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भगवान की मूर्तियां, चित्र, रुद्राक्ष, शिवलिंग, तांबे पर बने हुए यंत्र , इत्यादि क्या घर में नहीं रखन


प्रशन ;-भगवान की मूर्तियां, चित्र, रुद्राक्ष, शिवलिंग, तांबे पर बने हुए यंत्र , इत्यादि क्या घर में नहीं रखने चाहिए? अगर हमारे देवी देवता कृपा करने वाले हैं ,उनकी ऊर्जा हमें शक्ति प्रदान करने वाली है शुभता देने वाली है तो क्या कारण है कि मंदिर में वे हमें शुभता प्रदान करेंगे और जैसे ही हम उन्हें घर में लाएं वे अशुभ हो जाएंगे और नकारात्मक प्रभाव देना शुरू कर देंगे ? यह तो बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसा कैसे हो सकता है? मैं एक दुकान पर जाता हूं और वहां केक खा लेता हूं ।अब यही केक मैं दुकान से घर में लाऊं और खाऊं तो मेरे लिए हानिकारक है यदि मैं इसे दुकान में खाऊं तो मेरे लिए हानिकारक नहीं है मेरे लिए बहुत लाभदायक है यह बात कुछ जचती नहीं है। पर यह भी सत्य है कि आपका विश्लेषण गलत तो हो नहीं सकता आपने कुछ सोच समझकर ही और कुछ देख कर ही यह विश्लेषण प्रस्तुत किया है गुरु जी आप भक्तों की मन की व्यथा को देखिए इसे पढ़ने के बाद और तो कुछ नहीं श्रद्धा का तो अंत हो कर रहेगा। जो भी इसे पढ़ेगा वह सोचेगा कि शायद हमारे देवी देवता बेकार हैं, इनकी पूजा पाठ करना गलत है ज्यादा देवी देवताओं का सम्मान करना गलत है और हमारे देवी देवता ineffective useless harmful injurious हैं,बेकार हैं ,नुकसान पहुंचाने वाले हैं। ज्यादा पूजा पाठ करने का कोई फायदा नहीं है पूजा पाठ करना ही नहीं चाहिए यह एक बेकार की चीज है दूसरे धर्मों के देवता अच्छे हैं हमारे देवी देवता बेकार के हैं इत्यादि इत्यादि।

मैं यह कहना चाहता हूं की आप जो विधि बता रहे हैं पूजा करने की वह तो वैसे ही है जैसे इस्लाम में। वे लोग घर पर किसी प्रकार की कोई चीज नहीं रखते हैं अपने घर में वो सिर्फ नमाज ही पढ़ते हैं और हफ्ते में एक बार या बीच-बीच में वह मस्जिद में जाकर ही नमाज़ पढ़ते हैं । आप की विधि भी वैसी ही है कि अपने घर में किसी प्रकार के पूजा के उपकरण ना रखे , देवी-देवताओं के चित्र ना रखे ,केवल मंदिरों में जाकर देवी-देवताओं की पूजा की जाए । आप यदि यह सब बता रहे हैं तो कुछ सोच कर ही बता रहे हैं परंतु हमारे पुराने ऋषि-मुनियों और मनीषियों ने इस बात को क्यों नहीं कहा है।

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उत्तर... पहली बात तो ये कि भक्ति और भगवान की धार्मिक हदबंदी की शरारत इंशानी दिमाग का फितूर है, न कि ऊपर वाले की डिमांड। किसी भी धर्म के मूल में जाने पर वहां सनातन ही मिलता है। मंदिर और मस्जिद में बहुत फर्क है इसे कहने की जरूरत नही। जब मंदिर जाने की बात कही जाये मगर उसे मस्जिद जाने जैसा करार दिया जाये तो आगे कुछ कहना शेष नही बचता।

भगवान और केक में भी फर्क किया जाना चाहिये। जब विषय जीवन से जुड़ा हो तो टिप्पड़ी में उत्तेजना की जगह धैर्य अधिक उपयोगी होता है।

