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योगकुण्डलिनी उपनिषद में कुण्डलिनी जागरण के लिए वर्णित सहितऔर केवल कुम्भक तथा चार प्रमुख प्राणायाम


प्राणायाम का महत्व;- 09 FACTS;- 1-प्राणायाम से चित्त की शुद्धि होती है। चित्त शुद्ध होने से अन्तःकरण में प्रकाश होता है और उस प्रकाश में आत्म साक्षात्कार होता है।प्राणायाम का साधक श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त करता है। मनस्वी और मनोजयी बनता है।मारकण्डेय पुराण में प्राणायाम के चार स्तर बताये गये हैं और उनके द्वारा उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति होने का प्रतिपादन किया गया है-जैसे सिंह, व्याघ्र और हाथी को सिखा, सधा कर नम्र बना लिया जाता है, वैसे ही प्राणायाम से प्राण वश में होते हैं। 2-जैसे महावत हाथी को अंकुश के बल पर इच्छानुसार चलाता है, वैसे ही योगीजन प्राण से इच्छानुसार काम लेते हैं। जैसे पाला हुआ चीता मृगों को ही मारता है, पालने वाले को नहीं। उसी प्रकार प्राणायाम से सँभाला हुआ प्राण पापों को नष्ट करता है, जीवन को नहीं। 3-प्राणायाम की चार स्थिति हैं;- 3-( 1) ध्वस्ति;- जिससे दूषित कर्मों और मनोविकारों का शमन होता है, उसे ध्वस्ति कहते हैं। 3-( 2) प्राप्ति;- जिससे लोभ, मोह आदि से भरी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, उसे प्राप्ति कहते हैं। 3-( 3) संवित् ;- जिससे ग्रह-नक्षत्र और सूक्ष्म लोकों से सम्बन्ध जुड़ जाता है तथा दिव्य ज्ञान की ज्योति दीप्तिमान होती है। अतीत अनागत और तिरोहित जान लिया जाता है उसे संवित् कहते हैं। 3-( 4) प्रसाद;- जिस स्थिति में पाँचों प्राण तथा दशों इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं, चित्त में आनन्द, उल्लास अनुभव होता है उसे प्रसाद कहतें हैं। 4-प्राणायाम की पहुँच अध्यात्म क्षेत्र के अति महत्वपूर्ण परतों तक है। उसे शारीरिक, मानसिक, व्यायामों का उपचार मात्र नहीं समझना चाहिये। वरन् उसे उच्च-स्तरीय योग साधन ही मानकर चलना चाहिये। पुरश्चरण अनुष्ठानों की सफलता के लिए पूर्व भूमिका के रूप में प्राणायाम विज्ञान की विशेष साधनाएँ कराई जाती हैं। कहा गया है- प्राण रहित होने पर जैसे शरीर में काम करने की कुछ भी क्षमता नहीं रहती, उसी तरह मंत्र की प्राण शक्ति को जब तक जागृत नहीं कर लिया जाता तब तक सैकड़ों पुरश्चरण करने पर भी मंत्र शक्ति से अभीष्ट लाभ की आशा नहीं की जा सकती। 5-प्राणमय कोष का प्राणायाम द्वारा जब परिमार्जन किया जाता है तो प्राण शक्ति की अजस्र धारा उसमें फूट निकलती है। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, यह पाँच प्राण और नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय, यह पाँच उपप्राण ऐसे विद्युत-प्रवाह हैं जिनका सम्बन्ध प्रकृति की सूक्ष्म शक्तियों से है। इन दशों द्वारा प्रकृतिगत प्राण तत्व में से मनुष्य बहुत कुछ अपने लिए खींच सकता है। मूलबन्ध, जालन्धर बन्ध और उड्डियान बन्ध से श्वाँस और नाड़ी तन्तुओं पर अधिकार प्राप्त होता है।लोम-विलोम, प्राणाकर्षण, सूर्यभेदी प्राणायाम, मूर्छाप्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम तथा प्लावनी प्राणायाम यह अपने-अपने क्षेत्र में बड़े ही महत्वपूर्ण हैं। इनसे मृत्यु तक पर विजय प्राप्त की जा सकती है। 6-प्राण को तत्वदर्शियों ने दो भागों में विभक्त किया है- (१) अणु (२) विभु। अणु वह है जो पदार्थ जगत में सक्रिय बनकर परिलक्षित होता है। विभु वह है जो चेतन जगत में जीवन बनकर लहलहा रहा है। इन दो विभागों को आधिदैविक कास्मिक और आध्यात्मिक माइक्रोकास्मिक अथवा हिरण्य गर्भ कहा जाता है।इस अणु शक्ति को लेकर ही पदार्थ विज्ञान का सारा ढाँचा खड़ा किया गया है। विद्युत ताप, प्रकाश, विकरण आदि की अनेकानेक शक्तियाँ उसी स्रोत में गतिशील रहती हैं।

