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देवदूतों के देवता/शक्तिपात/3 तरह की सिद्धियां


मददगार देवदूतों की गिनती करोड़ों में है. 33 करोड़ देवी देवताओं में अधिकांश देवदूत ही है. देवदूतों के भी देवता होते हैं. जो उनके अधिपति होते हैं. अधिपति देव के नाम से देवदूतों के वर्ग होते है. सभी देवदूत अपने अधिपति देवो की इच्छा और निर्देशों को प्रार्थमिकता देते है. कोई भी देवदूत स्वतंत्र प्रभार का नही होता. देवदूतों के मुख्यतः दो वर्ग है. एक वर्ग वर्ग भगवान शिव के देवदूतों का है, दूसरा भगवान विष्णु का. ब्रह्माजी के देवदूतों की संख्या बहुत सीमित है. कुछ देवदूत माता दुर्गा, माता लक्ष्मी, माता सरस्वती के अधीनस्थ होते है, वे अत्यधिक क्षमता वाले होते है; जैसे भैरव जी. अत्यधिक क्षमता वाले देवदूत ब्रह्मांड के विभिन्न आयामो में आ जा सकते है; जैसे हनुमान जी. कुछ देवदूत अपने अधिपति देवदूतों की सेवा में है. जहाँ देवता रहते है, वहीं वे भी रहते है. इस कारण उनका निवास चतुर्थ की बजाय उससे उच्च आयाम में होता है, जैसे नंदी भगवान शिव के वाहन है और उनके दूत भी. वे उनके साथ शिवलोक में रहते है. वे भी उच्च आयाम में है.;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

देवदूतो की दुनिया ;-

देवदूतों की दुनिया जानने से पहले कुछ वैज्ञानिक सत्य समझ लेते हैं. जिस दुनिया में हम जी रहे हैं, वह थ्री डी अर्थात् 3 आयाम में है. इसका एक बात हमेशा छिपा रहता है. इस बात को ठीक से समझने के लिए पहले आयाम को जान लेते हैं. जब हम कहीं खींची लाइन देते हैं तो 1 डी अर्थात् एक आयाम देख रहे होते हैं. एक आयाम में सिर्फ लंबाई दिखती है. जब कोई तस्वीर देखते हैं तो वह 2 आयाम में दिखती है. 2 आयाम में लंबाई के साथ चौड़ाई भी दिखती है. जब किसी वस्तु को देखते हैं तो 3 आयाम में दिखती है, अर्थात् उसके तीन भाग दिखते हैं. तीसरा भाग उसकी गहराई ऊंचाई के रूप में दिखता है. 2 की जगह 3 आयाम देखने पर चीजें अधिक साकार और सजीव दिखती है. थ्री डी फिल्मों को इसी तरह से पेश किया जाता है. सामने मौजूद किसी भी चीज को चारों तरफ से देखा जाए तो ही उसे पूरी तरह जाना जा सकता है. मगर आंखें सिर्फ थ्री-डी ही देख पाने में सक्षम होती है. वस्तु के पीछे का भाग उसी के पीछे छिपा रहता है जिसे आंखें नहीं देख पाती. इस तरह हर वस्तु, व्यक्ति, स्थान का एक आयाम सामान्य दृष्टि से छिपा रहता है. इसी तरह दुनिया का एक आयाम हमसे छिपा रहता है.

देवदूतों की मृत्यु का सिद्धांत;-

देवदूतो के मामले में मृत्यु का सिद्धांत थोड़ा बदल जाता है. साफ नियत और पक्के इरादे के कारण उनका आभामंडल कभी नहीं भटकता. लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करके कर्म के कारण भी उनका आभामंडल कभी नहीं भटकता. भौतिक मृत्यु के समय वे स्थूल शरीर तो छोड़ देते हैं, लेकिन उनका सूक्ष्म शरीर और आत्मा परमात्मा के गंतव्य तक नहीं जाते. उन्हें चतुर्थ आयाम में रोक लिया जाता है. चतुर्थ आयाम में नियुक्ति एक तरह से उनका नया जन्म होता है.

