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Tभज गोविन्दम् मूढ़मते।10


एक क्षण पर्याप्त है—(प्रवचन—दसवां)

प्रश्न-सार :

1—प्राणायाम का अर्थ है: ऐसी विधि जिससे प्राणों का विस्तार हो, और प्रत्याहार है: मूल स्रोत की ओर वापस लौटना। पहले विस्तार, फिर वापसी–ऐसा क्यों?

2—स्वप्नावस्था में भी अकाम आ जाए, इसकी कीमिया पर कुछ उपदेश दें।

3—क्या पुण्य, धर्म, भगवान की कामना भी दुख में ही ले जाएगी?

4—प्रत्याहार–गंगा का गंगोत्री में और वृक्ष का बीज में लौट जाना–क्या संभव है?

5—क्या प्रत्याहार के लिए योग और भक्ति, दोनों आवश्यक हैं?

6—आपको रोज सुन कर आंखों में आंसू, हृदय का डोलना और लगता है कि आत्मज्ञान का दिन है यह; लेकिन वह आता नहीं। इस धूप-छांव का क्या प्रयोजन है?

पहला प्रश्न:

कल आपने समझाया कि प्राणायाम का अर्थ है: ऐसी विधि जिससे प्राणों का विस्तार हो; और प्रत्याहार है: मूल स्रोत की ओर वापस लौटना। पहले विस्तार, फिर वापसी–ऐसा क्यों?

क्योंकि जीवन विरोध से निर्मित है; और जीवन के होने का और कोई ढंग नहीं। श्वास बाहर जाती है, फिर भीतर वापस लौटती है। पूछा कभी–ऐसा क्यों? जब भीतर ही जाना है श्वास को तो बाहर ले जाने की जरूरत क्या? लेकिन अगर श्वास भीतर ही रह जाए, बाहर न जाए, तो मौत घटेगी, जीवन नहीं। श्वास अगर बाहर ही रह जाए, भीतर न आए, तो भी मौत घटेगी, जीवन नहीं। जीवन गति है–दो विरोधों के बीच गति है; दो तटों के बीच सरिता का प्रवाह है। श्वास बाहर जाती है, भीतर आती है; भीतर आती है, बाहर जाती है–प्रतिपल प्राणायाम भी हो रहा है, प्रत्याहार भी हो रहा है।

श्वास का बाहर जाना प्राणायाम है, श्वास का भीतर आना प्रत्याहार है। और ऐसी ही लयबद्धता तुम्हारी चेतना में भी सध जाए, ऐसी ही गति तुम्हारी चेतना में भी थिर हो जाए, ऐसे ही तुम बाहर अनंत तक फैल जाओ और ऐसे ही तुम भीतर शून्य तक पहुंच जाओ–भीतर हो शून्य, बाहर हो अनंत–ये दोनों तुम्हारे कूल-किनारे हो जाएं, इनके बीच तुम सतत प्रवाहित होओ, तो ही तुम भगवत-स्वरूप हो पाओगे। क्योंकि भगवान का यही स्वरूप है–भीतर शून्य, बाहर पूर्ण।

यह सारा अस्तित्व परमात्मा का प्राणायाम है। सृष्टि है प्राणायाम, प्रलय है प्रत्याहार। एक श्वास बाहर गई, सृष्टि हुई; श्वास भीतर लौटी, प्रलय हुआ।

इसे तुम अगर ठीक से समझ पाओ तो जीवन में सब जगह दिखाई पड़ेगा। जन्म है प्राणायाम, मृत्यु है प्रत्याहार; जन्म में तुम फैलते हो, मृत्यु में सिकुड़ जाते हो, वापस लौट जाते हो। और जीवन जन्म और मृत्यु के किनारों के बीच है। जन्म जीवन नहीं; मृत्यु भी जीवन नहीं। जन्म और मृत्यु के बीच जो प्रवाहित है, जो अज्ञात नृत्य कर रहा है छंद में, लय में लीन है–वही है जीवन।

मन की आकांक्षा है तर्कयुक्त होने की और जीवन है विरोधयुक्त, इसलिए जीवन अतक्र्य है। और जिन्होंने तर्क से जानना चाहा वे भटके और कभी पहुंचे नहीं।

तर्क तो यही कहेगा: प्राणायाम और प्रत्याहार तो विरोध हो गया–कुछ एक कहें! ज्ञान और भक्ति तो विरोध हो गया–कुछ एक कहें! शून्य और पूर्ण तो विरोध हो गया–कुछ एक कहें!

