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भज गोविन्दम् मूढ़मते-7


परम-गीत की एक कड़ी—(प्रवचन—सातवां)

सूत्र :

भगवद्गीता किंचिदधीता गंगाजल लवकणिका पीता।

सकृदपि येन मुरारिसमर्चा क्रियते तस्य यमेन न चर्चा।।

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्।

इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुरारे।।

रथ्याकर्पटविरचितकन्थः पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः।

योगी योगनियोजितचित्तो रमते बालोन्मत्तवदेव।।

कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः का मे जननी को मे तातः।

इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम्।।

त्वयि मयि चान्यत्रैको विषर्‌णुव्यर्थं कुप्यसि मय्य सहिष्णुः।।

सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम्।।

शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्नं विग्रहसंधौ।

भव समचित्तः सर्वत्र त्वं वांछस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम्।।

मैंने एक कथा सुनी है। एक ततैया ने विशाल भवन के बाहर खिड़की के पास अपना घर बनाया था। सर्दियों में ततैया सोती, विश्राम करती; गर्मियों में उड़ती, नाचती, फूलों से पराग इकट्ठा करती। प्रसन्नचित्त थी, आनंदित थी। पर ततैया बड़ी विशिष्ट थी, विचारक थी–सोचती बहुत और दूसरी ततैयों को बड़े निंदा के भाव से देखती; क्योंकि उनका जीवन बस वासना का जीवन था; विचार की कोई झलक भी उन्हें नहीं मिली; चिंतन-मनन उन्होंने जाना नहीं; शास्त्रों से उनकी कोई पहचान नहीं!