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ओंकार का महत्व/क्यों कलह का शिकार होते हैं गायत्री मंत्र के साधक?


ब्रह्मा और विष्णु ने पूछा ," हे प्रभु ! सृष्टि आदि पाँच कृत्यों के लक्षण क्या हैं , यह हम दोनो को यह बताने की कृपा करें ।"

भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया ," मेरे कर्तव्यों को समझना अत्यंत गहन है । ब्रह्मा और अच्युत ! 'सृष्टि' ,'पालन', 'संहार', 'तिरोभाव' और 'अनुग्रह' -यह पाँच ही मेरे जगत-सम्बंधी नित्यसिद्ध कार्य हैं । संसार की रचना का जो आरम्भ है , उसी को सर्ग या सृष्टि कहते हैं। मुझसे पालित होकर सृष्टि का सुस्थिर रूपसे रहना सृष्टि का पालन कहलाता है । उसका विनाश ही संहार है । प्राणों के उत्क्रमण को तिरोभाव कहते हैं । इन सब से मुक्त हो जाना ही मेरा अनुग्रह है । इस प्रकार मेरे पाँच कृत्य हैं । सृष्टि आदि जो चार कृत्य है वो संसार का विस्तार करने वाले हैं । पाँचवा कृत्य 'अनुग्रह ' मोक्ष के लिए है । वह हमेशा मुझमें ही अचल भाव से स्थिर रहता है । मेरे भक्तजन इन पाँचों कृत्यों को पाँचों भूतों में देखते हैं। सृष्टि भूतल में , पालन जल में , संहार अग्नि में , तिरोभाव वायु में और अनुग्रह आकाश में । पृथ्वी से सबकी सृष्टि होती है । जल से सबकी वृद्धि एवं जीवन रक्षा होती है । अग्नि सबको भस्म कर देती है । वायु सबको एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है और आकाश सबको अनुगृहीत करता है । विद्वान मनुष्यों को यह विषय इसी रूप में जानना चाहिए । इन पाँच कृत्यों का भारवहन करने के लिए ही मेरे पाँच मुख हैं । चार दिशाओं में चार मुख और इनके बीच में पाँचवाँ मुख है । पुत्रों ! आप दोनो ने कठिन तप करके 'सृष्टि' और 'पालन' नामक दो कृत्य प्राप्त किए हैं । अतः आप दोनो मुझे अति प्रिय हो । इसी प्रकार मेरी विभूतिस्वरूप 'रूद्र' और 'महेश्वर' में दो अन्य उत्तम कृत्या -' संहार' और 'तिरोभाव' मुझसे प्राप्त किए हैं । अनुग्रह मेरे उपरांत कोई भी नहीं पा सकता । रूद्र और महेश्वर अपने कर्मों को भूले नहीं हैं इसीलिए मैंने उनके लिए अपनी समानता प्रदान की है । वे रूप , वेष , कृत्य , वाहन , आसन और आयुध आदि में मेरे समान ही हैं । मैंने पूर्वकाल में अपने स्वरूपभूत मंत्र का उपदेश किया है , जो ओंकार के रूप में प्रसिद्ध है ।सबसे पहले मेरे मुख से ओंकार (ॐ) प्रकट हुआ , जो मेरे स्वरूप का बोध कराता है ।प्रतिदिन ओंकार का स्मरण करना मेरे स्मरण का प्रतीत है । मेरे उत्तरवर्ती मुख से अकार का , पश्चिम मुख से उकार का , दक्षिण मुख से मकार का , पूर्ववर्ती मुख से विंदु का तथा मध्यवर्ती मुख से नाद का प्राकट्य हुआ । इस प्रकार पाँच अवयवों से युक्त ओंकार का विस्तार हुआ है । पूरा ब्रह्माण्ड इस मंत्र में व्याप्त है । यह मंत्र शिव और शक्ति दोनो का बोधक है । इसी से पंचाक्षर मंत्र की उत्पत्ति हुई है । ( 'ॐ नमः शिवाय ' पंचाक्षर मंत्र है ) इस पंचाक्षर मंत्र से ही मात का वर्ण प्रकट हुए हैं , जो पाँच भेद वाले हैं । उसी से शिरो मंत्र सहित त्रिपदा गायत्री का प्राकट्य हुआ है । गायत्री से सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए हैं और उन्ही वेदों से करोड़ों मंत्र निकले हैं । उन मन्त्रों से भिन्न भिन्न कार्यों की सिद्धि होती है ; परंतु इस प्रणव एवं पंचाक्षर से सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है । इस मंत्रसमुदाय से भोग और मोक्ष दोनो की सिद्धि होती है । " भगवान शिव के इस कथन को बताने के बाद नन्दिकेश्वर आगे की कथा बताते हुए बोले ,".......";;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

