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पितृदोष - कारण , लक्षण एवं निदान ...


पितृदोष - कारण , लक्षण एवं निदान !!

पितृदोष - कारण , लक्षण एवं निदान !!

केवल सनातन हिन्दू धर्म मे ही पुनर्जन्म की अवधारणा है, जिस जीव ने जन्म लिया है , वो अवश्य ही दूसरा जन्म लेगा ...किन्तु

यदि मृत्यु पूर्व जीव की कोई इच्छा रह गई हो , कोई पापकर्म रहा हो अथवा अकाल मृत्यु हुई हो ...

ऐसे मे उस जीव की आत्मा का पुनर्जन्म नहीं हो पाता और आत्मा संतुष्टि के अभाव मे भटकती रहती है ,

जिससे उस आत्मा के वंशजों पर बुरा प्रभाव पड़ता है , जिसे हम ‘ पित्रदोष ‘ कहते हैं ।

शास्त्रों के अनुसार हमारे मृत पूर्वजों और परिवार जनों को पितृ देवता माना जाता है।

पितृ देवता की कृपा के बिना किसी भी व्यक्ति को सुख प्राप्त नहीं हो सकता है।

ज्योतिषशास्त्र में कई प्रकार के दोषों के बारे में बताया गया है।

इनमें पितृदोष भी एक है।

यह दोष जन्मकुण्डली में तब बनता है जब नवम भाव में राहु, केतु, शनि अथवा मंगल अपनी नीच राशि में बैठा हो। नवमेश के साथ इन ग्रहों की युति बन रही हो।

चन्द्र से अथवा चन्द्रमा की राशि से नवम भाव में पाप ग्रह बैठे हों। जन्मकुण्डली में अगर चन्द्रमा और सूर्य राहु केतु से ग्रसित हों तब भी पितृ दोष माना जाता है।

पितृ दोष का प्रभाव -

- पितृ दोष होने पर व्यक्ति कितना भी परिश्रम कर ले , सफलता उससे दूर ही रहती है।

- व्यक्ति को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है।

- व्यक्ति के साथ दुर्घटनाएं होती रहती हैं।

- ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यह दोष होने पर अकाल मृत्यु की भी आशंका रहती है।

- पितृ के श्राप के कारण वंश की वृद्घि रूक जाती है।

महर्षि पराशर ने लिखा है 'पितृशापत्सुतक्षयः' अर्थात पितरों के श्राप से संतान की हानि होती है।

पित्रदोष लगने के कारण -

परिवार के स्त्री-पुरूष मृत्यु के बाद पितृ कहलाते हैं।

ब्रह्म पुराण के अनुसार मृत्यु के पश्चात जिस व्यक्ति का श्राद्ध कर्म नहीं किया जाता है उन्हें पितृलोक में स्थान नहीं मिलता है।

वह भूत-प्रेत बनकर भटकते रहते हैं और कष्ट भोगते हैं।

श्राद्धपक्ष आने पर यमराज की आज्ञा से विभिन्न योनियों में पड़े पितृगण श्राद्ध की इच्छा से अपनी संतानों के घर आते हैं।

पितृपक्ष के 15 दिनों तक जो व्यक्ति अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक अन्न जल भेंट करते हैं तथा उनके नाम से ब्रह्मणों को भोजन कराते हैं वह पित्रों के आशीर्वाद से पितृदोष से मुक्त हो जाते हैं।

जो लोग पितृपक्ष में पितरों का श्राद्ध नहीं करते हैं उनकी संतान की कुण्डली में पितृदोष लगता है तथा अगले जन्म में वह भी पितृ दोष से पीड़ित होकर कष्ट प्राप्त करते हैं।

पितृ दोष से मुक्ति के उपाय –

पितृदोष से मुक्ति के लिए ज्योतिष शास्त्र में कई उपाय बताए गये हैं।

इनमें सबसे आसान उपाय हैं पंच ग्रास ...

