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क्या मुद्रा की साधना द्वारा मनुष्य शारीरिक और मानसिक शक्तियों की वृद्धि करके अपने आध्यात्मिक उद्देश्


क्या है मुद्रा ?-

06 FACTS;-

1-हमारा शरीर पांच तत्व और पंच कोश से नीर्मित है, जो ब्रह्मांड में है वही शरीर में है। शरीर को स्वस्थ बनाए रखने की शक्ति स्वयं शरीर में ही है। इसी रहस्य को जानते हुए भारतीय योग और आयुर्वेद में ऋषियों ने यम, नियम, आसन, प्राणायाम, बंध और मुद्रा के लाभ को लोगों को बताया। 2-यह शरीर पांच तत्वों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से मिलकर बना है। शरीर में ही पांच कोश है जैसे अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश। शरीर में इन तत्व के संतुलन या कोशों के स्वस्थ रहने से ही शरीर, मन और आत्मा स्वस्थ ‍रहती है। इनके असंतुलन या अस्वस्थ होने से शरीर और मन में रोगों की उत्पत्ति होती है। इन्हें पुन: संतुलित और स्वस्थ बनाने के लिए मुद्राओं का सहारा लिया जा सकता है।

3-योग अनुसार आसन और प्राणायाम की स्थिति को मुद्रा कहा जाता है। बंध, क्रिया और मुद्रा में आसन और प्राणायाम दोनों का ही कार्य होता है। योग में मुद्राओं को आसन और प्राणायाम से भी बढ़कर माना जाता है। आसन से शरीर की हडि्डयाँ लचीली और मजबूत होती है जबकि मुद्राओं से शारीरिक और मानसिक शक्तियों का विकास होता है।मुद्राओं का संबंध शरीर के खुद काम करने वाले अंगों और स्नायुओं से है।

4-अंगुली में पंच तत्व .. हाथों की सारी अंगुलियों में पांचों तत्व मौजूद होते हैं जैसे अंगूठे में अग्नि तत्व, तर्जनी अंगुली में वायु तत्व, मध्यमा अंगुली में आकाश तत्व, अनामिका अंगुली में पृथ्वी तत्व और कनिष्का अंगुली में जल तत्व।अंगुलियों के पांचों वर्ग से अलग-अलग विद्युत धारा बहती है। इसलिए मुद्रा विज्ञान में जब अंगुलियों का रोगानुसार आपसी स्पर्श करते हैं, तब रुकी हुई या असंतुलित विद्युत बहकर शरीर की शक्ति को पुन: जाग देती है और हमारा शरीर निरोग होने लगता है। ये अद्भुत मुद्राएं करते ही यह अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं।

5-मुद्रा संपूर्ण योग का सार स्वरूप है। इसके माध्यम से कुंडलिनी या ऊर्जा के स्रोत को जाग्रत किया जा सकता है। इससे अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों की प्राप्ति संभव

है।सामान्यत: अलग-अलग मुद्राओं से अलग-अलग रोगों में लाभ मिलता है। मन में सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है। शरीर में कहीं भी यदि ऊर्जा में अवरोध उत्पन्न हो रहा है तो मुद्राओं से वह दूर हो जाता है और शरीर हल्का हो जाता है।

6-मुद्राओं की संख्या को लेकर काफी मतभेद पाए जाते हैं।योगमुद्रा को कुछ योगाचार्यों ने ‘मुद्रा‘ के और कुछ ने ‘आसनों‘ के समूह में रखा है।मुद्रा और दूसरे योगासनों के बारे में बताने वाला सबसे पुराना ग्रंथ ‘घेरण्ड संहिता‘ है। हठयोग पर आधारित इस ग्रंथ को महर्षि घेरण्ड ने लिखा था। घेरंड में 25 और हठयोग प्रदीपिका में 10 मुद्राओं का उल्लेख मिलता है।जिनमें 5 हंसों की और 5 विशेष परमहंसों की मुद्राएं हैं ।

क्या कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने में विशेष मुद्राओं से सहायता मिलती है?-