देवदूतों की आत्मा;-

क्या देवदूतों में भी आत्मा होती है ? हां सभी प्राणियों में आत्मा होती है.जीवन आत्मा का ही सफर है, जिसके लिए शरीर बदलते रहते हैं कभी इंसान, कभी पशु, कभी कीड़े मकोड़े, कभी राक्षस, कभी देवदूत कभी धरती पर कभी दूसरे ग्रह पर. 84 लाख योनियों का सफर.देव भूतों की गतिविधियों को जानने के लिए उनकी आत्मा को सूक्ष्म शरीर के संबंध को समझना होगा. आत्मा परमात्मा का अंश है, सब जानते हैं... आत्मा एक ऊर्जा अंश है. जब कोई जन्म लेता है तो परमात्मा अपनी उर्जाओं का एक अंश निकाल कर उसे जिम्मेदारी सौपते है. इस अंश को आत्मा के नाम से पहचाना जाता है, जो अपरिवर्तनीय होती है. गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं "आत्मा को बदला नहीं जा सकता, प्रभावित नहीं किया जा सकता, काटा या जलाया नहीं जा सकता. खत्म नहीं किया जा सकता. इस पर भले बुरे का कोई प्रभाव नहीं पड़ता." अथार्थ आत्मा को दुनियादारी से प्रभावित हुए बिना काम करना होता है. इसके लिए परमात्मा हर आत्मा को ब्रह्मांडीय ऊर्जा का आवरण देते है. जिसे सूक्ष्म शरीर कहा जाता है. जो समय काल स्तिथियो के हिसाब से परिवर्तन शील होता है. इस पर भले बुरे का भी प्रभाव पड़ता है. सूक्ष्म शरीर आत्मा का माध्य्म होता है.

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देवी देवता करते हैं शक्तिपात.ऋषि-मुनि करते थे शक्तिपात.सक्षम गुरू आज भी करते हैं शक्तिपात .आप भी कर सकते हैं शक्तिपात;- शक्तिपात बड़े उद्देश्य वाली दुर्लभ अध्यात्मिक क्रिया है. इसके द्वारा सक्षम साधक दूसरों पर शक्तियों का संचरण करते हैं. जिससे शक्तिपात प्राप्त करने वाले व्यक्ति की आंतरिक शक्तियां जाग जाती हैं. अध्यात्मिक शक्तियां जाग जाती हैं. दैवीय शक्तियां जाग जाती हैं. कुंडली जाग जाती है. उर्जा चक्र जाग जाते हैं. आभामंडल जाग जाता है. शास्त्रों में यहां तक बताया गया है कि शक्तिपात से सौभाग्य जाग जाता है. शक्तिपाय से जन्मों से चले आ रहे पाप नष्ट हो जाते हैं. दुख नष्ट हो जाते हैं. शक्तिपात करने वाला साधक ब्रह्मांडीय शक्तियों और ग्रहण करने वाले व्यक्ति के मध्य खुद को माध्यम के रूप में उपयोग करते है. कुछ गुरू अपनी तपस्याओं की उर्जाओं का दूसरों पर शक्तिपात कर देते हैं.भगवान ने शक्तिपात करने की क्षमता सबको दी है ... जरूरत होती है उसका उपयोग करने की. जरूरत होती है खुद को ब्रह्मांडीय उर्जाओं से जुड़ने योग्य बनाने की. जरूरत होती है दूसरों के सूक्ष्म शरीर को छूने की काबिलियत की. थोड़े से सदाचरण, थोड़े से ज्ञान और थोड़े अभ्यास से कोई भी शक्तिपात करने योग्य बन जाता है. इसमें अधिक समय नही लगता. जो शिवशिष्य हैं उन्हें शिवगुरू की शक्तियों का शक्तिपात करने का अधिकार है. इसलिये मैने उन्हें मृत्युंजय शक्तिपात सिखाने का निर्णय लिया है. शक्तिपात सीखने के इच्छुक साधक अपना शिव ज्ञान जागरण रुद्राक्ष सिद्ध कर लें. कुछ विद्या दान और भोजन दान नियमित शुरू करें. इतनी तैयारी के साथ मेरे पास आयें. मै उन्हें शक्तिपात से अपना और दूसरों का जीवन बदलने योग्य बनने की तकनीक सिखाऊंगा. सबका जीवन सुखी हो यही हमारी कामना है.

