Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

क्या है जप साधना और मंत्र जाप करने की विधि? वाणी के कितने चरण होते हैं?क्या है पूर्णांक 108 का र


मनोमय कोश की स्थिरता एवं एकाग्रता के लिये जप का साधन बड़ा ही उपयोगी है। इसकी उपयोगिता निर्विवाद है कि सभी धर्म, मजहब, सम्प्रदाय, माला की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं। जप करने से मन की प्रवृत्तियों को एक ही हेतु में लगा देना सरल हो जाता है। कहते हैं कि एक बार एक मनुष्य ने किसी भूत को सिद्ध कर लिया। भूत बड़ा बलवान था उसने कहा मैं तुम्हारे वश में आ गया, ठीक है, जो आज्ञा मिलेगी सो करूंगा, पर मुझ से बेकार नहीं बैठा जाता। यदि मैं बेकार रहा तो आप को ही खा जाऊंगा। यह मेरी शर्त अच्छी तरह समझ लीजिये। उस आदमी ने भूत को बहुत से काम बताये उसने थोड़ी-थोड़ी देर में सब काम कर दिये। भूत की बेकारी से उत्पन्न होने वाला संकट उस सिद्ध को बेतरह परेशान कर रहा था। तब वह दुखी होकर अपने गुरु के पास गया। गुरु ने उस सिद्ध को बताया कि आंगन में एक श्वांस गाढ़ दिया जाय और भूत से कह दिया जाय कि जब तक दूसरा काम न बताया जाया करे तब तक उस बांस पर बार-बार चढ़ें और बारबार उतरे। यह काम मिल जाने पर भूत से काम लेते रहने की भी सुविधा हो गई और सिद्ध के आगे उपस्थित रहने वाला संकट हट गया। मन ऐसा ही भूत है जो जब भी निरर्थक बैठता है तभी कुछ न कुछ खुराफात करता है। इसलिए यह जब भी काम से छुट्टी पावें तभी इसे जप पर लगा देना चाहिए। जप केवल समय काटने के लिए ही नहीं है वरन् वह एक बड़ा ही उत्पादक एवं निर्माणात्मक मनोवैज्ञानिक श्रम है। निरन्तर पुनरावृत्ति करते रहने से मन में उस प्रकार का अभ्यास एवं संस्कार बन जाता है जिससे वह स्वभावतः उसी ओर चलने लगता है। पत्थर बार-बार रस्सी की रगड़ लगने से उसमें गड्ढा पड़ जाता है। पिंजड़े में रहने वाला कबूतर, बाहर निकाल देने पर भी लौटकर उसी में वापिस आ जाता है। गाय को जंगल में छोड़ दिया जाय तो भी वह रात को स्वयंमेव लौट आती है। निरन्तर के अभ्यास से मन भी ऐसा अभ्यस्त हो जाता है कि अपने दीर्घ काल तक सेवन किये गये कार्यक्रम में अनायास ही प्रवृत्त हो जाता है। अनेक निरर्थक कल्पना प्रपंचों में उछलते-कूदते फिरने की अपेक्षा आध्यात्मिक भावना की एक सीमित परिधि में भ्रमण करने के लिए जप की प्रक्रिया बड़ी ही उत्तम है। दीर्घ काल तक निरन्तर जप का अभ्यास करने से मन एक ही दिशा में प्रवृत्त रहने लगता है। आत्मिक क्षेत्र में मन का लगा रहना उस दिशा में एक दिन पूर्ण सफलता प्राप्त होने का सुनिश्चित लक्षण है। मन रूपी भूत बड़ा बलवान है। यह सांसारिक कार्यों को भी बड़ी सफलता पूर्वक करता है और जब आत्मिक क्षेत्र में जुट जाता है तो भगवान के सिंहासन को हिला देने में भी नहीं चूकता मन की उत्पादक, रचनात्मक एवं प्रेरक शक्ति इतनी विलक्षण है कि उसके लिए संसार की कोई वस्तु असम्भव नहीं। भगवान को प्राप्त करना भी उसके लिए