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SHIV SUTRA-8


जिन सूत्र--(भाग-1) प्रवचन--08

सम्‍यक ज्ञान मुक्‍ति है—प्रवचन—आठवां

प्रश्‍नसार:

1—आपने कहा कि सत्‍य संज्ञा नहीं है, क्रिया है।

क्‍या प्रेम, आनंद, ध्‍यान, समाधि भी क्रिया ही है?

क्‍या क्रिया का समझ से कोई संबंध है?

2—तीर्थंकर चौबीस ही क्‍यों, ज्‍यादा क्‍यों नहीं?

3—क्‍या परंपरा की जरूरत नहीं है? क्‍या परंपरा से हानि ही हानि हुई है?

4—किसी सुंदर युवती को देख कर मन उसकी और आकर्षित हो जाता है। क्‍या वासना यह है, या प्रेम, या सुंदरता की स्‍तुति?

पहला प्रश्न:

आपने कल कहा कि सत्य संज्ञा नहीं है, क्रिया है। क्या इसी भांति प्रेम, आनंद, ध्यान, समाधि जो भी स्वभावगत है, वह भी संज्ञा नहीं, वरन क्रिया है? और क्या क्रिया का समझ से कोई संबंध नहीं है? कृपा कर समझाएं।

क्रिया है: जीवंतता। संज्ञा है: लाश। संज्ञा का अर्थ है: जो चीज हो चुकी। क्रिया का अर्थ है: जो अभी हो रही, हो रही, हो रही। जैसे नदी बह रही है, नदी क्रिया है; तालाब नहीं बह रहा, तालाब संज्ञा है। बहाव जीवन है, ठहराव मृत्यु है।

जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है, सभी क्रिया जैसा है। प्रेम भी कोई वस्तु नहीं है; प्रेम भी प्रक्रिया है। करो तो है, न करो तो गया। जो तुमसे कहता है, मैं तुम्हें प्रेम करता हूं, उसका प्रेम भी उन्हीं क्षणों में होता है जब वह करता है; जब नहीं करता तब प्रेम खो जाता है।

प्रेम को बनाये रखना हो तो क्रिया को जारी रखना पड़े। ध्यान भी तभी होता है जब तुम करते हो; जब तुम नहीं करते, खो जाता है। जो तुम करते हो वही होता है। श्वास भी तुम जब तक ले रहे हो, तभी तक है; जब न लोगे, तब कैसी श्वास?

जीवन का बड़ा गहनतम सत्य है कि यहां सभी प्रक्रियाएं हैं। विज्ञान ने भी इस सत्य को उदघोषित किया है।

बड़े वैज्ञानिक एडिंगटन ने लिखा है कि "ठहराव' झूठा शब्द है, क्योंकि कोई चीज ठहरी हुई नहीं है। सब हो रहा है। इसलिए ठहराव को प्रदर्शित करनेवाले सभी शब्द अज्ञान-सूचक हैं। हम कहते हैं, वृक्ष है। ऐसा कहना नहीं चाहिए। यह सत्य के अनुकूल नहीं है। यह अस्तित्व का सूचक नहीं है। कहना चाहिए, वृक्ष हो रहा है। जब हम कहते हैं वृक्ष है, तब ऐसा लगता है कि होना बंद हो चुका, कोई चीज है। जब हम कहते हैं वृक्ष है, जितनी देर हमने कहने में लगाई कि वृक्ष है, उतनी देर में वृक्ष कुछ और हो चुका। कुछ पुराने पत्ते गिर गये। कुछ नई कोंपलें सरककर बाहर आ गयीं। कोई कली फूल बन गई। कोई फूल बिखर गया। वृक्ष उतनी देर में बूढ़ा हो रहा है। हम कहते हैं, मकान है, लेकिन मकान भी जराजीर्ण हो रहा है; आज है कल नहीं हो जायेगा, अन्यथा महलों के खंडहर कैसे होते! हम कहते हैं, यह आदमी जवान है; अगर हम गौर से देखें तो कहना पड़ेगा, यह आदमी जवान हो रहा है या यह आदमी बूढ़ा हो रहा है। "है' की कोई अवस्था नहीं है।

