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SHIV SUTRA-1


शिव—सूत्र:-

ओंम स्वप्रकाश आनंद—स्वरूप भगवान शिव को नमन

''चैतन्‍य आत्मा है।ज्ञान बंध है।यौनिवर्ग और कला शरीर है।

उद्यम ही भैरव है।शक्‍तिचक्र के संधान से विश्व का संहार हो जाता है।शक्‍तिचक्र के संधान से विश्व क्त संहार खे जाता है'''

चैतन्य हम सभी हैं, लेकिन आत्मा का हमें कोई पता नहीं चलता। अगर चैतन्य ही आत्मा है तो हम सभी को पता चल जाना चाहिए। हम सब चैतन्य है। लेकिन, चैतन्य आत्मा है, इसका क्या अर्थ होगा?

पहला अर्थ : इस जगत में, सिर्फ चैतन्य ही तुम्हारा अपना है। आत्मा का अर्थ होता है, अपना; शेष सब पराया है। शेष कितना ही अपना लगे, पराया है। मित्र हों, प्रियजन हों, परिवार के लोग हों, धन हो, यश, पद-प्रतिष्ठा हो, बड़ा साम्राज्य हो, वह सब जिसे तुम कहते हो मेरा, वहां धोखा है। क्योंकि वह सभी मृत्यु तुमसे छीन लेगी। मृत्यु कसौटी है, कौन अपना है, कौन पराया है। मृत्यु जिससे तुम्हें अलग कर दे, वह पराया था। और मृत्यु तुम्हें जिससे अलग न कर पाये, वह अपना था।

आत्मा का अर्थ है : जो अपना है। लेकिन जैसे ही हम सोचते है अपना, वैसे ही दूसरा प्रवेश कर जाता है। अपने का मतलब ही होता है कोई दूसरा, जो अपना है। तुम्हें यह खयाल ही नहीं आता कि तुम्हारे अतिरिक्त, तुम्हारा अपना कोई भी नहीं है; हो भी नहीं सकता। और जितनी देर तुम भटके रहोगे इस धारा में कि कोई दूसरा अपना है, उतने दिन व्यर्थ गये; उतना जीवन अकारण बीता। उतना समय तुमने सपने देखे। उतने समय में तुम जाग सकते थे, मोक्ष तुम्हारा होता; तुमने कचरा इकट्ठा किया।

सिर्फ तुम ही तुम्हारे हो।

यह पहला सूत्र है : मेरे अतिरिक्त मेरा कोई भी नहीं है। यह बड़ा क्रांतिकारी सूत्र है, बड़ा समाज—विरोधी है। क्योंकि समाज जीता इसी आधार पर है कि दूसरे अपने है; जाति के लोग अपने है; देश के लोग अपने है— मेरा देश, मेरी जाति, मेरा धर्म, मेरा परिवार; मेरे का सारा खेल है। समाज जीता है ‘मेरी’ की धारणा पर। इसलिए धर्म समाज—विरोधी तत्व है। धर्म समाज से छुटकारा है, दूसरे से छुटकारा है। और धर्म कहता है कि तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा और कोई भी नहीं है।

ऊपर से देखें तो यह बडा स्वार्थी वचन मालूम पड़ेगा; क्योंकि यह तो यह बात हुई कि हम ही अपने है, तो तत्‍क्षण हमें लगता है कि यह तो स्वार्थ की बात है। यह स्वार्थ की बात नहीं है। अगर यह तुम्हें खयाल में आ जाये, तो ही तुम्हारे जीवन में परार्थ और परमार्थ पैदा होगा। क्योंकि जो अभी आत्मा के भाव से ही नहीं भरा है, उसके जीवन में कोई परार्थ और कोई परमार्थ नहीं हो सकता।

तुम कहते हो दूसरों को मेरा। लेकिन, ‘मेरा’ कहकर तुम करते क्या हो? मेरा कहकर तुम उन्हें चूसते हो। ‘मेरा’ तुम्हारा शोषण का हिस्सा है, फैलाव है। जिसको भी तुम ‘मेरा’ कहते हो, उसको तुम गुलाम बनाते हो। तुम उसे अपने परिग्रह में परिवर्तित कर देते हो। मेरी पत्नी, मेरा पति, मेरा बेटा, मेरा पिता— तुम करते क्या हो? इस मेरे के पीछे—इस ‘मेरे’ के परदे के पीछे— तुम्हारे संबंध का मूल आधार क्या है? तुम चूसते हो, तुम शोषण करते हो, तुम दूसरे का उपयोग करते हो। इस दूसरे के उपयोग को तुम सोचते हो परार्थ, तो तुम भ्रांति में हो।

…..

जब तुम परोपकार करते हो, तब तुम कर नहीं सकते; क्योंकि जिसे अपना ही पता नहीं, वह परोपकार करेगा कैसे? तुम चाहे सोचते हो कि तुम कर रहे हो, गरीब की सेवा, अस्पताल में बीमार के पैर दबा रहे हो, लेकिन, अगर तुम गौर से खोजोगे, तो तुम कहीं-न-कहीं अपने अहंकार को ही भरता हुआ पाओगे। और, अगर तुम्हारा अहंकार ही सेवा से भरता है, तो सेवा भी शोषण है। आत्मज्ञान के पहले कोई व्यक्ति परोपकारी नहीं हो सकता; क्योंकि स्वयं को जाने बिना इतनी बड़ी क्रांति हो ही नहीं सकती।

मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उससे झाड़ रही थी और कह रही थी कि यह मामला क्या है, एक दफा साफ हो जाना चाहिए। तुम मेरे सभी रिश्तेदारों को नफरत और घृणा क्यों करते हो? नसरुद्दीन ने कहा, ‘यह बात गलत है; यह बात तथ्यगत भी नहीं है। और इसका प्रमाण भी है मेरे पास। और प्रमाण यह है कि मैं तुम्हारी सास को अपनी सास से ज्यादा चाहता हूं।’

