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SHIV SUTRA-03योग के सूत्र: विलय, वितर्क, विवेक


सूत्र;-

''विस्मय योग की भूमिका है। स्वयं में स्थिति ही शक्ति है। वितर्क अर्थात विवेक आत्मज्ञान का साधन है। अस्तित्व का आनंद भोगना समाधि है''।

विस्मय योग की भूमिका है।

इसे थोड़ा समझें।

विस्मय का अर्थ शब्दकोश में दिया है—आश्‍चर्य; पर, आश्‍चर्य और विस्मय में एक बुनियादी भेद है। और वह भेद समझ में न आये तो अलग—अलग यात्राएं शुरू हो जाती है। आश्‍चर्य विज्ञान की भूमिका है, विस्मय योग की; आश्चर्य बहिर्मुखी है, विस्मय अंतर्मुखी; आश्‍चर्य दूसरे के संबंध में होता है, विस्मय स्वयं के संबंध में—स्व बात।

जिसे हम नहीं समझ पाते; जो हमें अवाक कर’ जाता है; जिस पर हमारी बुद्धि की पकड़ नहीं बैठती; जो हमसे बड़ा सिद्ध होता है; जिसके सामने हम अनायास ही किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते है; जो हमें मिटा जाता है—उससे विस्मय पैदा होता है। लेकिन, अगर यह जो विस्मय की दशा भीतर पैदा होती है—अतर्क्य, अचिंत्य के समक्ष खड़े होकर—इस धारा को हम बहिर्मुखी कर दें, तो विज्ञान पैदा होता है। सोचने लगें पदार्थ के संबंध में; विचार करने लगें जगत के संबंध में; खोज करने लगें रहस्य की, जो हमारे चारों ओर है—तो विज्ञान का जन्म होता है।

विज्ञान आश्‍चर्य है। आश्‍चर्य का अर्थ है—विस्मय बाहर की यात्रा पर निकल गया। और आश्‍चर्य और विस्मय में यह भी फर्क है कि जिस चीज के प्रति हम आश्‍चर्यचकित होते है, हम आज नहीं कल उस आश्‍चर्य से परेशान हो जायेंगे; आश्‍चर्य से तनाव पैदा होगा। इसलिए आश्‍चर्य को मिटाने की कोशिश होती है।

विज्ञान आश्‍चर्य से पैदा होता है, फिर आश्‍चर्य को नष्ट करता है; व्याख्या खोजता है, सिद्धांत खोजता है, सूत्र चाबियां खोजता है और तब तक चैन नहीं लेता जब तक कि रहस्य मिट न जाये; जब तक कि ज्ञान हाथ में न आ जाये; जब तक विज्ञान यह न कह सके कि हमने समझ लिया—तब तक चैन नहीं।

विज्ञान जगत से आश्‍चर्य को मिटाने में लगा है। अगर विज्ञान सफल हुआ तो दुनिया में ऐसी कोई चीज न रह जायेगी, जो आदमी न कह सके कि हम जानते है। इसका अर्थ हुआ कि जगत में कोई परमात्मा न बचेगा; क्योंकि परमात्मा का अर्थ ही यह होता है कि जिसे हम जान भी लें तो भी दावा न किया जा सके कि हम जानते है; जो हमारे जानने के बाद भी जानने को शेष रह जाये; जिसे जान—जानकर भी हम चुकता न कर पायें; जिसके विस्मय को अंत करने का कोई उपाय नहीं।

एक तो ऐसी वस्तुएं हैं, जिन्हें हमने जान लिया—उन्हें हम ‘ज्ञात’ कहें; कुछ ऐसी वस्तुएं हैं, जिन्हें हमने जाना नहीं लेकिन हम जान लेंगे—उन्हें हम ‘अज्ञय’ कहें; और कुछ ऐसा भी है इस जगत में, जिसे हमने जाना भी नहीं है और हम जान भी न पायेंगे—उसे हम ‘ अज्ञेय ‘ कहें। परमात्मा अज्ञेय है। वह तीसरा तत्व है। विज्ञान इसलिए परमात्मा को स्वीकार नहीं करता; क्योंकि विज्ञान कहता है कि ऐसा कुछ भी नहीं है, जो न जाना जा सके। नहीं जाना होगा हमने अभी तक, हमारे प्रयास कमजोर हैं; लेकिन आज नहीं कल, केवल समय की बात है, हम जान लेंगे। एक दिन जगत पूरा का पूरा जान लिया जायेगा; इसमें अनजाना कुछ भी न बचेगा।

विज्ञान आश्‍चर्य से पैदा होता है और फिर आश्‍चर्य की हत्या में लग जाता है। इसलिए, विज्ञान को मैं ‘पितृघाती’ कहता हूं जिससे पैदा होता है, उसे मिटाने में लग जाता है। धर्म बिलकुल विपरीत है। धर्म भी एक आश्‍चर्य— भाव से पैदा होता है; इस आश्‍चर्य—भाव को शिवसूत्र में विस्मय कहा है। फर्क इतना ही है कि जब किसी स्थिति में आश्‍चर्य से भर जाता है धार्मिक खोजी, तो वह बाहर की यात्रा पर नहीं जाता, वह भीतर की यात्रा पर जाता है। जब भी कोई रहस्य उसे घेर लेता है तो वह सोचता है कि मैं जानूं कि मैं कौन हूं। रहस्य अंतर्मुखी बन जाये; यात्रा, खोज भीतर चलने लगे, पदार्थ की तरफ नहीं, स्व की तरफ मेरी खोज उसुख हो जायें; मेरा संधान पहले उसे जानने में लग जाये कि मैं कौन हूं—तो विस्मय।