यूनान के बहुत बड़े मनीषी हैराक्लतु ने कहा है, तुम एक ही नदी में दुबारा नहीं उतर सकते। दुबारा उतरने को वही नदी पाओगे कहां? पानी बहा जा रहा है।

फिर हैराक्लतु के एक शिष्य ने कहा कि अगर हैराक्लतु सही है तो एक ही नदी में एक बार भी कैसे उतरा जा सकता है? जब तुम्हारे पैर ने नदी की ऊपर की सतह छुई, तब नदी और थी; जरा पैर नीचे गया, तब नदी और हो गई; और तलहटी तक पहुंचा, तब तक नदी और हो गई। गंगा बही जाती है। बहाव में गंगा है। इसलिए सब हो रहा है।

तुम हो, ऐसा नहीं--तुम हो रहे हो।

जीवन एक घटना है, वस्तु नहीं। और जिसने जीवन का यह घटनामय रूप देखा, उसके भीतर जीवन बड़ी प्रज्वलता से जलेगा। तब तुम यह नहीं कहोगे कि प्रेम कोई स्थायी निधि है, कि रखी है हृदय में! प्रेम भी श्वास जैसा है; लो तो है, न लो तो नहीं है।

तुम जो करते हो, उस कृत्य में ही चीजें होती हैं। तुम जो हो उससे तुम्हारी कोई स्थिति का पता नहीं चलता, सिर्फ तुम्हारी क्रिया का पता चलता है। तुम कहते हो, यह आदमी साधु है। इसका केवल इतना ही अर्थ हुआ, यह आदमी साधु होने में लगा है। यह आदमी साधुता को सम्हाल रहा है। तुम कहते हो, यह आदमी ध्यानी है। इसका इतना ही अर्थ होता है कि यह ध्यान की श्वासें ले रहा है।

यहां सब चीज चल रही है, कोई चीज ठहरी नहीं है। सब रूपांतरित हो रहा है, प्रतिपल रूपांतरित हो रहा है। प्रतिपल नया घट रहा है, पुराना जा रहा है। इसलिए तो कहते हैं, पुराने से मोह मत रखो; क्योंकि तुम्हारा मोह तुम्हें अटकायेगा। और जीवन और तुम्हारा छंद टूट जायेगा। इसलिए तो कहते हैं, भविष्य की चाह मत करो; क्योंकि भविष्य अभी नहीं है। अतीत न हो चुका, भविष्य अभी नहीं है। जो न हो चुका उसे पकड़ोगे तो मुश्किल में पड़ोगे, अड़चन पैदा होगी; जो अभी नहीं है उसे तो पकड़ोगे कैसे? सिर्फ कल्पना करोगे। जो है, उसे देखो। और जो है, वह प्रतिपल बहा जा रहा है। इस बहती गंगा का साक्षात्कार करो।

बुद्ध के ऊपर कोई एक व्यक्ति आया और थूक गया। नाराज था बहुत। बड़े क्रोध में था। बुद्ध जैसे व्यक्तियों का होना भी कुछ लोगों को बड़े क्रोध से भर देता है। क्योंकि बुद्ध जैसे व्यक्तियों के होने से कुछ लोगों के होने की असंभावना पैदा हो जाती है। बुद्ध की मौजूदगी अहंकार को तोड़ती है। बुद्ध की मौजूदगी कहती है कि तुम भी ऐसे हो सकते थे, न हो पाये। बुद्ध की मौजूदगी तुम्हें तुम्हारे सत्य से परिचित कराती है। बुद्ध का फूल तुम्हें तुम्हारे कांटे की तरफ इशारा करवाता है। नाराजगी पैदा होती है।

