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भज गोविन्दम् मूढ़मते।-9


संसार–एक पाठशाला—(प्रवचन—आठवां)

प्रश्न-सार

।–कृपया शंकर की संन्यास की घटना पर कुछ प्रकाश डालें।

2—मेरी प्रार्थना है कि आप मेरे घर पधारें, लेकिन इसी वेश में, क्योंकि मैं महामूढ़ हूं।

3—साधना के द्वारा ग्रंथि-विसर्जन के लिए हम क्या करें?

4—क्या संभव है कि आदमी का चित्त एक नवजात शिशु के चित्त की भांति हो जाए?

5—’गंगा-यात्रा से कुछ न होगा’ और ‘गंगाजल की एक बूंद भी पीने से आदमी मृत्युंजय हो जाता है’–इस पर प्रकाश डालें।

6—सत्य गुरु-प्रसाद से मिलता है तो क्यों अहंकार के प्रयास को भी बढ़ावा देते हैं।

7—जागे तो क्या?

पहला प्रश्न:

शंकर जब छोटे थे, तब मां ने उन्हें संन्यास लेने की अनुमति न दी। परंतु एक दिन नदी में स्नान करते समय शंकर को मगरमच्छ ने पकड़ लिया। शंकर ने मरने से पहले मां से संन्यास लेने की अनुमति मांगी। अनुमति मिली और शंकर बच गए! कृपया इस घटना पर कुछ प्रकाश डालें।

घटना का कोई मूल्य नहीं है। घटना हुई भी हो, ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन जो अर्थ है, वह समझने जैसा है। और इसे सदा स्मरण रखना कि बुद्धपुरुषों के जीवन में जो घटनाएं हैं, वे घटनाएं कम हैं, प्रतीक ज्यादा हैं; उनमें छिपा कुछ राज है। वे ऐतिहासिक हों, न हों–आध्यात्मिक हैं। समय की धारा में वैसा घटा हो, न घटा हो, लेकिन चैतन्य की धारा में वैसा घटता है।

बुद्धपुरुषों को इतिहास के माध्यम से मत समझना; काव्य, अनुभव के माध्यम से समझना। अन्यथा बड़ी जड़ता पैदा होती है। यही छोटी सी बोध-कथा है।

‘शंकर छोटे थे, तब मां ने उन्हें संन्यास लेने की अनुमति न दी।’

बहुत सी बातें छिपी हैं। मां यानी ममता, मां यानी मोह। मोह और संन्यास लेने की आज्ञा दे, अति कठिन है। क्योंकि संन्यास का अर्थ तो मोह की मृत्यु होगी। संन्यास का अर्थ ही यह है कि व्यक्ति परिवार से मुक्त हो रहा है–मां अब मां न होगी, पिता अब पिता न होंगे, भाई अब भाई न होंगे। इसलिए तो जीसस ने बार-बार कहा है, जो मेरे साथ चलना चाहता हो, उसे अपनी मां को, अपने पिता को इनकार करना होगा; जो मेरे साथ चलना चाहता हो, उसे अपने परिवार का परित्याग करना होगा। यदि तुम परिवार को न छोड़ सको, तो जीसस के परिवार के हिस्से नहीं बन सकते।

संन्यास का अर्थ है कि यह जो जन्म और मृत्यु के बीच में घिरा हुआ जीवन है, यह व्यर्थ है। अगर जीवन ही व्यर्थ है, तो जिस मां ने जन्म दिया, वह तो व्यर्थ हो गई। उसने तो जीवन को जन्म दिया ही नहीं, एक सपने को विस्तार दिया। तो संन्यास तो मूलतः जीवन से मुक्ति है। और जीवन की मुक्ति का अर्थ हुआ–मां से मुक्ति, पिता से मुक्ति, परिवार से मुक्ति, समाज से मुक्ति। यह सब व्यर्थ हुआ। तो मां तो कैसे आज्ञा दे! संन्यास की आज्ञा और मां दे–असंभव है; अति कठिन है। मोह से तो संन्यास की आज्ञा नहीं मिल सकती; ममता से आज्ञा नहीं मिल सकती। जीवन जहां से आया है, उसी स्रोत से, तुम जीवन से मुक्त होना चाहो, इसकी आज्ञा मांगो–असंभव है।

‘शंकर छोटे थे, तभी मां ने उन्हें संन्यास लेने की अनुमति न दी।’

और ध्यान रखना, चाहे तुम कितने ही बड़े हो जाओ, मां के लिए छोटे ही रहोगे। मां से तो बड़े न हो पाओगे। जिसने तुम्हें जन्म दिया, उससे तो तुम छोटे ही रहोगे। तुम सत्तर साल के हो जाओ, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। शंकर छोटे थे, इसका कुल अर्थ इतना ही है कि जब भी किसी संन्यास की आकांक्षा से भरे खोजी ने मां से आज्ञा मांगी, तभी मां को लगा–छोटा बच्चा, और ऐसे दूभर मार्ग पर जाना चाहता है! मां ने रोकना चाहा है।

