Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

SHIV SUTRA-06


सूत्र;-

आत्‍मा नर्तक है। अंतरात्‍मा रंगमंच है। बुद्धि के वश में होने से सत्‍व की सिद्धि होती है। और सिद्ध होने से स्‍वातंत्र्य फलित होता है। स्‍वतंत्र स्‍वभाव के कारण वह अपने से बाहर भी जा सकता है और वह बाहर स्‍थित रहते हुए अपने अंदर भी रह सकता है।

सूत्रों में प्रवेश के पहले कुछ बातें समझ लें। फ्रैड़िक नीस्ते ने कहीं कहा है कि मै केवल उस परमात्मा में विश्वास कर सकता हूं जो नाच सकता हो। उदास परमात्मा में विश्वास करना केवल बीमार आदमी का लक्षण हैं।

बात में सच्चाई है। तुम अपने परमात्मा को अपनी ही प्रतिमा में ढालते हो। तुम उदास हो—तुम्हारा परमात्मा उदास होगा। तुम प्रसन्न हो—तुम्हारा परमात्मा प्रसन्न होगा। तुम नाच सकते हो तो तुम्हारा परमात्मा भी नाच सकेगा। तुम जैसे हो, वैसा ही तुम्हें अस्तित्व दिखाई पड़ता है। तुम्हारी दृष्टि का फैलाव ही सृष्टि है। और जब तक तुम नाचते हुए परमात्मा में भरोसा न कर सको, तब तक जानना कि तुम स्वस्थ नहीं हुए। उदास, रोते हुए, रुग्ण परमात्मा की धारणा तुम्हारी रुग्ण दशा की सूचक है।

पहला सूत्र है आज का—आत्मा नर्तक है।

नर्तक के संबंध में कुछ और बातें समझ लें। नर्तन अकेला ही एक कृत्य है, जिसमें कर्ता और कृत्य बिलकुल एक हो जाते हैं। कोई आदमी चित्र बनाये, तो बनानेवाला अलग और चित्र अलग हो जाता है। कोई आदमी कविता बनाये, तो कवि और कविता अलग हो जाती है। कोई आदमी मूर्ति गढ़े, तो मूर्तिकार और मूर्ति अलग हो जाती है। सिर्फ नर्तन एक मात्र कृत्य है, जहां नर्तक और नृत्य एक होता है; उन दोनों को अलग नहीं किया जा सकता। अगर नर्तक चला जाएगा—नृत्य चला जाएगा। और, अगर नृत्य खो जाएगा तो उस आदमी को, जिसका नृत्य खो गया,नर्तक कहने का कोई अर्थ नहीं। वे दोनों संयुक्त हैं।

इसलिए परमात्मा को नर्तक कहना सार्थक है। यह सृष्टि उससे भिन्न नहीं है। यह उसका नृत्य है। यह उसकी कृति नहीं है। यह कोई बनायी हुई मुर्ति नहीं है कि परमात्मा ने बनाया और वह अलग हो गया। प्रतिपल परमात्मा इसके भीतर मौजूद है। वह अलग हो जाएगा तो नर्तन बंद हो जाएगा। और ध्यान रहे कि नर्तन बंद हो जाएगा तो परमात्मा भी खो जाएगा; वह बच नहीं सकता। फूल—फूल में, पत्ते—पत्ते में, कण—कण में वह प्रकट हो रहा है। सृष्टि कभी पीछे अतीत में होकर समाप्त नहीं हो गयी; प्रतिपल हो रही है। प्रतिपल सृजन का कृत्य जारी है। इसलिए सब कुछ नया है। परमात्मा नाच रहा है—बाहर भी, भीतर भी।

आत्मा नर्तक है—इसका अर्थ है कि तुमने जो भी किया है, तुम जो भी .कर रहे हो और करोगे, वह तुमसे भिन्न नहीं है। वह तुम्हारा ही खेल है। अगर तुम दुख झेल रहे हो तो यह तुम्हारा ही चुनाव है। अगर तुम आनंदमग्न हो, यह भी तुम्हारा चुनाव है; कोई और जिम्मेवार नहीं है।

मैं एक कालेज में प्रोफेसर था। नया—नया वहां पहुंचा। कालेज बहुत दूर था गांव से। और, सभी प्रोफेसर अपना खाना साथ लेकर ही आते थे और दोपहर को एक टेबल पर इकट्ठे होते थे। संयोग की ही बात थी कि मैं जिनके पास बैठा था, उन्होंने अपना टिफिन खोला, झांककर देखा और कहा : ‘फिर वही आलू की सब्जी और रोटी!’ मुझे लगा कि उन्हें शायद आलू की सब्जी और रोटी पसंद नहीं है। लेकिन, मैं नया था तो मैं कुछ बोला नहीं। दूसरे दिन फिर वही हुआ। उन्होंने फिर डब्बा खोला और फिर कहा कि ‘फिर वही आलू की सब्जी और रोटी!’ तो मैंने उनसे कहा कि अगर आलू की सब्जी और रोटी पसंद नहीं तो अपनी पली को कहें कि कुछ और बनाये। उन्होंने कहा : ‘पत्नी! पत्नी कहां है। मैं खुद ही बनाता हूं।’

यही तुम्हारा जीवन है। कोई है नहीं। हंसो तो तुम हंस रहे हो, रोओ तो तुम रो रहे हो; जिम्मेवार कोई भी नहीं। यह हो सकता है कि बहुत दिन रोने से तुम्हारी रोने की आदत बन गयी हो और तुम हंसना भूल गये हो। यह भी हो सकता है कि तुम इतने रोये हो कि तुमसे अब कुछ और करते बनता नहीं—अभ्यास हो गया। यह भी हो सकता है कि तुम भूल ही गये, इतने जन्मों से रो रहे हो कि तुम्हें याद ही नहीं कि कभी यह मैने चुना था—रोना। लेकिन तुम्हारे भूलने से सत्य असत्य नहीं होता है। तुमने ही चुना है। तुम ही मालिक हो। और, इसलिए जिस क्षण तुम तय करोगे, उसी क्षण रोना रुक जाएगा।