गायत्री मंत्र की ऊर्जाएं विशाल हैं. जाहिर है उनके परिणाम भी बड़े ही होंगे. लाभ हुआ तो बड़ा, नुकसान हुआ तो बड़ा.

*गायत्री मंत्र की ऊर्जाएं आलोचना बर्दास्त नही करतीं*. गायत्री साधक आलोचक हुआ तो उसे आतंकी जैसा जानें. एक के हाथ मे हथियार का आतंक, दूसरे की जुबान में जहरीले शब्दों का आतंक. बंदूक वाले शरीर को छलनी करते हैं, जहरीले शब्दों वाले मन को.

जिनके रिश्ते बेवजह बिगड़ते रहते हैं या वे अपनों को बार बार कडुआ बोलते हैं, तो इसका एक कारण गायत्री मंत्र का जाप हो सकता है. *गड़बड़ी मन्त्र में नही है, बल्कि साधक द्वारा मन्त्र की मर्यादा तोड़ने से ऐसा होता है*. गायत्री मंत्र जाप की मर्यादा है कि साधक किसी की आलोचना न करें, अन्यथा विनाश की स्थिति पैदा होगी. अब सवाल ये है कि आलोचना तो हमेशा बुरी होती है. फिर गायत्री मंत्र जाप में ही इस पर कठोरता क्यों.

दरअसल गायत्री मंत्र की ऊर्जाएं पीली और तीक्ष्ण होती हैं. उनका घनत्व कम और बहाव अधिक होता है. जिससे उनमें प्रसार की क्षमता दूसरी ऊर्जाओं की अपेक्षा कई गुना अधिक होती है. वो साधक के भीतर अग्नितत्व का प्रसार तेजी से करती है. यदि उपयोग सही हो तो अग्नितत्व आत्मा तक का शुद्धिकरण करने में सक्षम है. जाप के वक्त गायत्री मन्त्र की ऊर्जाएं निम्न भावनाओं के केंद्र मणिपुर चक्र पर आकर इकट्ठी होती. उनके प्रभाव से निम्न भावनाएं जलकर भस्म होने लगती हैं. *जिससे साधक तेजस्वी होता है, उसके और ब्रम्हांड के रहस्यों के बीच के पर्दे हटने लगते हैं. ज्ञान का जागरण होता है*. इसके विपरीत आलोचनाओं की ऊर्जा गाढ़े कत्थई रंग की होती है. उसके इकट्ठा होने का केंद्र भी मणिपुर चक्र ही होता है. ऐसी एनर्जी को ऊर्जाओं का जहर कहा जाता है. ये मणिपुर चक्र पर भारी मात्रा में आई गायत्री मंत्र की सकारात्मक ऊर्जाओं में मिलकर उन्हें भी जहरीला बना देती है.जैसे बाल्टी में भरे सकारात्मक प्रभाव वाले दूध में मिलकर जहर उसे भी जहरीला बना देता है. इस तरह से मणिपुर चक्र सामान्य से कई गुना अधिक दूषित हो जाता है. क्योंकि गायत्री मंत्र जाप से वहां सामान्य से कई गुना अधिक ऊर्जाएं एकत्र हो गयी थीं. आलोचना की जहरीली ऊर्जाओं ने उन सबको भी जहर बना दिया. ऐसी ऊर्जाओं से भरा मणिपुर चक्र प्रलयंकारी हो जाता है. भावनाओं को बिगाड़कर व्यक्ति में आतंकी सोच पैदा करता है. ऐसा व्यक्ति अपने अलावा सबमें कमियां देखता है. सकारात्मकता को नजरअंदाज करना प्रवत्ति बन जाती है. उसका तेज नष्ट होने लगता है. अकारण असफलताओं का सामना करना पड़ता है. बेचैनी,गुस्सा और तनाव पीछे पड़ जाता है. पेट गड़बड़ाया रहता है, एसिडिटी, bp, हर्ट, सुगर, थाइरोइड, पैर, कमर दर्द की बीमारियां सिर उठाने लगती हैं.

