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SHIV SUTRA -07 क्या ध्‍यान चिदात्‍म सरोवर में स्‍नान है?


शिव--सूत्र;-

''ध्यान बीज है। आसनस्थ अर्थात स्व—स्थित व्यक्ति सहज ही चिदात्म सरोवर में निमज्जित हो जाता है और आत्म—निर्माण अर्थात द्विजत्व को प्राप्त करता है। विद्या का अविनाश जन्य का विनाश है।''

जीसस से उनके शिष्यों ने पूछा, 'प्रभु का राज्‍य कैसा है? क्‍या उसका रूप—नाम? तो जीसस ने कहा, ‘प्रभु का राज्‍य एक बीज की भांति है?' जीसस उसी बीज की बात कर रहे हैं, जिसकी हम आज चर्चा करेंगे।

ध्यान है वह बीज। बीज अपने—आप में सार्थक नहीं होता। बीज तो एक साधन है। बीज तो वृक्ष होने की संभावना है। बीज कोई स्थिति नहीं; बीज तो यात्रा है। जैसे बीज वृक्ष तक पहुंचकर सफल हो जाता है; क्योंकि फिर फल लग आते हैं, फूल लग आते हैं—वही सफलता है; ऐसे ही ध्यान का बीज जब वृक्ष बन जाता है और फल—फूल लग जाते हैं—वही परमात्मा है।

बीज की स्थिति को ठीक से समझ लेना जरूरी है। तुम परमात्मा के संबंध में तो निरंतर पूछते हो। वह पूछ—ताछ बेकार है; क्योंकि वृक्ष की क्या पूछ—ताछ करना, जब बीज ही न संभाला हो! और बिना बीज को बोये तुम वृक्ष को देख भी कैसे सकोगे? परमात्मा कोई बाह्य घटना नहीं है कि तुम उसे देख लो; वह तुम्हारी परिष्कृत स्थिति है; वह तुम्हारा ही विकास है। तुम दूसरे के परमात्मा को न देख सकोगे? तुम्हारे भीतर छिपा हुआ जब बीज टूटेगा और वृक्ष बनेगा, तभी तुम उसे देख सकोगे।

बुद्ध, महावीर, कृष्ण, शिव—वे लाख उपाय करें, तो भी तुम्हें परमात्मा को दिखा नहीं सकते, क्योंकि तुम्हारा परमात्‍मा तुम्हारे भीतर छिपा है। और, अभी बीज है, वृक्ष नहीं बना; बीज में कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। जब बीज फूटेगा, विकसित होगा,तुम प्रकट होओगे, खिलोगे, तुम्हारा दीया जलेगा—तभी तुम जानोगे कि परमात्मा है। इसलिए नास्तिक को हराना बहुत मुश्किल है। वस्तुत: नास्तिक को कोई कभी नहीं हरा पाया। इसका कारण यह नहीं कि नास्तिक सही है। इसका कारण यह है कि वह गलत ही प्रश्र पूछ रहा है। जो भी जवाब दिए जाएंगे, वे व्यर्थ होंगे। वह पूछता है, ' ईश्वर को दिखाओ; कहां है ईश्वर?' ईश्वर तुम में छिपा है। ईश्वर पूछनेवाले में छिपा 'है। और दूसरे का ईश्वर नहीं दिखाया जा सकता; वह आंतरिक घटना है। जब तुम्हारा बीज टूटेगा, तभी तुम जान पाओगे।

अभी तुम बीज की भांति हो। लेकिन तुम इसे समझे नहीं; तुम बाहर खोज रहे हो। और जब तक तुम बाहर खोजते रहोगे, तुम्हारा बीज भीतर ही पड़ा रहेगा, अंकुरित न होगा; क्योंकि बीज के लिए वैसे ही पानी चाहिए, भूमि चाहिए, प्रकाश चाहिए, प्रेम चाहिए, जैसे कि छोटे बच्चों को। जब तुम भीतर आंख मोड़ोगे, जब तुम्हारा ध्यान भीतर बरसेगा, और तुम्हारी जीवन—ऊर्जा भीतर की तरफ मुड़ेगी, तभी बीज को प्राण मिलेंगे; तभी बीज जीवंत होगा, अंकुरित होगा। ध्यान बीज है।

मेरे पास लोग आते हैं। वे पूछते हैं, अशांति है; कैसे शांत हो जाएं?

एक दिन सुबह—सुबह मुल्ला नसरुद्दीन आया। उसे देखकर ही मैं कुछ कहने को था, लेकिन इसके पहले में कुछ कहूं उसके पहले ही उसने सवाल किया। उसने कहा कि अब मेरी सहायता आपको करनी ही पड़ेगी। मैंने पूछा, 'क्या है समस्या?'उसने कहा, 'बड़ी जटिल समस्या है। दिन में कोई दस—बीस—पच्चीस बार, कभी और भी ज्यादा, खान करने की बड़ी तीव्र आकांक्षा पैदा होती है। मैं पागल हुआ जा रहा हूं। बस, यही धुन सवार रहती है। कुछ मेरी सहायता करो।’ तो मैंने पूछा, 'स्नान तुमने किया कब से है?' उसने कहा, ' जब तक मुझे याद आता है, मैं सान की झंझट में कभी पड़ा ही नहीं।’