ध्यान रखना, जीवन सदा ही विरोधी है; क्योंकि जीवन विरोधों से बड़ा है; जीवन विरोधों को आत्मसात कर लेता है। तर्क बड़ा छोटा है; छोटी बुद्धि का उपाय है; वह एक को ही समा पाता है, तो विपरीत बाहर छूट जाता है।

इसलिए बुद्ध ने अगर शून्य कहा, तो यह अर्थ न था कि पूर्ण उसमें समाया नहीं है। लेकिन बुद्ध को मानने वालों ने कहा कि जब शून्य है तो पूर्ण नहीं हो सकता। और जब शंकर ने कहा पूर्ण, तो यह अर्थ न था कि शून्य उसमें समाया नहीं है। लेकिन शंकर के मानने वालों ने कहा, जब पूर्ण है तो शून्य कैसे हो सकता है।

यहीं तो अनुयायी भटक जाता है। अनुयायी जीता है तर्क से और बुद्धि से। और जो जानते हैं, उन्होंने विरोध को एक साथ जाना है। लेकिन वे भी विरोध को एक साथ कहने में अड़चन अनुभव करते हैं, क्योंकि समझाना है तुम्हें। अगर विरोध एक साथ कहे जाएं, तो तुम्हें लगता है बड़ी असंगति हो गई। तुम्हारा मन चेष्टा ही करता रहता है तर्कबद्ध, सरणीबद्ध गणित की। और जीवन किसी गणित को मानता नहीं; जीवन सब गणित की सीमाओं को तोड़ कर बहता है। जीवन तो बाढ़ है।

दूसरा प्रश्न:

कल आपने अकाम की सूक्ष्म विवेचना की। स्वप्न-अवस्था में भी अकाम आ जाए, इसकी कीमिया पर कुछ उपदेश दें।

तुम स्वप्न की चिंता न करो, तुम जाग्रत में ही साध लो। जाग्रत में जो सध जाएगा, वह स्वप्न में अपने आप उतरने लगता है। क्योंकि तुम्हारे स्वप्न तुम्हारे जाग्रत की प्रतिध्वनियां हैं। तुमने जाग्रत में जो किया है, वही स्वप्न में तुम फिर-फिर अनुगूंज सुन लेते हो उसकी। उसी की प्रतिध्वनि है। स्वप्न कुछ नया तो देता नहीं। स्वप्न भी क्या नया देगा?

दिन भर धन इकट्ठा करते हो, तो रात रुपये गिनते रहते हो। दिन भर मन में कामवासना तिरती है, तो रात काम के स्वप्न चलते हैं। जिनके जीवन में भजन है, उनकी निद्रा में भी भजन प्रविष्ट हो जाता है; और जिनका दिन शांत और शून्य है, उनकी रात भी शांत और शून्य हो जाती है। रात तो पीछा करती है दिन का; वह दिन की छाया है। रात को बदलने की फिक्र ही मत करो।

अगर रात के स्वप्नों में कामवासना परेशान करती है, तो यही समझो कि जाग्रत में कहीं धोखा हो रहा है। इशारा समझो। स्वप्न तो इंगित करते हैं–दिन में भी तुम जिन्हें समझने से चूक जाते हो, स्वप्न उन्हें स्पष्ट इशारा कर देते हैं। हो सकता है कि दिन में तुम बड़े साधु बने बैठे होओ। लेकिन वह साधुता बगुले जैसी है। एक टांग पर खड़ा है! उसको देख कर तो ऐसा ही लगेगा कि कोई तपस्वी है। और कितना शुभ्र है! अब बगुले से ज्यादा और सफेदी कहां खोजोगे? और कैसा खड़ा है! कौन योगी खड़ा होगा! हिलता भी नहीं! ऐसा बाहर को देख कर मत भूल में पड़ जाना। भीतर वह मछलियों का चिंतन कर रहा है, भीतर वह मछलियों की राह देख रहा है। यह सब आसन, यह सब सिद्धासन, मछलियों की आकांक्षा में साधा है।

खैर बगुला दूसरे को धोखा दे दे, अपने को कैसे धोखा देगा? खुद तो जानता है कि किसलिए खड़ा है। यह श्वास साधे किसलिए खड़ा है–उसे पता है।

