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क्या है परम तत्त्व शिव का विज्ञान ? शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाने का क्या रहस्य है?



क्या है भारतीय आध्यात्म चिंतन में परम तत्त्व शिव /शिवलिंग का विज्ञान ?-

09 FACTS;-

1-शिव मात्र एक आस्था के प्रतीक ही नहीं अपितु सत्य सनातन संस्कृति के प्रथम पुरुष एवं मनुष्य द्वारा ब्रह्माण्ड में निहित सबसे बड़े वैज्ञानिक खोज में से एक हैं .शिव मात्र जलाभिषेक के प्रतीक न होकर ब्रह्माण्ड की धुरी हैं .

शिव आकाशगंगा के मथते हुए निहारिकाओं के केंद्र हैं .करोणों सूर्य जिनकी परिक्रमा कर रहे हैं.

2-नासा के दूरबीनों के द्वारा खीचे हुए आकाश गंगाओं के केंद्राभिमुख होते चित्रों के मूल में हैं शिव .

शक्ति (energy) और द्रव्यमान (mass) का संयोग हैं शिव ……शव + शक्ति = शिव .उर्जा और द्रव्यमान को प्रोटॉन में बदलने की प्रक्रिया में निहित हैं शिव जिस से ब्रह्माण्ड का उदय हुआ …और इस तरह से भारतीय मनीषा ने इन शिव को परम “कल्याण” का स्वरुप माना… शिव ही मूल हैं ……फिर शिव को मानवीय धारणाओ में समाहित करने को शिवलिंग का स्वरुप प्रकट हुआ ….

3-शिवलिंग एक मात्र निराकार ब्रह्म जो ऐसा है की स्वतः स्फूर्त नर नारी का गुण समेटे …स्वयं में ही जन्म देने के गुणों से युक्त है …..जो अर्धनारीश्वर है …जो उभय गुणों को समेटे है …और ब्रह्माण्ड में अद्वितीय लिंग है.शिवलिंग के ऊपर का भाग अंतरिक्ष ,मध्य पृथ्वी और नीचे भूमि में छुपा हुआ भाग पातळ या गहराई का द्योतक है … इस तरह से हम ब्रम्ह और ब्रह्माण्ड की पूजा करते हैं … हमने प्रकृति के रूद्रभिषेकों से जलाभिषेक सीखा है …..हिमालय स्वरुप विशालता को कल कल करती ,नहलाती असंख्य नदी नदों और ग्लासियरों से … यही अर्धनारीश्वर फिर शंकर कहलाते हैं….hybrid का अर्थ है मिश्रित स्वरुप जो हम विज्ञान में hybridisation के रूप में पढ़ते हैं .ठीक बिल्कुल उसी प्रकार…शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।

4-वास्तव में, ''लिंग” एक संस्कृत का शब्द है………शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने के कारन…इसे लिंग कहा गया है…।स्कन्दपुराण में स्पष्ट कहा है कि…आकाश स्वयं लिंग है एवं , धरती उसका पीठ या आधार है ..और , ब्रह्माण्ड का हर चीज ..अनन्त शून्य से पैदा होकर…अंततः उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है … यही कारण है कि इसे कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे कि ज्योतिर्लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, विद्युत स्फुलिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam) इत्यादि …जिसमे प्रवेश करना व् निकलना होता है ….वह आकाश का लिंग है ……. अर्थात ये आकाश के गुण है ।जिसमे अपर, पर, (युगपत) एक वर, (चिरम) विलम्ब, क्षिप्रम शीघ्र इत्यादि प्रयोग होते है, इसे काल कहते है, और ये …. काल के लिंग है । जिसमे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर व् नीचे का व्यवहार होता है ….उसी को दिशा कहते है… अर्थात ये सभी दिशा के लिंग है ।जिसमे (इच्छा) राग, (द्वेष) वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, सुख, दुःख, (ज्ञान) जानना आदि गुण हो, व