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क्या हैं उनमनी मुद्रा ,अगोचरी मुद्रा,अश्विनी मुद्रा की साधना ?क्या है 5 हंसों की और परमहंसों की मुद्


क्या हैं उनमनी मुद्रा ,अगोचरी मुद्रा,अश्विनी मुद्रा की साधना ?

7-अगोचरी मुद्रा;-

04 FACTS;-

1-तुलसीदास ने कहा है ''गो गोचर जहाँ लगि मन जायी । सो सब माया जानों भाई '' अर्थात इन्द्रियाँ ( गो ) और उनके विचरने का स्थान ( गोचर ) जहाँ तक मन जाता है । वह सब माया है । तो जैसा कि इस मुद्रा के नाम से ही स्पष्ट है ''अगोचरी'' । यानी जहाँ इन्द्रियों ( 5 ग्यान इन्द्रियाँ । 5 कर्म इन्द्रियाँ । और मन । ) का जाना नहीं हो सकता । वह अगोचर है ।

2-अगोचरी से आंतरिक नाद का अनुभव होता है और उन्मनी से परमात्मा के साथ ऐक्य बढ़ता है। जिससे पांचों इंद्रियों पर संयम कायम हो जाता है।

3-शरीर के भीतर नाद में, सभी इंद्रियों के साथ मन को पूर्णता के साथ ध्यान लगाकर... कान से भीतर स्थित नाद को सुनने का अभ्यास करना चाहिए। इससे ज्ञान एवं स्मृति बढ़ती है तथा चित्त एवं इंद्रियां स्थिर होती हैं।

4-इसके लिये संतमत में दो प्रमुख दोहे हैं ..

4-1-आँख कान मुँह ढाँप के ,नाम निरंजन लेय । अंदर के पट तब खुलें,जब बाहर के देय ।

4-2-तीनों बन्द लगाय कर , अनहद सुनो टंकोर । सहजो सुन्न समाधि में, नहिं सांझ नहिं भोर ।..

अगोचरी मुद्रा कैसे करें?-

07 FACTS;-

1-अगोचरी मुद्रा अथार्त नाक से चार उँगली आगे के शून्य स्थान पर दोनों नेत्रों की दृष्टि को एक बिन्दु पर केन्द्रित करके ध्यान लगाना।ॐ शरीर है ..निरंजन राम है ।ये मुद्रा कई तरह के नाम ध्यान में प्रयोग की जाती है ।

2-अंगूठे के पास वाली दोनों उंगली ..दोनों कानों में इतनी टाइट ,मगर इतनी सहनीय घुसायें कि कान बाहरी आवाज के प्रति साउंडप्रूफ़ हो जाँय । अब बीच वाली दोनों बङी उंगली से , दोनों आँखे मूँदते हुये ,थोङा ही टाइट ( ताकि दुखने न लगें ) रखकर दबायें रहें ।

3-शेष बची दोनों उंगलियाँ ,मुँह बन्द करते हुये होठों पर रखकर हल्का सा दबायें रहें। दोनों अंगूठे .. गर्दन पर या आपकी शरीर की बनाबट के अनुसार जहाँ भी सरलता से आरामदायक स्थिति में रख जाँय ..रख लें । इनके कहीं भी होने से कुछ ज्यादा अंतर नहीं होता । बस अभ्यास करते समय असुविधा और कष्ट महसूस न हो ।

4-अब बस अंदर मष्तिष्क के बीचोबीच में स्वत सुनाई देने वाली आवाज को सुनते रहना है।यह बेहद आसानी से हरेक को पहली ही बार में सुनाई देगी ।शुरूआत में रथ के पहियों के दौङने की घङघङाहट सुनाई देगी।यह सूर्य का रथ है। इसको काल पहिया या चक्र भी कह सकते हैं। पर एक काल-चक्र दूसरा भी होता हैं। ये आवाज किसी किसी को घर की चाकी चलने से निकलने वाली आवाज जैसी भी सुनाई देती है ।

