क्या आप्तकाम होना ही विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित एक सौ बारह विधियों का उद्देश्य है?


समग्र मनुष्य क्या है?-

07 FACTS;-

1-समग्र मनुष्य का अर्थ महान पुरुष बनना नहीं है।अर्थ यही है कि एक मनुष्य की भांति ..संतुलन पैदा करो, केंद्रित होओ और आप्तकाम बनो।संगीतज्ञ, कवि, कलाकार की भांति नहीं ..एक मनुष्य की भांति । 2-एक महाकवि महान कविता के कारण महाकवि है। एक महान संगीतज्ञ महान संगीत के कारण महान संगीतज्ञ है। वैसे ही एक महापुरुष महापुरुष है, क्योंकि उसने कुछ कृत्य किए हैं; वह बड़ा वीर हो सकता है। महापुरुष किसी एक दिशा में महापुरुष है। यह आंशिक है; महानता आंशिक है, खंडित है। यही कारण है कि महापुरुषों को साधारणजन से अधिक संताप झेलना पड़ता है। 3- पूरा मनुष्य, समग्र मनुष्य होने का अर्थ यह है कि तुम केंद्रित हो जाओ, बिना केंद्र के मत रहो। इस क्षण तुम कुछ हो, अगले क्षण कुछ और हो। सामान्यतया तुम अपना केंद्र कहां महसूस करते हो?हृदय में, मस्तिष्क में या नाभि केंद्र में, तुम्हारा केंद्र कहां है? तुम्हारा उत्तर हो सकता है कि कभी मैं मस्तिष्क में उसे महसूस करता हूं कभी हृदय में और कभी कहीं भी नहीं। तो आख बंद करो और अभी उसे अनुभव करो कि कहां है। और तब बहुसंख्यक लोगों की यह स्थिति हो सकती है ... वे कहते हैं, अभी, इस क्षण मुझे लगता है कि मैं मस्तिष्क में केंद्रित हूं। लेकिन दूसरे क्षण वे वहां नहीं होते। वे कहते हैं, मैं हृदय में हूं। और अगले क्षण केंद्र वहां से भी खिसक गया है; वह और कहीं है। 4-सच तो यह है कि तुम केंद्रित नहीं हो, तुम क्षणिक ढंग से केंद्रित हो। तुम्हारे प्रत्येक क्षण का अलग केंद्र है, इसलिए तुम बदलते रहते हो। जब मस्तिष्क काम करता है तो तुम समझते हो कि मस्तिष्क केंद्र है। और जब तुम प्रेम में होते हो तब समझते हो कि हृदय केंद्र है। और जब तुम कोई खास काम नहीं करते हो; तब तुम उलझन महसूस करते हो। तब तुम्हें केंद्र का पता नहीं चलता है, क्‍योंकि तुम्‍हें उसका पता तभी चलता है जब तुम कुछ करते हो । उस समय शरीर का एक विशेष भाग केंद्र बन जाता है। लेकिन तुम केंद्रित नहीं हो। जब तुम कुछ नहीं कर रहे होते हो तो तुम्हें अपने केंद्र का पता नहीं हो सकता। 5-एक समग्र मनुष्य केंद्रित होता है। वह जो भी कर रहा हो वह सदा अपने केंद्र में रहता है। अगर उसका मन सक्रिय है तो वह सोचता है, उसके मन में विचार चलता है, लेकिन वह अपने नाभि केंद्र में स्थित है। केंद्र उसका कभी खोता नहीं है।वह मस्तिष्क का उपयोग कर लेता है, लेकिन वह कभी मस्तिष्क में नहीं रहता है। वह हृदय का उपयोग कर लेता है, लेकिन वह कभी हृदय में नहीं रहता है। ये उसके लिए उपकरण बने रहते हैं और वह केंद्रित रहता है। दूसरी बात कि समग्र मनुष्य संतुलित है। सच तो यह है कि जब कोई केंद्रित होता है तो वह संतुलित भी हो जाता है। उसका जीवन एक गहन संतुलन है। वह कभी एकतरफा, एकांगी नहीं होता है, वह कभी किसी अति पर नहीं होता है, वह सदा मध्य में रहता है। गौतम बुद्ध ने इसे ही मज्‍झिम निकाय कहा है। वह सदा मध्य में रहता है। 6-जो व्यक्ति केंद्रित नहीं है वह सदा अति पर चला जाएगा। वह खाएगा तो बहुत खा लेगा या वह उपवास करेगा। लेकिन सम्यक भोजन उसके लिए संभव नहीं है। उपवास आसान है, अति भोजन ठीक है। वह या तो संसार में उलझा रहेगा या वह संसार का त्याग कर देगा। लेकिन वह कभी संतुलित नहीं हो सकता है, वह कभी मध्य में नहीं रह सकता है। क्योंकि अगर तुम केंद्रित नहीं हो तो तुम नहीं जानते हो कि मध्य का क्या अर्थ है। 7-जो मनुष्य केंद्रित है वह सब बात में सदा मध्य में रहता है; वह कभी अति पर नहीं जाता। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि उसका भोजन सम्यक भोजन होता है; वह न कभी ज्यादा खाता है और न कभी उपवास करता है। उसका श्रम सम्यक श्रम होता है; वह न कभी अति श्रम करता है और न कभी आलस्य करता है। वह जो भी है संतुलित है।