7-अणु के भीतर जो सक्रियता है वह सूर्य की है।विश्व- व्यापी शक्ति भण्डार मात्र अणु शक्ति की भौतिक सामर्थ्य तक ही सीमाबद्ध है।जड़ जगत में शक्ति तरंगों के रूप में संव्याप्त सक्रियता के रूप में प्राण का परिचय दिया जा सकता है और चेतन जगत में सम्वेदना उसे कहा जा सकता है।

8-इच्छा, ज्ञान और क्रिया इसी सम्वेदना के तीन रूप में है। जीवन्त प्राणी इसी के आधार पर जीवित रहते हैं। उसी के सहारे चाहतें, सोचते और प्रयत्नशील होते हैं। इस जीवन शक्ति की जितनी मात्रा जिसे मिल जाती है वह उतना ही अधिक प्राणवान् कहा जाता है। आत्मा को महात्मा, देवात्मा और परमात्मा बनने का अवसर इस प्राण शक्ति की अधिक मात्रा उपलब्ध करने पर ही सम्भव होता है। चेतना की.. विभु सत्ता जो समस्त विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है ,चेतन प्राण कहलाती है। उसी का अमुक अंश प्रयत्न पूर्वक अपने में धारण करने वाला प्राणी-प्राणवान् एवं महाप्राण बनता है।

9-प्राणायाम जीवन का रहस्य है। श्वासों के आवागमन पर ही हमारा जीवन निर्भर है और ऑक्सीजन की अपर्याप्त मात्रा से रोग और शोक उत्पन्न होते हैं। प्रदूषण भरे महौल और चिंता से हमारी श्वासों की गति अपना स्वाभाविक रूप खो ही देती है जिसके कारण प्राणवायु संकट काल में हमारा साथ नहीं दे पाती। योगकुण्डलिनी उपनिषद में वर्णित कुम्भक क्या है?-

02 FACTS;- परिचय;-

सांस को रोककर रखने की क्रिया को कुम्भक कहते हैं। इस प्राणायाम में सांस को अंदर खींचकर या बाहर छोड़कर रोककर रखा जाता है। योग ग्रन्थों में कुम्भक 2 प्रकार का बताया गया है-

1-आन्तरिक कुम्भक;-

इस क्रिया में दोनों नासा छिद्रों से वायु को अंदर खींचकर जितनी देर तक सांस को रोकना संभव हो रोककर रखा जाता है और फिर बाहर छोड़ दिया जाता है।

2-बाहरी कुम्भक;-

इस क्रिया में दोनों नासा छिद्रों से वायु को बाहर छोड़कर जितनी देर तक सांस रोकना संभव रोककर रखा जाता है और फिर सांस को अंदर खींचा जाता है।

सहित कुम्भक और केवल कुम्भक क्या है?- 1-सहित कुम्भक;-

सहित कुम्भक वह प्राणायाम है, जिसके साथ मंत्र आदि का जाप किया जाता है और केवल कुम्भक वह प्राणायाम है, जिसमें मंत्र या गिनती आदि के बिना अभ्यास किया जाता है। सहित कुम्भक प्राणायाम को 2 विधियों द्वारा किया जाता है, परन्तु हठयोग के ज्ञानियों ने इसे 3 भागों में बांटा हैं- कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम।