‘शंकर छोटे थे, तभी मां ने उन्हें संन्यास लेने की अनुमति न दी। परंतु एक दिन नदी में स्नान करते समय शंकर को मगरमच्छ ने पकड़ लिया।’

लेकिन जीवन की नदी में आज नहीं कल, दुख पकड़ता है। जीवन की नदी में ही मिलन होता है मृत्यु से भी। तुम कोई मृत्यु को मिलने नहीं जाते हो नदी। तुम तो स्नान करने गए थे; तुम तो तैरने का सुख लेने गए थे; तुम तो सुबह की ताजगी लूटने गए थे। कोई संसार में मरने को थोड़े ही जाता है? कोई जीवन की धार में मगरमच्छों से मिलने थोड़े ही जाता है? जाता तो सुख की तलाश में है; खजानों की खोज में है; सफलता, यश, प्रतिष्ठा, महिमा के लिए है। लेकिन पकड़ा जाता है मगरमच्छों से। आज नहीं कल, मौत पकड़ती है। और जितना बोधवान व्यक्ति होगा, उतने जल्दी यह स्मरण आता है कि यह नदी तो ऊपर-ऊपर है, भीतर मौत छिपी है। मगरमच्छ यानी भीतर छिपी मौत। ऊपर से जल की ऐसी पवित्र धार मालूम होती है, भीतर मौत प्रतीक्षा कर रही है। ऊपर से कितना लुभावना लगता है और नदी कैसी भोली-भाली लगती है। और भीतर मौत दांव लगाए बैठी है! जो जितना होशियार है, जितना बुद्धिमान है, जितना चैतन्यपूर्ण है, उतने जल्दी ही दिखाई पड़ जाएगा।

शंकर को बहुत जल्दी दिखाई पड़ गया। तुम्हें अगर देर तक दिखाई न पड़े, तो समझना कि बुद्धिमत्ता क्षीण है, बहुत बोध नहीं है; मिट्टी की पर्तें जमी हैं तुम्हारे दर्पण पर और तुम्हारी बुद्धि धुएं से भरी है। अन्यथा जल्दी ही दिख जाएगा। शंकर को दिख गया कि इस जीवन में तो मौत के सिवाय कुछ मिलेगा नहीं। इतनी ही बात है कथा में। और जब तक मौत ही स्पष्ट न हो जाए, तब तक ममता से छुटकारा नहीं होता, तब तक मां से छुटकारा नहीं है।

इसे थोड़ा समझो। एक तरफ मां है, मां यानी जन्म; दूसरी तरफ मौत है, मौन यानी अंत। अगर मौत दिख जाए तो ही मां से छुटकारा है; अंत दिख जाए तो ही जन्म व्यर्थ होता है।

तो संन्यास का अर्थ है–मौत का दर्शन, मृत्यु की प्रतीति।

संसार में तो हम मौत को टाले जाते हैं। हम कहे चले जाते हैं, सदा दूसरा मरता है, मैं तो कभी मरता नहीं। रोज ही तुम देखते हो–किसी की अरथी उठ गई, किसी का जनाजा उठ गया; कोई कब्रिस्तान चले गए, कोई मरघट चले गए। तुम सभी को पहुंचा आते हो मरघट, तुम तो कभी नहीं जाते। तुमको दूसरे पहुंचाएंगे। तुम्हें तो कभी पता ही न चलेगा कि तुम भी जाते हो; क्योंकि जब तक तुम जा सकते हो, तब तक तो तुम जाओगे नहीं। जब तुम न जा सकोगे, तभी दूसरे तुम्हें पहुंचाएंगे। इसलिए प्रत्येक को ऐसा लगता है, मौत सदा दूसरे की घटती है–हम तो जीते हैं, दूसरे मरते हैं। ऐसे ही झूठे आसरों पर आदमी जीए चला जाता है!

संन्यास का अर्थ है, इस बोध का जग जाना कि मृत्यु मेरी है। और कोई भी मरता हो, हर बार जब कोई मरता है तो मेरे ही मरने की खबर बार-बार आती है। हर एक की मृत्यु में मेरी ही मृत्यु की सूचना है, इंगित है, इशारा है। और हर एक की मौत में थोड़ा मैं मरता हूं। अगर तुम्हें समझ हो, तो हर एक की मौत तुम्हारी मौत हो जाएगी। अगर नासमझी हो, तो तुम्हारा दंभ और अकड़ जाएगा कि सदा दूसरे मरते हैं, मैं तो कभी नहीं मरता, मैं अमर हूं।

शंकर को दिखाई पड़ा कि मौत है। मौत के दिखाई पड़ते ही मां से छुटकारा हो जाता है। क्योंकि मां यानी जीवन, मां यानी जिसने उतारा। मौत यानी जो ले जाएगी।