अब समझें मूर्तियों का विज्ञान..... पहली बात तो हम यहां भक्ति के विज्ञान की बात कर रहे हैं. न कि उसके खिलाफ. हम मानते हैं कि भक्ती करना ही काफी नही है, बल्कि जरूरी है भक्ती के परिणामों तक पहुंचना. जब तक कोई व्यक्ति नासमझी, पाखंड, प्रपंच, रुढ़ियों और परम्पराओं में उलझा है तब तक उसकी भक्ती फलदायी नही हो सकती. घर में मंदिर बनाना इसी तरह की एक क्रिया है. किसी जगह को मंदिर का नाम दे देने भर से वहां भगवान पैदा नही हो जाते. बल्कि उस जगह को भगवान की उर्जाओं के साथ जोड़ने से उनका आशीर्वाद मिलता है. इसी तरह किसी वस्तु को भगवान का नाम दे देने भर से उसमें भगवान वास नही करने लगते, बल्कि उस वस्तु को भगवान की उर्जाओं से जोड़कर उसे दैव उर्जाओं का केंद्र बनाया जाता है. प्राण प्रतिष्ठायुक्त मंदिरों में पूजा प्रार्थना करने से व्यक्ति की नकारात्मक उर्जाओं का शमन होता है. क्योंकि शास्त्रों के विधान में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा करके उन्हें नकारात्मकता हटाने और सकारात्मकता देने के लिये तैयार किया जाता है. इसी को देव आशीर्वाद कहते हैं. ये प्रक्रिया घर के मंदिर में नही अपनाई जा सकती. धन खर्च करके कोई घर में एेसे अनुष्ठान करा भी ले तो भी सामूहिक पूजा पाठ कैसे होगा. बिना सामूहिक पूजा प्रार्थना के देव उर्जायें स्थायित्व नही ग्रहण करतीं. घरों में पहले से ही समस्याग्रस्त नकारात्मक उर्जायें होती हैं. उन्हीं के बीच बैठकर पूजा पाठ करने से समस्यायें घटने की बजाय बढ़ती हैं. क्योंकि पूजापाठ से प्राप्त सकारात्मक उर्जायें भी नकारात्मक उर्जाओं में मिलकर नकारात्मक हो जाती हैं. इसे एेसे समझें जैसे एक बाल्टी जहरीले पानी में दो बाल्टी साफ पानी मिला दिया जाये तो तीन बाल्टी जहरीला पानी तैयार हो जाएगा. जिससे नुकसान खतरा बढ़ जाएगा. सही मायने में घरों में मंदिर पूजा पाठ के बिगड़े स्वरूप का साक्ष्य हैं. सिर्फ मूर्तियां इकट्ठी होने से भगवान की कृपा का केंद्र बनता तो देवी देवताओं की मूर्तियां और फोटो बेचने वाली दुकानें स्वर्ग बन जाती हैं. अब बात करते हैं कि ऋषियों मुनियों ने इस बारे में कुछ क्यों नही बोला. ऋषियों मुनियों के काल में लोग घरों में मंदिर बनाते ही नही थे. इसलिये उन्हें इस बारे में कुछ कहने की जरूरत नही पड़ी. इस काल में आश्रम पद्धति थी. वहीं मंदिर थे. लोग वहीं जाकर प्रार्थनायें करते थे. जो लोग अधिक प्रभावशाली थे वे अपने लिये अलग मंदिर बनवाते थे. वहां सामूहिक पूजा न होने के कारण उनके कुल विनाश को प्राप्त हो जाते थे. जैसे रावण का कुल. इन बातों को समझने के लिये आप सबको लाजिक से निकलकर अध्यात्म के विज्ञान को समझना होगा.

भगवान ने इसे विज्ञान के रूप में ही स्थापित किया है. उसी रूप में समझें और अपनायें तो पूजा पाठ और भक्ती को कभी विफलता का मुंह नही देखना पड़ता. अन्यथा भक्त ही वो कौम है जो भगवान के नाम पर जान देने का शोर मचाते हैं मगर भगवान को ही कोसने से बाज नही आते. वे ये कहने में क्षण मात्र भी नही लगाते कि भगवान तो उनकी प्रार्थना नही सुनते. या भगवान उन्हें दुख दे रहे हैं. ये बातें भक्ती की नही आलोचकों की हैं. गलती या नासमझी हम करें और जिम्मेदार भगवान को ठहराएं, ये कैसी भक्ती. ये कैसा धर्म.

