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क्या हैं बुद्धि की प्रकृति , प्रकार और तीन प्रकार  से सुनना ?स्वयं के भीतर प्रवेश करने के लिए ,कोई


मनुष्य किन घटकों से बना है ?-

अध्यात्मशास्त्र के अनुसार मनुष्य विविध देहों से बना है....

1- स्थूल शरीर अथवा स्थूलदेह

2-चेतना (ऊर्जा) अथवा प्राणदेह

3- मन अथवा मनोदेह

4-बुद्धि अथवा कारणदेह

5-सूक्ष्म अहं अथवा महाकारण देह

6-आत्मा अथवा हम सभी में विद्यमान ईश्‍वरीय तत्त्व

विविध देहों का विस्तृत विवरण ;-

06 FACTS;-

1-स्थूलदेह;-

आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से यह देह सर्वाधिक परिचित है । यह देह अस्थि-ढांचा, स्नायु, ऊतक, अवयव, रक्त, पंच ज्ञानेंद्रिय आदि से बनी है ।

2-चेतनामय अथवा प्राणदेह;-

यह देह प्राणदेह के नाम से परिचित है । इस देह द्वारा स्थूल तथा मनोदेह के सभी कार्यों के लिए आवश्यक चेतनाशक्ति की (ऊर्जा की) आपूर्ति की जाती है । यह चेतनाशक्ति अथवा प्राण पांच प्रकार के होते हैं :

2-1-प्राण : श्‍वास के लिए आवश्यक ऊर्जा

2- 2-अपान : मल-मूत्र विसर्जन, वीर्यपतन, प्रसव आदि के लिए आवश्यक ऊर्जा

2- 3-समान : जठर एवं आंतों के कार्य के लिए आवश्यक ऊर्जा

2- 4-उदान : उच्छवास तथा बोलने के लिए आवश्यक ऊर्जा

2- 5-व्यान : शरीर की ऐच्छिक तथा अनैच्छिक गतिविधियों के लिए आवश्यक ऊर्जा

2- 6-मृत्यु के समय यह ऊर्जा पुनश्‍च ब्रह्मांड में विलीन होती है और साथ ही सूक्ष्मदेह की यात्रामें गति प्रदान करने में सहायक होती है । .

3-मनोदेह अथवा मन;-

मनोदेह अथवा मन हमारी संवेदनाएं, भावनाएं और इच्छाओ का स्थान है । इस पर हमारे वर्तमान तथा पूर्वजन्म के अनंत संस्कार होते हैं । इसके तीन भाग हैं :

3-1-बाह्य (चेतन) मन : मन के इस भाग में हमारी वे संवेदनाएं तथा विचार होते हैं, जिनका हमें भान रहता है ।

3-2-अंतर्मन (अवचेतन मन) : इसमें वे संस्कार होते हैं, जिन्हें हमें इस जन्म में प्रारब्ध के रूप में भोगकर पूरा करना आवश्यक है । अंतर्मन के विचार किसी बाह्य संवेदना के कारण, तो कभी-कभी बिना किसी कारण भी बाह्यमन में समय-समय पर उभरते हैं । उदा. कभी-कभी किसी के मन में अचानक ही बचपन की किसी संदिग्ध घटना के विषय में निरर्थक एवं असम्बंधित विचार उभर आते हैं ।

3-3-सुप्त (अचेतन) मन : मन के इस भाग के संदर्भ में हम पूर्णतः अनभिज्ञ होते हैं । इसमें हमारे संचित से संबंधित सर्व संस्कार होते हैं ।

अंतर्मन तथा सुप्त मन, दोनों मिलकर चित्त बनता है ।

3-4-कभी-कभी मनोदेह के एक भाग को हम वासनादेह भी कहते हैं । मन के इस भाग में हमारी सर्व वासनाएं संस्कारूप में होती हैं ।मनोदेह से सम्बंधित स्थूल अवयव मस्तिष्क है ।

4-बुद्धि;-

कारणदेह अथवा बुद्धि का कार्य है – निर्णय प्रक्रिया एवं तर्कक्षमता ।

बुद्धि से सम्बंधित स्थूल अवयव मस्तिष्क है ।

5- सूक्ष्म अहं;-

सूक्ष्म अहं अथवा महाकारण देह मनुष्य की अज्ञानता का अंतिम शेष भाग (अवशेष) है। मैं ईश्‍वर से अलग हूं, यह भावना ही अज्ञानता है।हमारे अस्तित्व का जो भाग मृत्यु के समय हमारे स्थूल शरीर को छोड जाता है, उसे सूक्ष्मदेह कहते हैं । इसके घटक हैं – मनोदेह, कारणदेह अथवा बुद्धि, महाकारण देह अथवा सूक्ष्म अहं और आत्मा । मृत्यु के समय केवल स्थूलदेह पीछे रह जाती है।प्राणशक्ति पुनश्‍च ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है।