इसलिए हिंदुओं ने एक बड़ी अनूठी कल्पना की है। हिंदुओं से ज्यादा कल्पनाशील, काव्यात्मक कोई जाति पृथ्वी पर नहीं है। उनके काव्य बड़े गहरे हैं। तुमने कभी देखी काली की प्रतिमा? वह मां भी है और मौत भी। काल मृत्यु का नाम है, इसलिए काली; और मां भी है, इसलिए नारी। सुंदर है, मां जैसी सुंदर है। मां जैसा सुंदर तो फिर कोई भी नहीं हो सकता। अपनी तो मां कुरूप भी हो तो भी सुंदर मालूम होती है। मां के संबंध में तो कोई सौंदर्य का विचार ही नहीं करता। मां तो सुंदर होती ही है। क्योंकि अपनी मां को कुरूप देखने का अर्थ तो अपने को ही कुरूप देखना होगा, क्योंकि तुम उसी के विस्तार हो। तो काली सुंदर है, सुंदरतम है। लेकिन फिर भी गले में नरमुंडों की माला है! सुंदर है, पर काली है–काल, मौत!

पश्चिम के विचारक जब इस प्रतीक पर सोचते हैं, तो वे बड़े चकित होते हैं कि स्त्री को इतना विकराल क्यों चित्रित किया है! और तुम उसे मां भी कहते हो! और इतना विकराल!

इतना विकराल इसलिए कि जिससे जन्म मिला है, उसी से मृत्यु की शुरुआत भी हुई। विकराल इसलिए कि जन्म के साथ ही मौत भी आ गई है। तो मां ने जन्म ही नहीं दिया, मौत भी दी है। तो एक तरफ वह सुंदर है मां की तरह, स्रोत की तरह। और एक तरफ अंत की तरह, काल की तरह अत्यंत काली है। गले में नरमुंडों की माला है, हाथ में कटा हुआ सिर है, खून टपक रहा है, पैरों के नीचे अपने ही पति को दबाए खड़ी है।

स्त्री के ये दो रूप–कि वह जीवन भी है और मृत्यु भी–बड़ा गहरा प्रतीक है। क्योंकि जहां से जीवन आएगा, वहीं से मृत्यु भी आएगी; वे दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। और जैसा हिंदुओं ने इस बात को पहचाना, पृथ्वी पर कोई भी नहीं पहचान सका।

शंकर को जब मृत्यु का बोध हुआ…मगरमच्छ ने नदी में पकड़ा हो या न पकड़ा हो, यह नासमझ इतिहासविदों से पूछो, इसमें मुझे कोई बहुत रस नहीं है। क्या लेना-देना, पकड़ा हो मगरमच्छ ने तो, न पकड़ा हो तो! लेकिन मौत दिख गई उन्हें, इतना पक्का है। और जब मौत दिख गई, तभी संन्यास घट गया। जब मौत दिख गई, तो फिर संन्यास बच ही नहीं सकता। फिर तुम जैसे हो, जहां हो, वहीं ठगे खड़े रह जाओगे। फिर जीवन वही नहीं हो सकता, जो इसके क्षण भर पहले तक था। वह पुरानी दौड़, वह महत्वाकांक्षा, वह यश, कीर्ति का नशा–वह सब टूट गया, मौत सब गिरा देगी। मरना है, फिर कितनी देर बाद मरना है, इससे क्या फर्क पड़ता है! आज कि कल कि परसों–यह तो समय का हिसाब है। अगर मौत होनी है तो हो गई, अभी हो गई। और उस मौत का तीर इस तरह चुभ जाएगा कि फिर तुम वही न हो सकोगे, जो अब तक थे। यह जो नये का होना है, उसी का नाम संन्यास है।

अगर तुम मुझसे पूछो कि संन्यास की क्या परिभाषा है? तो मैं कहूंगा: संन्यास वैसे जीवन की दशा है, जब बाहर तो मौत नहीं घटी, लेकिन भीतर घट गई। जीते हो, लेकिन मौत को जानते हुए जीते हो। यही संन्यास है। जीते हो, लेकिन मौत को भूलते नहीं क्षण भर को। यही संन्यास है। जानते हो कि क्षण भर के लिए टिकी है ओस–अभी गिरी, अभी गिरी। जगत तरैया भोर की–अभी डूबी, अभी डूबी। जीते हो, लेकिन जीने के नशे में नहीं डूबते। जीने का नशा अब तुम्हें डुबा नहीं सकता। जागे रहते हो, होश बना रहता है।

मौत जगाती है। जो जाग गया, वही संन्यासी है। जो जीवन में खोया है और सपनों को सच मान रहा है, वही गृहस्थ है। सपने में जिसका घर है, वह गृहस्थ; या घरों में जो सपने सजा रहा है। सपनों के बाहर जो उठ आया, तंद्रा टूटी, बेहोशी गई, जाग कर देखा कि यहां तो सिवाय मौत के और कुछ भी नहीं है। जिसे हम बस्ती कहते हैं, वह बस मरघट है, प्रतीक्षा करने वालों का क्यू है। किसी का वक्त आ गया, कोई क्यू में थोड़ा पीछे खड़ा है। क्यू सरक रहा है, मरघट की तरफ जा रहा है। जिसको यह दिखाई पड़ गया, उसके जीवन से आसक्ति खो जाती है। वही आसक्ति का खो जाना संन्यास है।