आत्मोपलब्ध व्यक्ति के क्या लक्षण है?-

10 FACTS;- 1-पहली बात है कि आत्मोपलब्ध व्यक्ति केंद्रित होगा। दूसरी बात कि वह संतुलित होगा। और तीसरी बात कि अगर ये दो चीजें ..केंद्रित होना और संतुलित होना ..घटित हो गईं तो बाकी चीजें अपने आप ही उसके पीछे ...पीछे आएंगी।

2-वह सदा विश्राम में, अमन—चैन में होगा; कभी तनाव में नहीं होगा। जो भी परिस्थिति हो, उसका विश्राम, उसकी शांति भंग नहीं होगी।वास्तव में, किसी भी परिस्थिति में, बेशर्त उसकी शाति भंग नहीं होगी। क्योंकि जो केंद्रित है वह सदा विश्राम में है, आराम में है। यदि मृत्यु आ जाए तो भी वह विश्राम में रहेगा। वह मृत्यु का स्वागत वैसे ही करेगा जैसे किसी मेहमान का किया जाता है।दुख आए तो वह उसका भी स्वागत करेगा। जो भी हो, उसको उसके केंद्र से च्‍युत नहीं किया जा सकता। यह विश्राम भी केंद्रित होने की उप -उत्पत्ति है। 3-ऐसे आत्मोपलब्ध व्यक्ति के लिए कुछ भी क्षुद्र नहीं है, कुछ भी महान नहीं है। सब कुछ उसके लिए पवित्र, सुंदर और धार्मिक हो जाता है। वह जो भी करता है, जो भी, वह उसे अन्यतम भाव से करता है। कुछ भी तुच्छ नहीं है। वह यह नहीं कहेगा कि यह तुच्छ है या यह महान है। सच में न कुछ महान है और न कुछ तुच्छ और नगण्य। उस व्यक्ति का स्पर्श महत्वपूर्ण होता है। आत्मोपलब्ध व्यक्ति, संतुलित ..केंद्रित व्यक्ति सब कुछ को बदल देता है, उसका स्पर्श उन्हें बड़ा बना देता है। 4-तुम किसी बुद्ध को देखो, तुम पाओगे कि वे चलते हैं और चलने को भी प्रेम करते हैं। बोधगया , निरंजना नदी के किनारे बोधिवृक्ष के नीचे बैठे हुए ,गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध हुए थे; तो वहां उनके चरण चिह्न सुरक्षित हैं।गौतम बुद्ध एक घंटा ध्यान करते थे फिर आसपास में घूमते थे। बौद्ध शब्दावली में उसे चक्रण कहते हैं।वे बोधिवृक्ष के नीचे बैठते थे, फिर घूमते थे; लेकिन उनका घूमना भी ध्यान जैसा ही होता था ...शांत और पवित्र। 5-किसी ने एक बार बुद्ध से पूछा कि आप ऐसा क्यों करते हैं, कभी आप आख बंद करके ध्यान करते हैं और कभी चलते हैं।गौतम बुद्ध ने कहा कि शांत होने के लिए बैठना आसान है, इसलिए मैं चलता हूं। लेकिन मैं वही शांति साथ लिए हुए चलता हूं। मैं बैठता हूं? लेकिन भीतर वही रहता हूं ..शांत। मैं चलता हूं लेकिन भीतर की शांति वैसी ही बनी रहती है। 