...थूका बुद्ध के ऊपर। बुद्ध ने पोंछ लिया अपनी चादर से। दूसरे दिन वह आदमी क्षमा मांगने आया। रात भर सो न सका। बुद्ध ने कहा, "नहीं, क्षमा की कोई बात नहीं; क्योंकि जो थूक गया था, वह अब है ही कहां! जिस पर थूक गया था, वह भी अब नहीं है। न मैं वही हूं, न तुम वही हो। छोड़ो भी! जाने भी दो! उन बातों में पड़ने की जरूरत कहां है? एक तो तुमने थूककर गलती की, फिर रातभर व्यर्थ की चिंता की। अब पश्चात्ताप कर रहे हो। अब छोड़ो! मेरी तरफ देखो। मैं वह नहीं हूं, जिस पर तुम थूक गये थे। तुम भी वह नहीं हो।

आनंद, बुद्ध का शिष्य, पास बैठा था। उसने कहा कि ठहरें, यह बात दर्शनशास्त्र की नहीं है। यह आदमी थूक गया था और वही आदमी है। बुद्ध ने कहा, "तुम थोड़ा देखो आनंद! कल यह थूक गया था, आज यह क्षमा मांगने आया है--वही आदमी हो कैसे सकता है? जो थूक गया था और जो क्षमा मांगने आया है, इसमें तुम्हें भेद नहीं दिखायी पड़ता? तुम चेहरे से धोखे में आ रहे हो। जरा भीतर देखो। यह आदमी वही नहीं है, नहीं तो थूकता। यह तो क्षमा मांगता है। यह कोई और है। यह किसी नये का आविर्भाव हुआ है। तुम इस नये के दर्शन करो।'

लेकिन आनंद मानने को राजी नहीं है, क्योंकि आनंद तो कल को ही पकड़े बैठा है। जो तुम्हें कल गाली दे गया था, वह आज जब तुम्हें दुबारा मिले तो तुम कल को पकड़कर मत बैठना; अन्यथा तुम जो आज आया है, उसे न देख पाओगे। हो सकता है, क्षमा मांगने आया हो। कल जो मित्र था, आज शत्रु हो सकता है। जो आज शत्रु है, कल मित्र हो सकता है।

ध्यानी अपने को सतत खाली रखता है, निर्मल रखता है, आंख खुली रखता है। बादल नहीं इकट्ठे करता। तथ्य को देखता है, जैसा अभी है। न तो कल से तौलता है, न आनेवाले कल से तौलता है। जैसा अभी है, उस तथ्य को देखता है। लेकिन इस तथ्य को देखने के लिए तुम्हें भी सत्य होना पड़े। इसलिए महावीर ने सत्य को समस्त धर्म का सार कहा। तप और संयम, और शेष सब गुण उसमें समाविष्ट हैं।

सत्य का अर्थ हुआ: भीतर तुम जो हो, वही रहो। तो बाहर भी तुम उसी को देख पाओगे, जो है। हम बाहर वही देखते रहते हैं, जो नहीं हैं। अतीत बड़ा बोझिल है। भविष्य भी बड़ा बोझिल है। और इन दोनों की कशमकश में, इन दो चक्कियों के पाट के बीच वर्तमान का छोटा-सा क्षण पिस जाता है। तुम या तो कल्पना करते हो, या याददाश्तों में खोये रहते हो। तुम देखते ही नहीं, जो तुम्हारे पास से गुजर रहा है।

जीवन को तथ्य में देखो। लेकिन उस देखने के लिए तुम्हें सत्यमय होना पड़ेगा। जो सत्य है, वह सत्य को देखेगा। और तब तुम्हें संज्ञाएं न दिखायी पड़ेंगी, क्रियाएं दिखायी पड़ेंगी।

आत्मा कोई वस्तु थोड़े ही है कि तुम उसे मुट्ठी में बांध ले सकते हो--आत्मा तो तुम्हारे भीतर चैतन्य की सतत प्रक्रिया है। वह जो चैतन्य का आविर्भाव हो रहा है पल-पल, वह जो साक्षी जन्म रहा है शून्य से निरंतर--वही है आत्मा।