बिलकुल सरल है। कठिनाई केवल एक नियत क्षेत्र में जमने की ही है सो जप के व्यवस्थित विधान से वह भी दूर हो जाती है। हमारा मन कैसा ही उच्छृंखल क्यों न हो पर जब उसको बार-बार किसी भावना पर केन्द्रित किया जाता रहेगा तो कोई कारण नहीं कि कालान्तर से वह उसी प्रकार का न बनने लगे। लगातार प्रयत्न करने से सरकस में खेल दिखाने वाले बन्दर, सिंह, बाघ, रीछ जैसे उद्दण्ड जानवर मालिक की मर्जी का काम करने लगते हैं, उसके इशारे पर नाचते हैं, तो कोई कारण नहीं कि चंचल और कुमार्गगामी मन को वश में करके इच्छानुवर्ती न बनाया जा सके। पहलवान लोग नित्य प्रति अपनी नियत मर्यादा में, गिनती में, डंड बैठक आदि करते हैं उनकी इस क्रिया पद्धति से उनका शरीर दिन-दिन हृष्ट-पुष्ट होता जाता है और एक दिन वे अच्छे बलवान बन जाते हैं। नित्य का जप एक आध्यात्मिक व्यायाम है। जिससे आत्मिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ सूक्ष्म शरीर को पहलवान बनाने में, महत्वपूर्ण सहायता मिलती है। एक एक बूंद जमा करने से घड़ा भर जाता है चींटी एक एक दाना ले जाकर अपने बिलों में बनो अनाज जमा लेती है। एक एक अक्षर पढ़ने से थोड़े दिनों में विद्वान बना जा सकता है। एक एक कदम चलने से लम्बी मंजिलें पार हो जाती हैं, एक एक पैसा जोड़ने से खजाने जमा हो जाते हैं, एक एक तिनका मिलने से मजबूत रस्सी बन जाती है, जप में भी यही होता है। माला का एक एक दाना फेरने से बहुत कुछ जमा हो जाता है, और इतना जमा हो जाता है कि उससे आत्मा का कल्याण हो जाता है इसीलिए योग ग्रन्थों में जप को यज्ञ बताया गया है। उसकी बड़ी महिमा गाई है और आत्म मार्ग पर चलने की इच्छा करने वाले पथिकों के लिए जप करने का कर्तव्य आवश्यक रूप से निर्धारित किया गया है। गीता के अध्याय 10 श्लोक 25 में कहा गया है कि ‘‘यज्ञो में जप यज्ञ श्रेष्ठ है।’’ मनुस्मृति में अध्याय 2 श्लोक 86 में बताया गया कि ‘‘होम’’ बलिकर्म, श्राद्ध, अतिथि सेवा, पाक यज्ञ, विधि-यज्ञ, दशपौर्णमासादि यज्ञ सब मिल कर भी जप यज्ञ के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होते।’’ महर्षि भारद्वाज ने गायत्री व्याख्या में कहा है कि ‘‘समस्त यज्ञों में जप यज्ञ अधिक श्रेष्ठ है। अन्य यज्ञों में हिंसा होती है पर जप यज्ञ में नहीं है। जितने कर्म, यज्ञ, दान, तप हैं सब जप यज्ञ की सोलहवीं कला के समान भी नहीं होते। समस्त पुण्य साधनों में जप यज्ञ सर्व श्रेष्ठ हैं।’’ इस प्रकार के अगणित प्रमाण शास्त्रों में उपलब्ध हैं। इन शास्त्र वचनों में जप यज्ञ की उपयोगिता एवं महत्ता का बहुत जोर प्रतिपादन किया गया है। कारण यह है कि जप मन को वश में करने का रामवाण अस्त्र है। और यह सर्व विदित तथ्य है कि मन को वश में करना इतनी बड़ी सफलता है कि उसकी प्राप्ति होने पर जीवन को धन्य माना जा सकता है। समस्त आत्मिक और भौतिक सम्पदाएं संयत मन से ही तो उपलब्ध की जाती हैं। जप यज्ञ के संबंध में कुछ आवश्यक जानकारियां नीचे दी जाती हैं—

