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अनासक्ति कर्म योग का तत्वज्ञान


अनासक्ति;-

राग और द्वेष से असंपृक्त हो जाना ही अनासक्ति है। महात्मा गाँधी ने गीता के श्लोकों का सरल अनुवाद करके अनासक्ति योग का नाम दिया।गांधी जी कहते थे कि गीता का मुख्य उद्देश्य अनासक्ति के सिद्धांत का प्रतिपादन करना है। उन्होंने संपूर्ण गीता का सार ' अनासक्ति योग ' नाम से तैयार किया। इसका संदेश आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है , आवश्यकता है उसे समझने एवं अनुसरण करने की। कर्तव्य कर्म करते समय निष्पृह भाव में चले जाना ही अनासक्त भाव है। बुद्ध ने इसे 'उपेक्षा' कहा है।

अनासक्त होने का अर्थ यह नहीं है कि हमें किसी वस्तु या किसी व्यक्ति की संगति का आनन्द उठाने की अनुमति नहीं है। बल्कि इसका अर्थ है कि किसी वस्तु या व्यक्ति के मोह में बहुत मज़बूती से जकड़े होने के कारण हम कष्ट भोगते हैं। हम उस वस्तु या व्यक्ति पर आश्रित हो जाते हैं और सोचने लगते हैं, “यदि यह वस्तु या व्यक्ति मुझसे बिछुड़ जाए या सदा मेरे पास न रहे तो मैं बहुत दुखी हो जाऊँगा।” अनासक्ति का अर्थ है, “यदि मुझे मेरी पसन्द का भोजन मिलता है, तो बहुत अच्छा होगा। यदि नहीं मिलता है, तब भी ठीक है। आखिर, भोजन ही तो सब कुछ नहीं है।” उसके प्रति किसी प्रकार की आसक्ति या भावनात्मक रूप से निर्भरता का भाव नहीं होता है।

अनासक्ति का अर्थ यह नहीं कि जो कुछ आप करें उसमें आपको रुचि न हो। उसकी अच्छाई बुराई सफलता असफलता की चिन्ता न करें। ऐसा करने से तो कोई भी कार्य करने में लापरवाही ही रहेगी। यदि अनासक्ति का अर्थ असम्बन्ध, अरुचि अथवा निरपेक्षता लिया जायेगा तो कोई भी कार्य कुशलता पूर्वक नहीं किया जा सकता। बिना कोई आशा रक्खे कोई भी काम करने में मनुष्य का मन न लगेगा। किसी कार्य में लाभालाभ का विचार ही उस कर्म में रुचि उत्पन्न करता है। जब मनुष्य असफलता का भय और सफलता की आशा लेकर कार्य करेगा तभी उसको संलग्नता और उत्तरदायित्व पूर्ण ढंग से कर सकेगा अन्यथा नहीं।

एक ओर कहा गया है कि मनुष्य का कर्म में अधिकार है, उसे हर अच्छा बुरा काम करने की स्वतन्त्रता है। पर दूसरी ओर निर्देश है कि मनुष्य सब कुछ करता हुआ भी कुछ नहीं करता। वह एक माध्यम मात्र, है, उसकी समस्त क्रियायें परमात्मा द्वारा प्रेरित होती हैं। विराट-पुरुष परमात्मा ही सारे कर्मों का कारण है।

यह दोनों कथन देखने में एक दूसरे के विरोधी प्रतीत होते हैं। जब मनुष्य किसी शक्ति की प्रेरणा से यंत्रवत् कार्य करता है तब वह कर्मों में स्वतंत्र, उसका उत्तरदायी किस प्रकार ठहराया जा सकता है? और यदि वह कर्मों में स्वतन्त्र है, अच्छा बुरा जो चाहे कर सकता है तब किसी शक्ति की प्रेरणा की बात कैसे टिक सकती है?