मनस्विद कहते हैं कि आदमी जब पैदा होता है तो शून्य की तरह पैदा होता है। बच्चा पैदा हुआ, शून्य की तरह पैदा होता है। अभी उसे कुछ भी पता नहीं है। वह है, ऐसा भी पता नहीं है। इसे होने के लिए भी थोड़ी देर लगेगी। लेकिन पैदा हुआ है, तो शून्य की तरह--यह उसकी पहली जीवन-घटना है। लेकिन जैसे ही बच्चा पैदा हुआ, मिटने का भय समाने लगता है। जब हुए, तो मिटने का भय भी आता है। भूख लगती है, प्यास लगती है--मिटने का भय पकड़ने लगता है। तो पहली जो तुम्हारे भीतर गहनतम स्थिति है, वह तो शून्य की है। उसे महावीर आत्मा कहते हैं। बुद्ध उसे अनात्मा कहते हैं। दोनों कहे जा सकते हैं--आत्मा, क्योंकि वह तुम्हारा स्वरूप है--अनात्मा, क्योंकि वहां "मैं' जैसा कोई भाव नहीं, शुद्ध स्वरूप है। "मैं' भी नहीं है वहां। लेकिन जैसे ही बच्चा पैदा हुआ कि डर पैदा हुआ कि अब मैं हूं, तो कहीं मिट न जाऊं। जहां "हूं' आया, वहां न होने का भय भी आया। जहां प्रकाश आया, पीछे-पीछे अंधेरा भी आया। तो एक भय की पर्त खड़ी होती है। शून्य है भीतर, उसके आसपास भय की पर्त है। अमृत है भीतर, उसके आसपास मृत्यु की पर्त है।

फिर समाज बच्चे को ढालना शुरू करता है। बच्चे को वैसा ही नहीं छोड़ देता, जैसा वह आया है। संस्कार देने हैं। शिक्षा देनी है। सभ्यता देनी है। बहुत कुछ काटना है, बहुत कुछ बनाना है। बहुत कुछ नया उगाना है, बहुत कुछ हटाना है। समाज कांट-छांट शुरू करता है। छैनी उठा लेता है। तो बच्चे के भीतर एक तीसरी पर्त पैदा होती है--नीति की, समाज की, संस्कार की, संस्कृति की। लेकिन स्वभावतः यह जो संस्कृति, समाज की पर्त है, यह उसके स्वभाव के प्रतिकूल पड़ती है। नहीं तो इसकी जरूरत ही न होती। इसकी जरूरत ही इसलिए होती है कि जैसा बच्चा स्वभाव के अनुसार है, वैसा समाज को अंगीकार नहीं है। बच्चा बेवक्त हंसने लगे, उसके स्वभाव के अनुकूल है कि उसे हंसी आ रही है, लेकिन समाज नियमन करेगा कि सब स्थान सब समय हंसने के योग्य नहीं हैं। कोई मर गया हो और तुम हंसने लगो...।

मेरे एक शिक्षक मर गये थे। बड़े सीधे-साधे शिक्षक थे। रहने-सहने का ढंग भी उनका बड़ा सीधा-साधा था। एक बड़ी पगड़ी बांधते थे। अकेले ही थे उस पूरे गांव में, जो उतना बड़ा पग्गड़ बांधते थे। चलते भी ऐसे ढीले-ढाले थे। संस्कृत के शिक्षक थे। तो उनको लोग पोंगा-पंडित ही समझते थे। स्कूल में उनका नाम बच्चों ने "भोलेनाथ' रख लिया था। जैसे ही वे आते, बच्चे कहने लगते: "जय भोले बाबा!' उनकी कमीज पर पीछे लिख देते: "जय भोले बाबा!' बोर्ड पर लिख देते: भोलानाथ। वे नाराज भी होते थे, लेकिन उनकी नाराजगी भी बड़ी प्रीतिकर थी। वे बड़ी नाच-कूद भी मचाते थे, बड़े गुस्से में भी आ जाते थे। मरने-मारने की जैसी हालत होती, लेकिन मारते-करते किसी को न थे। सीधे-साधे आदमी थे। शोरगुल मचाकर चुप हो जाते थे।