स्‍नान न करोगे और स्नान करने की आकांक्षा पकड़ेगी, तो समस्या स्नान नहीं है, समस्या तुम हो। तुम अशांत हो; तुम्हें पता नहीं कि तुमने ध्यान कभी नहीं किया। तुम उस झंझट में कभी पड़े ही नहीं। और अशांति तुम मिटाना चाहते हो; और ध्यान के सान के बिना वह कभी नहीं मिटेगी; वह तलफ है।

ध्यान भीतर का सान है। जैसे शरीर ताजा हो जाता है सान के बाद, धूल, कूड़ा—करकट शरीर से बह जाता है, स्वच्छता आ जाती है—ऐसे ही ध्यान भीतर का, अंतरात्मा का सान है। और, भीतर जब सब ताजा हो जाता है, तब कैसी अशांति, तब कैसा दुख, कैसी चिंता! तब तुम पुलकित होते हो, प्रफुल्लित होते हो! तुम्हारे पैरों में अर बंध जाते हैं! तुम्हारा जीवन एक नृत्य हो जाता है! उसके पहले तुम उदास हो, थके हो, परेशान हो। और तुम सोचते हो कि तुम्हारी अशांति के कारण बाहर हैं तो तुम भांति में हो।

तुम्हारी अशांति का एक ही कारण है कि ध्यान के बीज को तुमने वृक्ष नहीं बनाया। तुम हजार उपाय करोगे— धन मिल जाए तो अशांति ठीक हो जाएगी; पुत्र हो जाए, यश मिल जाए, कीर्ति मिल जाए, अच्छा स्वास्थ्य हो, शरीर हो, लम्बी उम्र हो,तो सब कुछ हो जाएगा, लेकिन अशांति न मिटेगी। वस्तुत: तो जितनी ये चीजें तुम्हें मिल जाएंगी, उतना ही तुम पाओगे कि अशांति और भी सघन होकर दिखाई पड़ने लगी।

गरीब आदमी कम अशांत होता है। अमीर ज्यादा अशांत हो जाता है। अमीरी से अशांति क्यों बढ जाती है? —बढती नहीं। होता तो गरीब भी अशांत हैं; लेकिन शरीर की ही भूख, शरीर की क्षुधा को निपटाने में इतनी ऊर्जा चली जाती है कि अपने भीतर की अशांति को देखने योग्य शक्ति भी नहीं बचती। अमीर की बाहर की जरूरतें पूरी हो जाती हैं, तो सारी शक्ति बचती है। और भीतर की जरूरत खयाल में आ गई। गरीब भी उतना ही अशांत है, लेकिन अशांति को जानने की सुविधा नहीं है। अमीर को अशांति कांटे की तरह चुभने लगती है, वही वही दिखाई पड़ती है।

तुम जिस दिन सब जरूरतें पूरी कर लोगे, उस दिन तुम अचानक पाओगे कि असली जरूरत एक थी—वह ध्यान है; बाकी सब जरूरतें शरीर की थी, तुम्हारी नहीं।

यह सूत्र कहता है. ध्यान बीज है। तुम्हारी महत यात्रा में, जीवन की खोज में, सत्य के मंदिर तक पहुंचने में— ध्यान बीज है। ध्यान क्या है? —जिसका इतना मूल्य है; जो कि खिल जाएगा तो तुम परमात्मा हो जाओगे; जो सड़ जाएगा तो तुम नारकीय जीवन व्यतीत करोगे। ध्यान क्या है? ध्यान है निर्विचार चैतन्य की अवस्था, जहां होश तो पूरा हो और विचार बिलकुल न हों;तुम तो रहो, लेकिन मन न बचे। मन की मृत्यु ध्यान है।

अभी तुम तो हो ही नहीं, मन—ही—मन है। इससे उलटा हो जाए, तुम—ही—तुम बचो और मन बिलकुल न बचे। अभी सारी ऊर्जा मन पीये जा रहा है। अभी जितनी भी तुम्हारी जीवन की शक्ति है, वह मन चूस लेता है।

तुमने अमरबेल देखी है? —वृक्षों को पकड़ लेती है। वह वृक्ष सूखने लगता है और बेल जीने लगती है और बेल फैलने लगती है। और बेल बड़ी मजेदार है! वह ठीक मन जैसी है। उसमें कोई जड़ें भी नहीं हैं। उसकी कोई जड़ नहीं; क्योंकि उसे जड की जरूरत ही नहीं है; वह दूसरे के शोषण से जीती है। वृक्ष को सुखाने लगती है, खुद जीने लगती है। और ठीक, हिन्दुओं ने उसे अच्छा नाम दिया—अमरबेल! वह मरती नहीं है। जब तक भी उसे शोषण मिलता रहेगा, वह अनंत काल तक जी सकती है।

ऐसा ही तुम्हारा मन है— वह अमरबेल है। वह मरता नहीं; वह अनंत काल तक जी सकता है; जन्मों—जन्मों तक तुम्हारा पीछा करेगा। और मजा यह है कि उसकी कोई जड़ नहीं, कोई बीज नहीं। उसका अस्तित्व बे—जड़ है। मर जाना चाहिए उसे इसी वक्त, लेकिन वह मरता नहीं; वह शोषण से जीता है।