और, दूसरी बात समझ लेनी जरूरी है कि विस्मय कभी चुकता नही; जितना ही हम जानते हैं, उतना ही बढ़ता है। इसलिए विस्मय एक विरोधाभास है; क्योंकि जानने से विस्मय नष्ट होना चाहिए। लेकिन, बुद्ध या कृष्ण या शिव या जीसस—उनका विस्मय नष्ट नहीं होता। जिस दिन वे परम ज्ञान को उपलब्ध होते हैं, उस दिन उनका विस्मय भी परम होता है। उस दिन वे ऐसा नहीं कहते कि हमने सब जान लिया; उस दिन वे ऐसा कहते हैं कि सब जानकर भी, सब जानने को शेष रह गया।

उपनिषदों ने कहा है कि पूर्ण से पूर्ण निकाल लिया जाये, तो भी पीछे पूर्ण शेष रह जाता है। सब जान लिया जाए, तो भी सब जानने को शेष रह जाता है। इसलिए, धार्मिक ज्ञान अहंकार का जन्म नहीं बनता; वैज्ञानिक ज्ञान अहंकार का जन्म बनेगा। धार्मिक ज्ञान में तुम जाननेवाले कभी भी न बनोगे; तुम सदा विनम्र रहोगे। और, जितना तुम जानते जाओगे, उतनी ही तुम्हें प्रतीति होगी कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूं। परम ज्ञान के क्षण में तुम कह सकोगे कि मेरा कोई भी ज्ञान नहीं। परम ज्ञान के क्षण में यह पूरा अस्तित्व विस्मय हो जायेगा।

वितान अगर सफल हो तो सारा जगत ज्ञात हो जायेगा; धर्म अगर सफल हो तो सारा जगत अज्ञात हो जायेगा। वितान अगर सफल हो तो तुम, जाननेवाले, अस्मिता से भर जाओगे और सारा जगत साधारण हो जायेगा; क्योंकि जहां विस्मय नहीं है, वहां सब साधारण हो जाता है; जहां रहस्‍य नहीं है, वहां सारी आत्मा खो जाती है; जहां रहस्‍य का और उपाय नहीं है, वहां आगे की यात्रा बंद हो जाती है; जहां जिज्ञासा पूरी हो गयी, कुतूहल समाप्त हो गया। अगर विज्ञान जीता तो जगत में ऐसी ऊब पैदा होगी, जैसी ऊब कभी भी पैदा नहीं हुई थी। इसलिए, अगर पश्‍चिम में लोग ज्यादा ऊब से भरे हैं, बोरडम से भरे हैं, तो उसका मौलिक कारण विज्ञान है; क्योंकि लोगों की विस्मय— क्षमता घटती जा रही है। लोग किसी भी चीज से चकित नहीं होते; चकित होना ही भूल गये हैं। अगर तुम उनके सामने कुछ ऐसा सवाल भी रखो, जो उलझानेवाला है, तो भी वे कहेंगे कि सुलझ जायेगा। क्योंकि लोगों की विस्मय— क्षमता घटती जा रही है। लोग किसी भी चीज से चकित नहीं होते; चकित होना ही भूल गये हैं। अगर तुम उनके सामने कुछ ऐसा सवाल भी रखो, जो उलझानेवाला है, तो भी वे कहेंगे कि सुलझ जायेगा। क्योंकि, मौलिक रूप से ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, विज्ञान की दृष्टि में, जो अज्ञात सदा के लिए रह जाए हम पर्दे उघाड़ ही लेंगे।

लेकिन, धर्म की यात्रा बड़ी उलटी है। जितने हम पर्दे उघाडते है, पाते हैं कि रहस्‍य उतना सघन होता जाता है; जितने हम करीब आते हैं, उतना ही पता चलता है कि जानना बहुत मुश्किल है। और, जिस दिन हम परमात्‍मा के ठीक केंद्र में प्रवेश कर जाते हैं; उस दिन सभी कुछ रहस्यपूर्ण हो जाता है। बुद्ध के लिए आकाश के तारे ही रहस्यपूर्ण नहीं है, जमीन पर पड़े कंकड—पत्थर भी आश्‍चर्यपूर्ण हो गये हैं; बुद्ध के लिए यह विराट ही रहस्यमय नहीं है, क्षुद्र से क्षुद्र घटना भी रहस्यपूर्ण हो गयी है। एक बीज का जमीन से अंकुरित होना भी उतना ही रहस्यपूर्ण है, जितना इस पूरी सृष्टि का जन्म।