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मंदिर का मतलब होता है देवस्थान। देवस्थान यानि कि वो जगह जिसकी उर्जायें सीधे देव शक्तियों से जुडी हों। किसी भी स्थान और वस्तुओं को ब्रह्माण्ड की देव शक्तियों से जोड़ने का निर्धारित वैदिक विज्ञान है। जिसे शास्त्रों में विधि पूर्वक बताया गया है। उसी के तहत मंदिर स्थापना के लिये स्थान का चयन किया जाता है। 1.वो स्थान विवादित या अवैध कब्जे वाले नही होना चाहिये, दान की गयी भूमि को उत्तम माना गया है। 2. मूर्ति स्थापना से पहले वहां की वास्तु ऊर्जाओं का जागरण कर लेना अनिवार्य होता है। 3. मूर्तियों का चयन भी वैदिक विज्ञान के आधार पर किया जाता है। फिर मूर्तियों को विभिन्न प्रक्रियाओं से कई दिनों तक शोधित किया जाता है। 4. उसके बाद लंबे सामूहिक अनुष्ठान करके उनकी प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। तब वे ब्रह्माण्ड में देवशक्तियों के साथ जुड़कर वहां से कल्याणकारी उर्जायें प्राप्त कर पाने में सक्षम हो पाती हैं। 5. इसके लिये उत्कृष्ट शास्त्रीय विधि को अपनाया जाता है। जो कि विज्ञान से भी ऊपर का विज्ञान है। क्या घरों में देवस्थान स्थापना के लिये ये सब सम्भव है। इस विधान के बिना कहीं भी बना मंदिर देवस्थान नही बल्कि उसका दिखावा मात्र होता है। दिखावा सदैव अहितकर ही होता है। प्रतीकात्मक मंदिर देव शक्तियां दे पाने में सक्षम नही होते। बल्कि कालांतर में अविश्वास का कारण बनते हैं। इसे ऐसे समझें कि किसी फिल्म में प्रधानमंत्री का रोल करने वाला व्यक्ति सच में प्रधानमंत्री जैसे काम नही कर सकता। कोई व्यक्ति भ्रांतिवश अपने काम कराने के लिये उसके चक्कर लगाता घूमे तो ये उसकी नासमझी ही होगी। इसी तरह तीर्थो की सड़किया दुकानों पर बिकने वाली मूर्तियों की तुलना तीर्थो की शक्तियों से नही की जानी चाहिये। उन्हें घर में रखकर तीर्थ की देव शक्ति मिल जायेगी, ऐसा सोचना नकली प्रधानमंत्री से काम लेने जैसा ही होगा। हाँ अगर भावनाएं भक्तिपूर्ण है तो कहीं भी देव शक्ति प्राप्त की जा सकती है। मगर भावनाएं किसी वस्तु या प्रतीक की मोहताज नही होतीं। मंदिर की मर्यादाएं..... 1. मूर्ति स्थापना भूमि पर बने प्लेटफार्म चबूतरे आदि पर ही होनी चाहिये. ... इससे नकारात्मक ऊर्जाओं की ग्राउंडिंग होती है 2. मूर्तियों के ऊपर और नीचे कुछ और बिलकुल नही होना चाहिये। ... ऐसा होने पर मूर्तियों की ऊर्जा शक्ति दूषित होती रहती है। 3. मंदिर में हर दिन कम से कम दो बार वैदिक आरती होनी चाहिये ... इससे मूर्तियों के आस पास की उर्जायें साफ होती हैं और देव शक्तियां मिलावट से बची रहती हैं 4. मंदिर में बिना प्राण प्रतिष्ठा के कोई भी मूर्ति नही होनी चाहिए .... बिना प्राण प्रतिष्ठा वाली मूर्तियों की ऊर्जा मिलावटी और अनियंत्रित होती है, जो दूसरी ऊर्जाओं को भी प्रभावित करती है 5. जहां मंदिर हो उस परिसर में कलह, गुस्सा और निंदा बिलकुल नही की जानी चाहिये ... इनकी गन्दी उर्जायें निर्मल देव शक्तियों का पलायन कर देती हैं 6. स्थापित मूर्तियां अपने स्थान से कभी न हटाई जाएँ ... हिलने या स्थान बदलने से मूर्तियों की उर्जायें बिखर जाती हैं, ऐसे में वे मिलावटी हो जाती हैं। मिलावटी ऊर्जा अक्सर नुकसान का कारण बनती है 7. मंदिर में हर दिन कम से कम 10 मिनट शंख और घण्टा घड़ियाल बजने चाहिये ... इससे वहां की नकारात्मक उर्जायें टूट कर निकल जाती हैं