6-आंतरिक गुण सदा एकरस है। वे सम्राट से मिलें कि भिखारी से, गौतम बुद्ध वही रहते हैं, उनका आंतरिक गुण एक सा बना रहता है। भिखारी से मिलते समय वे कुछ दूसरे नहीं हो जाते हैं,और सम्राट से मिलते समय भी वे दूसरे नहीं होते। वे वही रहते हैं और सच तो यह है कि बुद्ध से मिलते समय सम्राटों ने अपने को भिखारी महसूस किया है और भिखारियों ने अपने को सम्राट। उनका स्पर्श, उनकी मनुष्यता, उनकी गुणवत्ता एक ही रहती है। 7-अपने जीवन ..काल में हर सुबह गौतम बुद्ध अपने शिष्यों से कहते थे, कुछ पूछना हो तो पूछो। फिर जब उनकाअंतिम दिन था ;उस सुबह भी उन्होंने वही किया। उन्होंने शिष्यों को बुलाया और कहा, कुछ पूछना चाहो तो पूछो। और याद रखो कि यह आखिरी सुबह है। दिन समाप्त होने के बाद मैं नहीं रहूंगा। 8-वे वही थे उस दिन भी! उस सुबह भी दूसरे दिनों की तरह ही उन्होंने कहा, अच्छा, कुछ पूछना है तो पूछ लो, लेकिन यह अंतिम दिन है। उनके स्वर में कोई बदलाहट नहीं थी। लेकिन शिष्य रोने लगे। पूछना तो भूल ही गए।गौतम बुद्ध ने कहा, रोते क्यों हो! किसी और दिन रोते तो ठीक था। यह तो अंतिम दिन है। शाम तक मैं नहीं रहूंगा। इसलिए रोने में समय मत गवाओ। और दिन तुम समय गंवा सकते थे। रोने में समय व्यर्थ मत करो। रोते क्यों हो! कुछ पूछना हो तो पूछ लो। जीवन और मृत्यु, दोनों में वे समान थे। 9-तो तीसरी बात कि व्यक्ति विश्राम में होता है।उसके लिए जीवन और मृत्यु समान हैं, आनंद और दुख समान हैं। कुछ भी उसे अशांत नहीं करता है; कुछ भी उसे अपने घर से, केंद्र से विचलित नहीं करता है। ऐसे व्यक्ति में तुम कुछ जोड़ नहीं सकते,ऐसे व्यक्ति से तुम कुछ घटा नहीं सकते। वह आप्तकाम है। उसका श्वास ..श्वास आप्तकाम है ...शात, आनंदित। वह पा गया है .. पहुंच गया है। वह अस्तित्व को उपलब्ध हो गया है। उसका फूल पूर्ण मनुष्य के रूप में खिल गया है। 10-यहआंशिक खिलावट नहीं है।बुद्ध महाकवि नहीं हैं, यद्यपि वे जो भी कहते हैं वह कविता है। वे कवि बिलकुल नहीं हैं,लेकिन उनके चलने में भी कविता है। वे चित्रकार नहीं हैं, लेकिन जब भी वे बोलते हैं, जो भी वे कहते हैं वह चित्र बन जाता है। वे संगीतज्ञ नहीं हैं,लेकिन उनका पूरा अस्तित्व सर्वश्रेष्ठ संगीत है। यह मनुष्य अपनी समग्रता में उपलब्ध हो गया है। चुपचाप भी बैठा हो तो उसकी उपस्‍थिति काम करती है। सृजन करती है। उनकी उपस्थिति सृजनात्मक है।

क्या है आप्तकाम ?