पंच ग्रास बनाने की विधि -

पित्रों के निमित्त भोजन बनाकर उसके पांच भाग कर लें।

प्रत्येक भाग में जौ और तिल मिलाएं और प्रथम भाग गाय को खिलाएं,

दूसरा भाग कौए को दें,

तीसरा भाग बिल्ली को दें,

चौथा भाग कुत्ते को खिलाएं,

पांचवां हिस्सा सुनसान स्थान में रखकर आएं ... लौटते समय पीछे मुड़कर नहीं देखें।

घर वापस आने के बाद ब्रह्मणों को भोजन कराएं।

भोजन में इस बात का ध्यान रखें कि जो वस्तुएं आपके पितरों को जीवित अवस्था में पसंद थीं उन वस्तुओं को अवश्य परोसें।

अगर ब्रह्मण भोजन करवाने में आप असमर्थ हैं तो पितृपक्ष के 15 दिनों तक गाय को घास खिलाएं और पानी पिलाएं।

शास्त्रों में बताया गया है कि ऐसा करने से पितरों को मुक्ति मिल जाती है तथा पित्रों के आशीर्वाद से श्राद्ध कर्म करने वाले की उन्नति होती है तथा उसके कष्ट दूर हो जाते हैं।

- बारह आदित्य (अदिति के पुत्र) दत्त, मित्र, आर्यमा, रुद्र, वरुण, सूर्य, भाग, विश्वन्, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु हैं। ग्यारह रुद्र मन्यु, मनु, महिनसन, मदन, शिवन, ऋतुध्वज, उग्ररेतस, भवन, कामन, वामदेव और द्रुतव्रतन हैं। दक्ष की पुत्री वसु के ये आठ पुत्र हैं : धरण, ध्रुव, सोम, अहास, अनिल, अनलन, प्रात्युष्ण और प्रभासन।

इनमे से आर्यमा को पितृ मान कर आहुति दे जाती है और माना जाता है इससे पित्रों को तृप्ति व मुक्ति मिलती है।

वैसे यह मानसिक जप व हवन होता है किन्तु काले तिल,अक्षत व अन्य हवन सामग्री से हवन कर 108 आहुती दी जा सकती है ।

इस मंत्र का जितना हो मानसिक करते रहें -

“ ॐ आर्यमाये नमः स्वधा “

* श्राद्धपक्ष के दिनों में पीपल के वृक्ष को रोज जल चढाये तथा “ ॐ श्री पित्रदेवाय नमः “ का जप करें ।

* सबसे पहले भूलकर भी किसी का अपमान ना करें (वैसे करना भी नहीं चाहिए), ब्रहमचर्य का पालन करे, इर्ष्या ,क्रोध और बुरे विचार मन में नहीं आने चाहिये।

* पित्र देवो के आशीर्वाद के लिए सबसे अच्छा श्री गीता जी का पाठ होता है, किसी योग्य ब्राहमण-पंडित से करवाया जाए। पाठ ये कह कर रखवाया जाता है, कि " हमारे पित्र देव जहा कही भी हो और जिस भी योनी में हो… उन्हें वहा पर शांति प्रदान हो और उनका आशीर्वाद हमारे पूरे परिवार को मिले गीता पाठ का जो भी पुण्य फल है वो हमारे पित्र देवो को मिले…. "

फिर अमावस्या को इस पाठ का हवन के साथ समापन होता है। ब्राहमण देव जी को यथा शक्ति कपडे दिए जाते है… जो पित्र देवो के नाम से होते है…. यथा शक्ति भोजन और दक्षिणा के साथ उनको विदाई दी जाती है…. यह पाठ ३ दिन या ५ दिन या फिर ७ दिन में होता है।

* श्राद्ध के दिन भगवदगीता के सातवें अध्याय का माहात्मय पढ़कर फिर पूरे अध्याय का पाठ करना चाहिए एवं उसका फल मृतक आत्मा को अर्पण करना चाहिए।

* श्राद्ध के आरम्भ और अंत में तीन बार निम्न मंत्र का जप करें -

" देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च ! नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव भवन्त्युत !!