1—जप के लिए प्रातःकाल एवं ब्राह्म मुहूर्त काल सर्वोत्तम है। दो घण्टे रात रहे से सूर्योदय तक ब्राह्म मुहूर्त कहलाता है। सूर्योदय से दो घण्टे दिन चढ़े तक

प्रातः काल होता है। प्रातःकाल से भी ब्राह्म मुहूर्त अधिक श्रेष्ठ है।

2—जप के लिए पवित्र एकान्त स्थान चुनना चाहिए मन्दिर, तीर्थ, बगीचा, जलाशय आदि एकान्त के शुद्ध स्थान जप के लिए अधिक उपयुक्त हैं। घर में

जप करना हो तो भी ऐसी जगह चुननी चाहिए जहां अधिक खटपट न होती हो।

3—संध्या को जप करना हो तो सूर्य अस्त से एक घण्टा उपरान्त तक जप समाप्त कर लेना चाहिए। प्रातःकाल के दो घण्टे और सायंकाल का एक घण्टा

इन तीन घण्टों को छोड़कर रात्रि के अन्य भागों में गायत्री मंत्र नहीं जपा जाता।

4—जप के लिये शुद्ध शरीर और शुद्ध वस्त्रों से बैठना चाहिए। साधारणतः स्नान द्वारा ही शरीर की शुद्धि होती है पर किसी विवशता, ऋतु प्रतिकूलता या

अस्वस्थता की दशा में हाथ मुंह धोकर या गीले कपड़े से शरीर पोंछ कर भी काम चलाया जा सकता है। नित्य धुले वस्त्रों की व्यवस्था न हो सके तो

रेशमी या ऊनी वस्त्रों से काम लेना चाहिए।

5—जप के लिए बिना बिछाये न बैठना चाहिए। कुश का आसन, चटाई आदि घास के बने आसन अधिक उपयुक्त हैं। पशुओं के चमड़े, मृगछाला आदि

आजकल उनकी हिंसा से ही प्राप्त होते हैं इसलिये वे निषिद्ध हैं।

6—पद्मासन से, पालती मारकर, मेरुदंड को सीधा रखते हुए जप के लिए बैठना चाहिए। मुंह प्रातःकाल पूर्व की ओर और सांयकाल पश्चिम की ओर रहे।

7—माला तुलसी की या चंदन की लेनी चाहिये। कम से कम एक माला नित्य जपनी चाहिए। माला पर जहां बहुत आदमियों की दृष्टि पड़ती हो वहां हाथ

को कपड़े से या गौमुखी से ढक लेना चाहिये।

8—माला जपते समय सुमेरु (माला के प्रारम्भ का सबसे बड़ा केन्द्रीय दाना) को उल्लंघन न करना चाहिये। एक माला पूरी करके उसे मस्तक तथा नेत्रों

से लगाकर पीछे की तरफ उलटा ही वापिस कर लेना चाहिये। इस प्रकार माला पूरी होने पर हर बार उलट कर ही नया आरम्भ करना चाहिये।

9—लम्बे सफर में, स्वयं रोगी हो जाने पर, किसी रोगी की सेवा में संलग्न रहने पर, जनन मृत्यु का सूतक लग जाने पर, स्नान आदि पवित्रताओं की

सुविधा नहीं रहती। ऐसी दशा में मानसिक जप चालू रखना चाहिये। मानसिक जप बिस्तर पर पड़े-पड़े, रास्ता चलते या किसी भी पवित्र अपवित्र दशा

में किया जा सकता है।

10—जप इस प्रकार करना चाहिये कि कंठ से ध्वनि होती रहे, होठ हिलते रहें परन्तु समीप बैठा हुआ मनुष्य भी स्पष्ट रूप से मंत्र को सुन न सके। मल

मूत्र त्याग या किसी अनिवार्य कार्य के लिए साधना के बीच में ही उठना पड़े तो शुद्ध जल से साफ होकर तब दुबारा बैठना चाहिये। जप काल में यथा

संभव मौन रहना उचित है। कोई बात कहना आवश्यक हो तो इशारे से कह देनी चाहिये।

12—जप नियत समय पर, नियत संख्या में, नियत स्थान पर, शान्त चित्त एवं एकाग्र मन से करना चाहिये। पास में जलाशय या जल से भरा पात्र होना

चाहिये। आचमन के पश्चात् जप आरम्भ करना चाहिये। किसी दिन अनिवार्य कारण से जप स्थगित करना पड़े तो दूसरे दिन प्रायश्चित्य स्वरूप एक

माला अधिक जपनी चाहिये।

13—जप के लिए गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ है। गुरु द्वारा ग्रहण किया हुआ मंत्र ही सफल होता है। स्वेच्छा पूर्वक मन चाही विधि से, मन चाहा मंत्र, जपने से