तो, जैसे—जैसे विस्मय घना होगा, वैसे—वैसे तुम्हारी आंखें छोटे बच्चे की तरह होती जायेंगी; क्योंकि छोटे बच्चे के लिए सभी कुछ विस्मय होता है। छोटे बच्चे को चलते देखो। वह रास्ते से जा रहा है, हर चीज उसे चौंकाती है। एक रंगीन पत्थर उसे कोहिनूर मालूम होता है। तुम हंसते हो, क्योंकि तुम ज्ञाता हो; तुम जानते हो कि यह रंगीन पत्थर है। तुम कहते हो—पागल मत हो, यह कोहिनूर नहीं है। लेकिन छोटा बच्चा उस पत्थर को खीसे में रखना चाहता है। तुम कहोगे: ‘वजन मत ढोओ। और, गंदा पत्थर है, कीचड़ में पड़ा है; फेंक इसे।’ लेकिन बच्चा इसे पकड़ता है। क्योंकि, तुम बच्चे को नहीं समझ पा रहे हो, यह बच्चे के लिए विस्मय है; यह रंगीन पत्थर किसी कोहिनूर से कम कीमती ‘नहीं है। कीमत विस्मय की है, पत्थरों की थोड़ी ही कोई कीमत होती है। एक तितली भी उसे इतना सम्मोहित कर लेती है, जितना परमात्मा भी तुम्हें मिल जाए तो इतना सम्मोहित नहीं करेगा। वह तितली के पीछे दौड़ना शुरू कर देता है।

एक छोटे बच्चे की जैसी निर्मल दशा है, ऐसे विस्मय की परम स्थिति में—बुद्धत्व की स्थिति में—किसी भी व्यक्ति की हो जाती है। इसलिए, जीसस ने कहा है कि जो छोटे बच्चों की तरह सरल होंगे, वे ही केवल मेरे प्रभु के राज्य में प्रवेश कर सकेंगे। जीसस ने वही कहा है, जो शिव सूत्र में कह रहे हैं. विस्मय योग भूमिका:। विस्मय योग का प्रथम चरण है। तब तो बहुत बातें खयाल में लेनी जरूरी हैं।

तुम्हारे पास जितना ज्ञान होगा, उतनी ही योग की भूमिका मुश्किल हो जायेगी। तुम्हें जितना दंभ होगा कि मैं जानता हूं उतना ही तुम योगी न हो पाओगे। जितने शास्त्र तुम्हारे चित्त पर भारी होंगे, उतना ही तुम्हारा विस्मय नष्ट हो गया। एक पंडित को पूछो, परमात्मा के संबंध में, तो वह ऐसे उत्तर देता है, जैसे परमात्मा कोई उत्तर देने की बात हो; जैसे कि कोई उत्तर दिया जा सकता हो। पंडित को पूछो, उसके पास उत्तर रेडीमेड हैं। तुमने पूछा भी नहीं था, उसके पास उत्तर तैयार था। परमात्मा भी उसे अवाक नहीं करता। उसके पास सूत्र सब निश्‍चित हैं, वह तो तत्क्षण समझा देता है।

लेकिन, बुद्ध के पास जाओ, पूछो परमात्मा के संबंध में, बुद्ध चुप रह जाते है। शायद तुम यही सोचकर लौट आओ कि बहुत से पंडित बुद्ध के पास से यही सोचकर लौट गये कि यह आदमी चुप रह गया! इसका मतलब है, इसे पता नहीं है। और, यह आदमी इसलिए चुप रह गया कि विस्मय तो द्वार है। तुम अगर थोड़े समझदार होते तो तुम रुक गये होते इस आदमी के पास, जिसने उत्तर नहीं दिया। और, तुमने इस आदमी को समझने की कोशिश की होती; इसकी आंखों में झांका होता; इसके सत्संग में, इसकी सन्निधि में तुम रहे होते; क्योंकि इसे कुछ स्वाद मिल गया है और वह स्वाद इतना बड़ा है कि शब्द उसे कह नहीं सकते और इसे कोई ऐसा दर्शन हुआ है, जो उत्तर नहीं बनाया जा सकता।

प्रश्‍न और उत्तर स्कूली बच्चों की बातें हैं। तुम्हारा प्रश्‍न ही बेहूदा है। परमात्मा के संबंध में कोई प्रश्‍न नहीं पूछ सकता। विराट के संबंध में कोई प्रश्‍न कैसे पूछा जा सकता है! विराट के संबंध में तो प्रश्‍न—उत्तर दोनों गिर जाते हैं। तुम्हारा प्रश्‍न क्षुद्र है। इसलिए, बुद्ध चुप रह गये हैं। लेकिन, तुम शायद यह सोचकर लौटोगे कि इस आदमी को पता होता तो जवाब देता। इसने जवाब नहीं दिया, इसे पता नहीं है। तुम पंडित को पहचानते हो; क्योंकि तुम्हारा सिर भी शब्दों से भरा है। तुम ज्ञानी को न पहचान पाओगे; क्योंकि ज्ञानी विस्मय से भरा है। और तुम्हारा विस्मय नष्ट हो गया है।