05 FACTS;-

1-आप्तकाम का अर्थ है.. सत्य का ज्ञाता और सत्यवक्ता या जिसकी इच्छाएँ पूर्ण हो गई हों।सुख की निर्बाध उपलब्धि ही प्राणियों का स्वाभाविक लक्ष्य है। सच्चा सुखी आप्तकाम पुरुष ही होता है और आत्माराम ही आप्तकाम होता है।आप्तकाम हुए बिना अशान्ति तो मिटती नहीं।कामना के पीछे भागने में कितनी भी उसकी पूर्ति प्राप्ति होती रहे विश्राम कहीं नहीं है।

2-भोग उलटे रोग का प्रसाद देता है।सुयश, सम्पत्ति, अधिकार के पीछे संसार के लोग पागल हैं। उन्हें पता तक नहीं चलता कि यह उन्माद उन्हें किस गर्त में ढकेल ले जा रहा है। अधिकार के साथ अशान्ति, सम्पत्ति के साथ चिन्ता, सुयश के साथ अहंकार आदि दोष रहेंगे ही। मनुष्य की सबसे बड़ी असफलता यही है कि वह इन्हें जीवन की सफलता समझता है। जब यह बात सूझने लगे तो समझना चाहिए कि माया नाथ ने अपनी माया उठा लेने का अनुग्रह किया है।’

3- अब आप्तकाम होने में चित्त के चार विकार बाधक रह जाते हैं-मोह, लोभ, काम और क्रोध। मोह और लोभ विषयी पुरुष को अपनाते हैं। ये स्थायी विकार हैं। प्रत्येक अवस्था में ये बने ही रहते हैं। ये मंद गति से बहते हैं, किन्तु बद्धमूल होते हैं। इनको निर्मूल किए बिना कोई साधक

नहीं बनता। लोभ और मोह का उन्मूलन जहाँ हो जाता है, वहाँ से परमार्थ पथ प्रारंभ हो जाता है। साधक में वैराग्य न हो तो साधन कैसे चलेगा और वैराग्य का अर्थ ही है लोभ और मोह का सम्यक् त्याग।’

4-उत्तेजक वातावरण में रहने वाले व्यक्ति का चित्त भी क्रमशः क्षीणसत्व हो जाता है। उसे उत्तेजना प्राप्ति के लिए अधिक उपकरण अपेक्षित होते हैं। चित्त में एक साथ अनेक आवेग नहीं रह सकते। जिनके चित्त में मोह या लोभ जितने प्रबल हैं, उन्हें काम या क्रोध उतने कम अभिभूत कर पाते हैं। लोभी व्यापारी हँस कर अपमान सह लेने में चतुर होता है। किन्तु शुद्ध जल के सरोवर में सामान्य वायु भी लहरें उठाया करती हैं।

5-एक साधु ने स्नेह पूर्वक कहा शरीर की चिन्ता से पागल मत रहा कर‘सूक्ष्म शरीर भी शरीर ही है काम और क्रोध स्थायी वृत्तियाँ नहीं है। ये आवेग हैं, आँधी की भाँति निमित्त के संयोग से आते हैं। आने के पूर्व जिनका पता ही नहीं होता, उन्हें आने से ही तू कैसे रोकेगा? समष्टि में निमित्त आवे ही नहीं, किसी के वश की बात है?’

प्रश्न था ‘तब?’

