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समाधि कितने प्रकार की होती है?'तत्त्व' (अष्टधा प्रकृति ,पांच तन्मात्राएँ ,और सोलह विकृतियाँ


समाधि के दो प्रकार;-

05 FACTS;-

1-जब कोई व्यक्ति अध्यात्म या ध्यान के मार्ग पर चलने लगता है और वह निरंतर उसी मार्ग पर चलता रहता है तो उसे उस मार्ग में जो उपलब्धियां मिलती है उसे विद्वानों ने सांसारिक भाषा में पद और आध्यात्म की भाषा में मोक्ष, मुक्ति या समाधि की स्थितियां कहा जाता है।समाधि समयातीत है जिसे मोक्ष कहा जाता है। इस मोक्ष को ही जैन धर्म में कैवल्य ज्ञान और बौद्ध धर्म में निर्वाण कहा गया है। योग में इसे समाधि कहा गया है

2-भक्ति सागर में समाधि के 3 प्रकार बताए गए है- 1.भक्ति समाधि, 2.योग समाधि, 3.ज्ञान समाधि।

3-शैव मार्ग में समाधि के 6 प्रकार बताए गए हैं जिन्हें 6 प्रकार की मुक्ति कहा गया है- (1) साष्ट्रि, (ऐश्वर्य), (2) सालोक्य (लोक की प्राप्ति), (3) सारूप (ब्रह्मस्वरूप), (4) सामीप्य, (ब्रह्म के पास), (5) साम्य (ब्रह्म जैसी समानता) (6) लीनता या सायुज्य (ब्रह्म में लीन होकर ब्रह्म हो जाना)।

4-ब्रह्मवैवर्त पुराण अनुसार चार तरह के पद होते हैं- 1.ब्रह्मपद, 2.रुद्रपद, 3.विष्णुपद और 4.परमपद (सिद्धपद)

4-1.ब्रह्मपद : यह सबसे बड़ा पद होता है। इस यह अनिर्वचनीय और अव्यक्त कहा गया है। इस अवस्था में व्यक्ति ब्रह्मलीन हो जाता है।

4-2.रुद्रपद : विष्णुपद से बड़कर रुद्रपद को माना जाता है, जबकि व्यक्ति अखंड समाधी में लीन हो जाता है।

4-3.विष्णुपद : सिद्धपद से बड़कर है विष्णुपद, जबकि सिद्धियों से बड़कर व्यक्ति मोक्ष की दशा में स्थित होकर स्थिरप्रज्ञ हो जाता है।

4-4.परमपद : जब कोई साधना प्रारंभ करता है तो सबसे पहले वह सिद्ध बनता है। इस सिद्धपद को ही परमपद कहते हैं।

5-योग में समाधि के दो प्रकार(Types of salvation ); बताए गए हैं-

5-1.सम्प्रज्ञात समाधि;-

वैराग्य द्वारा योगी सांसारिक वस्तुओं (भौतिक वस्तु) के विषयों में दोष निकालकर उनसे अपने आप को अलग कर लेता है और चित्त या मन से उसकी इच्छा को त्याग देता है, जिससे मन एकाग्र होता है और समाधि को धारण करता है। यह सम्प्रज्ञात समाधि कहलाता है। सम्प्रज्ञात समाधि... वितर्क, विचार, आनंद और अस्मितानुगत होती है।

5-2.असम्प्रज्ञात समाधि;-

05 POINTS;-

इसमें व्यक्ति को कुछ भान या ज्ञान नहीं रहता। मन जिसका ध्यान कर रहा होता है उसी में उसका मन लीन रहता है। उसके अतिरिक्त किसी दूसरी ओर उसका मन नहीं जाता। दरअसल यह अमनी दशा है।असम्प्रज्ञात में सात्विक, राजस और तामस सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है।

2-योग-सूत्र’ केअनुसार सम्प्रज्ञात समाधि’ की पराकाष्ठा में उत्पन्न विवेकख्याति में भी आत्मस्थिति का निषेध करने वाली ‘परवैराग्यवृत्ति’ नेति-नेति यह स्वरूपावस्थिति नहीं है, के अभ्यास पूर्वक असम्प्रज्ञात समाधि सिद्ध होती है।सभी वृत्तियों के निरोध का कारण (पर वैराग्य के अभ्यास पूर्वक, निरोध) संस्कार मात्र शेष सम्प्रज्ञात समाधि से भिन्न असम्प्रज्ञात समाधि है। 3-साधक का जब पर-वैराग्य की प्राप्ति हो जाती है, उस समय स्वभाव से ही चित्त संसार के पदार्थों की ओर नहीं जाता। वह उनसे अपने-आप उपरत हो जाता है उस उपरत-अवस्था की प्रतीति का नाम ही या विराम प्रत्यय है।