वे मरे तो मैं अपने पिता के साथ उनके घर गया। उनकी लाश पड़ी थी। और उनकी पत्नी आयी और उनकी छाती पर गिर पड़ी और कहा, "हाय, मेरे भोलेनाथ!' भोलेनाथ कहकर हम उन्हें चिढ़ाते थे। यह तो किसी और को पता न था, मुझको ही पता था। वहां तो सब बड़े-बूढ़े थे। तो वे तो चुप रहे, लेकिन मुझे बड़ी जोर की हंसी आई कि यह तो हद्द मजाक हो गयी! जिंदगी में भी "भोलेनाथ', मरकर अब कोई और कहने को नहीं तो खुद पत्नी कह रही है, "हाय मेरे, भोलेनाथ।' जितना मैंने रोकने की कोशिश की, उतनी मुश्किल हो गयी। आखिर हंसी निकल ही पड़ी। पिता नाराज हुए। कहा, दुबारा अब कभी ऐसी जगह न ले जायेंगे। और शिष्टाचार सीखो। यह कोई ढंग हुआ? वहां कोई मरा पड़ा है, लोग रो रहे हैं--और तुम हंस रहे हो!

मैंने उनसे कहा, मेरी भी तो सुनो। वहां किसी को पता ही नहीं था, जो राज मुझे पता है। जिस वजह से मुझे हंसी आयी--वह हंसी यह थी कि जिंदगीभर इस आदमी को हम भोलानाथ कहकर चिढ़ाते रहे, मरकर भी मजाक तो देखो! कोई और नहीं तो खुद पत्नी कह रही है, "हाय मेरे भोलेनाथ!' यह आदमी, इसकी आत्मा वहां भी उछलने-कूदने लगी होगी, नाराज हो गई होगी कि हद्द हो गई! आखिरी विदा के क्षण में भी!

लेकिन तब से उन्होंने मुझे ले जाना बंद कर दिया। कहीं कोई मर जाये, कुछ हो तो वे मुझे न ले जाते।

संस्कार देना जरूरी है। परिवार की अपनी अड़चन है। समाज की अपनी असुविधा है। बच्चे को वैसे ही नहीं छोड़ा जा सकता, कुछ न कुछ काट-छांट करनी पड़ेगी। वह जो काट-छांट है, उसमें बच्चे के स्वभाव के प्रतिकूल उस पर कुछ थोपा जाता है। जहां रोना चाहता है, रो नहीं सकता है। जहां हंसना चाहता है, हंस नहीं सकता। जहां क्रोध करना चाहता है, क्रोध नहीं कर सकता। जहां प्रेम नहीं करना है, वहां प्रेम दिखलाना पड़ता है। जिनके पैर नहीं छूने, उनके पैर छूने पड़ते हैं। जो नहीं खाना है, वह खाना पड़ता है। जो खाना है, वह खाने को मिलता नहीं है। तो तीसरी पर्त खड़ी होती है--संस्कार की, समाज की, नियंत्रण की। कारागृह बनता है।

फिर जैसे ही बच्चा बड़ा होता है, धीरे-धीरे जैसे-जैसे उसके पास ताकत आती है, वह पीछे के दरवाजों से अपने स्वभाव की पूर्ति के रास्ते खोजता है। कमजोर है बच्चा, छोटा है, तब तक तो स्वीकार कर लेता है; लेकिन जैसे-जैसे समझ आने लगती है, ताकत आने लगती है, वह कोई रास्ते निकालने लगता है, छिप-छिपकर करने लगता है काम, जो उसे करने हैं। धोखा पैदा होता है। तो चौथी पर्त पैदा होती है जो समझौते की पर्त है। वह समाज जो मानता है, चाहता है, वैसा दिखाता है; और जो उसे करना है, वैसा करता है। तो दोहरा व्यक्तित्व बनता है। यह चौथी पर्त है।