6-साधु ने कहा-‘आँधी तो आएगी। आने का पता लगे तो भवन के द्वार बन्द कर ले।इनका वेग भीतर ही सहन कर लेने की क्षमता हो जाय तो तू आप्तकाम हो गया। सुखी हो गया। सफल हो गया।जीवन की सफलता यही है कि मनुष्य काम और क्रोध के वेग को सह लेने में सक्षम हो। विश्वास करो जिस दिन तुम यह शक्ति प्राप्त कर लोगे आप्तकाम हो जाओगे।''साधु ने अपनी बात की व्याख्या कर दी-काम और क्रोध के वेग तो आएँगे।वेग को सहने की क्षमता उत्पन्न करो।आने पर सावधान होकर इन्द्रिय के द्वार बन्द कर ले।इनका वेग क्रिया से, शब्द से, शरीर की भाव भंगिमा से बाहर निकले; शरीर छोड़कर ये बाहर जाएँ, इससे पहले ही इन्हें चित्त में शान्त कर ले।

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''आत्मोपलब्ध व्यक्ति केंद्रित होगा''इसका क्याअर्थ है?-

09 FACTS;-

1-तंत्र किसी आंशिक विकास की फिक्र नहीं करता, वह तुम्हारे पूरे अस्तित्व के साथ तुम्हारी चिंता लेता है। इसलिए तीन चीजें बुनियादी हैं। तुम्हें केंद्रित होना है, अपनी जड़ों से संयुक्त होना है। उसका अर्थ है कि तुम्हें सदा मध्य में होना है ..और किसी प्रयत्न के बिना। अगर कोई प्रयत्न है तो तुम संतुलित नहीं हुए। और तुम्हें विश्राम में होना है ..जगत के साथ विश्राम में, अस्तित्व के साथ विश्राम में।और तब बहुत चीजें उसके परिणाम में उसके पीछे -पीछे आती हैं। 2-यह बुनियादी जरूरत है। क्योंकि जब तक यह जरूरत पूरी नहीं होती, तुम नाम के लिए ही मनुष्य हो। तुम यथार्थत: मनुष्य नहीं हो ..हो सकते हो, क्षमता है। लेकिन क्षमता को वास्तविक

बनाना होगा।एक बुनियादी बात समझने जैसी है कि हृदय और मस्तिष्क के केंद्रों का विकास तो करना है, लेकिन नाभि केंद्र का नहीं।नाभि केंद्र को खोज भर लेना है, विकसित नहीं करना है।नाभि केंद्र है, उसे पुन: खोज लेना है।वह पूरी तरह विकसित है, तुम्हें उसका विकास नहीं करना है।