6-आत्मा;-

आत्मा हमारे भीतर का ईश्‍वरीय तत्त्व है और हमारा वास्तविक स्वरूप है । सूक्ष्मदेह का यह मुख्य घटक परमेश्‍वरीय तत्त्व का अंश है। इस अंश के गुण हैं – सत, चित्त और आनंद (शाश्‍वत सुख) । आत्मा पर जीवन के किसी सुख-दुःख का प्रभाव नहीं पडता और वह निरंतर आनंदावस्था में रहती है । वह जीवन के सुख-दुःखों की ओर साक्षीभाव से (तटस्थता से) देखती है। आत्मा तीन मूल सूक्ष्म-घटकों के परे है; तथापि हमारा शेष अस्तित्व स्थूलदेह एवं मनोदेह से बना होता है ।

क्या हैं अज्ञान (अविद्या) ?-

02 FACTS;-

1-आत्मा के अतिरिक्त हमारे अस्तित्व के सभी अंग माया का ही भाग हैं । इसे अज्ञान अथवा अविद्या कहते हैं, जिसका शब्दशः अर्थ है (सत्य) ज्ञान का अभाव।हम अपने अस्तित्व को केवल स्थूल शरीर, मन एवं बुद्धि तक ही सीमित समझते हैं ।अज्ञान (अविद्या) ही दुःख का मूल कारण है। हमारा तादात्म्य हमारे सत्य स्वरूप (आत्मा अथवा स्वयंमें विद्यमान ईश्‍वरीय तत्त्व) के साथ नहीं होता ।

2-आत्मा और अविद्या मिलकर जीवात्मा बनती है । जीवित मनुष्य में अविद्या के कुल बीस घटक होते हैं – स्थूल शरीर, पंचसूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय, पंचसूक्ष्म कर्मेंद्रिय, पंचप्राण, बाह्यमन, अंतर्मन, बुद्धि और अहं । सूक्ष्म देह के घटकों का कार्य निरंतर होता है, जीवात्मा का ध्यान आत्मा की अपेक्षा इन घटकों की ओर आकर्षित होता है; अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान की अपेक्षा अविद्या की ओर जाता है ।

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क्या हैं बुद्धि का अर्थ;-

05 FACTS;-

1-सामान्य अर्थ मे तेजी से सीखने और समझने, स्मरण और तार्किक चिन्तन आदि गुणो को बुद्धि के रूप मे प्रयोग मे लाते है। जब मानव के पास बुद्धि होती है तो उसके लिए संसार को जानना सहज हो जाता है । जब हमारे अंदर ज्ञान होता है और मन की स्थिरता होती है तो हम कार्य करने में दक्ष हो जाते है।बुद्धि से ही मानव अपनी इन्द्रियों का मंथन करता हुआ , चित – मन दोनों को अपना माध्यम बनाकर उसमे अपने को समाहित कर देता है।बुद्धि ही है जो इस धरती पर विचरने वाले दूसरे जीवों से हमें अलग करती है और हमारे लिए एक उपहार है।

2-मनोवैज्ञानिको द्वारा दी गयी बुद्धि की परिभाषाएँ सामान्य अर्थ से अलग है जिन्हे तीन भागो मे बांटा जा सकता है।बुद्धि को वातावरण के साथ समायोजन करने की क्षमता के आधार पर परिभाषित किया गया है। जिस व्यक्ति मे सीखने की क्षमता जितनी अधिक होती है उस व्यक्ति मे बुद्धि उतनी ही अधिक होगी। जिस व्यक्ति मे अमूर्त चिन्तन की योग्यता जितनी अधिक होगी वह व्यक्ति उतना ही अधिक बुद्धिमान होगा।बुद्धि केवल एक योग्यता ही नही है परन्तु इसमें अनेक तरह की योग्यताए सम्मलित होती है।

3-मनोवैज्ञानिक वेश्लर केअनुसार “बुद्धि एक समुच्चय या सार्वजनिक क्षमता है जिसके सहारे व्यक्ति उद्देश्यपूर्ण क्रिया करता है, विवेक पूर्ण चिन्तन करता है तथा वातावरण के साथ प्रभावकारी ढ़ग से समायोजन करता है''।व्यक्ति केवल शारीरिक गुणों से ही एक दूसरे से

भिन्न नहीं होते बल्कि मानसिक एवं बौद्धिक गुणों से भी एक दूसरे से भिन्न होते हैं। ये भिन्नताऐं जन्मजात भी होती हैं। कुछ व्यक्ति जन्म से ही प्रखर बुद्धि के तो कुछ मन्द बुद्धि व्यवहार वाले होते हैं।आजकल बुद्धि को बुद्धि लब्धि के रूप में मापते हैं जो एक संख्यात्मक मान है और केवल एक संख्या के माध्यम से व्यक्ति के सामान्य बौद्धिक एवं उसमें विद्यमान विभिन्न विशिष्ट योग्यताओं के सम्बंध को इंगित करता है।

