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अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--03)


अष्टावक्र उवाच।

एको द्रष्टाsसि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।

अयमेव हि ते बंधो द्रष्टारं यश्यसीतरम्।।7।।

अहं कतेत्यहंमानमहाकृष्णहि दंशित।

नाहं कत्तेंति विश्वासामृत पीत्वा सुखी भव।। 8।।

एको विशुद्धबोधोउहमिति निश्चवह्रिना।

प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोक: सुखी भव।। 9।।

यत्र विश्वमिदं भाति कल्पित रज्जुसर्यवत्!

आनंदपरमानद स बोधक्ल सुखं चर।। 10।।

मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्ययि।

किंवदतीह सत्येयं या मति: स गतिर्भवेत।। 11।।

आत्मा साक्षी विभु: पूर्ण एको मुक्तश्चिद क्रिय:।

असंगो निस्पृह: शांतो भ्रमात संसारवानिव!! 12।।

कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मान परिभावय।

आभासोsहं भ्रमं मुक्त्‍वा भावं बाह्यमथांतरम्।।13।।

पहला सूत्र:

अष्‍टावक्र ने कहा, तू सबका एक द्रष्टा है और सदा सचमुच मुक्त है। तेरा बंधन तो यही है कि तू अपने को छोड़ दूसरे को द्रष्टा देखता है।’

यह सूत्र अत्यंत बहुमूल्य है। एक—एक शब्द इसका ठीक से समझें!

'तू सबका एक द्रष्टा है। एको द्रष्टाऽसि सर्वस्व! और सदा सचमुच मुक्त है।’

साधारणत: हमें अपने जीवन का बोध दूसरों की आंखों से मिलता है। हम दूसरों की आंखों का दर्पण की तरह उपयोग करते हैं। इसलिए हम द्रष्टा को भूल जाते हैं, और दृश्य बन जाते है। स्वाभाविक भी है।

छोटा बच्चा पैदा हुआ। उसे अभी अपना कोई पता नहीं। वह दूसरों की आंखों में झांककर ही देखेगा कि मैं कौन हूं।

अपना चेहरा तो दिखायी पडता नहीं, दर्पण खोजना होगा। जब तुम दर्पण में अपने को देखते हो तो तुम दृश्य हो गये,द्रष्टा न रहे। तुम्हारी अपने से पहचान ही कितनी है? उतनी जितना दर्पण ने कहा।

मां कहती है बेटा सुंदर है, तो बेटा अपने को सुंदर मानता है। शिक्षक कहते हैं स्कूल में, बुद्धिमान हो, तो व्यक्ति अपने को बुद्धिमान मानता है। कोई अपमान कर देता है, कोई निंदा कर देता है, तो निंदा का स्वर भीतर समा जाता है। इसलिए तो हमें अपना बोध बड़ा भ्रामक मालूम होता है, क्योंकि अनेक स्वरों से मिलकर बना है; विरोधी स्वरों से मिलकर बना है। किसी ने कहा सुंदर हो, और किसी ने कहा, 'तुम, और सुंदर! शक्ल तो देखो आईने में!' दोनों स्वर भीतर चले गये, द्वंद्व पैदा हो गया। किसी ने कहा, बड़े बुद्धिमान हो, और किसी ने कहा, तुम जैसा बुद्ध आदमी नहीं देखा—दोनों स्वर भीतर चले गये, दोनों भीतर जुड़ गये। बड़ी बेचैनी पैदा हो गयी, बड़ा द्वंद्व पैदा हो गया।

इसीलिए तो तुम निश्चित नहीं हो कि तुम कौन हो। इतनी भीड़ तुमने इकट्ठी कर ली है मतों की! इतने दर्पणों में झांका है, और सभी दर्पणों ने अलग—अलग खबर दी! दर्पण तुम्हारे संबंध में थोड़े ही खबर देते हैं, दर्पण अपने संबंध में खबर देते हैं।

तुमने दर्पण देखे होंगे, जिनमें तुम लंबे हो जाते हो; दर्पण देखे होंगे, जिनमें तुम मोटे हो जाते। दर्पण देखे होंगे, जिनमें तुम अति सुंदर दिखने लगते। दर्पण देखे होंगे, जिनमें तुम अति कुरूप हो जाते, अष्टावक्र हो जाते।

