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भज गोविन्दम् मूढ़मते।4


कदम कदम पर मंजिल—(प्रवचन—चौथा)

प्रश्न-सार

1—कहा जाता है कि शंकर हिंदू वेदांती थे और आपने कहा कि शंकर छिपे हुए बौद्ध हैं; इसे कृपया स्पष्ट करें।

2—शंकर और आप भजन करने को कहने के पहले हमें हर बार मूढ़ कह कर क्यों संबोधित करते हैं?

3—रेचन में केवल क्रोध,र् ईष्या, दुख आदि के नकारात्मक भाव ही बाहर आते हैं। क्यों?

4—कृपया डूबने तथा होश और बेहोशी की सीमा-रेखाओं को स्पष्ट करें।

5—क्या प्रार्थना की जगह भजन भी धन्यवाद ज्ञापन मात्र है?

पहला प्रश्न:

कहा जाता है कि शंकर हिंदू वेदांती थे और आपने कहा कि शंकर छिपे हुए बौद्ध हैं; इसे कृपया स्पष्ट करें।

शंकर छिपे हुए बौद्ध भी हैं, छिपे हुए जैन भी, छिपे हुए मुसलमान भी; वैसे ही जैसे बुद्ध छिपे हुए हिंदू हैं, छिपे हुए जैन भी, छिपे हुए ईसाई भी; और वैसे ही जैसे क्राइस्ट छिपे हुए हिंदू हैं, छिपे हुए मुसलमान, छिपे हुए बौद्ध भी। जिन्होंने जाना है, उन्होंने एक को ही जाना है; दो हैं ही नहीं जानने को। हिंदू, मुसलमान, ईसाई–सब ऊपर-ऊपर के नाम हैं, ऊपर की पहचान हैं; भीतर का सत्य एक है। भाषा अलग होगी; जो कहा गया है, वह अलग नहीं है; ढंग अलग होगा कहने का, समझाने की प्रक्रिया अलग होगी; लेकिन जो स्वाद मिला है, उसके अलग होने की कोई संभावना नहीं है।

इसे ठीक से समझ लेना जरूरी है; इसकी नासमझी न मालूम कितने उपद्रव का कारण बनती है। हिंदू मुसलमान से लड़ते हैं, जैन बौद्धों से लड़ते हैं। और जहां किसी तरह का संघर्ष दिखाई पड़े, समझ लेना कि सत्य वहां से खो जाता है; तुम्हारे लड़ने में ही सत्य की हत्या हो जाती है; तुम्हारे संघर्ष में ही असत्य निर्मित हो जाता है। क्योंकि जहां भी संघर्ष है, वहीं हिंसा है; फिर चाहे हिंसा शरीर के संघर्ष में प्रकट हो या बुद्धि के संघर्ष में, इससे कुछ भेद नहीं पड़ता। दूसरे को मिटाने की चेष्टा चाहे शरीरगत हो और चाहे मानसिक, हिंसा हिंसा है। दूसरे में गलत देखने की आकांक्षा और वृत्ति हिंसा का ही फैलाव है। जब तक तुम विपरीत में भी स्वयं को न देख पाओ, तब तक जानना, मन से ऊपर उठना नहीं हुआ; चेतना के मंदिर में प्रवेश नहीं हुआ।

उस मंदिर के बहुत द्वार हैं और प्रत्येक द्वार से प्रवेश संभव है। और जो मंदिर में प्रविष्ट हो जाता है, वह द्वार को भूल जाता है। कौन याद रखता है द्वार को प्रवेश के बाद? प्रवेश के पहले द्वार बहुत महत्वपूर्ण मालूम होता है, क्योंकि उससे ही प्रवेश करना है; लेकिन प्रवेश के बाद द्वार व्यर्थ हो जाता है। द्वार की तरफ पीठ हो जाती है प्रवेश के बाद, प्रवेश के पहले द्वार की तरफ आंख थी।

सब संप्रदाय द्वार हैं। और जब तक संप्रदाय तुम्हें बहुत महत्वपूर्ण मालूम पड़े–हिंदू, मुसलमान, जैन–तब तक जानना मंदिर में प्रवेश नहीं हुआ; अभी द्वार पर आंख अटकी है। जब मंदिर में प्रवेश हो जाएगा तो द्वार की तरफ पीठ हो जाएगी–न हिंदू अर्थपूर्ण रह जाएगा, न मुसलमान अर्थपूर्ण रह जाएगा।

वह जो महा अर्थ प्रकट होगा मंदिर के अंतरगृह में, वह तुम्हारे संप्रदाय को ही नहीं, तुम्हारे शास्त्र को ही नहीं, तुम्हें भी मिटा ले जाएगा; सब कुछ बह जाएगा उस बाढ़ में। और उस बाढ़ के बाद जो बच रहता है, वही तुम्हारा स्वभाव है। उस बाढ़ में, जो भी पर-भाव था, सब बह जाएगा; उस बाढ़ में, जो भी ऊपर के आवरण थे, सब बिखर जाएंगे; उस बाढ़ में, जो भी विजातीय था, उससे तुम्हारे संबंध टूट जाएंगे। केवल तुम बचोगे अपने शुद्धतम कुंआरेपन, अपनी निर्दोषिता में।