20 FACTS;- 1-तंत्र मार्ग में कुण्डलिनी शक्ति की बड़ी महिमा बतलाई गई है । इसके जागृत होने से षटचक्र भेद हो जाते हैं और प्राणवायु सहज ही में सुषुम्ना से बहने लगती है इससे चित्त स्थिर हो जाता है और मोक्ष मार्ग खुल जाता है । इस शक्ति को जागृत करने में मुद्राओं से विशेष सहायता मिलती है ।इनकी विधि योग ग्रंथों में बतलाई गई है। 2-तंत्र-शास्त्र भारतवर्ष की बहुत प्राचीन साधन-प्रणाली है । इसकी विशेषता यह बतलाई गई है कि इसमें आरम्भ ही से कठिन साधनाओं और कठोर तपस्याओं का विधान नहीं है, वरन् वह मनुष्य के भोग की तरह झुके हुए मन को उसी मार्ग पर चलाते हुए धीरे-धीरे त्याग की ओर प्रवृत्त करता है । इस दृष्टि से तंत्र को ऐसा साधन माना गया कि जिसका आश्रय लेकर साधारण श्रेणी के व्यक्ति भी आध्यात्मिक मार्ग में अग्रसर हो सकते हैं ।

3-यह सत्य है कि बीच के काल में तंत्र का रूप बहुत विकृत हो गया और इसका उपयोग अधिकांश मे मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि जैसे जघन्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाने लगा, पर तंत्र का शुद्ध रूप ऐसा नहीं है । उसका मुख्य उद्देश्य एक-एक सीढ़ी पर चढ़कर आत्मोन्नति के शिखर पर पहुँचता ही है ।

4-वैज्ञानिक अभी तक इतना ही जान पाये हैं कि नाक से ली हुयी साँस मन से होती हुई फेफड़ों तक पहुँचती है। फेफड़ों के छिद्रों में भरे हुये रक्त को वायु शुद्ध कर देती है। और रक्त-परिसंचालन की गतिविधि शरीर में चलती रहती है। किन्तु प्राणायाम द्वारा श्वाँस-क्रिया को बन्द करके भारतीय योगियों ने यह सिद्ध कर दिया कि चेतना जिस प्राण-तत्व को धारण किये हुये जीवित है, उसके लिये श्वाँस- क्रिया आवश्यक नहीं है।साँस ली हुई हवा का स्थूल भाग ही रक्त शुद्धि का काम करता है, उसका सूक्ष्म भाग सुषुम्ना शीर्षक में अवस्थित खड़ा और पिंगला नाड़ियों के माध्यम से नाभि-कन्द स्थित चेतना को उद्दीप्त किये रहता है।

5-”गोरक्ष पद्धति” में श्लोक 48 में इस क्रिया को शक्ति-चालन महामुद्रा, नाड़ी शोधन आदि नाम दिये है और लिखा है कि सामान्य अवस्था में इड़ा और पिंगला-नाड़ियों का शरीर की जिस ग्रन्थि या इन्द्रिय से सम्बन्ध होता है, मनुष्य उसी प्रकार के विचारों से प्रभावित होता रहता है, इस अवस्था में नाड़ियों के स्वतः संचालन का अपना कोई क्रम नहीं होता। किन्तु जब विशेष रूप (प्राणायाम) से प्राण-वायु को जगाया जाता है तो इड़ा (गर्म नाड़ी) और पिंगला (ठण्डी नाड़ी) दोनों सम-स्वर में प्रवाहित होने लगती है। 6-इस अवस्था के विकास के साथ-साथ नाभि-कन्द में प्रकाश स्वरूप गोला भी विकसित होने लगता है। उसके प्राण-शक्ति का विद्युत-शक्ति के समान निस्तारण होता है। चूँकि सभी नाड़ियाँ इसी भाग से निकलती है, इसलिये वह इस ज्योति के संस्पर्श में होती है। सभी नाड़ियों में वह विश्व-व्यापी शक्ति भरने से सारे शरीर में वह तेज ‘ओजस’ के रूप में प्रकट होने लगता हैं। इन्द्रियों में वही जल के रूप में, नेत्रों में चमक के रूप में परिलक्षित होता है। इस प्राण-शक्ति के कारण प्रबल आकर्षण शक्ति पैदा होती है।