4-इस उपरति की प्रतीति का अभ्यास-क्रम भी जब बन्द हो जाता है, उस समय चित्त की वृत्तियों का सर्वधा अभाव हो जाता है। केवल मात्र अन्तिम उपरत-अवस्था के संस्कारों से युक्त चित्त रहता है, फिर निरोध संस्कारों में क्रम की समाप्ति होने से वह चित्त भी अपने कारण में लीन हो जाता है।

5-अतः प्रकृति के संयोग का अभाव हो जाने पर द्रष्टा की अपने स्वयं में स्थिति हो जाती है। इसे ही असम्प्रज्ञात समाधि या निर्बीज समाधि कहते हैं। इसी अवस्था को कैवल्य-अवस्था के नाम से भी जाना जाता है।

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सम्प्रज्ञात समाधि के प्रकार;-

संप्रज्ञात समाधि को 4 भागों में बांटा गया है-

04 FACTS;-

1.वितर्कानुगत समाधि-

2.विचारानुगत समाधि-

3.आनन्दानुगत समाधि-

4.अस्मितानुगत समाधि-

(1) वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि :-

02 POINTS;-

1-सूर्य, चन्द्र, ग्रह या राम, कृष्ण आदि मूर्तियों को, किसी स्थूल वस्तु या प्राकृतिक पंचभूतों की अर्चना करते-करते मन को उसी में लीन कर लेना वितर्क समाधि कहलाता है।भावना द्वारा ग्राहय रूप किसी स्थूल-विषय विराट्, महाभूत शरीर आदि किसी वस्तु पर चित्त को स्थिर कर उसके यथार्थ स्वरूप का सम्पूर्ण विषयों सहित जो पहले कभी देखें, सुने एवं अनुमान न किये हो, साक्षात् किया जाये वह वितर्कानुगत समाधि है।

2-वितर्कानुगत समाधि के दो भेद हैं (1) सवितर्कानुगत (2) अवितर्कानुगत । सवितर्कानुगत समाधि शब्द, अर्थ एवं ज्ञान की भावना सहित होती है। अवितर्कानुगत समाधि शब्द, अर्थ एवं ज्ञान की भावना से रहित केवल अर्थमात्र होती है।

(2) विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि :-

02 POINTS;-

1-स्थूल पदार्थों पर मन को एकाग्र करने के बाद छोटे पदार्थ, छोटे रूप, रस, गन्ध, शब्द आदि भावनात्मक विचारों के मध्य से जो समाधि होती है, वह विचारानुगत अथवा सविचार समाधि कहलाती है। जिस भावना द्वारा स्थूलभूतों के कारण पंच सूक्ष्मभूत तन्मात्राएं तथा अन्तः करण आदि का सम्पूर्ण विषयों सहित साक्षात्कार किया जाये वह विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि है।

2-यह समाधि भी दो प्रकार की होती है। (1) सविचार (2) निर्विचार। जब शब्द स्पर्श, रूप रस गंध रूप सूक्ष्म तन्मात्राओं एवं अन्तःकरण रूप सूक्ष्म विषयों का आलम्बन बनाकर देश, काल, धर्म आदि दशाओं के साथ ध्यान होता है, तब वह सविचार सम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है। सविचार सम्प्रज्ञात समाधि के ही विषयां में देश-काल, धर्म इत्यादि सम्बन्ध के बिना ही, मात्र धर्मी के, स्वरूप का ज्ञान प्रदान कराने वाली भावना निर्विचार समाधि कही जाती है।

(3) आनन्दानुगतय सम्प्रज्ञात समाधि :-

03 POINTS;-

1-आनन्दानुगत समाधि में विचार भी शून्य हो जाते हैं और केवल आनन्द का ही अनुभव रह जाता है। विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि के निरन्तर अभ्यास करते रहने पर सत्वगुण की अधिकता से आनन्द स्वरूप अहंकार की प्रतीति होने लगती है, यही अवस्था आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कही जाती है।

2-इस समाधि में मात्र आनन्द ही विषय होता है और ‘‘मैं सुखी हुँ’’ ‘‘मैं सुखी हुँ’’ ऐसा अनुभव होता है। इस समय कोई भी विचार अथवा ग्रहय विषय उसका विषय नहीं रहता। इसे ग्रहण समाधि कहते हैं।