ऐसी ही कई और अनिवार्य मर्यादाएं हैं जिन्हें घर के मंदिर में निभा पाना मुश्किल होता है। जिससे जाने अनजाने वहां हुआ पूजा पाठ अमर्यादित या नकारात्मकता से युक्त हो जाता है, अमर्यादित क्रियाएं सदैव दुखदायी ही होती हैं, भले ही मर्यादा नासमझी में ही क्यों न टूटी हो।

यहां हमने इस बात पर चर्चा की है कि मंदिर अर्थात देव स्थान कैसा होना चाहिये। इस पर चर्चा नही की कि किस मंदिर में क्या हो रहा है. इस श्रृंखला का उद्देश्य अध्यात्म के मूल विज्ञान को सामने लाना है। ताकि भ्रांतियां टूटें, रूढ़ियों की जकड़न हटे और श्रद्धालु अपनी पूजा पाठ का फल भी प्राप्त कर सकें। यहां हम कोई सुझाव या राय नही दे रहे, विज्ञान बता रहे हैं. आपके जीवन से जुड़ा हर फैसला आपका व्यक्तिगत होना चाहिये। आपका जीवन सुखी हो यही हमारी कामना है। हर हर महादेव।

घर में मंदिरः आलसी या अहंकारी भक्ति का प्रमाण

सभी अपनों को राम राम कुछ समय पहले एक दम्पति मुझसे मिलने आये. वे अपने साथ एक लिस्ट लाये थे. जिसमें 28 चीजों के नाम लिखे थे. वे चीजें थीं देवी देवताओं के फोटो या मूर्तियां. कुल मिलाकर 28. मुझसे कहा कि इनकी एनर्जी चेक करके बताइये कि इनमें कौन कौन परिवार की एनर्जी से मैच करते हैं. सबके फोटो भी लाये थे. जिनसे मैने एनर्जी रीड की. पाया कि उनमें से किसी भी चीज की एनर्जी उनसे मैच नही कर रही थी. एेसे में की जानी वाली पूजा विपरीत प्रभाव देती है. मेरी बात पर सहमति जताते हुए उन्होंने बताया कि जितनी ज्यादा पूजा पाठ करते हैं, समस्यायें उतनी ही बढ़ती चली जा रही हैं. मैने उनसे पूछा कि इतने फोटो/मूर्तियों घर में क्यों रखी हैं. उन्होंने बताया कि कुछ तो तीर्थों से लायी गईं, कुछ ज्योतिष-वास्तु के विद्वानों के कहने पर रखीं. एक पुरानी है, जो दादा जी के जमाने से स्थापित है. उनका कहना था कि तीर्थों से मूर्तियां लाकर घर में रखने से एेसा सोच रहा था कि शायद वो तीर्थ की शक्तियां घर में ही स्थापित हो जायेंगी. मैने पूछा तीर्थों से लायी मूर्तियां रखने के बाद कर्ज बढ़ा क्या. कलकुलेशन करके उन्होंने बताया कि 6 साल में 3 करोड़ का कर्ज हो गया. मैने पूछा ज्योतिषियों, वास्तु विदों के सुझाव पर मूर्तियां रखने से कलह बढ़ी क्या. उन्होंने बताया कि उसी के बाद बहू बेटे अलग अलग रह रहे हैं. अब तो तलाक ही आखिरी रास्ता बचा है. घर का हर सदस्य अपनी अपनी चला रहा