और उसका स्वरूप, तुम लाख उपाय करो, तो भी बिना अनुभव के नहीं समझा जा सकता; उसका स्वाद ही लेना होगा; उस मस्ती में डूबना ही होगा; उस नशे को पीना ही होगा। जब तक तुम मदमत्त होकर, सब भांति खोकर, सब कुछ लुटा कर उसमें न डूब जाओगे–जब तक तुम बाकी रहोगे, तब तक संसार बाकी रहेगा; जब तुम मिट जाओगे, तभी परमात्मा शुरू होता है। जहां तक खुदी है, वहां तक खुदा नहीं है। और जहां खुदी की समाप्ति है, वहीं खुदा का प्रारंभ है।

शंकर छिपे हुए बौद्ध हैं, क्योंकि वे वही कह रहे हैं जो बुद्ध ने कहा। और बुद्ध भी छिपे हुए वेदांती थे, क्योंकि वे वही कह रहे थे जो उपनिषद ने कहा है। कपड़े अलग हैं। और कभी-कभी कपड़े विरोधी भी मालूम पड़ते हैं।

इसे थोड़ा समझें। बुद्ध ने उपनिषद और वेदों का विरोध किया, और फिर भी उन्होंने उपनिषद, वेद को ही सिद्ध किया। विरोध करना पड़ता है। उपनिषद जब जन्मे, जब उपनिषद की गंगा पैदा हुई, तो गंगा बड़ी स्वच्छ थी, निर्मल थी, गंगोत्री थी। फिर गंगा बही; हजारों लोगों का स्नान हुआ; हजारों गांवों से गुजरी–गंदी हुई, कूड़ा-कर्कट हुआ, नदी-नाले गिरे। जो गंगोत्री में गंगा की पवित्रता है, वह आकर काशी में नहीं रह जाती। वह रह नहीं सकती। जैसे-जैसे समय बीतता है, वैसे-वैसे मूल-स्रोत अपनी स्वच्छता को खो देता है।

उपनिषद जब पैदा हुए, बुद्ध के कोई ढाई हजार साल पहले, तब उनकी गरिमा अनूठी थी; उनके शब्द-शब्द में प्रकाश था, पंक्ति-पंक्ति में परमात्मा था। बुद्ध के समय तक वह गरिमा खो गई, धूल जम गई। दर्पण तो रहा, लेकिन बहुत धूल से भर गया। अब उसमें कोई प्रतिबिंब नहीं बनता था। अब दर्पण अंधा हो चुका था।

लेकिन दर्पण के आस-पास बड़ा संप्रदाय खड़ा हो गया था। अगर बुद्ध चेष्टा भी करें कि हम दर्पण को साफ कर दें, तो वे साफ नहीं करने देंगे। क्योंकि जिसे बुद्ध धूल कहते हैं, सांप्रदायिक बुद्धि उसी को अपना धर्म कहती है। दर्पण को तो सांप्रदायिक बुद्धि जानती भी नहीं, जमी हुई धूल को ही जानती है; वह धूल को ही शृंगार मानती है, धूल ही आभूषण है। कैसे राजी हो सकती है सांप्रदायिक बुद्धि कि तुम धूल को झाड़ दो! उसका तो अर्थ हुआ हमारा धर्म ही नष्ट हो जाएगा।

इस धूल के कारण बुद्ध को इस दर्पण को भी इंकार करना पड़ा; क्योंकि जब तक इस दर्पण को इंकार न किया जाए, दूसरे दर्पण के लिए लोगों को राजी नहीं किया जा सकता। लेकिन दूसरा दर्पण ठीक वैसा ही दर्पण है जैसा पहला दर्पण था। फर्क इतना ही है कि पहला पुराना हो गया, जराजीर्ण हो गया, उस पर धूल जम गई। सत्य संगठित हो गया, बस मर जाता है। अब यह दूसरा सत्य फिर नया है–नवजात; सुबह की ओस की भांति ताजा। नया सत्य भी थोड़े दिन में फिर पुराना हो जाएगा।

शंकर के पैदा होते-होते बुद्ध का सत्य भी वैसा ही पुराना हो गया। समय किसी को भी क्षमा नहीं करता। और समय तो हर चीज पर धूल जमा देता है। जो चीज आज नई है, कल पुरानी हो जाएगी; जो आज छोटा सा नवजात शिशु है, कल बूढ़ा हो जाएगा; जिसके स्वागत में आज बैंड-बाजे बजाए थे, कल उसको मरघट पर विदा कर आना पड़ेगा।