फिर पांचवीं एक पर्त है, जो सबसे ऊपर-ऊपर है--लोकाचार की, शिष्टाचार की। किसी को तुम मिलते हो तो कहते हो, "कहिए, कैसे हैं? बड़ी खुशी हुई मिलकर। बड़े दिनों बाद दर्शन हुए। बड़े दिन से आंखें तरसती थीं।'

ये सब बातें हैं। यह औपचारिक पर्त है। इससे थोड़ा संबंधों में सुगमता बनी रहती है। जयराम जी, हैलो--इससे थोड़ा दो व्यक्तियों के बीच में स्निग्धता बनी रहती है--लुब्रिकेशन। नहीं तो कोई मिला और सीधे खड़े हो गये। वह भी खड़ा है, तुम भी खड़े हो--कहां से चलें, क्या कहें, क्या न कहें! तो अड़चन खड़ी होगी, तो कहा जयराम जी! बातचीत शुरू हुई। "मौसम कैसा है?' "अच्छा है।' "पति-पत्नी, बच्चे, घर, सब कुशल हैं?' सिलसिला चल पड़ा। अब आगे बात चल सकेगी। कहीं से शुरू तो करना होगा।

तो पांचवीं पर्त है उपचार की। ये तुम्हारी पर्तें हैं। पहली जो घटना थी शून्य की, वह तुम्हारा सत्य है। अब इन चार पर्तों के नीचे दबा है सत्य। इन पर्तों को धीरे-धीरे छांटना होगा। इन पर्तों को धीरे-धीरे हटाना होगा। जैसे कि नदी पर पत्ते छा जाते हैं, सैवाल फैल जाता है, तो हम हटाकर देखते हैं, नीचे जलधार बह रही है--इन चार पर्तों के नीचे तुम्हारा स्वभाव बह रहा है, तुम्हारी गंगा बह रही है। इनको हटाने का नाम ही साधना है। ये चारों पर्तें जड़ हैं। ये चारों पर्तें संज्ञा की हैं। और तुम्हारा स्वभाव क्रिया का है। इन चारों पर्तों के साथ समाज राजी है, तुम्हारे स्वभाव से राजी नहीं है; क्योंकि ये चारों पर्तें तुम्हें नियंत्रण में ला देती हैं। तुम्हारा स्वभाव तो बड़ी विस्फोटक घटना है।

इसलिए तो महावीर जब जिंदा होते हैं तो स्वीकार नहीं होते। बड़े विस्फोटक आदमी हैं। अपने रंग में जीते हैं। कोई समझौता नहीं करते। अपने स्वभाव में जीते हैं, चाहे कोई भी कीमत चुकानी पड़े। अगर नग्न होने में मजा आया तो नग्न जीते हैं। चाहे दुनिया कुछ भी कहे। भला कहे, बुरा कहे--कोई चिंता नहीं लेते।

तो महावीर तो एक बगावती हैं, एक क्रांतिकारी हैं। धर्म बगावत है, क्रांति है। हां, जब महावीर मर जाते हैं तो उनके पीछे जो इकट्ठे होते हैं, वे कोई बगावती नहीं हैं। या हो सकता है, पहली जो संख्या, पहले लोग जो महावीर के पास आये थे, वे बगावती रहे हों; लेकिन उनके बेटे तो बगावती नहीं होंगे। उनके बेटे तो पैदाइश से जैन होंगे। जिन्होंने महावीर को चुना था अपनी स्वेच्छा से, उन्होंने तो बड़ी हिम्मत की थी, बड़ा साहस किया था। क्योंकि महावीर बदनाम थे। गांव-गांव से खदेड़े जाते थे। पत्थर मारे गये। कान में खीलें ठोंक दिये किसी ने। कहीं स्वीकार न थे। जिन्होंने उन्हें स्वीकार किया था, वे तो बड़े हिम्मतवर लोग रहे होंगे, बड़े साहसी।