दर्पण में जो झलक मिलती है वह तुम्हारी नहीं है, दर्पण के अपने स्वभाव की है। विरोधी बातें इकट्ठी होती चली जाती हैं। इन्हीं विरोधी बातों के संग्रह का नाम तुम समझ लेते हो, मैं हूं! इसलिए तुम सदा कंपते रहते हो, डरते रहते हो।

लोकमत का कितना भय होता है! कहीं लोग बुरा न सोचें। कहीं लोग ऐसा न समझ लें कि मैं मूढ़ हूं! कहीं ऐसा न समझ लें कि मैं असाधु हूं! लोग कहीं ऐसा न समझ लें; क्योंकि लोगों के द्वारा ही हमने अपनी आत्मा निर्मित की है।

गुरजिएफ अपने शिष्यों से कहता था. अगर तुम्हें आत्मा को जानना हो तो तुम्हें लोगों को छोड़ना होगा। ठीक कहता था। सदियों से यही सदगुरुओं ने कहा है। अगर तुम्हें स्वयं को पहचानना हो तो तुम्हें दूसरों की आंखों में देखना बंद कर देना होगा।

मेरे देखे, बहुत—से खोजी, सत्य के अन्वेषक समाज को छोड़ कर चले गये—उसका कारण यह नहीं था कि समाज में रह कर सत्य को पाना असंभव है, उसका कारण इतना ही था कि समाज में रह कर स्वयं की ठीक—ठीक छवि जाननी बहुत कठिन है। यहां लोग खबर दिये ही चले जाते हैं कि तुम कौन हो। तुम पूछो न पूछो, सब तरफ से झलकें आती ही रहती हैं कि तुम कौन हो। और हम धीरे—धीरे इन्हीं झलकों के लिए जीने लगते हैं।

मैंने सुना, एक राजनेता मरा। उसकी पत्नी दो वर्ष पहले मर गयी थी। जैसे ही राजनेता मरा, उसकी पत्नी ने उस दूसरे लोक के द्वार पर उसका स्वागत किया। लेकिन राजनेता ने कहा. अभी मैं भीतर न आऊंगा। जरा मुझे मेरी अर्थी के साथ राजघाट तक हो आने दो।

पत्नी ने कहा अब क्या सार है? वहां तो देह पड़ी रह गयी, मिट्टी है।

उसने कहा मिट्टी नहीं; इतना तो देख लेने दो, कितने लोग विदा करने आये!

राजनेता और उसकी पत्नी भी अर्थी के साथ—साथ—किसी को तो दिखाई न पड़ते थे, पर उनको अर्थी दिखाई पड़ती थी—चले.। बड़ी भीड़ थी! अखबारनवीस थे, फोटोग्राफर थे। झंडे झुकाए गये थे। फूल सजाये गये थे। मिलिट्री के ट्रक पर अर्थी रखी थी। बड़ा सम्मान दिया जा रहा था। तोपें आगे—पीछे थीं। सैनिक चल रहे थे। गदगद हो उठा राजनेता।

पत्नी ने कहा, इतने प्रसन्न क्या हो रहे हो?

उसने कहा, अगर मुझे पता होता कि मरने पर इतनी भीड़ आयेगी तो मैं पहले कभी का मर गया होता। तो हम पहले ही न मर गये होते, इतने दिन क्यों राह देखते! इतनी भीड़ मरने पर आये इसी के लिए तो जीये!

भीड़ के लिए लोग जीते हैं, भीड़ के लिए लोग मरते हैं।

दूसरे क्या कहते हैं, यह इतना मूल्यवान हो गया है कि तुम पूछते ही नहीं कि तुम कौन हो। दूसरे क्या कहते हैं, उन्हीं की कतरन छांट—छांटकर इकट्ठी अपनी तस्वीर बना लेते हो। वह तस्वीर बड़ी डांवांडोल रहती है, क्योंकि लोगों के मन बदलते रहते हैं। और फिर लोगों के मन ही नहीं बदलते रहते, लोगों के कारण भी बदलते रहते हैं।

कोई आकर तुमसे कह गया कि आप बड़े साधु—पुरुष हैं, उसका कुछ कारण है—खुशामद कर गया। साधु—पुरुष तुम्हें मानता कौन है! अपने को छोड्कर इस संसार में कोई किसी को साधु—पुरुष नहीं मानता।

तुम अपनी ही सोचो न! तुम अपने को छोड्कर किसको साधु —पुरुष मानते हो? कभी—कभी कहना पडता है। जरूरतें हैं,जिंदगी है, अड़चनें हैं—झूठे को सच्चा कहना पडता है; दुर्जन को सज्जन कहना पडता है, कुरूप को सुंदर की तरह प्रशंसा करनी पड़ती है, स्तुति करनी पड़ती है, खुशामद करनी पड़ती है। खुशामद इसीलिए तो इतनी बहुमूल्य है।