3-जो साधक ‘सानन्द समाधि’ को ही सर्वस्व मानकर आगे नहीं बढते, उनका देह से अभ्यास छूट जाता है परन्तु स्वरूपावस्थिति नहीं होती। देह से आत्माभिमान निवृत्त हो जाने के कारण इस अवस्था को प्राप्त हुए योगी ‘विदेह’ कहलाते हैं।

(4) अस्मितानुगत सम्प्रज्ञानुगत समाधि :-

03 POINTS;-

1-अस्मित अहंकार को कहते हैं। इस प्रकार की समाधि में आनन्द भी नष्ट हो जाता है। इसमें अपनेपन की ही भावनाएं रह जाती है और सब भाव मिट जाते है। इसे अस्मित समाधि कहते हैं। इसमें केवल अहंकार ही रहता है। पतंजलि इस समाधि को सबसे उच्च समाधि मानते हैं।

2-आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि के अभ्यास के कारण जिस समय अर्न्तमुखी रूप से विषयां से विमुख प्रवृत्ति होने से, बुद्धि का अपने कारण प्रकृति में विलीन होती है वह अस्मितानुगत समाधि है। इन समाधियां आलम्बन रहता है। अतः इन्हें सालम्बन समाधि कहते हैं।

3-इसी अस्मितानुगत समाधि से ही सूक्ष्म होने पर पुरूष एवं चित्त में भिन्नता उत्पन्न कराने वाली वृत्ति उत्पन्न होती है। यह समाधि- अपर वैराग्य द्वारा साध्य है।

क्या है ‘असम्प्रज्ञात समाधि’ या निर्बीज समाधि का महत्व?-

07 FACTS;- 1-चेतना के हर शिखर पर बोध की नयी अनुभूति है, योग की नयी शक्ति की प्राप्ति है। अन्तर्यात्रा के इन प्रयोगों में जो पहले किया जा चुका है, अगली बार उससे कुछ अलग हटकर करना पड़ता है और इसकी परिणति भी कुछ अलग ही होती है। ज्यों- ज्यों यह सिलसिला चलता है, चित्त के विकार मिटते हैं। प्रत्येक विकार के मिटते ही एक नयी अनुभूति की किरण फूटती है।

2-इन विकारों के मिटने के बाद विचारों के मिटने का क्रम आता है। साथ ही साधक की योग अनुभूति सघन होती है और सबसे अंत में मिटते हैं- संस्कार। सभी तरह के संस्कारों के मिटने के साथ ही योग साधक निर्विचार से निर्बीज की ओर छलांग लगाता है।

3-अनासक्ति स्वाभाविक होती है। अंतस् में न तो विकारों की कीचड़ जमती है और न विचारों का शोर होता है। ऐसे में संस्कारों की छाया और छाप भी स्वभावतः ही हटती- मिटती है। अंतश्चेतना निर्बीज में छलांग लगाने के लिए तैयार होती है।इस तथ्य का खुलासा करते हुए

महर्षि पतंजलि कहते हैं-

''जब सारे नियंत्रणों पर का नियंत्रण पार कर लिया जाता है, तो निर्बीज समाधि फलित होती है और उसके साथ ही उपलब्धि होती है- जीवन से मुक्ति।''

4-योगर्षि पतंजलि ने इस सूत्र में जिस अनुभूति का संकेत किया है, वह व्यक्तित्व की अद्भुत घटना है। यह है- सृष्टि और जीवन में होने वाले सभी चमत्कारों का सार। यह चेतना का अंतिम शिखर है, जहाँ कोई नियंत्रण और संयम न होने के बावजूद प्रकाश और ज्ञान अपनी सम्पूर्णता में फलित होते हैं। यह वही आलोक लोक है- जिसकी चर्चा करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है- ‘ जहाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि का प्रकाश होने के बावजूद प्रकाश है। जहाँ पहुँचकर फिर से वापस नहीं आना पड़ता है, वही मेरा परम धाम है। यही शिव भक्तों का महाकैलाश है और विष्णु भक्तों का वैकुण्ठ। निर्गुण उपासकों को यही ब्रह्म सायुज्य मिलता है। परम योगियों का सत्यलोक यही है।'' 5-जीवन में भली-बुरी परिस्थितियाँ हमारे अपने ही किन्हीं भले-बुरे संस्कारों का परिणाम है। इन परिस्थितियों के प्रति हमारे मन में उठने वाले भली-बुरी भाव विचार की प्रतिक्रियाएँ अपनी प्रगाढ़ता में नये संस्कारों को जन्म देती है। इस तरह संस्कारों से परिस्थितियाँ और परिस्थितियों से संस्कार यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है।