4-लेकिन अफसोस की बात कि यही बुद्धि हमारे दुखों का मूल बनती है क्योंकि आप बुद्धि रूपी चाकू को गलत छोर से पकड़े हुए हैं।बुद्धि एक धारदार रेजर की तरह होती है। अगर आप इसे धारदार रखेंगे तो यह हरेक चीज की काट-पीट करेगी।भारत में एक परंपरा है कि जब आप किसी को चाकू दें तो उसे एक खास तरीके से देते हैं। नहीं तो आपदू सरे को

घायल कर देंगे।अगर आपको पता ही नहीं हो कि कहां इसका हैंडल है और कहां इसका ब्लेड, और आपने इसे गलत तरफ से पकड़ लिया तो यह आपको ही नुकसान पहुंचाएगा।

इसी से जुड़ी एक रोचक घटना है। रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु के बाद स्वामी विवेकानंद ने उनके संदेश व शिक्षाओं को फैलाने के लिए अमेरिका जाने का फैसला किया।

उन दिनों समुद्र पार किसी दूसरे देश जाना किसी दूसरे ग्रह पर जाने जैसा था। तो वे जाने से पहले परमहंस की पत्नी शारदा देवी से आशीर्वाद लेने पहुँचे।

5-जब वह उनके पास पहुंचे तो उस वक्त वह कुछ काम कर रही थीं। शारदा देवी ने बिना सिर उठाए उनकी बातें सुनी। विवेकानंद ने कहा, ‘मैं पश्चिमी देशों में जाकर अपने गुरु की शिक्षाओं को फैलाना चाहता हूं। क्या मैं जा सकता हूं?’ अपने काम में व्यस्त, बिना अपना सिर उठाए उन्होंने विवेकानंद से कहा, ‘नरेन क्या तुम मुझे वह चाकू दे सकते हो?’ नरेन ने चाकू उठाया और गुरु मां को दे दिया। चूंकि नरेन एक खास तरीके के व्यक्ति थे, इसलिए उन्होंने एक खास तरीके से वह चाकू उन्हें दिया। नरेन ने चाकू के धार वाले सिरे को हाथ में पकडक़र मां को चाकू का हत्था पकडऩे को दिया। मां ने चाकू ले लिया और उसे एक तरफ रख दिया और बोली, ‘तुम जा सकते हो।’ तब नरेन ने इस बात पर गौर किया और फिर उन्होंने उनसे पूछा, ‘आपने मुझसे चाकू क्यों मांगा? आपको तो सब्जी काटनी नहीं थीं। जो भी काटना था, वह सब पहले ही बर्तन में कटा रखा हुआ है। फिर आपने चाकू क्यों मांगा?’ गुरु मां ने कहा, ‘मैं यह देखना चाहती थी कि तुम चाकू कैसे पकड़ाते हो। अब तुम अपने गुरु की शिक्षाओं को फैलाने के लिए जा सकते हो।’

क्या है बुद्धि ह्रदय का संयोग ?-

03 FACTS;-

1-वस्‍तुत: बुद्धि का स्‍वभाव नकार/ निगेटिव है।जब भी आपके भीतर से ‘’हां’’ होती है, यस होता है, तब ह्रदय होता है। और जब नहीं होती है, ‘’नो’’ तब बुद्धि होती है। इसलिए जो व्‍यक्‍ति जीवन को पूरी तरह ‘’हां’’ कह सकता है, वह आस्‍तिक है; और जो व्‍यक्‍ति ‘’नहीं’’ पर जोर दिये चला जाता है, वह नास्‍तिक है। नास्‍तिक होने से कोई संबंध नहीं कि वह ईश्‍वर को अस्‍वीकार करता है या नहीं करता। नास्‍तिक होने का अर्थ है कि ‘’नहीं’’ उसके जीवन की व्‍यवस्‍था है; ‘’न’’ कहना उसका सुख है, हां कहने में उसे अड़चन है, कठिनाई है। इसलिए आप देखते है जैसे ही बच्‍चे में बुद्धि आनी शुरू होती है वह इंकार करना शुरू कर देता है। जैसे ही बच्‍चा जवान होने लगता है, उसकी अपनी बुद्धि चलने लगती है, उसे ‘’न’’ कहने में रस आने लगता है, ‘’हां’’ कहना मजबूरी मालूम पड़ती है।

2-बुद्धि का स्‍वभाव संदेह है, ह्रदय का स्‍वभाव श्रद्धा है। तो कुछ लोग है जिनको तर्क की ही कुल जमा बेचैनी है, पक्ष में या विपक्ष में। और कोई अंतर नही पड़ता, जो तर्क पक्ष में है वहीं

