Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

हाथ की पांच अंगुलियां शरीर में महत्वपूर्ण तत्वों से जुड़ी हुई हैं।क्या इन मुद्राओं का अभ्यास करके आप


शून्य मुद्रा क्या है ?-

02 FACTS;-

1-शून्य का अर्थ होता है आकाश । हमारी मध्यमा उंगली आकाश से जुडी हुई होती है । ये मुद्रा हमारे शरीर के अन्दर के तत्वों में संतुलन बनाये रखती है । शून्य मुद्रा मुख्यत: हमारी श्रवण क्षमता को बढ़ाती है। यह मुद्रा शरीर के अन्दर के अग्नि तत्वों को संचालित करती है । इस मुद्रा का ज्यादातर अभ्यास शरीर के किसी भी हिस्से में होने वाले दर्द के लिए किया जाता है ।

2-आकाश का अर्थ है खुलापन , विस्तार एवं ध्वनि । शुन्य मुद्रा इसका उल्टा है । आकाश तत्व की वृद्धि से जो असन्तुलन उत्पन्न होता है , उसे कम करने के लिए शून्य मुद्रा लगाते हैं ।

शून्य मुद्रा करने की विधि :-

05 FACTS;-

1- सबसे पहले आप जमीन पर कोई चटाई बिछाकर उस पर पद्मासन या सिद्धासन में बैठ जाएँ , ध्यान रहे की आपकी रीढ़ की हड्डी सीधी हो ।

2- अपने दोनों हाथों को अपने घुटनों पर रख लें और हथेलियाँ आकाश की तरफ होनी

चाहिये ।

3- मध्यमा अँगुली(बीच की अंगुली)को हथेलियों की ओर मोड़ते हुए अँगूठे से उसके प्रथम पोर को दबाते हुए बाकी की अँगुलियों को सीधा रखें ।

4- अपना ध्यान साँसों पर लगाकर अभ्यास करना चाहिए। अभ्यास के दौरान सांसों को सामान्य रखना है।

5- इस अवस्था में कम से कम 45 मिनट तक रहना चाहिये ।

शून्य मुद्रा करने का समय व अवधि :-

इसका अभ्यास हर रोज़ करेंगे तो आपको अच्छे परिणाम मिलेंगे। सुबह के समय और शाम के समय यह मुद्रा का अभ्यास करना अधिक फलदायी होता हैं। मुद्रा का अभ्यास प्रातः एवं सायंकाल को 22-22 मिनट के लिए किया जा सकता है|

शून्य मुद्रा से होने वाले लाभ :-

18 FACTS;-

1. शरीर में किसी भी अंग में सुन्नपन आ जाए , तो इस मुद्रा को लगाने से सुन्नपन दूर होता है । सुन्नपन वहीं होता है , जहाँ रक्त संचार ठीक से न हो । शून्य मुद्रा रक्त संचार बढाती है ।

2. कानों में सांय-सांय की आवाज हो , तो इस मुद्रा से लाभ होगा ।

3. कानों में दर्द के लिए यह मुद्रा बहुत ही लाभदायक है – तत्काल दो-तीन मिनट में ही कान दर्द समाप्त हो जाता है।

4. बच्चों को कभी गाल पर थप्पड़ मारने से या टक्कर से कान में दर्द एवं कानों की सूजन भी इससे ठीक होती है ।

5. कानों में बहरापन हो जाए , कान बहता हो , तो लगभग 45 मिनट रोज इस मुद्रा के निरन्तर अभ्यास से बहरापन दूर होता है , कानों का बहना बंद हो जाएगा । कानों में जमी हुई मैल भी इस मुद्रा से दूर होगी । कानों के सभी रोगों में शून्य मुद्रा व आकाश मुद्रा दोनों ही लाभकारी हैं । कानों के बहरेपन में यह मुद्रा रामबाण का काम करता है।

6. इस मुद्रा से गले के रोग दूर होते हैं , आवाज साफ होती है और थायरायड के रोग भी दूर होते हैं ।