और, तुम्हारा मन तुम्हें चारों तरफ से घेरे हुए है। तुम तो बिलकुल दब ही गये हो अमरबेल में। सारी जीवन—ऊर्जा मन ले लेता है, कुछ बचता नहीं। तुम दीन—दरिद्र, तुम सूखे—सूखे जीते हो। मन तुम्हें उतना ही जीने देता है, जितना जरूरी है मन के लिए। बेल भी वृक्ष को पूरा नहीं मारती; क्योंकि पूरा मारेगी तो खुद मर जाएगी। उतना बचाकर चलती है, जितना जरूरी है। मालिक भी गुलाम को पूरा नहीं मार डालता; उतना भोजन देता है, जितना गुलाम के जिंदा रहने के लिए जरूरी हो।

तुम्हारा मन तुम्हें बस उतना ही देता है, जितना तुम बने रहो; अन्यथा निन्यानबे प्रतिशत पी लेता है। एक प्रतिशत तुम हो, निन्यानबे प्रतिशत मन है—यह गैर— ध्यान की अवस्था है। निन्यानबे प्रतिशत तुम हो जाओगे, एक प्रतिशत मन होगा—यह ध्यान की अवस्था है। और अगर सौ प्रतिशत तुम हो गये और मन शून्य हो गया—यह समाधि की अवस्था है; तुम मुक्त हो गये; बीज पूरा वृक्ष हो गया; अब कुछ पाने को न बचा; जो भी पाया जा सकता था, पा लिया; सब संभावनाएं सत्य हो गयीं, जो भी छिपा था, वह प्रगट हो गया। तब तुम्हारी सुगंध से अस्तित्व भर जाता है। तब तुम्हारा नर्तन दूर—दूर कोनों तक, चांद—तारों तक सुना जाता है। तब तुम ही पुलकित नहीं होते; तुम्हारे साथ पूरे विश्व की प्राण—धारा पुलकित होती है। तब अस्तित्व में एक उत्सव आ जाता है। जब भी कोई एक बुद्ध पैदा होता है, सारा अस्तित्व उत्सव से भर जाता है; क्योंकि सारा अस्तित्व तुम्हारे बीज को वृक्ष बनाने के लिए आतुर है।

ध्यान का अर्थ है : जहां मन न के बराबर रह जाए। समाधि का अर्थ है. जहां मन बिलकुल शून्य हो जाए, तुम—ही—तुम बचो।

और, शिव का यह सूत्र कहता है : ध्यान बीज है। इसलिए ध्यान से शुरू करना पड़ेगा।

अभी तो होश—बेहोश, जागते—सोते, मन ही तुम्हें पकड़े हुए है। रात सपने चलते हैं, दिन विचार चलते हैं। उठते—बैठते मन का ऊहापोह चलता रहता है। और बड़े आश्रर्य की बात तो यह है कि सार उसमें कुछ भी नहीं। कितना ही यह ऊहापोह चले, मन से कुछ मिलता नहीं। क्या तुमने पाया है? इतने दिन सोचकर कहां तुम पहुंचे हो? इसे भी तो सोचो। इस तरफ भी ध्यान दो कि इतनी यात्रा करने के बाद कौन—सी मंजिल मिली है। सोच—सोचकर क्या पाया?

एक दार्शनिक था—बडा दार्शनिक—इमानुएल कांट। सांझ घर की तरफ आ रहा था। एक छोटे—से लड़के ने उसे रास्ते पर रोका और कहा, 'अंकल, मै आपके घर गया था। कल हम पिकनिक पर जा रहे हैं। और, आपके कैमरे को मांगने गया था। आप तो घूमने गये थे, नौकर मिला। उसने बिलकुल मना कर दिया। क्या यह उचित है कि नौकर मना कर दे?'

बच्चा क्रोध में था। कांट ने कहा, 'बिलकुल अनुचित है। मेरे रहते नौकर मना करनेवाला कौन होता है! आओ मेरे साथ।’

बहुत प्रसन्न हुआ पहुंचे घर। ने बड़ी डाट—डपट की नौकर पर और वह बच्चा पुलकित होता रहा बच्चा। कांट। कहा कि मेरे रहते तू मना करनेवाला कौन होता है। उस बच्चे से भी कहा कि तू बोल, मेरे रहते नौकर मना करनेवाला कौन होता है। उस बच्चे ने कहा, 'बिलकुल, नहीं, अंकल। और इस आदमी ने बड़ी बेहूदगी से इनकार किया।

और, तब इमानुएल कांट ने उस बच्चे से कहा कि अब तुझे मैं बताता हूं कि कैमरा मेरे पास नहीं है। यह सारी खुशी बच्चे की, यह सारी पुलक, यह मिलने की आशा, सब शोरगुल और आखिर में पता चलता है कि कैमरा उसके पास नहीं है!

यह तुम्हारे मन की दशा है! जीवन— भर दौड़ोगे, चिल्लाओगे, आशा बांधोगे, श्रम करोगे और आखिर में मन कहेगा कि जिसकी तुम तलाश कर रहे हो, वह मेरे पास नहीं है। मन ने सदा यही कहा है। उसके पास है भी नहीं। इसलिए मन सदा आशा बंधाता है और मन सदा कहता है— 'आज तो नहीं, कल; कल निश्रित।’ मन से ज्यादा आश्वासन देनेवाला और कोई भी नहीं। और तुम छू हो! क्योंकि मन के पास होता तो आज ही दे देता। वह कल की कह रह है और तुम मान लेते हो। और तुम कितनी बार मान चुके हो। और हर बार कल आता है और मन फिर कल पर टाल देता है। लेकिन यह तुम्हारी बेहोश आदत हो गयी है। तुम कल की बात सुनने के आदी हो गये हो। यह आदत इतनी गहरी हो गयी है कि इस पर पुन: विचार नहीं करते। बेहोशी में भी, रात के सपने में भी, मन तुम्हें कल पर टालता रहता है।