सहित कुम्भक की तीनों विधियां;-

1-1-सहित कनिष्ठ;-

02 FACTS;-

1-इस प्राणायाम के अभ्यास के लिए स्वच्छ-साफ व शांत तथा एकांत स्थान पर पद्मासन की स्थिति में बैठकर अपने सिर, गर्दन, पीठ व छाती को सीधा रखते हुए अभ्यास करना चाहिए। आसन की इस स्थिति में बैठकर अपने दाएं हाथ को नाक की दाईं तरफ रखें और बाएं हाथ को घुटनों पर रखें। इसके बाद दाहिने अंगूठे से नाक के दाएं छिद्र को बन्द करके ´ॐ´ का मन ही मन 8 बार जाप करते हुए बाएं छिद्र से सांस अन्दर खींचें (पूरक करें)।

2-फिर सांस को अन्दर रोककर रखें (कुम्भक करें) और ´ॐ´ का 32 बार जाप करें। इसके बाद सांस को धीरे-धीरे छोड़ते हुए ´ॐ´ का 16 बार जाप करें। सांस को बाहर निकालते समय नाक के बाएं छिद्र को बन्द करके वायु को नाक के दाएं छिद्र से बाहर निकालें। इसके बाद पुन: दाएं छिद्र से ही सांस अन्दर खींचते हैं और पहले की तरह ही क्रमानुसार सांस को अन्दर रोककर ´ॐ´ का जाप करते हैं। फिर नाक के दाएं छिद्र को बन्द करके नाक के बाएं छिद्र से सांस को बाहर निकाल देते हैं। प्राणायाम की इस क्रिया को कनिष्ठ प्राणायाम कहते हैं।

1-2-सहित मध्यम;-

इस प्राणायाम में भी सभी क्रिया पहले के समान ही होती है। केवल इसमें मंत्र और संख्या की गिनती बदल जाती है। इस क्रिया में पहली बार सांस अन्दर खींचते हुए 16 बार ´ॐ´ का जाप करना होता। फिर सांस को अन्दर रोककर 64 बार ´ॐ´ का जाप करना होता है और फिर सांस को बाहर निकालते हुए 32 बार ´ॐ´ का जाप करना होता है।

1-3-सहित उत्तम;-

सहित प्राणायाम की सबसे अच्छी विधि वह है, जिसमें ´ॐ´ का जाप करने की संख्या अधिक होती है। इस क्रिया में ´ॐ´ का जाप करने की संख्या दूसरे से दुगनी हो जाती है। इस क्रिया में सांस अन्दर खींचते हुए 32 बार ´ॐ´ का जाप किया जाता है और सांस को अन्दर रोककर 128 बार ´ॐ´ का जाप किया जाता है। अंत में सांस को बाहर निकालते हुए 64 बार ´ॐ´ का जाप किया जाता है। इन तीनों प्राणायाम के अभ्यास में आसन व स्थिति समान रखनी होती है।

NOTE;-

04 FACTS;-

1-इन तीनों सहित प्राणायाम के अभ्यास में सांस पहले नाक के बाएं छिद्र से ही लिया जाता है (पूरक किया जाता है)। फिर सांस को अन्दर रोककर रखा जाता है (कुम्भक किया जाता है) और फिर बाएं छिद्र को बन्द करके दाएं छिद्र से सांस को बाहर छोड़ा जाता है (रेचक किया जाता है)। पुन: सांस को दाएं छिद्र से ही लिया जाता है और दूसरे छिद्र से सांस को बाहर निकाला जाता है। यह एक अच्छा प्राणायाम है।

2-सहित प्राणायाम की तीनों क्रियाओं से रोगों में लाभ होता है।इसके अभ्यास से शरीर में शारीरिकं शक्ति का विकास होता है और शरीर चुस्त-दुरुस्त व स्फूर्तिवान बनता है। इसके अभ्यास से चेहरे पर तेज व चमक आती है। इससे मन प्रसन्न व शांत रहता है।मानसिक परेशानी दूर होती है। इसके अभ्यास से व्यक्ति कई दिनों तक बिना कुछ खाये-पीये रह सकता है अर्थात इसके द्वारा भूख-प्यास पर नियंत्रण किया जा सकता है।