7. मसूड़े मजबूत होते हैं , मसूड़ों का रोग पायरिया भी ठीक होता है ।

8. ह्रदय रोग व गले के रोग भी दूर होते हैं ।

9. जब कान बहते हों तो , कानों में दर्द हो तो डॉक्टर कानों में रुई डालकर कान बंद कर देते हैं – शून्य मुद्रा ठीक यही काम करती है ।

10. जिस प्रकार आकाश मुद्रा विकलांग बच्चों के लिए लाभकारी है , उसी प्रकार से जो बच्चे Hyperactive होते हैं , अत्यधिक जिद्दी होते हैं , एक जगह टिक कर नहीं बैठ सकते उनमें एकाग्रता नहीं होती , उनका आकाश तत्व बढ़ा होता है , उन्हें शून्य मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए , और साथ ही पृथ्वी मुद्रा का भी क्योंकि उनका पृथ्वी तत्व कम होता है । Hyperactive बच्चों की एकाग्रता की कमी को Attention Deficit Disorder कहते हैं ।

11. अगर कान की कोई बीमारी शून्य मुद्रा से नहीं ठीक होती है तो आकाश मुद्रा से अवश्य ठीक हो जाती है ।

12. हवाई यात्रा करते समय कानों में दवाब बढ़ जाता है Ear Plug लगाने पड़ते हैं । ऐसे में शून्य मुद्रा लगा लें ।

13. इसके नियमित अभ्यास से इच्छा शक्ति मजबूत होती है ।

14. इसको करने से एकाग्रता बढती है ।

15. इसको करने से शरीर में किसी भी प्रकार के होने वाले दर्द में लाभ मिलता है ।

16. शून्य मुद्रा थायराइड ग्रंथि के रोग भी दूर करती है ।

17. शरीर से आलस्य को कम करती है ।

18. यह मुद्रा मानसिक तनाव को कम करती है ।

शून्य मुद्रा में सावधानियाँ :-

यह मुद्रा खाली पेट करनी चाहिए । इस मुद्रा को करते समय आपका ध्यान भटकना नहीं चाहिए । भोजन करने के तुरंत पहले या बाद में शून्य मुद्रा न करें । किसी आसन में बैठकर एकाग्रचित्त होकर शून्य मुद्रा करने से अधिक लाभ होता है ।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

आकाश मुद्रा क्या है ?-

02 FACTS;-

1-मध्यमा अंगुली आकाश तत्व का प्रतीक होती है। जब अग्नि तत्व और आकाश तत्व आपस में मिलते हैं , तो आकाश जैसे विस्तार का आभास होता है। आकाश तत्व की बढ़ोतरी होती है। आकाश में ही ध्वनि की उत्पत्ति होती है और कानों के माध्यम से ध्वनि हमारे भीतर जाती है ।

2- इस मुद्रा को नियमित रूप से करने से कान के रोग, बहरेपन, कान में लगातार व्यर्थ की आवाजें सुनाई देना व हड्डियों की कमजोरी आदि दूर होती हैं।

आकाश मुद्रा करने की विधि :-

04 FACTS;-

1- सबसे पहले एक स्वच्छ और समतल जगह पर दरी / चटाई बिछा दे।

2- अब सुखासन, पद्मासन या वज्रासन में बैठ जाये।

3- अब अपने दोनों हाथों को घुटनों पर रखे और हाथों की हथेली आकाश की तरफ कर लें।

4- अंगुठे के अग्रभाग को मध्यमा उंगुली के अग्रभाग से मिलाएं , शेष तीनों उंगुलियां सीधी

रखें ।

मुद्रा करने का समय :-

यह मुद्रा कम से कम 48 मिनिट तक करें । सुबह के समय और शाम के समय यह मुद्रा का अभ्यास करना अधिक फलदायी होता हैं। यदि एक बार में 48 मिनट तक करना संभव न हो तो प्रातः,दोपहर एवं सायं 16-16 मिनट कर सकते है ।

आकाश मुद्रा से होने वाले लाभ :-

13 FACTS;-

1. आकाश तत्व के विस्तार से शून्यता समाप्त होती है । खालीपन , खोखलापन , मुर्खता दूर होती है खुलेपन का विस्तार होता है ।

