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भज गोविन्दम् मूढ़मते।-1


इस मधुर गीत का पहला पद शंकर ने तब लिखा, जब वे एक गांव से गुजरते थे,और उन्होंने एक बूढ़े आदमी को व्याकरण के सूत्र रटते देखा। उन्हें बड़ी दया आई, मरते वक्त व्याकरण के सूत्र रट रहा है यह आदमी! पूरा जीवन भी गंवा दिया, अब आखिरी क्षण भी गंवा रहा है! पूरे जीवन तो परमात्मा को स्मरण नहीं किया, अब भी व्याकरण में उलझा है! व्याकरण के सूत्र रटने से क्या होगा?

शंकर की सारी वाणी में 'भज गोविन्दम्' से मूल्यवान कुछ भी नहीं है। क्योंकि शंकर मूलतः दार्शनिक हैं। उन्होंने जो लिखा है, वह बहुत जटिल है; वह शब्द, शास्त्र, तर्क,ऊहापोह, विचार है। लेकिन शंकर जानते हैं कि तर्क, ऊहापोह और विचार से परमात्मा पाया नहीं जा सकता; उसे पाने का ढंग तो नाचना है, गीत गाना है; उसे पाने का ढंग भाव है, विचार नहीं; उसे पाने का मार्ग हृदय से जाता है, मस्तिष्क से नहीं। इसलिए शंकर ने ब्रह्म-सूत्र के भाष्य लिखे, उपनिषदों पर भाष्य लिखे, गीता पर भाष्य लिखा, लेकिन शंकर का अंतरतम तुम इन छोटे-छोटे पदों में पाओगे। यहां उन्होंने अपने हृदय को खोल दिया है।

ओशो

सदा गोविन्द को भजो—(प्रवचन—पहला)

सूत्र:

भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् मूढ़मते।

संप्राप्ते सन्निहिते काले न हि न हि रक्षति डुकृग्करणे।।

मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम्।

यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम्।।

नारीस्तनभरनाभीदेशं दृष्ट्वा मा गा मोहावेशम्।

एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचिन्तय वारं वारम्।।

नलिनीदलगतजलमतितरलं तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।

विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोकं शोकहतं च समस्तम्।।

यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावन्निजपरिवारो रक्तः।

पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे।।

यावत्पवनो निवसति देहे तावत्पृच्छति कुशलं गेहे।

गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये।।

बालस्तावक्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः।

वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः।।

सत्य मिलता है शून्य में और खो जाता है शब्दों में।

सत्य मिलता है मौन में, बिछुड़ जाता है मुखरता में।

सत्य की कोई भाषा नहीं है। सारी भाषा असत्य है। भाषा मात्र मनुष्य का निर्माण है। सत्य मनुष्य का निर्माण नहीं,आविष्कार है। सत्य तो है ही, उसे बनाना नहीं है, न उसे प्रमाणित करना है, सिर्फ उघाड़ना है। और उघाड़ने की घटना, जब मनुष्य के भीतर सारी भाषा का ऊहापोह शांत हो जाता है, तभी घटती है। क्योंकि भाषा के ही परदे हैं, विचार से ही बाधा है।

यह बहुत बुनियादी और प्राथमिक सूत्र है समझ लेने का।

बच्चा पैदा होता है; कोई भाषा उसके पास नहीं होती। न कोई शास्त्र लेकर आता है, न कोई धर्म; न कोई जाति, न कोई राष्ट्र। उतरता है शून्य की भांति। शून्य की पवित्रता अनूठी है। शून्य एकमात्र कुंआरापन है, बाकी तो सभी विकृत है। उतरता है एक ताजे फूल की भांति। चेतना पर एक लकीर भी नहीं होती। जानता कुछ भी नहीं। लेकिन बच्चे की जानने की क्षमता शुद्ध होती है। दर्पण है; अभी कोई प्रतिबिंब भी नहीं बना। लेकिन दर्पण की क्षमता पूरी है, शुद्ध है। बाद में प्रतिबिंब तो बहुत बन जाएंगे, जानना तो बढ़ जाएगा, जानने की क्षमता कम होती जाएगी; क्योंकि वह जो शून्य था, वह शब्दों से भर जाएगा; उसकी रिक्तता समाप्त हो जाएगी। जैसे दर्पण पर प्रतिबिंब बनें और चिपकते चले जाएं, अलग न हों, तो दर्पण की झलकाने की क्षमता कम हो जाएगी।

बच्चा पैदा होता है, जानता कुछ भी नहीं, लेकिन जानने की क्षमता उसकी परिशुद्ध होती है। इसीलिए तो बच्चे जल्दी सीख लेते हैं, बूढ़े मुश्किल से सीख पाते हैं; क्योंकि सीखने की क्षमता ही बूढ़े की कम हो गई--मन भर गया; स्लेट पर बहुत कुछ लिखा जा चुका; कागज अब कोरा नहीं है। पहले कागज को कोरा करना पड़े, तभी कुछ नया लिखा जा सके।