- समस्त देवताओं, पितरों, महयोगियों, स्वधा एवं स्वाहा सबको हम नमस्कार करते हैं l ये सब शाश्वत फल प्रदान करने वाले हैं l

* श्राद्ध में इस विशेष मंत्र उच्चारण करने से, पितरों को संतुष्टि होती है और संतुष्ट पितर आप के कुल खानदान को आशीर्वाद देते हैं

" ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा "

* यदि कोई व्यक्ति न्यून सामर्थ्य का है तो भी कोई बात नहीं ….

विष्णु पुराण के अनुसार दरिद्र व्यक्ति केवल मोटा अन्न, जंगली साग-पात-फल और न्यूनतम दक्षिणा दे सकता है ,

वह भी ना हो तो सात या आठ तिल अंजलि में जल के साथ लेकर ब्राह्मण को देना चाहिए या

किसी गाय को दिन भर घास खिला देनी चाहिए अन्यथा

हाथ उठाकर दिक्पालों और सूर्य से याचना करनी चाहिए कि हे! प्रभु मैंने हाथ वायु में फैला दिये हैं, मेरे पितर मेरी भक्ति से संतुष्ट हों।

* पीपल की ... गंध, अक्षत, तिल व फूल चढ़ाकर पूजा करें, दूध या दूध मिला जल चढ़ाकर पीपल के नीचे एक गोघृत यानी गाय के घी का दीप जलाएं।

दूध से बनी खीर का भोग लगाएं , चंदन की माला से यह मंत्र की 5 माला कर विष्णु आरती करें।

मंत्र - ” ॐ ऐं पितृदोष शमनं हीं ॐ स्वधा ”

आरती कर पूजा का जल घर में लाकर छिड़कें व प्रसाद घर-परिवार के सदस्यों को खिलायेँ।

* घर की दक्षिण दिशा की दीवार पर अपने दिवंगत पूर्वजों का फोटो लगाकर उस पर हार चढ़ाकर उन्हें सम्मानित करें।

* अमावस्या के दिन अपने पितरों का ध्यान करते हुए पीपल के पेड़ पर कच्ची लस्सी, थोड़ा गंगाजल, काले तिल, चीनी, चावल, जल तथा पुष्प अर्पित करें और “ ॐ पितृभ्य: नम: ” मंत्र का यथा संभव जाप करें.

उसके बाद पितृ सूक्त का पाठ करना शुभ फल प्रदान करता है।

* यथा संभव गौ ग्रास, कौवे , पक्षियों और कुत्ते को भोजन देना बहुत शुभ रहता है ,

किसी गरीब को भोजन तो अत्यंत शुभ है।

* श्राद्ध के दिनों में माँस आदि का मांसाहारी भोजन नहीं करना चाहिए.

शराब तथा अंडे का भी त्याग करना चाहिए ,

सभी तामसिक वस्तुओं को सेवन छोड़ देना चाहिए और पराये अन्न से परहेज करना चाहिए।

* सामर्थ्यवान लोगों को ... ब्राह्मणों को गोदान, कुंए खुदवाना, पीपल तथा बरगद के पेड़ लगवाना,

विष्णु भगवान के मंत्र जाप, श्रीमदभागवत गीता का पाठ करना, पितरों के नाम पर अस्पताल, मंदिर, विद्यालय, धर्मशाला, आदि बनवाने से भी लाभ मिलता है।

* यह खास उपाय सोमवती अमावस्या को होता है , जो एक ही बार काफी है…

फिर भी यदि 5 सोमवती अमावस्या किया जाए तो बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त होते है।