3-इस प्राणायाम से मन व इन्द्रियां वश में रहती हैं। इसका अभ्यास ध्यान व समाधि जैसी योगसाधना के लिए लाभकारी होता है। 4-जब तक केवली कुम्भक सिद्ध न हो ,तब तक सहित कुम्भक का अभ्यास करना चाहिये । ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; 2-केवली कुम्भक;-(अदभुत चमत्कारिक यौगिक क्रिया ” केवल निधि )

03 FACTS;- 1-जिसको केवली कुम्भक सिद्ध हो जाता है, वह पूजने योग्य बन जाता है । यह योग की एक ऐसी कुंजी है कि छ: महीने के दृढ़ अभ्यास से साधक फिर वह नहीं रहता जो पहले था । उसकी मनोकामनाएँ तो पूर्ण हो ही जाती हैं, उसका पूजन करके भी लोग अपनी मनोकामना सिद्ध करने लगते हैं ।

2-जो साधक पूर्ण एकाग्रता से इस पुरुषार्थ को साधेगा, उसकी व्यापकता बढ़ती जायेगी । महानता का अनुभव होगा । वह अपना पूरा जीवन बदला हुआ पायेगा।बहुत तो क्या,

तीन ही दिनों के अभ्यास से चमत्कार घटेगा । तुम, जैसे पहले थे वैसे अब न रहोगे । काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि षडविकार पर विजय प्राप्त करोगे।

3-काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि : “मेरे चिरजीवन और आत्मलाभ का कारण प्राणकला ही है ।”

केवली की विधि;-

04 FACTS;-

1-इस प्राणायाम का अभ्यास पदमासन, सुखासन या सिद्धासन में बैठकर किया जाता है। इसे साफ व एकान्त स्थान पर करें। इस प्राणायाम का अभ्यास बिना रेचक व पूरक किए ही किया जाता है। इसके अभ्यास में सांस को अपने इच्छानुसार जहां का तहां रोककर रखा जाता है (कुम्भक किया जाता है)। इसलिए इस प्राणायाम को केवली या प्लाविनी प्राणायाम कहा जाता है।

2-स्वच्छ तथा उपयुक्त वातावरण में सिद्धासन में बैठ जाएं।मस्तक, ग्रीवा और छाती एक ही सीधी रेखा में रहें । दोनों नासिका (नाक के छिद्र) से वायु को तब तक अंदर खींचे, जब तक फेफड़े समेत पेट में पूर्ण रूप से वायु न भर जाएं।इसके बाद क्षमता अनुसार श्वास को रोककर रखें। फिर दोनों नासिका छिद्रों से धीरे-धीरे श्वास छोड़ें अर्थात वायु को बाहर निकालें। इस क्रिया को अपनी क्षमता अनुसार कितनी भी बार कर सकते हैं।

3-रेचक और पुरक किए बिना ही सामान्य स्थिति में श्वास लेते हुए जिस अवस्था में हो, उसी अवस्था में श्वास को रोक दें। फिर चाहे श्वास अंदर जा रही हो या बाहर निकल रही हो। कुछ देर तक श्वासों को रोककर रखना ही केवली प्राणायाम है।

4-इस समग्र प्रक्रिया के दौरान प्रणव का मानसिक जप जारी रखो।इस तरह इस क्रिया को तब तक करें, जब तक आप की इच्छा हो।

विशेष विधि :-

11 FACTS;-

1-त्रिबंध ;-

1-1-एक खास महत्व की बात तो यह है कि श्वास लेने से पहले गुदा के स्थान को अन्दर सिकोड़ लो यानी ऊपर खींच लो। यह है मूलबन्ध।

1-2-अब नाभि के स्थान को भी अन्दर सिकोड़ लो ।यह हुआ उड्डियान बन्ध ।

1-3-तीसरी बात यह है कि जब श्वास पूरा भर लो तब ठोंड़ी को, गले के बीच में जो खड्डा है-कंठकूप, उसमें दबा दो । इसको जालन्धर बन्ध कहते हैं।