मुल्ला नसरुद्दीन बीमार था। पत्नी ने खबर की तो मैं उसके घर गया। भारी बेहोशी में था। बुखार तेज था। लगता था एक सौ पांच, एक सौ छह डिग्री बुखार होगा। बिलकुल बेहोश पड़ा है। आग से जल रहा है। मैंने पूछा कि कब से यह दशा है। पत्नी ने कहा कि अभी—अभी कोई घड़ी— भर...। मुल्ला नसरुद्दीन के मुंह में, मैने कहा, थरमामीटर लगाकर देखो। मुंह में थरमामीटर लगाया। उस बेहोश अवस्था में भी उसने क्या कहा! उसने कहा, 'माचिस प्लीज! ' चेन स्मोकर है। एक सिगरेट से दूसरी जलाकर सदा पीता रहा। एक सौ पांच डिग्री बुखार में भी और सब तो याद नहीं, कोई सुध नहीं है, लेकिन मुंह में थरमामीटर डालते ही उसे याद सिगरेट की ही आती है—माचिस प्लीज!

तुम मर भी रहे होओगे, तो भी तुम्हारी दशा यह होगी—माचिस प्लीज! तुम्हारा मन पुरानी आदत के अनुसार अपनी बेहोशी में भी ताने—बाने बुनता रहता है। मरते क्षण भी तुम मन से ही भरे रहोगे। तुम पूजा करो, प्रार्थना करो, तुम मंदिर जाओ,तीर्थयात्रा करो—मन तुम्हारे साथ है। और, जहां भी मन तुम्हारे साथ है, वहा धर्म से तुम्हारा संबंध न जुड़ेगा

एक मुसलमान फकीर हुआ—हाजी मोहम्मद। साधु पुरुष था। एक रात उसने सपना देखा कि वह मर गया है और एक चौराहे पर खड़ा है, जहां से एक रास्ता स्वर्ग को जाता है, एक नरक को; एक रास्ता पृथ्वी को जाता है, एक मोक्ष को। चौराहे पर एक देवदूत खड़ा है—एक फरिश्ता, और वह हर आदमी को उसके कर्मों के अनुसार रास्ते पर भेज रहा है।

हाजी मोहम्मद तो जरा भी घबडाया नहीं; जीवनभर साधु था। हर दिन की नमाज पांच बार पूरी पढ़ी थी। साठ बार हज की, इसलिए हाजी मोहम्मद उसका नाम हो गया। अच्छूकर जाकर द्वार पर खड़ा हो गया देवदूत के सामने। देवदूत ने कहा, 'हाजी मोहम्मद! ' देवदूत ने इशारा किया, 'नरक की तरफ यह रास्ता है।’ हाजी मोहम्मद ने कहा, ' आप समझे नहीं शायद। कुछ भूल—चूक हो रही है। साठ बार हज किये हैं।’

देवदूत ने कहा, 'वह व्यर्थ गयी; क्योंकि जब भी कोई तुमसे पूछता तो तुम कहते, हाजी मोहम्मद! तुमने उसका काफी फायदा जमीन पर ले लिया। तुम बड़े अकड़ गये उसके कारण। कुछ और किया है?'

हाजी मोहम्मद के पैर थोडे डगमगा गये। जब साठ बार की हज व्यर्थ हो गयी, तो अब आशा टूटने लगी। उसने कहा, 'ही, रोज पांच बार की नमाज पूरी—पूरी पढ़ता था।’ उस देवदूत ने कहा, 'वह भी व्यर्थ गयी; क्योंकि जब कोई देखने वाला होता था तो तुम जरा थोड़ी देर तक नमाज पढ़ते थे। जब कोई भी न होता तो तुम जल्दी खत्म कर देते थे। तुम्हारी नजर परमात्मा पर नहीं थी; देखने वालों पर थी। एक बार तुम्हारे घर कुछ लोग बाहर से आये हुए थे, तो तुम बड़ी देर तक नमाज पढ़ते रहे। वह नमाज झूठी थी। ध्यान में परमात्मा न था, वे लोग थे। लोग देख रहे है तो जरा ज्यादा नमाज, ताकि पता चल जाये कि मैं धार्मिक आदमी हूं—हाजी मोहम्मद; वह बेकार गयी; कुछ और किया है?' अब तो हाजी मोहम्मद घबड़ा गया और घबड़ाहट में उसकी नींद टूट गयी। सपने के साथ जिंदगी बदल गयी। उस दिन से उसने अपने नाम के साथ हाजी बोलना बंद कर दिया। नमाज छिपकर पढ़ने लगा; किसी को पता भी न हो। गांव में खबर भी पहुंच गयी कि हाजी मोहम्मद अब धार्मिक नहीं रहा। कहते हैं कि नमाज तक बंद कर दी है! बुढ़ापे में सठिया गया है। लेकिन उसने इसका कोई खंडन न किया। वह चोरी छिपे नमाज पढ़ता। वह नमाज सार्थक होने लगी। कहते है, मरकर हाजी मोहम्मद स्वर्ग गया।