विशेष लाभ नहीं होता। इसलिए अपनी स्थिति के अनुकूल आवश्यक विधान किसी अनुभवी पथ प्रदर्शक से मालूम कर लेना चाहिए।

उपरोक्त नियमों के आधार पर किया हुआ गायत्री जप मन को वश में करने एवं मनोमय कोष को सुविकसित करने में बड़ा ही महत्वपूर्ण सिद्ध होता है।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

वाणी के चार स्तर

वाणी, जो हम बोलते और सुनते हैं, उसके चार स्तर होते हैं। जो शब्द हमारे मुख से बाहर निकलता है, और हमारे या औरों के कानों तक पहुँचता है, आइये देखें उसका पूरा खेल। समझने की कोशिश करें।

1. परा वाणी------- परा, वाणी का वह स्तर है जहाँ शब्द, मात्र कुछ तरंगों के रूप में जन्म लेते हैं। यहाँ शब्द का कोई स्पष्ट स्वरुप नहीं होता। मात्र कुछ तरंगें, जिनके स्फुरण को सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है। लगता है कि भीतर कुछ हुआ, लेकिन क्या हुआ? कुछ पता नहीं।

2. पश्यन्ति------- परा स्तर में जन्मी अमूर्त तरंगें जब कुछ स्पष्ट होने लगती हैं, तो बोलने वाला उसे अपने अंतर्मन में देख पाने लगता है। पश्यन्ति के स्तर पर ही शब्द अपना आकार ग्रहण करता है। परा की अस्पष्ट और निराकार तरंगों का भौतिक अस्तित्व वक्ता के अनुभव में आ जाता है।

3. मध्यमा------- मध्यमा में वह शब्द, जो उच्चरित होने वाला है, जो परा में मात्र कुछ निराकार तरंगों और पश्यन्ति में सिर्फ अपनी भौतिक उपस्थिति का अनुभव मात्र दे रहा था, अब एक निश्चित ज्यामितीय आकार ग्रहण कर लेता है। उच्चरित होने वाले शब्द के इसी ज्यामितीय आकार के अनुरूप वक्ता के स्वर-यंत्र अपना भी आकार बनाते हैं। स्वर-यन्त्र से तात्पर्य है, गला, मूर्धा, तालु, जीभ, दाँत और होंठ। अपने निश्चित ज्यामितीय आकार के अनुरूप शब्द विशेष, गले, मूर्धा, तालु, जीभ और दाँतों से टकराता हुआ बाहर निकलने के पूर्व अपने अंतिम पड़ाव, होठों तक पहुँचता है। शब्द की यह सारी यात्रा वाणी के जिस स्तर पर घटित होती है, वही है, मध्यमा।

4. बैखरी------- बैखरी के बारे में विशेष क्या कहना है? वाणी के इस स्तर से तो सबका परिचय है ही। वही, जो हम सब लोग बोलते और सुनते रहते हैं। जो वाणी, जो शब्द हमारे होठों से बाहर निकल कर, ब्रह्माण्ड में बिखर जाता है।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

;अर्थात् ‘ज’ अर्थात् जन्म मरण से छुटकारा, ‘प’ अर्थात् पापों का नाश। इन दोनों प्रयोजनों को पूरा करने वाली निष्पाप और जीवन मुक्त बनाने वाली साधना ‘जप’ कहते हैं।जप के लिये प्रयुक्त की जाने वाली वाणी का स्तर ऊँचा होना चाहिए। जिह्वा से होने वाले शब्दोच्चारण की बैखरी वाणी कहते हैं। यह केवल जानकारी के आदान-प्रदान से प्रयुक्त होती है।

भावों के प्रत्यावर्तन में मध्यमा वाणी काम आती है। इसे भाव सम्पन्न व्यक्ति ही बोलते हैं। जीभ और कान के माध्यम से नहीं वरन् हृदय से हृदय तक यह प्रवाह चलता है। भावनाशील व्यक्ति ही दूसरों की भावनायें उभार सकता है। यह बैखरी और मध्यमा वाणी मनुष्यों के बीच विचारों एवं भावों के बीज आदान-प्रदान का काम करती है।