2. कानों की सुनने की शक्ति बढ़ती है तथा कान के अन्य रोग भी दूर होते हैं । जैसे कानों का बहना , कान में झुनझुनाहट , कानों का बहरापन। इसके लिए कम से कम एक घंटा रोज यह मुद्रा लगाएं।

3. आकाश तत्व के विस्तार से ह्रदय रोग , ह्रदय से संबंधित समस्त रोग , उच्च रक्तचाप भी ठीक होते हैं क्योंकि आकाश तत्व का सम्बन्ध ह्रदय से है ।

4. शरीर की हडिडयाँ मजबूत होती हैं । कैल्शियम की कमी दूर होती है ।ऑस्टियोपोरोसिस यानि अस्थि क्षीणता दूर होती है ।इसके लिए रोज एक घंटे का अभ्यास करें ।

5. दाएं हाथ से पृथ्वी मुद्रा और बाएं हाथ से आकाश मुद्रा बनाने से जोड़ों का दर्द दूर होता है ।

6. जबड़े की जकड़न इस मुद्रा से दूर होती है । विशेष और तुरंत लाभ ।

7. माला के मोतियों को अंगूठे पर रखकर मध्यमा उंगुली के अग्रभाग से माला फेरने से भौतिक सुख मिलता है , ऐश्वर्य प्राप्त होता है । मध्यमा उंगुली शनि की प्रतीक होती है यह मुद्रा शनि पूजा की भी प्रतीक होती है ।

8. ध्यान अवस्था में यह मुद्रा आज्ञा चक्र एवं सहसार चक्र पर कम्पन पैदा करती है – जिससे दिव्य शक्तियों की अनुभूति होती है तथा आंतरिक शक्तियों का विकास होता है । अधिकांशत: जप व ध्यान इस मुद्रा में किए जाते हैं ।

9. आकाश तत्व का संबंध आध्यत्मिकता से होता है।

10. मानसिक व शरीरिक रूप से विकलांग बच्चों के लिए यह मुद्रा रामबाण है ।

11. बाएं हाथ से आकाश मुद्रा बनाकर भोजन करने से भोजन का श्वास नली में जाने का खतरा नहीं होता है ।

12. कफ के दोष दूर होते हैं । गले में जमा हुआ कफ ठीक होता है । शरीर में कहीं भी दूषित कफ फंसा हो तो वह इस मुद्रा से दूर हो जाता है ।

13. इस मुद्रा से मिर्गी का रोग भी ठीक होता है ।

सावधानियां :-

यह मुद्रा खाली पेट करनी चाहिए । इस मुद्रा को करते समय अपका ध्यान भटकना नहीं चाहिए । और इस मुद्रा को शोर व् गंदे स्थान पर नही करना चाहिए।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

सूर्य मुद्रा/अग्नि मुद्रा क्या है ?-

03 FACTS;-

1-सूर्य का अर्थ होता है अग्नि, सूर्य मुद्रा को करने से हमारे भीतर के अग्नि तत्व संचालित होते हैं। सूर्य की अँगुली अनामिका को रिंग फिंगर भी कहते हैं। इस अँगुली का सीधा संबंध सूर्य और यूरेनस ग्रह से होता है ।

2-सूर्य ऊर्जा स्वास्थ्य का प्रतिनिधित्व करती है और यूरेनस कामुकता, अंतर्ज्ञान और बदलाव का प्रतीक है। सूर्य को सेहत और उर्जा का प्रतीक माना जाता है। सूर्य मुद्रा को लोग अग्नि मुद्रा के नाम से भी जानते हैं।

3-यह मुद्रा पृथ्वी मुद्रा के विपरीत है । यह मुद्रा सूर्य के गुणों का हमारे शरीर में विस्तार करती है तथा पृथ्वी तत्व की अधिकता को कम करती है ।

सूर्य मुद्रा करने की विधि:-

05 FACTS;-

1- सबसे पहले आप जमीन पर कोई चटाई बिछाकर उस पर पद्मासन या सिद्धासन में बैठ जाएँ , ध्यान रहे की आपकी रीढ़ की हड्डी सीधी हो ।

2- अब अपने दोनों हाथों को अपने घुटनों पर रख लें और हथेलियाँ आकाश की तरफ होनी चाहिये ।