इस बोध से भरने का नाम ही कि ‘मैं ही मालिक हूं, ‘मैं ही सृष्टा हूं,, ‘जो भी मैं कर रहा हूं उसके लिए मै ही जिम्मेवार हूं, —जीवन में क्रांति हो जाती है। जब तक तुम दूसरे को जिम्मेवार समझोगे, तब तक क्रांति असंभव है; क्योंकि तब तक तुम निर्भर रहोगे। तुम सोचते हो कि दूसरे तुम्हें दुखी कर रहे हैं, तो फिर तुम कैसे सुखी हो सकोगे? असंभव है; क्योंकि दूसरों को बदलना तुम्हारे हाथ में नहीं। तुम्हारे हाथ में तो केवल स्वयं को बदलना

अगर तुम सोचते हो कि भाग्य के कारण तुम दुखी हो रहे हो तो फिर तुम्हारे हाथ के बाहर हो गयी बात। भाग्य को तुम कैसे बदलोगे? भाग्य तुमसे ऊपर है। और, तुम अगर सोचते हो कि तुम्हारी विधि में ही विधाता ने लिख दिया है—जो हो रहा है, तो तुम एक परतंत्र यंत्र हो जाओगे; तो तुम आत्मवान न रहोगे।

आत्मा का अर्थ ही यह है कि तुम स्वतंत्र हो; और, चाहे कितनी ही पीड़ा तुम भोग रहे हो, तुम्हारे ही निर्णय का फल है। और, जिस दिन तुम निर्णय बदलोगे, उसी दिन जीवन बदल जाएगा। फिर, जीवन को देखने के ढंग पर सब कुछ निर्भर करता है।

मैं मुल्ला नसरुद्दीन के घर में मेहमान था। सुबह बगीचे में घूमते वक्त अचानक मेरी आंख पड़ी, देखा कि पत्नी ने एक प्याली नसरुद्दीन के सिर की तरफ फेंकी। लगी नहीं सिर में, दीवार से टकराकर चकनाचूर हो गयी। नसरुद्दीन ने भी देख लिया कि मैंने देख लिया है। तो वह बाहर आया और उसने कहा: ‘क्षमा करें! आप कहीं कुछ और न सोच लें! हम बड़े सुखी हैं। ऐसे कभी—कभार पत्नी चीजें फेंकती है, मगर इससे हमारे सुख में कोई भेद नहीं पड़ता।’

मैं थोड़ा हैरान हुआ। मैने पूछा : ‘थोड़ा विस्तार से कहो।’ तो उसने कहा कि’ अगर उसका निशाना लग जाता है तो वह खुश होती है और अगर चूक जाती है तो मैं खुश होता हूं। मगर हमारी खुशी में कोई भेद नहीं पड़ता। और, कभी—कभी निशाना लगता है, कभी—कभी चूकता है। हम दोनों खुश हैं।’

जिंदगी को देखने के ढंग पर निर्भर करता है। तुम ही बनाते हो फिर तुम ही देखते हो और फिर तुम ही व्याख्या करते हो। तुम बिलकुल अकेले हो। तुम्हारे संसार में कोई दूसरा कभी प्रवेश नहीं करता। प्रवेश कर भी नहीं सकता। कोई प्रवेश भी करता है तो वह तुमने ही आज्ञा दी है। इससे एक कठिनाई है, इसलिए तुम इसे भूले हुए हो।

कठिनाई यह है कि यह अनुभव करना कि मैं ही जिम्मेवार हूं तब तुम दुखी न हो सकोगे। और अगर दुखी होना चाहते हो तो शिकायत न कर सकोगे। और, उन दोनों में बड़ा रस है।

दुखी होने में भी बड़ा रस है; क्योंकि जब तुम दुखी होते हो, तब तुम शहीद होते हो। शहीदगी का बड़ा मजा है। जब तुम दुखी होते हो, तब तुम सहानुभूति मांगते हो। सहानुभूति में बड़ा रस है। इसलिए तो लोग अपने दुख की कथा एक—दूसरे को बढ़ा—चढ़ा कर सुनाते हैं। क्या कारण होगा कि लोग दुख की इतनी कथा सुनाते रहते हैं। कोई सुनना भी नहीं चाहता।

कौन उत्सुक है तुम्हारे दुख में? और, दुख की बातें सुनकर दूसरा भी उदास ही होगा; कोई दूसरे के जीवन में फूल तो नहीं खिल जाएंगे। लेकिन, तुम सुनाये जा रहे हो। और दूसरा तभी तक सुनता है, जब तक उसे आशा रहती है कि तुम भी उसकी सुनोगे। अन्यथा वह फिसल जाएगा। तुम उन्हीं आदमियों को कहते हो कि उबानेवाले है, जो तुम्हें बोलने का मौका ही नहीं देते। तो एक समझौता है—तुम हमें उबाओ हम तुम्हें उबाएं। तुम अपने दुख की कथा कहकर हमें परेशान करो; हम अपने दुख की कथा कहकर तुम्हें परेशान करें और बराबर हो जाएं।

क्यों आदमी दुख की इतनी चर्चा करता है? क्या कारण है?—सहानुभूति की अपेक्षा रखता है। दुख की बात करेगा तो कोई पुचकारेगा, सहलाएगा कोई कहेगा कि बड़े दुखी हो। दूसरे का प्रेम मांग रहे हो तुम दुख के द्वारा। इसलिए, दुख में तुम्हारा बड़ा इन्वैस्टमेंट है। उसमें तुमने अपनी बहुत संपत्ति लगायी है।’ जब भी तुम दुखी होते हो, तभी तुम्हें थोड़ी—सी आशा चारों तरफ से मिलती है। लोग तुम्हें सहारा देते मालूम पड़ते हैं; सहानुभूति दिखलाते हैं। प्रेम तुम्हें जीवन में मिला नहीं है और सहानुभूति कचरा है; लेकिन प्रेम के लिए वही निकटतम परिपूरक है। जिसको असली सोना न मिला हो, वह फिर नकली सोने से काम चलाने लगता है।

