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एक सिद्धी हवा में उड़ने की-


एक सिद्धी हवा में उड़ने की-3 यौगिक विज्ञानः जिससे योगी सबके सामने हवा में उड़ गये

राम राम, मै शिवप्रिया गुरू जी के निकट शिष्य शिवांशु जी की आध्यात्मिक यात्रा का ये अंश कल्पना से परे है. जब मैने इसे पढ़ा तो आश्चर्यचकित रह गई. शिवांशु जी ने ई बुक और वीडियो सिरीज के लिये कई साधना वृतांत लिखे हैं. जो एडिटिंग और प्रकाशन अनुमति के लिये गुरू जी के पास प्रतीक्षारत हैं. जब कभी समय मिलता है, तब गुरू जी उन्हें पढ़कर एडिट करते हैं. उसी बीच कई बार मुझे ये खजाना पढ़ने को मिल जाता है. तो मै आपके साथ शेयर कर लेती हूं. अपने एक वृतांत में उन्होंने हवा में उड़ते साधू का आंखो देखा हाल लिखा है. सिद्ध साधू से प्राप्त साधना विधान भी लिखा है. साथ ही गुरू जी से मिले उसके वैज्ञानिक पक्ष को भी विस्तार से लिखा है. मै यहां उच्च साधकों की प्रेरणा के लिये उनके वृतांत को उन्हीं के शब्दों में शेयर कर रही हूं. लेकिन एक बात के लिये सावधान रहें. सरल लगने के बावजूद बिना किसी सक्षम गुरू के मार्गदर्शन के वायुगमन की साधना विधि न अपनायें. ये बहुत बहुत खतरनाक साबित हो सकता है. मै यहां शिवांशु जी के शब्दों में ही उनका वृतांत शेयर कर रही हूं.