इससे आगे दो और वाणियाँ हैं जिन्हें परा और पश्यन्ति कहते हैं। परा पिण्ड में और पश्यन्ति ब्रह्माण्ड क्षेत्र में काम करती है। आत्म-निर्माण का-अपने भीतर दबी हुई शक्तियों को उभारने का काम ‘परा’ करती है। ईश्वर से-देव शक्तियों से-समस्त विश्व से-लोक-लोकान्तरों से संबंध संपर्क बनाने में पश्यन्ति का प्रयोग किया जाता है। अस्तु इन परा और पश्यन्ति वाणियों को दिव्य वाणी एवं देव वाणी कहा गया है।

-वाणी के चार चरण होते हैं, परा, पश्यन्ति, मध्यमा और बैखरी। इनमें से पृथक तीन अन्तःकरण रूपी गुफा में छिपी रहती है चौथी बैखरी ही बोलने में प्रयुक्त होती है।यह वाणी चरण वाली होती है। उसे विद्वान ब्रह्मवेत्ता ही जानते हैं। इन वाणियों में से तीन तो गुफा में ही छिपी बैठी है। वे अपने स्थानों से नीचे नहीं हिलती। चौथी बैखरी को ही मनुष्य बोलते हैं।

NOTE;-

वाणी का उद्भव परा से होता है। पश्यन्ती में विकसित होकर उसकी दो शाखायें फूटती है। मध्यमा में वह पुष्पों से लद जाती है और बैखरी में वह फलित होती है। जिस क्रम से उसका विकास होता है उसके उलटे क्रम से वह लय भी हो जाती है।विधानात्मक कर्मकाण्ड की उपयोगिता भी है और महत्ता भी। पर उसे समय सर्वांगपूर्ण नहीं मानना चाहिए उसके साथ जब भावनाओं का-वृत्तियों का-समन्वय होता है तभी उस कर्मकाण्ड से शक्ति उत्पन्न होती है।

वाक् शक्ति को अग्नि भी कहा गया है। यह अग्नि सर्वत्र तेजस्विता, ऊर्जा, प्रखरता एवं आभा उत्पन्न करती है इसलिए वाक् अग्नि भी है। ऋग्वेद में कहा गया है कि ऋषि वाणी द्वारा ही अग्नि को प्राप्त करते रहे हैं।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

मंत्र शब्द का अर्थ असीमित है। वैदिक ऋचाओं के प्रत्येक छन्द भी मंत्र कहे जाते हैं। तथा देवी-देवताओं की स्तुतियों व यज्ञ हवन में निश्चित किए गए शब्द समूहों को भी मंत्र कहा जाता है। तंत्र शास्त्र में मंत्र का अर्थ भिन्न है। तंत्र शास्त्रानुसार मंत्र उसे कहते हैं जो शब्द पद या पद समूह जिस देवता या शक्ति को प्रकट करता है वह उस देवता या शक्ति का मंत्र कहा जाता है।

विद्वानों द्वारा मंत्र की परिभाषाएँ निम्न प्रकार भी की गई हैं।

1. धर्म, कर्म और मोक्ष की प्राप्ति हेतु प्रेरणा देने वाली शक्ति को मंत्र कहते हैं।

2. देवता के सूक्ष्म शरीर को या इष्टदेव की कृपा को मंत्र कहते हैं। (तंत्रानुसार)

3. दिव्य-शक्तियों की कृपा को प्राप्त करने में उपयोगी शब्द शक्ति को मंत्र कहते हैं।

4. अदृश्य गुप्त शक्ति को जागृत करके अपने अनुकूल बनाने वाली विधा को मंत्र कहते हैं। (तंत्रानुसार)

5. इस प्रकार गुप्त शक्ति को विकसित करने वाली विधा को मंत्र कहते हैं।

मंत्र साधना के समय

मंत्र साधना के लिए निम्नलिखित विशेष समय, माह, तिथि एवं नक्षत्र का ध्यान रखना चाहिए।

1. उत्तम माह - साधना हेतु कार्तिक, अश्विन, वैशाख माघ, मार्गशीर्ष, फाल्गुन एवं श्रावण मास उत्तम होता है।

2. उत्तम तिथि - मंत्र जाप हेतु पूर्णिमा़, पंचमी, द्वितीया, सप्तमी, दशमी एवं ‍त्रयोदशी तिथि उत्तम होती है।