जैसे व्यक्ति पैदा होते हैं और मर जाते हैं, वैसे ही धर्म भी पैदा होते हैं और मर जाते हैं! समय की धारा में जो भी प्रवेश करता है, वह जराजीर्ण होगा, बूढ़ा होगा, व्यर्थ होगा, कचरा हो जाएगा। लेकिन जब घर में कोई मर जाता है–मां मर जाए–कितना प्रेम किया था उसे, लेकिन मर जाने पर कितना ही रोओ, फिर भी मरघट ले जाना पड़ता है। अब कोई नासमझ अगर मां की लाश को घर में रख कर बैठ जाए, तो जो जिंदा हैं, उनका जीना मुश्किल हो जाएगा। माना कि उससे बहुत प्रेम था; और माना कि बड़ी पीड़ा होती है उसे जाकर चिता पर जला आने में। लेकिन फिर भी मजबूरी है, चिता पर ले जाना ही पड़ेगा; रोते हुए जाएंगे, छाती पीटते हुए जाएंगे, लेकिन चिता पर तो ले जाना ही पड़ेगा। लाश को घर में रखने का उपाय नहीं।

लेकिन जो समझ हम शरीर के साथ करते हैं, वही समझ हम संप्रदाय के साथ नहीं कर पाते। धर्म जीवित धर्म है, और जब संप्रदाय हो जाता है तो लाश है। पर लाश को हम सम्हाल कर रख लेते हैं। संप्रदाय की दुर्गंध के कारण फिर जीना मुश्किल ही हो जाता है। संप्रदाय लड़ते हैं, लड़ाते हैं। धर्म तो एक करवाता है। संप्रदाय तोड़ते हैं, तुड़वाते हैं। मंदिर और मस्जिद में बड़ा बैर है। मंदिर और मस्जिद के परमात्मा में तो बैर नहीं हो सकता। मंदिर और मस्जिद के मानने वाले में बड़ी शत्रुता है। लेकिन वह जिसकी पूजा चली है मंदिर में और जिसकी पूजा चली है मस्जिद में–और किसी ने उसको राम कह कर पुकारा है और किसी ने अल्लाह कह कर–ये संबोधन अलग होंगे, लेकिन जिसे पुकारा है, वह तो एक ही है।

शंकर के समय तक आते-आते बुद्ध की धारा भी गंदी हो गई; गंगोत्री न रही, वह भी काशी आ गई। शंकर को फिर खंडन करना पड़ा। क्योंकि अब बुद्ध को मानने वाले बौद्ध थे; बड़ा संप्रदाय था; और वे धूल को न झाड़ने देंगे। फिर नये दर्पण को निर्मित करना पड़ा। आज फिर हालत वैसी हो गई है–शंकर के दर्पण पर फिर धूल जम गई है। यह सदा ही होता रहेगा।

धूल को मत पूजना, दर्पण को खोजना। तब तुम एक सा ही दर्पण सभी के भीतर पाओगे। और जब तुम्हें एक सा दर्पण सभी के भीतर दिखाई पड़ने लगे, तभी तुम जानना तुममें सदबुद्धि का जन्म हुआ है। बुद्धि और सदबुद्धि का यही भेद है। बुद्धि खंडन करती है, आलोचना करती है, विरोध करती है, विवाद करती है; सदबुद्धि संवाद करती है। बुद्धि बताती है कि भेद कहां-कहां है; सदबुद्धि बताती है कि अभेद कहां है। बुद्धि विश्लेषण करती है, सदबुद्धि संश्लेषण करती है। बुद्धि सीमाएं खींचती है, सदबुद्धि सीमाएं मिटाती है। और जब सभी सीमाएं मिट जाती हैं, तभी असीम की उपलब्धि होती है।

ऐसा मत सोचना कि तुम सीमाओं में बंधे-बंधे असीम को जान लोगे। जानेगा कौन? अगर तुम्हीं सीमा में बंधे हो तो असीम को कैसे जानोगे? तुम जो भी जानोगे, वह सीमित हो जाएगा। असीम को जानना हो तो एक ही उपाय है: अपनी सीमाओं को तोड़ डालना। खिड़की के भीतर से आकाश को देखोगे, तो उतना ही आकाश दिखाई पड़ेगा, जितना खिड़की का ढांचा होगा; उससे ज्यादा आकाश दिखाई नहीं पड़ सकेगा; खिड़की आकाश को भी सीमित कर देगी। अगर पूरे आकाश को देखना हो तो बाहर निकल आना घर के खुले आकाश के नीचे। वहां तुम हिंदू भी न रह जाओगे, मुसलमान भी न रह जाओगे; क्योंकि ये नाम खिड़कियों के हैं। खुले आकाश के नीचे तुम मात्र रह जाओगे। और वह तुम्हारा मात्र रह जाना शुद्ध अस्तित्व ही असीम को जानने का उपाय है। असीम को जानना हो तो असीम होना पड़ेगा। वही एकमात्र शर्त है। क्योंकि समान ही समान को जान सकता है। तुम सीमाओं में बंधे असीम को जानने चलोगे–कैसे जान पाओगे? तुम अपनी सीमाएं तो अपने साथ ही लेकर चलोगे; उन्हीं के भीतर से झांकोगे। तुम्हें वही दिखाई पड़ेगा, जो तुम्हारी सीमाएं दिखा सकती हैं।