3- अब सबसे पहले अनामिका उंगली को मोड़कर अंगूठे की जड़ में लगा लें एवं उपर से अंगूठे से दबा लें।

4- अपना ध्यान श्वास पर लगाकर अभ्यास करना चाहिए। अभ्यास के दौरान श्वास को सामान्य रखना है।

5- इस मुद्रा को आप 10-15 मिनट तक करें ।

सूर्य मुद्रा करने का समय व अवधि :-

इसका अभ्यास हर रोज़ करेंगे तो आपको अच्छे परिणाम मिलेंगे। सुबह के समय और शाम के समय यह मुद्रा का अभ्यास करना अधिक फलदायी होता हैं। आप इसे सांयकाल सूर्यास्त से पूर्व भी कर सकते हैं ।सूर्य मुद्रा को प्रारंभ में 8 मिनट से प्रारंभ करके 24 मिनट तक कर सकते है।

सूर्य मुद्रा से होने वाले लाभ :-

18 FACTS;-

1. जैसे की इस मुद्रा का नाम है ,यह हमें सूर्य की गरमी प्रदान करती है । ऊर्जा प्रदान करती है ।हमें चुस्त बनाती है ।

2. जो व्यक्ति सर्दी से परेशान रहते हैं , जिन्हें सर्दी बहुत लगती है , जिनके हाथ पैर ठण्डे रहते हैं , उन्हें इस मुद्रा का बहुत लाभ होगा ।

3. सूर्य मुद्रा से शरीर का मोटापा ,थुलथुलापन ,भारीपन,स्थूलता समाप्त होती है । वजन कम होता है । मोटापे को कम करने के लिए दिन में दो -तीन बार 15-15 मिनट इस मुद्रा का अभ्यास करें ।

4. मधुमेह के रोगियों के लिए बहुत लाभकारी है । यह मुद्रा बढ़ी हुई शंकरा को जला देती है । इससे मोटापा कम होने से मोटापा जनित रोग जैसे मधुमेह,कब्ज इत्यादि ठीक होते हैं । रक्त में यूरिया पर नियंत्रण होता है । यकृत के सभी रोग दूर होते हैं ।

5. सूर्य मुद्रा से अग्नि तत्व बढ़ता है , शरीर में गरमी पैदा होती है । इससे कफ,प्लूरेसी,दमा,अस्थमा,सर्दी,जुकाम,निमोनिया,टी.वी. ,सायनस के रोग दूर होते हैं । सूर्य मुद्रा लगाने से 5-10 मिनट में ही सूर्य स्वर चालू हो जाता है । इसलिए ठंड के सभी रोगों में लाभदायक है । प्रात: उठने पर और रात सोते समय 15-15 मिनट सूर्य मुद्रा अवश्य करें ।

6. इस मुद्रा द्वारा अनामिका उंगुली से हथेली में स्थित थायरायड ग्रन्थि के केन्द्र बिन्दु पर दवाब पड़ने से थायरायड के रोग दूर होते हैं । थायरायड ग्रन्थि के कम स्त्राव के कारण होने वाले सभी रोग जैसे-मोटापा इत्यादि भी दूर होते हैं ।

7. सूर्य सम्पूर्ण विश्व को रोशनी देता है । सूर्य मुद्रा करने से नेत्र ज्योति बढती है और मोतियाबिन्द भी ठीक होता है ।

8. इससे कोलेस्ट्रोल कम होता है । जब मोटापा कम होता है , वजन कम होता है , शरीर की चयापचय क्रिया ठीक होती है तो कोलेस्ट्रोल नियंत्रण में आ जाता है ।

9. तीव्र सिर दर्द में इस मुद्रा से तुरंत आराम मिलता है ।

10. इसके नियमित अभ्यास से व्यक्ति में अंतर्ज्ञान जाग्रत होता है ।

11. इस मुद्रा के अभ्यास से मानसिक तनाव दूर हो जाता है ।

12. इसका नियमित अभ्यास करने से पेट के सभी रोग समाप्त हो जाते हैं ।

13. शरीर की सूजन को भी यह मुद्रा दूर करती है ।

14. इसको करने से बेचैनी और घबराहट दूर होती है। साथ ही साथ दिमाग भी स्थिर होने लगता है।