5-वास्तव में सृष्टि में पाप पुण्य वाले दो पहियों का रथ निरंतर दौङता रहता है।और जीव इन्ही दोनों पहियों से बँधा अज्ञान में घिसटता रहता है । समदर्शी संत पाप पुण्य ..दोनों को छोड़कर इसी रथ के ऊपर बैठकर जीवन सफ़र तय करता है ।

6-इसी स्थिति के लिये कबीर ने कहा है ''चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय । दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय ''। अर्थात जीव अपने स्वरूप को भूलकर पाप पुण्य के दो पाट वाली चाकी में अनंतकाल से पिस रहा है।इस रथ की आवाज के बाद ,आपको किसी बाग में चहकती अनेकों चिङियों की आवाज सुनाई देगी।इसके बाद निरंजन यानी रामधुनि यानी ररंकार सुनाई देगा।यही ध्वनि रूपी असली राम का नाम है।

7-शंकर जी ने पार्वती को यही अमरकथा सुनाई थी।यह घटाकाश में निरंतर गूंज रहा है । तुलसीदास ने रामायण में संकेत रूप में इसी के अखंड पाठ की सलाह दी थी ।कागभुशुंडि ने भी इसी के बारे में कहा था कि ''मैं निरंतर राम कथा का पान करता हूँ '।..इसके सुनते वक्त बस ये ध्यान रखना है कि मष्तिष्क के बीचोबीच वाली आवाज ही सुनें..दाँये बाँये की नहीं ।

अगोचरी मुद्रा के लाभ :- 03 FACTS;- 1-ये मुद्रा बहुत तेजी से पाप भक्षण करती है और ईश्वर प्राप्ति में बहुत सहयोगी है। 2-अगर मन अशांत हो तो यह बहुत ही लाभकारी मुद्रा है ,यह मन के विचारों की उथल-पुथल को शांत करती है | 3-यह ध्यान की शक्ति में विकास करती है | 8-उनमनी मुद्रा ;-

04 FACTS;- 1-उनमनी मुद्रा यानी भोंहो के मध्य ध्यान टिकाना । उनमनी याने संसार से उदासीनता का भाव । उन ( यानी प्रभु ) मनी ( मन लगा देना ) प्रभु से मन लगा देना । कहने का आशय यह है कि ध्यान के समय संसार से उदासीन होकर प्रभु से प्रेम भाव से मन को जोङना ।

2-सहस्त्रार (जो सर की चोटी वाला स्थान है) में पूर्ण एकाग्रता के साथ मन को लगाने का अभ्यास करने से आत्मा परमात्मा की ओर गमन करने लगती है और व्यक्ति ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ने लगता है।

3-शुरूआत करते समय खुली आँखों से कुछ देर तक नाक की नोक को देखते रहें । इससे सुरति एकाग्र होकर स्वतः ही नाक की जङ (बिन्दी या तिलक के ठीक नीचे का स्थान .. भ्रूमध्य के ठीक नीचे) पर पहुँच जायेगी । और आपकी आँखे स्वयं बन्द होती चली जायेंगी ।

4-अपने को ढीला छोङ दें और इसके बाद कुछ न करते हुये जो हो रहा है उसको होने दें। कुछ अभ्यास के बाद इसी स्थिति के बीच लेट जाने का प्रयत्न करें। इसके लिये आरामदायक गद्दे पर अभ्यास करें ।इसकी सही क्रिया जान लेने पर यह मुद्रा आंतरिक लोकों की सहज यात्रा कराती है ।

9)अश्विनी मुद्रा ;-

05 FACTS;-

1-जिस प्रकार से अश्व (घोडा) अपने गुदाद्वार को बार-बार सिकोड़ता एवं ढीला करने की क्रिया करता है उसी प्रकार से अपने गुदाद्वार से यह क्रिया करने से अश्वनी मुद्रा बनती है | इस मुद्रा का नाम भी इसी आधार पर पड़ा है | घोड़े में बल एवं फुर्ती का रहस्य यही मुद्रा है, इस क्रिया के करने के फलस्वरूप घोड़े में इतनी शक्ति आ जाती है कि आज के मशीनी युग में भी इंजन आदि की शक्ति अश्वशक्ति (HORSE POWER) से ही मापी जाती है.