विपक्ष में हो सकता है।बुद्धि और हृदय जब तक न मिल जाएं, तुम जीवन की अग्नि से बच न पाओगे।अकेले बुद्धि अंधी है और अकेले हृदय भी पंगु है ; जुड़ कर दोनों पूर्ण हो जाते हैं।और दोनों तुम्हारे पास हैं; दोनों का उपयोग कर लेना है। तो ज्ञान को भक्ति का सहारा बनाओ, भक्ति को ज्ञान का सहारा बनाओ; दोनों तुम्हारे पंख बन जाएं, तुम आकाश में उड़ सकोगे।न एक पंख से कभी कोई पक्षी उड़ा है, न एक पैर से कोई प्राणी चला है, न एक पतवार से नाव चलती है; दोनों पतवार चाहिए। कोई विरोध नहीं है। 3-उस घड़ी को परम सौभाग्य की घड़ी मानना,जब तुम विवेकपूर्वक प्रेम कर सको। और परमात्मा ने तुम्हें जो भी दिया है, उसमें किसी का भी अस्वीकार मत करना; क्योंकि उतने ही अंश में तुम पंगु हो जाओगे। तुम पूरे हो, सिर्फ संयोग बिठाना है। वीणा रखी है, तार पड़े हैं; लेकिन तारों को वीणा पर जोड़ना है, तारों को कसना है, साज बिठाना है। तुम्हारे भीतर सब मौजूद है, सिर्फ संयोग मौजूद नहीं है। उस संयोग का नाम ही साधना है कि तुम्हारे भीतर की वीणा और तार मिल जाएं।

क्या है बुद्धि की चार श्रेणियां?-

04 FACTS;-

बुद्धि चार प्रकार की होती है-

1) बुद्धि

2) मेधा बुद्धि

3) ऋतम्भरा बुद्धि और

4) प्रज्ञा बुद्धि ।

1) बुद्धि;-

बुद्धि वह होती है जो यथार्थ निर्णय देने वाली हो । हमारे नेत्र के पिछले बिभाग में पीला पटल है , इस पीले पटल में तन्मात्राएँ/5 Senses लगी है । तन्मात्राओं के पश्चात मन है । मन का सम्बन्ध बुद्धि से है । इस प्रकार जो पदार्थ नेत्रों के समक्ष आता है वह मन के द्वारा बुद्धि तक पहुचता है और हम यथार्थ निर्णय लेते है ।इन्द्रिय जो भी कार्य करती है तो यह सब विषय मन के द्वारा बुद्धि तक पहुँचते है और बुद्धि उनका निर्णयात्मक उत्तर देती है।जब मानव के ह्रदय में यह विचार आता है कि सब कुछ प्रभु का रचाया हुआ है और वह सर्वव्यापक है , तो इन्द्रिय किसी प्रकार का पाप नहीं कर सकती । परन्तु जो प्रभु को सर्वव्यापक कहते तो है पर विश्वास नहीं करते , उनसे यह आशा नहीं की जा सकती कि वे पाप नहीं करेंगे ।

2) मेधा बुद्धि;-

02 POINTS;-

1-मेधावी बुद्धि उसको कहते है जिसके आने के पश्चात मानव के जन्म जन्मान्तरों के संस्कार जाग्रत हो जाते है।मेधावी बुद्धि का सम्बन्ध अंतरिक्ष से होता है।जो वाणी अंतरिक्ष में रमण करती है , मेधावी बुद्धि प्राप्त होने पर उसको जान लिया जाता है।मेधावी बुद्धि अंतरिक्ष में संसार के ज्ञान विज्ञान को देखा करती है कि यह संसार का विज्ञान और कौन कौन से वाक्य अंतरिक्ष में रमण कर रहे है ।मेधावी बुद्धि उस विवेक का नाम है जब मानव संसार से विवेकी होकर परमात्मा के रचाये हुए तत्वों पर विवेकी होकर जाता है ।

2-इस मेधावी बुद्धि का क्षेत्र है , पृथ्वी के गर्भ में नाना प्रकार कि धाराए तथा खनिज , समुद्रो की तरंगो में रमण करने वाली धातुए तथा प्राणी, वायुमंडल में रमण करने वाले, रजोगुणी, तमोगुणी तथा सतोगुणी परमाणु , इन परमाणुओ तथा वाणी का मंथन करना इसका क्षेत्र है । मानव मेधावी बुद्धि का विवेकी बनकर परमात्मा के रचाये हुए विज्ञान को जानता हुआ यह आत्मा ऋतम्भरा बुद्धि के द्वार चला जाता है ।

ऋतम्भरा बुद्धि ;-

ऋतम्भरा बुद्धि उसको कहते है जब मानव योगी और जिज्ञासु बनने के लिए परमात्मा की गोद में जाने के लिए लालयित होता है तो वही मेधावी बुद्धि , ऋतम्भरा बुद्धि बन जाती है । पांचो प्राण ऋतम्भरा बुद्धि के अधीन हो जाते है । योगी जब इन पांचो प्राण को अपने अधीन करके उनसे मिलान कर लेता है तो आत्मा इन प्राणो पर सवार हो जाता है और सर्वप्रथम मूलाधार में रमण करता है ।