1-4-इस त्रिबंध के साथ यदि प्राणायाम होगा तो वह पूरा लाभदायी सिद्ध होगा एवं प्राय: चमत्कारपूर्ण परिणाम दिखायेगा।

2-इस त्रिबन्धयुक्त प्राणायाम की प्रक्रिया में एक सहायक एवं अति आवश्यक बात यह है कि आँख की पलकें न गिरें । आँख की पुतली एकटक रहे। आँखें खुली रखने से शक्ति बाहर बहकर क्षीण होती है और आँखे बन्द रखने से मनोराज्य होता है । इसलिए इस प्राणायम के समय आँखे अर्द्धोन्मीलित रहें आधी खुली, आधी बन्द । वह अधिक लाभ करती है ।

3-एकाग्रता का दूसरा प्रयोग है जिह्वा को बीच में रखने का । जिह्वा तालू में न लगे और नीचे भी न छुए । बीच में स्थिर रहे । मन उसमें लगा रहेगा और मनोराज्य न होगा । परंतु इससे भी अर्द्धोन्मीलित नेत्र ज्यादा लाभ करते हैं ।

4-प्राणायाम के समय भगवान का ध्यान भी एकाग्रता को बढ़ाने में अधिक फलदायी सिद्ध होता है ।मन आत्मा में लीन हो जाने पर शक्ति बढ़ती है क्योंकि उसको पूरा विश्राम मिलता है । मनोराज्य होने पर बाह्म क्रिया तो बन्द होती है लेकिन अंदर का क्रियाकलाप रुकता नहीं । इसीसे मन श्रमित होकर थक जाता है । प्राणायाम के बाद त्राटक की क्रिया करने से भी एकाग्रता बढ़ती है, चंचलता कम होती है, मन शांत होता है।

5-प्राणायाम करके आधा घण्टा या एक घण्टा ध्यान करो तो वह बड़ा लाभदायक सिद्ध होगा ।

एकाग्रता बड़ा तप है। रातभर के किए हुए पाप सुबह के प्राणायाम से नष्ट होते हैं । साधक निष्पाप हो जाता है । प्रसन्नता छलकने लगती है ।

6-जप स्वाभाविक होता रहे यह अति उत्तम है । जप के अर्थ में डूबे रहना, मंत्र का जप करते समय उसके अर्थ की भावना रखना । कभी तो जप करने के भी साक्षी बन जाओ । ‘वाणी, प्राण जप करते हैं । मैं चैतन्य, शांत, शाश्वत् हूँ ।’ खाना पीना, सोना जगना, सबके साक्षी बन जाओ । यह अभ्यास बढ़ता रहेगा तो केवली कुम्भक होगा ।

7-प्राणायाम करते करते सिद्धि होने पर मन शांत हो जाता है । मन की शांति और इन्द्रियों की निश्चलता होने पर बिना किये भी कुम्भक होने लगता है । प्राण अपने आप ही बाहर या अंदर स्थिर हो जाता है और कलना का उपशम हो जाता है । यह केवल, बिना प्रयत्न के कुम्भक हो जाने पर केवली कुम्भक की स्थिति मानी गई है।

8-ध्यान के प्रारंभिक काल में चेहरे पर सौम्यता, आँखों में तेज, चित्त में प्रसन्नता, स्वर में माधुर्य आदि प्रगट होने लगते हैं । ध्यान करनेवाले को आकाश में श्वेत त्रसरेणु (श्वेत कण) दिखते हैं । यह त्रसरेणु बड़े होते जाते हैं।जब ऐसा दिखने लगे तब समझो कि ध्यान में सच्ची प्रगति हो रही है ।