इन कथनों के विरोधाभास को समझने के लिये गहराई से विचार करने की आवश्यकता है! मनुष्य में जो चेतना पूर्ण गतिवत्ता है उसका कारण तो वह विराट-शक्ति है किन्तु कर्मगति की दिशा मनुष्य की अपनी है। परमात्मा विद्युत की भाँति गतिशीलता की शक्ति तो देता किन्तु उस शक्ति से संचलित मनुष्य-यंत्र किस ओर जाता है इसका उत्तरदायी वह नहीं है! विद्युत धारायें केवल प्रेरणा देती हैं अब आगे उपभोक्ता का कर्तव्य है कि वह उसका उपयोग रोशनी करने में करता है या किसी के प्राण लेने में। गैस मोटर को ढकेलती भर है उसके चलने के ढंग का उत्तरदायित्व संचालक पर है।

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गीता द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मविद्या के प्रमुख आधार अनासक्ति - योग में दो शब्द हैं - एक अनासक्ति और दूसरा योग। अनासक्ति निषेधात्मक और योग विधेयात्मक पद हैं। विषयों के प्रति आसक्ति का निषेध अनासक्ति है। केवल निषेध या अस्वीकृति से योजना पूर्ण नहीं होती। एक के परित्याग द्वारा रिक्त स्थान की पूर्ति हेतु कुछ की स्वीकृति आवश्यक है। असत् की अस्वीकृति के साथ सत् की स्वीकृति की प्रक्रिया चल पड़ती है।

योग का अर्थ है जोड़ना। कुछ अवाँछित, अनावश्यक जीर्ण के ध्वंस के भूमिका पर नव-निर्माण स्वाभाविक है। इसी प्रकृति की प्रक्रिया के ज्ञानपूर्वक अनासक्त चित्त को भगवान में जोड़ने की प्रवृत्ति योग है।

वस्तुतः विषय-भोग से निवृत्ति की क्रिया के साथ विराट् भगवान् की ज्ञान-भक्ति, कर्मपरक प्रवृत्ति की क्रिया का कुशलतापूर्वक ताल-मेल बिठाना ही अनासक्ति योग है।

प्रायः अनासक्ति का नितान्त गलत मायना लगाया जाता है। प्रचलित धारण के मुताबिक संसार से अलग हो जाना वैराग्य या अनासक्ति है। इसी तरह पारिवारिक सामाजिक तथा लौकिक-साँसारिक दायित्व की पूर्ति हेतु किये गये कर्म को आसक्ति कह देते हैं। इस मान्यता से निष्क्रियता- अकर्मण्यता की स्थिति उत्पन्न होती है।

वास्तव में अनासक्ति का सही अभिप्रायः कर्म-फल के त्याग से ही है। तभी तो गीताकार भगवान कृष्ण महाभारत के युद्ध के सर्वाधिक सक्रिय तत्व होकर भी अनासक्त रहते हैं। जय-पराजय, मानापमान, सुख-दुख आदि के द्वन्द्वों से परे रहना भगवान की एक दिव्य स्थिति है। यही है संसार में रहते हुए साँसारिक विषयों से अप्रभावित रहने की कला ‘अनासक्ति’।

मानव जीवन का परम लक्ष्य है पूर्णता। ‘पूर्णता’ भगवत्-प्राप्ति का आधार और स्वरूप भी हैं। भगवान के गुणों को ग्रहण करते हुए उनके सदृश बन जाना ही उनकी प्राप्ति अथवा उनका साक्षात्कार कहलाता है। यह उपलब्धि अनासक्ति - योग से सम्भव है।

इस योग की सम्पूर्ण साधना में लोकहित के लिए कर्म करते हुए स्वयं को फलासक्ति के मोह का पूर्ण परित्याग करना पड़ता है। अनासक्ति को साधन और उसे ही साध्य मानकर समस्त कर्तव्य किये जाते हैं। यही कारण है कि महात्मा गाँधी कहा करते थे - ‘हमें भगवान की प्राप्ति नहीं करनी है, बल्कि भगवान बनना है। जब तक मनुष्य भगवान नहीं बन जाता तब तक शान्ति नहीं प्राप्त होती।”

जहाँ तक भगवान बनने का सम्बन्ध है वह तो विगत जमाने के तीन महापुरुष शंकर, रामानुज और तिलक के ज्ञान-भक्ति-कर्म के योगत्रय की समवेत साधना पूर्ण अनासक्ति की प्राप्ति से ही सम्भव है। ज्ञानयोग से वैराग्य रूपी वैचारिक अनासक्ति, भक्तियोग से भावनात्मक अनासक्ति और कर्मचोग से विषय विकारों सम्बन्धी अनासक्ति प्राप्त होती है।