सहानुभूति नकली प्रेम है। आकांक्षा तो प्रेम की थी, लेकिन प्रेम को तो अर्जित करना होता है; क्योंकि प्रेम केवल उसी को मिलता है जो प्रेम दे सकता है। प्रेम दान का प्रतिफलन है। तुम देने में असमर्थ हो; तुम सिर्फ मांग रहे हो। तुम भिखमंगे हो, तुम सम्राट नहीं! और, मांगते हो तो जितने ज्यादा दुखी हो, उतनी ही आसानी हो जाती है।

भिखमंगे को रास्ते पर देखो! वह झूठे घाव अपने शरीर पर बनाये हुए है। वे घाव असली नहीं हैं। वह मवाद ऊपर से लगायी गयी है। लेकिन जब वह बिलकुल दुख से भरा होता है, तब तुमको भी ‘ना’ करना बहुत मुश्किल हो जाता है; ग्लानि होती है, अहंकार को चोट लगती है कि इतने दुखी आदमी को कैसे ‘ना’ करो। अगर वह स्वस्थ तगड़ा है तो तुम भी कहोगे कि ‘मुसटंडे हो; कुछ करो, कुछ कमाओ कमा सकते हो! ‘लेकिन दुखी आदमी को देखकर तुम बोल नहीं पाते। तुम्हें सहानुभूति दिखानी ही पड़ती है—चाहे झूठी ही सही।

इसलिए तुम दुख को पक्के हो, क्योंकि तुम्हें प्रेम नहीं मिला। जिसको प्रेम मिला है जीवन में, वह आनंदित होगा; वह आनंद को पकड़ेगा, दुख को नहीं। दुख पकड़ने जैसा नहीं है। फिर तुम्हें सुविधा है शिकायत करने में; क्योंकि, जब भी तुम कहते हो कि दूसरे तुम्हें दुखी कर रहे हैं, तब जिम्मेदारी का बोझ हट जाता है। और जब मैं तुमसे कहता हूं सारे शास्त्र तुमसे कहते हैं और सारे बुद्ध—पुरुषों ने एक ही बात कही है कि तुम हा जिम्मेवार हो, कोई और नहीं—तब बड़ा बोझ मालूम पड़ता है। सबसे बड़ा बोझ तो यह मालूम पड़ता है कि अब शिकायत तुम किसी पर फेंक नहीं सकते। और उससे भी बड़ा बोझ इस बात का पड़ता है कि अब तुम सहानुभूति किससे मांगोगे, अगर तुम ही जिम्मेवार हो। और भी गहरे में यह कठिनाई खड़ी होती है कि अगर तुम ही जिम्मेवार हो तो बदलाहट की जा सकती है। और बदलाहट करना एक क्रांति है, एक रूपांतरण से गुजरना है।

तुम्हारी पुरानी आदतें हैं, वे सभी तोड़नी होंगी। तुम्हारा एक पुराना ढांचा है, वह सब गलत है। अब तक जो तुमने मकान बनाया है, वह पूरा—का—पूरा नरक है। लेकिन तुमने ही बनाया है, चाहे कितना ही बड़ा बना लिया हो, उसे पूरा गिराना पड़ेगा। अतीत का सारा—का—सारा श्रम व्यर्थ जाता मालूम पड़ता है। इसलिए, तुम इस सत्य से बचने की कोशिश करते हो। लेकिन, जितने तुम बचोगे, उतने ही तुम भटकोगे।

पहली बात समझ लो कि तुम ही केंद्र हो अपने अस्तित्व के; कोई जिम्मेवार नहीं। और कितना ही बोझ मालूम पड़े, लेकिन तुम ही जिम्मेवार हो। इस सत्य को अगर स्वीकार कर लोगे तो जल्दी ही सारे दुख खो जाएंगे। क्योंकि, एक बार यह साफ हो जाए कि मैं ही बना रहा हूं यह अपना खेल, तो मिटाने में कितनी देर लगती है? तब कोई दूसरा नहीं है। और, फिर अगर तुम दुख में ही रस लेना चाहते हो तो तुम्हारी मर्जी! लेकिन, फिर शिकायत करने का कोई कारण नहीं। अगर तुम संसार में ही भटकना चाहते हो, तुम्हारी मौज! अगर तुम नरक ही जाना चाहते हो, तो तुम्हारा चुनाव! लेकिन, फिर शिकायत का कोई कारण नहीं। तब तुम प्रसन्नता से दुख में जीओ।

ये सूत्र इसी अर्थ में बड़े कीमती है।

पहला सूत्र है : आत्मा नर्तक है। तुम्हारे कृत्य और तुम्हारा अस्तित्व अलग—अलग नहीं है। तुम्हारे कृत्य तुम्हारे ही अस्तित्व से निकलते है; जैसे नृत्य निकलता है नर्तक से। और, नर्तक अगर चिल्लाने लगे कि मैं इस नृत्य से परेशान हूं मैं इसे नहीं करना चाहता तो तुम क्या कहोगे? तुम कहोगे : ‘रुक जाओ। ठहर जाओ! कौन तुमसे कहता है कि नाचो? तुम ही नाच रहे हो। रुक जाओ, अगर यह सब व्यर्थ है और तुम्हें रसकर और प्रीतिकर नहीं है। और, अगर तुम्हें दुख मिलता है तो रुको, ठहरो! ‘नृत्य खो जाएगा!