2-यह मूल बन्ध की प्रारम्भिक क्रिया है।प्राण शक्ति का क्षरण रोककर आध्यात्मिक प्रगति हेतु ऊपर की ओर दिशान्तरित कर देती है।अश्विनी मुद्रा इतनी आसान है कि इसको करने में किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं होती है।गुदाद्वारा को बार-बार सिकोड़ने और फैलाने की क्रिया को ही अश्विनी मुद्रा कहते हैं।इससे गुदा की पेशियाँ मजबूत होती हैं।

3-प्रत्येक नए साधक को या जिनकी साधना रुक गई है उनको यह अश्विनी मुद्रा अवश्य करनी चाहिए। इसको करने से शरीर में गरमी का अनुभव भी हो सकता है, उस समय इसे कम करें या धीरे-धीरे करें व साथ में प्राणायाम भी करें।सर्दी में इसे करने से ठण्ड नहीं लगती। मन एकाग्र होता है। साधक को चाहिए कि वह सब अवस्थाओं में इस अश्विनी मुद्रा को अवश्य करता रहे।जितना अधिक इसका अभ्यास किया जाता है उतनी ही शक्ति बदती जाती है। इस क्रिया को करने से प्राण का क्षय नहीं होता और इस प्राण उर्जा का उपयोग साधना की उच्च अवस्थाओं की प्राप्ति के लिए या विशेष योग साधनों के लिए किया जा सकता है।

4-मूलबंध इस अश्विनी मुद्रा से मिलती-जुलती प्रक्रिया है। इसमें गुदा द्वार को सिकोड़कर बंद करके भीतर - ऊपर की और खींचा जाता है। यह वीर्य को ऊपर की और भेजता है एवं इसके द्वारा वीर्य की रक्षा होती है। यह भी कुंडलिनी जागरण व अपानवायु पर विजय का उत्तम साधन है। इस प्रकार की दोनों क्रियाएं स्वतः हो सकती हैं। इन्हें अवश्य करें...ये साधना में प्रगति प्रदान करती हैं।

5-दो विधि ;-

02 FACTS;-

1-कगासन में बैठकर (टॉयलैट में बैठने जैसी अवस्था) गुदाद्वार को अंदर खिंचकर मूलबंध की स्थिति में कुछ देर तक रहें और फिर ढीला कर दें। पुन: अंदर खिंचकर पुन: छोड़ दें। यह प्रक्रिया यथा संभव अनुसार करते रहें और फिर कुछ देर आरामपूर्वक बैठ जाएं। 2-बिस्तर से उतरें, नीचे धरती पर चटाई-कम्बल आदि बिछा दे l पूर्व की तरफ सिर कर दे l श्वास बाहर फेंक दे , पेट को अन्दर-बाहर 2-5 बार करे l योनी को संकोचन-विस्तरण 25 बार करे l फिर श्वास ले l फिर श्वास बाहर फेंके और शौच जाने की जगह को, जैसे घोड़ा लीद छोड़ता है, संकोचन-विस्तरण करता है, ऐसे करे l ऐसे 4 श्वास लेकर करे तो 100 बार हो जायेगा l

सावधानियां :-

02 FACTS;- अश्वनी मुद्रा करते समय यदि मल-मूत्र का वेग हो तो इस वेग को रोकना नही चाहिए बल्कि इससे निवृत्त हो लेना चाहिए | यदि गुदाद्वार में किसी प्रकार का गंभीर रोग हो तो यह मुद्रा योग शिक्षक की सलाह अनुसार ही करें।

अश्विनी मुद्रा करने का समय व अवधि -

:02 FACTS;- 1-सामान्य स्थिति में यह क्रिया लेटकर,बैठकर या चलते-फिरते कभी भी दिन में कई बार कर सकते हैं | 2-अश्वनी मुद्रा ..एक बार में कम-से-कम 20-30 बार करनी चाहिए |

लाभ : - 02 FACTS;-

1-अश्विनी मुद्रा के आध्यात्मिक लाभ :- अश्वनी मुद्रा से कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है। आपका मूलाधार केंद्र प्रभावशाली होगा l स्वाधिष्ठान केंद्र विकसित होगा l ध्यान भजन में बरकत होगी