7-यह शक्ति नाभि प्रवेश में प्रस्फुटित होती है और चूँकि दृष्टि प्रवेश भी उसी के समीप है, इसलिए वह भाग शीघ्र और तेजी से प्रभावित होता है। इसलिये यौन-शक्ति केन्द्रों का नियन्त्रण में रखना अधिक आवश्यक होता है। साधना की अवधि में संयम पर इसीलिये अधिक जोर दिया जाता है, जिससे कुण्डलिनी शक्ति का फैलाव ऊर्ध्वगामी हो जाये उसी से ओज की वृद्धि होती है। 8-स्थूल रूप से शरीर के वायु मंडल की ही प्रख्यात वैज्ञानिक देख पाते है, वे अभी तक नाड़ियों के भीतर बहने और जीवन की गतिविधियों को मूलरूप से प्रभावित करने वाले प्राण प्रवाह को नहीं जान सके। सूक्ष्म नेत्रों से उसे देखा जाना संभव भी नहीं है। उसे भारतीय योगियों ने चेतना के अति सूक्ष्म-स्तर का चेतन करके देखा।

9-योग शिखोपनिषद् में 101 नाड़ियों का वर्णन करते हुये सुषुम्ना को परानाड़ी बताया है। यह कोई नाड़ी नहीं है वरन इड़ा और पिंगला के समान विद्युत-प्रवाह से उत्पन्न हुई एक तीसरी धारा है। जिसका स्थूल रूप से अस्तित्व नहीं भी है और सूक्ष्म रूप से इतना व्यापक एवं विशाल है कि जीव की चेतना अब उसमें से होकर चला करती है तो ऐसा लगता है कि वह किसी आकाश गंगा में प्रभावित हो रही हो। वहाँ से विशाल ब्रह्माण्ड की भाँति होती है।

10-अन्तरिक्ष में अव-स्थित अगणित सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह-नक्षत्र की स्थिति समझने का अलभ्य अवसर, जो किसी चन्द्रयान या राकेट के द्वारा भी सम्भव नहीं है, इसी शरीर में मिलता है। उस स्थिति का वर्णन किया जाये तो प्रतीत होगा कि जो कुछ स्थल और सूक्ष्म इस संसार में विद्यमान् है, उन सब के साथ सम्बन्ध मिला लेने और उनका मान उपलब्ध करने की क्षमता उस महान् आत्म-तेज में विद्यमान् है जो कुण्डलिनी के भीतर बीज रूप में मौजूद है। 11-सुषुम्ना नाड़ी मेरुदण्ड में प्रवाहित होती है और ऊपर मस्तिष्क के चौथे निचले भाग में जाकर सहस्रार चक्र में उसी तरह प्रविष्ट हो जाती है, जिस तरह तालाब के पानी में से निकलती हुई कमल नाल से शत-दल कमल विकसित हो उठता है। सहस्रार चक्र ब्रह्माण्ड लोक का प्रतिनिधि है, यहाँ ब्रह्म की सम्पूर्ण विभूति-बीज रूप से विद्यमान् है और कुण्डलिनी की ज्वाला वहीं जाकर अन्तिम रूप से जा ठहरती है, उस स्थिति में निरन्तर मधुपान का सा, सुख जिसका कभी अन्त नहीं होता; प्राप्त होता है, उसी कारण कुण्डलिनी शक्ति से ब्रह्म प्राप्ति होना बताया जाता है। 12-कुण्डलिनी का महत्व इसी शरीर में परिपूर्ण और सामर्थ्य का स्वामी बनकर आत्मा की अनुभूति और ईश्वर दर्शन प्राप्त करने से निःसन्देह बहुत अधिक बढ़ जाता है। पृथ्वी का आधार जिस प्रकार शेष भगवान को मानते है, उसी प्रकार कुण्डलिनी शक्ति पर ही प्राणि मात्र का जीवन अस्थित्व टिका हुआ है। सर्प के आकर की वह महाशक्ति ऊपर जिस प्रकार मस्तिष्क में अवस्थित शून्य-चक्र से मिलती है, उसी प्रकार नीचे वह यौन-स्थान में विद्यमान् कुण्डलिनी के ऊपर टिकी रहती है।