अहंकार ऐसे रास्ते खोजता है। ऊपर से दिखता है कि तुम परोपकार कर रहे हो; लेकिन, भीतर तुम ही खड़े होते हो। और जितनी सूक्ष्म हो जाती है यात्रा, उतनी ही पकड़ के बाहर हो जाती है। दूसरे तो पकड़ ही नहीं पाते; तुम भी नहीं पकड पाते हो। दूसरे तो धोखे में पड़ते ही हैं; तुम भी अपने दिये, धोखे में, भूल जाते हो, भटक जाते हो। हम सभी ने अपनी-अपनी भूल-भुलैया बना ली हैं। उसमें हमने दूसरों को धोखा देने के लिए ही शुरू किया था सारा उपाय, आयोजन यह हमने कभी सोचा न था कि अपनी बनाई भूल-भूलैयां में हम खुद ही खो जायेंगे। लेकिन हम खो गये हैं।

पहली बात स्मरण रखो| तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा कोई भी नहीं है। जैसे ही यह स्मरण सघन होता है कि चैतन्य ही आत्मा है, चैतन्य ही मैं हूं और सब ‘पर’ है, पराया है, विजातीय है, वैसे ही तुम्हारे जीवन में क्रांति की पहली किरण प्रविष्ट हो जाती है; वैसे ही तुम्हारे और समाज के बीच एक दरार पड़ जाती है; वैसे ही तुम्हारे और तुम्हारे संबंधों के बीच एक दरार पड़ जाती है। लेकिन आदमी अपनी तरफ देखना ही नहीं चाहता। देखना कठिन भी है; क्योंकि, देखने के पहले जिस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, वह बहुत संघातक है।

….

यह पहला सूत्र है- चैतन्य आत्मा। इस सूत्र को एक गहरे बीज की तरह हृदय में उतर जाने दो। व्यर्थ है सारे जगत की यात्रा, अगर तुम अपने से अपरिचित रह गये। अगर स्वयं को न जान पाये, और सब भी जान लिया तो वह सारा ज्ञान भी इकट्ठे जोड़ में अज्ञान सिद्ध होगा। अगर अपने को न देख पाये, और सारा जगत देख डाला, चांद—तारे छान डाले, तो भी तुम अन्य ही रहोगे। क्योंकि आख तो उसी को मिलती है, जो स्वयं को देख लेता है। ज्ञान तो उसी को मिलता है, जो स्वयं से परिचित हो जाता है। जो चैतन्य के स्वप्रकाश में नहा लेता है, वही पवित्र है। और कोई तीर्थ नहीं है; चैतन्य तीर्थ है। चैतन्य तुम्हारा स्वभाव है। उससे तुम क्षणभर को भी पार नहीं गये हो। लेकिन दीये तले अंधेरा है। तुम उससे दूर जा भी नहीं सकते, चाहो तो भी। लेकिन भ्रम पैदा हो सकता है कि तुम बहुत दूर चले गये हो। तुम सपना देख सकते हो संसार में। लेकिन, सपना सत्य नहीं हो सकता। सत्य तो सिर्फ एक बात है, वह है तुम्हारा चैतन्य स्वभाव।

चैतन्य आत्मा है। तो, पहली तो बात कि मेरा सिवाय चैतन्य के और कोई भी नहीं है। यह भाव तुममें सघन हो जाए, तो संन्यास का जन्म हुआ। क्योंकि मेरे अतिरिक्त भी मेरा कोई हो सकता है, यही भाव संसार है।

इसलिए पहले सूत्र में बड़ी क्रांति है। पहली चिनगारी है, शिव फेंकते हैं तुम्हारी तरफ – और वह यह है कि तुम जान लो कि तुम ही बस तुम्हारे हो, बाकी कोई तुम्हारा नहीं है। इससे बड़ा विषाद मन को पकड़ेगा; क्योंकि तुमने दूसरों के साथ बड़े संबंध बना रखे हैं, बड़े सपने संजो रखे हैं। दूसरों के साथ तुम्हारी बड़ी आशा जुडी हैं।

मां देख रही है कि बेटा बड़ा होगा; बड़ी आशाएं जुड़ी है! बाप देख रहा है कि बेटा बड़ा होगा; बड़ी आशाएं जुड़ी है। और इन सारी आशाओं में तुम अपने को खो रहे हो। यही तुम्हारे पिता भी इन्हीं आशाओं को कर—करके समाप्त हुए तुम्हारे लिये। तुमसे क्या उन्हें मिला? यही आशाएं कर-करके तुम समाप्त हो जाओगे; तुम्हारे बेटे से तुम्हें कुछ मिलेगा नहीं। तुम्हारा बेटा भी यही छूता जारी रखेगा। वह अपने बेटे से आशाएं करेगा।

नहीं, अपनी तरफ देखो—न तो पीछे, न आगे। कोई तुम्हारा नहीं है। कोई बेटा तुम्हें नहीं भर सकेगा। कोई संबंध तुम्हारी आत्मा नहीं बन सकता। तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा कोई मित्र नहीं है। लेकिन तब बड़ा डर लगता है; क्योंकि लगता है कि तुम अकेले हो गये। और आदमी इतना भयभीत है कि गली से गुजरता है अकेले में, तो भी जोर से गीत गाने लगता है। अपनी ही आवाज सुन के लगता है कि अकेला नहीं है। यह तुम अपनी ही आवाज सुन रहे हो। बाप जब बेटे में अपने सपने रचा रहा है, तो बेटे की कोई सहमति नहीं है। यह बाप खुद ही अकेले में सीटी बजा रहा है। इसलिए, दुखी होगा कल; क्योंकि उसने जिंदगी भर सपने खाये और यह सोचता है कि बेटा भी यही सपने देख रहा है। यह गलती में है। बेटा अपने सपने देखेगा। तुम अपने सपने देख रहे हो। तुम्हारे बाप ने अपने सपने देखे थे। ये कहीं मिलते नहीं।