आत्मा नर्तक है—इसका अर्थ यह है कि तुमने जो भी किया हो, तुमने ही किया है, वह तुमसे ही निकला है। जैसे वृक्षों से पत्ते निकलते हैं, ऐसे तुम्हारे अस्तित्व से तुम्हारे कृत्य निकलते हैं। रुक जाओ—और कृत्य खो जाएंगे।

और दूसरी बात समझ लेनी जरूरी है—आत्मा नर्तक है—अगर तुम्हारे दुख के नृत्य को, इस विषाद और संताप से भरे जीवन को तुम रोक दोगे तो नर्तन तो नहीं रुकेगा, नर्तन का रूप बदलेगा। क्योंकि नर्तन तो रुक ही नहीं सकता; वह तुम्हारे जीवन का अंग है। वह तुम्हारा स्वभाव है। नाचते तो तुम रहोगे ही, लेकिन तब आंसू नहीं होंगे, मुस्कराहट होगी। तब तुम्हारे नृत्य में एक गीत होगा, एक पुलक होगी, एक आनंद होगा, एक हर्षोन्माद होगा, एक मस्ती होगी। अभी तुम्हारा नृत्य नारकीय है, तब स्वर्गीय होगा।

एक मुसलमान फकीर हुआ—इब्राहीम। कभी सम्राट था, फिर फकीर हुआ। वह भारत यात्रा पर आया था। उसने एक साधु को पूछा; क्योंकि साधु उदास दिखता था। अक्सर साधु उदास होते हैं; क्योंकि उनकी जिंदगी का रस उनकी गृहस्थी में था। कोई दूसरा रस वे जानते नहीं। और गृहस्थी छोड़ बैठते हैं, सब रस खो जाता है। दुखी भला न हों, लेकिन उदास होते हैं।

दुख और उदासी में थोड़ा फर्क है। दुख का अर्थ है कि उदासी में एक तीव्रता है; उदासी में भी एक जोशखरोश है; उदासी में एक बाढ़ है। दो तरह की बाढ़ होती है। एक दुख की बाढ़ होती है, एक सुख की बाढ़ होती है। एक, जब तुम उदासी से इतने भर जाते हो कि आंसू बहने लगते हैं; एक, जब तुम खुशी से इतने भर जाते हो कि आंसू बहने लगते हैं—दोनों बाढ़ हैं।

जब कोई आदमी संसार को छोड़कर भाग जाता है, क्योंकि उसे लगता है कि यहां दुख है, तो जो यहां सुख है, वह भी छूट जाता है। तब वह उदास हो जाता है; कोई बाढ़ नहीं आती—न सुख की, न दुख की।

तुम अपने साधुओं को, संन्यासियों को जाकर देखो। वें मुर्दा हैं; जैसे जीते जी मर गए हैं; नर्तन जैसे बंद हो गया है। दुख को तो छोड़ भागे हैं, साथ में सुख भी छूट गया; क्योंकि वहीं सुख भी दिखाई पड़ता था। उनकी आशा यह थी कि जब वे दुख को छोड़कर भाग जाएंगे, तो सुख ही सुख बचेगा। यहीं भूल है।

संसार में दुख है; वहां सुख भी है। तुम सुख को तो बचाना चाहते हो, दुख को छोड़ना चाहतें हो। दुख को छोड़कर भागते हो, सुख भी छूट जाता है।

वह साधु उदास था—साधारण साधु रहा होगा। क्योंकि सच में जो साधु है, वह सुख—दुख दोनों को छोड़ता है। सुख को बचाना नहीं चाहता; सुख—दुख दोनों को छोड़ता है। जैसे ही सुख—दुख दोनों को छोड्ता है, उदासी खो जाती है; क्योंकि उदासी उन दोनों का मध्य—बिंदु है। जब तुमने दोनों ही छोड दिये, तब मध्य—बिंदु भी खो जाता है। और तब एक नये आयाम की यात्रा शुरू होती है, उसे आनंद, शांति, निर्वाण—जो भी नाम हम देना चाहें, दें।

आनंद में बाढ़ नहीं है; आनंद ठंडी किरण है, ठंडा प्रकाश है; वहां बाढ़ नहीं है। आनंद उदासी जैसा है एक अर्थ में। उदासी सुख और दुख के मध्य में है। आनंद सुख और दुख के पार है। उदासी एक स्थिति है अंधकार की, जहां सब शिथिल हो गया—मृत्यु की; जहां सब आलस्य में पड़ गया। आनंद एक सतेज अवस्था है जागृति की; लेकिन, न वहां सुख है, न दुख है। इस संबंध में आनंद भी उदासी जैसा है—वहा न सुख है, न दुख है। वहां प्रकाश तो है, लेकिन प्रकाश सुख जैसा नहीं है; क्योंकि, सुख के प्रकाश में भी तीव्रता होती है और पसीना आ जाता है।

सुख से भी लोग इसलिए थक जाते हैं। तुम ज्यादा देर सुखी नहीं रह सकते। सुख भी थकाएगा क्योंकि, उसमें त्वरा है, तीव्रता है,बुखार है। अगर तुम्हें रोज—रोज लाटरी मिलने लगे, तुम मरोगे, तुम जिंदा न बचोगे। बस, वह एकाध बार मिले तो ठीक। क्योंकि, रोज—रोज मिलने लगे तो इतना ज्यादा हो जाएगा तनाव कि तुम सो न सकोगे। छाती इतनी धड़केगी कि तुम विश्राम न कर सकोगे। एक्साइटमेंट, उत्तेजना इतनी होगी कि वह तुम्हारी हत्या बन जाएगी। इसलिए सुख हमेशा होमियोपैथी की मात्रा में झेला जा सकता है। एलोपैथी की मात्रा तुम न झेल सकोगे। बस, जरा—जरा—सी पुड्यों में मिलता है—काफी दुख, थोड़ा—सा सुख—बस उतना ही झेला जा सकता है। क्योंकि वह भी तनाव है। उसमें भी गरमी है, उत्ताप है।

दुख भी तनाव, सुख भी तनाव।’ है। आनंद अनुत्तेजित चित्त की दशा है। वहां प्रकाश तो है, लेकिन ताप नहीं है। वहां नृत्य तो है, लेकिन उत्तेजना नहीं है। वहां एक शांत मौन नृत्य है, जहां कोई आवाज नहीं होती। वहां शून्य में नर्तन है, जिससे कोई थकान नहीं आती। वह शरीर का नहीं है। सुख और दुख दोनों शरीर के हैं; आना का है आनंद। वह एक दूसरा ही नर्तन है।