11 POINTS;-

1) मूलाधार में लगभग 6 ग्रन्थियां लगी है , आत्मा के यहाँ पहुचने पर ये ग्रन्थियां स्पष्ट हो जाती है , इस आत्मा का प्राणो के सहित आगे को उत्थान हो जाता है ।

2) आगे चलकर यह आत्मा नाभि चक्र में आता है , जिसमे 12 ग्रन्थियां होती है , यह ग्रथि 72 करोड़ , 72 लाख, 10 हज़ार , 2 सौ 2 नाड़ियों का समूह है । आत्मा के यहाँ पहुचने पर वे भी स्पष्ट हो जाती है ।

3) इसके आगे यह आत्मा गंगा , यमुना, सरस्वती में स्नान करता हुआ ह्रदय चक्र में पहुचता है । इसको अविनाश चक्र भी कहते है । यह 24 ग्रन्थियां का समूह माना जाता है , आत्मा के यहाँ पहुचने पर ये भी स्पष्ट हो जाती है ।

4) इसके आगे यह आत्मा कंठ चक्र में जाता है जिसे उदान चक्र या ब्राह्यी चक्र भी कहते है । इसमें लगभग 47 ग्रन्थियां होती है, आत्मा के यहाँ पहुचने पर ये भी स्पष्ट हो जाती है ।

5) इसके आगे यह आत्मा घ्राण चक्र में जाता है , आत्मा के यहाँ पहुचने पर ये भी स्पष्ट हो जाती है ।

6) आगे वह स्थान आता है जहाँ इड़ा, पिंगला , सुषुम्ना नाम की नाड़ियों , जिन्हे गंगा, यमुना, सरस्वती भी कहते है, का मिलान होता है , इसे त्रिवेणी या आज्ञाचक्र भी कहते है ।

7) आत्मा प्राणो सहित त्रिवेणी में स्नान करता हुआ ब्रह्मरंध्र में पहुँचता है , उस स्थान पर सूर्य का प्रकाश भी फीका पड़ जाता है । 8) इतने प्रबल प्रकाश से आगे चलकर आत्मा रीढ़ में जाकर जहाँ कुंडली जाग्रत हो जाती है ।इस कुंडली के जाग्रत होने का नाम ही परमात्मा से मिलन होना है ।

9) हमारा विज्ञानं दो प्रकार का होता है पहला भौतिक विज्ञानं और दूसरा आध्यात्मिक विज्ञानं । भौतिक विज्ञानं को समझने तथा रिसर्च करने के लिए हमें बुद्धि और मेधा बुद्धि की आवश्यकता होती है तथा आध्यात्मिक विज्ञानं में घुसने के लिये हमें ऋतम्बरा और प्रज्ञा बुद्धि की आवस्यकता होती है। बुद्धि और मेधा बुद्धि हमें यन्त्र विज्ञानं के सहारे ग्रहों तक पहुंचा देती है तथा ऋतंबरा बुद्धि और प्रज्ञा बुद्धि हमें गृह मंडल से आगे क्या है उस क्षेत्र की जानकारी देती हैं।

10) ऋतंबरा बुद्धि 5 इन्द्रिय और 5 प्राणो को एक सूत्र में बाँध कर उन पर सवार होकर अंतरिक्ष में रमन करती है।और ऋतम्बरा बुद्धि जानकारी देती है कि अंतरिक्ष लोक में क्या है.इसके बाद काम शुरू होता है प्रज्ञा बुद्धि का ।प्रज्ञा बुद्धि ऋतम्बरा बुद्धि को छोड़ 3 नाड़ियों इडा पिंगलाऔर सुषुम्ना पर सवार होकर कुंडलनी को जागृत करती हुई ब्रह्मरन्द्र को पार करती हुई जब समाधि में लीन हो जाती है । तो प्रज्ञा बुद्धि ही फिर वहाँ क्या हो रहा है ..उसकी

जानकारी देती है ।ऋतम्बरा बुद्धि और प्रज्ञा बुद्धि वाले लोग ही समाधि में जा सकते है तथा उन महान लोगों को ही ब्रह्म ज्ञान प्राप्त होता है । 11) अगर आप भी मेधा बुद्धि ,ऋतम्बरा बुद्धि और प्रज्ञा बुद्धि में रमण करना चाहते है तो सबसे पहले आपको भौतिक विज्ञानं का अध्यन करना चाहिए इससे आपको मेधा बुद्धि प्राप्त होगी । उसके बाद आपको ज्योतिष विज्ञानं (गृह विज्ञानं ) और धार्मिक ग्रंथो का अध्यन करना चाहिए । इससे आपको ऋतम्बरा बुद्धि प्राप्त होगी । उसके बाद आपको आध्यात्मिक विज्ञानं का अध्ययन और ध्यान अभ्यास करना चाहिए । इससे आपको प्रज्ञा बुद्धि प्राप्त होगी. प्रज्ञा बुद्धि की प्राप्ति के बाद तो आप सभी लोको में भ्रमण कर सकते हो । तथा भगवान को प्राप्त कर सकते है ।