तुम्हारा मन प्रार्थना भी करेगा, तो भी प्रार्थना न होने देगा। तुम्हारा मन प्रार्थना से भी अहंकार को भरने लगेगा। अपने ध्यान की चर्चा मत करना, उसे छिपाना। उसे संभालना, जैसे कोई बहुमूल्य हीरा मिल गया हो और उसे तुम छिपाते हो, उछालते नहीं फिरते हो। संपदा को तुम गड़ा देते हो—ऐसे ही तुम ध्यान को गडा देना। उसकी तुम चर्चा मत करना। उससे तुम अहंकार मत भरने लगना। अन्यथा मन की बेल वहां भी पहुंच गयी और वह चूस लेगी। और जहां मन पहुंच जाता है, वहां धर्म नहीं है। और जहां मन नहीं पहुंचता, वहां धर्म है। मन बाहतृखा है। उसका ध्यान दूसरे पर होता है, अपने पर नहीं होता। ध्यान अंतर्मुखता है।

ध्यान का अर्थ है—अपने पर ध्यान है, दूसरे पर नहीं। मन का अर्थ है—दूसरे पर ध्यान। ध्यान करो, तुम अगर दो पैसे गरीब को देते भी हो, तो तुम देखते हो कि लोग देखते है या नहीं। तुम मंदिर बनाते हो, तो बड़ा पत्थर लगाते हो अपने नाम का; तुम दान करते हो तो अखबार में खबर छपवाते हो। सब व्यर्थ हो जाता है। हाजी मोहम्मद होकर तुम पहुंच न पाओगे। तुमने कितने उपवास किये, कितने व्रत किये, इस सब की फेहरिश्त संभाल कर मत रखना। परमात्मा की दुनिया दुकानदार की दुनिया नहीं है; वहाँ हिसाब काम नहीं आता। वहां तुम हिसाब लेकर गये कि वहां तुम हारोगे। हिसाब संसार में काम आता है।'

लेकिन तुम देखो। जैन मुनि हर वर्ष छपवाते हैं कि इस बार उन्होंने कितने उपवास किये; इस वर्षाकाल में कितने दिन भूखे रहे; कितने व्रत, नियम लिये। वे हिसाब रख रहे हैं। ये दुकानदार ही हैं। जो मंदिरों में बैठ गए हैं। इनकी बद्धि का गणित से छुटकारा नहीं हुआ। और, इनका ध्यान, इनका उपवास—सब व्यर्थ जा रहा है। ये हाजी मोहम्मद हुए जा रहे हैं।

नहीं तुम बाहर की चिंता मत करना कि दूसरे लोग तुम्हें धार्मिक समझते हैं या नहीं। दूसरे लोग क्या कहते हैं, यह बात विचारणीय ही नहीं है; क्योंकि दूसरे लोगों से तुम्हारे मन का संबंध है, तुम्हारा जरा भी नहीं। जिस दिन मन समाप्त हो जाएगा,उस दिन तुम असंग हो जाओगे। मन ही दूसरों से तुम्हें जोड़े हुए है। और जब तक मन तुम्हें संसार से जोड़े हुये है, तब तक तुम परमात्‍मा से टूटे रहोगे। जिस दिन तुम संसार से टूट जाओगे, मन खो जाएगा—उसी दिन तुम परमात्मा से जुड़ जाओगे। इधर हुए असंग, वहां हुआ संग। यहां टूटा नाता, वहां जुड़ा नाता। यहां से हुई आंख बंद, वहां खुली।

ध्यान बीज है और ध्यान का अर्थ है : निर्विचार चैतन्य।

दूसरा सूत्र : आसनस्थ व्यक्ति सहज ही चिदात्‍म सरोवर में निमज्जित हो जाता है। यह सूत्र बड़ा क्रांतिकारी है; सरल भी,कठिन भी। आसनस्थ हुआ व्यक्ति चिदात्म सरोवर में निमज्जित हो जाता है, डूब जाता है।

जापान में झेन फकीरों की परम्परा है। उनसे तुम पूछो कि ध्यान के लिए क्या करें तो वे कहते हैं कि कुछ न करो, बस बैठ जाओ। ध्यान रखना, जब वे कहते हैं कि कुछ न करो तो इसका मतलब है : कुछ भी न करना, बस बैठ जाना। बस इतना ही करना कि बैठ गये और कुछ भी मत करना; क्योंकि तुमने कुछ किया कि मन आया। बात सरल लगती है, पर बड़ी कठिन है। यही तो मुसीबत है कि बैठना मुश्‍किल है। आंख बंद की, काम शुरू हुआ, दौड़ शुरू हुई। शरीर बैठा हुआ दिखायी पड़ता है;मन जाग रहा है।