शंकर ही छिपे हुए बौद्ध नहीं हैं, बुद्ध भी छिपे हुए वेदांती हैं।

जो भ्रष्ट हो चुका है, उसे नष्ट करना होता है; जो विकृत हो गया है, उसे विनाश करना होता है; जो जराजीर्ण हो गया है, उसे चिता पर रखना होता है–ताकि नये के लिए स्थान रिक्त हो जाए।

मन कहता है, पुराने को बचा लो। मन कहता है, पुराने को सम्हाल लो। लेकिन अगर तुम पुराने को बहुत सम्हाले जाओगे, तो नये को जगह न मिलेगी। बूढ़े का जाना जरूरी है, ताकि बच्चे आ सकें। जराजीर्ण वृक्ष गिरेगा, ताकि नये अंकुर फूट सकें।

मैंने सुना है, एक बहुत पुराना चर्च था। वह जराजीर्ण हो गया था; हवा चलती तो लगता कि अब गिरा, तब गिरा। उसमें पूजा करने वाले लोग भी डरने लगे थे; कभी भी गिर सकता था। आखिर ट्रस्टियों ने बैठक की कि अब कुछ करना ही होगा। अब तो पुजारी भी भीतर आने से डरता है, पूजा करने वाले भी डरते हैं, पास से गुजरने वाले भी चर्च के भयभीत होते हैं; क्योंकि कब गिर जाए! किसकी जान ले ले! रास्ता भी निर्जन हो गया है, उससे कोई गुजरता नहीं।

तो उन्होंने तीन प्रस्ताव स्वीकार किए। एक कि पुराने चर्च को गिराना पड़ेगा। अत्यंत दुख से, सर्वसम्मति से उन्होंने स्वीकार किया। और दूसरा कि नये चर्च को बनाना पड़ेगा।

यह बड़ी पीड़ा से स्वीकार किया, क्योंकि पुराने से मोह बन जाते हैं। नये से तो परिचय ही नहीं है अभी, नया तो अभी पैदा ही नहीं हुआ; तो नये से तो मोह कैसे हो सकता है! पुराने से मोह होता है। इसलिए तो अगर छोटा बच्चा मर जाए तो उतना दुख नहीं होता। जैसे-जैसे उसकी उम्र बड़ी होने लगी कि उतना ज्यादा दुख होगा; क्योंकि उतना परिचय हो जाएगा; उतना संबंध बन जाएगा; उतने राग निर्मित हो जाएंगे।

पुराने को गिराना है–दुख से; नये को बनाना है–मजबूरी है; और तीसरा प्रस्ताव उन्होंने पास किया कि नये चर्च को हम पुराने चर्च की जगह ही बनाएंगे। और जब तक नया न बन जाए, तब तक हम पुराने का उपयोग जारी रखेंगे! और नये चर्च में हम पुराने चर्च के ही पत्थरों का उपयोग करेंगे। और जब तक बन न जाए नया चर्च, तब तक हम पुराने का उपयोग जारी रखेंगे। और यह भी सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया उन्होंने!

वह चर्च अब भी खड़ा है! वह गिर नहीं सकता। मोह मन के बड़े गहरे हैं।

और मैं उसी व्यक्ति को धार्मिक कहता हूं, जो पुराने को छोड़ कर नित-नूतन और नवीन में जागता चला जाए। जो सदा अपने कुंआरेपन को बचाने में समर्थ है, वही धार्मिक है। जो प्रतिपल अतीत से ऐसे ही बाहर निकल आता है, जैसे सांप अपनी पुरानी केंचुली को छोड़ कर बाहर निकल आता है; फिर पीछे लौट कर भी नहीं देखता।

अगर तुम सद्यःनूतन को साध लो, अगर तुम प्रतिपल नये में जीवित हो जाओ, अगर तुम पुराने कूड़े-कबाड़ को न ढोओ, तो उस नवीनता में ही तुम सनातन को पा लोगे। उस प्रतिपल नये होने में ही परमात्मा छिपा है।

दूसरा प्रश्न:

शंकर और आप गोविन्द का भजन करने को कहने के पहले हमें हर बार मूढ़ कह कर क्यों संबोधित करते हैं?