13-प्राण और अपान वायु के चौंकने से वह धीरे-धीरे सशक्त होने लगती है। साधना की प्रारम्भिक अवस्था में यही क्रिया धीरे-धीरे होती है। किन्तु साक्षात्कार या सिद्धि की अवस्था में यह सीधी हो जाती है और सुषुम्ना का द्वार खुल जाने से शक्ति का स्फुरण वेग से फूट कर सारे शरीर में-विशेष रूप से मुख्यकृति में-फूट पड़ता है। कुण्डलिनी जागरण से दिव्य-ज्ञान ,दिव्य अनुभूति और अलौकिक सुख का सरोवर इसी शरीर में मिल जाता है। 14-सुषुम्ना नाड़ी का रुका हुआ छिद्र जब खुल जाता है तो साधक को एक ध्वनि प्रारम्भ में मेघ के गर्जन, वर्षा समुद्र की हहराहट, घण्टा, भक्ति, विराग और भ्रमर-गुजार के तुल्य विकसित होती है, यही बाद में अनहद नाद में परिवर्तित हो जाती है। नाभि से 4 उंगल ऊपर यह आवाज सुनाई देती है, उसे सुनकर चित्त उसी प्रकार मोहित होता है, जिस प्रकार वेणुनाद सुनकर सर्प सब कुछ भूल जाता है। अनहद नाद से साधक के मन पर चढ़े हुए जन्म-जन्मान्तरों के सुसंस्कार छूट जाते हैं। नाद ही नहीं कुण्डलिनी शक्ति अपने जिस पुर्यष्टक नाम प्राण-स्वरूप में स्थिर है उसमें ऐसी सुगन्ध प्रस्फुटित होती है, जैसे वहाँ कोई मञ्जरी या कस्तूरी बड़े यत्न से सुरक्षित रखी गई है। 15-कुण्डलिनी जाग्रत करने के लिये जितनी दुस्तर उसकी सिद्धियाँ है, उतना कठिन साहस भी करना पड़ता है, किन्तु यह शक्ति जब जागृत हो जाती है और उसके प्रवाह का अन्त नाड़ियों में फैलने से रोककर ब्रह्म नाड़ी से ऊपर की ओर से जाते है। ब्रह्म नाड़ी सुषुम्ना की भी मध्यवर्ती और अत्यन्त सूक्ष्म नाड़ी है। सुषुम्ना के भीतर भी केले के पत्तों की तरह बज्व्रा और चित्रणी नाड़ी है, उनकी विषम धारा का नाम ब्रह्म नाड़ी है, जो इस शरीर को आकाश गगन की शक्ति से भर देती है। इन नाड़ियों को पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने एक धूमर पदार्थ (ग्रे कैटर) के रूप में जानने का प्रयत्न किया है पर वे अभी तक इस सम्बन्ध में कोई यांत्रिक जानकारी उपलब्ध नहीं कर सके है।

16-योग वसिष्ठ में कुण्डलिनी साधन की दिव्य सिद्धियों का वर्णन करते हुए लिखा है;- ''रेचक के प्रयोग से जब कुण्डलिनी शक्ति मस्तिष्क में थोड़ी देर के लिये टिक जाती है तो उन सिद्ध पुरुषों के दर्शन होते है जो बहुत पहले इस नश्वर देह का परित्याग कर चुके है। प्राणों को मुख से 12 गुना बाहर रखने का अभ्यास कर लेने वाला योगी किसी दूसरे शरीर में प्रवेश कर सकता है। इन्हीं युक्तियों से योगी में जीव को कुण्डली से उसी प्रकार बाहर निकालने की क्षमता मिल जाती है, जिस प्रकार वायु से सुगन्ध खींच ली जाये। इस स्थिति में शरीर कही भी पड़ा रहे चेतना उससे अलग होकर बाहर के दृश्यों का उसी प्रकार घूम कर आनन्द ले सकती है, जैसे कोई इस शरीर से ही कहीं भ्रमण कर रहा हो। दूसरे शरीर चाहे यह जड़ जैसे वृक्ष ही क्यों न हों उसमें भी यह चेतना प्रवेश करके यहाँ के सब रहस्य जान सकती है, किसी और के शरीर में प्रवेश करके उस शरीर को मिलने वाले भोग आदि सुखों का रसास्वादन किया जा सकता है। अपने शरीर से भोग-भोग कर चेतना को किसी और के शरीर में बदलता रहे तो बहुत काल तक भौतिक सुख और उसे सारे संसार में फैला कर वह सर्व-व्यापी और अन्तर्यामी हो सकता है''। 17-कुण्डलिनी शक्ति की सिद्धियों का कोई आर-पार नहीं है। अन्य योगों की अपेक्षा यह योग सरल भी है, किन्तु साधना काल के विक्षेप और कठिनाइयों को सम्भालने के लिये उसमें भी बड़े साहस और कठोर तप की आवश्यकता होती है। कुण्डलिनी शक्ति मूलतः नाड़ियों से सम्बन्धित है। और नाड़ी जाल के द्वारा ही वह सारे शरीर में फैलती है। इसलिये उसे जाग्रत करने का सम्पूर्ण विश्राम नाड़ियों के उत्तेजन से ही सम्भव होता है।