अगर तुम सिर्फ बैठ जाओ और कुछ भी न करो, तो ध्यान...। अगर तुम आसनस्थ हो जाओ, जस्ट सिटिंग, बस बैठे हैं,न राम—नाम का जप चल रहा है, न कृष्ण की सूइत चल रही है, कुछ भी नहीं कर रह हैं, न कोई विचार की तरंग है, क्योंकि वह भी कृत्य है। अगर तुम कुछ भी न करो, विचार को रोकने की कोशिश भी नहीं चल रही हो; क्योंकि वह भी कृत्य है, वह भी दूसरा विचार है। न तुम परमात्मा का स्मरण कर रहे हो, न संसार का; क्योंकि वे सब विचार हैं। न तुम भीतर दोहरा रहे हो कि'मैं आत्मा हूं, 'अहं ब्रह्मास्मि', 'मैं ब्रह्म हूं, —यह सब बकवास है। इसके दोहराने से कुछ भी न होगा, ये सब विचार हैं—तुम कुछ भी न कर रहे होओ, बस तुम बैठ गये, जैसे तुम एक चट्टान हो, जिसके भीतर कुछ भी नहीं हो रहा, बाहर कुछ भी नहीं हो रहा—इस दशा का नाम आसनस्थ है। जापान में इस अवस्था को झाझेन कहते है—बस, सिर्फ बैठ जाना। और, झेन फकीर इस विधि का उपयोग करते हैं। कभी—कभी बीस साल लग जाते हैं, तीस साल लग जाते हैं, तब कहीं आदमी इस अवस्था में पहुंच पाता है कि सिर्फ बैठा हुआ है।

सरल दिखता है, सूत्र बड़ा कठिन है। इस दुनिया में सरलतम चीजें ही सर्वाधिक कठिन होती हैं। तुमसे कोई करने को कहे तो तुम हिमालय चढ जाओ। उसमें इतनी अड़चन नहीं है। पसीना आएगा, थकान होगी। मगर चढ़ जाओगे। तुमसे कोई कहे कि न करो, तो बस मुसीबत आ गयी; हालांकि वह सिर्फ तुमसे इतना ही कह रहा है कि तुम बैठो, कुछ मत करो।

अगर तुम चुपचाप बैठे रहो, क्या होगा? पहले तो जैसे ही तुम बैठोगे, तुम पाओगे, शरीर में अनेक स्थानों मे गति शुरु होती है। कहीं पैर में लगता है कि क्या चुभ रही है। कहीं शरीर के किसी कोने में लगता है कि खुजलाहट आ रही है। कहीं लगता है कि कमर में दर्द हो रहा है। कहीं लगता है कि गर्दन में पीड़ा हो रही है। और एक क्षण पहले तक यह कुछ भी न हो रहा था, तुम बिलकुल ठीक थे। अचानक सब तरफ से शरीर बगावत कर रहा है। वह कह रहा है कि कुछ करो; न कुछ बने तो खुजलाओ, लेकिन कुछ करो। कुछ नहीं तो शरीर की करवट बदल लो। पैर ऐसे रखे हैं, ऐसे रख लो। लेट जाओ। कुछ करो।

क्योंकि जीवन इस संसार में कृत्य के बल से टिका है। जैसे ही तुम कृत्य से शून्य हुए कि यह संसार खोया। जैसे ही तुम शांत बैठना चाहते हो, शरीर कहता है कि कुछ करो।

मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, 'वैसे हमें कभी पता नहीं चलता कि कहां दर्द है, कहां क्या है; लेकिन जब भी ध्यान करने बैठते है, बस तभी मुसीबत शुरू होती है। खांसी आयेगी, ऐसे बिलकुल तुम ठीक बैठे हो, कभी खांसी न आयी थी। बस बैठे तुम खाली कि शरीर कृत्य शुरू करता है। इस पर ध्यान रखना। शरीर की बात को मत सुनना। मालिक तुम हो और अगर तुमने न सुना, शरीर थोड़े दिनों में चुप हो जाएगा; क्योंकि यह कितनी देर तक चिल्लाका। तुम ध्यान देते हो, तुम पोषण देते हो; तुम कह देना कि कुछ भी हो, इस एक घंटे में मैं कुछ करनेवाला नहीं। खुजलाहट ही चलेगी न, क्या बिगड़ जाएगा?

कभी तुमने यह खयाल किया कि अगर तुम दो—चार मिनट हिम्मत जुटा लो तो खुजलाहट अपने—आप चली जाती है। और खुजलाने से कभी कोई खुजलाहट गयी है? बढ़ती है! अगर तुमने पका ही खयाल कर लिया कि शरीर गुलाम है और मेरी आज्ञा मानेगा, मैं नहीं मानता, तुम अचानक पाओगे कि गला ठीक हो गया, खांसी खो गयी। तुम्हें थोड़े दिन मालकियत घोषणा करनी पड़ेगी। क्योंकि इस गुलाम को तुमने बहुत दिन तक मालिक बनाया है, इसलिए उसकी मालकियत छिनती है तो वह बाधा डालता है। वह तुम्हें बुलाता है कि यह नहीं चलने देंगे; सिंहासन पर मैं हूं!

एक घंटे अगर तुमने खाली बैठने का तय किया है तो का हर्जा हो जाएगा? पैर खुजलाता है, खुजलाने दो। कोई प्राण नहीं निकले जाते हैं, खुजलाहट ही चल रही है और तुम थोड़ी देर में ही पाओगे कि जैसे ही तुमने संयम रखा, वैसे ही पैर जिद्द छोड़ देगा। वह जिद्द तो सिर्फ तरकीब थी, तुम्हें झुकाने के लिए थी। तुम सुनते तो दूसरी जगह खुजलाहट चलती; तुम नहीं सुनोगे,जहां खुजलाहट चलती थी, वहां शांत हो जाएगी। खाली घर हो तो भिखमंगा थोड़ी देर चिल्लाकर चला जाता है। लेकिन अगर तुमने इतना भी कहा कि दूसरे घर जा, यहां कोई नहीं है, तो फिर वह खड़ा रहता है। तुमने प्रतिक्रिया की, तुमने प्रत्युत्तर दिया,फिर वह कुछ—न—कुछ कहेगा।