संन्यास विरक्ति की चेष्टा नहीं है, संन्यास विरक्ति का अनुशासन नहीं है, संन्यास आसक्ति का टूट जाना है। बस जहां आसक्ति खो गई। अनासक्ति का साधना संन्यास नहीं है, ध्यान रखना। क्योंकि आसक्ति न टूटी हो तो ही अनासक्ति साधनी पड़ती है। आसक्ति टूट गई हो तो अनासक्ति साधनी नहीं पड़ती। आसक्ति की जगह जो खाली जगह छूट जाती है, वही अनासक्ति है; वह अभाव है। तब तुम संन्यस्त हो।

इसीलिए मैं तुमसे कहता हूं, संन्यास के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं। तुम जहां हो, वहीं थोड़ा होश आ जाए; बस थोड़ा दीया जल जाए भीतर का; चीजें जैसी हैं, वैसी दिखाई पड़ने लगें–नशे की आंख से नहीं, खुली आंख से।

एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन चला आ रहा है रात शराबघर से। नशे में है, गीत गुनगुना रहा है। एक आदमी रास्ते पर टकरा गया। अंधेरा, नशे में, गीत गुनगुनाता, होश नहीं–क्रोध में बोला कि उल्लू के पट्ठे, पांच सेकेंड के भीतर क्षमा मांग, नहीं तो…

उधर से बड़ी कड़कड़ाती आवाज आई कि नहीं तो? तो क्या करेगा अगर पांच सेकेंड में क्षमा न मांगूं?

कड़कड़ाती आवाज ने जरा होश वापस लौटाया, गौर से देखा: आदमी कम, मोहम्मद अली मालूम होता है! घूंसेबाज! घबड़ा गया, होश उतरा, जमीन पर वापस आया। कहा, बड़े मियां, अगर पांच सेकेंड कम पड़ते हों, तो कितना समय चाहिए आपको?

जिंदगी में जैसे तुम चल रहे हो–नशे में हो, सपनों का गीत गुनगुना रहे हो–चीजें जैसी हैं, वैसी दिखाई नहीं पड़तीं। धक्का लगना चाहिए, एक कड़कड़ाती आवाज आनी चाहिए, चोट कि सब बिखर जाए, एक क्षण को उस चोट में बादल छितर-बितर हो जाएं और तुम्हें खाली आकाश दिखाई पड़े। तब तुम सिवाय मौत से घिरे हुए अपने को और कुछ न पाओगे। जिसको तुमने जिंदगी जाना, वह मौत का चेहरा है। जिसको तुमने सुख जाना, वह दुख के मुखौटे हैं। जिनको तुमने धन जाना, वह कौड़ियों के साथ झूठ का खेल है। उस धन की भ्रांति में तुम निर्धन बने रहे। और उस जीवन की भ्रांति में तुम असली जीवन से परिचित न हो पाए। और समय हाथ से बीता चला जाता है; प्रतिपल जीवन चुकता जाता है, शक्ति क्षीण होती चली जाती है।

यह तो प्रतीक है केवल कि शंकर को जब मौत ने पकड़ लिया, तो मरने के पहले मां से संन्यास लेने की अनुमति मांगी। अनुमति मिली।

तभी अनुमति मिल सकती है, जब मौत का संकट द्वार पर खड़ा हो जाए। उसके पहले अनुमति मिल भी नहीं सकती। जब मां को भी ऐसा लगे कि या तो बेटा बचेगा तो संन्यासी होकर बचेगा, या जैसा है वैसा तो मर ही जाएगा। मरे बेटे में और संन्यासी बेटे में चुनने का सवाल हो, तो ही मां संन्यासी बेटे को चुनेगी–इतना ही अर्थ है। क्योंकि संन्यासी बेटा मरा हुआ बेटा है।

संन्यास का अर्थ है: आदमी जीते जी मर गया।

जीसस ने कहा है: जब तक तुम अपनी सूली को अपने कंधे पर ढोने को राजी न होओ, मेरे साथ न चल सकोगे; जब तक तुम अपने को ही इनकार करने को राजी न होओ, मेरे साथ न चल सकोगे; जब तक तुम मरने को राजी नहीं हो, तब तक पुनरुज्जीवन का कोई उपाय नहीं है।

अगर ऐसी कहानी सच में घटी हो, तो वह प्रतीक याद करने जैसा है–कि शंकर, छोटा सा बच्चा, नवजात, मौत के चंगुल में फंसा है, मगर ने पकड़ा हुआ है उसका पैर, नदी के तट पर मां खड़ी है और शंकर पूछते हैं कि मैं मर रहा हूं, बचने का अब कोई उपाय नहीं है, तू आज्ञा दे दे! अब तो आज्ञा दे दे कि मैं संन्यस्त हो जाऊं, मरूं संन्यासी की तरह! अब कोई जीने का तो उपाय नहीं रहा कि संन्यासी की तरह जी सकूंगा, मगर ने पकड़ा है–यह गया, यह गया–अब तो आज्ञा दे दे!