हर बाप दुखी मरता है। क्या कारण होगा? क्योंकि जो—जो स्वप्न वह बांधता है, वे सभी सपने बिखर जाते हैं। हर आदमी अपने सपने देखने को यहां है, तुम्हारे सपने देखने को नहीं। और तुम्हें अगर चाहिए कि एक आप्त—स्थिति उपलब्ध हो जाये—स्व तृप्ति मिले—तो तुम सपने किसी और के साथ मत बांधना; अन्यथा तुम भटकोगे।

संसार का इतना ही अर्थ है कि तुमने अपने सपनों कि नाव दूसरों के साथ बांध रखी है। संन्यास का अर्थ है कि तुम जाग गये। और तुमने एक बात स्वीकार कर ली—कितनी ही कष्टकर हो, कितनी ही दुखपूर्ण मालूम पडे प्रथम, और कितनी ही संघातक पीड़ा अनुभव हो—कि तुम अकेले हो। सब संग—साथ झूठा है। इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम भाग जाओ हिमालय। क्योंकि जो अभी हिमालय की तरफ भाग रहा है, उसे सभी संग—साथ सार्थक हैं, झूठा नहीं हुआ। क्योंकि जो चीज झूठ हो गई, उससे भागने में भी कोई सार्थकता नहीं है। कोई भी सुबह जागकर भागता तो नहीं कि सपना झूठा है, भाग इस घर से। सपना झूठा हो गया, बात खत्म हो गई। उसमें भागना क्या है! लेकिन एक आदमी है जो भाग रहा है पली से, बच्चों से। इसका भागना बताता है—इसने सुन लिया होगा कि सपना झूठा है, लेकिन अभी इसे खुद पता नहीं चला। कल तक यह पली की तरफ भागता था, अब पत्नी की तरफ पीठ करके भागता है; लेकिन दोनों ही अर्थों में पत्नी सार्थक थी।

जीवन—सत्य की खोज दो मार्गों से हो सकती है। एक पुरुष का मार्ग है—आक्रमण का, हिंसा का, छीन—झपट का। एक सी का मार्ग है—समर्पण का, प्रतिक्रमण का।

विज्ञान पुरुष का मार्ग है; विज्ञान आक्रमण है। धर्म सी का मार्ग है; धर्म नमन है।

इसे बहुत ठीक से समझ लें।

इसलिए पूर्व के सभी शास्त्र परमात्मा को नमस्कार से शुरू होते है। वह नमस्कार केवल औपचारिक नहीं है। वह केवल एक परंपरा और रीति नहीं है। वह नमस्कार इंगित है कि मार्ग समर्पण का है, और जो विनम्र है, केवल वे ही उपलब्ध हो सकेंगे। और, जो आक्रमक है, अहंकार से भरे है; जो सत्य को भी छीन—झपटकर पाना चाहते है; जो सत्य के भी मालिक होने की आकांक्षा रखते है; जो परमात्मा के द्वार पर एक सैनिक की भांति पहुंचे हैं—विजय करने, वे हार जायेंगे। वे छ को भला छीन—झपट लें, विराट उनका न हो सकेगा। वे व्यर्थ को भला लूटकर घर ले आयें; लेकिन जो सार्थक है, वह उनकी लूट का हिस्सा न बनेगा।

इसलिए विज्ञान व्यर्थ को खोज लेता है; सार्थक चूक जाता है। मिट्टी, पत्थर, पदार्थ के संबंध में जानकारी मिल जाती है,लेकिन आत्‍मा और परमात्मा की जानकारी छूट जाती है।

विज्ञान इसीलिए आत्मा में भरोसा नहीं करता। भरोसा करे भी कैसे? इतनी चेष्टा के बाद भी आत्मा की कोई झलक नहीं मिलती। झलक मिलेगी ही नहीं। इसलिए नहीं कि आत्मा नहीं है; बल्कि तुमने जो ढंग चुना है, वह आत्मा को पाने का ढंग नहीं है। तुम जिस द्वार से प्रवेश किये हो, वह क्षुद्र को पाने का ढंग है। आक्रमण से, जो बहुमूल्य है, वह नहीं मिल सकता।

जीवन का रहस्य तुम्हें मिल सकेगा, अगर नमन के द्वार से तुम गये। अगर तुम झुके, तुमने प्रार्थना की, तो तुम प्रेम के केंद्र तक पहुंच पाओगे। परमात्मा को रिझाने के लिए अति प्रेमपूर्ण, अति विनम्र, प्रार्थना से भरा हृदय चाहिए। और जल्दी वहां नहीं है। तुमने जल्दी की, कि तुम चूके। वहां बड़ा धैर्य चाहिए। तुम्हारी जल्दी और उसका हृदय बंद हो जायेगा। क्योंकि जल्दी भी आक्रमण की खबर है। इसलिए जो परमात्मा को खोजने चलते है,उनके जीवन का ढंग दो शब्दों में समाया हुआ है— प्रार्थना और प्रतीक्षा। प्रार्थना से शास्त्र शुरू होते है और प्रतीक्षा पर पूरे होते है। प्रार्थना से खोज इसलिए शुरू होती है। इस शास्त्र का पहला चरण है :

इस नमन को बहुत गहरे उतर जाने दें। क्योंकि अगर द्वार ही चूक गया, तो पीछे महल की चर्चा करूंगा, समझ में न आयेगी।

