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क्या है परम तत्त्व शिव का विज्ञान ? शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाने का क्या रहस्य है?


10 FACTS;-

क्या है परम तत्त्व शिव का विज्ञान ?

1-शिव मात्र एक आस्था के प्रतीक ही नहीं अपितु सत्य सनातन संस्कृति के प्रथम पुरुष एवं मनुष्य द्वारा ब्रह्माण्ड में निहित सबसे बड़े वैज्ञानिक खोज में से एक हैं .शिव मात्र जलाभिषेक के प्रतीक न होकर ब्रह्माण्ड की धुरी हैं .

शिव आकाशगंगा के मथते हुए निहारिकाओं के केंद्र हैं .करोणों सूर्य जिनकी परिक्रमा कर रहे हैं.

2-नासा के दूरबीनों के द्वारा खीचे हुए आकाश गंगाओं के केंद्राभिमुख होते चित्रों के मूल में हैं शिव .

शक्ति (energy) और द्रव्यमान (mass) का संयोग हैं शिव ……शव + शक्ति = शिव

उर्जा और द्रव्यमान को प्रोटॉन में बदलने की प्रक्रिया में निहित हैं शिव जिस से ब्रह्माण्ड का उदय हुआ …और इस तरह से भारतीय मनीषा ने इन शिव को परम “कल्याण” का स्वरुप माना…

शिव ही मूल हैं ……फिर शिव को मानवीय धारणाओ में समाहित करने को शिवलिंग का स्वरुप प्रकट हुआ ….

भारतीय आध्यात्म चिंतन में शिवलिंग का क्या विज्ञान है?-

शिवलिंग एक मात्र निराकार ब्रह्म जो ऐसा है की स्वतः स्फूर्त नर नारी का गुण समेटे …स्वयं में ही जन्म देने के गुणों से युक्त है … और इसलिए भारतीय मनीषा ने शिवलिंग की पूजा प्रारम्भ किया …..जो अर्धनारीश्वर है …जो उभय गुणों को समेटे है …और ब्रह्माण्ड में अद्वितीय लिंग है

शिवलिंग के ऊपर का भाग अंतरिक्ष ,मध्य पृथ्वी और नीचे भूमि में छुपा हुआ भाग पातळ या गहराई का द्योतक है … इस तरह से हम ब्रम्ह और ब्रह्माण्ड की पूजा करते हैं …

जलाभिषेक सीखा है हमने प्रकृति के रूद्रभिषेकों से …..हिमालय स्वरुप विशालता को कल कल करती नहलाती असंख्य नदी नदों और ग्लासियरों से …

यही अर्धनारीश्वर फिर शंकर कहलाते हैं….hybrid का अर्थ है मिश्रित स्वरुप जो हम विज्ञान में hybridisation के रूप में पढ़ते हैं .ठीक बिल्कुल उसी प्रकार…शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।

ध्यान देने योग्य बात है कि…''लिंग” एक संस्कृत का शब्द है………

जिसके निम्न अर्थ है :

अर्थात…रूप, रस, गंध और स्पर्श …ये लक्षण आकाश में नही है …किन्तु शब्द ही आकाश का गुण है ।

अर्थात….. जिसमे प्रवेश करना व् निकलना होता है ….वह आकाश का लिंग है ……. अर्थात ये आकाश के गुण है ।

अर्थात….. जिसमे अपर, पर, (युगपत) एक वर, (चिरम) विलम्ब, क्षिप्रम शीघ्र इत्यादि प्रयोग होते है, इसे काल कहते है, और ये …. काल के लिंग है ।

अर्थात……. जिसमे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर व् नीचे का व्यवहार होता है ….उसी को दिशा कहते है…मतलब कि….ये सभी दिशा के लिंग है ।

अर्थात….. जिसमे (इच्छा) राग, (द्वेष) वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, सुख, दुःख, (ज्ञान) जानना आदि गुण हो, वो जीवात्मा है… और, ये सभी जीवात्मा के लिंग अर्थात कर्म व् गुण है ।

इसीलिए…शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने के कारन…इसे लिंग कहा गया है…।

स्कन्दपुराण में स्पष्ट कहा है कि…आकाश स्वयं लिंग है एवं , धरती उसका पीठ या आधार है ..और , ब्रह्माण्ड का हर चीज ..अनन्त शून्य से पैदा होकर…अंततः उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है …

यही कारण है कि इसे कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे कि ज्योतिर्लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, विद्युत स्फुलिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam) इत्यादि

यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि…..