क्योंकि तुम हो! कुछ अन्यथा कहना झूठ होगा। और शंकर जब कहते हैं: ‘भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम् मूढ़मते।’ तो बड़े प्रेम से कहते हैं; उनकी करुणा के कारण कहते हैं। वे तुम्हें गाली नहीं दे रहे हैं। क्योंकि शंकर तो गाली दे कैसे सकते हैं! शंकर से तो गाली निकल नहीं सकती; वह तो असंभव है। वे तुम्हें चेता रहे हैं, वे तुम्हें जगा रहे हैं, वे तुम्हें धक्का दे रहे हैं। वे कह रहे हैं–उठो! सुबह हुई बड़ी देर हो गई और तुम अभी तक सो रहे हो!

वे मूढ़ कहते हैं, क्योंकि जब तक वे कुछ कठोर शब्द न कहें, तुम्हारी नींद न टूटेगी। और वे मूढ़ कहते हैं, क्योंकि यही सत्य है, यही यथार्थ है।

मूढ़ता का अर्थ है: मूर्च्छा। मूढ़ता का अर्थ है: सोए-सोए जीना। मूढ़ता का अर्थ है: विवेकहीनता। मूढ़ता का अर्थ है: जागरण की कमी, होश का न होना।

जब तुम क्रोध में होते हो, तब तुम ज्यादा मूढ़ हो जाते हो; क्योंकि तब होश और भी खो जाता है। लेकिन कभी-कभी तुम होश में होते हो, तब तुम उतने मूढ़ नहीं होते। और तुम भी जानते हो कि कभी तुम कम मूढ़ होते हो, कभी ज्यादा मूढ़ होते हो। कभी मन में मोह भर जाता है तो मूढ़ता बढ़ जाती है; कभी मन में वासना भर जाती है तो मूढ़ता बढ़ जाती है।

तुलसीदास के जीवन में कथा है कि पत्नी मायके गई थी। तो वर्षा की रात में सांप को पकड़ कर वे चढ़ गए। घर के पीछे से प्रवेश कर रहे थे चोर की भांति। बड़ी गहरी मूढ़ता रही होगी कि सांप भी दिखाई न पड़ा, रस्सी समझ में आया। वासना बड़ी तीव्र रही होगी; कामना ने बिलकुल अंधा कर दिया होगा; आंखें बिलकुल अंधेरे से भर गई होंगी। नहीं तो सांप दिखाई न पड़े!

हालत तो ऐसी है कि अक्सर रस्सी में सांप दिखाई पड़ जाता है–भय के कारण। मौत आदमी को डराती है। राह पर रस्सी पड़ी हो तो सांप दिख जाता है। इससे उलटी हालत हुई–सांप था और तुलसीदास ने समझा कि रस्सी है और चढ़ गए! पकड़ा, तब भी स्पर्श से पता न चला। बिलकुल मूर्च्छित रहे होंगे! कामवासना ने पागल कर दिया होगा!

पत्नी ने कहा देख कर यह दशा कि जितना प्रेम मुझसे है, अगर इतना ही प्रेम परमात्मा से होता, तो तुम अब तक महापद के अधिकारी हो जाते। पीछे लौट कर सांप को देखा–खयाल आया, वासना अंधा बना देती है–जीवन में एक क्रांति घटित हो गई। पत्नी गुरु बन गई। वासना ने निर्वासना की तरफ जगा दिया। संन्यस्त जीवन हो गया। परमात्मा को खोजने लगे। काम में जो शक्ति लगी थी, वह राम की तलाश करने लगी। जो ऊर्जा काम बनती थी, वही ऊर्जा राम बनने लगी।

मूढ़ता ही वही ऊर्जा है। जो आज सोई-सोई है, वही कल जागेगी; जो आज छिपी पड़ी है, वही कल प्रकट होगी। मूढ़ता ही प्रज्ञा बनेगी। वह जो तुम्हारी नींद है, वही तुम्हारा जागरण बनेगी। इसलिए उससे नाराज मत होना; और न ही मन में निंदा से भरना; और न ही अपनी मूढ़ता को छिपाने की कोशिश करना।

बहुत लोग वही कर रहे हैं! वे महामूढ़ हैं, जो मूढ़ता को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। तो तुम छोटी-मोटी जानकारी इकट्ठी कर लेते हो; अपनी मूढ़ता को जानकारी से ढांक लेते हो। भीतर घाव रहते हैं, ऊपर से तुम फूल लगा लेते हो। शास्त्र से उधार लिया ज्ञान ऐसे ही फूल हैं, दूसरों से उधार ली जानकारी ऐसे ही फूल हैं, जिनमें तुम ढांक लेते हो मूढ़ता को और भूल जाते हो।

मूढ़ता को भूलना नहीं है, मूढ़ता को याद रखना है। क्योंकि याद रखो तो ही उसे मिटाया जा सकता है; भूल गए तो मिटाना असंभव है। इसलिए शंकर पद-पद पर दोहराते हैं: भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम् मूढ़मते। तुम्हारी बेहोशी को देख कर करुणावश दोहराते हैं। तुम्हें याद रहे कि तुम मूढ़ हो, यह कहीं भूल न जाए। और तुम्हारी पूरी चेष्टा है कि भूल जाए। तुम पूरे उपाय करते हो कि किसी तरह यह बात भूल जाए कि मैं मूढ़ हूं! तुम मान कर चलते हो कि मैं ज्ञानी हूं।

सिर्फ ज्ञानी ही मानते हैं कि वे ज्ञानी नहीं हैं, अज्ञानी तो सभी मानते हैं कि वे ज्ञानी हैं। अज्ञानी तो बड़ी अकड़ से संघर्ष करता है अपने ज्ञान का। वह तो मानने को राजी नहीं होता है कि मैं नहीं जानता हूं। सिर्फ परम ज्ञानी ही मानने को राजी होते हैं कि क्या हम जानते हैं!