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मृत्युंजय शक्तिपात के अगले चरण में उर्जा चक्रों की सफाई होनी चाहिये. आभामंडल में उर्जा चक्रवात उत्पन्न करके उसकी सभी परतों की सफाई अच्छी तरह से की जानी चाहिये. ताकि साधक की उर्जा विकार मुक्त हो सके. उसके मन में उत्साह और उमंग उत्पन्न हो. शक्तिपात करने वाले विद्वान इस प्रक्रिया पर सर्वाधिक ध्यान देते हैं. आभामंडल की सफाई के बाद कुंडलिनी शक्ति को उत्तेजित किया जाना चाहिये. उसके लिये मूलाधार चक्र से नीचे दोनो पैरों के बीच में पृथ्वी तत्व की उर्जा को अधिक मात्रा में एकत्र किया जाना चाहिये. यह क्रिया दबाव बनाने वाली होती है. सो साधक को इसकी प्रतिक्रिया की पूर्व जानकारी अवश्य दे दी जानी चाहिये. पृथ्वी तत्व के दवाब के दौरान कई बार मानसिक और शारीरिक बेचैनी होती है. कई बार विभिन्न अंगों पर भारी दबाव महसूस होता है. एेसी स्थिति में कुछ साधक घबरा जाते हैं. उन्हें लगता है कि उनके द्वारा अपनायी जा रही प्रक्रिया में कोई चूक हो रही है और उनके साथ कुछ गलत हो रहा है. घबराहट में वे शक्तिपात का पूरा लाभ नही उठा पाते. कुंडलिनी स्थान पर पृथ्वी तत्व की लाल उर्जाओं का एकत्रीकरण करने के बाद मूलाधार चक्र को उत्तेजित किया जाना चाहिये. लेकिन उससे पहले सभी उर्जा चक्रों की सफाई सुनिश्चित कर लेनी चाहिये. अन्यथा उर्जा चक्रों की पंखुड़ियों पर जमी दूषित उर्जायें शक्तिपात के नतीजों को बिगाड़ सकती हैं. शक्तिपात का पूर्ण लाभ मिले इसके लिये सभी साधक खुद को आलोचनाओं से बचाये रखें. भोजन दान नियमित करते रहें. विद्या दान भी जरूर करें. सबका जीवन सुखी हो, यही हमारी कामना है.