2-अश्विनी मुद्रा के चिकित्सकीय लाभ :-

04 POINTS;- 1-अश्वनी मुद्रा के निंरतर अभ्यास से गुदा से सम्बंधित समस्त रोग(जैसे बवासीर, अर्श, भगंदर आदि) नष्ट हो जाते हैं | 2-इस मुद्रा को करने से दिमाग़ तेज होता है शरीर में ताकत बढ़ती है तथा उम्र लंबी होती है।वह आजीवन निरोग रहता है | 3-शौच के समय यदि इस क्रिया को बार –बार किया जाये तो शौच खुलकर आता है | 4-अश्विनी मुद्रा त्रिदोषनाशक है l बवासीर और कब्ज़ में बहुत लाभ होता है lइससे बुद्धि में इजाफा होता है l

क्या अर्थ है सिद्धि/ मुद्रायें और परमात्मा का?- कबीर कहते हैं कि परमात्मा पाँचवें तत्व या पाँचों तत्व से भी परे हैं । अर्थात शरीर से बाहर है । ये सिर्फ़ समाधि द्वारा स्थिर हुयी विदेह अवस्था में संभव है । अथवा निजत्व में पूर्ण और निश्चयात्मक असंशय भाव से स्थिर होकर संभव है ।

संत कबीर के अनुसार;- ''संतों शब्दई शब्द बखाना ।शब्द फांस फँसा सब कोई ।

शब्द नहीं पहचाना ।प्रथमहिं ब्रह्म स्वं इच्छा ते ।

पाँचै शब्द उचारा ।सोहं निरंजन रंरकार शक्ति और ॐकारा ।

पाँचों तत्व प्रकृति । तीनों गुण उपजाया ।

लोक द्वीप चारों खान । चौरासी लख बनाया।

शब्दइ काल कलंदर कहिये । शब्दइ भर्म भुलाया ।

पाँच शब्द की आशा में । सर्वस मूल गंवाया ।

शब्दइ ब्रह्म प्रकाश मेंट के । बैठे मूंदे द्वारा

शब्दइ निरगुण शब्दइ सरगुण । शब्दइ वेद पुकारा ।

शुद्ध ब्रह्म काया के भीतर । बैठ करे स्थाना ?

ज्ञानी योगी पंडित औ । सिद्ध शब्द में उरझाना ।

पाँचइ शब्द पाँच हैं मुद्रा ।काया व्यास देव ताहि पहिचाना ।

चांद सूर्य तिहि जाना । सोहं शब्द अगोचरी मुद्रा ।

भंवर गुफा स्थाना । बीच ठिकाना । जो जिहसक आराधन करता । सो तिहि करत बखाना ।

शब्द निरंजन चांचरी मुद्रा । है नैनन के माँही ।

ताको जाने गोरख योगी । महा तेज तप माँही ।

शब्द ॐकार भूचरी मुद्रा । त्रिकुटी है स्थाना।

शुकदेव मुनी ताहि पहिचाना । सुन अनहद को काना ।

शब्द रंरकार खेचरी मुद्रा । दसवें द्वार ठिकाना।

ब्रह्मा विष्णु महेश आदि लो । रंरकार पहिचाना ।

शक्ति शब्द ध्यान उनमुनी मुद्रा । बसे आकाश सनेही ।

झिलमिल झिलमिल जोत दिखावे । जाने जनक विदेही ।

पाँच शब्द पाँच हैं मुद्रा । सो निश्चय कर जाना ।

आगे पुरुष पुरान निःअक्षर । तिनकी खबर न जाना ?