प्रज्ञा बुद्धि;-

07 POINTS;-

1) -प्रज्ञा बुद्धि उस ऋषि को प्राप्त होती है जो मुक्ति को प्राप्त कर लेता है । हमारे कंठ के निचले भाग में ह्रदय चक्र होता है , उस चक्र में मेधावी बुद्धि का संक्षेप रमण करता है । उसमे ब्रह्माण्ड के सारे के सारे ज्ञान और विज्ञानं रमण करने लगता है । जैसे अंतरिक्ष में हमारे वाक्य रमण करते है , उस विद्या से जो वाक्य हम उच्चारण करना चाहते है , वही वाक्य अंतरिक्ष से हमारे समीप आने लगते है । उसी वाक्य के आरम्भ होने को मेधावी बुद्धि का ” ऋद्धि भूषणम ” कहा जाता है । इस भूषण को धारण करने से मानव का जीवन विकासदायक बनता है । वह नाना प्रकार के छल , दम्भ, आडम्बर आदि से दूर हो जाता है । और वह योगी त्रिकालदर्शी यानि भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीनो कालों का ज्ञाता हो जाता है।

2) -महर्षि पतंजलि अपने योग सूत्रों में योग साधना की जिन उपलब्धियों की चर्चा करते हैं, उनमें यह उपलब्धि विशेष है। प्रज्ञा या बौद्धिक चेतना हमारे जीवन रथ की संचालक है। इसकी अवस्था ही जीवन की दिशा का निर्धारण करती है। सामान्य क्रम में बुद्धि सन्देह, भ्रम की वजह से चंचल रहती है। इस चंचलता की वजह से ही इसकी निर्णय क्षमता एवं विश्लेषण क्षमता पर असर पड़ता है। बौद्धिक दिशाभ्रम के कारणों में पूर्वाग्रहों, स्वार्थपरता एवं हठधर्मिता का भारी हाथ रहता है। इनके कारण बुद्धि में वह समझदारी नहीं पनप पाती, जिसकी आवश्यकता है।

3) -अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रयोग- विशेष तौर पर ध्यान की प्रणालियाँ, बुद्धि के इस कल्मष को दूर करती है। इस कल्मष के दूर होने से इसमें सहज निर्मलता आती है। इसके विकार दूर होने से इसमें न केवल सत्य का आकलन करने की योग्यता विकसित होती है, बल्कि इसमें ऋत् दर्शन की दृष्टि भी पनपती है।सत्य के दो रूप है। एक वह जो सामान्य इन्द्रियों एवं साधारण बौद्धिक समझ से देखा व जाना जाता है। जिसके रूप काल एवं परिस्थिति के हिसाब से बदलते रहते हैं। उदाहरण के लिए टेबल में पुस्तक रखी है। यह सत्य है, किन्तु यह सत्य एक सीमित स्थान एवं सीमित समय के लिए है। समय एवं स्थान के परिवर्तन के साथ ही यह सत्य- सत्य नहीं रह जाएगा। 4) -सत्य के इस सामान्य रूप के अलावा एक अन्य रूप है, जो सर्वकालिकम एवं सार्वभौमिक है। यह अपरिवर्तनीय है। क्योंकि यह किसी एक स्थान से नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व से जुड़ा है। यह सत्य अस्तित्व के नियमों का है। भौतिक ही नहीं, अभौतिक या पराभौतिक प्रकृति इस दायरे में आते हैं। यह न बदलता है और न मिटता है। इसे जानने वाला सृष्टि एवं स्रष्टा के नियमों से परिचित हो जाता है। इसकी प्राप्ति किसी तार्किक अवधारणा या फिर किसी विवेचन, विश्लेषण से नहीं होती। बल्कि इसके लिए सम्पूर्ण अस्तित्व से एक रस होना पड़ता है। और ऐसा तभी होता है, जब योग साधक के चित्त को निर्विकार की भावदशा प्राप्त हो। 5) -ऋतम्भरा में सत्य की शाश्वतता के साथ परमात्मा की सरसता है ; जो हमारा अन्तरतम होने के साथ सभी का अन्तरतम है। जब योगी को निर्विचार समाधि की अवस्था प्राप्त होती है, तो उसकी प्रज्ञा ऋतम्भरा से आलोकित- आपूरित हो जाती है। उसमें ब्रह्माण्ड की समस्वरता स्पन्दित होने लगती है। यहाँ न कोई द्वन्द्व है और न किसी अव्यवस्था की उलझन। जहाँ कहीं जो भी नकारात्मक है, जो भी विषैला है, वह सबका सब विलीन, विसर्जित हो जाता है। ध्यान रहे कि यहाँ किसी को निकाल फेंकने की जरूरत नहीं रहती, क्योंकि सम्पूर्णता में सबको जीवन के सभी तत्त्वों को उनका अपना स्थान मिल जाता है। 6) -यहाँ पहुँचते ही जीवन चेतना शिकायतों- सन्देहों, उलझनों, भ्रमों से मुक्त हो जाती है। सब कुछ समझ में आने लगता है, एकदम साफ- साफ और सुस्पष्ट। प्रत्येक तत्त्व की स्थिति ही नहीं, उसका औचित्य भी स्पष्ट हो जाता है। और तब पता चलता है कि यथार्थ में परेशान होने का कोई कारण ही नहीं है। यही विशेषता है-इस भावदशा का।ऋतम्भरा में सर्वत्र सम्पूर्णता ही है। और इस सम्पूर्ण में सभी कुछ इतनी समस्वरता एवं संगीत लिए है कि बस माधुर्य के अलावा कुछ बचता ही नहीं। यहाँ केवल जीवन ही नहीं, मृत्यु का भी अपूर्व सौन्दर्य है। हर वस्तु नए प्रकाश में आलोकित होता है। पीड़ा भी, दुःख भी एक नए गुणवत्ता के साथ स्वयं को प्रकट करते हैं। यहाँ असुन्दर भी सुन्दर हो जाता है, क्योंकि तब पहली बार समझ में आता है कि विपरीतता, विषमता क्यों आवश्यक है। और तब ये सब और इनमें से कुछ भी असुविधाजनक नहीं रहता। सब का सब एक दूसरे के संपूरक हो जाता है। यह बड़ा ही स्पष्ट अनुभव होता है- ये सभी तत्त्व एक दूसरे की मदद के लिए हैं। 7) -सामान्य बोलचाल में- जिसे हम सब कहते- सुनते हैं, भगवान् का प्रत्येक विधान मंगलमय है। उसकी सही समझ चेतना की इसी अवस्था में समझ आती है। प्रज्ञा के ऋतम्भरा होने पर ही भगवान् के मंगलमय विधान का बोध होता है। अभी वर्तमान में एक कोरा कथन है- जिसमें शब्द तो बोले जाते हैं, परन्तु उनमें कोई अर्थ नहीं होता। बस एक ध्वनि बनकर कानों में गूँज जाती है। इसमें अस्तित्व के प्राण नहीं बसते। परन्तु प्रज्ञा के ऋतम्भरा होने पर इस मंगलमयता की प्रतिपल प्रतिक्षण अनुभूति होती रहती है। और योगी बन जाता है—मीरा की तरह, सुकरात की भाँति। उसे प्राप्त होती है महात्मा ईसा की अवस्था, जिसमें विष का प्याला, सूली की चुभन भी मंगलमय नजर आती है; क्योंकि तब इसकी बहुमूल्यता अनुभूत होने लगती है।