इसी कारण गायत्री के साधक को किसी की आलोचना नही करनी चाहिये. *जो गायत्री साधक इस मर्यादा का पालन करते हैं, उनसे देवता भी मित्रता करने के इच्छुक रहते हैं. इसके विपरीत जो साधक आलोचक होते हैं वे अपने साथ दूसरों का भी जीवन बर्बाद कर बैठते हैं*.

जल्दबाजी में किया जाप रिश्ते तबाह कर देता है गायत्री मंत्र बड़ी उर्जाओं का भंडार है. नियमों का पालन करते हुए इसकी साधना की जाये तो व्यक्ति ब्रह्मांड के शक्तिशाली लोगों में से एक बन सकता है. नियमो की अनदेखी हो तो साधक दूसरों की खुशियों की भी तबाही का कारण बन जाता है. कुछ लोग तर्क देते हैं कि कोई भी मां अपने बच्चों को तकलीफ नही दे सकती. इसलिये गायत्री मां भी गायत्री मंत्र का जाप करने वालों को कष्ट नही देतीं. यहां दो बातें याद रखने की जरूरत है. कोई भी मां भक्ति के नाम पर नियम तोड़ने या शक्तियों से खिलवाड़ की इजाजत नही देती. गुरू जी बताते हैं कि गायत्री मंत्र के साथ खिलवाड़ का मतलब है जिंदगी के साथ खिलवाड़. वैसे ही जैसे आग के साथ खिलवाड़. नियमों की अनदेखी मंत्र के साथ खिलवाड़ होता है. गायत्री मंत्र से प्राप्त उर्जायें तादाद में बहुत अधिक होती हैं. इसीलिये उनमें मिलावट हो तो तबाही भी बहुत होती हैं. मिलावट नियमों की अनदेखी से होती है. गायत्री मंत्र के साधक को स्वेच्छाचारी कदापि नही होना चाहिये. अन्यथा वे अपने जीवन को तबाह कर डालेंगे. साथ ही उन सबके जीवन में उथल पुथल पैदा कर देंगे जो उनके करीबी हैं.