है. घर में सभी परायों की तरह रहते हैं. मैने पूछा इस सबके लिये आप किसको जिम्मेदार मानते हो. हम तो किसी का बुरा करना तो दूर बूरा सोचते भी नहीं. जितना बन पड़ता है सबकी मदद ही करते हैं. पति, पत्नी का एक ही मत था भगवान ही हमारी नही सुन रहे. वही दुख दे रहे हैं. हम तो हर समय उनकी सेवा ही करते हैं. शायद भगवान से अच्छे लोगों का सुख देखा नही जाता. आप लोगों ने घर में ये दुकाननुमा मंदिर क्यों बनाया है. बाहर के मंदिर में क्यों नही जाते. मैने पूछा. इस पर पति पत्नी के दो मत सामने आये. पति ने बताया रात देर से आता हूं, सुबह 8 बजे उठता हूं. 10 बजे फैक्ट्री के लिये निकलना होता है. मंदिर जाने का टाइम ही नही मिलता. इसलिये घर पर ही मंदिर बनाया है. पत्नी का कहना था वे पहले नियमित एक मंदिर में जाती थीं. मगर वहां का पुजारी भेदभाव करने वाला निकला. वो उनकी पड़ोसन को ज्यादा इंम्पार्टेंश देता था. मंदिर की कमेटी से भी हमने इसकी शियाकत की. मगर पुजारी नही बदला. प्रसाद देते समय भी मेरे साथ एेसे पेश आता था जैसे अहसान कर रहा हो. इसलिये हमने मंदिर जाना बंद कर दिया. घर में ही मंदिर बढ़ा लिया. बढ़ा लिया का क्या मतलब है. मैने पूछा. मतलब ये कि उस मंदिर में जिन जिन देवी देवताों की मूर्तियां हैं, उन सबको हमने भी अपने घर के मंदिर में स्थापित कर लिया. उनकी सेवा के लिये एक पंडित जी रोज घर पर आते हैं और पूजा पाठ कर जाते हैं. कहने की जरूरत नही कि उन दोनो ने आलस्य और अहंकार की वजह से मंदिर जाना छोड़ा. कमोवेश एेसा ही हाल 98 से अधिक भक्तों का है. वे मंदिरों में जाने से बचने के लिये घर में मंदिर बना या बढ़ा लेते हैं. ये गलत है. मैने उस दम्पति को बताया और घर से मंदिर हटाकर विसर्जित करने की सलाह दी. उनसे कहा कि दादा जी के जमाने से रखी मूर्ति वहीं रख दो जहां पहले रखी थी. पहले वो मूर्ति घर के लाकर में थी. ये काफी कठिन फैसला था उनके लिये. 5 माह लगे उन्हें घर का मंदिर विसर्जित करने में. विसर्जित करते ही मेरे पास आये और बोले कुछ भला बुरा हो तो आप ही सम्भालना. लेकिन क्या अब घर में पूजा पाठ बिल्कुल न करें. मैने उन्हें घर में बिना मंदिर के पूजा करने की मानस पूजा का विधान बताया. कुछ महीने बाद वापस फिर आये. उनके साथ बहु बेटा भी था. बोले आपने सही कराया. भगवान की गलती नही थी. हम ही गलत कर रहे थे. भगवान तो सबकी सुनते हैं. हमारी भी.