6-आचार्य आदिशंकरा की भाषा में ‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्’ यानि कि फिर से जन्म और फिर मरण और फिर दुबारा माँ की कोख में आगमन-शयन। इसका कोई अंत-विराम नहीं। जन्म-मरण का यह सिलसिला अनवरत-अविराम चलता रहता है। यदि इसे कहीं विराम देना है, तो स्वयं ही चेतना पड़ता है और योग साधक को अनासक्ति, सहनशीलता और ध्यान की त्रिवेणी में गोते लगाने पड़ते हैं। इस त्रिवेणी में स्नान करने वाला चित्त ही जन्म-मरण के कालव्यूह से बाहर आ पाता है। 7-परन्तु निर्बीज समाधि के लिए चित्त के सभी संस्कारों का दहन-शोधन जरूरी है और यह प्रक्रिया कठिन एवं दीर्घ है। काम कई जन्मों का है। यदि इसे एक जन्म में पूरा करें, तो कठिन स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। चित्त से संस्कार तीव्रतापूर्वक निकालने पर जीवन में बड़ी तीव्रता से परिवर्तन आते हैं। शरीर भी इसे तभी सहन कर पाता है, जबकि निरन्तर तपरत रहे। अन्यथा बीच में इसके छूट जाने की स्थिति बन जाती है।

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NOTE;-

क्या है पांच महाभूत? -पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश,

क्या है पाँच तन्मात्रा?- गंध, रस, रूप, स्पर्श,शब्द

क्या है पांच कर्मेन्द्रिय? -वाक्, हाथ, पैर, गुदा और लिंग ,

क्या है पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ?- कान, नेत्र, रसना, नासिक और त्वचा

क्या है पांच महाभूत की पांचो तन्मात्राओं और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ से सम्बन्ध?-05 FACTS;-

1-अब देखें इन पांचो तन्मात्राओं के साथ अपने ज्ञानेन्द्रियाँ कैसे सम्बन्धित हैं। शब्द जो की आकाश का तन्मात्रा है आपको आकाश तत्व से परिचित करवाता है ।आप शब्द पर ध्यान लगायेंगे तो नि:शब्द की यात्रा ओर अग्रसर होंगे यह सत्य है ।

2-शब्द को सुनने का माध्यम है कान । स्पर्श को हम वायु के माध्यम से अनुभूत करते हैं ।त्वचा के माध्यम से हीं स्पर्श भासता है। किसी भी वस्तु का रूप हमें प्रकाश के द्वारा भासित होता है। और प्रकाश का स्त्रोत है अग्नि।अग्नि जहाँ भी होगी प्रकाश होगा हीं ।और रूप को प्रकाश के माध्यम से हम आँख से देखते हैं ।

3-हमें स्वाद का अहसास जिह्वा के द्वारा होता है और किसी भी पदार्थ में रस न हो तो उसका स्वाद महसूस नहीं होगा। और स्वाद के रस को प्रवाहित करने के लिए जल की आवश्यकता होती है।

4-नेत्र बंद करके निम्बू का स्मरण करें तो जिह्वा पर जल भर आयेगा आपके।गंध को हम नाक से महसूस करते है और जिस भी वस्तु में गंध होता है वह पृथ्वी से सम्बन्धित होगी हीं ।

क्या है तत्त्व' का शाब्दिक अर्थ?-

06 FACTS;-

1-तत्त्व है जिससे यथार्थ बना हुआ है। 'तत्त्व' का शाब्दिक अर्थ है, वास्तविक स्थिति, ययार्थता, वास्तविकता, असलियत। 'जगत् का मूल कारण' भी तत्त्व कहलाता है।

2-दुखों की निवृत्ति का साधन तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान हैं । दुःख की जड़ अज्ञान हैं ।जितना अधिक अज्ञान होगा उतना ही अधिक दुःख होगा।जिस तत्त्व का जितना यथार्थ ज्ञान होता जाएगा, उससे उतनी ही दुखनिवृत्तिरूप सुख की प्राप्ति होती जायेगी ।जब सारे तत्वों से यथार्थ ज्ञान हो जाएगा तो सारे तत्त्वों से अभय रूप सुख का लाभ होगा ।अतः सारे तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान ही सारे दुखों की जड़ काटना हैं । इसलिए तत्त्वों को संक्षेप में विचार किया जाता है।