मृत्युंजय योग के सर्वे के मुताबिक 96 प्रतिशत से अधिक गायत्री साधक स्वेच्छाचारी ही होते हैं. खासतौर से वे साधक जो गायत्री परिवार से जुड़े हैं. जबकि उनके गुरू प्रकांड विद्वान और युग ऋषि पं श्री राम शर्मा ने इस मामले में अपने लोगों को स्वेच्छाचारी न होने की प्रबल हिदायत दे रखी है. स्वेच्छाचारी का मतलब है मंत्र जाप में मनमानी करना. आगे हम प्रमाणित कर रहे लोग कैसे मनमानी करते हैं. शायद इसका कारण उनकी अज्ञानता है. हर मंत्र को जपने की एक लय होती है. उसी के मुताबिक मंत्र जाप से उर्जा की तरंगे निकलकर साधक का उद्देश्य पूरा करती हैं. ये लय मंत्र के उच्चारण का तरीका तय करती है. इसे मंत्र की छंद कहा जाता है. तय छंद के मुताबिक मंत्र का जाप किया जाये तो ही उसका फल मिलता है. अन्यथा मिलावटी उर्जायें उत्पन्न होकर अर्थ का अनर्थ कर डालती हैं. निर्धारित छंद के मुताबिक मंत्र जपा जाये तो हर मंत्र का जाप निश्चित समय में पूरा होता है. किसी मंत्र के जाप में निर्धारित से कम या ज्यादा टाइम लगे तो वो स्वेच्छाचारी जाप होता है. उसके परिणाम हमेशा परेशानी पैदा करने वाले ही होते हैं. ठीक उसी तरह जैसे हमारे देश के राष्ट्रीय गान जन-गन-मन...को तय लय में किया जाये तो उसमें 52 सेकेंड लगते है. यदि इससे कम या ज्यादा टाइम लगे तो उस लय में किये गये राष्ट्रीय गान को दोष पूर्ण माना जाता है. इस तरह का गान करने वालों को सजा का भी प्रावधान है. गायंत्री मंत्र की छंद भी गायत्री है. इस छंद की लय में जाप हो तो एक गायत्री मंत्र में लगभग 12 से 14 सेकेंड लगने चाहिये. इस तरह एक माला अर्थात् 108 मंत्र जाप में 23 मिनट से अधिक लगने चाहिये. एक घंटे में 3 माला से कम ही जपे जा सकते हैं. मगर गायत्री के अधिकांश साधक इसके विपरीत जल्दबाजी और हड़बड़ी में जाप करते हैं. कुछ नियमित साधकों ने दावा किया कि वे 1 घंटे में 11 से 12 माला तक जाप कर लेते हैं. शायद इसका कारण उनकी अज्ञानता है. उन्हें मंत्र जाप के अनिवार्य नियम भी नही बताये गये. एेसे अधिकांश लोगों ने पूछने पर बताया कि दीक्षा के समय उन्हें सिर्फ कितने माला मंत्र जाप करना है इतना ही बताया गया. उसे किस लय में करना है ये नही बताया गया. ये तरीका गलत है. इससे विनाशकारी मिलावटी उर्जायें उत्पन्न होती हैं. जो साधक के मणिपुर चक्र व अग्नितत्व का संतुलन बिगाड़ देती हैं. परिणाम स्वरूप साधक क्रोधी होने लगते हैं. उन्हें बात दर्दास्त नही होती. जिससे वे उत्तेजना भरे लहजे में बात करते हैं, बातों की मिठास खत्म हो जाती है. निकट सम्बंधी उनके द्वारा बार बार हर्ट किये जाते हैं. खासतौर से एेसे साधक अपने जीवनसाथी के प्रति बहुत असामान्य व्यवहार करते देखे गये हैं. हमेशा शिकायतें और दोषारोपण की कोशिश करते हैं. अंततः उनके रिश्ते बिगड़ने लगते हैं. परिवार की शांति बिखर जाती है. हर समय कलह की स्थितियां बनती रहती हैं. क्योंकि ऐसी उर्जायें साधक को अपनी गल्ती मानने से रोकती हैं. कब ईगो के शिकार हो गये, उन्हें पता भी नही चलता. इन सबसे घर के दूसरे लोगों का भी मन खराब रहता है. खराब मन सदैव उन्नति रोक देता है. कई तरह की लाइलाज बीमारियों का कारण भी बनता है. जो साधक निर्धारित छंद के अनुरूप गायत्री मंत्र का जाप करते हैं, देव शक्तियां हर पल उनके साथ रहती हैं. मंत्र जाप के अन्य नियमों पर आगे चर्चा करेंगे.

गायत्री परिवार के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्माजी युग पुरुष थे. उनके विचार और ज्ञान सामाजिक क्रांति में सक्षम थे. उन पर एक दो नही दर्जनों शोध किये जा सकते हैं. उनकी योजनाएं आज भी प्रपंच- पाखण्ड को हराने में सक्षम हैं. वे अध्यात्म के विज्ञान को बारीकी से समझते थे, फिर भी उन्होंने महिलाओं को गायत्री मंत्र जाप के लिये प्रेरित किया. जो आगामी पीढ़ियों के लिये चिंता का सबब बनता नजर आ रहा है. इसके पीछे के रहस्य पर हम आगे चर्चा जरूर करेंगे. फिलहाल हम उन्हें नमन करते हुए बात आगे बढाते हैं।

चर्चा का विषय था 'क्या गायत्री मंत्र जाप से महिलाओं को नुकसान होता है, वे बात बर्दास्त नही कर पातीं, ज्यादा बीमारियों की शिकार होती हैं।' ऊपर का कमेंट नमूना है इस बात का कि गायत्री मंत्र का जाप करने वाली अधिकांश महिलाएं खुद पर कंट्रोल नही रख पातीं, यहां तक कि शास्त्रार्थ जैसे विषयों पर भी अपना आपा खो देती हैं और उद्दंड भाषा का उपयोग करने से खुद को नही रोक पातीं. जो महिलाएं गायत्री मंत्र का नियमित जाप करती हैं, उनके पतियों से व्यक्तिगत राय लेने पर चिंता में डालने वाले तथ्य सामने आते हैं.