ठीक इसी प्रकार…… शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं | क्योंकि…. ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है…अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की दृष्टि से बोलने की जगह … शुद्ध वैज्ञानिक भाषा में बोला जाए तो…हम कह सकते हैं कि शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि हमारे ब्रह्मांड की आकृति है. स्कंदपुराण‘ में इसका अर्थ प्रकृति की चेतना से संबंधित है, आर्थात आकाश लिंग है और पृथ्वी उसकी पीठिका है। यह आकाश इसलिए लिंग कहलाता है, क्योंकि इसी में समस्त देवताओं का निवास है और इसी में वे गतिशील रहते हैं। आकाश को पुराणकारों ने इसलिए लिंग माना है, क्योंकि इसका स्वरूप शिव-लिंग जैसा अर्ध-वृत्ताकार है। दूसरे वह पृथ्वी रूपी पीठिका पर स्थित या अधिरोपित होने जैसा दिखाई देता है।

प्रकृतिमय इसी लिंग के आकार का वर्णन लिंग पुराण में है। इसके अनुसार सभी लोकों का स्वरूप लिंग के आकार का है। इसी लिंग में ब्रह्मा समेत सभी चर-अचर जीव, बीज स्वरूप लघु रूपों में प्रतिश्ठित हैं। सांख्य दर्शान भी लिंग और योनि को प्रकृति के रूपों में देखता है। इसमें व्यक्त प्रकृति के लिए लिंग शब्द का उपयोग किया गया है, जबकि अव्यक्त प्रकृति के लिए अलिंग शब्द का। अलिंग अर्थात जो लिंग नहीं है, यानी इसका आशय योनि से है। अर्थात शिव-लिंग के रूप में जिस मूर्ति की पूजा की जाती है ,वह लौकिक स्त्री-पुरुष के जननांग नहीं, वरन् विश्व जननी व्यक्त एवं अव्यक्त प्रकृति की मूर्तिस्वरूपा प्रतिमा है। शिवपुराण में शिव-लिंग को चैतन्यमय और लिंगपीठ को अंबामय बताया गया है। किंतु लिंग पुराण में लिंग को शिव और उसके आधार को शिव-पत्नी बताया गया है। यहीं से यह मान्यता लोक प्रचलन में आई कि शिव-लिंग उमा-महेश के प्रतीक स्वरूप हैं।

लिंग-पुराण में एक जगह शिव-लिंग को त्रिदेव का घोतक भी बताया गया है..,

''लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा शीर्ष पर भगवान शिव का निवास माना गया है ''

संसार की उत्पति में ॐ और शिव का सबसे बड़ा योगदान रहा है.शिव एक शुद्ध ज्योति रूपी चेतना है. इसी ज्योति रूपी चेतना से संसार की उत्पति होती है और यहीं पर जाकर आत्मा का सफ़र खत्म हो जाता है. इसी शक्ति से ऊर्जा उत्पन्न होती है और उसी उर्जा से इलेक्ट्रान, प्रोटोन एवं न्यूट्रॉन की उत्पति होती है.

शिव ही सत्य है और कभी शिव ही पूरे संसार में पूजनीय थे. ऐसा कई जगह लिखा हुआ है. वैसे कहते तो यह भी हैं कि सनातन ही नहीं बल्कि हर धर्म का अंतिम लक्ष्य शिव से आत्मा का मिलन कराना है. बाकी बस लोगों को भ्रमित करने के लिए कुछ आखिरी रोशनी या प्रकाश पुंज को अलग-अलग नाम दिए गये हैं.

ॐ नमः शिवाय का अर्थ

ॐ नम: शिवाय का जब हम अर्थ खोजते हैं तो हम प्राप्त कर सकते हैं कि (अ +उ +म अर्थात आत्मा +परमात्मा +प्रकृति) नम: का तात्पर्य हुआ कि मन अर्थात इच्छाओं से दूर अर्थात अपनी आत्मा के निकट और शिवाय का तात्पर्य हुआ कि शिव तत्व अर्थात प्रेम अर्थात परमात्मा के निकट.

तो सामान्य शब्दों में ॐ नमः शिवाय का अर्थ है कि मेरी आत्मा इस जड़ प्रकृति से दूर प्रेम और आनंद से परिपूर्ण मूल प्रकृति अर्थात परमात्मा के निकट आ जाये.