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मृत्युंजय शक्तिपात;- खुद को बंद आंखों से देखने की कोशिश करें... शक्तिपात ग्रहण करने की श्रेष्ठ स्थिति प्राप्त करने के लिये खुद को बंद आंखों से देखने की कोशिश करनी चाहिये. आगे चल कर यह स्थिति आत्म साक्षात्कार में बड़ी सहायक सिद्ध होती है... इसे लिये शक्तिपात के दौरान आंखें बंद करके बैठें. ध्यान अपने नाभि चक्र पर केंद्रित करें. यहां उर्जाओं का भंडारण होता है. कुछ समय बाद नाभि चक्र पर उर्जा का संचरण महसूस होता है. ध्यान वहीं लगाये रखें. कालांतर में नाभि से निकलती छोटी आकृति की अनुभूति होती है. धीरे धीरे यह आकृति सामने आकर स्थिर हो जाती है. शुरू शुरू में आकृति प्रकाश के रूप में नजर आती है. धीरे धीरे उसकी पहचान सामने आने लगती है. स्पष्ट होने पर पता चलता है कि स्वयं वह व्यक्ति ही सामने बैठा है. जिसपर आसमान से दिव्य उर्जाओं की बरसात हो रही होती है. शत्किपात की उर्जायें सामने स्थित अपने सूक्ष्म शरीर की उर्जा नाड़ियों में प्रवाहित होती दिखती हैं..... शक्तिपात की सह स्थिति बड़ी ही सुखकारी होती है..... जो साधक अध्यात्मिक रूप से जितना सक्षम होता है वह उतनी ही जल्दी खुद को देखना आरम्भ कर देता है. कुछ गुरू साधक के सामने स्थित सूक्ष्म चेतना को अपने साथ लेकर ब्रह्मांड भ्रमण करा देते हैं. मृत्युंजय शक्तिपात में शामिल हो रहे सभी साधक खुद को देखने का अभ्यास शुरू करें. इसके लिये आरम्भ में कल्पना का सहारा लें. कल्पना ज्ञान से बड़ी होती है. कल्पना उत्पत्ति का कारण भी बनती है. खुद को सामने स्थिति होने की मजबूत कल्पना के लिये यहां एक चित्र दोबारा दे रहा हूं. इसे ध्यान से देखें. कई बार देखें और अपने मन में बसा लें. चित्र में मै जिस आकृति पर शक्तिपात कर रहा हूं वहां खुद के होने की कल्पना करें. काम आसान हो जाएगा. जल्दी ही कल्पना साकार रूप में परिवर्तित होती जाएगी. एक दिन सच में खुद को अपने सामने बैठा देखने में सक्षम हो जाएंगे. अध्यात्म में इस स्थिति को बहुत महत्व दिया जाता है. सौभाग्य जगाने वाला माना जाता है. सामान्य लोगों के लिये इसे दुर्लभ माना जाता है. मृत्युंजय शक्तिपात ले रहे साधकों को मै सामान्य नही मानता. आप सबको इसे दुर्लभ से सरल बनाना है. दिन में जितना चाहें इसका अभ्यास कर सकते हैं. अपनी अनुभूतियों में दिन प्रति दिन इस दिशा में होने वाली प्रगति का विवरण दें. जो लोग शक्तिपात के दौरान होने वाले अनुभव शेयर नही कर पा रहे या किसी गरीब को भोजन दान नही कर पा रहे, उन्हें खुद को शक्तिपात से तत्काल अलग कर लेना चाहिये. क्योंकि मै उनकी उर्जाओं का विशलेषण नही कर पा रहा. यैसे में शक्तिपात की अधिकता नुकसान का कारण बन सकती है.

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शक्तिपात के प्रथम चरण में आभामंडल की ऊपरी परतों की सफाई होती है. आभामंडल की 6 बाहरी परतों में 6 तरह की दूषित उर्जायें शत्रुवत सक्रिय होती हैं. जिसके कारण लोगों का जीवन ठहर सा जाता है. योग्यता क्षमता मेहनत लगन और ईमानदारी के परिणाम नही मिल पाते. शत्रुवत सक्रिय ये उर्जायें प्रारब्ध, ग्रह नक्षत्र, वास्तु, पितृ और देवबाधा से उत्पन्न होती हैं. इनकी दूषित उरजायें आभामंडल को ऊपर से सघनता के साथ घेरे रहती हैं. जिसके कारण ब्रह्मांड से आने वाली जीवन दायी उर्जाओं को अंदर प्रवेश करने में कड़ा संघर्ष करना पड़ता है. जब जीवन दायी उर्जायें आभामंडल के भीतर नही जा पातीं तो परिणाम असफळताओं के रूप में सामने आते हैं. शक्तिपात के समय सबसे पहले इसी अवरोध को हटाया जाता है. विद्वान इसे 6 शत्रुओं का निष्कासन कहते है. इनके हटने के बाद ही व्यक्ति ईश्वर द्वारा प्रदत्त शक्तियों का उपयोग कर सकता है. सफल हो सकता है. अगले चरण में आभामंडल की ऊपर से 12 परतों की सफाई की जाती है. जिनमें उपरोक्त 6 परतें और उसके बाद की 6 परतें शामिल होती हैं. यह चरण भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. यहां मनः स्थिति से दूषित हुई उर्जायें मौजूद होती हैं. जो बनते काम बिगाड़ने में जुटी रहती हैं. विद्वान इन्हें संघर्षकारी उर्जायें कहते हैं. क्योंकि ये लोगों के जीवन में संघर्ष उत्पन्न करती हैं. कल मृत्युंजय योग शक्तिपात के दौरान साधकों के आभामंडल से संघर्षकारी उर्जाओं को हटाया जाएगा. दूसरे चरण के दौरान साधकों को मन में उत्साह उमंग उत्पन्न होती लगेगी. बंद आंखों से उन्हें उर्जाओं के रंग दिखने की अनुभूतियां बढ़ जाएंगी. उनके व्यवहार में अपनापन बढ़ेगा. सारी दुनिया अपनी सी लगने लगती है. 1. अपनी अनुभूतियां लगातार लिखें. ताकि मै शक्तिपात ले रहे साधकों की उर्जाओं का निरीक्षण कर सकूं. 2. कुछ साधक जरूरत मंदों को भोजन दान नही दे रहे हैं. यदि एेसा ही रहा तो आने वाले दिनों में उनके पास मेरी उर्जायें जानी बंद हो जाएंगी. वे शक्तिपात का लाभ नही उठा सकेंगे. 3. कुछ लोगों ने देवत्व जागरण रुद्राक्ष के बारे में पुनः प्रश्न किये हैं. मेरा सुझाव है कि अपनी सुविधानुसार यथाशीग्र प्राप्त कर लें. या खुद अपने आप देवत्व जागरण रुद्राक्ष सिद्ध करके धारण कर लें. 4. शक्तिपात ले रहे साधक विद्यादान आरम्भ करें. मेरा सुझाव है कि शिवगुरू से जुड़ी पुस्तकों का दान करें. 5. शक्तिपात के दौरान जिन साधकों के मन में विचलन होता है वे साथ दिये चित्र को ध्यान से देंखे और शक्तिपात के दौरान बंद आखों से इसी चित्र के अनुरूप अपने आपको उर्जाओं में देखने की कोशिश करें. सबका जीवन सुखी हो, यही हमारी कामना है.

