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Narmadeshwar Shiva Linga- A very rare Shivlinga


Narmadeshwar Shiva Ling- As the name suggests is found in the Narmada river in India which flows in the states of Madhya Pradesh and Maharashtra. Also these ling is called 'Banaling'.

It is believed to be a manifestation of Lord Shiva and it helps the devotee in connecting with supreme Lord Shiva. It is also believed that where there is Narmadeshwar Shivling, Lord Shiva Himself resides there.

The history of Narmadeshwar Shiva Linga dates back to centuries and the formation of this Shiva Linga is very unique in its own right. Its believed that the waves of the Narmada River hits the stones in the river and thus this Linga forms its oval shape. However this process takes thousands of years together and that is why it is so auspicious. One can even hear the water inside the Linga when shaken.

The Narmadeshwar Shivling are quite strong and the hardness is a 7 on the Moe's Scale.

It is the considered view of many researchers and geologists that the unique composition of the Narmadha Shivalingas was due to the impregnation of it's rocky river-sides and the rocks in the river bed 14 million years ago by a large meteorite that crashed into the Narmada River.

The fusion of the Meteorite and the Earthly Minerals has spawned a new and unique type of Crystalline Rock with extraordinary energetic qualities.

Benefits of Installing Narmadeshwar Linga

Narmada Stone are Swayambhu Shiva Lingas that have taken shape in the Sacred Narmada River. It can be placed at your own home, healing place, meditation space, work place, Business Place, Corporate Houses. Narmada Linga will bring and maintain peace and harmony. The Narmada Shivling is a most sacred symbol and divine energy tool, Enhanced Positive energy will be invoked in the place.

It is seen from many people during 'Shani Sadhesati' they got tremendous relief by keeping & worshipping 'Narmadeshwar Shivling'.

1.Narmadeshwar Shivling have mysterious super power that induces focus and concentration.

2.Ancient sages and seers of India have recommended worship of Narmada Shiv linga so that any person can connect with Lord Shiva. Spiritually the person would feel very nearer to the Lord Shiv as well as the only Shivling has the power to give the positive effect of any planetary bad effect. No planet in this earth has the power to give bad effect to the Shivling worshipper.

3.It brings prosperity at home.

4.It also brings growth and opportunities when placed in Office.

5.It helps in activating the energy within which is also called as kundalini energy and the seven chakras. It awakens the energy centers and brings feelings of peace and well being.

6.Natural Spiritual healing stone balances and brings harmony to the surrounding environment.

7.It also helps in maintaining the cordial relationship, its recommended for healthy relationship between husband and wife. Couples who keep and worship Narmadeshwar Shivling in their home are blessed with Lord Shiva’s blessings.

8.It removes vastu Doshas and protects the place from all tantrik attacks.

9.It protects the home from evil effects.

TO CLEAN STONES;-

There are a few different ways to clean stones—you can do any of the following:

1-Bury them in dirt for a week. Returning your crystals and stones to the earth allows them to cleanse and recharge with the vibration of the earth.

2-Wash them in salt water: Salt purifies and absorbs negative energy. (Note: Some crystals disintegrate when wet. Common stones that can’t get wet include: amber, turquoise, red coral, fire opal, moonstone, calcite, kyanite, kunzite, angelite, azurite, selenite. A good rule of thumb: Many stones that end in “ite” are not water-friendly.)

3-Leave the crystals out in the moonlight for three days prior and three days after the full moon (or for at least 24 hours). Lunar energy helps cleanse and charge the stones, and the moon’s light is brightest and energetically strongest during the full moon.

4-Wipe them with a soft cloth and isopropyl alcohol to remove fingerprints and to sanitize.

5-Burn sage and run the stone through the smoke because it is purifying.

जबलपुर(मध्‍यप्रदेश);-

विंध्य पर्वत श्रृंखला में स्थित यह नगर पवित्र नर्मदा नदी के तट पर स्थित है।कोई जिंदगी की दौड़-धूप से थक हार कर कुछ पल सुकून पाने के लिए यहां पहुंचता है तो किसी को मां नर्मदा के प्रति आस्था यहां नियमित तौर खींच लाती है।

इतिहास;-

1-पुराणों और किंवदंतियों के अनुसार इस शहर का नाम पहले जबालिपुरम् था, क्योंकि इसका सम्बंध महर्षि जाबालि से जोड़ा जाता है। जिनके बारे में कहा जाता है कि वह यहीं निवास करते थे।

2-एक पहाड़ी पर मदन महल का किला स्थित है, जो लगभग 1100 ई. में राजा मदन सिंह द्वारा बनवाया गया एक पुराना गोंड किला है जिसका निर्माण सामरिक उद्देश्य से किया गया था. इसमें आवासीय व्यवस्था नहीं । इसके ठीक पश्चिम में गढ़ है, जो 14वीं शताब्दी के चार स्वतंत्र गोंड राज्यों का प्रमुख नगर था। भेड़ाघाट, ग्वारीघाट और जबलपुर से प्राप्त जीवाश्मों से संकेत मिलता है कि यह प्रागैतिहासिक काल के पुरापाषाण युग के मनुष्य का निवास स्थान था। मदन महल, नगर में स्थित कई ताल और गोंड राजाओं द्वारा बनवाए गए कई मंदिर इस स्थान की प्राचीन महिमा की जानकारी देते हैं।महलरानी दुर्गावती का मदन महल - मदन महल का किला सन् १११६ में राजा मदन शाह द्वारा बनवाया गया था।

