Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

क्या हैं महत्तत्त्व ?क्या हैं शैव दर्शनके अनुसार ३६ तत्त्व ?


गीता

हे अर्जुन ! मेरी योनि ( गर्भ रखने का स्थान ) महत्तत्त्व है , उसी में मैं गर्भ रखता हूँ ( अपने ज्ञान का प्रकाश डालता हूँ ) और उसी से सं भूतों की उत्पत्ति होती है ।

हे अर्जुन ! सब योनियों में जो शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी योनि महत्त्व हैं और उसमे बीज को डालने वाला मैं चेतन तत्त्व पिता हूँ | ( गीता 14/3,4)

(२). महत्तत्त्व का विषम परिणाम ‘अहंकार’ –

पुरुष (चेतनतत्त्व) से प्रतिबिंबित महत्तत्त्व ही ( सत्त्व में रजस और तमस की अधिकता से विकृत हो कर ) अहंकार रूप से व्यक्त भाव में बहिर्मुख हो रहा हैं।

कर्तापन अहंकार में हैं न की पुरुष में ।

(३). अहंकार का विषम परिणाम ‘ग्रहणरूप ११ इन्द्रिय’ –

(४). अहंकार का विषम परिणाम ‘ ग्राह्यरूप ५ तन्मात्राएँ ‘ –

(५). तन्मात्राओं का विषम परिणाम ‘ग्राह्यरूप पांच स्थूलभूत’ –

४. सृष्टि और प्रलय – इन सोलह विकृतियों का , जो तीनो गुणों के केवक विकार हैं , रज पर तम के अधिक प्रभाव से वर्तमान स्थूल रूप को छोड़ कर अपने अहंकार और पाँचो तन्मात्राओं में क्रम से लीन हो जाने का नाम प्रलय हैं।और रज के अधिक प्रभाव के कारण फिर विकृति रूप में प्रकट होने का नाम सृष्टि हैं।

सृष्टि के पीछे प्रलय , प्रलय के पीछे सृष्टि – यह क्रम अनादि से चला आ रहा हैं |

५. सृष्टि के तीन भेद –

(१) आध्यात्मिक सुख दुःख – जो सीधे अपने साथ सम्बन्ध रखने वाला हैं , जैसे बुद्धि, अहंकार, मन, इन्द्रियाँ और शरीर | इनसे आध्यात्मिक सुख दुःख होता हैं जो दो प्रकार का हैं – शारीरिक और मानसिक |

शरीर का बलवान, फुर्तीला और स्वस्थ होना शारीरिक सुख हैं और दुर्बल, अस्वस्थ और रोगी होना शारीरिक दुःख |

इसी प्रकार शुभ संकल्प , शान्ति, वैराग्य आदि मानसिक सुख हैं और ईर्ष्या, तृष्णा, शोक, राग, द्वेष आदि मानसिक दुःख हैं |

(२) आधिभौतिक – जो अन्य प्राणियों की भिन्न – भिन्न सृष्टि से संबंध रखने वाला हैं जैसे गो, अश्व, पशु- पक्षी आदि | इनसे मिलने वाला सुख दुःख आधिभौतिक हैं दूध, घी, सवारी , सांप का काटना आदि |

(३) आधिदैविक – जो दिव्य शक्तियों की सृष्टि से संबंध रखने वाला हैं , जैसे पृथ्वी, सूर्य आदि | इनसे मिलने वाला प्रकाश, वृष्टि आदि आधिदैविक सुख दुःख हैं |

५. पांच वृत्तियाँ – प्रमाण , विपर्यय , विकल्प , निद्रा और स्मृति |

६. पांच ज्ञानेन्द्रियाँ – नेत्र , श्रोत्र, घ्राण , रसना और त्वचा |