जगत में बड़ी—से—बड़ी दुर्घटना है और वह है कि विस्मय का नष्ट हो जाना। जिस दिन तुम्हारा विस्मय नष्ट होता है, उसी दिन तुम्हारे छुटकारे का उपाय नष्ट हो गया। जिस दिन तुम्हारा विस्मय नष्ट हुआ, उसी दिन तुम्हारा बाल—हृदय मर गया, जड़ हो गया, तुम बूढ़े हो गये। क्या अब भी तुम चौकते हो? क्या जीवन तुम्हें प्रश्‍न बनता है? क्या चारों तरफ से पक्षियों की आवाजें, झरनों का शोरगुल, हवाओं का वृक्षों से गुजरना, तुम्हारे लिए किसी पुलक से भर जाता है? तुम आह्लादित हो जाते हो? तुम जीवन को चारों तरफ देखकर अवाक होते हो? नहीं; क्योंकि तुम्हें सब यह पता है कि यह पक्षियों की आवाज है, यह शोरगुल है हवाओं का वृक्षों में—तुम्हारे पास हर चीज के उत्तर है। उत्तरों ने तुम्हें मार डाला है। तुम ज्ञान के पहले ज्ञानी हो गये हो।

विस्मय योग भूमिका:। जो व्यक्ति योग में प्रवेश करना चाहे, विस्मय उसके लिए द्वार है। अपने बचपन को वापस लौटाओ। फिर से पूछो, फिर से कुतूहल करो, फिर से जिज्ञासा जगाओ—तो तुम्हारे भीतर जहां—जहां जीवन के स्रोत सूख गये हैं, फिर हरे हो जायेंगे; जहां—जहां पत्थर अड़ गये है, वहां—वहां वह झरना फिर प्रगट हो जायेगा। तुम फिर से आंख खोलो और चारों तरफ देखो। सब उत्तर झूठे हैं। क्योंकि सब तुम्हारे उत्तर उधार हैं। तुमने खुद कुछ भी नहीं जाना है। लेकिन, तुम उधार ज्ञान से ऐसे भर गये हो कि तुम्हें प्रतीति होती है कि मैंने जान लिया।

विस्मय को जगाओ। तुम्हारे आसन, प्राणायाम से कुछ भी न होगा, जब तक विस्मय न जग जाए। क्योंकि आसन, प्राणायाम सब शरीर के हैं। ठीक है, शरीर—शुद्धि होगी, शरीर स्वस्थ होगा; लेकिन शरीर की शइद्ध और शरीर का स्वास्थ्य तुम्हें कोई परमात्मा से न मिला देगा।

विस्मय मन की शुद्धि है। विस्मय का अर्थ है—मन सभी उत्तरों से मुक्त हो गया। विस्मय का अर्थ है—तुमने हटा दिया उत्तरों का कचरा; तुम्हारा प्रश्‍न फिर नया और ताजा हो गया और तुमने अपने अज्ञान को समझा।

विस्मय का अर्थ है—मुझे पता नहीं; पांडित्य का अर्थ है—मुझे पता है। जितना तुम्हें पता है, उतने ही तुम गलत हो। जब तुम सरल भाव से कहते हो—मुझे कुछ भी पता नहीं है, सारा जगत अज्ञान है। जो भी मुझे पता है वह भी कामचलाऊ है; मैंने अभी कुछ भी नहीं जाना है—ऐसी प्रतीति जैसे ही तुम्हारे हृदय में जितनी गहरी बैठ जायेगी, तुमने योग का पहला कदम उठाया। फिर दूसरे कदम आसान हैं। लेकिन अगर पहला कदम ही चूक जाये, तो फिर तुम कितनी ही यात्रा करो, उससे कुछ हल नहीं होता। क्योंकि, जिसका पहला कदम गलत पड़ा वह मंजिल पर नहीं पहुंच सकेगा। पहला कदम जिसका सही है, उसकी आधी यात्रा पूरी हो गयी। और, विस्मय पहला कदम है।

थोड़ा गौर से देखो। तुम्हारे पास ज्ञान है? तुम भी थोड़े गौर से देखोगे तो तुम समझ लोगे कि ज्ञान नहीं है; सब कचरा है, इकट्ठा कर लिया है—शाख से, गुरुओं से, संतों से और उसे तुम बहुमूल्य थाती की तरह संजोये बैठे हो। उसने तुम्हें कुछ भी नहीं दिया, सिर्फ तुम्हारे विस्मय की हत्या कर दी। तुम्हारा विस्मय तड़प रहा है, मरा हुआ पडा है; अब तुम चौकते नहीं। अब तुम्हें कोई भी चीज चौंकाती नहीं।

एक ईसाई फकीर हुआ—इकहार्ट। उसने एक बड़ी अनूठी बात कही है। उसने कहा है: संत वही है, जिसे हर चीज चौका दे; हर चीज, छोटी—छोटी घटनायें जिसे चौका देती हैं। पानी में पत्थर गिरता है, आवाज होती है, लहरें उठता हैं—संत को चौका देती हैं। यह इतना विस्मयपूर्ण है, इतना रहस्यपूर्ण है। संत श्वास लेता है, जीता है—यह भी काफी चौकानेवाला है।

इकहार्ट रोज सुबह की प्रार्थना में परमात्मा को कहता था, ‘आज फिर सुबह हुई। आज फिर सूरज उगा। तेरी लीला अपार है। न उगता तो क्या करते? क्या उपाय था? आदमी बेबस है।’

इकहार्ट कहता था, ‘ आज सांस आती है, कल न आए, क्या करूंगा?’