आगे बढ़ने से पहले हम स्पस्ट हो जाएं कि महिलाओं को गायत्री मंत्र जपने का अधिकार है या नहीं हम इस पर चर्चा नही कर रहे हैं। हमारा विषय ये भी नही है कि उन्हें इससे लाभ होता है या नही। हम बात कर रहे हैं गायत्री मंत्र के जाप से महिलाओं और उनके परिवारीजनों को होने वाले नुकसान की।

हमें हर पल याद रखना होगा कि गायत्री मंत्र महामन्त्र है, इसकी विशालता की चर्चा करने बैठें तो सदियां खर्च हो जाएंगी। यहां हम उसकी ऊर्जाओं की प्रचण्डता से होने वाले नुकसान की बात कर रहे हैं। जितनी अधिक ऊर्जा, उतनी अधिक सतर्कता की जरूरत। ठीक वैसे ही जैसे परमाणु विखण्डन से प्राप्त ऊर्जाओं में। उपयोग किया तो अंतरिक्ष तक पहुंच जाते हैं, चूक हुई तो दुनिया के नक़्शे से पूरे के पूरे देश गायब हो जाएंगे। एक बात और ध्यान में रखते चलें कि गायत्री मंत्र के देवता सविता सूर्य हैं. गायत्री माता नही. इसलिये गायत्री मां की उपासना अलग बात है और गायत्री मंत्र की साधना अलग। गायत्री मां की उपासना से महिलाओं को कोई नुकसान नही होता। गायत्री चालीसा या दूसरे मन्त्र आदि अपनाकर वे वेद माता गायत्री की सिद्धि कर सकती हैं।

गायत्री मंत्र की ऊर्जाओं में अग्नितत्व की अधिकता होती है, जो निम्न भावनाओं के केंद्र मणिपुर चक्र को उकसाता है,गैर जरूरी स्तर तक बढ़ा अग्नितत्व महिलाओं की प्राकृतिक संरचना को असन्तुलित करता है, मन की कोमलता को भंग करता है. उनमें धैर्य के विशाल प्राकृतिक गुण को जला देता है। धैर्य ही वो गुण है जो मां होने के नाते महिलाओं को दुनिया के सर्वाधिक सम्मान का अधिकारी बनाता है। उसके बिगड़ते ही वे बेरुखाई या डिप्रेशन का शिकार हो जाती हैं। बात बात में आपा खो देती हैं। यदि माताएं अपना आपा खो बैठे तो आने वाली पीढ़ियों की कल्पना डरावनी होगी। जरूरत से ज्यादा बढा अग्नितत्व तन के जलतत्व को भी असंतुलित कर देता है। जल तत्व के प्रतिनिधि स्वाधिष्ठान चक्र में कई तरह की अशुद्धियां पैदा होती। जो यूट्रेस, ओबरी को क्षतिग्रस्त करती हैं। कमर,पैर, पीठ के रोग का कारण बनती हैं। तपा हुआ स्वभाव प्रायः bp और सुगर का कारण बनता है।

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गायंत्री मंत्र जापः क्या करें क्या न करें धन की कामना से इसका जाप कभी न करें. गायत्री मंत्र जाप करने से ईश्वर की प्राप्ति होती है। ये दो वेदों के संगम से निर्मित है. यजुर्वेद के मंत्र *ॐ भूर्भुवः स्वः* और ऋग्वेद के *तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्* (छंद 3.62.10) को जोड़कर बना है. मंत्र में सवित्र (सूर्य) देव की उपासना है, इसलिए इसे सावित्री मंत्र भी कहा जाता है। यह बहुत तेजी से काम करता है. सदुपयोग हो तो तीब्र स्रजन, दुरुपयोग हो तो तीखा विनाश. पूर्व काल में कई बार ऋषियों ने पाया कि अनाड़ी साधकों द्वारा गायत्री मंत्र का जाप करने से मानसिक अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो रही है. इसके दुरुपयोग से पीढ़ियां बिगड़ने लगीं. तो उन्हें कठोर कदम उठाने पड़े. उन्होंने गायत्री मंत्र को श्रापित (प्रभावहीन) कर दिया. गायत्री मंत्र के रचनाकार ऋषि खुद विश्वामित्र ने भी ऐसे ही कारणों से इसको श्रापित किया. दुनिया रचने वाले ब्रह्मा जी ने भी इसे श्रापित किया. ऋषि वशिष्ठ ने भी गायत्री मंत्र को श्रापित किया.