अतएव अनासक्ति को परम लक्ष्य या साध्य इष्टदेव मानने वाला पूर्ण मंजिल तक पहुँचने के लिए अपना कर्तव्य सम्यक् प्रकारेण पहले निश्चित कर लेता है। तभी सबसे प्रेम, सबकी सेवा, आत्मवत् सर्वभूतेषु का प्रयोग, समाज एवं वसुधा को कुटुम्ब मानकर अपने सर्वस्व का उनके हित समर्पण ही उसके जीवन का सहज व्यवहार बन जाता है।

पर्याप्त काल पर्यन्त एक लक्ष्य के प्रति नियमितता और निरन्तरतापूर्वक जुटे रहने पर मंजिल नजदीक आने लगती है। एक राह पर सतत् चलते रहने की स्थिति मात्र एक विलक्षण रस का सृजन करती है। उस रस-सागर में मानसिक अवगाहन से ही परमानन्द पीयूष-पान के विशिष्ट स्वाद की सुखद अनुभूति मिलती है।

परन्तु इसी बीच कर्मफल अपना रंग दिखाता ह। साधना पथ पर आरुढ़ कर्मठ तपस्वी को और कुछ मिले या न मिले, मान- बड़ाई की वर्षा होने लगती है। यही सबसे बड़ा बाधा, विघ्न या खतरा है। आने वाली शेष आपत्तियों का यही मूलाधार बन जाती है। कंचन कामिनी के त्यागी को भी मान-बड़ाई का आकर्षण पतन के गर्त में धकेल सकता है।

ज्ञानयोग द्वारा बुद्धितत्त्व, कर्मयोग द्वारा इच्छा तत्व और भक्तियोग द्वारा भाव तत्व की प्रवृत्तियों को निर्मूल करने का विधान है। इससे कर्मफल की कामना मिट जाती है। तब सहज ही समग्र दृष्टि केवल लक्ष्य पर केन्द्रित हो जाती है। यही सहज लक्ष्य तो अनासक्ति है।

इसी अनासक्ति को निष्काम कर्मयोग के रूप में साधन कहा गया है किन्तु दूसरी ओर यही अनासक्ति साध्य भी है। ‘अनासक्ति’ इष्ट की प्राप्ति या भगवत् साक्षात्कार का द्योतक स्वरूप है। निर्वाण, मुक्ति व मोक्ष ‘अनासक्ति’ की पूर्णतम उपलब्धि का ही नाम है।

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मनुष्य में जो चेतना पूर्ण गतिवत्ता है उसका कारण तो वह विराट-शक्ति है किन्तु कर्मगति की दिशा मनुष्य की अपनी है। परमात्मा विद्युत की भाँति गतिशीलता की शक्ति तो देता किन्तु उस शक्ति से संचलित मनुष्य-यंत्र किस ओर जाता है इसका उत्तरदायी वह नहीं है! विद्युत धारायें केवल प्रेरणा देती हैं अब आगे उपभोक्ता का कर्तव्य है कि वह उसका उपयोग रोशनी करने में करता है या किसी के प्राण लेने में। गैस मोटर को ढकेलती भर है उसके चलने के ढंग का उत्तरदायित्व संचालक पर है।

संसार में जो कुछ अच्छा बुरा हितकर अथवा अहितकर होता है वह सब परमात्मा की प्रेरणा तथा इच्छा से होता है, मनुष्य का उसमें कोई हाथ नहीं है। वह स्वयं कुछ नहीं करता। किसी विराट्-शक्ति द्वारा उससे बलात् कराया जाता है, ऐसा विश्वास धारण करने से मनुष्य भले ही अपने कर्म फल का भागी न बने, पर यह विश्वास व्यवहार जगत में हितकर नहीं है। स्वभावतः बुराई की ओर दौड़ने वाला मनुष्य इस विश्वास के बल पर और भी भयंकर हो जायेगा। उसको किसी कर्म का फल भले ही भोगना न पड़े किन्तु उसके कुकर्म दूसरों के लिये तो कष्ट एवं अनिष्टकर होंगे ही।

किसी को मारने वाला यह सोचकर अपने कृत्य की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाये कि उसने वैसा स्वयं नहीं किया बल्कि सर्व शक्तिमान परमात्मा की प्रेरणा से किया, और मरने वाला अथवा उसके सम्बन्धी यह सोच कर संतोष कर लें कि इसमें मारने वाले का कोई दोष नहीं, मरने वाला परमात्मा की इच्छा से मृत्यु को प्राप्त हुआ है, यह भला किस प्रकार सम्भव हो सकता है?