तब भी तुम सोचना, मां झिझकी होगी। तब भी आशा ने पंख फैलाए होंगे। तब भी उसे लगा होगा: कौन जाने, बच ही जाए! लेकिन मौत सामने थी। शंकर खिंचा जा रहा है। भीड़ इकट्ठी हो गई होगी। लोग भी कहने लगे होंगे: अब आज्ञा दे दे, अब मरते को क्या बांधना! जो जा ही रहा है, जाने के पहले उसे छोड़ दे! फिर उसकी पुकार को सुन कि वह संन्यस्त मरना चाहता है, ताकि फिर जन्म न हो, ताकि जीवन की आसक्ति न रह जाए। वह जीवन को छोड़ कर मरना चाहता है। जो जीवन हाथ से जा ही रहा है, उसे छोड़ने की आज्ञा दे दे!

फिर भी मुझे लगता है, मां झिझकी होगी; आंखें आंसुओं से भर गई होंगी। उसने भगवान से प्रार्थना की होगी कि बचा दो मेरे बेटे को। लेकिन जब कोई उपाय न पाया होगा, तब उसने कहा होगा, अच्छा–बेमन से, असहाय अवस्था में–कि ठीक, अब तुम मर ही रहे हो, तो ठीक है, संन्यस्त होकर मर जाओ।

मगर यह घटना घटी नहीं है, क्योंकि मगरमच्छ इन बातों की चिंता नहीं करते। आदमी नहीं करते चिंता, मगरमच्छ क्या करेंगे! कहते हैं, शंकर बच गए। मगरमच्छ ने देखा कि अब संन्यासी हो गया, अब क्या मारना! नहीं, मगरमच्छ इतने बुद्धिमान नहीं। हिटलर-मुसोलिनी नहीं हैं, तो मगरमच्छों की क्या बात करनी!

नहीं लेकिन, प्रतीक बड़ा बहुमूल्य है: व्यक्ति बचता तभी है जब संन्यस्त हो जाता है, फिर मौत भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाती। मरता वही है, जो जीवन को पकड़ता है; जो जीवन को अपने हाथ ही छोड़ देता है, उसे मौत भी कैसे मार पाएगी? जो देने को ही राजी हो गया है, उससे छीनोगे कैसे? जो बचाना चाहता है, उससे ही छीना जा सकता है।

इसलिए जीसस कहते हैं: जो बचाएगा, वह खो देगा; जो खोने को राजी है, उसने बचा लिया।

इस सार की बात को समझ लेना–शंकर बच गए। मगरमच्छ ने छोड़ा?

नहीं, इतनी ही खबर है कि मौत संन्यासी को नहीं मार पाती। संन्यासी को मारने का उपाय नहीं है। क्योंकि संन्यासी कहता है: मैं–जिसे तुम मार सकते थे, छोड़ ही दिया उसे। उस अहंकार को, उस आकांक्षा-अभीप्सा के जाल को, उस सपनों के फैलाव को छोड़ ही दिया मैंने। मैं खुद ही मर गया हूं अपने हाथ से। तब भीतर जो अमृत बचा है–जो घिरा था मृत्यु से–वही शुद्ध होकर बचता है ।

जब तक तुम जीवन को पकड़ रहे हो, तब तक तुम्हें अपने अमृत की कोई खबर नहीं है। इसीलिए तो जीवन को इतनी जोर से पकड़े हो कि कहीं छूट न जाए; डर है कि कहीं मर न जाओ। फिर भी डर तो लगा ही रहता है। जितना पकड़ते हो, उतने ही पैर कंपते हैं। क्योंकि जानते तो तुम हो, कैसे झुठलाओगे, कि मौत आ रही है। कितना ही समझाओ–कैसे समझाओगे? मौत आ रही है। कितना ही आंखें बचाओ, कितना ही छिपाओ–छिपोगे कहां? जाओगे कहां? मौत सब तरफ से आ रही है। कोई एक दिशा होती तो दूसरी दिशा में बच जाते–मौत सभी दिशाओं से आ रही है, दिग-दिगंत से आ रही है। और अगर बाहर से आती होती, तो भी बच जाते; भीतर से आ रही है। कहीं भी भाग जाओ, मौत आएगी ही; कहीं भी छिप जाओ, मौत खोज ही लेगी; क्योंकि मौत तुम्हारे भीतर ही छिपी है।

