Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

यक्षिणी साधना/हिमालय के सिद्ध क्षेत्र में साधनारत तपस्वी


यक्षिणी साधना...ये उच्च साधना है. इसे स्त्री पुरुष कोई भी कर सकता है. यक्षिणी कुबेर समुदाय की देवी है. देवताओं में यक्ष प्रजाति बहुत ही शक्तिशाली और बुध्दिमान मानी जाती है. यक्षप्रश्न में बड़े बड़े ज्ञानी उलझ जाते हैं. भगवान् शिव को यक्षराज कहा जाता है. एक प्रजाति की यक्षिणियां लोगों के बारे में ज्ञात अज्ञात बताती हैं. ये यक्षिणी किसी भी व्यक्ति के वर्तमान और भूतकाल की सारी बातें जान लेती है. उन्हें साधक के कान में बता देती है. कई बार आपने कुछ ऐसे सिद्धों के बारे में सुना होगा जो लोगों के बारे में सब कुछ बता देते हैं. इनमें कुछ ने यक्षिणी सिद्ध की होती है.

यक्षिणी साधक के सामने आये हुए हर व्यक्ति की बीती जिंदगी को पढ लेती हैं. फिर उसके बारे में साधक के कान में बताती है. जैसे उस व्यक्ति का नाम क्या है, वो कहाँ रहता है, क्या खाकर आया है, किसके साथ आया है, उसकी जेब में कितने पैसे हैं, उसके साथ किसने क्या किया है, उसने किसके साथ क्या किया है, उसने किससे क्या बातें की हैं आदि. और वो सब कुछ जो उस व्यक्ति के जीवन में घट चुका है.

यक्षिणी शक्तिशाली तो होती है मगर बहुत सीधी और भोली होती है. सामान्यतः ये साधक को नुकसान नही पहुंचती. बल्कि उसकी सुविधाओं और सुखों के लिये हर सम्भव प्रयास करती है. सिद्ध हो जाने पर वह साधक के वश में हो जाती है. जो साधक कहता है उसे पूरा करती है. यक्षिणियां कई तरह की होती हैं. धन देने वाली, भोग विलास देने वाली, ज्ञान देने वाली. कालीदास को एक यक्षिणी ने ही ज्ञान देकर मुर्ख से विद्वान बनाया था. सिद्ध हो जाने पर यक्षिणी साधक के समक्ष प्रकट होती है. उससे पूछती है कि साधक उसे प्रेमिका-पत्नी, बहन, माँ में से किस रूप में अपने साथ रखना चाहता है. 1. प्रेमिका या पत्नी के रूप में वह साधक को राजाओं की तरह सुखी देखना चाहती है. इसके लिये अपनी सभी दैवीय शक्तियों का उपयोग करती है. धन, प्रतिष्ठा, शक्ति, युक्ति के सभी साधन उपलब्ध कराती है. दरअसल उच्च क्षमताओं से युक्त यक्षिणी उन्हें ही पति के रूप में चाहती है जो शक्तिशाली हों, प्रतिष्ठित हों, मशहूर हों, धनवान हों, पराक्रमी हों और राजाओं की तरह प्रभावशाली हों. इस लिये वह साधक को प्रभावशाली बनाकर अपनी ही इच्छा की पूर्ति करती है. मगर वह साधक के जीवन में अपने शिवा दूसरी स्त्री को बर्दास्त नही करती. अगर साधक इस मामले में जरदस्ती करने की कोशिश करता है. तो यक्षिणी क्रोधित हो जाती और साधक के साथ दुसरी स्त्री को भी नष्ट कर डालती है. हलांकि यक्षिणियां इतनी खूबसूरत होती हैं कि उनके रहते व्यक्ति किसी और की तरफ आकर्षित हो ही नही सकता. 2. बहन के रूप में स्वीकार करने पर वह साधक के जीवन को हर तरह से सुखी बनाने में जुटी रहती है. धन, साधन देती है. समस्याएं दूर करती है. सम्मान दिलाती है. यहां तक कि साधक की इच्छा पर वह हर रात धरतीलोक, परीलोक, नागलोक, राक्षसलोक, गन्धर्वलोक की चुनिंदा सुंदरियों को लाकर भी साधक को सौंप देती है. हर पल वह चाहती है कि उसका भाई सभी सुख भोगे. 3. माँ के रूप में स्वीकार करने पर वह देवी माँ की तरह साधक की देखभाल करती है. अपनी सभी दैवीय शक्तियों का उपयोग करके साधक का पालन पोषण करती है. उसकी उन्नति कराती है. उसे ब्रह्माण्ड के रहस्य बताती है. उसे लोगों के बारे में ज्ञात अज्ञात बताती है. ज्ञान देती है. सिद्धियां दिलाती है. मोक्ष की राह पर ले जाने का प्रयास करती है.