यदि इस नियम को सार्वभौम मान कर यह कल्पना भी कर ली जाय कि संसार का प्रत्येक मनुष्य यह विश्वास रखने लगा है कि कोई किसी काम का उत्तरदायी नहीं है और न कोई किसी को कष्ट अथवा हानि पहुँचाने का दोषी है तब तो संसार में एक भयानक अव्यवस्था ही उत्पन्न हो जाय। न कोई किसी को मारने लूटने में संकोच करे और न कोई उसका प्रतिकार। सबल व्यक्ति निर्बलों को एक मिनट में मिटाकर रख दें। किसी कृत्य के परिणाम, उसके दण्ड तथा प्रतिकार के भय से ही मनुष्य एक साधारण अनुशासन में चलता है!

सब कुछ परमात्मा की इच्छा से होता है ऐसा विश्वास बना लेने पर मनुष्य के ज्ञानी होने की कम किन्तु निरंकुश होने की अधिक सम्भावना है। यदि मनुष्य के प्रत्येक कर्म में सर्व शक्तिमान की प्रेरणा रहती है तो फिर कर्म करने वाले को उसका परिणाम क्यों भुगतना पड़ता है मनुष्य असंयम करता है किन्तु ईश्वर की इच्छा से तो फिर उसे रोग के रूप में उसका दण्ड क्यों मिलता है? एक प्रकार से तो यह परमात्मा का अन्याय ही प्रतीत होता है। पहले तो वह किसी को कुछ बुरा करने को प्रेरित करता है और फिर उसे वैसा करने का दण्ड देता है, यह कहाँ का न्याय हुआ। और यदि यह मान लिया जाय कि सर्व शक्तिमान मनुष्य से शुभाशुभ कर्म कराकर फिर जो उसे उसका पुरस्कार अथवा दंड देता है यह उसकी लीला है खेल है-तब भी यह उस सर्व शक्तिमान विराट् पुरुष के अनुरूप नहीं है। यह बचकाना खेल न तो उसके गौरव उपयुक्त है ओर न वह ऐसा खेल खेलेगा ही।

विराट् पुरुष द्वारा प्रेरित यह याँत्रिकता जड़ प्रकृति तथा विवेक रहित पशु-पक्षियों में तो किसी हद तक मानी जा सकती है किन्तु सचेतन तथा विवेकशक्ति सम्पन्न मनुष्य के विषय में नहीं मानी जा सकती।

परमात्मा ने मनुष्य को अनेक आश्चर्यजनक शक्तियाँ देकर स्वतन्त्र कर दिया है कि यदि वह चाहे तो शक्तियों का सदुपयोग करके परमपद प्राप्त कर ले अथवा उनके दुरुपयोग द्वारा अधोगति में जा पड़े। उसने मनुष्य को सारे उपादान देकर खिलाड़ी की तरह संसार के मैदान में छोड़ दिया है और स्वयं एक निष्पक्ष दर्शक की भान्ति उसका खेल देखता है कि सुगति दुर्गति के इस विशाल खेल में कौन खिलाड़ी जीतता है और कौन हारता है। जो अपने स्रोत अर्थात् लक्ष्य को पाता जाता है वह उस परमपद परमात्मा की गोद में पहुँचता जाता है और जो हारता है वह खेलने के लिये दुबारा संसार में भेज दिया जाता है। मनुष्य की आयु खेल के एक अवसर की अवधि है। समाप्त हो जाने के बाद यदि खिलाड़ी सफल नहीं हो पाता तो उसे समयानुसार पुनः अवसर व समय दिया जाता है।

विवेकवान मनुष्य को इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये कि उसके शुभाशुभ कर्मों का प्रेरक तथा संचालक सर्व शक्तिमान परमात्मा है, उसका अपना कोई दायित्व नहीं है। न वह कुछ करने के स्वतन्त्र है और न करता ही है।

अनासक्ति कर्मयोग का यह अर्थ कदापि नहीं है कि तटस्थ रहकर कुछ भी अच्छा बुरा किये जाओ कोई भी गुण दोष हमारे लिये नहीं आयेगा। अनासक्ति कर्मयोग का केवल यह अर्थ है कि अपने कर्मों के फलाफल से प्रभावित होकर कर्म गति में व्यवधान अथवा विराम न आने दें जिससे दिन प्रति दिन अपने कर्मों में सुधार करते हुये परमपद की ओर बढ़ते जायें।