लेकिन आदमी बगुले से भी ज्यादा बेईमान है। वह दूसरों को ही धोखा नहीं देता, दूसरों को धोखा देते-देते अपने को भी धोखा दे लेता है। जब दूसरे मानने लगते हैं उसकी बात, तो धीरे-धीरे खुद भी अपनी बात मानने लगता है। तब तुम्हें पता लगेगा कि तुम्हारे जाग्रत और स्वप्न में विरोध हो गया। तब तुम्हें जाग्रत में तो कोई कामवासना की तरंग उठती नहीं मालूम होती। क्योंकि तुमने बहुत बुरी तरह दबाया है; तुम उसकी छाती पर चढ़ बैठे हो; तुम उसे उठने नहीं देते। नहीं कि वह समाप्त हो गई है; बस तुम उठने नहीं देते। नहीं कि वह मिट गई है; तुम सिर्फ उसे प्रकट नहीं होने देते। उसे तुम दबाए हो छाती के कोनों में। रात जब तुम शिथिल हो जाते हो, दबाने वाला सो जाता है, तब जो लहर दिन भर दबाई थी, वह मुक्त होकर विचरण करने लगती है; वही तुम्हारे स्वप्न में कामवासना बन जाती है। जिन्होंने दमन किया है, स्वप्न में उसे पाएंगे।

स्वप्न को इशारा समझो; स्वप्न तुम्हारा मित्र है। वह यही कह रहा है कि दबाने से कुछ भी न होगा, रात हम प्रकट हो जाएंगे। दिन भर दबाओगे, रात हम फिर मौजूद हो जाएंगे। किसी तरह दूसरों को धोखा दे लोगे, अपने को भी धोखा दे लोगे, लेकिन हमसे छुटकारा ऐसे नहीं होगा।

अब तुम पूछते हो कि स्वप्न में भी कामवासना से मुक्त होने के लिए क्या करें?

इससे ऐसा लगता है कि जाग्रत में तो तुम मुक्त हो ही गए हो, अब रह गई है स्वप्न से मुक्त होने की बात। यहीं भ्रांति है। स्वप्न इतना ही कह रहा है कि जाग्रत में भी तुम मुक्त नहीं हुए हो। क्योंकि जिस दिन जाग्रत में मुक्त हो जाओगे, उस दिन स्वप्न में कुछ बचता ही नहीं। स्वप्न तो तुम्हारी ही सूक्ष्म कथा है।

तुम मुझसे यह पूछ रहे हो कि जैसे हमने जाग्रत में दबा लिया, ऐसी कोई तरकीब हमें बता दें कि स्वप्न में भी दबा लें। फिर तो तुम्हारी मुक्ति का कोई उपाय न रह जाएगा। क्योंकि जो दबा है, वह सदा मौजूद रहेगा और कभी न कभी प्रकट होगा। वह तो धधकता हुआ ज्वालामुखी है। बाहर लपटें न आएं, इससे क्या होता है! भीतर तो तुम जलोगे और सड़ोगे; भीतर तो तुम गलोगे। कैंसर की तरह बढ़ेगा रोग; तुम्हारे रोएं-रोएं में फैल जाएगा।

नहीं, स्वप्न को समझो। स्वप्न की समझ इतना ही कह रही है कि दिन में तुमने कुछ चालबाजी की है, दिन में तुमने कुछ धोखा किया है। अब दिन को अपने समझने की कोशिश करो कि कहां तुम धोखा किए हो? कहां तुमने दबाया है? और जहां तुमने दबाया हो, वहां उसे उघाड़ो।

मन का एक गहरा सूत्र समझ लो कि जैसे वृक्षों की जड़ें अगर अंधेरी भूमि में दबी रहें, तो ही अंकुरण जारी रहता है–पत्ते आते हैं, फूल लगते हैं, फल लगते हैं। अगर तुम वृक्ष की जड़ों को उखाड़ लो भूमि के बाहर–अंधेरे गर्त के बाहर निकाल लो, रोशनी में रख लो–वृक्ष मर जाता है। ठीक यही मन का सूत्र है: मन में जो भी रोग हों, उन्हें निकालो बाहर, रोशनी में लाओ। रोशनी मौत है रोग की।

तुम उलटा करते रहे हो; और तुम्हारे तथाकथित धर्मगुरु तुम्हें उलटा ही समझाते रहे हैं। वे कहते रहे हैं: और दबा दो! बिलकुल दबा दो; जड़ का पता ही न चले!