नौ नाथ चौरासी सिद्धि लो । पाँच शब्द में अटके

मुद्रा साध रहे घट भीतर । फिर औंधे मुख लटके।

पाँच शब्द पाँच है मुद्रा ।लोक द्वीप यम जाला ।

कहैं कबीर अक्षर के आगे। निःअक्षर का उजियाला ।

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भावार्थ;-

05 FACTS;- 1-सभी शब्द... नाम, धुनों आदि का वर्णन परमात्मा की प्राप्ति के लिये कर रहे हैं । और इन्हीं नकली शब्द जाल में फ़ंस कर रह गये । असली शब्द या ‘वस्तु’ की तरफ़ किसी का ध्यान नही है।आदि सृष्टि के समय ब्रह्म ने इच्छा करते हुये 5 शब्दों को उत्पन्न किया - सोहं निरंजन रंरकार शक्ति और ॐकार । 2-फ़िर 5 तत्व और हरेक तत्व की 5-5 = 25 प्रकृति और 3 गुणों ( सत, रज, तम ) को उत्पन्न किया । फ़िर लोक, दीप, चार खाने ( अंडज, जरायुज, स्वेदज, वारिज ) और 84 लाख जीव जन्तुओं को बनाया ।शब्द को ही काल, खिलाङी कहिये और शब्द से ही समस्त भ्रम उत्पन्न हुआ। 3-इन पाँच शब्दों के चक्कर में फ़ंसकर जीव अपना मूल परमात्मा को भूल गया । यही शब्द ब्रह्म आत्मप्रकाश छुपाकर मुक्ति या परमात्म द्वार को बन्द कर स्थित हो गये। मनुष्य शरीर के बीच ( सभी आँखों से ऊपर ) हंस के 5 शब्द कृमशः निरंजन, ॐकार, सोहं, रंरकार, शक्ति और 5 मुद्रायें कृमशः चांचरी, भूचरी, अगोचरी, खेचरी, उनमुनी हैं । 4- चाचरी मुद्रा, दोनों आँखें बन्द कर अन्तर में नाभि से नासिका के अग्रभाग तक द्रण होकर सिद्ध की जाती है । भूचरी मुद्रा, सोहं - हंसो अजपा जप को प्राण ( स्वांस ) के मध्य ध्यान में रखकर सिद्ध की जाती है । अगोचरी मुद्रा, दोनों कानों को बन्द कर अन्दर की ध्वनि सुनकर सिद्ध की जाती है । 5-खेचरी मुद्रा में जीभ को उलटकर ब्रह्मरन्ध्र ( तालु ) और काग तक बारबार छुआकर पहुँचाकर सिद्ध की जाती है । यह मुद्रा हनुमान जी को सिद्ध थी । जिससे उन्हें उङने, छोटा -बङा शरीर आदि बना लेने की कई सिद्धियां प्राप्त थीं ।उनमनी मुद्रा में दृष्टि को भौंहों के मध्य टिकाकर मुद्रा सिद्ध की जाती है ।

क्या है 5 हंसों की मुद्राएं ?-

03 FACTS;-

1-परमात्मा ने जैसे ब्रह्माण्ड की रचना की । ठीक उसी आकार में मनुष्य शरीर की रचना की ।योग स्थितियों के साक्षात्कार और प्राप्ति के लिये की गयी क्रिया अवस्था को मुद्रा कहते हैं ।पंच मुद्राओं को भी राजयोग का साधन मानते हैं ।वैसे यह मुद्राएं सिर्फ साधकों के लिए हैं जो कुंडलिनी जागरण कर सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं।

2-खेचरी से स्वाद् अमृततुल्य होता है। भूचरी से प्राण-अपान वायु में एकता कायम होती है। चांचरी से आंखों की ज्योति बढ़ती है और ज्योतिदर्शन होते हैं। अगोचरी से आंतरिक नाद का अनुभव होता है और उन्मनी से परमात्मा के साथ ऐक्य बढ़ता है। उक्त सभी से पांचों इंद्रियों पर संयम कायम हो जाता है। ये है;–

3-ये पांच प्रमुख मुद्राएं हैं- 1.खेचरी (मुख के लिए), 2.भूचरी (नाक के लिए), 3.चांचरी (आंख के लिए), 4.अगोचरी (कान के लिए), 5.उन्मनी (मस्तिष्क के लिए)।

3-1- चाचरी ;-

चाचरी मुद्रा, दोनों आँखें बन्द कर अन्तर में नाभि से नासिका के अग्रभाग तक द्रण होकर सिद्ध की जाती है । सर्वप्रथम दृष्टि को नाक से चार अंगुल आगे स्थिर करने का अभ्यास करना चाहिए। इसके बाद नासाग्र पर दृष्टि को स्थिर करें, फिर भूमध्य में दृष्टि स्थिर करने का अभ्यास करें। इससे मन एवं प्राण स्थिर होकर ज्योति का दर्शन होता है।