18-साधना काल में साधक को अपनी मन स्थिति को वशवर्ती और स्थिर बनाये रखने के लिये यधति यम, नियम, ध्यान, धारण, प्रत्याहार आदि का भी अभ्यास करना आवश्यक होता है किन्तु कुण्डलिनी प्राण-शक्ति है, इसलिये उनका जागरण मूलतः प्राणायाम की क्रियाओं से होता है। कुछ साधन ऐसे भी है जिनमें प्राणायाम के साथ मूलबन्ध और उड्डियान -ग्रन्ध भी करने पड़ते है। यह क्रियायें हठवादी होने से कई जोखिम भी हो सकते है यद्यपि इनमें कुण्डलिनी शक्ति का जागरण थोड़े समय में ही हो जाता है, किन्तु योगियों ने उन कठिनाइयों और बाधाओं को देखकर ऐसे सुगम प्राणायाम में खोज निकाले जो किसी भी स्वरूप, निर्मल, युवक, वृद्ध या नारियों द्वारा किये जा सके और कुण्डलिनी के क्रमिक विकास का लाभ प्राप्त कर सकें। 19-प्राणायाम के अभ्यास से यहाँ शरीर में प्राण शक्ति बढ़ती है, वहाँ कुण्डलिनी जागरण के लिये आवश्यक साहस और आत्मबल भी प्राप्त होता है। आत्मबल के विकास में कठिन साधनायें लोग स्वरूप समय में ही छोड़ बैठते है, किन्तु प्राणायाम के शारीरिक और मानसिक लाभ तुरन्त मिलते है, जिससे मनोबल बढ़ता है और आगे का मार्ग साफ होता चला जाता है।

बुद्धि के सूक्ष्म क्षमताओं का विकास होने से स्थूल भागो का विकास और दुर्बल साधनाओं से भी अधिक लाभ होने लगती है और पारलौकिक साधना में आस्था बढ़ने लगती है |

20-इस विधि से मार्ग में पड़ने वाली कठिनाइयों के प्रति उसी तरह साहस बढ़ता जाता है जिस तरह किसी को यदि यह मालूम हो जाये कि यहाँ से इतनी दूरी पर रत्नों का भण्डार छिपा हुआ है तो वह मनुष्य रत्नों के लोभ में मार्ग में आने वाली बाधाओं को भी ठहराकर उन्हें प्राप्त करने के लिये चल पड़ता है।

बन्ध का क्या अर्थ है?-

04 FACTS;-

1-बन्ध का अर्थ है ताला लगाना, बन्द करना, रोक देना। बन्ध के अभ्यास में, शरीर के विशेष क्षेत्र में ऊर्जा प्रवाह को रोक दिया जाता है। जब बंध खुल जाता है तो ऊर्जा शरीर में अधिक वेग से वर्धित दबाव के साथ प्रवाहित होती है।

2-मूलबंध यानी गुदाद्वार (मलद्वार) को संकोचन करना, उड्डियान बंध याने पेट को अन्दर ले जाना, जलंधर बंध याने ठोड़ी को कंठ कूप में लगाना।

3-तीन बंध कब करना चाहिये ....प्राणायाम के आरंभ से अन्त तक मूलबंध कायम रखना ;कुँभक (श्वाँस फेफड़े में रोके रखना) करते समय जालंधर बन्ध और रेचक करते समय (श्वाँस बाहर निकालते समय) उड्डियान बन्ध करना।

4-सामान्यत:, बन्धों के अभ्यास के समय श्वास रोका जाता है। मूल बन्ध और जालन्धर बंध पूरक के बाद व रेचक के बाद भी किये जा सकते हैं। उड्डियान बंध और महाबन्ध केवल रेचक के बाद ही किये जाते हैं।