तुम सांस ले तो न सकोगे। सांस तुम्हारे बस में तो नहीं है। इतने पास है श्वास, फिर भी तुम उसके मालिक नहीं हो। गयी बाहर और न लौटी, तो नहीं लौटोगी। इतने पास जो है, उसके भी हम ज्ञाता और मालिक नहीं हैं। और, खयाल हमें यह है कि हम सब कुछ जानते है। तुम्हारे सब जानने ने ही तुम्हें मारा है। इस कचरे को हटा दो और हलके हो जाओ। तत्‍क्षण, तुम्हारी आंखें जब ज्ञान से न भरी होंगी, तब रहस्य से भर जायेंगी। उस रहस्य की अंतर्यात्रा का नाम विस्मय है, बहिर्यात्रा का नाम आश्‍चर्य है।

अगर उस रहस्य को तुमने पदार्थों पर लगा दिया, तो तुम एक वैज्ञानिक हो जाओगे। अगर उस रहस्‍य को तुमने स्वयं की सत्ता पर लगा दिया तो तुम एक महायोगी हो जाओगे। और, दोनों के परिणाम भिन्न होंगे। क्योंकि, आश्‍चर्य हिंसात्मक है; विस्मय अहिंसात्मक है। आश्‍चर्य जिस तरफ लग जाता है, उसे तोड्ने लगता है, विश्लेषण करता है; क्योंकि आश्‍चर्य में एक बेचैनी है, विस्मय में एक रस है।

इस फर्क को भी ठीक से समझ लो। शब्दकोश में वह नहीं लिखा हुआ है, लिखा भी नहीं जा सकता; क्योंकि शब्दकोश बनानेवाले को कोई विस्मय पता भी नहीं है।

आश्‍चर्य हिंसात्मक है, आक्रमक है। तुम जिस चीज के प्रति आश्‍चर्य से भरते हो, एक तनाव पैदा हो जाता है। उस तनाव को हल करना ही पड़ेगा। जब तक वह जिज्ञासा पूरी न हो जायेगी; जब तक तुम जान न लोगे, तब तक एक बेचैनी तुम्हारे सिर पर सवार रहेगी। वह जो वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में लगा रहता है, अट्ठारह—अट्ठारह घंटे, वह किस लिए लगा है? एक बेचैनी है; जैसे एक भूत प्रेत ने उसे पकड़ लिया है। और, जब तक वह उसको हल न कर लेगा, तब तक वह लगा ही रहेगा।

लेकिन, विस्मय आक्रमक नहीं है और विस्मय एक बेचैनी नहीं है; बल्कि विस्मय एक विश्राम है। जब कोई व्यक्ति विस्मय से भरता है तो एकदम विश्राम से भर जाता है। विस्मय को मिटाना नहीं है, विस्मय को पीना है विस्मय का स्वाद लेना है। विस्मय में लीन हो जाना है, एक हो जाना है। आश्‍चर्य मिटाने में लग जाता है; विस्मय जीने में लग जाता है। विस्मय जीवन की एक शैली है; आश्‍चर्य मनुष्य का एक हिंसात्मक रूप है।

इसलिए विज्ञान विजय की भाषा में सोचता है—तोड़ो, फोड़ो, जीतो। धर्म समर्पण की भाषा में सोचता है—अपने को खो दो। जब तुम्हारे भीतर विस्मय का प्रवेश होगा, तो विस्मय तुममें इस तरह लीन हो जायेगा, जैसे तुम ने नमक की डली पानी में डाल दी और सारा पानी खारा हो जाये। जिस दिन तुम विस्मय से भरोगे उस दिन तुम विस्मय से खारे हो जाओगे। रोआं—रोआं विस्मय से भर जायेगा। उठोगे तो विस्मय, बैठोगे तो विस्मय। तुम सदा चौंके रहोगे। हर चीज रहस्यपूर्ण हो जायेगी। खतम भी विराट का हिस्सा हो जायेगा। क्योंकि जब छ में भी विस्मय जुड़ जाता है, तो छ भी विराट हो जाता है। तब जाना हुआ कुछ भी नहीं है, सभी तरफ रहस्‍य तुम्हें घेरे हुए है। तब प्रतिपल नया हो रहा है और प्रतिपल निमंत्रण दे रहा है। विस्मय एक आमंत्रण है।

मुल्ला नसरुद्दीन एक चुनाव में खड़ा हो गया था, तो मत मांगने घर—घर गया। गांव में जो चर्च का पादरी था, उसके द्वार पर भी गया। जब मत मांगने गया था, तब भी उसके मुंह से शराब की बास आ रही थी। पादरी भला आदमी था। सीधे—सीधे कहना अशिष्टता होगी। तो, उसने नसरुद्दीन से कहा, ‘मुझे तुमसे एक बात पूछनी है। अगर संतोषजनक उत्तर दिया तो मेरा मत, मेरा वोट तुम्हारे लिए है। क्या तुम कभी शराब पीते हो?’ पूछने का इसमें कुछ भी नहीं था, शराब वह पिये ही हुये था। नसरुद्दीन चौका और उसने कहा कि इसके पहले मैं जवाब दूं एक सवाल मुझे भी पूछना है, ‘यह जांच—पड़ताल है या आमंत्रण? इज दिस ऐन इंक्वायरी आर ऐन इन्वीटेशन?’