लेकिन जड़ जितनी गहरी जम जाएगी, जितनी गहरी दबा दी जाएगी, उतना ही खतरा हो रहा है; उतना ही तुम्हारे जीवन में विष फैल जाएगा।

उघाड़ो! अपने को अपनी आंखों के सामने लाओ! छिपो मत, भागो मत–जागो! तो दिन में भी खोदो अपनी जड़ों को। लाओ रोशनी में, देखो।

इसे ही मैं ध्यान कहता हूं। ध्यान कोई विधि थोड़े ही है कि तुमने कर ली और छुटकारा हुआ। ध्यान एक सतत प्रक्रिया है होश की। चौबीस घंटे, उठते, बैठते ध्यान रखो।

राह पर तुम जा रहे हो। एक सुंदर स्त्री पास से गुजर गई या सुंदर पुरुष पास से गुजर गया। जिसको तुम लुच्चा कहते हो, वह ठिठक कर खड़ा हो गया, देखने लगा। इसीलिए लुच्चा कहते हैं। लुच्चा आता है लोचन शब्द से। जो आंख गड़ा कर देखता है, वह लुच्चा। उसी से आलोचक भी आता है। वे दोनों एक ही अर्थ रखते हैं। वह खड़ा हो गया ठिठक कर, देखने लगा।

तुम साधु हो, तुम कोई लुच्चे नहीं हो। तुम चोरी-छिपे देखते हो; तुम ठिठक कर नहीं देखते, तुम दूसरे बहाने देखते हो; तुम पास की दुकान में देखने लगते हो। देखते दुकान में हो, देखना चाहते हो सुंदर स्त्री को। या हो सकता है कि तुमने और भी गहरा दमन कर लिया है। तुमने इतना दमन कर लिया है कि तुम आंखें नीची करके, देखते ही नहीं स्त्री को–न दुकान, न किसी बहाने से–तुम सिर्फ आंखें नीची किए अपने बाजार की तरफ चले जाते हो। तब रात सपने में तुम देखोगे; क्योंकि देखना तो तुमने चाहा था।

और यह भी हो सकता है कि यह आंख झुका कर चलने की आदत तुम्हारी गहरी बन गई हो कि तुम्हें पता भी न चलता हो, कब तुम आंख झुका लेते हो। यह झुक ही जाती हो आदतवश; स्त्री की भनक पड़ती हो और आंख झुक जाती हो। ऐसा तुमने शील और आचरण तय कर लिया हो। ऐसा तुमने चरित्र निर्मित कर लिया हो। तब तुम आंख झुका कर चले जाते हो, तुम्हें झुकानी भी नहीं पड़ती। यह तो सिर्फ यांत्रिक कुशलता से हो जाता है। तुम्हें शायद पता भी न चले कि स्त्री पास से गुजरी थी। लेकिन आंख का झुकना बताता है कि तुम्हें चाहे ऊपर से पता न चला हो, भीतर तुम्हारे प्राणों में कोई कंपा, कोई हवा का झोंका भीतर गया, कोई तरंग उठी; उसी तरंग ने आंखें झुका दीं। आंखें झुकाना बचने की तरकीब है। तुम गुजर गए।

दुनिया तुम्हें संत कहेगी, सज्जन कहेगी, साधु कहेगी। इससे अहंकार को मजा भी आएगा, रस भी मिलेगा–रिस्पेक्टबिलिटी; आदर मिलता है। तुम और भी धार्मिक होने लगोगे। आंख भी फोड़ सकते हो। अहंकार ऐसा है कि आदमी कुछ भी कर सकता है।

लेकिन इससे तुम किसे धोखा दोगे? तुम्हारे अंतरतम को तुम धोखा न दे पाओगे। रात के अंधेरे में, गहरी तंद्रा में, बेहोशी में जब तुम पड़े होओगे, तब तुम्हारा सज्जन तो सोया है, संत तो गहरी नींद में पड़ा है–तब मन में वे सब राग उठने शुरू होंगे जो तुमने दबाए; वे गीत गूंजने लगेंगे जो तुमने अनसुने किए; उन्हीं से स्वप्न निर्मित होगा।

स्वप्न जब निर्मित हो, तो यह मत सोचना कि स्वप्न में कुछ खराबी है। स्वप्न तो मित्र है, वह तो यह कह रहा है कि तुमने खूब गहरा धोखा दे दिया। अभी भी चेतो! इस धोखे से कुछ सार नहीं, मैं भीतर मौजूद हूं। ऐसे कामवासना न जाएगी। जाग कर पहचानो अपनी वृत्ति को, होश को सम्हालो।

असली सवाल पास से गुजरी स्त्री को देखने या न देखने का नहीं है, तुम्हारे भीतर जो देखने की तरंग उठी, उसको देखने या न देखने का है। स्त्री देखी तो, स्त्री न देखी तो, कोई बड़ा सवाल नहीं है। तुम्हारे भीतर जो तरंग देखने की उठी थी, जो वासना उठी थी, उसे देखा कि नहीं? अगर उसे नहीं देखा तो स्वप्न में आएगा; अगर उसे देख लिया तो स्वप्न में आने की कोई जरूरत न रही। अगर तुम ऐसे प्रतिपल अपने भीतर की उठती वासना को देखते रहो, तुम पाओगे स्वप्न शून्य हो गए।