खुशामद के चक्कर में लोग क्यों आ जाते हैं? मूढ़ से मूढ़ आदमी से भी कहो कि तुम महाबुद्धिमान हो तो वह भी इनकार नहीं करता र क्योंकि उसको अपना तो कुछ पता नहीं है, तुम जो कहते हो वही सुनता है, तुम जो कहते हो वही हो जाता है।

तो उनके कारण बदल जाते हैं। कोई कहता है, सुंदर हो; कोई कहता है, असुंदर हो; कोई कहता है, भले हो, कोई कहता है, बुरे हो—यह सब इकट्ठा होता चला जाता है। और इन विपरीत मतों के आधार पर तुम अपनी आत्मा का निर्माण कर लेते हो। तुम ऐसी बैलगाड़ी पर सवार हो जिसमें सब तरफ बैल जुते हैं, जो सब दिशाओं में एक साथ जा रही है तुम्हारे अस्थिपंजर ढीले हुए जा रहे हैं। तुम सिर्फ घसिटते हो, कहीं पहुंचते नहीं—पहुंच सकते नहीं!

पहला सूत्र है आज का 'तू सबका एक द्रष्टा है। और तू सदा सचमुच मुक्त है।’

व्यक्ति दृश्य नहीं है, द्रष्टा है।

दुनियां में तीन तरह के व्यक्ति हैं, वे, जो दृश्य बन गये—वे सबसे ज्यादा अंधेरे में हैं, दूसरे वे, जो दर्शक बन गये—वे पहले से थोड़े ठीक हैं, लेकिन कुछ बहुत ज्यादा अंतर नहीं है; तीसरे वे, जो द्रष्टा बन गए। तीनों को अलग—अलग समझ लेना जरूरी है।

जब तुम दृश्य बन जाते हो तो तुम वस्तु हो गये, तुमने आत्मा खो दी। इसलिए राजनेता में आत्मा को पाना मुश्किल है;अभिनेता में आत्मा को पाना मुश्किल है। वह दृश्य बन गया है। वह दृश्य बनने के लिए ही जीता है। उसकी सारी कोशिश यह है कि मैं लोगों को भला कैसे लग र सुंदर कैसे लगू श्रेष्ठ कैसे लग? श्रेष्ठ होने की चेष्टा नहीं है, श्रेष्ठ लगने की चेष्टा है। कैसे श्रेष्ठ दिखायी पडूं!

तो जो दृश्य बन रहा है, वह पाखंडी हो जाता है। वह ऊपर से मुखौटे ओढ़ लेता है, ऊपर से सब आयोजन कर लेता है— भीतर सड़ता जाता है।

फिर दूसरे वे लोग हैं, जो दर्शक बन गए। उनकी बड़ी भीड़ है। स्वभावत: पहले तरह के लोगों के लिए दूसरे तरह के लोगों की जरूरत है; नहीं तो दृश्य बनेंगे लोग कैसे? कोई राजनेता बन जाता है, फिर ताली बजाने वाली भीड़ मिल जाती है। तो दोनों में बड़ा मेल बैठ जाता है। नेता हो तो अनुयायी भी चाहिए। कोई नाच रहा हो तो दर्शक भी चाहिए। कोई गीत गा रहा हो तो सुनने वाले भी चाहिए। तो कोई दृश्य बनने में लगा है, कुछ दर्शक बनकर रह गये हैं। दर्शकों की बड़ी भीड़ है।

पश्चिम के मनोवैज्ञानिक बड़े चिंतित हैं, क्योंकि लोग बिलकुल ही दर्शक होकर रह गए हैं। फिल्म देख आते हैं, रेडिओ खोल लेते हैं, टेलिविजन के सामने बैठ जाते हैं घंटों! अमरीका में करीब—करीब औसत आदमी छह घंटे रोज टेलिविजन देख रहा है। फुटबाल का मैच हो, देख आते हैं। कुश्ती हो रही हो तो देख आते हैं। क्रिकेट हो तो देख आते हैं। ओलंपिक हो तो देख आते हैं। बस सिर्फ देखने वाले रह गए हैं। खड़े हैं दर्शक की तरह राह के किनारे राहगीर। जीवन का जुलूस निकल रहा है, तुम देख रहे हो।

