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'मकर संक्रांति' का क्या महत्व है?


मकर संक्रांति का महत्व ;- 14 FACTS- 1-मकर संक्रांति' का त्यौहार जनवरी यानि पौष के महीने में मनाया जाता है। हिंदू धर्म में सूर्य यानि सूरज को प्रमुखता दी जाती है। जिसकी वजह से हिंदू धर्म में सूर्य की दिशा परिवर्तन के मुताबिक त्यौहारों और मांगलिक कार्यों की तिथि का निर्धारण किया जाता है। हिन्दू शास्त्रों में हर महीने को दो भागों में बांटा गया है - कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। इसी तरह साल को भी दो हिस्सों में बांटा गया है।अयन दो तरह के होते हैं उत्तरायण और दक्षिणायन। सूर्य के उत्तर दिशा में अयन (गमन) को उत्तरायण कहा जाता है। 2-साल को उत्तरायण और दक्षिणायन के रूप में बांटने के पीछे सूर्य की दिशा परिवर्तन को मुख्य वजह होती है। पौष माह यानि जनवरी के महीने में मकर संक्रांति' के समय सूर्य अपनी दिशा में (सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए) की दिशा में परिवर्तन करते हुए दक्षिण से उत्तर दिशा की तरफ आ जाता है। जिसकी वजह से इस काल को उत्तरायण भी कहा जाता है। 3-जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं तो बेहद शुभ समय होता है,क्योंकि पृथ्वी प्रकाशमय रहती है इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। जबकि सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अंधकार में शरीर त्याग करने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है। 4-इसके साथ ही इस समय सूर्य की किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं।सब कुछ प्रकृति के नियम के तहत है, इसलिए सभी कुछ प्रकृति से बद्ध है। जिस तरह पौधा प्रकाश में अच्छे से खिलता है, अंधकार में सिकुड़ जाता है। उसी तरह मानव जीवन और प्रकृति भी इस दौरान अपने स्वरूप को बदलने की प्रक्रिया की शुरूआत करती है और बसंत के आने पर अपना पूरा रूप बदल लेती है। 5-पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर एक महीने के लिए जाते हैं, क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है। हालांकि ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य और शनि का तालमेल संभव नहीं, लेकिन इस दिन सूर्य खुद अपने पुत्र के घर जाते हैं। इसलिए पुराणों में यह दिन पिता-पुत्र के संबंधों में निकटता की शुरुआत के रूप में देखा जाता है।कालगणना के अनुसार जब सूर्य मकर राशि से मिथुन राशि तक भ्रमण करता है, तब तक के समय को उत्तरायण कहते हैं।यह समय छ: माह का होता है. तत्पश्चात जब सूर्य कर्क राशि से सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, और धनु राशि में विचरण करता है तब इस समय को दक्षिणायन कहते हैं. इस प्रकार यह दोनो अयन 6-6 माह के होते हैं।इसलिए शास्त्रों में इस त्यौहार का विशेष महत्व माना गया है। 6-मकर संक्रांति खगोलीय घटना है, जिससे जड़ और चेतन की दशा और दिशा तय होती है। मकर संक्रांति का महत्व हिंदू धर्मावलंबियों के लिए वैसा ही है जैसे वृक्षों में पीपल, हाथियों में ऐरावत और पहाड़ों में हिमालय।स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायण का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायण के छह मास के शुभ काल में, जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त हैं। इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अंधकार में शरीर त्याग करने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है। 7-महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था, कारण कि उत्तरायण में देह छोड़ने वाली आत्माएँ या तो कुछ काल के लिए देवलोक में चली जाती हैं या पुनर्जन्म के चक्र से उन्हें छुटकारा मिल जाता है। दक्षिणायन में देह छोड़ने पर बहुत काल तक आत्मा को अंधकार का सामना करना पड़ सकता है। 