एडीसन ने कहा है कि लोग कहते हैं कि मैं बहुत जानता हूं। और मेरी हालत ऐसी है, जैसे एक छोटे बच्चे ने सागर के किनारे कुछ शंख और सीप इकट्ठे कर लिए हों। इतना ही मेरा ज्ञान है–मुट्ठियों में थोड़े से शंख-सीप। और विराट सागर पड़ा है जिसको मैं जानता नहीं हूं।

तुम्हें अपना छोटा सा ज्ञान बहुत बड़ा मालूम पड़ता है! एक छोटा सा दीया जला लिया है, उसकी टिमटिमाती रोशनी पड़ती है चारों तरफ, थोड़ी सी जगह रोशन हो जाती है, इसको तुम ज्ञान कहते हो! और अनंत पड़ा है अंधकार से भरा, उसका तुम्हें कोई होश नहीं है! जब तुम समझोगे अपनी मूढ़ता को तो तुम कहोगे, यह भी कोई ज्ञान है–यह टिमटिमाती दीये की रोशनी! अनंत पड़ा है यात्रा के लिए, अनंत पड़ा है अन्वेषण के लिए, अनंत पड़ा है खोजने के लिए–और मैं इन शंख-सीपियों को हाथ में बटोर कर ज्ञानी हो रहा हूं! तब तुम इस ज्ञान को भी छोड़ दोगे। और जिस दिन तुम जानोगे कि तुम मूढ़ हो–इस होश से भरोगे–उसी दिन मूढ़ता पिघलने लगी। क्योंकि यह होश मूढ़ता के बाहर ले जाएगा। मूढ़ता बेहोशी है, तो होश के साथ टूटने लगेगी।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अगर किसी पागल को यह समझ में आ जाए कि मैं पागल हूं, तो वह ठीक हो जाएगा। पागल को समझ में नहीं आता कि वह पागल है; वह तो यही समझता है कि दुनिया पागल है।

खलील जिब्रान ने लिखा है कि एक मित्र पागल हो गया, तो वह उससे मिलने पागलखाने गया। वह एक बेंच पर बैठा था बगीचे की, पागलखाने की। जिब्रान उसके पास जाकर बैठ गया और उसने बड़े दया-भाव से कहा कि मित्र, बड़ा दुख होता है तुम्हें यहां देख कर।

उसने बड़े गौर से जिब्रान को देखा और कहा, दुख! दुख किस बात का?

जिब्रान ने कहा, यह देख कर कि तुम्हें पागलखाने आना पड़ा।

वह पागल हंसने लगा। उसने कहा, तुम गलती में हो। जब से हम यहां आए हैं, तब से ही हमें गैर-पागलों का सत्संग हुआ; बाहर तो सब पागल हैं, और उनसे छुटकारा हो गया, यह हमारा सौभाग्य है। तुम इसे पागलखाना समझ रहे हो! पागलखाना बाहर है–दीवालों के बाहर; यहां थोड़े से चुने हुए बुद्धिमान लोग रहते हैं।

पागल को समझ में कैसे आए कि वह पागल है? इतनी ही समझ होती तो वह पागल कैसे होता? और पागल को इतना ही समझ आ जाए कि मैं पागल हूं, तो पागलपन टूटने लगा।

ऐसा समझो कि रात तुम्हें नींद में समझ में आ जाए कि तुम सपना देख रहे हो, तो सपना टूटने लगा। सपना देखने के लिए जरूरी है कि तुम्हें याद न आए कि तुम सपना देख रहे हो। सुबह याद आएगी, जब सपना टूट जाएगा। जब सपना चल रहा है, तब तो तुम ऐसा ही समझोगे कि सब सत्य हो रहा है। अगर वहीं बीच सपने में याद आ जाए कि यह सपना है, उसी वक्त टूट जाएगा।

गुरजिएफ अपने शिष्यों को कहता था कि बड़े सपने को तोड़ने के पहले छोटे सपनों को तोड़ना सीखो। यह बड़ा संसार माया है, इसको तुम तोड़ न पाओगे, जब तक तुम छोटे सपने ही नहीं तोड़ सकते। रात का सपना ही नहीं टूटता, तो दिन का सपना क्या खाक टूटेगा! तो गुरजिएफ अपने शिष्यों को कहता था कि रात सोते वक्त–प्रति रात सोते वक्त एक ही ध्यान करते हुए सोओ कि जब सपना आए, तो साथ मुझे याद भी आ जाए कि यह सपना है।