वह साधु साधारण साधु था, जैसे तुम्हें सब जगह मिल जाएंगे। इब्राहीम ने उस साधु को उदास देखा तो हैरान हुआ। क्योंकि ईब्राहीम की धारणा थी कि साधु को आनंदित हो जाना चाहिए। तो उसने पूछा कि साधु का लक्षण क्या है। इब्राहीम ने साधु को पूछा कि साधु का लक्षण क्या है।

उस साधु ने कहा कि रोटी मिल जाए तो स्वीकार कर ले और न मिले तो संतोष करे। इब्राहीम ने कहा : यह तो कुत्ते का लक्षण है। इसमें साधुता क्या? कुत्ता भी यही करता है—मिल जाए तो ठीक, न मिले तो संतुष्ट है। साधु हैरान हुआ और उसने कहा कि आप साधु की क्या परिभाषा करते हैं। तो इब्राहीम ने कहा : मिल जाए तो बांट कर खाए और न मिले तो नाच कर धन्यवाद दे परमात्मा को कि तुमने तपक्ष्चर्या का एक अवसर दिया। साधु की परिभाषा—मिल जाए तो बांट कर खाये। जो भी मिले, उसे बांटे—वही साधु है। उसे पल्ड्रे और रोके तो गृहस्थ है। बचाये तो गृहस्थ है, बांटे तो साधु है; वह चाहे आनंद हो, ज्ञान हो—कुछ भी हो; चाहे ध्यान हो। जो भी मिल जाए ,उसे बांट दे।

एक बड़े मजे की बात है—इस संसार में जो चीजें है, अगर तुम उन्हें बांटों, तो वे कम हो जायेंगी। इसलिए आदमी पकड़ते है। तुम तिजोरी को बांटोगे तो ज्यादा दिन तिजोरी बचेगी नहीं। क्योंकि इस संसार में सभी सीमित है—बांटा कि गया। इसलिए संसार में सीमित को पकड़ना पड़ता है। पर इस आदत को आत्मा में ले जाने की कोई जरूरत नहीं; वहां सब संपदा असीम है। वहां जितना बांटों उतना बढ़ता है; जितना उलीचो, उतना नया आता है। सागर है अनंत!

इब्राहीम ठीक कहता है : मिले तो बांट कर खा ले; अकेला न खाए ,बांटे; न मिले तो नाच कर धन्यवाद दे। संतोष काफी नहीं है, क्योंकि संतोष में तो उदासी है।

लोग अक्सर कहते हैं कि संतोषी सदा सुखी है; गलती में है। संतोषी सुखी नहीं होता, संतोषी सिर्फ सुख मानता है। भीतर गहरे में दुखी होता है, लेकिन कुछ भी नहीं कर पाता। अवश है, इसलिए संतोष को धारण कर लेता है। संतोषी नहीं। संतोष तो उदासी का हिस्सा है। सह लिया, ज्यादा शोरगुल न मचाया, शिकायत न की—यह मरे हुए चित्त का लक्षण हुआ।

इब्राहीम ने कहा कि न मिले तो नाचकर धन्यवाद दे कि तूने एक अवसर दिया, तपश्चर्या का; आज उपवास होगा। मिले तो धन्यवाद, क्योंकि बांटा, फैलाया। न मिला तो धन्यवाद।

साधु के आनंद को नष्ट नहीं किया जा सकता, और तुम्हारे दुख को नष्ट भी किया जाए तो ज्यादा—से—ज्यादा उदासी फलित होती है। तुम किसी तरह दुख को छोड़ भी दो तो बस उदास हो जाते हो। तुम्हें दुख भी संलगन रखता है, काम में लगाये रखता है। तुमने खयाल नहीं किया—अगर तुम्हारे सब दुख छिन जाएं तो तुम आत्महत्या कर लोगे; क्योंकि तुम करोगे क्या फिर! कुछ बचेगा नहीं करने को।

बाप काम में लगा है; क्योंकि बेटों को पढाना है, शादी करनी है। सबकी शादी हो जाए, सबका काम निपट जाए इसी वक्त, तो बाप क्या करेगा? जिंदगी बेकार मालूम होगी। बेकार की चीज में तुम्हें कारोबार मिला हुआ है। उससे तुम्हें लगता है कि तुम कुछ कर रहे हो, महत्वपूर्ण हो, जरूरी हो; तुम्हारे बिना दुनिया न चलेगी; बेटे का क्या होगा, पली का क्या होगा! इससे तुम्हारे अहंकार को सहारा मिलता है कि तुम आवश्यक हो; तुमसे ही सब चल रहा है। हालांकि, सब तुम्हारे बिना भी चलता रहेगा। तुम नहीं थे, तब भी चल रहा था; तुम नहीं होओगे, तब भी चलेगा। लेकिन, बीच में थोड़ी देर को तुम सपना देख लेते हो—अपने जरूरी होने का।

तो, ज्यादा—से—ज्यादा तुम अगर दुख को छोड़ो भी तो तुम संतोष कर सकते हो। संतोष में दुख छुपा हुआ है। संतोष ऊपर—ऊपर है; भीतर दुख का घाव है। वह मलहमपट्टी है; वह उपचार नहीं है।

न; साधु संतोषी नहीं होता; साधु आनंदित होता है। परिस्थिति कोई भी हो, मिलेगा तो बांटकर आनंदित होगा; नहीं मिलेगा तो न मिलने में भी नाचेगा और आनंदित होगा।

आत्‍मा का स्वभाव नर्तन है, और आत्मा दो तरह से नाच सकती है। इस तरह से नाच सकती है कि चारों तरफ दुख का जाल पैदा हो जाए। चारों तरफ उदासी भर जाए, चारों तरफ अंधकार पैदा हो। और,आत्मा ऐसे भी नाच सकती है कि चारों तरफ किरणें नाचने लगें और चारों तरफ फूल खिल जाएं।