कुछ हैं जो जीवन के जुलूस में सम्मिलित हो गये हैं; वह जरा कठिन धंधा है; वहां बड़ी प्रतियोगिता है। जुलूस में सम्मिलित होना जरा मुश्किल है। बड़े संघर्ष और बड़े आक्रमण की जरूरत है। लेकिन जुलूस को देखने वालों की भी जरूरत हैं। वे किनारे खड़े देख रहे हैं। अगर वे न हों तो जुलूस भी विदा हो जाये।

तुम थोड़ा सोचो, अगर अनुयायी न चलें पीछे तो नेताओं का क्या हो! अकेले—'झंडा ऊंचा रहे हमारा' —बड़े बुद्ध मालूम पड़े! बड़े पागल मालूम पड़े! राह—किनारे लोग चाहिए, भीड़ चाहिए। तो पागलपन भी ठीक मालूम पड़ता है। तुम थोड़ा सोचो, कोई देखने न आये और क्रिकेट का मैच होता रहे—मैच के प्राण निकल गए! मैच के प्राण मैच में थोड़े ही हैं : देखने जो लाखों लोग इकट्ठे होते हैं, उनमें हैं।

और आदमी अदभुत है! आदमी तो घुड़दौड़ देखने भी जाते हैं। यह पूरा कोरेगांव पार्क घुड़दौड़ देखने वालों की बस्ती है। यह बड़ी हैरानी की बात है. आदमी को दौड़ाओ कोई घोड़ा देखने नहीं आता! घोड़े दौड़ते हैं, आदमी देखने जाते हैं। यह घोड़ों से भी गयी—बीती स्थिति हो गई। देखते ही देखते जिंदगी बीत जाती है। दर्शक.! प्रेम करते नहीं तुम; फिल्म में प्रेम चलता है, वह देखते हो। नाचते नहीं तुम; कोई नाचता l, तुम देखते हो। गीत तुम नहीं गुनगुनाते; कोई गुनगुनाता है, तुम सुनते हो। तुम्हारा जीवन अगर नपुंसक हो जाये, अगर उसमें से सब जीवन ऊर्जा खो जाये तो आश्चर्य क्या? तुम्हारे जीवन में कोई गति नहीं है,कोई ऊर्जा का प्रवाह नहीं है। तुम मुर्दे की भांति बैठे हो। बस तुम्हारा कुल काम इतना है कि देखते रहो, कोई दिखाता रहे, तुम देखते रहो। ये दो ही की बड़ी संख्या है दुनियां में। दोनों एक—दूसरे से बंधे हैं।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं, दुनियां में हर बीमारी के दौ पहलू होते हैं। दुनियां में कुछ लोग हैं, जिनको मनोवैज्ञानिक कहते हैं. मैसोचिस्ट, स्व—दुखवादी! वे अपने को सताते हैं। और दुनियां में दूसरा एक वर्ग है, जिसको मनोवैज्ञानिक कहते हैं सैडिस्ट, पर—दुखवादी। वे दूसरे को सताते हैं। दोनों की जरूरत है। इसलिए दोनों जब मिल जाते हैं तो बड़ा राग —रंग चलता है।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अगर पति दूसरों को सताने वाला हो और स्त्री खुद को सताने वाली हो तो इससे बढ़िया जोड़ा और दूसरा नहीं होता। स्त्री अपने को सताने में मजा लेती है, पति दूसरे को सताने में मजा लेता है—राम मिलायी जोडी, कोई अंधा कोई कोढ़ी! मिल गये, बिलकुल मिल गये, बिलकुल ठीक बैठ गये!

हर बीमारी के दो पहलू होते हैं। दृश्य और दर्शक एक ही बीमारी के दो पहलू हैं। स्त्रियां आमतौर से दृश्य बनना पसंद करती हैं, पुरुष आमतौर से दर्शक बनना पसंद करते हैं। मनोवैज्ञानिकों की भाषा में स्त्रियों को वे कहते हैं एग्जीबीशनिस्ट;नुमाइशी। उनका सारा रस नुमाइश बनने में है।

मुल्ला नसरुद्दीन मक्खियां मार रहा था। बहुत मक्खियां हो गयी थीं तो पत्नी ने कहा, इनको हटाओ। आईने के पास मक्खियां मार रहा था; बोला कि एक जोड़ा, दो मादाएँ बैठी हैं। पत्नी ने कहा हद हो गई! तुमने पता कैसे चलाया कि नर हैं कि मादा हैं?