मृत्युंजय शक्तिपात के प्रथम चरण में आज साधकों के आभामंडल की सफाई आरम्भ हुई. ग्रहों के दुष्प्रभाव, वास्तु के दुष्प्रभाव, तंत्र के दुष्प्रभाव, प्रारब्ध के दुष्प्रभाव, गुस्से के दुष्प्रभाव, आलोचनाओं के दुष्प्रभाव आदि के कारण आभामंडल दूषित उर्जाओं से भर जाता है. दुषित आभामंडल तन-मन-धन की समस्यायें तो पैदा करता ही है साथ ही अध्यात्मिक उन्नति रोक देता है. इस कारण साधना सिद्धि के लिये आभामडल की सफाई सबसे पहले होनी चाहिये. आज के शक्तिपात के दौरान मैने साधकों के आभामंडल की ऊपरी 6 परतों की सफाई की. आभामंडल में कुल 49 परतें होती हैं. प्रतिदिन 6 परतों की सफाई होगी. आभामंडल साफ होने से साधक खुलापन, हल्कापन महसूस करते हैं. ध्यान साधना के दौरान उन्हें उर्जाओं के रंग दिखने लगते हैं. अनूभूतियां लगातार भेजें... 1. शक्तिपात ग्रहण कर रहे साधक अपनी अनूभूतियों में लिखें कि शक्तिपात के दौरान बंद आखों से उन्हें किस किस रंग की उर्जायें दिखीं. 2. कुछ लोगों ने देवत्व जागरण न होने की बात कही है. शक्तिपात के बेहतर परिणामों के लिये सभी को देवत्व जागरण रुद्राक्ष प्राप्त कर लेना चाहिये. 3. कुछ साधकों ने पूछा है कि देवत्व की जगह कुंडली जागरण रुद्राक्ष का उपयोग कर सकते हैं क्या. नही शक्तिपात की उर्जाओं को ग्रहण करके साधक के रोम छिद्रों में स्थापित करने की क्षमता देवत्व जागरण और कायाकल्प रुद्राक्ष में ही होती है. जिनके पास शिव ज्ञान जागरण रुद्राक्ष है वे शक्तिपात के लिये उसका उपयोग कर सकते हैं. 4. शक्तिपात ग्रहण करने के बाद किन्ही दो जरूरतमंदों को भोजन देना न भूंलें. इससे बरक्कत होती रहेगी. 5. शक्तिपात लेते समय मृत्युंजय मंत्र ऊं. ह्रौं जूं सः का जप जरूर करें.