संन्यास आनंद का नृत्य है और गृहस्थ दुख का नृत्य! नरक कहीं और नहीं। तुम इस आशा में मत बैठे रहना कि नरक कहीं और है। नरक तुम्हारे गलत नाचने का ढंग है, जिससे दुख पैदा होता है। स्वर्ग भी कहीं और नहीं है। स्वर्ग तुम्हारे ठीक नाचने का ढंग है जिससे तुम जहां भी हो, वहां स्वर्ग पैदा हो जाता है। स्वर्ग तुम्हारे नृत्य का गुण है। नर्क भी तुम्हारे नृत्य का गुण है।

तुम नाचना नहीं जानते; लेकिन सदा तुम सोचते हो कि आंगन टेढ़ा है, इसलिए नाच ठीक नहीं हो रहा है। आंगन टेढ़ा जरा भी नहीं है और, जिसे नाचना आता है, टेढ़ा आंगन भी ठीक है, कोई फर्क नहीं पडता। और जिसे नाचना नहीं आता, उसके लिए बिलकुल ठीक ज्यामिती से बनाया गया नब्बे कोण का आंगन भी…। नाचना नहीं आ जाएगा इससे।

मैंने सुना है, एक आदमी आंख के आपरेशन के लिए गया। आपरेशन के पहले डाक्टर से उसने पूछा कि मुझे बिलकुल दिखाई नहीं पड़ता; मुझे दिखाई पड़ना शुरू हो जाएगा? डाक्टर ने चिकित्सा के पहले परीक्षा की और कहा कि बिलकुल! उस आदमी ने कहा कि क्या मैं पढ़ भी सकूंगा? डाक्टर ने कहा : ‘बिलकुल!’ फिर उस आदमी की आंखें ठीक हो गयीं, उसे दिखाई भी पड़ने लगा। लेकिन वह, बड़ा नाराज, एक दिन डाक्टर के घर पहुंचा और उसने कहा कि ‘तुम झूठ बोले, पड़ तो मैं अब भी नहीं सकता।’ उस डाक्टर ने कहा : ‘तुम्हें सब दिखाई पड़ने लगा; पढ़ क्यों नहीं सकते?’ उसने कहा कि पढ़ना तो मुझे आता ही नहीं।

आंख भी ठीक हो जाए और पढ़ना न आता हो तो पढ़ना नहीं आ जाएगा। आंगन कितना ही सीधा हो जाए, नाचना न आता हो तो नाचना आंगन के सीधे होने पर निर्भर नहीं है, वह सीखना पड़ेगा। और ध्यान रहे, कोई और सिखानेवाला नहीं है। तुम बिलकुल अकेले हो। इशारे बुद्ध—पुरुष दे सकते है, लेकिन सीखना तुम्हीं को पड़ेगा। कोई तुम्हें हाथ पकड़कर सिखा नहीं सकता। वह जीवन का नृत्य इतना भीतर है, इतना गहरा है कि वहां बाहर के हाथ पहुंच नहीं सकते। वहां तुम्हारे सिवाय किसी का प्रवेश नहीं है। वहां तुम निपट अकेले हो। बाकी सब बाहर है।

आत्मा नर्तक है। सुख और दुख—दों ढंग से आत्मा नाच सकती है। अगर तुम दुखी हो तो तुमने गलत ढंग सीख लिए हैं नाचने के। ढंग को बदलों। किसी के ऊपर दोष मत डालों। कोई शिकायत मत करो। जब तक शिकायत करोगे, तुम गलत ही नाचते रहोगे; क्योंकि तुम्हें यह खयाल ही न आएगा कि भूल मेरी है…; सदा भूल दूसरे की है।

शिकायत बंद करो। अपनी तरफ देखो और जहां—जहां तुम्हें दुख पैदा होता है, खोजो गौर से, तुम्हारे भीतर ही उसके कारण मिलेंगे। उन कारणों को छोड़ दो; क्योंकि जिनसे दुख पैदा होता है, उन कारणों को किये जाने का प्रयोजन क्या है? जिनसे सिर्फ जहर के फल लगते हों, उन बीजों को तुम क्यों बोये. चले जाते हो? हर वर्ष क्यों फसल काट लेते हो उनकी? बेहतर तो यह होगा कि तुम फसल ही न बोओ, तो भी ठीक रहेगा। खाली पडा रहे खेत तो भी बुरा नहीं है। और अच्छा यह होगा कि कुछ दिन खाली ही पड़ा रहे, ताकि पुराने सब बीज दग्ध हो जाए ताकि तुम नये बीज बो सको।

खाली पड़े रहने से तुम डरते क्यों हो? ध्यान बीच की खाली अवस्था है। ध्यान, जैसे कोई किसान साल—दो—साल के लिए खेत को खाली छोड़ दे, कुछ भी न बोए, ऐसा ध्यान बीच की अवस्था है; नरक के बीच और स्वर्ग के बीच खाली स्थान है। कुछ दिन के लिए छोड़ दो, कुछ मत बोओ। एक बात ध्यान रखो—गलत करने से न करना बेहतर है। कुछ देर के लिए रुक ही जाओ, कुछ मत करो। जब तक कि ठीक करना न आ जाए, तब तक न करना ही बेहतर है; क्योंकि हर कृत्य, गलत कृत्य, गलत कृत्यों की शृंखला पैदा करता है। उसको ही हम कर्मों का जाल कहते है।

तुम कुछ—न—कुछ किए ही चले जा रहे हो। तुम, बस खाली नहीं बैठ सकते, कुछ—न—कुछ करोगे ही। तुम खाली बैठ जाओ—वही ध्यान है, ताकि पुरानी आदत छूट जाए और उस खाली बैठने में तुम्हें साफ—साफ दिखाई पड़ने लगे। क्योंकि तुम इतने व्यस्त हो कि देखने की फुर्सत और शुविधा नहीं है, समय नहीं है।