पुरुष को थोड़ा हटायें। आक्रमक—वृत्ति को थोड़ा दूर करें। यह समझ कुछ बुद्धि से आनेवाली नहीं है; हृदय से आनेवाली है। यह समझ तुम्हारे कुछ तर्क पर निर्भर न करेगी; यह तुम्हारे प्रेम पर निर्भर करेगी। इस शाख को तुम समझ पाओगे; लेकिन वह समझ ऐसी न होगी जैसे कोई गणित को समझता है। वह समझ ऐसी होगी, जैसे कोई काव्य को समझता है। कविता पर तुम झपट नहीं पड़ते। तुम कविता का धीरे— धीरे स्वाद लेते हो, चुस्की लेते हो; जैसे कोई चाय को पीता है। तुम उसे गटक नहीं जाते। वह कोई कड्वी दवा नहीं है। तुम उसका स्वाद लेते हो, चुस्की लेते हो— धीरे— धीरे, उसके स्वाद को लीन होने देते हो। और एक ही कविता को समझना हो, तो बहुत बार पढ़ना पड़ता है। एक गणित को तुमने एक बार समझ लिया, फिर दुबारा करने की कोई जरूरत नहीं रह जाती; गणित समाप्त हो गया। कविता कभी भी समाप्त नहीं होती; क्योंकि हृदय का कोई ओर—छोर नहीं है। और तुम जितना ही प्रेम करते हो, उतना ही उदघाटित होता है।

इसलिए पूर्व में हम शाख का अध्ययन नहीं करते; हम शाख का पाठ करते है। अध्ययन शास्त्र का हो भी नहीं सकता। अध्ययन का अर्थ है कि एक बार समझ लिया, फिर कचरे में फेंक दिया, जैसे कि बात खतम हो गई। जब समझ ही लिया तो अब दुबारा क्या करना। पाठ का अर्थ होता है; समझ बुद्धि की होती तो एक बार में पूरी हो जाती। इसकी तो चुस्कियां बार—बार लेनी पड़ेगी। इसे तो जाने—अनजाने न मालूम कितनी बार दोहराना पड़ेगा। इसे बहुत—से भाव— क्षणों में, बहुत—सी मनोदशाओं में— कभी सुबह जब सूरज उगता है तब, कभी रात जब सब अंधकार हो जाता है तब, कभी मन जब प्रफुल्लित होता है तब, और कभी मन जब उदासी से भरा होता है तब— विभिन्न चित्त की दशाओं में, विभिन्न मनों— क्षणों में, इसमें उतरना होगा, तब इसके सभी पहलू धीरे— धीरे प्रकट होंगे। फिर भी तुम उसे चुकता न कर पाओगे।

कोई शास्त्र कभी चुकता नहीं। जितना ही तुम पाओगे कि खोज लिया, उतना ही तुम पाओगे कि खोज के लिए और भी ज्यादा बाकी रह गया। जितने तुम गहरे उतरोगे, पाओगे कि गहराई बढ़ती चली जाती है। शास्त्र को कभी पाठी चुका नहीं पाता। पाठ का मतलब ही यही है कि बार—बार, बहुत बार। पश्‍चिम इस बात को समझ ही नहीं पाता। उनकी पकड़ के बाहर है कि लोग गीता को हजारों साल से क्यों पढ रहे हैं? फिर एक ही आदमी रोज सुबह उठकर गीता पढ़ लेता है; पागल हो गया है? उनको खयाल में नहीं कि पाठ की प्रक्रिया हृदय में उतारने की प्रक्रिया है। उसका समझ से बहुत वास्ता नहीं है; स्वाद से वास्ता है। तर्क और गणित और हिसाब से उसका कोई भी संबंध नहीं है। उसका संबंध तो अपने हृदय को और उसके बीच की जो दूरी है,उसको मिटाने से है। धीरे— धीरे हम इतने लीन हो जायें उसमें कि पाठी और पाठ एक हो जाये; पता ही न चले कि कौन गीता है और कौन गीता का पाठी।

ऐसे भाव से जो चले.. .यह की का भाव है। यह समर्पण की धारा है। इसे खयाल में ले लें।

नमन से हम चलें तो शिव के सूत्र समझ में आ सकेंगे। उन्हें तुम अपने में उतरने देना, और जल्दी निर्णय की मत करना कि वे ठीक हैं कि गलत हैं। क्योंकि सूत्रों के संबंध में एक बात खयाल में रख लेना— तुम्हारे ऊपर निर्भर नहीं है तय करना कि ये ठीक है या गलत हैं। तुम निर्णय कर भी कैसे पाओगे? जो अंधेरे में खड़ा है, वह प्रकाश के संबंध में क्या निर्णय करेगा! और जिसने कभी स्वास्थ्य नहीं जाना, जो रोग की शय्या से ही बंधा रहा, उसे स्वास्थ्य की परिभाषा कैसे समझ में आयेगी! जिसने कभी प्रेम की स्फुरणा नहीं पहचानी और जो जीवनभर घृणा, ईर्ष्या और द्वेष में जिया है, वह प्रेम की कविता तो पढ़ सकता है, क्योंकि शब्द उसकी समझ में आ जायेंगे; लेकिन शब्दों में जो छिपा है, अंतरगुंफित है, वह द्वार तो उसके लिए बंद ही रहेगा। इसलिए तुम निर्णय मत करना कि क्या ठीक, क्या गलत।

तुम सिर्फ पीना, —समझना भी नहीं कहता हूं— तुम सिर्फ पीना, तुम सिर्फ स्वाद में उतरना। और, अगर वह स्वाद तुम्हारे भीतर रहस्य के लोक खोलने लगे, और वह स्वाद अगर तुम्हारे भीतर नई सुगंध को जन्म दे दे और तुम पाओ की क्षणभर को ही सही, तुम्हारे दुर्गंध का व्यक्तित्व विलीन हो गया, और तुम्हारे भीतर कोई फूल खिला, और तुम सुगंधित हुए, क्षणभर को ही तुम पाओ कि तुम अंधकार नहीं हो, कोई दिया जल गया, एक झलक मिली; जैसे अंधेरे में बिजली कौंध गई हो, उसी से— उसी से समझ आयेगी, तुम्हारे समझने से नहीं। तुम्हारे अनुभव की झलक से समझ आयेगी। इसलिए तुम विनम्र रहना।