स्वयं के भीतर प्रवेश करने के लिए ,कोई कैसे तृतीय प्रकार के सुनने की कला तक पहुंच सकता है?- 02 FACTS;- 1-तीन प्रकार के Element है और तीन प्रकार की सुनने की विधिया है... प्रथम- बुद्धि द्वारा सुनना -Air Element द्वितीय-भाव, सहानुभूति व प्रेम द्वारा सुनना-Water Element तृतीय-श्रद्धा के द्वारा समग्रता से सुनना--Fire Element 2-तीन Element .5 हैं..तीनो के समन्वय से Totality की यात्रा शरू होती हैं ।तभी हम अस्तित्व / बीइंग तक पहुंच पाते है अथार्त दूसरा .5 ... पूर्णता ।

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प्रथम- बुद्धि द्वारा सुनना ;-

08 FACTS;-

।-बुद्धि द्वारा सुनने का तात्पर्य है ;जब मन कई विचारों से भरा हुआ हो, तो जो कुछ भी उस तक आता है, उसे वह अपने रंग देता चला जाता है।तब मन वह नहीं सुनता जो कि कहा जा रहा है, बल्कि वह सुनता है,जो कि वह सुनना चाहता है।आप सुन रहे हैं और भीतर लगातार तर्क चल रहा है कि क्या सही है और क्या गलत है; तो आप अपनी धारणाओं, अपने आदर्शों, अपने तरीकों से तुलना कर रहे हैं।भीतर के इतने शोरगुल में आप केवल चुनाव करते है, छोड़ते है और अपने ही अर्थ लगाते है। तभी कुछ भीतर घुस पाता है। पर तब उसकी दूसरी ही शक्ल हो जाती है;वह वही नहीं होगा जो कहा गया होगा।