2-बन्ध के चार प्रकार;-

(1) मूूलबन्ध (2)उड्डीयान बन्ध (3) जालन्धर बन्ध(4) महाबन्ध

लाभ ; -

03 FACTS;-

1-चूंकि बन्धों में क्षणिक रूप से रक्त का प्रवाह रुक जाता है, इसीलिए बन्ध के खुलने पर ताजा रक्त का बढ़ा हुआ प्रवाह होता है जो पुराने मृत कणों को बहाकर दूर ले जाता है। इस प्रकार से सभी अंग मजबूत, नये और पुनर्जीवित होते हैं और रक्त संचार में सुधार हो जाता है।

2-बन्ध मस्तिष्क केन्द्रों, नाडिय़ों और चक्रों के लिए भी लाभदायक है। ऊर्जा माध्यम शुद्ध कर दिये जाते हैं, रुकावटें हटा दी जाती हैं और ऊर्जा का प्रवाह, आना-जाना सुधर जाता है। बन्ध, दबाव और मानसिक व्यग्रता को शमित कर देते हैं एवं आन्तरिक सुव्यवस्था और संतुलन में सुधार लाते हैं।

3-सावधानी..बन्धों को करने के प्रयास से पूर्व, स्तरों की श्वसन तकनीकों का अभ्यास नियमित रूप से काफी लंबी अवधि तक कर लेना चाहिए।

1-मूल बन्ध :-

03 FACTS;-

1-मूल बन्ध अर्थात गुदा संबंधी रोक।मूलाधार प्रदेश (गुदा व जननेन्द्रिय के बीच का क्षेत्र) को ऊपर की ओर खींचे रखना मूलबन्ध कहलाता है।

2-गुदा को संकुचित करने से अपान स्थिर रहता है। प्राण की अधोगति रुककर ऊर्ध्व गति होती है। मूलाधार स्थित कुण्डलिनी में मूलबन्ध से चैतन्यता उत्पन्न होती है,आँतें बलवान् होती हैं। मलावरोध नहीं होता, रक्त सच्चार की गति ठीक रहती है।

3-अपान और कूर्म दोनों पर ही मूलबन्ध का प्रभाव पड़ता है। वे जिन तन्तुओं में फैले रहते हैं, उनका संकुचन होने से यह बिखराव एक केन्द्र में एकत्रित होने लगता है।

2-उड्डियान बन्ध : -

03 FACTS;-

1-मध्य पेट को उठाना।पेट को ऊपर की ओर जितना खींचा जा सके, उतना खींच कर उसे पीछे की ओर पीठ में चिपका देने का प्रयत्न इस बन्ध में किया जाता है। इससे मृत्यु पर विजय होती है। जीवनी शक्ति को बढ़ाकर दीर्घायु तक जीवन स्थिर रखने का लाभ उड्डियान से मिलता है। आँतों की निष्क्रियता दूर होती है।

2-उदर तथा मूत्राशय के रोगों में इस बन्ध से बड़ा लाभ होता है। नाभि स्थित समान और कृकल प्राणों में स्थिरता तथा वात, पित्त, कफ की शुद्धि होती है। सुषुम्रा नाड़ी का द्वार खुलता है और स्वाधिष्ठान चक्र में चेतना आने से वह स्वल्प श्रम से ही जाग्रत् होने योग्य हो जाता है।

3-सावधानियाँ... आँतों की सूजन, आमाशय या आँतों के फोड़े, हर्निया, आँख के अन्दर की बीमारी ग्लूकोमा, हृदय रोगी, उच्च रक्तचाप रोगी एवं गर्भवती महिलाएँ न करें।

3-जालन्धर बन्ध : -

03 FACTS;-

1-जालन्धर बन्ध अर्थात ठोड्डी को बन्द करना।मस्तक को झुकाकर ठोड़ी को कण्ठ- कूप (कण्ठ में पसलियों के जोड़ पर जो गड्ढा है, उसे कण्ठ -कूप कहते हैं) अथवा छाती से लगाने को जालन्धर बन्ध कहते हैं। हठयोग में बताया गया है कि इस बन्ध का सोलह स्थान की नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है....