ध्यान का इतना ही अर्थ है कि तुम चुप एक घंटा, दो घंटा, तीन घंटा—जितनी देर तुम्हें मिल जाए, खाली बैठ जाओ, कुछ मत करो। सिर्फ देखते रही, ताकि धीरे— धीरे तुम्हारी आंख पैनी और गहरी हो जाए और तुम्हें यह दिखाई पड़ने लगे कि सभी जो हुआ मेरे जीवन में, मैं ही उसका कारण था। यह प्रतीति आते ही व्यर्थ का बोना बंद हो जाएगा। तब एक सार्थक नृत्य पैदा होता है।

धर्म परम आनंद है; वह त्याग की उदासी नहीं, वह अस्तित्व का भोग है। वह महाभोग में सम्मिलित होना है। वह अस्तित्व के नृत्य के साथ एक हो जाना है। धर्म को तुम त्याग और उदासी की भाषा में सोचना ही मत। वह गलत धर्म है, जो त्याग और उदासी की भाषा में सोचता है। सही धर्म हमेशा नृत्य है। वह आनंद का है। सही धर्म हमेशा बजती हुई बांसुरी है।

आत्मा नर्तक है, अंतरात्मा रंगमंच है। और, यह जो नृत्य हो रहा है, यह कहीं बाहर नहीं हो रहा है; यह तुम्हारे भीतर ही चल रहा है। यह संसार रंगमंच नहीं है; तुम्हारी अंतरात्मा ही रंगमंच है। तुम कितना ही सोचो कि तुम बाहर चले गये हो, कोई बाहर जा नहीं सकता जाओगे कैसे बाहर? तुम रहोगे अपने भीतर ही। वहीं सब खेल चल रहा है। सब खेल वहां चलता है, फिर बाहर उसके परिणाम दिखाई पड़ते है। ऐसे जैसे तुम कभी सिनेमागृह में जाते हो, तो पर्दे पर सब खेल दिखाई पड़ता है; लेकिन खेल असल में तुम्हारी पीठ के पीछे प्रोजैक्टर में चलता होता है, पर्दे पर सिर्फ दिखाई पड़ता है। पर्दा असली रंगमंच नहीं है; लेकिन आंखें तुम्हारी पर्दे पर लगी रहती हैं और तुम भूल ही जाओगे— भूल ही जाते हो कि असली चीज पीछे चल रही है। सारा फिल्म का जाल पीछे है, पर्दे पर तो केवल उसका प्रतिफलन है।

अंतरात्मा रंगमंच है। प्रोजैक्टर भीतर है। सब खेल के बीज भीतर से शुरू होते हैं, बाहर तो सिर्फ खबरें सुनाई पडती हैं; प्रतिध्वनिया सुनाई पड़ती हैं। और अगर बाहर दुख है तो जानना कि भीतर तुम गलत फिल्म लिये बैठे हो। और, बाहर तुम जो भी करते हो, गलत हो जाता है तो उसका अर्थ है कि भीतर से तुम जो भी निकालते हो, वह सब गलत है।

पर्दें को बदलने से कुछ भी न होगा। पर्दे को तुम कितना ही लीपो—पोतो, कोई फर्क न पड़ेगा। तुम्हारी फिल्म अगर गलत भीतर से आ रही है तो पर्दा उसी कहानी को दोहराता रहेगा। और, न केवल तुम फिल्म हो, बल्कि की एक टूटे हुए रिकार्ड की भांति हो, जिसमें एक ही लाइन दोहरती जाती है, पुनरुक्ति होती जाती है।

तुमने कभी भीतर अपनी खोपड़ी की जांच—पड़ताल की? —तो तुम पाओगे कि वहां वही—वही चीजें दोहरती रहती हैं—टूटा हुआ रिकार्ड। तुम वही—वहो दोहराते रहते हो। कुछ नया वहां नहीं घटता, और वहां तुम जो भी दोहराते हो, उसके प्रतिफलन चारों तरफ सुनाई पड़ते हैं, चारों तरफ जगत के पर्दे पर उसका प्रतिफलन होता है।

मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन फिल्म देखने गया। पली थी, साथ में उसका बच्चा था… और मुल्ला नसरुद्दीन का बच्चा! कोई ढंग का तो हो नहीं सकता; क्योंकि जब भीतर सब बेढंगा हो तो बाहर भी सब बेढंगा ही आता है। तो वह रो रहा है, चिल्ला रहा है, शोरगुल मचा रहा है। मैनेजर को कम—से—कम सात दफा आना पड़ा कि भाई, आप अपने पैसे वापस ले लें और जाएं या इस बच्चे को चुप रखें। मगर वह काहे को चुप करनेवाला है! बार—बार मैनेजर को आना पड़ा। नसरुद्दीन सुन लेता और चुप बैठा देखता रहा। जब फिल्म की आखीर बिलकुल करीब आने लगी तो उसने अपनी पली से पूछा कि क्या खयाल है, फिल्म ठीक कि गलत? पत्नी ने कहा कि बिलकुल बेकार है। तो उसने कहा. ‘अब देर मत कर। जोर से चहुंटी ले ले लड़के को, ताकि पैसे वापस लें और घर जाएं।

तुम बहुत दिन से देख रहे हो! कई जन्मों से देख रहे हो कि सब गलत है! कब चहुंटी लोगे? खुद को ही लेनी पड़ेगी; यहां कोई दूसरा नहीं है। कब तुम जागोगे और वापस लौटोगे? और क्या जरूरत है इस गलत को देखने की, जो तुम्हें कष्ट से भर रहा है; जो तुम्हें पीड़ा और बोझ दे रहा है; सिवाय संताप के और दुख—स्‍वप्‍नों के जिससे कुछ भी पैदा नहीं होता—इस भवन को तुम छोड़ सकते हो। इस भवन में तुम अपने ही कारण रुके हो। क्यों देर कर रहे हो? अभी मन भरा नहीं? अगर मन न भरा हो तो फिर बुद्ध, महावीर, कृष्ण, शिव, जीसस—इनकी बकवास में क्यों पड़ते हो? अगर मन न भरा हो, तो इनकी बातें मत सुनो; इनसे दूर रहो, उनसे बचो। क्योंकि ये केवल उनके लिए ही सार्थक हैं, जिनका मन भर गया हो और जिन्होंने फिल्म काफी देख ली; जो ऊब गये अब वहां से; जो अब नरक से बेचैन हो गये हैं और एक स्वर्गीय नृत्य की आकांक्षा जिनमें जग गयी है; जिनकी अभीप्सा पर परमात्मा के लिए है।