3-योग में ईश्वर को और मिलाकर कुल 26तत्त्व माने गए हैं। सांख्य के 'पुरुष' से योग के ईश्वर में विशेषता यह है कि योग का ईश्वर क्लेश, कर्मविपाक आदि से पृथक् माना गया है।वेदांतियों के मत से ब्रह्म ही एकमात्र परमार्थ तत्त्व है।शून्यवादी बौद्धोंके मत से शून्य या अभाव ही परम तत्त्व है, क्योंकि जो वस्तु है, वह पहले नहीं थी और आगे भी न रहेगी।

4-कुछ जैन तो जीव और अजीव ये ही दो तत्त्व मानते हैं और कुछ पाँच तत्त्व मानते हैं—जीव, आकाश, धर्म, अधर्म, पुदगल और अस्तिकाय। चार्वाक के

मत में पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु ये ही तत्त्व माने गए हैं और इन्हीं से जगत् की उत्पत्ति कही गई है।

5-न्यायदर्शन में 16, वैशेषिक दर्शन में 6, और कश्मीर शैवदर्शन के अनुसार 36 तत्त्व हैं। इसी प्रकार अनेक दर्शनों की भिन्न भिन्न मान्यताएँ तत्त्व के संबंध में हैं।

6-सांख्यदर्शन के अनुसार २५ तत्त्व माने गए हैं ;-

मूल प्रकृत्ति से शोष तत्त्वों की उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार है—प्रकृति से महत्तत्व (बुद्धि), महत्तत्व से अहंकार, अहंकार से ग्यारह इंद्रियाँ (पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ और मन) और पाँच तन्मात्रा , पाँच तन्मात्रों से पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, आदि)। प्रलय काल में ये सब तत्त्व फिर प्रकृति में क्रमशः विलीन हो जाते हैं।

जडतत्त्व क्या है ?

06 FACTS;-

1-संसार प्रकृति के आठ जड़ तत्वों (पाँच स्थूल तत्व और तीन दिव्य तत्व) से मिलकर बना है। स्थूल तत्व = जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश। दिव्य तत्व = बुद्धि, मन और अहंकार। 2-हमारे स्वयं के दो रूप होते हैं एक बाहरी दिखावटी रूप जिसे स्थूल शरीर कहते हैं और दूसरा आन्तरिक वास्तविक दिव्य रूप जिसे जीव कहते हैं। बाहरी शरीर रूप स्थूल तत्वों के द्वारा निर्मित होता है और हमारा आन्तरिक जीव रूप दिव्य तत्वों के द्वारा निर्मित होता है।जीव को अपना आध्यात्मिक उत्थान करने के लिये सबसे पहले बुद्धि तत्व के द्वारा अहंकार तत्व को जानना होता है, अहंकार तत्व है जो स्थूल शरीर में रहते हुए कभी समाप्त नहीं हो सकता है। 3-अहंकार = अहं + आकार = स्वयं का रूप स्वयं के रूप को ही अहंकार कहते हैं, अहंकार दो प्रकार का होता है। शरीर को अपना वास्तविक रूप समझना "मिथ्या अहंकार" कहलाता है और जीव को अपना वास्तविक रूप समझना "शाश्वत अहंकार" कहलाता है।जब तक मनुष्य बुद्धि के द्वारा अपनी पहिचान स्थूल शरीर रूप से करता है और शरीर को ही कर्ता समझता है तब वह मिथ्या अहंकार से ग्रसित रहता है तब तक सभी मनुष्यों के ज्ञान पर अज्ञान का आवरण चढ़ा रहता है।अज्ञान से आवृत सभी जीव मोहनिशा (मोह रूपी रात्रि) में अचेत अवस्था (निद्रा अवस्था) में ही रहते हैं उन्हे मालूम ही नही होता है कि वह क्या कर रहें हैं और उन्हे क्या करना चाहिये।

