Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

संक्षेप में न्यायदर्शन ...PART-04

षड्दर्शन उन भारतीय दार्शनिक एवं धार्मिक विचारों के मंथन का परिपक्व परिणाम है जो हजारों वर्षो के चिन्तन से उतरा और हिन्दू (वैदिक) दर्शन के नाम से प्रचलित हुआ। इन्हें आस्तिक दर्शन भी कहा जाता है। दर्शन और उनके प्रणेता निम्नलिखित है। 1-पूर्व मीमांसा: महिर्ष जैमिनी 2-वेदान्त (उत्तर मीमांसा): महिर्ष बादरायण 3-सांख्य: महिर्ष कपिल 4-वैशेषिक: महिर्ष कणाद 5-न्याय: महिर्ष गौतम 6-योग: महिर्ष पतंजलि

न्यायदर्शन;-

04 FACTS;- 1-न्याय दर्शन /न्याय सूत्र के रचयिता का गौतम ( गोत्र नाम गोतम ) है और व्यक्तिगत नाम अक्षपाद है |विभिन्न प्रमाणों की सहायता से वस्तुतत्त्व की परीक्षा न्याय हैं |महिर्ष अक्षपाद गौतम द्वारा प्रणीत न्याय दर्शन एक आस्तिक दर्शन है जिसमें ईश्वर कर्म-फल प्रदाता है। इस दर्शन का मुख्य प्रतिपाद्य विषय प्रमाण है। न्याय शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त होता है परन्तु दार्शनिक साहित्य में न्याय वह साधन है जिसकी सहायता से किसी प्रतिपाद्य विषय की सिद्ध या किसी सिद्धान्त का निराकरण होता है ।अत: न्यायदर्शन में अन्वेषण अर्थात् जाँच-पड़ताल के उपायों का वर्णन किया गया है।

2-इस ग्रन्थ में पांच अध्याय है तथा प्रत्येक अध्याय में दो दो आह्रिक हैं। कुल सूत्रों की संख्या 539 हैं।न्यायदर्शन में अन्वेषण अर्थात् जाँच-पड़ताल के उपायों का वर्णन किया गया है। कहा है कि सत्य की खोज के लिए सोलह तत्व है। उन तत्वों के द्वारा किसी भी पदार्थ की सत्यता (वास्तविकता) का पता किया जा सकता है।वैशेषिक और न्याय , इन दोनों दर्शनों के अनुसार आत्मा, आकाश, काल, दिशा, मन और परमाणु ( वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी के) नित्य हैं; और शरीर, इन्द्रियाँ, चारों स्थूलभूत ( पृथ्वी, जल. अग्नि, वायु और इनसे बनी सारी सृष्टि ) अनित्य हैं |

3-इन दोनों दर्शनों ने सांख्ययोग के सदृश परमात्मा तत्त्व को आत्मतत्त्व में सम्मिलित का दिया हैं अर्थात उसका अलग वर्णन नहीं किया हैं | इससे यह सिद्ध होता हैं कि इन्होने परमात्मा तत्त्व को अस्वीकार नहीं किया हैं |इसका कारण यह हैं कि इन दोनों दर्शनों ने वेदांत दर्श