उसने कहा, घंटे भर से आईने पर बैठी हैं—मादाएं होनी चाहिए। नर को आईने के पास क्या करना?

स्त्रियो आईने से छूट ही नहीं पातीं। आईना मिल जाये तो चुंबक की तरह खींच लेता है। सारी जिंदगी आईने के सामने बीत रही है—कपड़ों में, वस्त्रों में, सजावट में, श्रृंगार में! और बड़ी हैरानी की बात है, इतनी सज— धजकर निकलती हैं, फिर कोई धक्का दे तो नाराज होती हैं! कोई धक्‍का न दे तो भी दुखी होंगी, क्योंकि धक्का देने के लिए इतना सज—धजने का इंतजाम था,नहीं तो प्रयोजन क्या था? पति के सामने स्त्रियां नहीं सजती। पति के सामने तो वे भैरवी बनी बैठी हैं। क्योंकि वहां धक्का— मुक्का समाप्त हो चुका है। लेकिन घर के बाहर जाएं, तब बड़ी तैयारी करती हैं। वहां दर्शक मिलेंगे। वहां दृश्य बनना है।

मनुष्य को, पुरुष को मनोवैज्ञानिक कहते हैं. वोयूर। उसकी सारी नजर देखने में है। उसका सारा रस देखने में है।

स्त्रियों को देखने में रस नहीं है र दिखाने में रस है। इसलिए तो स्त्री—पुरुषों का जोडा बैठ जाता है। बीमारी के दो पहलू बिलकुल एक साथ बैठ जाते हैं। और ये दोनों ही अवस्थाएं रूण हैं।

अष्टावक्र कहते हैं मनुष्य का स्वभाव द्रष्टा का है। न तो दृश्य बनना है और न दर्शक।

अब कभी तुम यह भूल मत कर लेना.। कई बार मैंने देखा है, कुछ लोग यह भूल कर लेते हैं, वे समझते हैं दर्शक हो गए तो द्रष्टा हो गये। इन दोनों शब्दों में बड़ा बुनियादी फर्क है। भाषा—कोश में शायद फर्क न हो—वहां दर्शक और द्रष्टा का एक ही अर्थ होगा, लेकिन जीवन के कोश में बड़ा फर्क है।

दर्शक का अर्थ है दृष्टि दूसरे पर है। और द्रष्टा का अर्थ है : दृष्टि अपने पर है। दृष्टि देखने वाले पर है, तो द्रष्टा। और दृष्टि दृश्य पर है, तो दर्शक। बडा क्रांतिकारी भेद है, बड़ा बुनियादी भेद है! जब तुम्हारी नजर दृश्य पर अटक जाती है और तुम अपने को भूल जाते हो तो दर्शक। जब तुम्हारी दृष्टि से सब दृश्य विदा हो जाते हैं, तुम ही तुम रह जाते हो, जागरण—मात्र रह जाता है, होश—मात्र रह जाता है—तो द्रष्टा।

तो दर्शक तो तुम तब हो जब तुम बिलकुल विस्मृत हो गए; तुम अपने को भूल ही गए; नजर लग गयी वहां। सिनेमा—हाल में बैठे हो. तीन घंटे के लिए अपने को भूल जाते हो, याद ही नहीं रहती कि तुम कौन हो। दुख—सुख, चिंताएं सब भूल जाती हैं। इसीलिए तो भीड़ वहां पहुंचती है। जिंदगी में बड़ा दुख है, चिंता है, परेशानी है—कहीं चाहिए भूलने का उपाय! लोग बिलकुल एकाग्र चित्त हो जातै हैं। बस ध्यान उनका लगता ही फिल्म में है। वहां देखते हैं पर्दे पर कुछ भी नहीं है, छायाएं डोल रही हैं, मगर लोग बिलकुल एकाग्र चित्त हैं। बीमारी भूल जाती, चिंता भूल जाती, बुढ़ापा भूल जाता, मौत भी आती हो तो भूल जाती है——लेकिन द्रष्टा नहीं हो गए हो तुम फिल्म में बैठकर, दर्शक हो गए; भूल ही गए अपने को; स्मरण ही न रहा कि मैं कौन हूं। यह जो देखने की ऊर्जा है भीतर इसकी तो स्मृति ही खो गयी, बस सामने दृश्य है, उसी पर अटक गए, उसी में सब भांति डूब गए।

दर्शक होना एक तरह का आत्म—विस्मरण है। और द्रष्टा होने का अर्थ है. सब दृश्य विदा हो गए, पर्दा खाली हो गया;अब कोई फिल्म नहीं चलती वहां; न कोई विचार रहे, न कोई शब्द रहे, पर्दा बिलकुल शून्य हो गया—कोरा और शुभ्र, सफेद! देखने को कुछ भी न बचा, सिर्फ देखने वाला बचा। और अब देखने वाले में डुबकी लगी, तो द्रष्टा!