ॐ सबसे पहली ध्वनि थी

ऐसा बोला जाता है कि संसार की उत्पत्ति के समय जो सबसे पहली ध्वनि संसार में गूंजी थी वह ॐ की ही ध्वनि थी.

यजुर्वेद कहता है कि ॐ ही ब्रह्मा है. सिख धर्म कहता है कि एक ओंकार सतनाम, अर्थात मात्र ॐ स्वरुप ही परमात्मा है. बौद्ध, जैन और यहाँ तक कि यहूदी-इसाई धर्म में भी ॐ ही सबकुछ है.

तो शिव हैं क्या?-

असल में सनातनी लोग भी शिव को पहचान नहीं पाए हैं. शिव वह नहीं है जो गले में सर्प लिए है या डमरू बजाते है. असल में शिव एक ऊर्जा है जो प्रकाश रूप में इस संसार को बनाये हुए है. आत्मा वहीँ से निकलती है और अगर उस आत्मा को मोक्ष मिलता है तो उसी में समा जाती है.

शिवलिंग की स्थापना शिव इस चर-अचर जगत की चेतना का मूल हैं। जगत की सारी अशुद्धि को शुद्ध करना शिव का कर्म है। जगत की सारी अच्छी और बुरी ऊर्जाएं शिव से ही शुद्ध होती हैं।

शिवलिंग के जलाभिषेक का महत्व;-

05 FACTS;-

1-ऐसा माना जाता है कि जहां शिवलिंग की स्थापना होती है, उस स्थान की सारी नकारात्मकता स्वयमेव नष्ट हो जाती है। शिवलिंग के पास से निकलने वाली सभी बुरी शक्तियां उसके स्पर्श से शुद्ध हो जाती हैं। इसी अवधारणा के साथ शिवलिंग के जलाभिषेक को मान्यता प्राप्त हुई है। माना जाता है कि जब बुरी शक्तियां प्रबल होती हैं, तब उनका ताप बहुत बढ़ जाता है।

यही शक्ति जब शिवलिंग से टकराती है, तब अपने कर्म के अनुसार वह उसका पूरा ताप हर उसे शुद्ध कर देते हैं।

2-इस क्रम में शक्ति तो शुद्ध हो जाती है, पर उसके ताप को ग्रहण कर शिवलिंग की गर्मी बढ़ जाती है। शिवलिंग पर लगातार जल चढ़ाने से उस अशुद्ध ताप में कमी आती है। दूध और पानी के मिश्रण से शिवलिंग की गर्मी समाप्त होती है और शक्ति में वृद्धि होती है। तब वह पुनः शक्तिशाली होकर दोगुनी क्षमता से विश्व के शुद्धिकरण में संलग्न हो जाते हैं।

3-इस बात को व्यक्तिगत स्तर पर बड़ी आसानी से समझा जा सकता है। यदि हम भयंकर तनाव, थकान या काम की अधिकता से परेशान हों, तो हमारा दिमाग गर्म हो जाता है। ऐसी हालत में हमारा दिमाग काम करना बंद कर देता है। इसके ठीक विपरीत अगर हमारा दिमाग और मन शांत हो, तो हमारी कार्यक्षमता बढ़ जाती है और हम बेहतर ढंग से काम कर पाते हैं।

4-शास्त्रों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए सभी कर्म स्वाधिष्ठान चक्र में संग्रहित होते हैं। यह चक्र जल तत्व से बना है। जब भी हम कोई बुरा काम करते हैं, तो वह हमारे शरीर के जल चक्र को प्रदूषित करता है। चूंकि जल तत्व पर ही व्यक्ति की व्यक्तिगत, स्वास्थ्य, संपत्ति और आध्यात्मिक उन्नति आधारित होती है, इसलिए जल तत्व के बुरे कर्म ग्रहण करते ही उसके पूरे जीवन पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

5-जाने-अनजाने में गलत काम करके व्यक्ति अपना ही नुकसान कर रहा होता है। ऐसे में जब कोई व्यक्ति शिवलिंग पर जल चढ़ाता है, तो उसके स्वाधिष्ठान चक्र में प्रदूषित हुआ जल तत्व, शिवलिंग पर जाप के साथ चढ़ाए जा रहे जल से एकाकार हो जाता है। इस तरह शिवलिंग पर जल चढ़ाने के साथ ही जल तत्व की शुद्धि हो जाती है और व्यक्ति का मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक उत्थान होता है।