कुछ विद्वानों का मत है कि शुक्राचार्य ने भी इस मंत्र को श्रापित किया. इन्हीं वजहों से हमने भी गायत्री मंत्र जाप को लेकर चर्चा शुरू की. ताकि साधक खुद को गायत्री मंत्र श्राप का शिकार होने से बचा सकें. इसकी साधना में कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिये.

1. निर्धारित छंद *लय* में किया गया गायत्री मंत्र जप साधक को लाखों में एक बना देता है. गायत्री मंत्र का जाप आत्मशोधन, ज्ञान और आत्मजागृति के लिये ही किया जाना चाहिये. 2 . जिस तरह महामृत्युंजय मंत्र का जाप धन की कामना से नही किया जाना चाहिये. 3. उसी तरह गायत्री मंत्र का जाप धन प्राप्ति के लिये कभी नही करना चाहिये. धन की कामना प्रायः आत्मशोधन की मूल भावना के विपरीत होती है. इसलिये धन के इच्छुक लोगों को अक्सर विपरीत परीणाम मिलते हैं. किसी भी मंत्र की कामना और साधक की कामना में भेद हो तो परिणाम बिगड़ ही जाते हैं. गायत्री मंत्र में निहित कामना आत्मशोधन की प्रेरणा (प्रचोदयात्) की है. *वास्तव में गायत्री मंत्र की साधना खुद को तपाकर निखारने की साधना है न कि सुविधाभोगी होने की*. इसीलिये पूर्व में गायत्री साधक जनेऊधारी ब्राह्मणों को भिक्षा यापन करना होता था. भिक्षा यापन से उन्हें धन की आवश्यकता नही पड़ती थी, दूसरे इससे उनका अहंकार मिटता था. गायत्री साधक का अहंकार उसके जीवन में प्रलय पैदा करता है. आज भी यगोपवीत संस्कार के मौके पर गायत्री धारण करते ही ब्राह्मण को भिक्षा मांगने की औपचारिकता निभानी होती थी. 4. सदैव शांत मन से ही गायत्री मंत्र का जाप करें. शांत मन से किया गया जाप चमत्कारिक परिणाम देता है. मन खराब हो तो इसका जाप बिल्कुल न करें. अन्यथा अस्थिरता और दूसरों को नीचा दिखाने की भावना उत्पन्न होती है. 5. गायत्री मंत्र जाप से 6 घंटे पहले और 6 घंटे बाद तक गुस्सा, आलोचना या कुतर्क बिल्कुल न करें. अन्यथा अहंकार बढ़कर बेकाबू हो जाता है. 6. उद्देश्य प्राप्ति के लिये गायत्री मंत्र का जाप बिना रुकावट हर दिन होना चाहिये. अन्यथा शरीर की शक्तियों (उर्जाओं) में भारी उतार चढ़ाव होता है. फलस्वरूप मानसिक और शारीरिक बीमारियां पनपती हैं. इसी कारण महिलाओं को इससे अलग रहने की सलाह दी जाती है. क्योंकि हर महीने माहवारी के दिनों में उन्हें मंत्र जाप रोक देना होता है. यह सलाह महिलाओं और उनके परिवार की सुरक्षा के लिये दी जाती है. अन्यथा उन्हें बार बार अपमान का सामना करना पड़ता है. जिससे वे चिड़चिड़ेपन का शिकार होती हैं. 7. गायत्री मंत्र जाप बच्चों और युवाओं के लिये बहुत हितकारी होता है. 8. गायत्री मंत्र जाप के लिये सक्षम गुरू ही धारण करें. उनके बताये नियमों का सदैव पालन करें.