तो शिष्यों का जो पहला समूह होता है, वह तो हिम्मतवर होता है। लेकिन जो दूसरी पीढ़ी आती है, वह तो फिर वैसी ही होती है। इसलिए तो सभी धर्म खो जाते हैं। जब सदगुरु जीवित होता है तो धर्म भी जीवित होता है। जब सदगुरु विदा हो जाता है तो धीरे-धीरे सदधर्म की ध्वनि भी, प्रतिध्वनि बनती जाती है--दूर, दूर, दूर--फिर खो जाती है। फिर महावीर पूज्य हो जाते हैं। फिर कोई अड़चन नहीं रह जाती है। फिर तुम उनकी मूर्ति बनाकर पूजो। फिर तुम्हें जो करना हो महावीर के साथ, बेशक करो।

दिगंबर हैं, नग्न मूर्ति की पूजा करते हैं। उनकी मौज! श्वेतांबर हैं, नग्न मूर्ति की पूजा नहीं करते। उनकी मौज! दिगंबर आंख-बंद महावीर की पूजा करते हैं--उनकी मौज। अब महावीर कुछ कह नहीं सकते कि जरा ठहरो, मुझे आंख खोलनी है। वे फौरन रोक देंगे कि बंद करो बकवास, आंख बंद रखो! नियम से चलो! दिगंबर बंद आंख की पूजा करते हैं; श्वेतांबर खुली आंख की पूजा करते हैं। कुछ मंदिर हैं, जो दोनों के हैं। तो आधा दिन दिगंबर पूजा करते हैं, आधा दिन श्वेतांबर पूजा करते हैं। अब बड़ी मुश्किल है, पत्थर की मूर्तियां हैं। वैसा कुछ आसान भी नहीं है कि आंख खोल दो, लगा दो। तो झूठी आंख चिपका देते हैं। जब सुबह दिगंबर पूजा करेंगे, तो वे खाली मूर्ति की पूजा कर जाते हैं। जब श्वेतांबरों की घड़ी आती है बारह बजे के बाद, तो वे आकर नकली आंख, खुली आंख चिपका देते हैं; कपड़े पहना देते हैं। पूजा शुरू हो जाती है। महावीर न तो कह सकते कि ये कपड़े मुझे पसंद नहीं, न कह सकते कि मुझे नग्न रहना है, न कह सकते हैं कि मुझे ठंडी लग रही है, अभी नग्न मत करो, कि अभी बहुत गर्मी है, कुछ कह नहीं सकते। अब तुम्हारे हाथ के खिलौने हैं। तुम्हारे महावीर, तुम्हारे बुद्ध, तुम्हारे कृष्ण, तुम्हारे हाथ के खिलौने हैं। असली महावीर, असली कृष्ण और बुद्ध जलते हुए अंगारे थे। उनको हाथ में रखने के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए थी। जो दग्ध होने को राजी थे वे उनके पास आये थे। कमजोर तो उनसे दूर भागे थे। कमजोर तो उनके दुश्मन थे। लेकिन पीछे...।

मेरे पास संन्यासी आते हैं। कोई पिता आता है, कोई मां आती है। वह कहते हैं, हमारे बेटे को भी संन्यास दे दें। उनका भाव मैं समझता हूं। उन्हें जो सुख मिला है, उन्हें जो शांति मिली है, वे चाहते हैं उनके बेटे को भी मिल जाये। लेकिन उन्होंने तो मुझे चुना है, बेटे को वे ले आये हैं। बेटे ने मुझे नहीं चुना है। बेटे ने स्वेच्छा से मुझे नहीं चुना है, बाप के साथ चला आया है। बाप कहता है, संन्यास तेरा भी करवाना है, तो वह कहता है, ठीक है। लेकिन यह संन्यासी और ढंग का संन्यासी होगा। यह तो मजबूरी का संन्यासी होगा।