कल मैं एक गीत पढ़ रहा था। मेरे एक मित्र हैं, खुमार बाराबंकवी। उर्दू के कवि हैं। उनकी पंक्ति है:

हो न हो अब आ गई मंजिल करीब

रास्ते सुनसान नजर आते हैं

जैसे-जैसे मंजिल करीब आने लगेगी, मन के रास्ते सुनसान नजर आने लगेंगे, वीरान होने लगेंगे। वहां स्वप्न से भी मिलना न होगा। बाजार तो खो ही जाएंगे, बाजारों की प्रतिछवियां भी खो जाएंगी। मित्र और शत्रु तो विदा हो ही जाएंगे, उनकी डोलती छायाएं भी विदा हो जाएंगी।

हो न हो अब आ गई मंजिल करीब

रास्ते सुनसान नजर आते हैं

जब तुम्हारे भीतर रास्ते सब सुनसान नजर आने लगें, तब पहचान लेना कि अब मंजिल बहुत दूर नहीं है, करीब है। जब तक तुम अपने भीतर के रास्तों को स्वप्नों से भरा हुआ पाओ, तब तक धोखे में मत पड़ना, तुम बाजार में ही हो। दुनिया तुम्हें साधु कहती होगी, तुमने अपने को साधु मान लिया होगा, लेकिन संसारी मरा नहीं है, केवल छिप गया है। और छिपा संसारी और भी खतरनाक है; क्योंकि छिपा संसारी वैसे ही है, जैसे कोई छिपा रोग। प्रकट हो तो इलाज भी हो जाए; छिपा हो तो इलाज भी मुश्किल। और रोगी अगर इनकार करता हो कि मैं रोगी हूं ही नहीं, तो चिकित्सक भी क्या करे? कम से कम रोगी स्वीकार करे कि मैं रोगी हूं, तो कुछ हो सकता है।

और यह कोई छोटे-छोटे लोगों के जीवन की घटना नहीं है, जिनको तुम बड़े-बड़े महात्मा कहते हो, उनके जीवन में भी यही उपद्रव है। महात्मा गांधी को भी, जीवन के आखिरी दिनों में भी कामवासना के स्वप्न आते रहे, स्वप्नदोष होता रहा। मगर वे आदमी ईमानदार थे, यद्यपि गलत रास्ते पर थे। क्योंकि अगर जीवन भर की चेष्टा के बाद भी और स्वप्न में कामवासना पकड़ती हो, तो उसका अर्थ है कि चेष्टा गलत रास्ते पर होती रही। चेष्टा में कोई कमी न थी। उन जैसा चेष्टारत आदमी तुम न पा सकोगे। बड़ी निष्ठा से उन्होंने मेहनत की थी। लेकिन निष्ठा से थोड़े ही मंजिल पास आती है। अकेली निष्ठा से अगर मंजिल पास आती होती, तब तो कोई भी पहुंच जाता।

न अकेली निष्ठा से मंजिल आती है पास, न अकेली ठीक राह से मंजिल आती है पास; जब ठीक राह से निष्ठा का मिलन होता है, तब मंजिल पास आती है।

तुम कितनी ही ईमानदारी से रेत से तेल निचोड़ने की कोशिश करो–तुम्हारी ईमानदारी थोड़े ही पर्याप्त है, रेत में तेल होना भी तो चाहिए। तुम कहो कि मैं कितनी निष्ठा, कितनी श्रद्धा से निचोड़ रहा हूं! अटूट है, अखंड है मेरी निष्ठा! पर इससे क्या होगा? रेत में तेल होना भी तो चाहिए। और दूसरा आदमी तुमसे कम निष्ठा से भी निचोड़े, लेकिन अगर तिल के दानों से निचोड़ता हो तो शायद मिल जाए, क्योंकि तेल वहां है। यह भी हो सकता है कि कोई तिल के दाने भी रखे बैठा रहे, लेकिन आस्था ही न हो, तो निचोड़ेगा कैसे?