शिव के जलाभिषेक और आत्मतत्व का रहस्य ;-

06 FACTS;-

1-उपर्युक्त बताए गए स्थूल कारणों के अतिरिक्त शिव के जलाभिषेक का एक सूक्ष्म कारण है, जो व्यक्ति के आत्मतत्व के रहस्य से जुड़ा है। माना जाता है कि हमारा शरीर पांच मूल तत्वों जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश से मिलकर बना है। हमारे शरीर के भीतर इन पांचों तत्वों से जुड़े चक्र पाए जाते हैं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण आज्ञाचक्र हमारे मस्तक के अग्र भाग में स्थित होता है। इसकी स्थिति मस्तक के अग्र भाग से लेकर नाक की आधी लंबाई तक रहती है। यह स्थान शिव का आधार माना जाता है। हमारा मस्तिष्क यही स्थित होता है।

2-इसके अलावा दूसरा महत्वपूर्ण स्थान सिर के उपरी हिस्से में माना जाता है, जहां सहस्रार चक्र होता है और यह आज्ञाचक्र से जुड़ा होता है। हमारे जीवन के सभी आनंद का स्रोत यही स्थल है। जब हम शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं, तब हमारे ध्यान में केवल दो बातें होती हैं- शिव और जल। इस प्रक्रिया में हम स्थूल रूप से जल शिवलिंग पर चढ़ा रहे होते हैं, पर सूक्ष्म रूप में हम अपने अंदर स्थित दो विशिष्ट चक्रों में स्थित शिव को पूज रहे होते हैं।

3-इस प्रक्रिया में शिवलिंग के शीतल होने के साथ हमारे शरीर के चक्रों का शुद्धिकरण हो रहा होता है। इससे महत्वाकांक्षाओं, तनावों, बढ़ती आयु आदि तमाम प्रभावों से क्षीण हो रहे हमारे शरीर के चक्रों को नई शक्ति मिलती है और हम आत्मिक रूप से शुद्ध हो जाते हैं। इसका सीधा प्रभाव हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर दिखाई देता है।

4-शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाना शरीर में मौजूद पंचतत्वों को उपचारित करने की विधि है.सभी जानते हैं कि हमारा शरीर पंचतत्वों से बना है. सक्षम शरीर के लिये पंचतत्वों की उर्जाओं का संतुलन अनिवार्य है.मगर ये कम ही लोग जानते हैं कि सक्षम जीवन के लिये कई और तत्वों की अनिवार्यता होती

है. वे तत्व आत्मा के संचालन में भूमिका निभाते हैं.

5-शरीर और आत्मा के संयोग को ही जीवन कहा जाता है. दोनो में से एक भी कमजोर पड़ा तो सफलतायें नही मिलतीं. इनमें एक तत्व है शिव तत्व. ये अनाहत चक्र की परिधि में रहता होता है. शिव तत्व सभी में उपलब्ध है. इसीलिये भगवान शिव ने सभी को शिवोहम् अर्थात् 'मै शिव हूं' कहने का अधिकार दिया है. जब कोई सिद्ध कहता है कि उसने शिव के दर्शन कर लिये तो उसका अर्थ होता है कि उसके भीतर का शिवतत्व जाग गया. उसने शिवतत्व का मन माफिक उपयोग करने का रहस्य जान लिया.

6-हिंदू धर्म की अधिकांश पूजा प्रक्रियाओं को केवल धर्म की दृष्टि से नहीं बनाया गया है। हमारे विद्वान मनीषियों ने हर कर्म का विधान व्यक्ति पर पड़ने वाले शारीरिक, आत्मिक प्रभाव को देखकर निश्चित किया है। यही कारण है कि हम हिंदुओं के अधिकतर कर्मविधानों का वैज्ञानिक आधार शास्त्रों में मिलता है। शिवलिंग पर जल अर्पित करने की छोटी सी प्रक्रिया के इस वृहद और सूक्ष्म विश्लेषण से आप जान सकते हैं कि हमारे हर धर्म-कर्म के धार्मिक ही नहीं, वैज्ञानिक प्रमाण भी उपलब्ध हैं।

शिवलिंग पर दूध चढ़ाने की व्याख्या;-

11 FACTS;-

1-इस व्याख्या के दो रास्ते हैं. एक भक्ति का दूसरा विज्ञान का. दोनो ही प्रमाणित करते हैं कि शिवलिंग पर दूध या जल भगवान शिव को खुश करने के लिये नही बल्कि खुद को उपचारित करने के लिये चढ़ाया जाता है.पहले हम इसके वैज्ञानिक पक्ष की बात करेंगे. शिवलिंग भगवान शिव का कोई अंग नही है. ये उनके द्वारा लोकहित में रचा गया उर्जा यंत्र है. जो आभामंडल से नकारात्मक उर्जाओं को निकालता और सकारात्मक उर्जाओं को देता है.