9-केवली कुम्भक सिद्ध करने का एक तरीका और भी है।रात्रि के समय चाँद की तरफ दृष्टि एकाग्र करके, एकटक देखते रहो।अथवा, आकाश में जितनी दूर दृष्टि जाती हो, स्थिर दृष्टि करके, अपलक नेत्र करके बैठे रहो । अडोल रहना । सिर नीचे झुकाकर खुर्राटे लेना शुरु मत करना।सजग रहकर, एकाग्रता से चाँद पर या आकाश में दूर दूर दृष्टि को स्थिर करो ।

निद्रा, तन्द्रा, मनोराज्य, कब्जी, स्वप्नदोष, यह सब योग के विघ्न हैं।उनको जीतने के लिए संकल्प काम देता है ।

10-योग का सबसे बड़ा विघ्न है वाणी ।मौन से योग की रक्षा होती है।नियम से और रुचिपूर्वक किया हुआ योगसाधन सफलता देता है ।निष्काम सेवा भी बड़ा साधन है किन्तु सतत बहिर्मुखता के कारण निष्काम सेवा भी सकाम हो जाती है ।देह में जब तक आत्म सिद्धि है तब तक पूर्ण निष्काम होना असंभव है ।

11-केवली कुम्भक प्राणायाम, तैराकों के लिए केवली कुम्भक प्राणायाम को साधना नहीं पड़ता । तैराक लोग इसे अनंजाने में ही साध लेते हैं फिर भी वे इसे विधिवत करके साधें तो तैरने की गति और स्टेमिना और बढ़ सकता है।केवली प्राणायाम को कुम्भकों का राजा कहा जाता है। दूसरे सभी प्राणायामों का अभ्यास करते रहने से केवली प्राणायाम स्वत: ही घटित होने लगता है। लेकिन फिर भी साधक इसे साधना चाहे तो साध सकता है।

विशेषता;-

इस कुम्भक की विशेषता यह है कि यह कुम्भक अपने आप लग जाता है और काफी अधिक देर तक लगा रहता है। इसमें कब पूरक हुआ, कब रेचक हुआ, यह पता नहीं लगता। इसका अभ्यास करने से उसका श्वास-प्रश्वास इतना अधिक लंबा और मंद हो जाता है कि यह भी पता नहीं रहता कि व्यक्ति कब श्वास-प्रश्वास लेता-छोड़ता है। इसके सिद्ध होने से ही योगी घंटों समाधि में बैठें रहते हैं। यह भूख-प्यास को रोक देता है।

इसका लाभ;-

02 FACTS;-

1-यह प्राणायाम कब्ज की शिकायत दूर कर पाचनशक्ति को बढ़ाता है। इससे प्राणशक्ति शुद्ध होकर आयु बढ़ती है। यह मन को स्थिर व शांत रखने में भी सक्षम है। इससे स्मरण शक्ति का विकास होता है। इससे व्यक्ति भूख को कंट्रोल कर सकता है और तैराक पानी में घंटों बिना हाथ-पैर हिलाएं रह सकता है।

2-इस प्राणायाम के सिद्ध होने से व्यक्ति में संकल्प और संयम जागृत हो जाता है। वह सभी इंद्रियों में संयम रखने वाला बन जाता है। ऐसे व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ति होने लगती हैं। इसके माध्यम से सिद्धियां भी प्राप्त की जा सकती है।

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योगकुण्डलिनी उपनिषद में वर्णित चार प्राणायाम;- योगकुण्डलिनी उपनिषद में वर्णित चार प्राणायाम कुछ इस प्रकार हैं... 1-सूर्यभेदी (केवल शीतकाल के लिए) 2-शीतली(केवल ग्रीष्मकाल के लिए)

3-उज्जई 4-भस्त्रिका सूर्यभेदी (केवल शीतकाल के लिए);-

02 FACTS;-

1-सूर्यभेदन प्राणायाम के नियमित अभ्यास से शरीर के अंदर गर्मी उत्पन्न होती है । ये सर्दियों में किया जाने वाला प्राणायाम है ।इसमें पूरक दायीं नासिका से करते हैं। दायीं नासिका सूर्य नाड़ी से जुड़ी मानी गई है। इसे ही सूर्य स्वर कहते हैं। इस कारण इसका नाम सूर्य भेदन प्राणायाम है।श्वास लेने की सभी प्रक्रियाओं में प्राण ऊर्जा ..पिंगला या सूर्यनाड़ी के माध्यम से जाती है। इडा या चंद्रनाड़ी के माध्यम से श्वास छोड़ा जाता है। यहां श्वास का प्रवाह नियंत्रित होता है और फेफड़े ज्यादा ऊर्जा शोषित करते हैं।