इसलिए जब निष्ठा और ठीक मार्ग का मिलन होता है, तब जीवन में क्रांति घटती है।

जीवन के अंत तक गांधी को स्वप्न पीड़ित करते रहे। मगर मैं कहता हूं, वे ईमानदार आदमी थे, तुम्हारे दूसरे साधु-संतों की तरह नहीं कि स्वप्न तो सताते रहे और उन्होंने कभी बाहर उनकी चर्चा न की। उन्होंने तो खुली चर्चा की। उनके शिष्य इससे परेशान थे। शिष्य चाहते थे, इसकी खुली चर्चा मत करो। क्योंकि शिष्यों को चोट लगती कि हमारे गुरु को और ऐसे सपने आते हैं! शिष्यों का जो गुरु के प्रति महात्मा का भाव था वह और शिष्यों के अहंकार को पीड़ा होती कि लोग क्या कहेंगे! वे गांधी को कहते, यह चर्चा खुली मत करो।

गांधी ने अंतिम दिनों में एक युवा स्त्री के साथ नग्न, बिस्तर पर सोना शुरू किया। कई शिष्य तो भाग गए। उनमें से कई अब बड़े गांधीवादी हैं जो भाग गए थे। अब वही ठेकेदार हो गए हैं; अब वे कहते हैं, वही वसीयतदार हैं! वही थे जो भाग गए थे गांधी के खिलाफ और गांधी के विरोध में हो गए थे कि यह क्या गड़बड़ है! ऐसा कहीं सुना, देखा? लेकिन गांधी की पीड़ा को कोई भी न समझा।

गांधी की पीड़ा यह थी। आखिर-आखिर में उनका तंत्र-शास्त्रों से संबंध जुड़ा। जीवन भर उन्होंने ब्रह्मचर्य की व्यर्थ चेष्टा में गंवाया। अंत में उन्हें तंत्र-शास्त्रों का पता चला कि अगर वासना से मुक्त होना हो तो जागना जरूरी है। और जागना हो तो परिस्थिति चाहिए, भागने से कुछ भी न होगा। तो परिस्थिति पैदा करने के लिए एक नग्न युवती के साथ रात सोते थे एक वर्ष तक–ताकि परिस्थिति पूरी रहे और उनके मन में कोई वासना उठे तो वे देख सकें, पहचान सकें। जिंदगी भर दबाया था, अब उघाड़ने के लिए भी बड़ी अथक चेष्टा करनी पड़ी। यह नग्न युवती के साथ सोना, उसे जगाने की अथक चेष्टा थी, जिसको अपने ही हाथों दबाया था।

जीवन भगोड़ेपन से हल नहीं होता, जीवन तो साक्षात्कार करने से हल होता है। जीवन की सभी समस्याओं का साक्षात्कार करना होगा। मत पूछो कि स्वप्न में कामवासना से मुक्त होने के लिए क्या करो। इतना ही जानो कि स्वप्न में जो वासना आ रही है, वह तुम्हारे जागरण में दबाई गई है। जागरण में मत दबाओ, जागरण में जागो और देखो! उघाड़ो!

तुम्हें तकलीफ होगी, क्योंकि तुम्हारे अहंकार को बड़ा बुरा लगेगा कि मैं ब्रह्मचारी, संन्यासी, त्यागी, और कामवासना मेरे भीतर है!

मगर ऐसे झूठे मोह को छोड़ना पड़े, ऐसे झूठे दंभ का कोई सार नहीं। वह तो है ही, तुम देखो या न देखो, इससे भेद न पड़ेगा। देख लो तो शायद मुक्ति भी हो जाए। और यही समझ लेने की बात है कि सिर्फ दर्शन से भी मुक्ति हो जाती है।

तुम एक चेष्टा करो कुछ महीनों के लिए–कुछ भी दबाओ मत; जो भी भीतर आता हो, उसे आंख के पर्दे पर पूरा का पूरा भीतर आ जाने दो। किंचित भी निंदा मत करना, क्योंकि जरा सी भी निंदा दबाने का कारण हो जाती है।

समझो कि एक कामवासना का विचार आया और तुमने कहा–बुरा है, पाप है। दमन शुरू हो गया। तुमने नहीं भी कहा बुरा है, पाप है; तुमने ऐसे देखा कि मजबूरी में देख रहे हो कि न देखते तो अच्छा था। तुमने भगवान से कहा, भगवान, यह क्या दिखला रहा है! बस दमन शुरू हो गया। निर्णय तुमने लिया–अच्छा कहा, बुरा कहा; शिकायत की, पश्चात्ताप किया, अपराध का भाव अनुभव किया–किसी तरह का मूल्यांकन किया और दमन शुरू हो गया।

तुम ऐसे ही देखो, जैसे तुम्हारा कुछ लेना-देना नहीं है। जैसे तुम वृक्ष में लगे फूलों को देखते हो, या आकाश में उड़ते बादलों को देखते हो, या राह से चलते लोगों को देखते हो; कोई प्रयोजन नहीं है, चुपचाप देखते हो; जैसे तुम्हारा कुछ लेन-देन नहीं है–निष्पक्ष, दूर खड़े, साक्षी-भाव से–तब वृत्तियां अपने पूरे रूप में उभरती हैं।