2-यदि आप, जो कुछ भी कहा जा रहा है उसे गहराई से समझना चाहते हैं, तो आपको इस भीतरी शोरगुल को बंद करना पड़ेगा।अन्यथा आप लगातार अपने द्वारा ही ऐसी संभावनाएं नष्ट कर रहे हैं जिससे कि आप पर कुछ भी घटित हो। आप चूक सकते हैं, और प्रत्येक बहुत कुछ चूक रहा है।हम अपने ही मन के घेरे में बंद रहते हैं और वही घेरा हम सब जगह साथ ले जाते हैं। इसलिए जो भी हम देखते हैं, जो भी हम सुनते हैं, जो भी हमारे चारों ओर हो रहा होता है, वह कभी भी सीधे हमारे भीतर तक नहीं पहुंचाया जाता। मन सदैव ही बीच में अपनी चालाकियां दिखलाने आ जाता है ।

3-दूसरी श्रेणी की सुनने की कला तक पहुंचने के लिए यह पहली बात है कि आपका मन जो भी कर रहा हो, उसके प्रति होश रहे। वह बीच में आ रहा है। जहां भी आप जाते हो, वह आपसे पहले ही पहुंच जाता है। यह कोई छाया की तरह नहीं है कि आपके पीछे-पीछे आए।लेकिन यह

आपसे पहले चला जाता है और हर वस्तु को रंग दे देता है। और इस तरह आप कभी भी किसी वस्तु के सत्य रूप से परिचित नहीं हो सकते।मन एक कल्पना निर्मित करता है।आपको मन के इस तरह काम करने की व्यवस्था से अवगत हो जाना चाहिए।

4-परन्तु हम कभी भी इस बात को नहीं जान पाते, क्योंकि हम तो मन से तादात्म्य जोड़े होते हैं--हम कभी नहीं जान पाते कि मन अपने आप कुछ करता चला जाता है।आप में और आपके मन के बीच कोई अंतराल नहीं है। आप तादात्म्य जोड़े हैं और वस्तुतः यही सारी समस्या है।और यही एक तरीका है जिससे कि मन आपके साथ चालाकी कर सकता है।आप एक विचार अथवा विचार की प्रक्रिया से अपना तादात्म्य जोड़ लेते है।और यह बड़ा विचित्र है, क्योंकि केवल दो दिन पहले वह आपका विचार नहीं था। आपने उसे कहीं सुन लिया। अब आपने उसे पकड़ लिया और अब वह

आपका हो गया! और अब यह विचार कहेगा--नहीं, यह बात ठीक नहीं है,

क्योंकि यह मेरे विचार के अनुसार नहीं है।

5-आप यह अंतर नहीं महसूस कर पाएंगे कि यह तो मन बोल रहा है, स्मृति बोल रही है ,यांत्रिकता बोल रही है और आपको उससे अलग रहना चाहिए।यहां तक कि यदि आपको तुलना करनी हो, जांचना हो, तो भी आपको अपनी स्मृति से, मन से, अतीत से अलग रहना चाहिए।मन

बदला जा सकता है और यदि आप उसके साथ तादात्म्य जोड़ेंगे, तो आप अपनी स्वतंत्रता खो देंगे।अपने मन से स्वतंत्र होना बहुत बड़ी स्वतंत्रता है, क्योंकि यह बहुत सूक्ष्म दासता है। इतनी गहरी दासता हैं कि आप इसे कभी अनुभव ही नहीं कर पाते हैं। यह कैद खाना ही आपका घर बन जाता है।

6-सदैव सजग रहें कि आपका मन आपकी चेतना नहीं है। और जितने ही आप सजग रहेंगे, आप पाएंगे कि चेतना एक बिलकुल ही भिन्‍न बात है। चेतना उर्जा है और मन मात्र विचार है,आप उसके मालिक हो जाएं। उसे अपना मालिक न बनने दें। उसे स्वयं से पहले कहीं न जाने दें। उसे अपने पीछे-पीछे आने दें। उसका उपयोग करें, परन्तु उसके द्वारा आप उपयोग न किए जाएं। वह एक यंत्र है, परन्तु हम उसके साथ तादात्म्य जोड़े बैठे हैं। इसलिए इस तादात्म्य को तोड़े।स्मरण रखें कि आप मन नहीं हैं।मन ही

बंधन है, और वस्तुतः आपका शरीर प्रकृति से आता है, परमात्मा से आता है परन्तु आपका मन समाज से आता है। इसलिए शरीर के पास सौंदर्य है, परन्तु मन के पास कदापि नहीं।

7-मन हमेशा ही कुरूप है। वह संस्कारित है, एक झूठा निर्माण है। शरीर एक सुंदर संदेश है। यदि आप मन को गिरा सकें, तो आप शरीर के साथ कोई संघर्ष नहीं पाएंगे। तब शरीर उस विराट के लिए ...उस असीम विस्तार के लिए;एक द्वार बन जाता है। शरीर में कुछ कुरूप नहीं ...वह तो स्वाभाविक फूल का खिलना है परन्तु तथा कथित धार्मिक लोग हमेशा ही शरीर के विरोध में रहे हैं और मन के पक्ष में रहे हैं।उन्होंने बड़ी

अजीब उलझन पैदा की है। उन्होंने सारी संवेदनशीलता समाप्त कर दी, क्योंकि शरीर ही सारी संवेदनशील