15. गर्भावस्था के बाद शरीर के वजन को घटाने के लिए आप रोज सूर्य मुद्रा करें।

16. Surya Mudra for Weight Loss भी है। इस मुद्रा को नियमित करने से वजन कम और शरीर संतुलित हो जाता है।

17. यह मुद्रा पाचन प्रणाली को ठीक करती है ।

18. वज्रासन लगाकर सूर्य मुद्रा में एक घंटा बैठने से लगभग 250 ग्राम वजन कम होता है ।

सूर्य मुद्रा में बरती जाने वाली सावधानियां :-

05 FACTS;-

1-सूर्य मुद्रा करने के वैसे तो अनेक लाभ हैं पर इसे करने से पहले कुछ सावधानी रखनी बहुत जरुरी हैं। आप इस मुद्रा को एक दिन में केवल 3 बार ही 15-15 मिनिट के लिए कर सकते हैं। 2-इसे भोजन के पहले करें और सूर्य मुद्रा करने के बाद कम से कम एक घंटे तक भोजन ना करें।

3-गर्मी के मौसम में इसे ज्यादा देर तक ना करें और गर्मी के समय सूर्य मुद्रा करने से पहले थोड़ा पानी पी लेना चाहिए।

4-अधिक रक्तचाप वाले और कमजोर, दुर्बल व्यक्ति इसे ना करें। शरीर में अधिक कमजोरी होने पर सूर्य मुद्रा को ना करें।

5-अम्लपित्त और एसिडिटी की समस्या होने पर यह मुद्रा ना करें ।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

लिंग मुद्रा क्या है ?-

02 FACTS;-

1-यह मुद्रा पुरुषत्व का प्रतीक है इसीलिए इसे लिंग मुद्रा कहा जाता है । लिंग मुद्रा का अभ्यास शरीर में गर्मी बढाने के लिए किया जाता है । खाँसी और कफ को जड़ से मिटाने के लिए ये सबसे अधिक प्रभावशाली मुद्रा है।

2-इस मुद्रा का आभ्यास सर्दी में बहुत किया जाता है । लिंग मुद्रा के प्रयोग से आप अपने शरीर की अनावश्यक कैलोरी को हटाकर मोटापे को कम कर सकते हैं ।शरीर में अधिक सर्दी महसूस होने या शीत बाधा होने पर लिंग मुद्रा के प्रयोग से शीघ्र लाभ होता है |इसे अधिक देर तक करने से सर्दियों में भी पसीना आता है|

लिंग मुद्रा करने की विधि :-

05 FACTS;-

1- सबसे पहले आप जमीन पर कोई चटाई बिछाकर उस पर पद्मासन या सिद्धासन में बैठ जाएँ , ध्यान रहे की आपकी रीढ़ की हड्डी सीधी हो ।

2- अब अपने दोनों हाथों की अँगुलियों को परस्पर एक-दूसरे में फसायें ।एक अंगूठे(बायां या दायां कोई एक) को सीधा रखें तथा दूसरे अंगूठे से सीधे अंगूठे के पीछे से लाकर घेरा बना दें ।

3- आँखे बंद रखते हुए श्वास सामान्य बनाएँ।

4- अपने मन को अपनी श्वास की गति पर व मुद्रा पर केंद्रित रखिए|

5- और इस अवस्था में कम से कम 16 मिनट तक रहना चाहिये ।

लिंग मुद्रा करने का समय व अवधि :-

इसका अभ्यास हर रोज़ करेंगे तो आपको अच्छे परिणाम मिलेंगे। सुबह के समय और शाम के समय यह मुद्रा का अभ्यास करना अधिक फलदायी होता हैं।वायु मुद्रा का अभ्यास प्रातः एवं सायंकाल को 16-16 मिनट के लिए किया जा सकता है ।

लिंग मुद्रा से होने वाले लाभ :-

14 FACTS;-

1- इसका नियमित अभ्यास करने से साधक में स्फूर्ति एवं उत्साह का संचार होता है ।

2- यह मुद्रा व्यक्ति के ब्रह्मचर्य की रक्षा करती है ।

3- व्यक्तित्व को शांत व आकर्षक बनाती है

4- शर्दी से बचने के लिए यह मुद्रा बहुत ही लाभदायक है ।

5- इसको करने से सर्दी से होने वाले बुखार से राहत मिलती है ।

6- इस मुद्रा के प्रयोग से स्त्रियों के मासिक स्त्राव सम्बंधित अनियमितता ठीक होती हैं

