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क्या है जप साधना और मंत्र जाप करने की विधि? वाणी के कितने चरण होते हैं?क्या है पूर्णांक 108 का र


मनोमय कोश की स्थिरता एवं एकाग्रता के लिये जप का साधन बड़ा ही उपयोगी है। इसकी उपयोगिता निर्विवाद है कि सभी धर्म, मजहब, सम्प्रदाय, माला की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं। जप करने से मन की प्रवृत्तियों को एक ही हेतु में लगा देना सरल हो जाता है। कहते हैं कि एक बार एक मनुष्य ने किसी भूत को सिद्ध कर लिया। भूत बड़ा बलवान था उसने कहा मैं तुम्हारे वश में आ गया, ठीक है, जो आज्ञा मिलेगी सो करूंगा, पर मुझ से बेकार नहीं बैठा जाता। यदि मैं बेकार रहा तो आप को ही खा जाऊंगा। यह मेरी शर्त अच्छी तरह समझ लीजिये। उस आदमी ने भूत को बहुत से काम बताये उसने थोड़ी-थोड़ी देर में सब काम कर दिये। भूत की बेकारी से उत्पन्न होने वाला संकट उस सिद्ध को बेतरह परेशान कर रहा था। तब वह दुखी होकर अपने गुरु के पास गया। गुरु ने उस सिद्ध को बताया कि आंगन में एक श्वांस गाढ़ दिया जाय और भूत से कह दिया जाय कि जब तक दूसरा काम न बताया जाया करे तब तक उस बांस पर बार-बार चढ़ें और बारबार उतरे। यह काम मिल जाने पर भूत से काम लेते रहने की भी सुविधा हो गई और सिद्ध के आगे उपस्थित रहने वाला संकट हट गया। मन ऐसा ही भूत है जो जब भी निरर्थक बैठता है तभी कुछ न कुछ खुराफात करता है। इसलिए यह जब भी काम से छुट्टी पावें तभी इसे जप पर लगा देना चाहिए। जप केवल समय काटने के लिए ही नहीं है वरन् वह एक बड़ा ही उत्पादक एवं निर्माणात्मक मनोवैज्ञानिक श्रम है। निरन्तर पुनरावृत्ति करते रहने से मन में उस प्रकार का अभ्यास एवं संस्कार बन जाता है जिससे वह स्वभावतः उसी ओर चलने लगता है। पत्थर बार-बार रस्सी की रगड़ लगने से उसमें गड्ढा पड़ जाता है। पिंजड़े में रहने वाला कबूतर, बाहर निकाल देने पर भी लौटकर उसी में वापिस आ जाता है। गाय को जंगल में छोड़ दिया जाय तो भी वह रात को स्वयंमेव लौट आती है। निरन्तर के अभ्यास से मन भी ऐसा अभ्यस्त हो जाता है कि अपने दीर्घ काल तक सेवन किये गये कार्यक्रम में अनायास ही प्रवृत्त हो जाता है। अनेक निरर्थक कल्पना प्रपंचों में उछलते-कूदते फिरने की अपेक्षा आध्यात्मिक भावना की एक सीमित परिधि में