शिवांशु जी का वृतांत... प्रभु जी ने मुझे कोई भी बड़ी साधना कराने से मना कर दिया. उन्हें पहले से ही ज्ञात था कि शर्त टूटने पर मै साधना के लिये अयोग्य माना जाऊंगा. शर्त टूट चुकी थी. सिध्द संत के पास होते हुए भी साधना न कर पाना मेरे लिये दुखद था. मगर मै अधिक दुखी नही हुआ. क्योंकि शर्त टूटने से मैने अपनी स्थिति को स्वीकार कर लिया था. तीसरे दिन मुझे वहां से वापस कर दिया गया. इस बीच प्रभु जी से हवा में चलने की साधनाओं पर उनके विज्ञान पर ढ़ेर सारी जानकारी प्राप्त कर ली. प्रभु जी उच्च श्रेणी के योगी भी थे. वे रोज सुबह साढ़े तीन बजे वहां से 95 किलोमीटर दूर पहाड़ियों पर बने एक मंदिर में जाया करते थे. वो देवी का मंदिर थे. देवी दर्शन के बाद ही उनका दिन शुरू होता था. जब तक उनके शिष्य उठकर नित्यकर्म करते तब तक वे लौट आते थे. वे वायुमार्ग से दर्शन हेतु जाते थे. उनका वायुगमन उनके शिष्यों के लिये सामान्य क्रिया जैसा था. मगर मेरे लिये वापसी तक उत्सुकता का विषय बना रहा. जब भी मै उन्हें हवा में देखता, बस देखता ही रहता. जैसे कोई नसिकिया हवाई जहाज को देखता है. प्रभु जी अपने वायुगमन का अधिक उपयोग नही करते थे. एक दिन मैने उनसे पूछा आपका वायुगमन तो विश्व में तहलका मचा सकता है. विज्ञान के समक्ष हम अध्यात्म को प्रूफ कर सकते हैं. उससे क्या होगा. प्रभु जी ने मुझसे उल्टा सवाल कर दिया था. उन्होंने (वैज्ञानिकों ने) हवाई जहाज, जेट, हैलीकाप्टर, ग्लाइडर, स्पेसशिप तमाम उड़ने वाली चीजें बना रखी हैं. कई तरह के खिलौने भी उड़ते हैं. वस्तुतः जिस चीज के गुरुत्वाकर्षण को न्यून कर दिया जाये, वही उड़ पड़ेगा. मेरे वायुगमन का भी यही कारण है. मै अपने शरीर के पृथ्वी तत्व पर नियंत्रण के जरिये खुद पर से गुरुत्वाकर्षण का असर कम कर देता हूं. बस शरीर ऊपर उठ जाता है. वे एेसे बता रहे थे जैसे वायुगमन को मामूली सी बात हो. मैने पूछा मगर इसे कर पाना तो चमत्कार जैसी बात है. नही ये कोई चमत्कार नही है. प्रभु जी ने कहा. पक्षी दिन भर उड़ते हैं. लम्बा सफर तय करते हैं. इसमें कैसा चमत्कार. बस थोड़े अभ्यास की बात है. योगी इसे अधिक आसानी से कर लेते हैं. मगर आपने तो योग से इसे नही सीखा. मैने सवाल किया. आपने तो इसके लिये मुश्किल साधना की है. तब मुझे वायुगमन के आसान तरीके नही मालुम थे. प्रभु जी ने बताया. अब मेरे सम्पर्क में एेसे कई लोग हैं जो वायुगमन करते हैं. उनमें से कईयों के तरीके अलग अलग हैं. तो वायुगमन करने वाले सबके सामने एेसा क्यों नही करते. मैने पूछा. क्योंकि इससे तमाशा बन जाएगा. वायुगमन की सिद्धी अर्जित करने की स्थिति तक पहुंचते पहुंचते समस्त संसारिक चाव खत्म से हो जाते हैं. खाना, पीना, पहनना, यश, प्रसिद्धी किसी भी चीज की ललक नही बचती. इसी कारण एेसे सिद्ध एकांत पसंद हो जाते हैं. मगर कुछ योगियों ने हवा में उड़ने को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत भी किया है. प्रभु जी की बातें लगातार सुनते रहने का मन होता था. दिन भर में एक दो बार ही वे बातें करने बैठते थे. एक दिन प्रभु जी ने स्वामी अच्युतानंद जी का उल्लेख किया। बताया कि योग की एक नई विधि खोजी. जिससे बिना किसी साधना के भी हवा में उड़ा जा सकता है. उसके आगे उन्होंने जो बताया वो उर्जा विज्ञान के बहुत करीब था. इस क्रिया में नाभि चक्र की विशेष भूमिका होती है. गुरुवर ने हमें सिखाया था कि नाभि चक्र हमारे शरीर की उर्जा के स्टोर रूप का काम करता है. वहीं उर्जा का भंडारण होता है. जिससे शरीर और मन का पोषण होता है. इसी उर्जा से कामनायें पूरी होती हैं. नाभि चक्र में एकत्र उर्जा ही जीवन चलाती है. ये उर्जा नाभि और उसके नीचे त्रिकोण में स्थिति तीन छोटे चक्रों के मध्य होती है. बोलचाल की भाषा में इसे नाप या नाल या पेचुटी कहते हैं. इस उर्जा के असंतुलन से पेट में असहय पीड़ा होती है. इसे नाप हट जाना कहा जाता है. जिसकी नाप हटी हो उसके इन्हीं तीनों छोटे चक्र को उपचार कर दिया जाता है. वो बिना किसी दवा के तुरंत ठीक हो जाता है. प्रभु जी हवा में उड़ने की योगिक क्रिया में इसी उर्जा क्षेत्र का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि नाभि के चारो ओर छोटी छोटी ग्लांट होती हैं. उनका केंद्र नाभि से ठीक नीचे होता है. जिसे सामान्य भाषा में गोला या पेचुटी बोला जाता है. ग्लांट्स यानि ग्रंथियों में भारी प्राण वायु अर्थात् जीवन शक्ति या वैज्ञानिक भाषा में आक्सीजन ही जीवन चलाती है. इसी से शरीर पोषित और जीवित रहता है. स्वामी अच्युतानंद जी ने इसी प्राण वायु को गुरुत्वाकर्षण के विपरीत इश्तेमाल करने की विधि खोजी. वे उच्च स्तर के योगी थे. उन्होंने योग के सभी आयामों पर नियंत्रण हासिल कर लिया था. प्रभु जी ने बताया कि अच्युतानंद जी की यौगिक क्रिया की शैली हैलीकाप्टर की सी समझो. जिस तरह से हैलीकाप्टर ऊपर के पंखों के जरिये अंदरूनी दबाव बनाकर अपने वजन को हवा में उठा लेता है. उसी तरह ये यौगिक क्रिया भी शरीर को हवा में उड़ा देती है. इस क्रिया के तहत नाभि के चारो ओर स्थित ग्रंथियों की प्राण वायु को तेज गति से हिलाया जाता है. फिर उसे नाभि के चारो तरफ गोलाकार में घुमाया जाता है. धीरे धीरे इसकी गति बढ़ती जाती है. स्वामी अच्युतानंद जी की क्रिया में प्राण वायु को गति देने से पहले नाभि से ऊपर वायु बंध लगा लिये जाते हैं. जिहें जलंधर बंध भी कहा जाता है. इससे उस दिशा में वायु का जाना रूक जाता है. नाभि के चारो तरफ तेजी से घूम रही प्राण वायु गति के प्रभाव से गर्म होने लगती है. और बहुत अधिक गर्म हो जाती है. गर्म गैस का स्वाभावतः प्रसार बढ़ता है. ये प्रसार इतना अधिक बढ़ जाता है कि उसका ऊपर की तरफ बढ़ता दबाव गुरुत्वाकर्षण से अधिक हो जाता है. यही वो क्षण होता है जब शरीर हवा में उठ जाता है. इसे स्वामी अच्युतानंद की यौगिक क्रिया के नाम से जाना जाता है. अच्युतानंद जी ने इस क्रिया को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया था. वे सबके देखते देखते एक फीट से अधिक ऊपर हवा में उठ गये. मै शरीर के विज्ञान को इस रूप में उपयोग करने की पद्धति से पहली बार परिचित हो रहा था. सुनने में सरल लगा. मगर प्रभु जी ने कहा कि इसे सिर्फ योग्य योगी के सानिग्ध में ही किया जाना चाहिये. सिर्फ सुनकर या पढ़कर कतई न करें. प्रभु जी ने वायुगमन के कुछ और वैज्ञानिक तरीके बताये. उनकी चर्चा मै आगे करूंगा. मगर बिना सक्षम मार्गदर्शन के आप इनमें से किसी को न करें. ..... क्रमशः।