कोई तीन साल लगते हैं रात का सपना तोड़ने में। तीन साल निरंतर प्रति रात्रि यही विचार, यही चिंतन, यही मनन, यही ध्यान करते सोते-सोते एक दिन ऐसी घड़ी आती है–परम सौभाग्य की घड़ी है वह–जिस दिन अचानक रात में सपने के साथ याद भी आ जाती है कि यह सपना है। बस इतनी याद आते ही सपना टूट जाता है और नींद में भी होश प्रवेश हो जाता है। उसी दिन से सपने खो जाते हैं, फिर सपने नहीं आते। और तभी तुम बड़े सपने में जाग सकते हो।

यह जो खुली आंख का सपना है, यह बड़ा सपना है।

रात का सपना तो निजी है, प्राइवेट है, अकेले-अकेले का है। पति भी अपनी पत्नी को अपने सपने में नहीं बुला सकता; एकदम निजी है। मित्र अपने मित्र को सपने में नहीं बुला सकता। कोई अपने सपने में किसी को साझीदार नहीं बना सकता; बड़ा आत्यंतिक है; अकेले का है।

यह सपना सामूहिक है, सार्वजनिक है। यह तो टूटना बहुत मुश्किल है; क्योंकि तुम्हारा अकेले का है भी नहीं–सबका सामूहिक है, संयुक्त है। लेकिन अगर पहला सपना टूट जाए तो फिर वही याद इस सपने में भी काम आ जाती है। फिर यही याद पर्याप्त है–कि इस जागते हुए में भी मुझे याद बनी रहे कि यह सपना है।

तुम कभी खयाल करो, किसी ने तुम्हें गाली दी और तुम सिर्फ स्मरण कर लो कि यह सपना है; क्रोध असंभव हो जाएगा। तुम्हारी कोई बहुमूल्य चीज गिर गई और टूट गई, जरा स्मरण कर लो कि सब सपना है; दुख विलीन हो जाएगा। पत्नी मर गई, या पति मर गया, या बेटा चल बसा–मुश्किल होगा याद करना कि सब सपना है, लेकिन काश, तुम कर लो–दुख विसर्जित हो गया। जिसने जान लिया कि सपना है, उसे न फिर मौत हिला पाती है, न जीवन डिगा पाता है; न सुख सुख मालूम होता; न दुख दुख मालूम होता। इसी को तो बुद्धत्व कहा है, इसी को जिनत्व कहा है। यही परम प्रज्ञा है कि न दुख छुए, न सुख छुए।

शंकर तुम्हें याद दिला रहे हैं बार-बार कि तुम मूढ़ हो। नाराज मत होना; क्योंकि नाराज होने से शंकर का कुछ न बिगड़ेगा, नाराज होने से तुम सिर्फ इतना ही सिद्ध करोगे कि शंकर बिलकुल ठीक कह रहे हैं कि तुम मूढ़ हो! शायद तुम महामूढ़ हो, वे सिर्फ मूढ़ ही कह रहे हैं–संकोचवश। तुम जिद्द करने मत लग जाना कि मैं मूढ़ नहीं हूं; नहीं तो वही तुम्हारी मूढ़ता का रक्षण बन जाएगा। तुम स्वीकार कर लेना। तुम्हारे स्वीकार से ही मूढ़ता टूटेगी। तुम न केवल स्वीकार करना, बल्कि तुम स्वयं को स्मरण दिलाते रहना उठते-बैठते कि मैं मूढ़ हूं, मूर्च्छित हूं, नासमझ हूं, पागल हूं। तुम्हारे कृत्य बदल जाएंगे; तुम्हारा गुणधर्म बदल जाएगा; तुम्हारी चेतना एक नई दिशा में गतिमान हो जाएगी। काश, तुम याद रख सको कि तुम नासमझ हो, तो तुम में समझदारी का सूत्रपात हो गया।

अज्ञान की पहचान ज्ञान का पहला चरण है। और अंधेरे को ठीक से समझ लेना प्रकाश जलाने की पहली शुरुआत है। जो अंधेरे को ही अंधेरा नहीं समझता, जो अंधेपन को अंधापन नहीं समझता, वह आंख की तलाश क्यों करेगा?