एक भिखमंगा मण रहा था मारवाड़ी के द्वार पर—गलत जगह पहुंच गया। उसने कहा, ' दो रोटी मिल जाएं।’ मारवाड़ी ने कहा, 'रोटी! यहां कोई रोटी—वोटी नहीं है। आगे जा!' तो उसने कहा, 'दो पैसे मिल जाएं।’ मारवाडी ने कहा, 'यहां कोई पैसे वगैरह नहीं हैं। यहां हम कुछ लेते—देते नहीं।’ तो उसने कहा, 'कुछ भी मिल जाए। कपडे का टुकड़ा ही मिल जाए।’ मारवाडी ने कहा, 'कहा नहीं कि यहां कुछ भी नहीं है?' तो उसने कहा, 'फिर तुम हमारे साथ क्यों नहीं आ जाते? यहां बैठे—बैठे क्या कर रहे हो?न कपड़ा है, न रोटी है, न पैसे हैं तो हम साथ—ही—साथ मांगेंगे।’

तुमने उत्तर दिया कि तुम फंसे। तुमने उत्तर दिया, उसका मतलब है, तुम हो और तुम राजी हो। कम—से—कम प्रतिक्रिया ऊर रहे हो, यह पर्याप्त है। शरीर में खुजलाहट उठे, तुम देखते रहना, कोई उत्तर मत देना। तुम थोड़ी देर में हैरान होओगे कि खुजलाहट गयी। दर्द उठे, देखते रहना; दर्द भी चला जाएगा। कोई छह महीने लगते हैं शरीर को आसनस्थ करने में। कोई भी आसन चुन लेना, जो सुख—आसन हो, जिसमें तुम देर तक बैठ सकी। कोई उलटा—सीधा आसन मत चुन लेना, जिसकी वजह से अकारण अड़चन हो, इसलिए सुखासन। आराम से बैठ सको। कोई शरीर को कष्ट नहीं देना है जानकर; कि कंकड़—पत्थर रखकर उस पर बैठ जाना; कि कांटे बिछा लेगा। शरीर वैसे ही काफी तकलीफ देगा, और नयी तकलीफ जुटाने की कोई जरूरत नहीं है।

सुखासन से बैठ जाना। लेकिन बैठ गये और एक घंटा बैठने का तय किया तो फिर एक घंटा शरीर की मत सुनना। तुम चकित होओगे, थोड़े ही दिन में—तीन सप्ताह के भीतर, तुम चकित होओगे—आर तुमने हिम्मत रखी और तुम न झुके, शरीर आवाज देना बंद कर देगा। और जब शरीर आवाज देना बंद कर दे, तब तुम मन की तरफ ध्यान देना। मन की तरफ ध्यान ही मत देना। अभी मन के साथ उलझना ठीक नहीं है। पहले शरीर को साथ हो जाने देना। जिस दिन पाओ कि अब शरीर कोई उपद्रव खड़ा नहीं करता, वह बैठने को राजी हो गया है आधी यात्रा पूरी हो गयी; आधी से भी ज्यादा पूरी हो गयी। क्योंकि मन भी शरीर का ही हिस्सा है। अगर पूरा शरीर बैठने को राजी हो गया तो अब यह हिस्सा ज्यादा देर बगावत नहीं कर सकता। यह सबसे ज्यादा बगावती है; लेकिन फिर भी शरीर का ही हिस्सा है। और जब पूरा शरीर आसन में आ गया तो यह ज्यादा देर यहां वहां नहीं भटक पाएगा। यह भी बैठ जाएगा।

शरीर को आसनस्थ कर लेने का अर्थ है कि शरीर का सब उपद्रव शांत हो गया। अब तुम ऐसे बैठते हो जैसे अशरीरी हो;जैसे शरीर है ही नहीं, शरीर का पता ही नहीं चलता; बस तुम बैठे हो। अब तुम मन पर ध्यान देना। और, मन की भी प्रक्रिया वही है कि मन कुछ भी कहे, सुनना मत। कोई प्रतिक्रिया मत करना। मन में विचार चले तो वैसे देखना जैसे तुम तटस्थ हो;जैसे तुम्हारा कोई लेना—देना नहीं है; जैसे ये विचार किसी और के मन में चल रह हैं, बहुत दूर हैं तुमसे; जैसे रास्ते पर शोरगुल चल रहा है या जैसे आकाश में बादल चल रहे हैं, कुछ तुम्हारा लेना—देना नहीं। उपेक्षा से तुम देखते रहना।

पहले शरीर को शांत हो जाने देना, फिर धीरे— धीरे, शरीर कोई तीन सप्ताह लेगा; मन कोई अन्दाजन तीन महीने लेगा। कम—ज्यादा हो सकता है। कैसी प्रगाढ़ता है तुम्हारी, उस पर निर्भर होगा। लेकिन करीब छह महीने के भीतर तुम पाओगे कि आसनस्थ दशा आ गयी। अब न शरीर कोई क्रिया करता है, न मन कोई क्रिया करता है।