3-हृदय और मस्तिष्क के केंद्र विकास करने की चीजें हैं।उन्हें ढूंढना नहीं है, उनका विकास करना है। समाज, संस्कृति, शिक्षा, संस्कार उनके विकास में सहयोगी होते हैं।लेकिन नाभि केंद्र को लेकर तो तुम पैदा ही होते हो, उसके बिना तुम नहीं हो सकते। तुम हृदय केंद्र के बिना हो सकते हो, तुम मस्तिष्क केंद्र के बिना हो सकते हो।वे जरूरतें हैं, उनका होना अच्छा है। लेकिन तुम उनके बिना भी हो सकते हो। उनके बिना होना असुविधाजनक होगा, लेकिन उनके बिना हुआ जा सकता है। लेकिन नाभि केंद्र के बिना तुम नहीं हो सकते हो। वह जरूरत नहीं है, वह तुम्हारा जीवन है। 4-हृदय केंद्र को कैसे विकसित किया जाए, प्रेम कैसे पैदा किया जाए, संवेदनशीलता कैसे बढ़ाई जाए, कैसे चित्त संवेदनशील हो, इसके लिए विधियां हैं। इसके लिए भी विधियां हैं कि ज्यादा बुद्धिमान, ज्यादा तर्कपूर्ण कैसे हुआ जाए। बुद्धि विकसित की जा सकती है, भाव विकसित किया जा सकता है, लेकिन अस्तित्व को विकसित नहीं किया जा सकता, वह है। उसे पुन: खोज भर लेना है। 5-इसमें कई बातें निहित हैं।एक,हो सकता है कि तुम्हारा मस्तिष्क, तुम्हारी तर्क शक्ति आइंस्टीन जैसी न हो। लेकिन तुम बुद्ध हो सकते हो।आइंस्टीन अपनी पूर्णता में काम करने वाला मस्तिष्क केंद्र है। वैसे ही कोई प्रेमी,अपनी पूर्णता में काम करने वाला हृदय केंद्र है।संभव है कि तुम प्रेमी भी न हो सको, लेकिन तुम बुद्ध हो सकते हो।क्योंकि बुद्धत्व तुम्हारे भीतर विकसित नहीं किया जाना है, वह है ही। वह बुनियादी केंद्र, मौलिक केंद्र, नाभि केंद्र की बात है। वह है ही। तुम बुद्ध हो ही, सिर्फ बेहोश हो। 6-तुम आइंस्टीन नहीं हो, होने की चेष्टा कर सकते हो।और फिर पक्का नहीं है कि तुम आइंस्टीन हो ही जाओ।क्योंकि सच में यह असंभव लगता है।क्यों असंभव लगता है? क्योंकि आइंस्टीन जैसा मस्तिष्क होने के लिए वही वातावरण,वही विकास, वही प्रशिक्षण चाहिए जो आइंस्टीन को मिला था। लेकिन उसे दोहराया नहीं जा सकता, क्योंकि दोहराना असंभव है। पहले तो तुम्हें वही माता पिता खोजने पड़ेंगे, क्योंकि प्रशिक्षण गर्भ में ही शुरू हो जाता है। वही माता पिता खोजने कठिन हैं, असंभव हैं। वही माता पिता जन्म -दिन, वही परिवार, वहीं संगी -साथी कैसे मिलेंगे? आइंस्‍टीन का जीवन हूं-ब-हू दोहराना पड़ेगा।अगर उसका एक बिंदु भी चूक गया तो तुम दूसरे व्यक्ति हो जाओगे। इसलिए यह असंभव है। 7-एक व्यक्ति एक बार ही इस संसार में आता है, क्योंकि वही -वही स्थिति नहीं दोहरायी जा सकती। वही स्थिति बड़ी बात है। उसका अर्थ है कि वैसे ही क्षण में ठीक वैसा ही संसार होना चाहिए। यह संभव नहीं है, असंभव है। और तुम तो यहां आ चुके हो, इसलिए जो भी तुम करोगे उसमें तुम्हारा अतीत सम्मिलित होगा। तुम आइंस्टीन नहीं हो सकते हो, व्यक्तित्व नहीं दोहराया जा सकता। 8-बुद्धत्व कोई व्यक्तित्व नहीं है, बुद्धत्व एक घटना है। इसमें कोई व्यक्तिगत गुण अर्थ नहीं रखते। बुद्ध होने के लिए तुम्हारा होना ही पर्याप्त है। वह केंद्र वहां है ही, मौजूद ही है, केवल तुम्हें उसे आविष्कृत भर करना है। तो हृदय केंद्र की विधियां विकसित करने की विधियां हैं और नाभि केंद्र की विधियां आविष्कृत करने की विधियां हैं। तुम्हें आविष्कृत भर करना है। बुद्ध तो तुम हो ही, केवल तुम्हें इसे जान लेना है। 