कुंडली, आभामण्डल और ऊर्जा चक्रों को ठीक रखा जाये तो यक्षिणी को आसानी से सिद्ध किया जा सकता है. इसी कारण गुरुवर के सानिग्ध में ये सिद्धी पाना अधिक सरल हो जाता है. अन्यथा कुछ लोग इसे सिद्ध करने में जीवन लगा देते हैं.

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

महायुद्ध की आहट से वे भी चिंतित हैं जो सामान्य दुनिया से अलग रहते हैं. वे हैं हिमालय के सिद्ध क्षेत्र में साधनारत तपस्वी. वे महायुद्ध के विनाश से मानवता को बचाने के महा उपाय खोज रहे हैं. बात को आगे बढ़ाने से पहले बताता चलूं कि ये पोस्ट संकुचित मानसिकता वाले तथाकथित तर्कशास्त्रियों के लिये नही है. जो दुनिया को अध्यात्म और विज्ञान के खुले नजरिये से देखते हैं, वही इन बातों को समझने में सक्षम होंगे. वैसे तो पूरा हिमालय ही साधना भूमि है. किंतु हिमालय में तपस्वियों का एक एेसा साधना क्षेत्र है जो दुनियावी लोगों को नजर नही आता. क्योंकि उस क्षेत्र का आयाम अलग है. धरती के सामान्य लोग 3 डाइमेंशन तक की चीजें ही देख सकते हैं. हिमालय का ये क्षेत्र उच्च डाइमेंशन में है. उच्च डाइमेंशन धरती पर कई जगह हैं. जहां निरंतर गतिविधियां हैं. मगर सामान्य आंखें उन्हें देख नही पातीं. दुनिया भर के वैज्ञानिकों को चुनौती देने वाला बरबूडा ट्रैंगिल एेसे ही अलग आयाम में स्थित क्षेत्रों में से एक है. उत्तर पश्चिम अटलांटिक महासागर में स्थित बरमूडा त्रिकोण को शैतान के त्रिकोण के रूप में भी जाना जाता है, जिसमे कुछ विमान और सतही जहाज (surface vessels) गायब हो जाते हैं। अवधारणा है कि वहां एेसा जीवन मौजूद है जिस पर धरती के नियम लागू नही होते. वहां भूमि से परे की जीवित वस्तुओं (extraterrestrial beings) की गतिविधियां हैं. उच्च डाइमेंशन में फिजिक्स के नियम लागू नही होते. टाइम के नियम लागू नही होते. वहां लोग सैकड़ों नही बल्कि हजारों साल जिंदा रह सकते हैं. उच्च डाइमेंशन की गतिविधियों को बाहर से देखा नही जा सकता, मगर वहां से लाखों किलोमीटर दूर स्थित ग्रहों की गतिविधियों को साफ देखा जा सकता है. जैसे वे दृश्य टी.वी. पर लाइव हों. हिमालय में स्थित उच्च आयाम क्षेत्र तपस्वियों में सिद्ध क्षेत्र के नाम से संबोधित है. वहां हजारों साल से साधनायें और अध्यात्म विज्ञान पर रिसर्च का काम चल रहा है. सिद्ध क्षेत्र में सिर्फ तपस्वी ही रहते हैं. उन्हें मोक्ष और उसे प्राप्त करने का सरल व सटीक रहस्य पता है. मगर वे इसके लिये कभी लालायित नही रहते. उनके जीवन का उद्देश्य मानवता की भलाई है. उसके लिये सदैव कार्यरत रहते हैं. वे हमारी दुनिया को मानव लोक कहकर सम्बोधित करते हैं. कभी वे भी मानव लोक में पैदा हुए. यहीं रहकर खुद को इस लायक बनाया कि देवलोक तक विचरण कर सकें. मानव लोक को वे अपने वंशजों का घर मानते हैं. इसकी भलाई के लिये वे यहां के लोगों से समय समय पर सम्पर्क करते रहते हैं. उनके सम्पर्क का तरीका क्या है और किनसे सम्पर्क करते हैं इस पर हम फिर कभी चर्चा करेंगे.