लेकिन, तुम्हारी मनोदशा ऐसी है कि तुम दो नावों में सवार होना चाहते हो। उसी से तुम्हारा कष्ट और भी बढ़ जाता है। तुम इस. संसार को भी भोगना चाहते हों—चाहे कितना ही दुख हो यहां, लेकिन थोड़ी आशा बनी रहती है कि सुख होगा; बस, अब होने के करीब है। आशा टिकाये रखती है और तुम्हारा अनुभव तुमसे कहता है कि होनेवाला नहीं है; क्योंकि कई दफा तुम यह आशा कर चुके हो, सदा असफल गयी। अनुभव तो बुद्धों के पक्ष में है; आशा बुद्धों के खिलाफ है। और तुम दोनों से भरे हो। और, दो नावें है। तो आशा की नाव पर भी तुम एक पैर रखे रहते हो कि शायद थोड़ी देर और। इस स्‍त्री से सुख नहीं मिला तो शायद दूसरी स्‍त्री से मिल जाये! इस बेटे से सुख नहीं मिला तो दूसरे बेटे से मिल जाए! इस धंधे में सफलता नहीं मिली तो दूसरे धंधे में मिल जाए!

तुम सदा आसपास की चीजें बदलते रहते हो। इस मकान में सुख नहीं तो दूसरे मकान में मिल जाए। यह थोड़ी छोटी है तिजोरी, थोड़ी बड़ी हो जाए तो मिलेगा। तुम कुछ—न—कुछ आसपास बदलते रहते हो—पर्दें में फर्क करते रहते हो। लेकिन, तुम्हारे भीतर की कथा वही है; वही कथा प्रोजैक्ट होती है पर्दे पर।

हर जगह तुम्हें दुख मिलता है। अनुभव तो दुख का है और आशा सुख की है—दो नावें है। बुद्ध, महावीर, कृष्ण को सुनोगे तो वे अनुभव की बात कह रहे है—वे कह रहे है कि उतर आओ आशा की नाव से, अनुभव की नाव पर सवार हो जाओ। तुम सुनते भी हो उनकी, क्योंकि उनको भी तुम इनकार नहीं कर सकते। और, उन्हें देखकर भी तुम्हें भरोसा आता है कि जो हमें नहीं मिला है, लगता है कि इन्हें मिला है; क्योंकि उनकी दौड़ समाप्त हो गयी। लेकिन, भरोसा पूरा भी नहीं आता, क्योंकि पता नहीं धोखा दे रहे हों! कौन जाने, न मिला हो, ऐसे ही कह रहे हों! कौन जाने इन्हें न मिला हो, हमें मिल जाए! ये कहते हैं कि मह खट्टे है; हो सकता है कि न पहुंच पाए हों गट्टों तक और हम पहुंच जाएं!

तो आशा भी छूटती नहीं। अनुभव भी एकदम गलत है, ऐसा कहना कठिन है। इस तरह तुम द्वंद्व में हो। यह द्वंद्व ही तुम्हारी विक्षिप्तता है। और, ये दोनों नावें अलग—अलग यात्रा पर है। तुम एक पर सवार हो जाओ। कोई जल्दी नहीं है—तुम संसार की नाव पर ही पूरे सवार हो जाओ, जल्दी ही तुम ऊब जाओगे। लेकिन, यह बुद्धों की नाव पर तुम्हारा जो पैर है, वह तुम्हें संसार का भी पूरा अनुभव नहीं होने देता। वहां भी तुम आधे—आधे जाते हो; क्योंकि बुद्धों का यह खयाल तुम्हारी आधी टांग को पक्के हुए है। तो, तुम मंदिर भी संभालते हो, दुकान भी संभालते हो—न दुकान संभलती है, न मंदिर संभलता है। ये दोनों साथ—साथ संभल नहीं सकते। तुम पूरी तरह दुकान पर ही चले जाओ। भूल जाओ कि कभी कोई बुद्ध हुआ, कोई महावीर, कोई कृष्ण हुआ है, शिव हुए। भूलो, ये कोई शास्त्र है? सब भूलो! बस, खाता—बही सब कुछ है। एक बार तुम पूरे वहां लग जाओ, तो जल्दी ही तुम वहां से बाहर निकल आओगे। तुम्हारा अनुभव ही तुम्हें कहेगा कि सब व्यर्थ है।

वह भी नहीं हो पाता और बुद्धों की नावों में तुम पूरे सवार नहीं हो पाते; क्योंकि तुम्हारा मन कहे चले जाता है कि अभी जल्दी मत करो, अभी बहुत समय है, और अभी तुम्हारी उम्र ही क्या? ये तो बुढ़ापे की बातें है। जब बिलकुल मरने लगो और एक पैर कब्र में चला जाए, तब तुम दूसरा पैर बुद्ध की नाव पर सवार कर लेना! अभी क्या जल्दी १!

तो, लोग सोचते है कि धर्म बुढ़ापे के लिए है। जब बिलकुल मरने लगेंगे, तब उन्हें गंगा—जल की जरूरत पड़ती है। जब बिलकुल मरने लगेंगे तब कोई उनके कान में नमोकार मंत्र दोहरा दे। मरते वक्त, जब सब व्यर्थ हो गया और जब कोई ऊर्जा न बची, कोई शक्ति न बची यात्रा की, तब तुम यात्रा को तैयार होते हो। नहीं, तुम फिर गिरोगे वापस संसार में! फिर तुम उसी नाव पर सवार होओगे! ऐसा तुम अनंत बार कर चुके हो!