8-इस दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं ,सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से देवों की ब्रह्म मुहूर्त उपासना का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाता है। इस काल को ही परा-अपरा विद्या की प्राप्ति का काल कहा जाता है। इसे साधना का सिद्धिकाल भी कहा गया है। इस काल में देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण, यज्ञ कर्म आदि पुनीत कर्म किए जाते हैं। 9-सूर्य की सातवीं किरण भारत वर्ष में आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देने वाली है। सातवीं किरण का प्रभाव भारत वर्ष में गंगा-जमुना के मध्य अधिक समय तक रहता है। इस भौगोलिक स्थिति के कारण ही हरिद्वार और प्रयाग में माघ मेला अर्थात मकर संक्रांति या पूर्ण कुंभ तथा अर्द्धकुंभ के विशेष उत्सव का आयोजन होता है।प्रयाग में प्रथम शाही स्नान के दिन देश के कोने कोने से साधू तथा श्रद्धालु आते हैं तथा माता गंगा , यमुना और सरस्वती के संगम पर स्नान करके अपने जीवन को धन्य करते हैं। 10-मकर संक्रांति के दिन ही पवित्र गंगा नदी का धरती पर अवतरण हुआ था। इसी दिन माता गंगा भगीरथ के पीछे चलकर गंगासागर में मिली थीं । गंगासागर बंगाल की खाड़ी के कॉण्टीनेण्टल शैल्फ में कोलकाता से १५० कि॰मी॰ (८०मील) दक्षिण में एक द्वीप है। यहीं गंगा नदी का सागर से संगम माना जाता है;जहां गंगा-सागर का मेला लगता है । गंगा के बंगाल की खाड़ी में पूर्ण विलय (संगम) के बिंदु पर गंगा-सागर का मेला लगता है, व प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर लाखों हिन्दू श्रद्धालुओं का तांता लगता है ; जो गंगा नदी के सागर से संगम पर नदी में स्नान करने के इच्छुक होते हैं। 11-यहाँ एक मंदिर भी है जो कपिल मुनि के प्राचीन आश्रम स्थल पर बना है। ये लोग कपिल मुनि के मंदिर में पूजा अर्चना भी करते हैं। पुराणों के अनुसार कपिल मुनि के श्राप के कारण ही राजा सगर के ६० हज़ार पुत्रों की इसी स्थान पर तत्काल मृत्यु हो गई थी। उनके मोक्ष के लिए राजा सगर के वंश के राजा भगीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाए थे और गंगा यहीं सागर से मिली थीं। 12-राजा भगीरथ सूर्यवंशी थे, जिन्होंने भगीरथ तप साधना के परिणामस्वरूप पापनाशिनी गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पूर्वजों को मोक्ष प्रदान करवाया था। राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों का गंगाजल, अक्षत, तिल से श्राद्ध तर्पण किया था। तब से माघ मकर संक्रांति स्नान और मकर संक्रांति श्राद्ध तर्पण की प्रथा आज तक प्रचलित है। पितामह भीष्म का श्राद्ध संस्कार भी सूर्य की उत्तरायण गति में हुआ था। फलतः आज तक पितरों की प्रसन्नता के लिए तिल अर्घ्य एवं जल तर्पण की प्रथा मकर संक्रांति के अवसर पर प्रचलित है। 13-इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत करके युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। उन्होंने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इसलिए यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।उत्तर भारत में यह पर्व 'मकर सक्रान्ति के नाम से और गुजरात में 'उत्तरायण' नाम से जाना जाता है। मकर संक्रान्ति को पंजाब में लोहडी पर्व, उतराखंड में उतरायणी, गुजरात में उत्तरायण, केरल में पोंगल, गढवाल में खिचडी संक्रान्ति के नाम से मनाया जाता है।मकर संक्रांति का पर्व संपूर्ण भारत वर्ष में किसी न किसी रूप में आयोजित होता है। 14- पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति का पर्व पंचशक्ति की साधना से ग्रहों को अपने अनुकूल बनाने का पर्व है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, आद्यशक्ति और सूर्य की आराधना एवं उपासना का पावन व्रत है। यह तन-मन-आत्मा को शक्ति प्रदान करता है। इसके प्रभाव से प्राणी की आत्मा शुद्ध होती है। संकल्प शक्ति बढ़ती है। ज्ञान तंतु विकसित होते हैं। मकर संक्रांति इसी चेतना को विकसित करने वाला पर्व है।

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