दूसरी बात— सूत्र का अर्थ होता है; संक्षिप्त से संक्षिप्त, सारभूत, टेलीग्राफिक। वहां एक—एक शब्द अत्यंत घना है; विस्तार नहीं होता सूत्र में, घनत्व होता है। लंबा नहीं होता सूत्र, बड़ा छोटा होता है; जैसे छोटा—सा बीज होता है। उसमें सारा वृक्ष समाया होता है। जैसा बीज है, ऐसा सूत्र है। बीज में तुम वृक्ष देख भी नहीं सकते। देखना भी चाहोगे तो बीज में तुम वृक्ष को पाओगे नहीं, क्योंकि उसके लिए बड़ी गहरी आंखें चाहिए—जो बीज में वृक्ष को देख लें, जो वर्तमान में भविष्य को देख लें, जो आज कल को देख लें, जो दृश्य से अदृश्य को खोज लें— बड़ी पैनी आंखें चाहिए। वैसी पैनी आंखें तुम्हारे पास अभी नहीं हैं। अभी तो तुम्हें बीज बीज ही दिखाई पड़ेगा। वृक्ष को देखना हो तो बीज को तुम्हें बोना पड़ेगा, और कोई रास्ता तुम्हारे पास देखने का नहीं है। और जो बीज टूटेगा जमीन में और वृक्ष अकुंरित होगा, तभी तुम पहचान पाओगे।

ये सूत्र बीज है। इन्हें तुम्हें अपने हृदय में बोना होगा। तुम अभी निर्णय मत करना। क्योंकि अभी तुमने अगर बीज पर निर्णय लिया तो तुम इसे फेंक ही दोगे; कचरा—कुड़ा मालूम पड़ेगा।

बीज में, कंकड़—पत्थर में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। कभी—कभी कंकड़—पत्थर ज्यादा चमकीले, रंगीन, खूबसूरत, कीमती होते है। लेकिन बीज और कीमती—से—कीमती कोहिनूर में भी एक फर्क है कि तुम कोहिनूर को बो दो, तो उसमें से कुछ पैदा न होगा। वह कीमती कितना ही हो, वह मुर्दा है। उसका मूल्य नासमझ कितना ही समझते हों, लेकिन जीवन उसमें नहीं है। वह लाश है। और बीज कुरूप भी दिखाई पड़ता हो, कोई उसकी कीमत भी न हो, लेकिन उसमें जीवन छिपा है। तुम उसे बो दो,उसमें से विराट वृक्ष पैदा होगा, और एक बीज से करोड़ों बीज लग जायेंगे। एक छोटा—सा बीज इस सारे विश्व को पैदा कर सकता है; क्योंकि एक बीज से करोड़ों बीज पैदा होते हैं। फिर करोड़ों बीज से, हर बीज से करोड़ बीज पैदा होते है। एक छोटे—से बीज में सारे विश्व का ब्रह्मांड समा सकता है।

सूत्र बीज है। उसके साथ जल्दी नहीं की जा सकती। उसको बोओगे हृदय में और अकुंरित होगा, फूल लगेंगे— तभी तुम जान पाओगे; तभी निर्णय लिया जा सकता है।

तीसरी बात— इसके पहले कि हम शुरू करें— धर्म महान क्रांति है। धर्म के नाम से तुमने जो समझा हुआ है, उसका धर्म से न के बराबर संबंध है। इसलिए शिव के सूत्र तुम्हें चौकायेंगे भी। तुम भयभीत भी होओगे, डरोगे भी; क्योंकि तुम्हारे धर्म डगमगायेंगे। तुम्हारे मंदिर, तुम्हारी मस्जिद, तुम्हारे गिरजे— अगर ये सूत्र तुमने समझे तो— गिर जायेंगे! तुम उन्हें बचाने की कोशिश में मत लगना; क्योंकि वे बचे भी रहें, तो भी उनसे तुम्हें कुछ भी मिला नहीं। तुम उनमें जी ही रहे हो, और तुम मुर्दा हो। मंदिर काफी सजे है, लेकिन तुम्हारे जीवन में कोई भी खुशी की किरण नहीं है। मंदिर में काफी रोशनी है; उससे तुम्हारे जीवन का अंधकार नहीं मिटता। उससे भयभीत मत होना; क्योंकि ये सूत्र तुम्हें कठिनाई में तो डालेंगे ही। क्योंकि शिव कोई पुरोहित नहीं है। पुरोहित की भाषा तुम्हें हमेशा संतोषदायी मालूम पड़ती है; क्योंकि पुरोहित को तुम्हारा शोषण करना है। पुरोहित तुम्हें बदलने के लिए उत्सुक नहीं है। तुम जैसे हो ऐसे ही रहो, इसी में उसका लाभ है। तुम जैसे हो— रुग्ण, बीमार— ऐसे ही रहो, इसी में उसका व्यवसाय है।

मैंने सुना है : एक डाक्टर ने अपने लड़के को पढ़ाया। पढ़—लिखकर घर आया। पिता ने कभी छुट्टी भी न ली थी। तो उसने कहा कि अब तू मेरी कारबार को सम्हाल और मैं तीन महीने विश्राम कर लूं। जीवनभर सिर्फ मैंने कमाया है और कभी विश्राम नहीं लिया। वह विश्व की यात्रा पर निकल गया। तीन महीने बाद लौटा, तो उसने अपने लड़के से पूछा कि सब ठीक चल रहा है? तो उसके लड़के ने कहा कि बिलकुल ठीक चल रहा है। आप हैरान होंगे कि जिन मरीजों को आप जीवनभर में ठीक न कर पाये, उनको मैंने तीन महीने में ठीक कर दिया है। पिता ने सिर ठोंक लिया। उसने कहा, 'मूर्ख, वही हमारा व्यवसाय था। क्या मैं उनको ठीक नहीं कर सकता था? तेरी पढ़ाई कहां से आती थी? उन्हीं पर आधार था। और भी बच्चे पढ़—लिख लेते। तूने सब खराब कर दिया।’ पुरोहित, तुम जैसे हो— रुग्ण, बीमार— वह तुम्हें वैसा ही चाहता है। उस पर ही उसका व्यवसाय है। शिव कोई पुरोहित नहीं है। शिव तीर्थंकर है। शिव अवतार हैं। शिव क्रांतिद्रष्टा है, पैगंबर है। वे जो भी कहेंगे, वह आग है। अगर तुम जलने को तैयार हो, तो ही उनके पास आना; अगर तुम मिटने को तैयार हो, तो ही उनके निमंत्रण को स्वीकार करना। क्योंकि तुम मिटोगे तो ही नये का जन्म होगा। तुम्हारी राख पर ही नये जीवन की शुरुआत है। इन बातों को खयाल में रखकर एक—एक सूत्र को समझने की कोशिश करें।