दृश्य और दर्शक, मनुष्यता इनमें बंटी है। कभी—कभी कोई द्रष्टा होता है—कोई अष्टावक्र, कोई कृष्ण, कोई महावीर, कोई बुद्ध। कभी—कभी कोई जागता और द्रष्टा होता है। तू सबका एक द्रष्टा है।

और इस सूत्र की खूबियां ये हैं कि जैसे ही तुम द्रष्टा हुए, तुम्हें पता चलता है द्रष्टा तो एक ही है संसार में, बहुत नहीं हैं। दृश्य बहुत हैं, दर्शक बहुत हैं। अनेकता का अस्तित्व ही दृश्य और दर्शक के बीच है। वह झूठ का जाल है। द्रष्टा तो एक ही है।

ऐसा समझो कि चांद निकला, पूर्णिमा का चांद निकला। नदी—पोखर में, तालाब—सरोवर में, सागर में, सरिताओं में, सब जगह प्रतिबिंब बने। अगर तुम पृथ्वी पर घूमों और सारे प्रतिबिंबों का अंकन करो तो करोड़ों, अरबों, खरबों प्रतिबिंब मिलेंगे—लेकिन चांद एक है, प्रतिबिंब अनेक हैं। द्रष्टा एक है; दृश्य अनेक हैं, दर्शक अनेक हैं। वे सिर्फ प्रतिबिंब हैं, वे छायाएं हैं।

तो जैसे ही कोई व्यक्ति दृश्य और दर्शक से मुक्त होता है—न तो दिखाने की इच्छा रही कि कोई देखे, न देखने की इच्छा रही; देखने और दिखाने का जाल छूटा; वह रस न रहा—तो वैराग्य। अब कोई इच्छा नहीं होती कि कोई देखे और कहे कि सुंदर हो, सज्जन हो, संत हूो, साधु हो। अगर इतनी भी इच्छा भीतर रह गयी कि लोग तुम्हें साधु समझें तो अभी तुम पुराने जाल में पड़े हो। अगर इतनी भी आकांक्षा रह गयी मन में कि लोग तुम्हें संत पुरुष समझें तो तुम अभी पुराने जाल में पड़े हो;अभी संसार नहीं छूटा। संसार ने नया रूप लिया, नया ढंग पकड़ा, लेकिन यात्रा पुरानी ही जारी है, सातत्य पुराना ही जारी है।

क्या करोगे देखकर? खूब देखा, क्या पाया? क्या करोगे दिखाकर? कौन है यहां, जिसको दिखाकर कुछ मिलेगा?

इन दोनों से पार हट कर, द्वंद्व से हट कर जो द्रष्टा में डूबता है, तो पाता है कि एक ही है। यह पूर्णिमा का चांद तो एक ही है। यह सरोवरों, पोखरों, तालाबों, सागरों में अलग—अलग दिखायी पड़ता था; अलग—अलग दर्पण थे, इसलिए दिखायी पड़ता था।

मैंने सुना है, एक राजमहल था। सम्राट ने महल बनाया था सिर्फ दर्पणों से। दर्पण ही दर्पण थे अंदर। काँच—महल था। एक कुत्ता, सम्राट का खुद का कुत्ता, रात बंद हो गया, भूल से अंदर रह गया। उस कुत्ते की अवस्था तुम समझ सकते हो क्या हुई होगी। वही आदमी की अवस्था है। उसने चारों तरफ देखा, कुत्ते ही कुत्ते थे! हर दर्पण में कुत्ता था। वह घबड़ा गया। वह भौंका।

जब आदमी भयभीत होता है तो दूसरे को भयभीत करना चाहता है। शायद दूसरा भयभीत हो जाये तो अपना भय कम हो जाये।

वह भौंका, लेकिन स्वभावत: वहां तो दर्पण ही थे; दर्पण—दर्पण से कुत्ते भौंके। आवाज उसी पर लौट आयी; अपनी ही प्रतिध्वनि थी। वह रात भर भौंकता रहा और भागता और दर्पणों से जूझता, लहूलुहान हो गया। वहां कोई भी न था, अकेला था। सुबह मरा हुआ पाया गया। सारे भवन में खून के चिह्न थे। उसकी कथा आदमी की कथा है।