ये उपाय संकल्प के साथ किया जाता है ,

सोमवती अमावस्या को , पास ही स्थित किसी पीपल के पेड़ के पास जाइये और उस पेड़ को एक जनेऊ दीजिये और एक जनेऊ भगवान विष्णु के नाम का उसी पीपल को दीजिये। पीपल के पेड़ और भगवान विष्णु की प्रार्थना कीजिये,

फिर उस पीपल के पेड़ की एक सौ आठ परिक्रमा दीजिये।

हर परिक्रमा के बाद एक मिठाई (जो भी आपके स्वच्छ रूप से हो, यदि नहीं भी हो तो बताशे ही अर्पित कर दें ) पीपल को अर्पित कीजिये।

परिक्रमा करते समय " ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ” मंत्र का जाप करते जाइये।

परिक्रमा पूरी करने के बाद फ़िर से पीपल के पेड़ और भगवान विष्णु की प्रार्थना कीजिये।

उनसे जाने-अनजाने में हुए अपराधों के लिए क्षमा मांग लीजिए।

* पित्र देवो के आशीर्वाद हेतु पिंड दान होता है…

किसी योग्य पंडित जी से करवाए बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त होते है …. वैसे गया सबसे उपयुक्त स्थान है…

* दत्तात्रेय देवताके चित्र या मूर्ति की प्रतिदिन पूजा करें।

* दत्तात्रेय देवतासे भावपूर्ण प्रार्थना कुछ इस प्रकार करें -

“ हे दत्तात्रेय देवता, जो भी पितर मेरे परिवार के परूष वर्गके जीवीकोपार्जन के मार्ग में बाधा निर्माण कर रहे हैं, उनसे आप हमारा रक्षण करें, हमारे परिवार के सभी सदस्यों के चारों ओर अभेद्य सुरक्षा कवच निर्माण होने दें ... अपनी कृपादृष्टि हमपर बनाए रखें, हम आपके शरणागत हैं”

यह प्रार्थना जप के साथ-साथ आप दिन में जितनी अधिक बार कर सकते हैं, करें।

* किसी ब्राह्मण को प्रत्येक मास अपने घर के मुखिया की मृत्यु तिथि पर और तिथि की जानकारी न होने पर, अमावस्या के दिन भोजन करवाएं, यह संभव न हो, तो ब्राह्मण को भोजन हेतु कुछ पैसे प्रत्येक महीने उस तिथि पर दें ...

इस तिथि पर दरिद्र को भोजन कराने से पितृ दोष निवारण में कोई सहायता नहीं मिलती।

* केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन नहीं कराना चाहिए।

* नियमित “ श्री गुरुदेव दत्त ” का जप करें।

वैसे तो 72 माला प्रतिदिन का विधान है , किन्तु जितना अधिक जप हो सके , कीजिये।

* घरमें पितरों के चित्र दृष्टि के सामने से, या पूजा घर से हटा दें , उसे या तो विसर्जित करें, या अलमारी में एक श्वेत वस्त्र में बांधकर रख दें,

श्राद्धके दिन यदि निकालना चाहें, तो निकाल सकते हैं।

* अधिकसे अधिक लोगों को दत्तात्रेय का जप एवं पितृ-दोष निवारण हेतु सारे उपाय बताएं।

* घरमें काले रंग के वस्त्र का प्रयोग, यथासंभव न करें,

सनातन धर्म में काले रंग के वस्त्र को शनि-दोष निवारण हेतु, या मकर संक्रांति के दिन पहनने के अलावा उस वस्त्र का प्रयोग साधारण व्यक्तिके लिए निषेध किया गया है।

* पितृपक्षमें ब्राह्मण को भोजन कराएं।

* पितृपक्षमें घर के पुरुष ने पितरों को प्रतिदिन जल-तिल तर्पण कर, श्राद्ध करना चाहिए।

* संत कार्य या धर्मकार्य में यथाशक्ति तन-मन-धन से योगदान करें।

* शास्त्रों के अनुसार हमारे मृत पूर्वजों और परिवारजनों को पितृ देवता माना जाता है।