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ये भक्ति नही उपाय हैसभी अपनों को राम रामPK का नंगा एलियन हो या OMG का कांजी भाई या न्यूज चैनलों पर चिल्ला चिल्लाकर अपनी बात मनवाने की कोशिश में धर्म का मजाक उड़ा रहे तथाकिथत तर्कशास्त्री. सब इस बात से चिंतित नजर आते हैं कि हर दिन शिवलिंग पर हजारों लीटर दूध चढ़ाकर बर्बाद कर दिया जाता है. उसे गरीबों को दे दिया जाये तो उनका पोषण हो जाएगा.मै उन्हें गलत नही मानता. गलत उन्हें मानता हूं जिन पर एेसी बातों को समझाने का दायित्व है. वे खुद को धर्म का विद्वान कहते हैं. फिर भी अपने जवाब से एेसे जिज्ञासुओं को संतुष्ट नही कर पाते. अंत में उन्हें नास्तिक या बेलगाम कहकर मुंह मोड लेते हैं. जहां अधिक दबाव होता है वहां भगवान की लीला कहकर अपनी छाती चौड़ी कर लेते हैं. उनसे एक सवाल जरूर पूछा जाना चाहिये कि वे किस लीला की बात कर रहे हैं.यदि भगवान की लीला (नाटक) से उनका तात्पर्य किसी रंगमंच या नाटक से है तो क्या भगवान को नाटक बाज मान लिया जाये. एेसे में कोई किसी नाटकबाजी पर यकीन क्यों करे. यदि भगवान की लीला (रचना) से उनका तात्पर्य उस साइंस से है जिससे दुनिया रची गई और जिससे दुनिया चलती है तो उन्हें उस विज्ञान की बारीकियों को बताना होगा. जिससे वे कतराते हैं. हो सकता है उन्हें खुद उस विज्ञान की जानकारी न हो या वे उसे गुप्त रखना चाहते हैं. कारण कुछ भी हो. परिहास का शिकार अध्यात्म को ही होना पड़ रहा है. दिनोदिन विश्वास संदेह की भेट चढ़ रहा है. इसी कारण लोगों की भक्ति में भय घुस गया है. अधिकांश लोग पूजा पाठ आदि सदगति की बजाय खराब समय के भय से करने लगे हैं. भक्ति की बजाय पूजा पाठ को ज्योतिष, वास्तु, तंत्र के उपायों के रूप में अपनाया जा रहा है.

.शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाना भी एेसा ही उपाय है. ये शरीर में मौजूद पंचतत्वों को उपचारित करने की विधि है.सभी जानते हैं कि हमारा शरीर पंचतत्वों से बना है. सक्षम शरीर के लिये पंचतत्वों की उर्जाओं का संतुलन अनिवार्य है.मगर ये कम ही लोग जानते हैं कि सक्षम जीवन के लिये कई और तत्वों की अनिवार्यता होती है. वे तत्व आत्मा के संचालन में भूमिका निभाते हैं. शरीर और आत्मा के संयोग को ही जीवन कहा जाता है. दोनो में से एक भी कमजोर पड़ा तो सफलतायें नही मिलतीं. इनमें एक तत्व है शिव तत्व. ये अनाहत चक्र की परिधि में रहता होता है. शिव तत्व सभी में उपलब्ध है. इसीलिये भगवान शिव ने सभी को *शिवोहम् अर्थात् मै शिव हूं* कहने का अधिकार दिया है.शिव तत्व की वैज्ञानिक चर्चा हम फिर कभी करेंगे. अभी सिर्फ इतना जान लेते हैं कि जब कोई सिद्ध कहता है कि उसने शिव के दर्शन कर लिये तो उसका अर्थ होता है कि उसके भीतर का शिवतत्व जाग गया. उसने शिवतत्व का मन माफिक उपयोग करने का रहस्य जान लिया.

अब हम बात करेंगे शिवलिंग पर दूध चढ़ाने की. इस व्याख्या के दो रास्ते हैं. एक भक्ति का दूसरा विज्ञान का. दोनो ही प्रमाणित करते हैं कि शिवलिंग पर दूध या जल भगवान शिव को खुश करने के लिये नही बल्कि खुद को उपचारित करने के लिये चढ़ाया जाता है.पहले हम इसके वैज्ञानिक पक्ष की बात करेंगे. शिवलिंग भगवान शिव का कोई अंग नही है. ये उनके द्वारा लोकहित में रचा गया उर्जा यंत्र है. जो आभामंडल से नकारात्मक उर्जाओं को निकालता और सकारात्मक उर्जाओं को देता है.ये ब्रह्मांड की अकेली आकृति है जो एक ही समय में नकारात्मकता हटाने और सकारात्कता स्थापित करने का काम करती है. इसकी आकृत्ति सर्वोत्तम आभामंडल की आकृत्ति वाली है. आभामंडल का सर्वोत्तम आकार उल्टे अंडे की तरह होता है. जो इत्तिफाक से लिंग जैसा भी है. इसलिये इसे लिंग कहकर संबोधित किया गया. इसकी रचना शिव ने की इसलिये इसे शिवलिंग कहा गया.