अमृत भी तुम्हारे भीतर छिपा है, मौत भी तुम्हारे भीतर छिपी है। और जब तक तुम जीवन को बाहर पकड़ोगे, तब तक तुम्हें भीतर की सिर्फ मौत दिखाई पड़ेगी; जिस दिन तुम भीतर की मौत को स्वीकार कर लोगे, उसी क्षण तुम्हें भीतर के जीवन के दर्शन शुरू हो जाएंगे।

ध्यान रहे, जैसे काले तख्ते पर हम सफेद खड़िया से लिखते हैं और अक्षर साफ दिखाई पड़ते हैं। अगर हम सफेद दीवाल पर लिखें तो नहीं दिखाई पड़ते। अगर तुमने भीतर की मौत को स्वीकार कर लिया, तो उस कालिमा में ही, वह जो अमृत का छोटा सा दीया तुम्हारे भीतर जल रहा है, वह हजार गुनी रोशनी में चमकने लगेगा।

लेकिन तुम मौत को स्वीकार नहीं करते, तुम काले तख्ते को स्वीकार नहीं करते, इसलिए सफेद अक्षर दिखाई नहीं पड़ते। तुम काले तख्ते को देखने से डरते हो, इसलिए सफेद अक्षर दिखाई नहीं पड़ते। इस विरोधाभासी वक्तव्य को हृदय में सम्हाल कर रख लेना। जिसने भी मौत को भर आंख देखा, उसे अमृत दिखाई पड़ गया।

‘शंकर बच गए।’

क्योंकि मौत तुम्हें मिटा ही नहीं सकती। तुम जिसे जीवन कहते हो, उसे मिटा सकती है। तुम जिसे शरीर कहते हो, उसे मिटा सकती है। तुम जिसे नाम-रूप कहते हो, उसे मिटा सकती है। तुम्हें मिटाने का मौत के पास कोई उपाय नहीं; तुम अमृत-पुत्र हो! तुम न कभी मिटे, न कभी मिटाए जा सकते हो। न तुम कभी पैदा हुए और न तुम कभी मरोगे। जो पैदा हुआ है, वह मरेगा। तुम्हारी देह पैदा हुई है, वह गुजरेगी। तुम्हारा नाम, तुम्हारा व्यक्तित्व पैदा हुआ है, वह मरेगा। लेकिन तुम नाम-रूप से अतीत सदा काल में थे, सदा काल में रहोगे। तुम सनातन हो, तुम शाश्वत हो।

संन्यास का इतना ही अर्थ है कि जो मिटेगा, हम उसे स्वयं छोड़ देते हैं; और उस खोज में निकलते हैं जो नहीं मिटेगा। क्षणभंगुर को छोड़ते हैं, शाश्वत की तरफ आंख उठाते हैं। अगर स्वयं का भी मिटना इसमें हो जाए, तो भी स्वीकार है; क्योंकि जो क्षणभंगुर है, उसे बचा कर भी कौन बचा पाया है, जाने ही दो। अगर जाने के बाद कुछ बच जाएगा–इस कूड़े-करकट के जाने के बाद अगर कुछ बच रहेगा–जिसको त्याग कर भी त्यागा न जा सके, छोड़ कर भी छोड़ा न जा सके; नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि–जिसे शस्त्र छेदें और छेद न पाएं; जिसे आग जलाए और जला न पाए–अगर कुछ ऐसा बचेगा–सब जलाने के बाद, सब शस्त्रों के छिद जाने के बाद, तो बस वही बचाने योग्य था। संन्यास उसकी ही खोज है।

इस घटना को तुम घटना मत समझना; यह बड़ा बहुमूल्य बोध-प्रतीक है; यह एक बोध-कथा है।

दूसरा प्रश्न:

साईंबाबा नारायण स्वामी के घर कुत्ता और कोढ़ी के वेश में गए थे और नारायण उन्हें पहचानने से रह गए। मेरी प्रार्थना है कि आप मेरे घर पधारें, लेकिन इसी वेश में, क्योंकि मैं महामूढ़ हूं।

अगर तुम मुझे पहचान गए हो, तो फिर किसी भी वेश में पहचान लोगे। और अगर तुम मुझे पहचाने ही नहीं, तो इसी वेश में पहचान पाओगे, इसका कोई पक्का कारण है? यदि तुम मुझे पहचान गए हो–मुझे–वेश को ही नहीं पहचाना, तो फिर वेश का आग्रह नहीं करना चाहिए। वेश को अगर पहचाना है और मुझे अगर नहीं पहचाना है, तो वेश को ही तुम्हारे घर भी ले आऊंगा, तब भी तुम वेश को ही पहचानोगे। फिर से सोच लो निमंत्रण के संबंध में, क्योंकि मैं बहुत से घरों में इसी वेश में गया हूं और वे नहीं पहचाने। वेश को पहचानने से कुछ पहचान हो भी नहीं सकती।