आश्‍चर्य जांच—पड़ताल है; विस्मय आमंत्रण है। विस्मय एक भीतरी बुलावा है। और, जैसे—जैसे तुम भीतर प्रवेश करते हो, वैसे—वैसे डूबते चले जाते हो। एक दिन ऐसा आयेगा कि तुम न बचोगे और विस्मय ही बचेगा। उस दिन परम ज्ञान घट गया। अगर तुमने आश्‍चर्य किया तो एक दिन ऐसा आयेगा कि तुम ही बचोगे और आश्‍चर्य न बचेगा। यह विज्ञान की निष्पत्ति है। अहंकार बचेगा और आश्‍चर्य नष्ट हो जायेगा। अगर विस्मय की यात्रा पर गये तो तुम नष्ट हो जाओगे, विस्मय बचेगा; रोआं—रोआं उसी स्वाद से भर जाएगा। तुम्हारा होना ही विस्मयपूर्ण होगा। इसे शिव ने भूमिका कहा है योग की।

ज्ञान को हटाओ। विस्मय से भरो। और अब कठिन लगेगा, शुरू में, क्योंकि तुम्हें खयाल है कि तुम सब जानते हो।

डी.एच. लारेंस, एक बड़ा विचारक—कीमती, मूल्यवान विचारक—हुआ। एक छोटे बच्चे के साथ बगीचे में घूम रहा था। उस छोटे बच्चे ने पूछा, ‘‘व्हाई दि ट्रीज आर मीन? वृक्ष हरे क्यों है?”

छोटे बच्चे ही ऐसे सवाल पूछ सकते हैं—इतने ताजे सवाल। तुम तो यह सवाल ही नहीं सोच सकते। तुम कहोगे कि वृक्ष हरे, हरे है, इसमें पूछना क्या है! यह कोई सवाल है! यह बच्चा छू है। लेकिन तुम फिर से सोचो कि वृक्ष हरे क्यों है। तुम्हें सच में उत्तर पता है? शायद तुम में कोई विज्ञान का विद्यार्थी हो तो वह कहेगा—क्लोरोफिल के कारण। मगर इससे कोई बच्चे के प्रश्‍न का हल तो नहीं होता। बच्चा पूछेगा कि वृक्ष में क्लोरोफिल क्यों है? आखिर क्लोरोफिल को वृक्ष में होने की क्या जरूरत है? और, आदमी में क्यों नहीं है? और, क्लोरोफिल कैसे वृक्षों को खोजता रहता है? ‘क्यों’ का कोई सवाल क्लोरोफिल से हल नहीं होता।

विज्ञान जो भी जवाब देता है, सब ऐसे ही हैं। उससे प्रश्‍न सिर्फ एक सीढ़ी पीछे हट जाता है, बस। अगर तुम जरा समझदार हो तो प्रश्‍न फिर उठा सकते हो। विज्ञान के पास ‘क्यों’ का कोई उत्तर नहीं है। इसलिए विज्ञान विस्मय को नष्ट नहीं कर सकता, सिर्फ भ्रम पैदा करता है नष्ट करने का।

लेकिन डी.एच लारेंस कोई वैज्ञानिक नहीं था; कवि था, एक उपन्यासकार था। उसके पास संचेतना थी। सौंदर्य की। वह खड़ा हो गया। वह सोचने लगा। उसने बच्चे से कहा कि मौका दो; क्योंकि मुझे खुद ही पता नहीं

तुम्हारे बच्चे ने भी तुमसे कई बार ऐसे सवाल किये होंगे। तुमने कभी कहा कि मुझे पता नहीं है। उससे अहंकार को चोट लगेगी। हर बाप सोचता है कि उसे पता है। बच्चा पूछता है, बाप जवाब देता है। इन्हीं जवाबों के कारण बाप प्रतिष्ठा खोता है बाद में; क्योंकि बच्चे को एक—न—एक दिन पता चल जाता है कि पता तुम्हें कुछ भी न था। तुम नाहक ही जवाब देते रहे। जैसा अज्ञानी मैं हूं वैसे ही तुम हो। तुम्हारी उम्र ज्यादा थी, तुम्हारा अज्ञान जरा पुराना था। बस, इतनी ही बात थी। लेकिन छोटे बच्चे को तुम जवाब दे देते हो। छोटा बच्चा भरोसा करता है। वह मान लेता है कि ठीक है, होगा। कितने दिन तक मानेगा?

डी.एच. लारेंस खड़ा हो गया। उसने कहा कि मैं सोचूंगा और अगर तुम ज्यादा ही जिद करो तो मैं इतना ही कह सकता हूं कि वृक्ष हरे हैं, क्योंकि हरे हैं। इसमें कोई और उत्तर नहीं है। मैं खुद ही इसी रहस्य से भरा हुआ हूं।

अगर तुम आंख से थोड़े ज्ञान का पर्दा थोड़ा हटाओगे तो तुम पाओगे कि चारों तरफ रहस्य खड़ा हुआ है। हरे वृक्ष हरे है, यह भी रहस्यपूर्ण है। वृक्षों में लाल फूल लग रहे हैं, यह भी रहस्यपूर्ण है। एक छोटे—से बीज में इतने—इतने विराटकाय वृक्ष छिपे हैं, यह भी रहस्यपूर्ण है। एक बीज को तुम संभाल कर रखे रहो, सैंकडों—हजारों सालों के बाद बोओ, वृक्ष प्रगट हो जाता है। जीवन शाश्वत मालूम होता है। हर घड़ी रहस्य से भरी है। पर, तुमने जैसे अपनी आंखें बंद कर ली हैं। तुम निश्‍चित हो गये हो। निश्‍चितता तुम्हारी जड़ता है।