मन से लड़ना मत। दबाने की कोशिश मत करना कि नहीं, विचार मत करो; क्योंकि ध्यान रखना यह भी विचार है,इतना विचार भी तुमने अगर सहारा दिया तो मन जारी रहेगा। मन न मालूम कितने उपद्रव खड़े करेगा। तुम लड़ना भी मत;क्योंकि लड़ने का मतलब है कि तुम राजी हो गये प्रतिक्रिया करने को, तुम उपेक्षा न कर पाए। उपेक्षा सूत्र है। तुम देखते रहना। तुम कुछ कहना ही मत। मुश्किल होगी, क्योंकि पुरानी आदतें हैं। सदा की आदतें हैं—उसके साथ प्रतिक्रिया करने की, बातचीत करने की, उत्तर देने की। धीरे— धीरे, तुम सिर्फ देखते, देखते देखते उस बड़ी में आ जाओगे, जब तुम सिर्फ बैठे हो, कुछ भी नहीं हो रहा है। न शरीर में कोई गति है, न मन में कोई गति है। जिस दिन शरीर और मन दोनों की गति शांत हो जाए, उस अवस्था का नाम आसनस्थ है।

आसन का अर्थ कोई बड़े योगासन साधने का नहीं है। लेकिन अगर तुम योगासन करते हो तो तुम्हें सहायता मिलेगी;क्योंकि बैठने में, उतनी देर तक बैठने की क्षमता बढ़ेगी। लेकिन कोई जरूरत नहीं है, कोई अनिवार्यता नहीं है। तुम अगर सिर्फ बैठना ही शुरू कर दो और सिर्फ बैठना ही सीख जाओ तो परम आसन वही है। कोई जरूरत नहीं कि तुम जमीन पर ही बैठो;तुम कुर्सी पर बैठ सकते हो। एक ही बात ध्यान रखना कि जिस अवस्था में बैठो, बस फिर उसी अवस्था में ही बैठे रहना।

सुख से बैठ जाओ ताकि शरीर को यह भी कहने को न बचे कि तुम नाहक मुझे दुख दे रहे हो। सुख से बैठ जाओ। सब तरफ से व्यवस्था कर लो सुख की। ठंड है तो कंबल डाल लो। गरमी है तो पंखा लगा दो। सब सुख की व्यवस्था कर लो। शरीर को अकारण कष्ट देने में रस मत लेना; क्योंकि वह दुष्टता है। वह चाहे तुम अपने शरीर को सताओ या दूसरे के शरीर को सताओ, वह दोनों हिंसा है। और, हिंसा से कभी कोई परमात्मा तक नहीं पहुंचता। यह शरीर भी उसी का है। इसे भी कष्ट देने की कोई जरूरत नहीं है। सब तरह से सुख की व्यवस्था कर लेना। फिर लेकिन एक बार बैठ गये, फिर शरीर कुछ भी कहे तो मत सुनना; फिर बैठे रहना। और मन के साथ उपेक्षा करना। पहले मन बड़ा ऊहापोह मचाएगा, बड़ा शोरगुल मचाएगा, जैसा उसने कभी नहीं मचाया था।

लोग मेरे पास आते है। वे कहते है कि जब ध्यान नहीं करते थे तब ऐसी मन में अशांति कभी न थी, अब और बढ़ गयी;अब तो बड़ा तुमुल नाद चलता है। तुमुल नाद पहले भी चलता था, तुम्हें पता नहीं था, क्योंकि तुमने कभी ध्यान नहीं दिया था। तुम उलझे थे बाहर, भीतर अराजकता यही थी; क्योंकि तुम्हारे शांत बैठने से अराजकता के बढ़ने का कोई भी संबंध नहीं है। वह घट सकती है; बढ़ेगी कैसे? लेकिन तुम इतने उलझे थे बाहर, सारा ध्यान बहिर्मुखी था—बाजार, दुकान, धन वहां चल रहा था—तुम्हें मौका नहीं मिला भीतर देखने का कि वहा क्या उपद्रव चल रहा है। अब तुमने बाहर से आंख बंद की तो सारा ध्यान, सारा फोकस, सारा प्रकाश भीतर पड रहा है। इस भीतर प्रकाश पड़ने पर पहली दफा तुम्हें पता चलता है कि भीतर कैसी अराजकता मची है।

मगर उपेक्षा! एक ही ध्यान रखना कि मन से सब अपेक्षा छोड़ दो। अपेक्षा रखी तो उपेक्षा न कर सकोगे। अपेक्षा छोड़ दो,कोई आशा मत रखो और उपेक्षा में बैठ जाओ, तटस्थ हो जाओ। कितना ही कठिन हो, सरल हो जाएगा, अगर तुम बैठते ही रहे। आज न होगा, कल होगा, परसों होगा—तुम इसकी चिंता मत करना कि कब होगा; क्योंकि तुम जितनी जल्दी करोगे, उतनी देर हो जाएगी। जल्दी मन का स्वभाव है। अगर तुमने जल्दी की तो मन तुम्हें हरा देगा। अगर तुमने धैर्य रखा और प्रतीक्षा करने को राजी रहे कि कोई जल्दी नहीं—कभी होगा, इसकी हमें फिक्र नहीं, हम बैठते रहेंगे—तुम पाओगे कि छह महीने के करीब मन भी शांत हो गया।

आसनस्थ दशा का अर्थ है, शरीर में कोई क्रिया नहीं, मन में कोई विचार नहीं। और शिव का यह सूत्र बड़ा क्रांतिकारी है। यह कहता है कि तुम आसनस्थ हुए कि सहज ही चिदात्म सरोवर में निमज्ज