4-भगवान की दो प्रमुख शक्तियाँ एक ज़ड़ शक्ति जिसमें जीव भी शामिल है "अपरा शक्ति" कहते हैं, दूसरी चेतन शक्ति यानि आत्मा "परा शक्ति" कहते हैं। यही अपरा और परा शक्ति के संयोग से ही सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन सुचारु रूप से चलता रहता है।जब कोई मनुष्य भगवान की कृपा से श्रद्धा भाव से निरन्तर किसी तत्वदर्शी संत के सम्पर्क में आता है तब वह मनुष्य सचेत अवस्था (जाग्रत अवस्था) में आने लगता है, तब वह अपनी पहिचान जीव रूप से करने लगता है तब उसका मिथ्या अहंकार मिटने लगता है और शाश्वत अहंकार में परिवर्तित होने लगता है यहीं से उसके अज्ञान का आवरण धीरे-धीरे हटने लगता है और ज्ञान प्रकट होने लगता है।

5-हमारे दोनों स्वरूप ज़ड़ ही हैं, जब पूर्ण चेतन स्वरूप "परमात्मा" का आंशिक चेतन अंश "आत्मा" जब जीव स्वरूप से संयुक्त होता है तब हमारे आन्तरिक स्वरूप जीव में चेतनता आ जाती है जिससे हमारा बाहरी स्वरूप स्थूल शरीर में भी चेतन शक्ति का संचार हो जाता है, इस प्रकार ज़ड़ और चेतन का संयोग से सृष्टि का संचालन निरन्तर होता रहता है।जीव मिथ्या अहंकार के कारण ही स्थूल शरीर धारण करके बार-बार जन्म और मृत्यु को प्राप्त होता रहता है, जब जीव का मिथ्या अंहकार मिटकर शाश्वत अहंकार में परिवर्तित हो जाता है तभी जीव मोक्ष के मार्ग पर चलने लगता है।

6-चौबीस जडतत्त्वों के प्रथम दो भेद प्रकृति और विकृति है , उनमे से आठ प्रकृतियाँ है और सोलह विकृतियां हैं।जो किसी नए तत्त्व के उपद्दन ( उत्त्पत्ति ) का कारण हो उसको प्रकृति कहते है और जिसके आगे कोई नया तत्त्व उत्पन्न न हो उसको विकृत्ति कहते है |

7-आठ प्रकीर्तियों में प्रधान ( मूल प्रकृति), महत्तत्त्व ,अहंकार और पांच तन्मात्राएँ – शब्द – तन्मात्रा , स्पर्श – तन्मात्रा , रूप तन्मात्रा , रस – तन्मात्रा और गंध – तन्मात्रा।

8-सोलह विकृतियाँ है – पांच स्थूलभूत आकाश , वायु, अग्नि, जल, और पृथ्वी , और ग्यारह इन्द्रियाँ जिनमे पांच ज्ञानेन्द्रियाँ श्रोत्र , त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण और पांच कर्मेन्द्रियाँ – वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा और ग्यारहवाँ मन।

9- प्रकृति के तीन गुण .. चौबीसों जडतत्त्व तीन गुणों ( सत्त्व, रजस और तमस ) हैं।सत्त्व का स्वभाव प्रकाश,रजस का क्रिया औरतमस का स्थिति है

जो वस्तु स्थिर है ( उसमे तमस प्रधान होता है , रजस और सत्त्व गौण रूप में

रहते है ) ,उसमे क्रिया उत्पन्न होती हो जाती है ( तो उसमे रजस प्रधान होता है , सत्त्व और तमस गौण रूप में होता है )

9-1-वेगवाली क्रिया के पीछे उसमे प्रकाश प्रकट हो जाता है ( तो उसमे सत्त्व प्रधान होता है , रजस और तमस गौण रूप में होता है ) ,

जो प्रकाशवाली है वह समयान्तर में प्रकाशहीन हो जाती है और

अंत में क्रियाहीन भी हो जाती है ।ये तीनो स्वभाव प्रत्येक वस्तु में पाये जाते

है।पुरुष के अतिरिक्त जो कुछ भी हैं यह सब त्रिगुणात्मक ही है।

10-- चेतनतत्त्व (पुरुष) – पच्चीसवाँ चेतनतत्त्व पुरुष है , जो तीन अर्थों का बोधक है |

( 1) चेतनतत्त्व व्यष्टि (पिण्ड) शरीरों से मिश्रित।

( 2) चेतनतत्त्व (ब्रह्माण्ड) समष्टि जगत से मिश्रित ।

(१) गुणों का प्रथम विषम परिणाम ‘महत्तत्त्व’ – है , जिसमे कर्तापन का अहंकार बीजरूप में छिपा हुआ है।

( 3) शुद्ध चेतनतत्त्व जडतत्त्व से निखरा हुआ केवल शुद्ध ज्ञानस्वरूप

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