Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--05)


अष्टावक्र उवाच।

देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोsसि पत्रक ।

बोधोsहं ज्ञानखंगेन तन्निष्कृत्य सुखी भव ।।14।।

नि:संगो निष्‍क्रियोउसि त्वं स्वप्रकाशो निरंजन:?

अयमेव हि ले बंध: समाधिमनुतिष्ठसि ।।15।।

त्वया व्याप्तमिदं विश्व त्वयि प्रोतं यथार्थत: ।

शुद्धबुद्ध स्वरूपस्‍त्‍वं मागम: क्षुद्रचित्तताम् ।।16।।

निरपेक्षो निर्विकारो निर्भर: शीतलाशय:।

अगाध बुद्धिरक्षुब्‍धो भव चिन्यात्रवासन: ।।17।।

साकारमनृतं विद्धि निराकारं तु निश्चलम् ।

एतत्तत्वोपदेशेन न पुनर्भवसंभव ।।18।।

यथैवादर्शमध्‍यस्थे रूपेन्त: परितस्तम: ।

यथैवास्थिन् शरीरेsन्तः परित परमेश्वर: ।।19।।

एकं सर्वगतं व्योम बहिरंतर्यथा घटे ।

नित्यं निरंतरं ब्रह्म सर्व भूतगणे तथा ।।20।।

पहला सूत्र

अष्टावक्र ने कहा, 'हे पुत्र! तू बहुत काल से देहाभिमान के पाश में बंधा हुआ है। उस पाश को मैं बोध हूं, इस ज्ञान की तलवार से काट कर तू सुखी हो!'

अष्टावक्र की दृष्टि में—और वही शुद्धतम दृष्टि है, आत्यंतिक दृष्टि है—बंधन केवल मान्यता का है। बंधन वास्तविक नहीं है।

रामकृष्ण के जीवन में ऐसा उल्लेख है कि जीवन भर तो उन्होंने मां काली की पूजा— अर्चना की, लेकिन अंततः अंतत: उन्हें लगने लगा कि यह तो द्वैत ही है, अभी एक का अनुभव नहीं हुआ। प्रीतिकर है, सुखद है, लेकिन अभी दो तो दो ही बने हैं। कोई स्त्री को प्रेम करता, कोई धन को प्रेम करता, कोई पद को, उन्होंने मां काली को प्रेम किया—लेकिन प्रेम अभी भी दो में बंटा है; अभी परम अद्वैत नहीं घटा। पीड़ा होने लगी। तो वे प्रतीक्षा करने लगे कि कोई अद्वैतवादी, कोई वेदांती, कोई ऐसा व्यक्ति आ जाये जिससे राह मिल सके।

एक परमहंस, 'तोतापुरी' गुजरते थे, रामकृष्ण ने उन्हें रोक लिया और कहा, मुझे एक के दर्शन करा दें। तोतापुरी ने कहा,यह कौन—सी कठिन बात है? दो मानते हो, इसलिए दो हैं। मान्यता छोड़ दो! पर रामकृष्ण ने कहा, मान्यता छोड़नी बड़ी कठिन है। जन्म भर उसे साधा। आंख बंद करता हूं काली की प्रतिमा खड़ी हो जाती है। रस में डूब जाता हूं। भूल ही जाता हूं कि एक होना है। आंख बंद करते ही दो हो जाता हूं। ध्यान करने की चेष्टा करता हूं द्वैत हो जाता है। मुझे उबासे!

तो तोतापुरी ने कहा, ऐसा करो जब काली की प्रतिमा बने तो उठाना एक तलवार और दो टुकडे कर देना। रामकृष्ण ने कहा, तलवार वहां कहां से लाऊंगा?

तो जो तोतापुरी ने कहा, वही अष्टावक्र का वचन है। तोतापुरी ने कहा, यह काली की प्रतिमा कहां से ले आये हो? वहीं से तलवार भी ले आना। यह भी कल्पना है। इसे भी कल्पना से सजाया— संवारा है। जीवन भर साधा है। जीवन भर पुनरुक्त किया है, तो प्रगाढ़ हो गई है। यह कल्पना ही है। सभी को आंख बंद करके काली तो नहीं आती।

ईसाई आंख बंद करता है, वर्षों की चेष्टा के बाद, तो क्राइस्ट आते हैं। कृष्ण का भक्त आंख बंद करता है तो कृष्ण आते हैं। बुद्ध का भक्त आंख बंद करता है तो बुद्ध आते हैं। महावीर का भक्त आंख बंद करता है तो महावीर आते हैं। जैन को तो क्राइस्ट नहीं आते। क्रिश्चियन को तो महावीर नहीं आते। जो तुम कल्पना साधते