2-सर्दी है या सर्दी के दिनों में बहुत ज्यादा ठंड लगती हो तो बायाँ स्वर बंद करके ….दायें नथुने से श्वास लो, एक मिनट रोको और “रं रं” का जप करो और छोड़ते समय दाया बंद करके बाएं से छोड़े… ऐसा दो बार करें, इससे बिना दवाई के सर्दी गायब हो जाती है ।सूर्यभेदी प्राणायाम में विशेष है...धीमी गति में दाए नाक से सांस लेना यथाशक्ति रोकना और बाए से धीरे धीरे छोड़ना।

सूर्यभेदी प्राणायाम करने की विधि ;-

11 FACTS;-

1-सबसे पहले इस प्राणायाम को करने के लिए किसी साफ़ – सुथरी जगह का चुनाव करे। अब जमीन पर चटाई बिछा ले। 2 -सबसे पहले किसी समतल और स्वस्छ जमीन पर चटाई बिछाकर उस पर पद्मासन, सुखासन सिद्धासन या की अवस्था में बैठ जाएं। 3 -सिर को सीधा करके बैठते है| 4 -सबसे पहले बाये हाथ के अंगूठे से बाये नाक को बंद कर लेते है | 5 -फिर दाए नाक से धीमी गति में साँस लेते है | 6 -ध्यान रहे साँस लेने में कोई गति और ध्वनि नहीं होनी चहिये | 7 -ठोड़ी (chin) को सीने (जालंधरबंध) की ओर मजबूती से दबाते हुए यथाशक्ति श्वास रोके रखें। 8 -अब पुनः सिर को सीधा करते है | 9 -अंत में दाए नाक से धीमी गति से छोर देते है |

10-किसी भी सुखासन में बैठकर मेरुदंड सीधा रखते हुए दाएं से प्रणव मुद्रा बनाते हैं और अंगुली को रखते हैं दायीं नासिका पर, फिर बायीं नासिका बंद कर दायीं नासिका से पेट और सीना फुलाते हुई पूरक क्रिया करते हैं। यथाशक्ति कुम्भक करने के बाद बंद हटाकर बायीं नासिका से रेचक करते हैं।

11-इसमें प्रारम्भ में पूरक, रेचक और कुम्भक एक, चार और दो रशों में करते हैं। बाद में धीरे-धीरे बढ़ाकर पूरक-15, कुम्भक-60 और रेचक-30 रशों में करें। रशों अर्थात जितनी भी देर भी आप पूरक करते हैं उससे दो रेचक और चार गुना कुम्भक करें। जैसे यदि आप 15 सेकंड पूरक करते हैं तो 60 सेकंड कुम्भक करें और फिर 30 सेकंड रेचक करें। सावधा‍नी :-

पूरक करते समय पेट और सीने को ज्यादा न फुलाएं। श्वास पर नियंत्रण रखकर ही पूरक क्रिया करें। पूरक-रेचक करते समय श्वास-प्रश्वास की आवाज नहीं आनी चाहिए। प्राणायाम बंद कमरे में न करें और न ही पंखे में। प्राणायाम के अभ्यास के लिए साफ-सुथरे वातावरण की जगह होना चाहिए। प्राणायाम का लाभ :-

02 FACTS;-

1-सूर्यभेदन प्राणायाम के नियमित अभ्यास से शरीर के अंदर गर्मी उत्पन्न होती है। सर्दियों के दिनों में इस प्राणायाम का अभ्यास किया जाए जो कफ संबंधी रोगों में यह लाभदायक है। नजला, खांसी, दमा, साइनस, लंग्स, हृदय और पाइल्स के लिए भी यह प्राणायाम लाभदायक है।