तुम चिकित्सक के पास जाते हो, चिकित्सक इसकी फिक्र नहीं करता कि तुम्हें कौन सी औषधि दी जाए; पहले फिक्र करता है कि निदान किया जाए, डायग्नोसिस ठीक हो। निदान पहली बात है, चिकित्सा दूसरी बात है। औषधि को खोज लेना सरल है, अगर निदान बिलकुल ठीक-ठीक हो जाए। अगर ठीक से बीमारी पकड़ में आ जाए तो औषधि बहुत बड़ी बात नहीं है। इसलिए बड़े चिकित्सक निदान का पैसा लेते हैं, औषधि बताने का नहीं। औषधि तो फिर कोई भी बता सकता है। अगर बीमारी पर हाथ पड़ गया तो औषधि ज्यादा दूर नहीं, वह तो बोतल में भरी रखी है। एक दफा साफ समझ में आ गया कि यह बीमारी है, तो औषधि तो अपने आप मिल जाएगी, कोई बड़ी अड़चन की बात नहीं है।

शंकर बार-बार कह रहे हैं तुमसे कि हे मूढ़, गोविन्द को भजो!

वे तुम्हारी बीमारी का निदान कर रहे हैं। मूढ़ता तुम्हारी बीमारी है, गोविन्द का भजन औषधि है। मगर मूढ़ ही अगर तुम नहीं हो तो भजन तुम गोविन्द का क्यों करोगे? अगर तुमने माना कि मैं बीमार ही नहीं हूं तो चिकित्सा तुम क्यों लोगे? अगर तुम अपनी बीमारी की ही रक्षा कर रहे हो और तुम दावा करते हो कि मेरी बीमारी मेरा स्वास्थ्य है, तो फिर तुम असाध्य हो, फिर तुम्हारा उपचार नहीं हो सकता।

तीसरा प्रश्न:

रेचन करता हूं तो केवल क्रोध, ईष्या, दुख आदि के नकारात्मक भाव ही बाहर आते हैं। प्रेम, भक्ति, आनंद और धर्म के भाव क्यों बाहर प्रकट नहीं होते? क्या वे मेरे भीतर नहीं हैं?

वे भीतर हैं, लेकिन जरा और भीतर हैं। जैसे कोई कुएं को खोदता है, तो पहले तो कंकड़-पत्थर, मिट्टी ही हाथ आती है, जल थोड़े ही एकदम से हाथ आ जाता है। फिर हर एक की जमीन भी अलग-अलग है–कहीं तीस फीट पर पानी निकल आता है, कहीं साठ फीट पर पानी निकलता है। पानी जरूर है। ऐसी कोई भी जमीन नहीं है, जिसके नीचे पानी न हो; गहराई का फर्क हो सकता है। अगर कोई सरल चित्त व्यक्ति खोदेगा, तो जल्दी ही पानी मिल जाएगा दो-चार-दस फीट की गहराई पर; अगर कोई जटिल चित्त व्यक्ति खोदेगा तो हो सकता है, पचास-साठ फीट की गहराई पर मिले। अगर कोई निर्दोष-मन व्यक्ति खोजेगा तो जल्दी पा लेगा, अगर कोई हिंसक, क्रोधी, तमसांध व्यक्ति खोजेगा तो देर लगेगी। पर एक बात तय है कि भेद मिट्टी की पर्त में होगा, जल सबके भीतर है; आत्मा सबके भीतर है; परमात्मा सबके भीतर है–भेद कर्मों की पर्त का होगा।

और जब तुम पहले-पहले खोदोगे तो सीधा परमात्मा हाथ नहीं लगेगा, पहले तो कर्मों की पर्त ही हाथ लगेगी; क्योंकि वही तुम्हारे चारों तरफ घिरी है। पहले तो कंकड़-पत्थर ही हाथ लगते हैं कुआं खोदने में। उनसे घबड़ा मत जाना। वह अच्छी शुरुआत है। वे खबर दे रहे हैं कि ठीक है, यात्रा शुरू हुई। कंकड़-पत्थर हाथ लगेंगे, फिर कूड़ा-कर्कट हाथ लगेगा, फिर अच्छी भूमि हाथ आएगी, फिर गीली भूमि हाथ आएगी। तुम रोज कदम-कदम करीब पहुंच रहे हो। गीली भूमि जब करीब आ जाए, तब तुम समझना कि अब जल ज्यादा दूर नहीं है।

जल सबके भीतर है; क्योंकि जल न हो तो तुम जीओगे कैसे? जीवन सबके भीतर है; जीवन न हो तो तुम होओगे कैसे? कितना ही दूर छिपा रखा हो उसे तुमने, कितने ही आवरण तुमने अपने आस-पास बना लिए हों, लेकिन इससे तुम उसे नष्ट नहीं कर पाते। आत्मा तुम्हारे कर्मों से दब सकती है, नष्ट नहीं होती। अब यह तुम पर निर्भर है कि तुमने कितना दबाया है, उतना ही रेचन करना पड़ेगा। और जन्मों-जन्मों में हमने दबाया है, इसलिए घबड़ाना मत।

‘रेचन करता हूं तो केवल क्रोध,र् ईष्या, दुख आदि के नकारात्मक भाव ही हाथ आते हैं।’

ठीक है, शुभ लक्षण है। उलीच डालो इनको।