घबड़ा मत जाना, क्योंकि जन्मों-जन्मों दबाया है। जब वे पूरे रूप में उभरेंगी तो तुम्हें ऐसा लगेगा–क्या मैं पागल हुआ जा रहा हूं? यह क्या हो रहा है? क्या सब मेरा नीति-धर्म नष्ट हो जाएगा? क्या मेरा सब चरित्र टूट जाएगा, खंडित हो जाएगा? क्या मैंने इतनी मुश्किल से, कठिनाई से अपनी जो प्रतिष्ठा बनाई है, वह सब धूल-धूसरित हो जाएगी?

घबड़ाना मत। यही साहस है। इसी साहस को मैं तपश्चर्या कहता हूं। धूप में खड़े होने में कोई साहस नहीं है, नग्न बर्फ में खड़े होने में भी कोई साहस नहीं है। सब शरीर की कसरतें हैं, थोड़े अभ्यास से आ जाती हैं। बड़े से बड़ा साहस–मैं भीतर जैसा हूं, वैसा ही देख लेने में है। और उसी से रूपांतरण हो जाता है, उसी से क्रांति घट जाती है।

तुम जरा देखो। यहां तुम देखना शुरू करोगे, अचानक तुम पाओगे कि स्वप्न के रास्ते खाली होने लगे। क्योंकि जो-जो तुम जागने में देख लोगे, फिर तुम्हारी आत्मा को स्वप्न में दिखाने का कोई प्रयोजन न रहा। जो तुमने ही देख लिया, उसे दिखाने की क्या जरूरत रही? स्वप्न खाली हो जाएंगे।

और काश, तुम्हारी रात स्वप्नों से खाली हो जाए, तो समाधि हो जाएगी। पतंजलि ने कहा है, सुषुप्ति और समाधि में जरा सा ही भेद है–बड़ा जरा सा भेद है–वह भेद इतना ही है कि सुषुप्ति मूर्च्छित है और समाधि जाग्रत है। जब सब स्वप्न तिरोहित हो जाते हैं…

अभी तुमने खयाल किया–सुबह तुम उठ कर याद कर सकते हो, कोई स्वप्न आया; यह भी याद कर सकते हो कि रात, पूरी रात सपनों ही सपनों से भरी रही। तो तुम्हारे भीतर कोई होश तो है–जो सपने देखता है; जो सपनों को पहचानता है; जो सपनों की याद रखता है। अब तुम ऐसा सोचो कि सब सपने खो गए, तब तुम्हारा यह होश जो सपनों में अटक जाता था, सपनों को देखता था, अब समाधि को देखेगा। क्योंकि सपने तो रहे नहीं, रास्ते पर राहगीर तो रहे नहीं, सुनसान रास्ता रह गया; अब सुनसान रास्ता दिखाई पड़ेगा। सुबह जब तुम उठोगे, तो तुम कहोगे–सुषुप्ति देखी, स्वप्न नहीं देखा।

सुषुप्ति को देख लेना समाधि है।

रास्ता खाली था, भीड़ न थी। लोग थे ही नहीं देखने को, तो राह देखी। आकाश बादलों से न घिरा था, बदलियां थी ही नहीं; आकाश देख लिया। बदलियों के कारण आकाश पर पर्दा पड़ जाता है। सपनों के कारण सुषुप्ति पर पर्दा पड़ जाता है। और सुषुप्ति समाधि है।

रोज रात तुम वहीं पहुंचते हो, जहां बुद्ध पहुंचते हैं; रोज रात तुम वहीं पहुंचते हो, जहां शंकर जीते हैं। लेकिन तुम्हारे बीच और समाधि में बड़ी भीड़ है; समाधि और तुम्हारे बीच बड़ा मेला लगा है। और वह मेला तुमने ही जुटाया है। गलत ढंग से जीवन के साथ व्यवहार करने से तुम कूड़ा-करकट इकट्ठा करते जाते हो।

क्षण-क्षण निपटारा कर लो। जो सामने आए, उसे भरपूर देख लो, उसे पूरा-पूरा देख लो, उसमें जरा भी ना-नुच मत करना। फिर तो कोई प्रयोजन न रहा। सपने में इसीलिए आता था कि तुमने ठीक से न देखा दिन में, लौट-लौट आना पड़ा।