9-तो दो तरह के लोग हैं। ऐसे बुद्ध जो जानते हैं कि हम बुद्ध हैं और ऐसे बुद्ध जो नहीं जानते कि हम बुद्ध हैं। लेकिन सभी बुद्ध हैं। जहां तक अस्तित्व का सवाल है, सब वही हैं। सिर्फ अस्तित्व में साम्यवाद है, और कहीं भी साम्यवाद असंगत है। बाकी सभी आयामों में कोई समान नहीं है, वहां असमानता बुनियादी है ।लेकिन यहां साम्यवाद से अर्थ है अस्तित्व की, होने की क्षमता। तब तुम बुद्ध, क्राइस्ट,श्रीकृष्ण के समान हो। लेकिन किसी दूसरे अर्थ में कोई दो व्यक्ति समान नहीं हैं। जहां तक बाहरी जीवन का संबंध है, असमानता बुनियादी है। और जहां तक आंतरिक जीवन का संबंध है, समानता बुनियादी है। क्या सभी बुद्धपुरुष नाभि केंद्रित हैं?- 11 FACTS;- 1-सभी बुद्धपुरुष नाभि केंद्रित होते हैं, लेकिन बुद्धपुरुषों की अभिव्यक्ति दूसरे केंद्रों के जरिए हो सकती है। इस भेद को हमें स्पष्ट समझ लेना चाहिए। सभी बुद्धपुरुष नाभि केंद्रित होते हैं; दूसरी संभावना नहीं है। लेकिन अभिव्यक्ति और बात है। 2-उदाहरण स्वरुप स्वामी रामकृष्ण परमहंस अपनी अभिव्यक्ति हृदय के द्वारा करते हैं। वे अपने संदेश के लिए हृदय को माध्यम बनाते हैं। नाभि से जो भी उन्होंने पाया है उसे वे हृदय से प्रकट करते हैं। वे गाते हैं, वे नाचते हैं, वह उनके आनंद की अभिव्यक्ति का ढंग है। लेकिन आनंद नाभि पर मिलता है, अन्यत्र नहीं।स्वामी रामकृष्ण नाभि पर केंद्रित हैं। लेकिन दूसरों को यह कहने के लिए ''पर केंद्रित हूं'' वे हृदय का उपयोग करते हैं। 3-जे.कृष्णमूर्ति (दार्शनिक एवं आध्यात्मिक विषयों के लेखक एवं प्रवचनकार) उस अभिव्यक्ति के लिए मस्तिष्क का उपयोग करते हैं।यही कारण है किउनकी अभिव्यक्तियां परस्पर विरोधी हैं।अगर तुम स्वामी रामकृष्ण को मानते हो तो तुम कृष्णमूर्ति को नहीं मान सकते। और अगर कृष्णमूर्ति पर तुम्हारा भरोसा है तो तुम स्वामी रामकृष्ण पर भरोसा नहीं कर सकते। क्योंकि भरोसा सदा अभिव्यक्ति में केंद्रित होता है, अनुभव में नहीं।स्वामी रामकृष्ण उस आदमी को बचकाने मालूम पड़ेंगे जो बुद्धि से, विचार से जीता है। वह कहेगा, यह क्या नासमझी है—नाचना, गाना? वे क्या कर रहे हैं? बुद्ध कभी नहीं नाचे, ये रामकृष्ण नाच रहे हैं! वे बचकाने लगते हैं। 4-बुद्धि को हृदय सदा बचकाना मालूम पड़ता है। लेकिन हृदय को बुद्धि व्यर्थ, सतही मालूम पड़ती है।कृष्णमूर्ति जो भी कहते हैं वह वही है, अनुभव वही है जो स्वामी रामकृष्ण, चैतन्य महाप्रभु या मीरा को हुआ था। लेकिन अगर व्यक्ति मस्तिष्क केंद्रित है तो उसकी अभिव्यक्ति, उसकी व्याख्या बुद्धिगत होगी। अगर स्वामी रामकृष्ण ,कृष्णमूर्ति को मिलेंगे तो कहेंगे, आइए,हम नाचे। समय क्यों बर्बाद करें? नाचकर उसे ज्यादा आदमी से कहा जा सकता है और वह गहरे जाता है। कृष्णमूर्ति कहेंगे,नाच? नाच से तो आदमी सम्मोहित हो जाता है। नाचे मत। विश्लेषण करें, तर्क करें, बोधपूर्ण हों। 5-अभिव्यक्ति के ये अलग -अलग केंद्र हैं, लेकिन अनुभव एक ही है। कोई अपने अनुभव का चित्र बना सकता है, झेन गुरुओं ने अपने अनुभव का चित्र बनाया। जब वे ज्