पितृ देवता की कृपा के बिना किसी भी व्यक्ति को सुख प्राप्त नहीं हो सकता है।

पितृ की तृप्ति के लिए व्यक्ति को हर माह अमावस से पहले आने वाली चौदस के दिन बरगद के पेड़ या पीपल के पेड़ को दूध अर्पित करना चाहिए।

इस उपाय से पितृ देवताओं की कृपा प्राप्त हो जाती है।

* एक गमले में एक पौधा तुलसी का तथा एक पौधा काले धतूरे का लगायें।

इन दोनों पौधों पर प्रतिदिन स्नान आदि से निवृत होकर शुद्ध जल में थोड़ा सा कच्चा दूध मिलाकर अर्पित करें।

जो भी व्यक्ति यह प्रयोग नित्य 1 वर्ष तक करेगा उसे पितृदोष से मुक्ति मिल जायेगी।

तथा उसको ब्रहमा, विष्णु, महेश, इन तीनों की संयुक्त पूजा फल मिलेगा ...

चूंकि विष्णु प्रिया होने के कारण तुलसी विष्णु रूप है तथा काला धतूरा शिव रूप है एंव तुलसी की जड़ो में ब्रहमा का निवास स्थान माना जाता है।

* तर्पण और श्राद्ध प्रायः दोपहर १२ बजे ही करना श्रेष्ठ रहता है और नदी ,तालाब या फिर घर में ही कर सकते हैं।

* भोजन , तर्पण और पिंड-दान ... सोने - चांदी या तांबे के बर्तन में ही करना चाहिए।

* श्राद्ध कर्म व पूजा में गंगाजल, दूध, शहद कुश और तिल का खास महत्व है।

इनका यथोचित उपयोग करना न चूकें।

* तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं।

ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णुलोक को चले जाते हैं।

तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।

* रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन का उपयोग करें।

* आसन में लोहा किसी भी रूप में उपयोग नहीं होना चाहिए।

* चना, मसूर, साबुत उड़द, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काली सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न का श्राद्ध भोजन में उपयोग न करें।

पितृ पक्ष में दो चीजों का बहुत ही महत्व होता है ,

एक तर्पण का दूसरा पिंड दान का।

तर्पण कोई भी अपने पितृ के प्रति करवा सकता है किन्तु पिंड दान का अधिकार पुत्र या पोता को ही है।

पिंड दान के लिए गया जी , पुष्कर, कुरुक्षेत्र का बहुत ही महत्व है, पिंड दान से दिवंगत आत्मा को शान्ति तो मिलती ही है ,

उसके अलावा हमारा पित्र दोष भी शांत होता है।

दिवंगत के लिए उनकी तिथि पर पिंड दान या तर्पण तो महतवपूर्ण तो है ही किन्तु पित्र पक्ष की अमावास को दान देना महत्वपूर्ण है ,

क्यों की अमावास को दान सर्वपित्र के लिए दिया जाता है ...

इस दान से पितृ दोष नहीं लगता है , जीवन में व्यक्ति निरंतर सफलता प्राप्त करता है।

इस दान से अकाल मृत्यु का भय नहीं होता है ।

वंश वृद्धि होती है ,

क्यों की ये दान हम जिन पितरों को जानते है या नहीं जानते है उन सब को समर्पित होता है ।

दान में जौ , काला तिल , कुछ सफ़ेद मिठाए, चावल , चीनी , घी, दूध , और खीर बना कर दान दिया जाता है ।

इस दिन ब्रह्मण को भोजन अवश्य करवाए तथा वस्त्र दान दे।

!! ॐ श्री पितृदेवाय नमः !

ॐ आर्यमाये नमः स्वधा “यह मानसिक जप व हवन होता है किन्तु काले तिल,अक्षत व अन्य हवन सामग्री से हवन कर 108 आहुती दी जा सकती है ।