तुमने कभी खयाल किया, अगर किसी भी बात को तुम ठीक से भोग लो, तो उसकी याद आनी बंद हो जाती है। अगर किसी को भी तुम गौर से देख लो, तो छुटकारा हो जाता है। गौर से जी लो, तो फिर कोई राग-रंग बंधे नहीं रह जाते। अधूरे अनुभव अटके रह जाते हैं और मन की आकांक्षा उन्हें पूरे करने की होती है। तो जो-जो तुम अधूरा जीए हो, वह तुम्हारे पास इकट्ठा हो गया है, उसकी भीड़ इकट्ठी हो गई है। अब कृपा करो, ऐसा मत करो। और सपने में मत पूछो मुझसे कि कैसे उसको रोकें; सपने से इतना ही पहचानो कि जागरण में रोका है। जागरण में भी मत रोको।

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जाओ और जो भी तुम्हारे मन में वासना उठे, उसे पूरा कर गुजरो; मैं यह नहीं कह रहा हूं। क्योंकि उस तरह तो तुम पूरा करने की चेष्टा भी कर लिए हो, वह भी पूरा नहीं हुआ है। जन्मों-जन्मों आदमी वही करता रहा है। क्रोध करने से कहीं क्रोध गया है? काम करने से कहीं काम गया है? लोभ करने से कहीं लोभ गया है?

यही द्वंद्व है। करो तो मजबूत होता है, क्योंकि अभ्यास बनता है। आज क्रोध किया, कल क्रोध किया, परसों भी क्रोध किया था, तो क्रोध की शृंखला मजबूत होती चली जाती है; अभ्यस्त क्रोधी हो जाते हो तुम। फिर जरा सी चिनगारी मिली कि क्रोध आदतवश उभर आता है। करो तो अभ्यास बनता है, दबाओ तो भीतर घाव बनते हैं।

दोनों के मध्य में मार्ग है–न तो करो, न दबाओ–सिर्फ देखो। यही साक्षी का सूत्र है–सिर्फ द्रष्टा बनो, कर्ता मत बनो।

दोनों हालत में तुम कुछ करते हो। अगर क्रोध आ गया, तो या तो तुम दूसरे पर क्रोध को फेंकते हो या अपने भीतर दबाते हो। दोनों गलत हैं। कामवासना उठी, तो या तो दूसरे पर उलीचते हो या अपने ही भीतर दबाते हो। दोनों गलत हैं। न तो उलीचो किसी पर। क्योंकि किसी ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है! और तुम्हारी वासना के द्वारा दूसरे पर उलीच कर तुम दूसरे को भी वासना के कीचड़-कबाड़ में घसीट रहे हो। उसकी वैसे ही समस्याएं कुछ कम न थीं, और आप मिल गए। वह अपनी ही उलझनों में उलझा था, और आपने और उलझा दिया। नहीं, उलीचो मत किसी पर। क्योंकि जिस पर भी तुम उलीचोगे, वह भी तुम पर वापस में उलीचेगा। आज तुम किसी पर वासना आरोपित करोगे, तो उसकी भी वासना है, वह तुम पर आरोपित करेगा।

इसीलिए तो वासना में बंधन मालूम पड़ता है। तुम जिसे बांधते हो, वह तुम्हें बांध लेता है; तुम जिसे भोगते हो, वह तुम्हें भोगने लगता है; तुम जिसे पकड़ते हो, वह तुम्हें पकड़ लेता है। किसी पर उलीचो मत–न काम, न क्रोध, न कुछ और। और अपने भीतर भी मत दबाओ; जब दूसरे पर इतनी कृपा की, तो अपने पर भी कृपा करो। तुमने भी तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? दबाओ भी मत।

और दोनों के मध्य में बड़ी बारीक, बड़ी सूक्ष्म यात्रा है। देखो! भरपूर देखो! क्योंकि देखने से किसी का कोई नुकसान नहीं हो रहा है। और जैसे-जैसे तुम देखोगे, तुम पाओगे–देखते-देखते ही एक जागरण आया। देखते-देखते ही होश उठा। और होश ही सब कुछ है।

माइले-दैरो-हरम तूने यह सोचा भी कभी

जिंदगी खुद ही इबादत है अगर होश रहे

माइले-दैरो-हरम…

ओ मंदिर और मस्जिद की तरफ झुकने वाले!

…तूने यह सोचा भी कभी

जिंदगी खुद ही इबादत है अगर होश रहे

फिर कोई और प्रार्थना नहीं, कोई पूजा नहीं, फिर कोई और ध्यान ही नहीं।

जिंदगी खुद ही इबादत है अगर होश रहे

तीसरा प्रशन:

आपने कहा, कामना अनिवार्यतः दुख में ले जाती है। तो क्या पुण्य की कामना, धर्म की कामना, भगवान की कामना भी दुख में ही ल