अगर नारायण स्वामी साईंबाबा को नहीं पहचान पाए कुत्ते और कोढ़ी में, तो इसीलिए कि वे साईंबाबा को पहचान ही नहीं पाए थे। वेश की पहचान कोई पहचान है? वेश के सामने झुकना कोई झुकना है? वेश की पूजा कोई पूजा है? अगर साईंबाबा इसी वेश में गए होते, जिस वेश में नारायण स्वामी को भ्रांति थी कि वे पहचानते हैं, तो निश्चित ही वे झुके होते, भोग लगाया होता, आदर-सत्कार किया होता। लेकिन क्या वह आदर-सत्कार साईंबाबा को मिला होता या वेश को ही मिला होता? वेश को ही मिला होता।

अब बड़े आश्चर्य की बात है कि वेश से तो कुत्ता भी ज्यादा जीवंत है; और वेश से तो कोढ़ी भी ज्यादा जीवंत है। वेश तो बाहर का आवरण है। आवरण की पकड़ छोड़ो।

लेकिन मैं जानता हूं, आवरण की पकड़ क्यों है। आवरण की पकड़ इसलिए है कि तुम स्वयं को भी अपने वेश के कारण ही पहचानते हो।

मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन हज की यात्रा पर गया, तो साथ में दो आदमी और थे–एक नाई था साथ में और एक गंजे सिर का गंवार था। रात रेगिस्तान में रुके। खतरा था, अनजान जगह थी, तो तय किया कि एक-एक आदमी जाग कर पहरा देता रहे। पहली ही चिट नाई के नाम निकली, तो नाई एक तिहाई रात जागा। लेकिन उसे नींद आने लगी, थका-मांदा। तो उसने सोचा, क्या करूं? कुछ और तो उसे आता नहीं, नाई का धंधा आता था, तो उसने मुल्ला नसरुद्दीन का सिर मूंड़ दिया। बैठे-बैठे करे क्या? रेगिस्तान में कोई दूसरा काम भी न दिखा। सोचा इसमें लग जाऊं तो नींद भी न आएगी, काम भी रहेगा और जागा भी रहूंगा। उसने सिर मूंड़ दिया। नंबर दो पर मुल्ला नसरुद्दीन का रात का पहरा था। जब उसका समय आया तो नाई ने उसे उठाया कि उठो मुल्ला! उसने अपनी आदतवश सिर पर हाथ फेरा। उसने कहा, भाई, तुमने दिखता है कि उस गंजे मूरख को जगा दिया मेरी जगह।

सिर घुटा हुआ पाया, वह तो गंजे मूरख का था। अपने सिर पर तो सदा उसने बाल पाए थे।

हमारी अपनी पहचान भी वेश की ही है। तुमने कभी खयाल किया, अगर तुम्हारी शक्ल रात सोते में बदल दी जाए, तो सुबह तुम पहचान पाओगे कि तुम्हीं हो? नहीं पहचान पाओगे। कैसे पहचानोगे? क्योंकि अपनी भी पहचान तो दर्पण में ही देख कर है, और तो कोई पहचान नहीं है; उससे गहरी तो कोई पहचान नहीं है। अगर सुबह तुम पाओ कि रात जब तुम सोए थे, तुम एक गोरे आदमी थे, सुबह उठ कर पाओ कि तुम नीग्रो हो गए–अगर कोई वैज्ञानिक प्लास्टिक सर्जरी कर दे रात की निद्रा में, तुम्हारी नाक का ढंग बदल दे, आंख का रंग बदल दे, बाल बदल दे–सुबह जब तुम दर्पण के सामने खड़े होओगे तो तुम भी उसी अवस्था में होओगे जो मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा। उसने एकदम गलत नहीं कहा है। वह गलत बातें कहता ही नहीं। वह बड़ी सूझ की बातें कहता है। वह कहता है कि भाई, तुमने गलती से उस गंजे मूरख को जगा दिया मेरी जगह। तुम भी यही पाओगे, चीख कर बाहर आ जाओगे कि क्या हो गया? यह मैं कोई और मालूम होता हूं!

हमारी पहचान अपने से वेश की है। इसलिए हम दूसरे से भी जो पहचान बनाते हैं, वह भी वेश की बनाते हैं। जब तक तुम अपने चैतन्य को न पहचानोगे, तब तक तुम मेरे चैतन्य को भी न पहचान सकोगे। तुम्हारी पहचान मेरे संबंध में उतनी ही गहरी होगी, जितनी तुम्हारी पहचान अपने संबंध में गहरी होती है। मैं तो तुम्हारे घर आ जाऊं, लेकिन उससे कुछ सार न होगा। जब तक तुम्हीं तुम्हारे घर न आए, तब तक मेरे तुम्हारे घर आने से कुछ भी नहीं हो सकता।

तीसरा प्रशन:

आपने कल ततैया की कहानी में मन के अवरोध के संबंध में बताया। साधना के द्वारा ग्रंथि-विसर्जन के लिए हम क्या करें, कृपया बताएं।

महामति, ततैया की कहानी भी समझ में न आई!