3-इस क्षेत्र में कई बौद्ध, हिन्दू और जैन भग्नावशेष भी हैं। कहते है कि जबलपुर में स्थ‍ित 52 प्राचीन ताल तलेैयों ने यहाँ की पहचान को बढाया, इनमें से अब कुछ ही तालाब शेष बचे हैं परन्तु उन प्राचीन ताल तलैयों के नाम अभी तक प्रचलित हैं। जिनमें से कुछ निम्न हैं; अधारताल, रानीताल, चेरीताल, हनुमानताल, फूटाताल, मढाताल, हाथीताल, सूपाताल, देवताल, कोलाताल, बघाताल, ठाकुरताल, गुलौआ ताल, माढोताल, मठाताल, सुआताल, खम्बताल, गोकलपुर तालाब, शाहीतालाब, महानद्दा तालाब, उखरी तालाब, कदम तलैया, भानतलैया, श्रीनाथ की तलैया, तिलकभूमि तलैया, बैनीसिंह की तलैया, तीनतलैया, लोको तलैया, ककरैया तलैया, जूडीतलैया, गंगासागर, संग्रामसागर। जबलपुर भेड़ाघाट मार्ग पर स्थित त्रिपुर सुंदरी मंदिर, हथियागढ़ संस्कृत के कवि राजशेखर से सम्बंधित है ।

1-ग्वारीघाट;-

ऐसी मान्यता है कि यहां मां पार्वती यानी गौरी ने तपस्या की थी। यहां मौजूद गौरी कुंड भी इस बात का प्रमाण देता है। पहले यह घाट गौरीघाट के नाम से जाना जाता था।लेकिन वर्तमान समय में इसे ग्वारीघाट कहते हैं।

ग्वारी का मतलवगांव और घाट का मतलव नदी किनारे का स्थान इसलिए अव ये ग्वारीघाट कहलाता हैं। कुछ लोग मानते हैं कि गौरीघाट का अपभ्रंश होकर इसका नाम ग्वारीघाट हो गया है। इसे मुख्य घाट के नाम से भी जाना जाता हैं। जहां पुराहित बैठ कर धार्मिक कार्य जैसे मुंडन,काल सर्प की पूज,दीप-दान,कथा आदि कार्यों का आयोजन करते है।

2-सिद्घ घाट;-

जैसा कि नाम से ही इस घाट का नाम ध्यान और सिद्घी से जुड़ा हुआ है। यहां एक जलकुंड मौजूद है। मान्यता है कि जिसमें 12 महिने पानी से भरा रहता है। यह भी माना जाता है कि कुंड के पानी को शरीर में लगाने से चर्म रोग ठीक हो जाता हैं। इसी घाट पर मां नर्मदा की आरती की जाती हैं।

3-जिलहरी घाट;-

ग्वारीघाट से कुछ ही दूरी पर स्थित नर्मदा के इस घाट की कहानी शंकर जी से जुड़ी है। यह मान्यता है कि यहां यहा पत्थर पर स्वनिर्मित भगवान शंकर की एक जिलहरी है। जिलहरी के कारण ही इस घाट का नाम जिलहरी घाट पड़ा।

4-उमा घाट;-

यह घाट ग्वारीघाट का ही एक हिस्सा है। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने इस घाट का जिर्णोधार करवाया था। यह घाट मुख्य रूप से महिलाओं के लिए बनवाया गया था। उमा भारती के नाम के कारण ही इस घाट को उमा घाट के नाम से जाना जाने लगा। वहीं पार्वती जी की तपस्या यहां भी होना माने जाने के कारण भी इसे उमा घाट कहते हैं।

5-पंचवटी घाट;-

मान्यता है कि वनवास के दौरान श्रीराम यहां आए और भेड़ाघाट स्थित चौसठ योगिनी मंदिर में ठहरे थे। भेड़ाघाट का नाम भृगु ऋषि के कारण पड़ा। पंचवटी में अर्जुन के पांच वृक्ष होने के कारण इसका नाम पंचवटी पड़ा।

6-तिलवारा घाट;-

प्रचीनकाल में तिल भांडेश्वर मंदिर यहां हुआ करता था। इसके साथ तिल संक्राति का मेला भरने के कारण भी इसे तिलवारा घाट कहते हैं।

7-लम्हेटाघाट;-

प्राचीन मंदिरों के कारण इस घाट का काफी महत्व है। इस घाट पर स्थित है श्री यंत्र का मंदिर जिसे मां लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस मंदिर में पूजा एवं अनुष्ठान करने लक्ष्मी की प्राप्ती होती हैं। जहां तक नाम का सवाल है तो लम्हेटा नाम के गांव के किनारे बसे होने पर इसे लम्हेटा घाट कहते हैं। एक रोचक बात यह है कि घाट का उत्तरी तट लम्हेटा और दक्षिणी तट लम्हेटी कहलाता है। एक अन्य विशेषता है यहां के फॉसिल्स। जो लम्हेटा फॉसिल्स के नाम से प्रसिद्घ हैं।लम्हेटाघाट के गया कुंड से शुरू हुआ था पितरों का श्राद्ध,

सभी घाटों का अपना महत्व;-

सभी घाट अपने आप में एक प्रसिद्घि लिए हुए हैं। सब घाटों का अपना-अपना अलग धार्मिक महत्व हैं। जिनमें से मुख्य रूप से ग्वारीघाट का धार्मिक दृष्टि से,पंचवटी घाट का पर्यटन की दृष्टि से,और तिलवार का मकर संक्राति की दृष्टि से अपना महत्व हैं।