3. उत्तम पक्ष - शुक्ल पक्ष में शुभ चंद्र व शुभ दिन देखकर मंत्र जाप करना चाहिए।

4. शुभ दिन - रविवार, शुक्रवार, बुधवार एवं गुरुवार मंत्र साधना के लिए उत्तम होते हैं।

5. उत्तम नक्षत्र - पुनर्वसु, हस्त, तीनों उत्तरा, श्रवण रेवती, अनुराधा एवं रोहिणी ‍नक्षत्र मंत्र सिद्धि हेतु उत्तम होते हैं।

मंत्र साधना में साधन आसन एवं माला

आसन - मंत्र जाप के समय कुशासन, मृग चर्म, बाघम्बर और ऊन का बना आसन उत्तम होता है।

माला - रुद्राक्ष, जयन्तीफल, तुलसी, स्फटिक, हाथीदाँत, लाल मूँगा, चंदन एवं कमल की माला से जाप सिद्ध होते हैं। रुद्राक्ष की माला सर्वश्रेष्ठ होती है।

अगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो वे मंत्र हमारे लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकते हैं। जैसे घर में जप करने से एक गुना, गौशाला में सौ गुना, पुण्यमय वन या बगीचे तथा तीर्थ में हजार गुना, पर्वत पर दस हजार गुना, नदी-तट पर लाख गुना, देवालय में करोड़ गुना तथा शिव के निकट अनंत गुना फल प्राप्त होता है।

जप तीन प्रकार का होता है- वाचिक, उपांशु और मानसिक। वाचिक जप धीरे-धीरे बोलकर होता है। उपांशु-जप इस प्रकार किया जाता है, जिसे दूसरा न सुन सके। मानसिक जप में जीभ और ओष्ठ नहीं हिलते। तीनों जपों में पहले की अपेक्षा दूसरा और दूसरे की अपेक्षा तीसरा प्रकार श्रेष्ठ है।

प्रातःकाल दोनों हाथों को उत्तान कर, सायंकाल नीचे की ओर करके तथा मध्यान्ह में सीधा करके जप करना चाहिए। प्रातःकाल हाथ को नाभि के पास, मध्यान्ह में हृदय के समीप और सायंकाल मुँह के समानांतर में रखें।

जप की गणना के लिए लाख, कुश, सिंदूर और सूखे गोबर को मिलाकर गोलियां बना लें। जप करते समय दाहिने हाथ को जप माली में डाल लें अथवा कपड़े से ढंक लेना आवश्यक होता है। जप के लिए माला को अनामिका अंगुली पर रखकर अंगूठे से स्पर्श करते हुए मध्यमा अंगुली से फेरना चाहिए। सुमेरु का उल्लंघन न करें। तर्जनी न लगाएँ। सुमेरु के पास से माला को घुमाकर दूसरी बार जपें।

जप करते समय हिलना, डोलना, बोलना, क्रोध न करें, मन में कोई गलत विचार या भावना न बनाएँ अन्यथा जप करने का कोई भी फल प्राप्त न होगा।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