शिवलिंग नकारात्मकता हटाकर हमारे भीतक के शिव तत्व को जगाने वाली अध्यात्म की सर्वाधिक प्रभावशाली तकनीक है. इसके विज्ञान पर चर्चा हम फिर कभी करेंगे. आज इसके उपयोग की बात कर लेते हैं. इनकी पूजा करते समय ये साधक के आभामंडल के भीतर होते हैं. सामान्य अवस्था में किसी व्यक्ति का आभामंडल 7 से 9 फीट दूर तक फैला होता है. जैसे ही हम शिवलिंग के पास जाते हैं, आभामंडल के भीतर शोधन क्रिया अपने आप शुरू हो जाती है. प्राकृतिक रूप से आभामंडल से नकारात्मक उर्जायें खींचकर जलहरी के जरिये उनकी ग्राउंडिंग कर दी जाती है. ताकि वे रुकावटी उर्जायें दोबारा लौटकर हमारे पास न आ सकें. इसीलिये शिवलिंग पर चढ़ाये गये तरल पदार्थ सीधे नाली में बहा दिये जाते हैं. क्योंकि उनमें नकारात्मक उर्जायें बह रही होती हैं.

शिवलिंग से बह रही चीजों को छूने भर से रोग व रुकावटें पीछे लग सकती हैं. उसे न छुवें. आगे बढ़ने से पहले उर्जा विज्ञान का एक फार्मूला याद रख लें. वह ये कि समधर्मी उर्जायें एक दूसरे को आकर्षित करती हैं. दूध की उर्जायें अनाहत चक्र की उर्जाओं की समधर्मी होती है. हाथ में आते ही ये अनाहत चक्र की उर्जाओं को आकर्षित करके अपने से जोड़ लेता है. शिवलिंग पर चढ़ाते समय अनाहत चक्र की नकारात्मक उर्जाओं को साथ लेकर बह जाता है. शिवलिंग उन हानिकारक विषाक्त उर्जाओं को जलहरी से बहाकर धरती के भीतर भेज देते हैं. इस तरह शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से अनाहत चक्र की सफाई हो जाती है.

अनाहत चक्र प्रेम, दया, आनंद, करुणा, क्षमा का केंद्र है. इस पर से गंदी उर्जायें हटने से शरीर के पंच तत्वों में से वायु तत्व का जागरण होता है. जिससे दुख, तनाव, नफरत, हृदय रोग, डिप्रेशन, फ्रस्टेशन और शरीर का वायु विकार कंट्रोल होता है. अनाहत चक्र पर शिव तत्व भी केंद्रित है. प्रदूषण हटने से वह भी एक्टिव होने लगता है. अध्यात्मिक शक्तियां जीवन को बेहतर बनाने में जुट जाती हैं. शिवलिंग पर दूध तो बहुत लोग चढ़ाते हैं. मगर सबको एेसा लाभ नही मिलता. क्योंकि वे इस विज्ञान से अंजान हैं. उन्हें बता दिया गया है कि इससे भगवान शिव खुश हो जाएंगे. तो वे अधिक से अधिक दूध चढ़ाने में जुटे रहते हैं.ये गलत है. अति हर चीज की बुरी होती है. जरूरत से ज्यादा दूध चढ़ाने से नकारात्मक उर्जायें खत्म होने के बाद अनाहत चक्र की सकारात्मक उर्जायें भी निकलकर बह जाती हैं. जिससे उल्टा असर होता है. धर्म के जानकार इसे देव बाधा कहते हैं.

अनाहत चक्र की सफाई का गुण कच्चे दूध में ही होता है. इसलिये पैकेट खोलकर चढ़ाया गया दूध बेअसर होता है. क्योंकि उसमें पाउडर वाला दूध भी मिलाया गया होता है. दूध में पानी मिलाकर ही शिवलिंग पर चढ़ाया जाना चाहिये. पानी जल तत्व युक्त स्वाधिष्ठान चक्र को भी साफ करता है. स्वाधिष्ठान चक्र की 70 प्रतिशत उर्जायें विशुद्धी चक्र के रास्ते सौभाग्य चक्र को जाती हैं. मनोकामनायें पूरी करने और सिद्धियां पाने के लिये इन्हीं उर्जाओं की जरूरत पड़ती है.