2-सूर्यभेदन प्राणायाम के नियमित अभ्यास से सकारात्मक विचारों का संचार करने में सहयोगी है। जब हमारी सोच सकारात्मक बन जाती है तो उसके परिणाम भी सकारात्मक आने लगते है ।और इसके साथ-साथ ही इसके अभ्यास से मन और मस्तिष्क को शांति मिलती हैं। सावधानिया;-

05 FACTS;- 1-उच्च-रक्तचाप एवं उष्ण प्रकर्ति के व्यक्तियों को इसे नही करना चाहिए । 2-यह प्राणायाम हमेशा खाली पेट करना चाहिए ।

3-इस प्राणयाम की अविधि एक साथ नहीं बढानी चाहिए । इस प्राणायाम का अभ्यास साफ-स्वच्छ हवा बहाव वाले स्थान पर करें।

4-पूरक करते समय पेट और सीने को ज्यादा न फुलाएं। श्वास पर नियंत्रण रखकर ही पूरक क्रिया करें। 5-उच्च रक्तचाप से पीड़ित से व्यक्ति को ये प्राणायाम नहीं करना चाहिए। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

2-शीतली प्राणायाम (केवल ग्रीष्मकाल के लिए);-

02 FACTS;- 1-"शीतली" शब्द का अर्थ है "ठंडा करने वाला", यानी वह प्रक्रिया जो हमारे शरीर को शांत कर सकती है और शीतलता की भावना दे सकती है। शीतली शब्द को मूल रूप से "शीतल" शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है ठंडा या सुखदायक। शीतली प्राणायाम का दैनिक अभ्यास शरीर के साथ मन को शांत करता है। शीतली प्राणायाम का मूल उद्देश्य शरीर के तापमान को करना होता जिससे हमारे तंत्रिका तंत्र और अंतःस्रावी ग्रंथियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।शीतली प्रणायाम छायादार वृक्ष की तरह है जो भरपूर ऑक्सिजन का निर्माण करते हैं।

2-इस प्राणायाम का अभ्यास करने से व्यक्ति युवा और आकर्षक हो जाता है और इसका दैनिक अभ्यास प्यास और भूख को नियंत्रित करने में आपको सक्षम बनाता है।शीतली प्राणायाम कुछ हद तक शीतकारी प्राणायाम के जैसा है और दोनो का ही उल्लेख प्राचीन पाठ "हठ योग प्रदीपिका" में किया गया है।

विधि :-

06 FACTS;-

1-सर्व प्रथम रीढ़ को सीधा रखते हुए किसी भी सुखासन में बैठ जाएं या किसी भीआरामदायक

ध्यान करने के आसन में बैठ जायें। हाथों को चिन या ज्ञान मुद्रा में घुटनों पर रख ले। 2-आँखें बंद कर लें और पूरे शरीर को शिथिल करने की कोशिश करें। 3-जहां तक संभव हो सके तनाव के बिना जीभ को मुंह के बाहर बढ़ाएं।जीभ के किनारों को रोल करें ताकि यह एक ट्यूब या नालिका जैसी बन जाए।हवा नलीनुमा इस ट्यूब से गुजरकर मुंह, तालु और कंठ को ठंडक प्रदान करेगी। इस ट्यूब के माध्यम से साँस अंदर लें। 4-साँस लेने के अंत में, जीभ को मुंह में वापिस अंदर ले लें और बंद कर लें। नाक के माध्यम से साँस छोड़ें। 5-श्वास लेते समय तेज हवा के समान ध्वनि उत्पन्न होनी चाहिए।जीभ और मुंह की छत पर बर्फ़ीली शीतलता का अनुभव होगा।यह एक चक्र है। 6- नौ चक्र करें।

सावधानी :-

04 FACTS;-

1-शीतली प्राणायाम के समय सांस लयबद्ध और गहरी होना चाहिए। प्राणायाम के अभ्यास के बाद शवासन में कुछ देर विश्राम करें।

2-जहां तक संभव हो सूर्योदय या सूर्यास्त के समय ही यह प्रणायम करें। ते