पूर्णांक 108 का रहस्य “ओ३म्” का जप करते समय १०८ प्रकार की विशेष भेदक ध्वनी तरंगे उत्पन्न होती है जो किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक घातक रोगों के कारण का समूल विनाश व शारीरिक व मानसिक विकास का मूल कारण है। बौद्धिक विकास व स्मरण शक्ति के विकास में अत्यन्त प्रबल कारण है। मेरा आप सभी से अनुरोध है बिना अंधविश्वास समझे कर्तव्य भाव से इस “पूर्णांक १०८” को पवित्र अंक स्वीकार कर,आर्य-वैदिक संस्कृति के आपसी सहयोग, सहायता व पहचान हेतु निःसंकोच प्रयोग करें, इसका प्रयोग प्रथम दृष्टिपात स्थान पर करें जैसे द्वार पर इस प्रकार करें।यह अद्भुत व चमत्कारी अंक बहुत समय काल से हमारे ऋषि – मुनियों के नाम के साथ प्रयोग होता रहा है और अब अति शीघ्र यही अंक हमारी महान सनातन वैदिक संस्कृति के लिये प्रगाढ़ एकता का विशेष संकेत-अंक (code word) बन जायेगा। “संख्या १०८ का रहस्य” अ→१ … आ→२ … इ→३ … ई→४ … उ→५ … ऊ→६.… ए→७ … ऐ→८ ओ→९ ……औ→१० … ऋ→११ … लृ→१२ … अं→१३ … अ:→१४.. ऋॄ →१५.. लॄ →१६ ×××××××××××××××××××××××××××× क→१ … ख→२ … ग→३ … घ→४ … ङ→५ … च→६ … छ→७ … ज→८ …झ→९ …ञ→१० … ट→११ … ठ→१२ … ड→१३ …ढ→१४ … ण→१५ … त→१६ … थ→१७ … द→१८ … ध→१९ … न→२० … प→२१ … फ→२२ … ब→२३ … भ→२४ … म→२५ … य→२६ … र→२७ … ल→२८ … व→२९ … श→३० … ष→३१ … स→३२ … ह→३३ … क्ष→३४ … त्र→३५ … ज्ञ→३६ … ड़ … ढ़ … –~ओं खम् ब्रह्म ~– ब्रह्म = ब+र+ह+म =२३+२७+३३+२५=१०८ ÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷ (१) — यह मात्रिकाएँ (१८स्वर+३६व्यंजन=५४) नाभि से आरम्भ होकर ओष्टों तक आती है, इनका एक बार चढ़ाव, दूसरी बार उतार होता है, दोनों बार में वे १०८ की संख्या बन जाती हैं। इस प्रकार १०८ मंत्र जप से नाभि चक्र से लेकर जिव्हाग्र तक की १०८ सूक्ष्म तन्मात्राओं का प्रस्फुरण हो जाता है। अधिक जितना हो सके उतना उत्तम है पर नित्य कम से कम १०८ मंत्रों का जप तो करना ही चाहिए ।। ——————————————— (२) — मनुष्य शरीर की ऊँचाई = यज्ञोपवीत(जनेउ) की परिधि = (४ अँगुलियों) का २७ गुणा होती है। = ४ × २७ = १०८ °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° (३) नक्षत्रों की कुल संख्या = २७ प्रत्येक नक्षत्र के चरण = ४ जप की विशिष्ट संख्या = १०८ अर्थात गायत्री आदि मंत्र जप कम से कम १०८ बार करना चाहिये । •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• (४) — एक अद्भुत अनुपातिक रहस्य ★पृथ्वी से सूर्य की दूरी/ सूर्य का व्यास=१०८ ★पृथ्वी से चन्द्र की दूरी/ चन्द्र का व्यास=१०८ अर्थात मन्त्र जप १०८ से कम नहीं करना चाहिये। ~~~~~ (५) हिंसात्मक पापों की संख्या ३६ मानी गई है जो मन, वचन व कर्म ३ प्रकार से होते है। अत: पाप कर्म संस्कार निवृत्ति हेतु किये गये मंत्र जप को कम से कम १०८ अवश्य ही करना चाहिये। ………………………………………………… (६) सामान्यत: २४ घंटे में एक व्यक्ति २१६०० बार सांस लेता है। दिन-रात के २४ घंटों में से १२ घंटे सोने व गृहस्थ कर्त्तव्य में व्यतीत हो जाते हैं और शेष १२ घंटों में व्यक्ति जो सांस लेता है वह है १०८०० बार। इसी समय में ईश्वर का ध्यान करना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति कोहर सांस पर ईश्वर का ध्यान करना चाहिये । इसीलिए १०८०० की इसी संख्या के आधार पर जप के लिये १०८ की संख्या निर्धारित करते हैं। ~~~~~~~~~~ (७) एक वर्ष में सूर्य २१६०० कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छःमाह उत्तरायण में रहता है और छः माहदक्षिणायन में। अत: सूर्य छः माह की एक स्थितिमें १०८००० बार कलाएं बदलता है। ∅∅∅∅∅∅∅∅∅∅∅∅∅∅∅∅∅∅∅ २१६०० कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छःमाह उत्तरायण में रहता है और छः माहदक्षिणायन में। अत: सूर्य छः माह की एक स्थितिमें १०८००० बार कलाएं बदलता है। ★★★★★★★★★★★★★★★★★★★ (८) ब्रह्मांड को १२ भागों में विभाजित किया गया है। इन १२ भागों के नाम मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन १२ राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अत: ग्रहों की संख्या ९ में राशियों की संख्या १२ से गुणा करें तो संख्या १०८ प्राप्त हो जाती है। ❤ ❤ ❤ ❤ ❤ ❤ ❤ ❤ ❤ ❤ ❤ (९) १०८ में तीन अंक हैं १+०+८. इनमें एक “१” ईश्वर का प्रतीक है। शून्य “०” प्रकृति को दर्शाता है। आठ “८” जीवात्मा को दर्शाता है क्योकि योग के अष्टांग नियमों से ही जीव प्रभु से मिल सकता है । जो व्यक्ति अष्टांग योग द्वारा प्रकृति के विरक्त हो कर ( मोह माया लोभ आदि से विरक्त होकर ) ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है उसे सिद्ध पुरुष कहते हैं। जीव “८” को परमपिता परमात्मा से मिलने के लिए प्रकृति “०” का सहारा लेना पड़ता है। ईश्वर और जीव के बीच में प्रकृति है। आत्मा जब प्रकृति को शून्य समझता है तभी ईश्वर “१” का साक्षात्कार कर सकता है। प्रकृति “०” में क्षणिक सुख है और परमात्मा में अनंत और असीम। जब तक जीव प्रकृति “०” को जो कि जड़ है उसका त्याग नहीं करेगा , शून्य नही करेगा, मोह माया को नहीं त्यागेगा तब तक जीव “८” ईश्वर “१” से नहीं मिल पायेगा पूर्णता (१+८=९) को नहीं प्राप्त कर पायेगा ।