तुम झिझकते भी नहीं। इसमें कुछ कारण हैं। क्योंकि इससे अहंकार को आश्वासन मिला रहता है कि मैं जानता हूं। मैं जानता हूं तो एक सुरक्षा बनी है। मैं नहीं जानता तो सब सुरक्षा खो जाती है। पता तुम्हें कुछ भी नहीं है। लेकिन यह बात पीड़ा देती है मुझे कुछ भी पता नहीं है। इसलिए तुम कुछ भी पकड़ लेते हो। तिनके को पकड़ लेता है डूबता हुआ आदमी, तिनके के सहारे ले लेता है। यह तुम जो पक्के हो, यह तिनका भी नहीं है। तिनके से शायद कभी कोई बच भी जाए, पर तुमने जो पक्का है, वह तिनका भी नहीं; वह तो सिर्फ सपना है, सिर्फ कोरे शब्द हैं।

एक आदमी पका मानकर बैठा है कि उसे ईश्वर का पता है। यह बात ही बेहूदी है कि कोई आदमी कहे कि मुझे पका पता है।’पके’ का मतलब होता है कि तुम ईश्वर के रहस्य को भी खोज लिये।’पके’ का अर्थ होता है कि तुम उसके भी आर—पार गुजर गये, उसे भी नाप—जोख लिया।’पके’ का अर्थ होता है कि वह भी माप लिया गया। तुमने तोल लिया तराजू पर, जांच—पड़ताल कर ली प्रयोगशाला में। पके का क्या अर्थ होता है?

एक दूसरा आदमी है, जिसको पका पता है कि ईश्वर नहीं है। ये दोनों मूढ़ हैं और दोनों की बीमारी एक है। एक अपने को आस्तिक कहता है, एक नास्तिक; और दोनों में जरा भी फर्क नहीं है। गहरे में दोनों की बीमारी एक है। दोनों मानते है कि हमें पता है और दोनों में विवाद खड़ा होता है।

ज्ञान से विवाद पैदा होता है; विस्मय से संवाद होता है। जब तुम विस्मय से भरोगे तो तुम्हारे जीवन में एक संवाद आयेगा। महावीर के पास कोई जाता और कहता: ‘ईश्वर है?’ तो वे कहते: ‘है।’ कोई नास्तिक जाता और कहता कि ईश्वर नहीं है तो वे कहते कि नहीं है। कोई दोनों को न माननेवाला अज्ञेयवादी (ऐग्रास्टिक) पहुंच जाता, तो महावीर उससे कहते कि है भी और नहीं भी।

बड़ी कठिन बात हो गयी। क्योंकि हम चाहेंगे—उत्तर साफ दो, सीधे दो; चाहे गलत हों, लेकिन साफ चाहिए। और ध्यान रखें, यह जगत इतना जटिल है कि यहां साफ उत्तर गलत ही होंगे। यहां जो उत्तर विरोधाभासी नहीं है, वह गलत होगा। यहां जो उत्तर अपने से विपरीत को भी समा लेता है, वही सही होगा; क्योंकि जगत अपने से विपरीत को समाये हुए है।

यहां जन्म भी है और मृत्यु भी है। यहां साफ—सुथरा रास्ता नहीं है। यहां अंधेरा भी है और प्रकाश भी है। यहां शुभ भी है और अशुभ भी है। यहां दोनों साथ—साथ जी रहे हैं। यहां पापी और पुण्यात्मा अलग—अलग नहीं हैं, दोनों साथ जी रहे है। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है। परमात्मा दोनों को अपने में समाये हुए है। अस्तित्व बड़ा है। कोई तर्क की कसौटी पर कटा हुआ नहीं है, अतर्क्य है। वहां दोनों एक—दूसरे में मिले हुए हैं।

ऐसा हुआ कि जुन्नैद ने एक रात प्रार्थना की परमात्मा से कि मैं जानना चाहता हूं कि इस गांव में ऐसा कोई आदमी है, जो महापापी हो; क्योंकि उसको देखकर, उसको समझकर में पाप से बचने की कोशिश करूंगा। मेरे पास मापदंड हो जायेगा कि यह महापापी है, इस जीवन से बचना है। आवाज आयी कि तेरा पडोसी। हैरान हुआ जुन्नैद। उसने कभी सोचा भी न था कि उसका पड़ोसी और महापापी! साधारण आदमी था, काम— धंधा करता था, दुकान चलाता था; ‘महापापी’ का तो उसने सोचा भी न था। उसका तो खयाल था कि महापापी होगा कोई रावण, महापापी कोई होगा कोई दुष्ट, शैतान। यह आदमी दुकान चलाता है, बाल—बच्चे पालता है। बड़ी उलझन में पड़ गया। यह तो साधारण आदमी था। इसको तो महापापी कोई भी न कहेगा।