7- नजला,जुकाम, साइनुसाइटिस,अस्थमा व निम्न रक्तचाप के रोग नष्ट हो जाते है ।

8- इसके नियमित अभ्यास से अतिरिक्त कैलोरी बर्न होती हैं ।

9- शरीर से बजन कम होता है ।

10- टली हुई नाभि पुनः अपने स्थान पर आ जाती हैं ।

11- यह मुद्रा श्वसन तंत्र को मजबूत करती है।

12- यह मुद्रा बलगम व् खांसी की समस्या का निवारण करती है ।

13- यह छाती की जलन की समस्या से निजात दिलाती है ।

14- फेफड़ों को शक्ति प्रदान करती है।

लिंग मुद्रा में सावधानियाँ :-

03 FACTS;-

1-यह लिंग मुद्रा खाली पेट करनी चाहिए ।इस मुद्रा को करते समय आपका ध्यान भटकना नहीं चाहिए ।

2-जिनको पित्त की समस्या है वो लोग इस मुद्रा को न करें ।

3-गर्मी के मौसम में इस मुद्रा को अधिक समय तक नहीं करना चाहिए ।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

ज्ञान मुद्रा क्या है ?-

04 FACTS;-

1-संस्कृत में ज्ञान का मतलब होता है बुद्धिमत्ता। इसे अंग्रजी में Mudra of Knowledge भी कहा जाता है। इसका नियमित अभ्यास करने से बुद्धिमत्ता में वृद्धि होती है । जब हम ज्ञान मुद्रा में योग करते हैं तो हमारी बुद्धि तेज होती है। इसलिए इस योग को करने के लिए ध्यान लगाना बहुत ही आवश्यक है ।

2-हमारे हाथों की अंगुलियों में प्रकृति के मूल 5 तत्व मौजूद होते हैं। जैसे अंगूठे में अग्नि तत्व, तर्जनी अंगुली में वायु तत्व, मध्यमा अंगुली में आकाश तत्व, अनामिका में पृथ्वी तत्व और कनिष्का अंगुली में जल तत्व। ज्योतिष के अनुसार हमारा अंगूठा मंगल ग्रह का प्रतीक ओर तर्जनी अंगुली बृहस्पति का प्रतीक होता है|ज्ञान मुद्रा से वायु महाभूत बढ़ता है ;इसलिए

इसे वायु वर्धक मुद्रा भी कहा जाता है।

3-ज्ञान मुद्रा शिरोमणि मुद्रा है|मूर्तियों एवं चित्रों में भगवान शिव , देवी सरस्वती ,भगवान बुद्ध , गुरु नानक देव जी आदि को ज्ञान मुद्रा में ही दिखाया गया है |अष्टावक्र ने जनक से कहा कि जो-जो अज्ञान है उसे जान लेना ही ज्ञान है। अधिकतर लोगों को यही नहीं मालूम होता है कि उनके कृत्य, विचार या दिनचर्या कितनी अव्यवस्थित या अज्ञानपूर्ण है।

4-ज्ञान मुद्रा संपूर्ण योग का सार स्वरूप है। इसके माध्यम से कुंडलिनी या ऊर्जा के स्रोत को जाग्रत किया जा सकता है। इससे अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों की प्राप्ति संभव है।

अंगूठा व् तर्जनी से क्या अभिप्राय है ?-

03 FACTS;-

1-अंगूठा अग्नि तत्व है और तर्जनी उंगली वायु तत्व | ज्योतिष अथवा ग्रहों की विधा में अंगूठा मंगल और तर्जनी गुरु ग्रह के प्रतीक हैं | इन दोनों तत्वों व ग्रहों के मिलन से वायु तत्व बढ़ता है और गुरु का वर्चस्व होता है |