९ पूर्णता का सूचक है। ~~~~~ (१०) जैन मतानुसार अरिहंत के गुण – १२ सिद्ध के गुण – ८ आचार्य के गुण – ३६ उपाध्याय के गुण – २५ साधु के गुण – २७ कुल योग – १०८ ~~~~~ (११) वैदिक विचार धारा में मनुस्मृति के अनुसार अहंकार के गुण = २ बुद्धि के गुण = ३ मन के गुण = ४ आकाश के गुण = ५ वायु के गुण = ६ अग्नि के गुण = ७ जल के गुण = ८ पॄथ्वी के गुण = ९ २+३+४+५+६+७+८+९ =अत: प्रकॄति के कुल गुण = ४४ जीव के गुण = १० इस प्रकार संख्या का योग = ५४ अत: सृष्टि उत्पत्ति की संख्या = ५४ एवं सृष्टि प्रलय की संख्या = ५४ दोंनों संख्याओं का योग = १०८ ÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷ (१२) ★ Vertual Holy Trinity ★ संख्या “१” एक ईश्वर का संकेत है। संख्या “०” जड़ प्रकृति का संकेत है। संख्या “८” बहुआयामी जीवात्मा का संकेत है। [ यह तीन अनादि परम वैदिक सत्य हैं ] [ यही पवित्र त्रेतवाद ( Holy Trinity ) है ] संख्या “२” से “९” तक एक बात सत्य है कि इन्हीं आठ अंकों में “०” रूपी स्थान पर जीवन है। इसलिये यदि “०” न हो तो कोई क्रम गणना आदि नहीं हो सकती। “१” की चेतना से “८” का खेल । “८” यानी “२” से “९” । यह “८” क्या है ? मन के “८” वर्ग या भाव । ये आठ भाव ये हैं – १. काम ( विभिन्न इच्छायें / वासनायें ) । २. क्रोध । ३. लोभ । ४. मोह । ५. मद ( घमण्ड ) । ६. मत्सर ( जलन ) । ७. ज्ञान । ८. वैराग । एक सामान्य आत्मा से महानात्मा तक की यात्रा का प्रतीक है — १०८ इन आठ भावों में जीवन का ये खेल चल रहा है । ×××××××××××××××××××××××××××× (१३) सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से नौ रश्मियां निकलती हैं और ये चारो ओर से अलग-अलग निकलती है। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गई। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बनें । इस तरह सूर्य की जब नौ रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनका पृथ्वी के आठ बसुओं से टक्कर होती हैं। सूर्य की नौ रश्मियां और पृथ्वी के आठ बसुओं की आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुई वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गई। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियां पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित है। 🙂 1+0+8==9 यह 9 अंक राज राजेश्वरी का प्रिय हे। जिस प्रकार भगवती नित्य पूर्ण हे यह अंक भी पूर्ण है। राधे राधे

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;