ऐसी स्त्रियां मेरे पास आती हैं, वे कहती हैं, "गर्भ में बच्चा है, उसे संन्यास दे दें।' उनका भाव मैं समझता हूं। उनका प्रेम मैं समझता हूं। मगर उनके भाव और प्रेम से थोड़े ही संसार चलता है। उनकी भाव की बात बड़ी शुद्ध है। उनका भाव यह है कि उनका बच्चा पैदा होते से ही संन्यासी हो। ठीक है, शुभ है। लेकिन बेटे से तो पूछो! वह जो अभी पैदा ही नहीं हुआ है, उसे जुआरी बनना है कि शराबी बनना है, कि संन्यासी बनना है, कि हिंदू बनना है कि मुसलमान बनना है--उससे तो पूछो! लेकिन उससे अभी पूछने का कोई उपाय नहीं है।

तो जैसे जैन घर में पैदा होने से कोई जैन हो जाता है, मेरे संन्यासी के घर में पैदा होने से कोई संन्यासी हो जायेगा। लेकिन दूसरी पीढ़ी मुर्दा होगी। शायद दूसरी पीढ़ी में भी थोड़ा घिसटता-लंगड़ता हुआ धर्म रह जाये, क्योंकि उसने पहली पीढ़ी के दर्शन किये होंगे; कम से कम पहली पीढ़ी के पास रही होगी; उस हवा में पली होगी। लेकिन तीसरी पीढ़ी? वह तो और दूर हो जायेगी। चौथी पीढ़ी और...।

फिर पच्चीस सौ साल हो गये महावीर को हुए, अब तो सब मुर्दे हैं। अब तो जैन के नाम से जो है वह मुर्दा है। वह उतना ही मुर्दा है जैसे मुहम्मद का मुसलमान मुर्दा है और ईसा का ईसाई मुर्दा है। यह स्वाभाविक है। इसे टाला नहीं जा सकता। जैसे व्यक्ति पैदा होते हैं, जवान होते हैं, मर जाते हैं--ऐसे ही धर्म पैदा होते हैं, जवान होते हैं, बूढ़े होते हैं और मर जाते हैं। इस संसार में जो भी चीज जन्मती है, वह मरती भी है। वह जो परमधर्म है, जो कभी पैदा नहीं होता, कभी नहीं मरता, उसका तो कोई नाम नहीं है--न हिंदू, न जैन, न मुसलमान, न ईसाई। उसकी हम बात नहीं कर रहे। लेकिन जैन, हिंदू, मुसलमान, ईसाई जिस धर्म का नाम है, यह कभी पैदा हुआ, कभी मरेगा।

ये जो चार पर्तें हैं तुम्हारे ऊपर, ये सब संज्ञा की तरह हैं। तुमने जिसे जैन धर्म कहा है, वह संज्ञा है। मैं जिसे जैन धर्म कह रहा हूं, वह क्रिया है। तुम जिसे जैन धर्म कह रहे हो, वह तुम्हारी पैदाइश, तुम्हारे जन्म, तुम्हारे संयोग की घटना है। मैं जिसे जैन धर्म कह रहा हूं, वह तुम्हारा आविष्कार है, तुम्हारी खोज है। फिर-फिर तुम्हें खोजना होगा। मेरा जो जैन धर्म है, वह हिंदू धर्म के विपरीत नहीं है। मेरा जो जैन धर्म है, वह इस्लाम के विपरीत नहीं है। मेरा जो जैन धर्म है, वह सभी धर्मों का सार है। वहां बाइबिल और कुरान और गीता और धम्मपद और जिन-सूत्र, सब एक हो जाते हैं। तुम्हारा जो जैन धर्म है, वह राजनीति है। वह हिंदू के खिलाफ है, वह मुसलमान के खिलाफ है। तुम्हारा जो जैन धर्म है, वह एक संप्रदाय है, धर्म नहीं। वह एक जड़, मरी हुई वस्तु है।

निश्चित ही, जैसे सत्य एक जीवंत आग है, लपटें जल रही हैं--ऐसे ही प्रेम भी, आनंद भी, ध्यान भी, समाधि भी, जो भी जीवंत है, वह लपट की तरह बहता हुआ है, गंगा की