3-2- भूचरी; -

भूचरी मुद्रा, सोहं - हंसो ,अजपा जप को प्राण ( स्वांस ) के मध्य ध्यान में रखकर सिद्ध की जाती है ।भूचरी मुद्रा कई प्रकार के शारीरिक मानसिक कलेशों का शमन करती है। कुम्भक के अभ्यास द्वारा अपान वायु उठाकर हृदय स्थान में लाकर प्राण के साथ मिलाने का अभ्यास करने से प्राणजय होता है, चित स्थिर होता है तथा सुषुम्ना मार्ग से प्राण संस्पर्श के ऊपर उठने की संभावना बनती है।

3-3- अगोचरी; -

अगोचरी मुद्रा, दोनों कानों को बन्द कर अन्दर की ध्वनि सुनकर सिद्ध की जाती है ।शरीर के भीतर नाद में सभी इंद्रियों के साथ मन को पूर्णता के साथ ध्यान लगाकर; कान से भीतर स्थित नाद को सुनने का अभ्यास करना चाहिए। इससे ज्ञान एवं स्मृति बढ़ती है तथा चित्त एवं इंद्रियां स्थिर होती हैं।

3-4- खेचरी; -

03 POINTS;-

1-खेचरी अथार्त जीभ को उलटकर ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचाकर स्थिर करना ।खेचरी मुद्रा में जीभ को उलटकर ब्रह्मरन्ध्र ( तालु ) और काग तक बारबार छुआकर पहुँचाकर सिद्ध की जाती है । यह मुद्रा हनुमान जी को सिद्ध थी ।जिससे उन्हें उङने, छोटा बङा शरीर आदि बना लेने की कई सिद्धियां प्राप्त थीं

2-इसके लिए जीभ और तालु को जोड़ने वाले मांस-तंतु को धीरे-धीरे काटा जाता है, अर्थात एक दिन जौ भर काट कर छोड़ दिया जाता है। फिर तीन-चार दिन बाद थोड़ा-सा और काट दिया जाता है। इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा काटने से उस स्थान की रक्त शिराएं अपना स्थान भीतर की तरफ बनाती जाती हैं। जीभ को काटने के साथ ही प्रतिदिन धीरे-धीरे बाहर की तरफ खींचने का अभ्यास किया जाता है।

3-इसका अभ्यास करने से कुछ महिनों में जीभ इतनी लम्बी हो जाती है कि यदि उसे ऊपर की तरफ उल्टा करें तो वह श्वास जाने वाले छेदों को भीतर से बन्द कर देती है। इससे समाधि के समय श्वास का आना-जाना पूर्णतः रोक दिया जाता है।

3-5- उनमनी; -

उनमनी अथार्त द्रष्टि को भौंहों के मध्य टिकाना ।सहस्त्रार (जो सर की चोटी वाला स्थान है) में पूर्ण एकाग्रता के साथ मन को लगाने का अभ्यास करने से आत्मा परमात्मा की ओर गमन करने लगती है और व्यक्ति ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ने लगता है।

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क्या है 5 परमहंसों की मुद्राएं ?-

ये 5 विशेष और परमहंसों की मुद्राएं हैं । उनका साक्षात्कार प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है ।

05 FACTS;-

1-शाम्भवी ;- जीवों में संकल्प से प्रवेश कर उनके अन्तःकरण का अनुभव करना

2- सनमुखी; - संकल्प से ही सभी कार्य होने लगे ।

3- सर्वसाक्षी ;- स्वयं को, तथा परमात्मा को सबमें देखना ।

4- पूर्णबोधिनी ;- जिसका विचार ( या इच्छा ) करता है । उसकी पूर्ति तथा बोध पल भर में ही हो जाता है । एक ही जगह स्थित सम्पूर्ण जगत की बात जानना ।

5- उनमीलनी ;- अनहोने कार्य करने की सिद्धि ।उनमनी मुद्रा में दृष्टि को भौंहों के मध्य टिकाकर मुद्रा सिद्ध की जाती है ।

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