2-ये ब्रह्मांड की अकेली आकृति है जो एक ही समय में नकारात्मकता हटाने और सकारात्कता स्थापित करने का काम करती है. इसकी आकृत्ति सर्वोत्तम आभामंडल की आकृत्ति वाली है. आभामंडल का सर्वोत्तम आकार उल्टे अंडे की तरह होता है. जो इत्तिफाक से लिंग जैसा भी है. इसलिये इसे लिंग कहकर संबोधित किया गया. इसकी रचना शिव ने की इसलिये इसे शिवलिंग कहा गया.

3-शिवलिंग नकारात्मकता हटाकर हमारे भीतक के शिव तत्व को जगाने वाली अध्यात्म की सर्वाधिक प्रभावशाली तकनीक है. इनकी पूजा करते समय ये साधक के आभामंडल के भीतर होते हैं. सामान्य अवस्था में किसी व्यक्ति का आभामंडल 7 से 9 फीट दूर तक फैला होता है. जैसे ही हम शिवलिंग के पास जाते हैं, आभामंडल के भीतर शोधन क्रिया अपने आप शुरू हो जाती है. प्राकृतिक रूप से आभामंडल से नकारात्मक उर्जायें खींचकर जलहरी के जरिये उनकी ग्राउंडिंग कर दी जाती है. ताकि वे रुकावटी उर्जायें दोबारा लौटकर हमारे पास न आ सकें. इसीलिये शिवलिंग पर चढ़ाये गये तरल पदार्थ सीधे नाली में बहा दिये जाते हैं. क्योंकि उनमें नकारात्मक उर्जायें बह रही होती हैं.

4-शिवलिंग से बह रही चीजों को छूने भर से रोग व रुकावटें पीछे लग सकती हैं. उसे न छुवें. आगे बढ़ने से पहले उर्जा विज्ञान का एक फार्मूला याद रख लें. वह ये कि समधर्मी उर्जायें एक दूसरे को आकर्षित करती हैं. दूध की उर्जायें अनाहत चक्र की उर्जाओं की समधर्मी होती है. हाथ में आते ही ये अनाहत चक्र की उर्जाओं को आकर्षित करके अपने से जोड़ लेता है. शिवलिंग पर चढ़ाते समय अनाहत चक्र की नकारात्मक उर्जाओं को साथ लेकर बह जाता है. शिवलिंग उन हानिकारक विषाक्त उर्जाओं को जलहरी से बहाकर धरती के भीतर भेज देते हैं. इस तरह शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से अनाहत चक्र की सफाई हो जाती है.

5-अनाहत चक्र प्रेम, दया, आनंद, करुणा, क्षमा का केंद्र है. इस पर से गंदी उर्जायें हटने से शरीर के पंच तत्वों में से वायु तत्व का जागरण होता है. जिससे दुख, तनाव, नफरत, हृदय रोग, डिप्रेशन, फ्रस्टेशन और शरीर का वायु विकार कंट्रोल होता है. अनाहत चक्र पर शिव तत्व भी केंद्रित है. प्रदूषण हटने से वह भी एक्टिव होने लगता है. अध्यात्मिक शक्तियां जीवन को बेहतर बनाने में जुट जाती हैं.

6-शिवलिंग पर दूध तो बहुत लोग चढ़ाते हैं. मगर सबको ऐसा लाभ नही मिलता. क्योंकि वे इस विज्ञान से अंजान हैं. उन्हें बता दिया गया है कि इससे भगवान शिव खुश हो जाएंगे. तो वे अधिक से अधिक दूध चढ़ाने में जुटे रहते हैं.ये गलत है. अति हर चीज की बुरी होती है. जरूरत से ज्यादा दूध चढ़ाने से नकारात्मक उर्जायें खत्म होने के बाद अनाहत चक्र की सकारात्मक उर्जायें भी निकलकर बह जाती हैं. जिससे उल्टा असर होता है. धर्म के जानकार इसे देव बाधा कहते हैं.