साधकों में शक्तिपात की ग्रहणशीलता बढ़ना उत्साहजनक होता है. शक्तिपात ग्रहण कर रहे साधकों के कुछ सवालों के जवाब देना जरूरी है. ताकि भ्रम न उत्पन्न हो. सवाल 1... खुद को अपने शरीर से बाहर निकलते नही देख पा रहे. इसे कैसे देखें. उत्तर... शक्तिपात के दौरान नाभि चक्र पर ध्यान लगायें. कुछ समय में वहां उर्जा की हलचल का अहसास होगा. तब अपने नाभि चक्र से सूक्ष्म चेतना के विस्तार का आग्रह करें. कहें- मेरे दिव्य नाभि चक्र आप सकारात्मक उर्जायों के भंडार हैं. अपनी उर्जा केंद्र से मेरे सूक्ष्म शरीर को अत्रिक्त उर्जायें देकर उसे मेरे सामने ला दें. पूरी क्रिया के दौरान आंखें बंद रखें. जब सामने किसी की अदृश्य मौजूदगी का अहसास हो तब अपने तीसरे नेत्र से उसकी पहचान करने का आग्रह करें. कहें- मरे दिव्य तीसरे नेत्र मुझे सामने स्थित मेरे सूक्ष्म शरीर को दिखायें. फिर खुद के सामने दिखने का धैर्य के साथ इंतजार करें. इस अभ्यास को संयम के साथ करें. उत्साह जनक नतीजे मिल ही जाते हैं. ध्यान रखें. सूक्ष्म चेतना को शरीर से बाहर निकालना बहुत ही संवेदनशीलता का विषय है. सावधानी से करें. इसे किसी सक्षम निगरानी में सीखा जाता है. शक्तिपात के दौरान सभी साधक मेरी उर्जाओं की निगरानी में होते हैं. सलाह है कि शक्तिपात के समय के अलावा इसे न करें. सवाल 2... देवत्व जागरण रुद्राक्ष नही है, क्या उसके बिना या दूसरे किसी रुद्राक्ष को धारण करके शक्तिपात ले सकते हैं. उत्तर... यथा शीघ्र देवत्व जागरण रुद्राक्ष प्राप्त कर लें. चक्रों के जागरण के शक्तिपात में उसकी विशेष भूमिका होगी. सवाल 3... शक्तिपात का समय क्या है. उत्तर... सुबह 7.30 से 10 बजे तक किसी भी समय 20 मिनट बैठें. सवाल 4... मृत्युंजय प्राणामय कैसे करें. उत्तर... शक्तिपात की उर्जायें सांसों के जरिये रोम रोम में व्याप्त की जाती हैं. इसलिये प्राणायाम के साथ ग्रहण किया गया शक्तिपात प्रभावशाली होता है. मृत्युंजय प्राणायाम के समय त्रयक्षरी मृत्युंजय मंत्र ऊं ह्रौं जूं सः का उपयोग किया जाता है. ऊं ह्रौं का जप करते हुए गहरी सांस अंदर खीचनी है. सांस धीरे धीरे खींचें. कुछ क्षण रोकें. फिर जूं सः का जप करते हुए सांस को धीरे धीरे छोड़ें. पूरी सांस बाहर निकाल देने के बाद कुछ क्षण रुकें. फिर नई सांस दोबारा अंदर लें. शक्तिपात के दौरान प्राणायाम जारी रखें. सवाल 5... शक्तिपात के समय मन विचलित होता है क्या करें. उत्तर... आंखें बंद करके सोचें ऊं ह्रौं जूं सः मंत्र सामने लिखा है, आप उसे पढ़ें. ध्यान मंत्र पर टिक जाएगा. सवाल 6... प्रतिदिन भोजन दान के लिये कोई व्यक्ति नही मिलता, क्या करें. उत्तर... चाहें तो हमारी संस्था के जरिये इस काम को सम्पन्न कर सकते हैं. उसके लिये हेल्पलाइन पर सम्पर्क कर लें. सवाल 7... विद्या दान कैसे करें. उत्तर... विद्या दान से ज्ञान और सौभाग्य जागता है. इसके दो तरीके प्रचलित हैं. एक किन्ही जरूरत मंद लोगों को नियमित पढ़ायें. पढ़ने में उनकी सहायता करें. दूसरे तरीके में लोग पुस्तकों व अन्य पाठ्य सामग्री का दान करते हैं. दान में वही पुस्तकें दें जो लोगों के पास पहले से न हों. और जिनको पढ़ने से उनके अध्यात्मिक व भौतिक जीवन का विकास हो सके.