पहला सूत्र है :

चैतन्यमात्मा— चैतन्य आत्मा है।

चैतन्य हम सभी हैं, लेकिन आत्मा का हमें कोई पता नहीं चलता। अगर चैतन्य ही आआ है तो हम सभी को पता चल जाना चाहिए। हम सब चैतन्य है। लेकिन, चैतन्य आत्मा है, इसका क्या अर्थ होगा?

पहला अर्थ : इस जगत में, सिर्फ चैतन्य ही तुम्हारा अपना है। आत्मा का अर्थ होता है. अपना; शेष सब पराया है। शेष कितना ही अपना लगे, पराया है। मित्र हों, प्रियजन हों, परिवार के लोग हों, धन हो, यश, पद—प्रतिष्ठा हो, बड़ा साम्राज्य हो— वह सब जिसे तुम कहते हो मेरा— वहां धोखा है। क्योंकि वह सभी मृत्यु तुमसे छीन लेगी। मृत्यु कसौटी है— कौन अपना है,कौन पराया है। मृत्यु जिससे तुम्हें अलग कर दे, वह पराया था। और मृत्यु तुम्हें जिससे अलग न कर पाये, वह अपना था।

आत्मा का अर्थ है : जो अपना है। लेकिन जैसे ही हम सोचते है अपना, वैसे ही दूसरा प्रवेश कर जाता है। अपने का मतलब ही होता है कोई दूसरा, जो अपना है। तुम्हें यह खयाल ही नहीं आता कि तुम्हारे अतिरिक्त, तुम्हारा अपना कोई भी नहीं है; हो भी नहीं सकता। और जितनी देर तुम भटके रहोगे इस धारा में कि कोई दूसरा अपना है, उतने दिन व्यर्थ गये; उतना जीवन अकारण बीता। उतना समय तुमने सपने देखे। उतने समय में तुम जाग सकते थे, मोक्ष तुम्हारा होता; तुमने कचरा इकट्ठा किया।

सिर्फ तुम ही तुम्हारे हो।

यह पहला सूत्र है : मेरे अतिरिक्त मेरा कोई भी नहीं है। यह बड़ा क्रांतिकारी सूत्र है, बड़ा समाज—विरोधी है। क्योंकि समाज जीता इसी आधार पर है कि दूसरे अपने है; जाति के लोग अपने है; देश के लोग अपने है— मेरा देश, मेरी जाति, मेरा धर्म, मेरा परिवार; मेरे का सारा खेल है। समाज जीता है 'मेरी' की धारणा पर। इसलिए धर्म समाज—विरोधी तत्व है। धर्म समाज से छुटकारा है, दूसरे से छुटकारा है। और धर्म कहता है कि तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा और कोई भी नहीं है।

ऊपर से देखें तो यह बडा स्वार्थी वचन मालूम पड़ेगा) क्योंकि यह तो यह बात हुई कि हम ही अपने है, तो तत्‍क्षण हमें लगता है कि यह तो स्वार्थ की बात है। यह स्वार्थ की बात नहीं है। अगर यह तुम्हें खयाल में आ जाये, तो ही तुम्हारे जीवन में परार्थ और परमार्थ पैदा होगा। र्क्यााक जो अभी आत्मा के भाव से ही नहीं भरा है, उसके जीवन में कोई परार्थ और कोई परमार्थ नहीं हो सकता।

तुम कहते हो दूसरों को मेरा। लेकिन, 'मेरा' कहकर तुम करते क्या हो? मेरा कहकर तुम उन्हें चूसते हो।’मेरा' तुम्हारा शोषण का हिस्सा है, फैलाव है। जिसको भी तुम 'मेरा' कहते हो, उसको तुम गुलाम बनाते हो। तुम उसे अपने परिग्रह में परिवर्तित कर देते हो। मेरी पत्नी, मेरा पति, मेरा बेटा, मेरा पिता— तुम करते क्या हो? इस मेरे के पीछे—इस 'मेरे' के परदे के पीछे— तुम्हारे संबंध का मूल आधार क्या है? तुम चूसते हो, तुम शोषण करते हो, तुम दूसरे का उपयोग करते हो। इस दूसरे के उपयोग को तुम सोचते हो परार्थ, तो तुम भ्रांति में हो।

एक सम्राट बूढ़ा हुआ। उसके तीन बेटे थे और वह बड़ी चिंता में था कि किसको राज्य दें। तीनों ही योग्य और कुशल थे,तीनों ही समान गुणधर्मा थे। इसलिए बड़ी कठिनाई हुई। उसने एक दिन तीनों बेटों को बुलाया और कहा कि पिछले पूरे वर्ष में तुमने जो भी कृत्य महानतम किया हो— एक कृत्य जो पूरे वर्ष में महानतम हो— वह तुम मुझे कहो।