ततैया की कहानी में यही बताया था–कि न कोई ग्रंथि थी, न कोई अवरोध था; किताब पढ़ ली थी। ततैया के जीवन में कोई अवरोध नहीं था, जिसको साधना से दूर करना था; ततैया की तकलीफ केवल इतनी थी कि पढ़ने में कुशल हो गई थी और किताब में पढ़ लिया था कि ततैया के पंख छोटे हैं और शरीर भारी है, इसलिए ततैया उड़ नहीं सकती।

अब यह जिन नासमझों ने लिखा हो, उन्होंने भला गणित का हिसाब बिठा लिया हो, लेकिन उन्होंने भी यह नहीं देखा कि ततैया उड़ती ही है। उड़ नहीं सकती, इस बात का क्या मतलब है? कोई ततैया तर्क से उड़ती है?

ततैया भी किताब पढ़ कर घबड़ा गई। उसकी दशा वैसी ही हुई, जैसी एक बहुत पुरानी कहानी है कि एक शतपदी, सौ पैरों वाला जानवर राह से गुजर रहा है। एक खरगोश बड़ा हैरान हुआ, बड़ी जिज्ञासा से भर गया कि सौ पैर! कौन सा पहले उठाता होगा? फिर कौन सा पीछे उठाता होगा? और सौ का हिसाब रखना, और फिर चलना भी! यह तो बड़ा जीता-जागता गणित है! उसने कहा, रुको भई, एक सवाल का जवाब दे दो। सौ पैर! इनमें तुम कौन सा पहले उठाते हो? और डगमगाते भी नहीं! लड़खड़ाते भी नहीं! ऐसा भी नहीं कि चार-दस इकट्ठे उठा दिए और गड़बड़ा गए और गिर गए। और सौ पैर का मामला! तुम कौन सा पहले उठाते हो? कौन सा पीछे उठाते हो? क्या तुम्हारा क्रम है? गणित क्या है इसका?

तब तक शतपदी ने भी कभी सोचा नहीं था। चलता रहा था, सोचा किसने। जन्म से, जब से होश पाया था, चल ही रहा था; कभी सवाल उठा ही न था। उसने भी कहा कि यह तो बड़ा सवाल उठा दिया। उसने नीचे झांक कर देखा, खुद भी घबड़ा गया–सौ पैर! संख्या भी नहीं आती इतनी तो उसको। उसने कहा, भई, अभी तक मैंने सोचा नहीं। अब तुमने सवाल उठा दिया तो मैं सोचूंगा, परीक्षण करूंगा, निरीक्षण करूंगा और देख कर तुम्हें जल्दी ही खबर दूंगा।

लेकिन फिर वह चल न सका। वह एक कदम चला और खड़बड़ा कर गिर गया। सौ पैर सम्हालने का मामला आ गया था! जान छोटी, सौ पैर! बुद्धि छोटी और सौ पैर! उतना बड़ा हिसाब न लगा सका, वह वहीं खड़बड़ा कर गिर पड़ा। उसने कहा, नासमझ खरगोश, तूने मेरी मुसीबत कर दी। अब मैं कभी भी न चल सकूंगा; क्योंकि यह सवाल मेरा पीछा करेगा। अब तक मैं चलता था।

तुमने कभी खयाल किया: जिन चीजों को भी तुम चिंतना बना लोगे, उन्हीं चीजों में मुश्किल हो जाएगी; छोटी-छोटी चीजें मुश्किल हो जाएंगी। तुम कोशिश करके देखो। सात दिन एक काम करो, इसको सोचो: जब भी भोजन करो, यह सोचो कि भोजन को तुम पचाते कैसे हो? अभी तक पचाया है, कोई अड़चन नहीं आई है, लेकिन जरा सात दिन तुम इस पर ध्यान करके देखो कि भोजन को पचाते कैसे हो? यह कोई छोटी घटना नहीं है। वैज्ञानिक कहते हैं, यह सबसे बड़ा चमत्कार है। रोटी ले जाते हो, खून-हड्डी बन जाती है, मांस-मज्जा बन जाती है; मस्तिष्क के सूक्ष्म तंतु बन जाती है; विचार बनती है, वासना बनती है! रोटी! और इस छोटी सी पेट की फैक्ट्री में सब रूपांतरण होता है। कैसे होता है? तुम जरा सात दिन सोचो। अपच हो जाएगा; फिर तुम कभी स्वस्थ न हो पाओगे। तो सोच कर करना, पेट गड़बड़ हो जाएगा। जैसे सौ पैर डगमगा गए, ऐसे तुम डगमगा जाओगे। यह हो कैसे रहा है?

जीवन तुम्हारी बुद्धि से बड़ा है। और जब भी तुम बुद्धि का उपयोग करते हो, वहीं अड़चन आ जाती है। जीवन तुमसे बहुत बड़ा है, बुद्धि बड़ी छोटी है। ततैया की कहानी भी तुम न समझे!

और पूछा है कि साधना के द्वारा ग्रंथि-विसर्जन के लिए हम क्या करें?