यहां दूसरा नहीं है। यहां अन्य है ही नहीं। जो है, अनन्य है। यहां एक है। लेकिन उस एक को जब तक तुम भीतर से न पकड़ लोगे, खयाल में न आयेगा।

'तू सबका एक द्रष्टा है, और सदा सचमुच मुक्त है।’

अष्टावक्र कहते हैं सचमुच मुक्त है। इसे कल्पना मत समझना।

आदमी बहुत अदभुत है! आदमी सोचता है कि संसार तो सत्य है और ये सत्य की बातें सब कल्पना हैं। दुख तो सत्य मानता है, सुख की कोई किरण उतरे तो मानता है कोई सपना है, कोई धोखा है।

मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, बडा आनंद मालूम हो रहा है, शक होता है यह कहीं भ्रम तो नहीं! दुख में इतने जन्मों—जन्मों तक रहे हैं कि भरोसा ही खो गया कि आनंद हो भी सकता है। आनंद असंभव मालूम होने लगा है। रोने का अभ्यास ऐसा हो गया है, दुख का ऐसा अभ्यास हो गया है, काटो से ऐसी पहचान हो गयी है कि फूल अगर दिखायी भी पड़े तो भरोसा नहीं आता, लगता है सपना है, आकाश—कुसुम है, होगा नहीं, हो नहीं सकता!

इसलिए अष्टावक्र कहते हैं, सचमुच मुक्त है! व्यक्ति बंधा नहीं है। बंधन असंभव है, क्योंकि केवल परमात्मा है, केवल एक है। न तो बांधने को कुछ है, न बंधने को कुछ है।

'तू सदा सचमुच मुक्त है!'

इसलिए अष्टावक्र जैसे व्यक्ति कहते हैं कि इसी क्षण चाहे तो मुक्त हो सकता है —क्योंकि मुक्त है ही। मुक्ति में कोई बाधा नहीं है। बंधन कभी पड़ा नहीं, बंधन केवल माना हुआ है।

'तेरा बंधन तो यही है कि तू अपने को छोड़, दूसरे को द्रष्टा देखता है।’

एको द्रष्टsसि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।

अयमेव हि ते बंधो द्रष्टारं पश्यसीतरम्।।

एक ही बंधन है कि तू अपने को छोड़ दूसरे को द्रष्टा देखता है। और एक ही मुक्ति है कि तू अपने को द्रष्टा जान ले। तो इस प्रयोग को थोड़ा करना शुरू करें।

देखते हैं.......। वृक्ष के पास बैठे हैं, वृक्ष दिखायी पड़ रहा है, तो धीरे—धीरे वृक्ष को देखते—देखते, उसको देखना शुरू करें जो वृक्ष को देख रहा है। जरा से हेर—फेर की बात है। साधारणत: चेतना का तीर वृक्ष की तरफ जा रहा है। इस तीर को दोनों तरफ जाने दें। इसका फल दोनों तरफ कर लें—वृक्ष को भी देखें और साथ ही चेष्टा करें उसको भी देखने की, जो देख रहा है। देखने वाले को न भूलें। देखने वाले को पकड़—पकड़ लें। बार—बार भूलेगा—पुरानी आदत है, जन्मों की आदत है। भूलेगा, लेकिन बार—बार देखने वाले को पकड़ लें। जैसे—जैसे देखने वाला पकड़ में आने लगेगा, कभी—कभी क्षण भर को ही आयेगा, लेकिन क्षण भर को ही पायेंगे कि एक अपूर्व शांति का उदय हुआ! एक आशीष बरसा!! एक सौभाग्य की किरण उतरी !!! एक क्षण को भी अगर ऐसा होगा तो एक क्षण को भी मुक्ति का आनंद मिलेगा। और वह आनंद तुम्हारे जीवन के स्वाद को और जीवन की धारा को बदल देगा। शब्द नहीं बदलेंगे तुम्हारे जीवन की धारा को, शास्त्र नहीं बदलेंगे—अनुभव बदलेगा स्वाद बदलेगा!