7-अनाहत चक्र की सफाई का गुण कच्चे दूध में ही होता है. इसलिये पैकेट खोलकर चढ़ाया गया दूध बेअसर होता है. क्योंकि उसमें पाउडर वाला दूध भी मिलाया गया होता है. दूध में पानी मिलाकर ही शिवलिंग पर चढ़ाया जाना चाहिये. पानी जल तत्व युक्त स्वाधिष्ठान चक्र को भी साफ करता है. स्वाधिष्ठान चक्र की 70 प्रतिशत उर्जायें विशुद्धी चक्र के रास्ते सौभाग्य चक्र को जाती हैं. मनोकामनायें पूरी करने और सिद्धियां पाने के लिये इन्हीं उर्जाओं की जरूरत पड़ती है.

8-शिवलिंग से बहकर नाली में जा रहे दूध, पानी आदि को प्रसाद के रूप में नही दिया जाता. क्योंकि इनमें भयानक रेडिएशन से भी खतरनाक नकारात्मका होती है. तर्क शात्रियों का कहना है कि दूध शिवलिंग पर चढ़ाने की बजाय गरीब बच्चों को दे दिया जाये. जिससे उनका पोषण होगा. हर व्यक्ति को क्षमतानुसार जरूरत मंदों की मदद करनी ही चाहिये. मगर उपचार अलग बात है और मदद करना अलग. किसी की मदद करने के लिये बिल्कुल जरूरी नही होता कि अपना उपचार न किया जाये.

9-सबसे खास बात जिनकी उर्जायें खराब हैं उनके हाथ से जिसे भी दूध दिया जाएगा. वही संकट में पड़ जाएगा. क्योंकि कच्चा दूध प्राकृतिक क्रिया के मुताबिक अनाहत चक्र की नकारात्मक उर्जाओं को अपने भीतर ले ही लेगा. उसके बाद जिसके पास जाएगा, उसी के अनाहत चक्र में वे सारी उर्जायें फैला देगा.

10-इसे वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित करना चाहें तो कोई तर्क शास्त्री खुद को सामने लाये. अपने हृदय की जांच कराये. फिर किसी हृदय रोगी के हाथ से हर दिन आधा लीटर कच्चा दूध लेकर पिये. 40 दिनों बाद दोबारा हृदय की जांच कराये. वहां हृदय रोग के लक्षण मिलेंगे.

11-शिवलिंग पर दूध चढ़ाकर खुद को उपचारित करने की जो बातें लिखी हैं. उनका वैज्ञानिक प्रमाण लेना चाहें तो...

11-1-किसी औरा फोटोग्राफी का सहारा ले सकते हैं. दूध चढ़ाने से पहला किसी के औरा का फोटो लें. दूध चढ़ाने के तुरंत बाद लें. दोनो में बड़ा फर्क नजर आएगा.

11-2 -जिसका बी. पी. गड़बड़ हो उसे चेक करें. दूध चढ़ाने से पहले और कुछ देर बाद का बी. पी. चेक करें. फर्क देखने को मिल जाएगा.

11-3 -दिल की धड़कन नापें. शिव लिंग पर दूध चढ़ाने से पहले दिल की धड़कन का ग्राफ ले लें. जल चढ़ाने के बाद फिर चेक करायें. फर्क नजर आ जाएगा. ऐसे ही तमाम और वैज्ञानिक तरीके हैं जिनसे शिवलिंग पर दूध चढ़ाने के लाभ साक्षात् देखे जा सकते हैं.

NOTE;-

शिव जी नशे नही करते हैं. बल्कि शिवलिंग पर भांग, धतूरा और गांजा रोगों से मुक्ति के लिये चढ़ाया जाता है. आखिर शिव को नशे की चीजें क्यों चढ़ती है? क्या वो यह पसंद करते है?जितने भी नशे की वस्तुएं है वह आप को “भरम, अचेतन, मिथ्या चेतना और माया” में ले जाती है । क्योंकि शिव जो है उनको लेकर कथा है कि उन्होंने दुनिया के सवसे जहरीला हलाहल विष को पी लिया था यानी वो बुराइयों को ग्रहण कर लेने में सक्षम है । इस वजह से जब हम शिव को धतूरा या कोई नशीली पदार्थ जैसे भाग या गाँजा चढ़ाते है तो उसके पीछे एक संदेश यह होता है ... ''महादेव जैसे आप ने हलाहल विष पी दुनिया को विषमुक्त किया वैसे ही मेरे भी विष या नशे (माया ,भरम ,आज्ञान) को हर कर मुझे इन बुराई से मुक्त करे या पवित्र बनाये”