दूसरी रात, उसने फिर प्रार्थना की कि ठीक; तू जो कहे, ठीक; अब मुझे एक और मापदंड चाहिए कि इस गांव में जो सबसे बड़ा महात्मा हो, पुण्यात्मा हो, उसकी मुझे खबर दे। परमात्मा ने कहा कि वही आदमी, वह जो तेरे पड़ोस में है। जुन्नैद ने कहा, ‘तू मुझे मुश्किल में डाल रहा है, मै वैसे ही काफी मुश्किल में हूं। दिनभर उस आदमी को देखता रहा, ऐसा कुछ महापाप नहीं देखा। अब और झंझट खड़ी हो गयी कि पुण्यात्मा भी वही है।’

तो आवाज आयी कि मेरी दुनिया में दोनों जुड़े है। सिर्फ, बुद्धि तोड़कर चीजों को देखती है। यहां बड़े—से—बड़े संत के पीछे भी छाया पड़ती है। यहां बड़े—से—बड़े पापी के चेहरे पर भी रोशनी है। इसलिए तो यह संभव होता है कि पापी चाहे तो संत. हो जाये, संत चाहे तो पापी हो जाये। इतनी आसानी से बदलाहट इसीलिए तो संभव है कि दोनों छिपे है एक में ही।

अंधेरा और उजाला अलग—अलग नहीं है; रात और दिन जुड़े है। तर्क तोड़ता है और साफ रास्ते बनाता है। तर्क ऐसे है जैसे तुमने एक छोटा—सा बगीचा बना लिया हो साफ—सुथरा, कटा—पिटा। जीवन जंगल की तरह है। वहां कुछ साफ—सुथरा नहीं है। वहां सब चीजें एक दूसरे से उलझी है।

जो जीवन को समझने चला है, उसे साफ कटे—कटाय उत्तरों से बचने की क्षमता चाहिए। उनको पकड़ लेने में सुरक्षा है; क्योंकि तुम्हें आश्वासन हो जाता है कि ठीक मुझे पता है। जैसे ही तुम्हें लगता है कि मुझे पता है, तुम्हारी हिम्मत आ जाती है, जिंदगी में चलने में भरोसा आ जाता है। इसलिए, तुम डरते हो ज्ञान छोड़ने से। इसलिए बड़ी पीड़ा होती है। तुमसे कोई धन छीन ले, इतनी मुसीबत नहीं, फिर कमा लेंगे। और धन तो मिट्टी थी—तुम जानते ही थे। तुमसे कोई पद छीन ले, कोई बड़ी चिंता की बात नहीं; तुम खुद भी त्याग सकते हो। लेकिन ज्ञान……!

इधर मैं देखता हूं एक अनूठी घटना घटती है। एक आदमी समाज छोड़ देता है, गांव छोड़ देता है, घर छोड़ देता है, पली—परिवार छोड़ देता है; लेकिन अगर वह जैन था तो हिमालय पर भी जैन रहता है; हिंदू था तो हिंदू रहता है; मुसलमान था तो मुसलमान रहता है। जिस समाज को यह छोड्कर भाग आया, उसी ने यह मुसलमान होना दिया था; उसी ने यह ज्ञान दिया था कि तुम मुसलमान हो; यह कुरान सच्ची किताब है, सब किताबें बाकी गलत हैं। सबको छोड़ आया, लेकिन ज्ञान को बचाकर आ जाता है हिमालय पर भी। कुछ भी नहीं बदला, इस आदमी की जिंदगी में; क्योंकि ज्ञान का भरोसा इसे यहां भी है।

ज्ञान तुम छोड़ दो, तो जहां तुम खड़े हो, वहीं हिमालय आ जाएगा। हिमालय का अर्थ ही इतना है कि जहां सब रहस्यपूर्ण है; जहां उतुंग शिखर हैं, जिन्हें तुम छू न सकोगे और जहां अनंत खाइयां हैं, जिनमें तुम उतर न सकोगे; जो हमारे सभी पैमानों से बड़ा है।

विस्मय का अर्थ है: जहां तुम्हारी बुद्धि व्यर्थ हो जाती है; जहां तुम्हारा अहंकार असमर्थ हो जाता है; जहां तुम एकदम असहाय हो जाते हो; तुम रो सकते हो वहां, हंस सकते हो वहां, लेकिन बोल नहीं सकते।

कहा जाता है कि मूसा जब सिनाई के पर्वत पर गये तो रोये भी, हंसे भी, पर बोले नहीं। पीछे जब लौटकर उनके शिष्यों ने पूछा कि यह क्या हुआ, परमात्मा सामने मौजूद था और परमात्मा ने खुद कहा, ‘मोजिज! जूते बाहर उतारकर आ; क्योंकि यह पवित्र भूमि है। यहां मैं मौजूद हूं।’ तो तुमने जूते उतारे। तुम रोये भी, हंसे भी, तुम बोले, क्यों नहीं? यह मौका क्यों छोड़ दिया? जो भी पूछने जैसा था, पूछ लेना था। एक कुंजी तो मांग लेनी थी, जिससे सभी ताले खुल जाते हैं।

मोजिज ने कहा, ‘जब वह सामने था, तब बुद्धि खो गयी; तब हृदय ही बचा। खुशी में रोया भी, खुशी में हंसा भी।’

और, यह मजा है जिंदगी का कि खुशी