यहां मुझे सुन रहे हैं—दो तरह से सुना जा सकता है। सूनते वक्त मैं जो बोल रहा हूं, अगर उस पर ही ध्यान रहे और तुम अपने को भूल जाओ तो फिर तुम द्रष्टा न रहे, श्रोता न रहे, श्रावक न रहे। तुम्हारा ध्यान मुझ पर अटक गया, तो तुम दर्शक हो गए। आंख से ही दर्शक नहीं हुआ जाता, कान से भी दशक हुआ जाता है। जब भी ध्यान आब्जेक्ट पर, विषय पर अटक जाये तो तुम दर्शक हो गये।

सुनते वक्त, सुनो मुझे, साथ में उसको भी देखते रहो, पकड़ते रहो, टटोलते रहो—जो सुन रहा है। निश्चित ही तुम सुन रहे हूो, मैं बोल रहा हूं : बोलने वाले पर ही नजर न रहे, सुनने वाले को भी पकड़ते रहो, बीच—बीच में उसका खयाल लेते रहो। धीरे— धीरे तुम पाओगे कि जिस घड़ी में तुमने —सुनने वाले को पकड़ा, उसी घड़ी में तुमने मुझे सुना, शेष सब व्यर्थ गया। जब तुम सुनने वाले को पकड़ कर सुनोगे तब जो मैं कह रहा हूं वही तुम्हें सुनायी पड़ेगा। और अगर तुमने सुनने वाले को नहीं पकड़ा है तो तुम न मालूम क्या—क्या सुन लोगे, जो न तो मैंने कहा, न अष्टावक्र ने कहा। तब तुम्हारा मन बहुत से जाल बुन लेगा।

तुम बेहोश हो! बेहोशी में तुम कैसे होश की बातें समझ सकते हो? ये बातें होश की हैं। ये बातें किसी और दुनियां की हैं। तुमने अगर नींद में सुना 'तो तुम इन बातों के आसपास अपने सपने गूंथ लोगे। तुम इन बातों का रंग खराब कर दोगे। तुम इनको पोत लोगे। तुम अपने ढंग से इनका अर्थ निकाल लोगे। तुम इनकी व्याख्या कर लोगे, तुम्हारी व्याख्या में ही ये अदभुत वचन मुर्दा हो जाएंगे। तुम्हारे हाथ लाश लगेगी अष्टावक्र की, जीवित अष्टावक्र से तुम चूक जाओगे। क्योंकि जीवित अष्टावक्र को पकड़ने के लिए तो तुम्हें अपने द्रष्टा को पकड़ना होगा—वहां है जीवित अष्टावक्र।

इसे खयाल में लो।

सुनते हो मुझे, सुनते —सुनते उसको भी सुनने लगो जो सुन रहा है। तीर दोहरा हो जाये मेरी तरफ और तुम्हारी तरफ भी हो। अगर मैं भूल जाऊं तो कोई हर्जा नहीं, लेकिन तुम नहीं भूलने चाहिए। और एक ऐसी घड़ी आती है, जब न तो तुम रह जाते हो, न मैं रह जाता हूं। एक ऐसी परम शांति की घड़ी आती है र जब दो नहीं रह जाते, एक ही बचता है, तुम ही बोल रहे हो,तुम ही सुन रहे हो, तुम— ही देख रहे हो, तुम ही दिखायी पड़ रहे हो। उस घडी के लिए ही इशारा अष्टावक्र कर रहे हैं कि वह एक है द्रष्टा और सदा सचमुच मुक्त है!

बंधन स्वप्न जैसा है।

आज रात तुम पूना में सोओगे, लेकिन नींद में तुम कलकत्ते में हो सकते हो, दिल्ली में हो सकते हो, काठमांडू में हो सकते हो, कहीं भी हो सकते हो। सुबह जागकर फिर तुम अपने को पूना में पाओगे। सपने में अगर काठमांडू चले गये, तो लौटने के लिए कोई हवाई जहांज से यात्रा नहीं करनी पड़ेगी, न ट्रेन पकड़नी पड़ेर्गो, न पैदल यात्रा करनी पड़ेगी। यात्रा करनी ही नहीं पड़ेगी। सुबह आंख खुलेगी और तुम पाओगे कि पूना में हो। सुबह तुम पाओगे, तुम कहीं गये ही नहीं। सपने में गये थे। सपने में जाना कोई जाना है?

'बंधन तो एक ही है तेरा कि तू अपने को छोड़, दूसरे को द्रष्टा देखता है।’

एक ही बंधन है कि हमें अपना होश नहीं, अपने द्रष्टा का होश नहीं।

एक तो यह अर्थ है इस सूत्र का। एक और भी अर्थ है, वह भी खयाल में ले ले