1-पादाङ्गुष्ठ 2- गुल्फ 3- घुटने 4-जंघा 5-सीवनी 6-लिंग 7-नाभि 8-हृदय, 9-ग्रीवा 10-कण्ठ 11- लम्बिका 12-नासिका 13-भ्रू 14-कपाल 15-मूर्धा 16- ब्रह्मरन्ध्र यह सोलह स्थान जालन्धर बन्ध के प्रभाव क्षेत्र हैं।

2-जालन्धर बन्ध से श्वास- प्रश्वास क्रिया पर अधिकार होता है। ज्ञानतन्तु बलवान् होते हैं। विशुद्धि चक्र के जागरण में जालन्धर बन्ध से बड़ी सहायता मिलती है।

3-सावधानियाँ- सर्वाइकल स्पाण्डिलाइटिस, उच्च रक्तचाप, हृदय रोगी न करें।

2-4-महाबन्ध :-

06 FACTS;-

1-महाबन्ध अर्थात एक ही समय पर तीनों बन्धों का अभ्यास।यह मुद्रा दो बन्धो का सयुक्त रूप है। इसी कारण इसे महाबंध भी कहते है।

2-यह मुद्रा तीन प्रकार के प्राणो का समायोजन करती है। अर्थात प्राण अपान को मिलाती है समान के क्षेत्र में।इस बन्ध के कारण शरीर में अनेक आश्चर्यजनक परिवर्तन भी होते है।

3-हठयोगप्रदीपिका में कहा गया है कि ''यह महाबंध मुद्रा सभी नाड़ियो

में प्राण के उर्ध्व गति को रोकता है और महान सिद्धियो को प्रदान करता है।यह मुद्रा कालपाश रूपी महान बंधन को काट देती है।इसके अभ्यास

से तीनो नाड़ियो (इड़ा,पिंगला,सुषुम्ना )का संगम होता है जिससे मन अंतराकश या महाकाश जिसे शिवस्थान भी कहते है में पहुँच जाता है।''

4-घेरण्ड सहिंता में कहा गया है कि ''यह मुद्रा बुढ़ापा तथा मृत्यु को

नष्ट करने वाली है। इसकी सिद्धि से समस्त कामनाओ की सिद्धि हो जाती है।''

5-शिव सहिंता में कहा गया है कि ''इस मुद्रा के अभ्यास से साधक

अपने शरीर को पुष्ट करने के साथ ही अस्थियो को भी सुदृढ़ कर लेता है। इसके द्वारा मानव मन संतुष्ट रहता है तथा अभ्यासी के सभी मनोरथो की सिद्धि हो जाती है।'' 6-इस प्रकार कहा जा सकता है की महाबंध मुद्रा शारीरिक लाभ व अध्यात्मिक लाभ दोनों हो प्रदान करती है। लाभ शरीर से प्रारम्भ होकर दिव्य स्तर तक जाते है।

3-महाबंध की विधि;-

03 FACTS;-

1-प्रथम दायां पांव उठाकर उसकी एड़ी से सीवनी को दृढ़ता से दबाकर गुदा मार्ग को बंद करें। यह मूलबंध की स्थिति है। फिर दायां पांव बाईं जांघ पर रखकर गोमुखासन करें और तब ठोढ़ी की छाती पर दृढ़ता से लगाकर रखें। यह जालन्धरबंध की स्थिति है। फिर पेट को दबाकर रखें। इससे अपानवायु ऊपर की ओर प्रवाहित होती है। इस समय में ध्यान त्रिकुटी पर लगाकर रखें। इस संपूर्ण स्थिति को महाबंध कहा जाता है।

2-इस प्रकार कहा जा सकता है की एड़ी को गुदा व उपस्थ के बीच दृढ़ता से सटाकर दूसरे पैर को ऐसे रखे की अर्द्धपद्मासन की स्थिति बन जाए। फिर मूल बंध लगाए उसके बाद कुम्भक प्राणायाम करके साथ ही जालन्धर बंध भी लगाए।इसी प्रकार पैरो के दूसरे क्रम से भी अर्धपद्मासन में बैठे और सारी प्रक्रिया को दोहराये। इसे ही महाबंध मुद्रा कहते है।

3-उसी अवस्था में नीचे से अपान वायु को उपर की तरफ ले जाए और नासिका से ली गई वायु अर्थात प्राण को नीचे की तरह ले जाकर जठर अर्थात उदर क्षेत्र में ले जाए और वहाँ पर प्राण समान कहलाता है इसी जगह समान और अपान वायु को मिला दे। ये एक अध्यात्मिक यात्रा है इसी कारण से इसे केवल साधक ही समझ सकते है।