2-इसे शिव और शक्ति का मिलाप भी कहा जाता है | वायु के बिना अग्नि जल नहीं सकती और वायु के मिलने से अग्नि बढती है |अंगूठा बुद्धि का प्रतीक है और अग्नि का भी | अत: तर्जनी और अंगूठे के मिलन से बुद्धि का विकास होता है |

3-अंगूठा परमात्मा और तर्जनी अहंकार अथार्त जीवात्मा की प्रतीक है |अंगूठा आंतरिक शक्ति व ऊर्जा का प्रतीक है और तर्जनी बाह्य ऊर्जा का । दोनों के मिलने से इनका समन्वय हो जाता है और हम दिव्य शक्तियों को प्राप्त करते हैं ।

ज्ञान मुद्रा का महत्व :-

02 FACTS;-

1-योग में ज्ञानमुद्रा को इसलिए शक्तिशाली कहा गया है क्योंकि यह मुद्रा आपकी तंद्रा को तोड़ती है। हाथों की ग्रंथियों का संबंध सीधे हमारे मस्तिष्क से होता है। दाएँ हाथ का संबंध बाएँ और बाएँ हाथ का संबंध दाएँ मस्तिष्क से माना गया है।

2-ज्ञानमुद्रा से मस्तिष्क के सोए हुए तंतु जाग्रत होकर मानव के होश को बढ़ाते हैं। ज्ञान का अर्थ ढेर सारी जानकारी या वैचारिकता से नहीं बल्कि होश से है। होशपूर्ण व्यक्तित्व के चित्त पर किसी भी प्रकार के कर्म या विचारों का दाग नहीं बनता।

ज्ञान मुद्रा की विधि :-

05 FACTS;-

1- सबसे पहले एक स्वच्छ और समतल जगह पर दरी / चटाई बिछा दे।

2- अब सुखासन, पद्मासन या वज्रासन में बैठ जाये।

3- अब अपने दोनों हाथों को घुटनों पर रखे और हाथों की हथेली आकाश की तरफ होनी चाहिए।

4- अब तर्जनी उंगली को गोलाकार मोडकर अंगूठे के अग्रभाग को स्पर्श करना हैं। और अन्य तीनों उंगलियों को सीधा रखें यह ज्ञान मुद्रा दोनों हाथो से करें ।

5- मन से सारे विचार निकालकर मन को केवल ॐ पर केन्द्रित करना हैं।

मुद्रा करने का समय :-

इसे 15 मिनट से 45 मिनट तक करें। चलते – फिरते , सोते – जागते , उठते – बैठते भी यह मुद्रा लगाई जा सकती है। जितना अधिक समय लगाएंगे , उतना ही लाभ भी बढ़ जाएगा। सुबह के समय और शाम के समय यह मुद्रा का अभ्यास करना अधिक फलदायी होता हैं।

ज्ञान मुद्रा करने के लाभ :-

22 FACTS;-

1. अंगूठे व तर्जनी के मिलने से वायु तत्व में वृधि होती है । इससे नकारात्मक विचार दूर होते हैं । बुद्धि का विकास होता है । एकाग्रता बढती है । स्मरण शक्ति बढती है और मानसिक शक्ति का विकास होता है । हम अपने मस्तिष्क का केवल 10 प्रतिशत ही प्रयोग करते हैं । परन्तु संकल्प के साथ हम इसकी संपूर्ण शक्तियों का उपयोग करना आरंभ कर देते हैं ।

2. मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु क्रियाशील होते हैं । अंगूठे के अग्रभाग व तर्जनी के अग्रभाग के हल्के से स्पर्शमात्र से हमारे मन व मस्तिष्क में अदभुत हलचल सी प्रारंभ हो जाती है । हल्का सा स्पदन होता है।

3. एकाग्रता बढ़ने से बुद्धिजीवियों , चिंतकों , शिक्षकों , विद्यार्थियों के लिए अति उत्तम मुद्रा । इसलिए इस मुद्रा को सरस्वती मुद्रा भी कहा जाता है ।

4. कैसा भी मन्द बुद्धि बालक हो , उसकी मेघा शक्ति शीघ्रता से विकसित होने लगती है और स्मरण शक्ति भी तीव्र होती है । जब अग्नि और वायु आपस में