सुझाव...

फोर्थ आयाम या चतुर्थ आयाम की अदृश्य दुनिया से संपर्क के लिए संजीवनी प्राणायाम अचूक साधना है. इसके लिए सक्षम साधक 2 से 4 घंटे तक लगातार प्रणाम करते हैं. जो साधक चौथे आयाम की सिद्ध दुनिया से संपर्क करना चाहते हैं या वहां प्रवेश करना चाहते हैं उनके लिए संजीवनी प्राणायाम की विधि बता रहा हूं. लेकिन ध्यान रहे, 1 घंटे से अधिक का प्राणायाम करना हो तो सक्षम मार्गदर्शक गुरु की देखरेख में ही करें, क्योंकि प्राणायाम के समय शरीर और मन शून्यता को ग्रहण करने लगते है. शून्यता का अर्थ है - ब्रह्मांड का हिस्सा बन जाना. ऐसे में ब्रह्मांड के तमाम रहस्य मस्तिष्क में खुलने लगते हैं, जिनको लेकर सही मार्गदर्शन न मिले तो साधक भ्रम के शिकार होते है. उनके भौतिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन का तालमेल खत्म हो जाता है, जिससे भौतिक जीवन में अनेक तरह के व्यक्तिरेक उत्पन्न होते हैं. यह स्थिति ही चिंताजनक होती है. ऐसे ने व्यक्ति न तो आध्यत्म को आत्मसात् कर पाता हैं और न ही भौतिक जीवन जीने में सक्षम बचता है.

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गुरुदेव ने मुझे बताया था कि लोगों के बारे में ज्ञात अज्ञात जानने के लिये साधक आमतौर से 3 तरह की सिद्धियां करते हैं. कर्ण पिशाचिनी, यक्षिणी, प्रेत सिद्धी. चौथी सिद्धी बहुत कठिन होने के कारण करोड़ों में कोई एक ही कर पाता है. वह है कर्णघंटा. इनमें फर्क ये है कि पहली तीनों सिद्धयां लोगों के जीवन में बीती बातों को बता तो सकती हैं. वे भविष्य की जानकारी नही दे सकतीं. वे न तो किसी का कुछ बिगाड़ सकती हैं और न ही बना सकती हैं. फिर भी जिस तरह से लोग माई से डरते थे, उस स्थिति में लोग भय के मारे अपनी उर्जाओं को खराब कर लेते हैं. और सोचते हैं सिद्ध व्यक्ति ने अपनी शक्ति का प्रयोग करके उनका नुकसान कर दिया.इसी तरह के भय में कुछ लोगों के प्राण भी चले जाते हैं.माई के पास यक्षिणी सिद्धी थी. ध्यान रखें ये सिद्धि भी मामूली नही होती, उच्च साधक ही इसे पा पाते हैं।

इसके विपरीत कर्णघंटा सिद्धी प्राप्त साधक लोगों के बीते समय के अलावा आने वाले समय को भी जान लेता है. वह उसे बदलने में भी सक्षम होता है.प्रायः इस सिद्धी कोअघोरी साधू कर पाते हैं. मगर हमें ध्यान रखना होगा कि ऐसी सिद्धी प्राप्त साधु बस्तियों में नही घुसते. शहरों के भीतर नही जाते. इसलिये शहरों में जो लोग अघोरी बनकर भूत भविष्य बताने का दावा करते हैं उनमें अधिकांश पाखंड कर रहे होते हैं. उनके झांसे में न आयें. सिद्ध अघोरी कभी किसी से कुछ नही मांगता. न अपनी जरूरत पूरी करने के लिये और न ही किसी की परीक्षा लेने के लिये.