लाभ;-

05 FACTS;-

1-इसके नियमित अभ्यास से जठराग्नि अधिक बढ़ती है, जिससे पाचन शक्ति उत्तम बनी रहती है। जरा-मृत्यु आदि निकट नहीं आ पाते और साधक योगी बन जाता है। 2-शरीर के विभिन्न प्रकार के रोग जैसे कब्ज,गैस,अपच दूर हो जाते है। मूत्र व धातु के समस्त रोग दूर हो जाते है। घुटने व जंघा मजबूत होती है। कोहनियों के जोड़ मजबूत होते है। थायरॉयड संबंधी समस्या दूर हो जाती है। गर्दन दर्द नहीं होता। शरीर के लगभग सभी रोग महाबंध मुद्रा के अभ्यास से ठीक हो जाते है। 3-अध्यात्मिक स्तर पर तो इसके बहुत ही लाभ है।यह मुद्रा सुषुम्ना को छोड़कर अन्य सभी नाड़ियो में प्राण की उर्ध्व गति को रोक देती है। जिसका बहुत फायदा साधक को मिलता है जो प्राण अब तक अनेक जगह पर बटा हुआ था वो सब जगह से रूककर सुषुम्ना से बहने लगता है।

4-इस मुद्रा के अभ्यास से साधक मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात शरीर का क्षरण भी नहीं होता और साधक के ह्रदय से मृत्यु का भय भी नष्ट हो जाता है। वह अपने मूल स्वरूप का दर्शन करने से अभय हो जाता है।

5-प्राण जो सामान्यत इड़ा या पिंगला से बहता है इस मुद्रा के अभ्यास से रूक जाता है और सुषुम्ना से होकर बहने लगता है। और इन तीनो नाड़ियो के संगम अर्थात आज्ञाचक्र पर पहुँच जाता है। आज्ञा चक्र को अन्ताकाश या महाकाश भी कहते है। सावधानियाँ :-

04 FACTS;- 1-खाली पेट ही अभ्यास करें। 2-कमर दर्द या घुटने या हाथ का दर्द हो तो यह अभ्यास ना करें। 3-गर्दन संबंधी समस्या हो तो अभ्यास न करें। 4-कई बार अभ्यास के समय पेट में अधिक गर्मी उत्पन्न हो जाती है जिस कारण कब्ज,मुँह में छाले जैसे समस्या हो जाती है।यह समस्या अपान प्राण को मिलाने से होती है।

कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने में विशेष मुद्राओं का महत्व;-

02 FACTS;-

1-तंत्र-शास्त्र में जो साधना बतलाई गई है, उसमें मुद्रा साधन बड़े महत्व का और श्रेष्ठ है । मुद्रा में आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि योग की सभी क्रियाओं का समावेश होता है । मुद्रा की साधना द्वारा मनुष्य शारीरिक और मानसिक शक्तियों की वृद्धि करके अपने आध्यात्मिक उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है । मुद्राएँ अनेक हैं ।घेरण्ड संहिता में उनकी संख्या 25 बतलाई गई है,

2-घेरण्ड संहिता में कुल पच्चीस (25) मुद्राओं का उल्लेख मिलता है । इन पच्चीस मुद्राओं के नाम निम्न हैं –

1.महामुद्रा, 2. नभोमुद्रा, 3. उड्डियान बन्ध, 4. जालन्धर बन्ध, 5. मूलबन्ध, 6. महाबंध, 7. महाबेध मुद्रा, 8. खेचरी मुद्रा, 9. विपरीतकरणी मुद्रा, 10. योनि मुद्रा, 11. वज्रोली मुद्रा, 12. शक्तिचालिनी मुद्रा, 13. तड़ागी मुद्रा, 14. माण्डुकी मुद्रा, 15. शाम्भवी मुद्रा, 16. पार्थिवी धारणा, 17. आम्भसी धारणा, 18. आग्नेयी धारणा, 19. वायवीय धारणा, 20. आकाशी धारणा, 21. अश्विनी मुद्रा, 22. पाशिनी मुद्रा, 23. काकी मुद्रा, 24. मातङ्गी मुद्रा, 25. भुजङ्गिनी मुद्रा ।

3-पर शिव-संहिता में उनमें से मुख्य मुद्राओं को छांट कर इसकी ही गणना कराई है , जो इस प्रकार है;-

(1) महामुद्रा (2)खेचरी (3)अगोचरी मुद्रा(4)‍ विपरीत-करणी (5) योनि मुद्रा (6) शक्ति चालिनी(7)अश्विनी मुद्रा(8)अगोचरी(9)