शिवलिंग से बहकर नाली में जा रहे दूध, पानी आदि को प्रसाद के रूप में नही दिया जाता. क्योंकि इनमें भयानक रेडिएशन से भी खतरनाक नकारात्मका होती है.अब बात करते तर्क शात्रियों के सवाल की.उनका कहना है कि दूध शिवलिंग पर चढ़ाने की बजाय गरीब बच्चों को दे दिया जाये. जिससे उनका पोषण होगा. हर व्यक्ति को क्षमतानुसार जरूरत मंदों की मदद करनी ही चाहिये. मगर उपचार अलग बात है और मदद करना अलग. किसी की मदद करने के लिये बिल्कुल जरूरी नही होता कि अपना उपचार न किया जाये.सबसे खास बात जिनकी उर्जायें खराब हैं उनके हाथ से जिसे भी दूध दिया जाएगा. वही संकट में पड़ जाएगा. क्योंकि कच्चा दूध प्राकृतिक क्रिया के मुताबिक अनाहत चक्र की नकारात्मक उर्जाओं को अपने भीतर ले ही लेगा. उसके बाद जिसके पास जाएगा, उसी के अनाहत चक्र में वे सारी उर्जायें फैला देगा.

इसे वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित करना चाहें तो कोई तर्क शास्त्री खुद को सामने लाये. अपने हृदय की जांच कराये. फिर किसी हृदय रोगी के हाथ से हर दिन आधा लीटर कच्चा दूध लेकर पिये. 40 दिनों बाद दोबारा हृदय की जांच कराये. वहां हृदय रोग के लक्षण मिलेंगे.शिवलिंग पर दूध चढ़ाकर खुद को उपचारित करने की जो बातें लिखी हैं. उनका वैज्ञानिक प्रमाण लेना चाहें तो... 1. किसी औरा फोटोग्राफी का सहारा ले सकते हैं. दूध चढ़ाने से पहला किसी के औरा का फोटो लें. दूध चढ़ाने के तुरंत बाद लें. दोनो में बड़ा फर्क नजर आएगा.2. जिसका बी. पी. गड़बड़ हो उसे चेक करें. दूध चढ़ाने से पहले और कुछ देर बाद का बी. पी. चेक करें. फर्क देखने को मिल जाएगा. 3. दिल की धड़कन नापें. शिव लिंग पर दूध चढ़ाने से पहले दिल की धड़कन का ग्राफ ले लें. जल चढ़ाने के बाद फिर चेक करायें. फर्क नजर आ जाएगा. एेसे ही तमाम और वैज्ञानिक तरीके हैं जिनसे शिवलिंग पर दूध चढ़ाने के लाभ साक्षात् देखे जा सकते हैं.

शिव जी नशे नही करते हैं. बल्कि शिवलिंग पर भांग, धतूरा और गांजा रोगों से मुक्ति के लिये चढ़ाया जाता है. आखिर शिव को नशे की चीजें क्यों चढ़ती है? क्या वो यह पसंद करते है?जितने भी नशे की वस्तुएं है वह आप को “भरम, अचेतन, मिथ्या चेतना और माया” में ले जाती है । क्योंकि शिव जो है उनको लेकर कथा है कि उन्होंने दुनिया के सवसे जहरीला हलाहल विष को पी लिया था यानी वो बुराइयों को ग्रहण कर लेने में सक्षम है । इस वजह से जब हम शिव को धतूरा या कोई नशीली पदार्थ जैसे भाग या गाँजा चढ़ाते है तो उसके पीछे एक संदेश यह होता है।की महादेव जैसे आप ने हलाहल विष पी दुनिया को विषमुक्त किया वैसे ही मेरे भी विष या नशे (माया ,भरम ,आज्ञान) को हर कर मुझे इन बुराई से मुक्त करे या पवित्र बनाये”