बडे बेटे ने कहा कि गांव का जो सबसे बड़ा धनपति है, वह तीर्थ—यात्रा पर जा रहा था; उसने करोड़ों रुपये के हीरे—जवाहरात बिना गिने, बिना किसी हिसाब—किताब के, बिना किसी दस्तखत लिये मेरे पास रख दिये, और कहा कि जब मैं लौट आऊंगा तीर्थ—यात्रा से, मुझे वापस लौटा देना। चाहता मैं तो पूरे भी पा जा सकता था क्योंकि न कोई लिखा—पढ़ी थी, न कोई गवाह था। इतना भी मैं करता तो थोडे—बहुत बहुमूल्य हीरे मै बचा लेता तो कोई कठिनाई न थी। क्योंकि उस आदमी ने न तो गिने थे, और न कोई संख्या रखी थी। लेकिन मैने सब जैसी—की—जैसी थैली वापस लौटा दी।

पिता ने कहा, 'तुमने भला किया। लेकिन मैं तुमसे पूछता हूं कि अगर तुमने कुछ रख लिये होते, तो तुम्हें पश्रात्ताप,ग्लानि, अपराध का भाव पकड़ता या नहीं?' उस बेटे ने कहा, 'निश्रित पकड़ता।’ तो बाप ने कहा, 'उसमें परोपकार कुछ भी न हुआ। तुम सिर्फ अपने पक्ष्चात्ताप, अपनी पीड़ा से बचने के लिए ही यह किये हो। इसमें परोपकार क्या हुआ? हीरे बचाते तो ग्लानि मन को पीड़ा देती, कांटे की तरह चुभती। उस कांटे से बचने के लिए तुमने हीरे वापस किये। काम तुमने अच्छा किया,ठीक है; लेकिन परोपकार कुछ भी न हुआ। उपकार तुमने अपना ही किया है।’

दूसरा बेटा थोड़ी चिंता में पड़ा। उसने कहा कि मैं राह के किनारे से गुजरता था, और झील में सांझ के वक्त, जब वहां कोई भी न था, एक आदमी डूबने लगा। चाहता तो मैं अपने रास्ते चला जाता, सुना—अनसुना कर देता; लेकिन मैंने तत्‍क्षण छलांग मारी। अपने जीवन को खतरे में डाला और उस आदमी को बाहर निकाला।

बाप ने कहा कि तुमने ठीक किया; लेकिन, अगर तुम चले जाते और उसको न निकालते तो क्या उस आदमी की मृत्यु सदा तुम्हारा पीछा न करती? तुम अनसुनी कर देते ऊपर से, लेकिन भीतर तो तुम सुन चुके थे उसकी चीत्कार— आवाज कि बचाओ! क्या सदा—सदा के लिए उसका प्रेत तुम्हारा पीछा न करता में उसी भय से तुमने छलांग लगाई, अपनी जान को खतरे में डाला; लेकिन परोपकार तुमने कुछ किया हो, इस भ्रांति में पड़ने का कोई कारण नहीं है।

तीसरे बेटे ने कहा कि मैं गुजरता था जंगल से। और एक पहाड़ की कगार पर मैने एक आदमी को सोया हुआ देखा, जो कि नींद में अगर एक भी करवट ले, तो सदा के लिए समाप्त हो जायेगा; क्योंकि दूसरी तरफ महान खड्ड था। मैं उस आदमी के पास पहुंचा और जब मैंने देखा कि वह कौन है, तो वह मेरा जानी दुश्मन था। मैं चुपचाप अपने रास्ते से जा सकता था। या,अगर मैं अपने घोड़े पर सवार, उसके पास से भी गुजरता, तो मेरे बिना कुछ किये, शायद सिर्फ मेरे गुजरने के कारण, वह करवट लेता और खड्डे में गिर जाता। लेकिन मैं आहिस्ते से जमीन पर सरकता हुआ उसके पास पहुंचा कि कहीं मेरी आहट से वह गिर न जाए। और यह भी मैं जानता था कि वह आदमी बुरा है। मेरे बचाने पर भी वह मुझे गालियां ही देगा। उसे मैंने हिलाया, आहिस्ते से जगाया। और वह आदमी मेरे खिलाफ गांव में बोलता फिर रहा है। क्योंकि वह आदमी कहता है, 'मैं मरने ही वहां गया था। इस आदमी ने वहां भी मेरा पीछा किया। यह जीने तो देता ही नहीं, इसने मरने भी न दिया।’

पिता ने कहा, 'तुम दो से बेहतर हो; लेकिन परोपकार यह भी नहीं है। क्यों? क्योंकि तुम अहंकार से फूले नहीं समा रहे हो कि तुमने कुछ बड़ा कार्य कर दिया। बोलते हो तो तुम्हारी आंखों की चमक और हो जाती है। कहते हो तो तुम्हारा सीना फूल जाता है। और जिस कृत्य से अहंकार निर्मित होता हो, वह परोपकार न रहा। बड़े सूक्ष्म मार्ग से तुमने अपने अहंकार को उससे भर लिया। तुम सोच रहे हो कि तुम बड़े धार्मिक हो, परोपकारी हो; तुम इन दो से बेहतर हो। लेकिन, मुझे राज्य के मालिक के लिए किसी चौथे की ही तलाश करनी पड़ेगी।’

जब तुम परोपकार करते हो, तब तुम कर नहीं सकते; क्योंकि जिसे अपना ही पता नहीं, वह परोपकार करेगा कैसे? तुम चाहे सोचते हो कि तुम कर रहे हो— गरीब की सेवा, अस्पताल में बीमार के पैर दबा रहे हो— लेकिन, अगर तुम गौर से खोजोगे,तो तुम कहीं—न—कहीं अपने अहंकार को ही भरता हुआ पाओगे। और, अगर तुम्हारा अहंकार ही सेवा से भरता है, तो सेवा भी शोषण है। आत्मज्ञान के पहले कोई व्यक्ति परोपकारी नहीं हो सकता; क्योंकि स्वयं को जाने बिना इतनी बड़ी क्रांति हो ही नहीं सकती।

मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उससे झाड़ रही थी और कह रही थी कि यह मामला क्या है, एक दफा साफ हो जाना चाहिए। तुम मेरे सभी रिश्तेदारों को नफरत और घृणा क्यों करते हो? नसरुद्दीन ने कहा, 'यह बात गलत है; यह बात तथ्यगत भी नहीं है। और इसका प्रमाण भी है मेरे पास। और प्रमाण यह है कि मैं तुम्हारी सास को अपनी सास से ज्यादा चाहता हूं।’

अहंकार ऐसे रास्ते खोजता है। ऊपर से दिखता है कि तुम परोपकार कर रहे हो; लेकिन, भीतर तुम ही खड़े होते हो। और जितनी सूक्ष्म हो जाती है यात्रा, उतनी ही पकड़ के बाहर हो जाती है। दूसरे तो पकड़ ही नहीं पाते; तुम भी नहीं पकड पाते हो। दूसरे तो धोखे में पड़ते ही हैं; तुम भी अपने दिये, धोखे में, भूल जाते हो, भटक जाते हो। हम सभी ने अपनी—अपनी भूल— भुलैया बना ली हैं। उसमें हमने दूसरों को धोखा देने के लिए ही शुरू किया था सारा उपाय, आयोजन यह हमने कभी सोचा न था कि अपनी बनाई भूल— भूलैयां में हम खुद ही खो जायेंगे। लेकिन हम खो गये हैं।

पहली बात स्मरण रखो. तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा कोई भी नहीं है। जैसे ही यह स्मरण सघन होता है कि चैतन्य ही आत्मा है, चैतन्य ही मैं हूं और सब 'पर' है, पराया है, विजातीय है—वैसे ही तुम्हारे जीवन में क्रांति की पहली किरण प्रविष्ट हो जाती है; वैसे ही तुम्हारे और समाज के बीच एक दरार पड़ जाती है; वैसे ही तुम्हारे और तुम्हारे संबंधों के बीच एक दरार पड़ जाती है। लेकिन आदमी अपनी तरफ देखना ही नहीं चाहता। देखना कठिन भी है; क्योंकि, देखने के पहले जिस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, वह बहुत संघातक है।

एक मारवाड़ी व्यापारी एक फिल्म अभिनेत्री के प्रेम में पड़ गया। वैसे बात अनहोनी थी—मारवाड़ी और व्यापारी! वह प्रेम से सदा दूर ही रहता है। लेकिन अनहोनी भी घटती है। प्रेम में तो पड़ गया; लेकिन व्यापारी का संदेह भरा चित्त! तो उसने एक जासूस नियुक्त कर दिया अभिनेत्री के पीछे कि तू पता लगा, इसका चरित्र तो ठीक है न। इसके पहले कि मैं प्रस्ताव करूं विवाह का, सब बात पकी कागज पर साफ हो जानी चाहिए।

जासूस ने बड़ी खोजबीन की। सात दिन बाद उसने रिपोर्ट भी भेज दी। रिपोर्ट आयी कि इस सी का चरित्र एकदम निर्दोष,निष्कलंक है। ऐसी कोई बात उसके संबंध में नहीं सुनी गई, नहीं जानी गई, जिससे संदेह पैदा हो; सिर्फ एक बात को छोड्कर—पिछले कुछ दिनों से एक संदिग्ध मारवाड़ी के साथ ही देखी जाती है। वह संदिग्ध मारवाड़ी वे स्वयं थे।

आख दूसरे को देखती है। हाथ दूसरे को छूते हैं। मन दूसरे की सोचता है। और तुम सदा अंधेरे में खड़े रह जाते हो। तुम्हारी हालत वही है जो दीये तले अंधेरे की होती है। दीये की रोशनी सब पर पड़ती है, सिर्फ तुम्हें छोड़ देती है। इसलिए तुम भटकते हो उस रोशनी में सब तरफ; सब दिशाओं में यात्रा करते हो, और एक अपरिचित रह जाता है—वही तुम हो।

यह पहला सूत्र है. चैतन्य आत्मा। इस सूत्र को एक गहरे बीज की तरह हृदय में उतर जाने दो। व्यर्थ है सारे जगत की यात्रा, अगर तुम अपने से अपरिचित रह गये। अगर स्वयं को न जान पाये, और सब भी जान लिया तो वह सारा ज्ञान भी इकट्ठे जोड़ में अज्ञान सिद्ध होगा। अगर अपने को न देख पाये, और सारा जगत देख डाला, चांद—तारे छान डाले, तो भी तुम अन्य ही रहोगे। क्योंकि आख तो उसी को मिलती है, जो स्वयं को देख लेता है। ज्ञान तो उसी को मिलता है, जो स्वयं से परिचित हो जाता है। जो चैतन्य के स्वप्रकाश में नहा लेता है, वही पवित्र है। और कोई तीर्थ नहीं है; चैतन्य तीर्थ है। चैतन्य तुम्हारा स्वभाव है। उससे तुम क्षणभर को भी पार नहीं गये हो। लेकिन दीये तले अंधेरा है। तुम उससे दूर जा भी नहीं सकते, चाहो तो भी। लेकिन भ्रम पैदा हो सकता है कि तुम बहुत दूर चले गये हो। तुम सपना देख सकते हो संसार में। लेकिन, सपना सत्य नहीं हो सकता। सत्य तो सिर्फ एक बात है, वह है तुम्हारा चैतन्य स्वभाव।

चैतन्य आत्मा है। तो, पहली तो बात कि मेरा सिवाय चैतन्य के और कोई भी नहीं है। यह भाव तुममें सघन हो जाए,तो संन्यास का जन्म हुआ। क्योंकि मेरे अतिरिक्त भी मेरा कोई हो सकता है, यही भाव संसार है।

इसलिए पहले सूत्र में बड़ी क्रांति है। पहली चिनगारी है—शिव फेंकते हैं तुम्ह