बच्चा जैसा पैदा होता है, यदि तुम पुनः वैसे ही हो जाओ, तो ही सत्य को पा सकोगे।

तो एक जन्म तो बच्चे का है और एक जन्म संतत्व का। जिसके जीवन में दूसरा जन्म घट गया, जो द्विज हो गया,वही ब्राह्मण है।

शास्त्र कहते हैं: पैदा सभी शूद्र की भांति होते हैं, कभी कोई विरला ब्राह्मण हो पाता है; शेष सब शूद्र की भांति ही पैदा होते हैं, शूद्र की भांति ही मर जाते हैं।

ब्राह्मण कौन है? वह नहीं जो वेद को जानता है; क्योंकि वेद को तो कोई भी जान ले सकता है। वह नहीं जिसे शास्त्र कंठस्थ है; शास्त्र तो कंठस्थ कोई भी कर ले सकता है; शास्त्र की जानकारी तो स्मृति है, ज्ञान नहीं। ब्राह्मण वह है जिसने ब्रह्म को जाना।

यहां तुम आ गए हो, तुम्हें शायद पता भी न हो, यह खोज ब्राह्मण होने की खोज है--ब्रह्म को जानने की खोज है।

इस मधुर गीत का पहला पद शंकर ने तब लिखा, जब वे एक गांव से गुजरते थे, और उन्होंने एक बूढ़े आदमी को व्याकरण के सूत्र रटते देखा। उन्हें बड़ी दया आई, मरते वक्त व्याकरण के सूत्र रट रहा है यह आदमी! पूरा जीवन भी गंवा दिया,अब आखिरी क्षण भी गंवा रहा है! पूरे जीवन तो परमात्मा को स्मरण नहीं किया, अब भी व्याकरण में उलझा है! व्याकरण के सूत्र रटने से क्या होगा?

स्वामी राम अमेरिका से वापस लौटे। अमेरिका में उनका गहरा प्रभाव पड़ा। आदमी अनूठे थे। अत्यंत जीवंत वेदांत था उनमें। नगद था परमात्मा, उधार नहीं। एक ज्योतिर्मय पुंज थे। अमेरिका के सरल हृदय पर उनकी बड़ी छाप पड़ी। अमेरिका का हृदय बहुत सरल है। सरल होने का कारण है, क्योंकि अमेरिका का कोई अतीत नहीं, कोई परंपरा नहीं, कोई इतिहास नहीं। कुल तीन सौ वर्ष पुराना देश है। बच्चे जैसा सरल चित्त है। बहुत पर्तें समझ की, ज्ञान की, शास्त्र की नहीं हैं। राम को लोगों ने पूजा। उनके वचनों को ऐसे सुना, जैसे वे अमृत का संदेश लाए हों। लोग उनके साथ नाचे और गाए।

राम भारत वापस लौटे, तो उन्होंने सोचा कि अमरीका जैसे देश में, जहां धर्म की कोई परंपरा नहीं है, जहां लोग बिलकुल ही भौतिकवादी हैं--जब वहां मेरे वचनों का ऐसा प्रभाव हुआ और मेरे व्यक्तित्व ने ऐसी लहर पैदा की, तो भारत में तो न मालूम क्या हो जाएगा! लौटता हूं अपने घर, जहां की परंपरा हजारों साल पुरानी है। कब प्रारंभ हुआ जहां का इतिहास--सब अंधकार में खो गया है--इतना लंबा है। जहां वेद लिखे गए, उपनिषद रचे गए, गीता निर्मित हुई; जहां बुद्ध, महावीर और शंकर जैसे लोग पैदा हुए, वहां मेरी बात तो ऐसी पकड़ी जाएगी जैसे मैं हीरे बांटता होऊं। जब अमरीका में--जहां लोग पदार्थवादी हैं, जो ईश्वर को समझ ही नहीं पाते, जिनके ईश्वर से सारे संबंध टूट गए हैं--जब वहां ऐसा चमत्कार हुआ, तो भारत में क्या न होगा!

लेकिन भारत में जो हुआ, वह राम ने सोचा भी न था। यह सोच कर कि उचित होगा कि भारत में प्रवेश मैं काशी से करूं--क्योंकि वही नगरी है; भारत के सारे सौभाग्य का इतिहास काशी के कण-कण में छिपा है; बुद्ध ने अपना पहला प्रवचन वहां दिया; शंकर ने अपनी विश्वविजय की घोषणा वहां की; वहां जैन तीर्थंकर हुए। काशी से पुराना कोई नगर सारे संसार में नहीं है।जेरुसलम भी नया है। मक्का और मदीना भी बहुत नये हैं। काशी प्राचीनतम तीर्थ है--पृथ्वी पर सबसे पहला सभ्य हुआ नगर है। तो राम पहले काशी पहुंचे। और उन्होंने पहला प्रवचन काशी में दिया।

लेकिन बीच प्रवचन में एक पंडित खड़ा हो गया और उसने कहा कि रुकें! संस्कृत आती है?

राम कुछ समझ न पाए। वे एक मस्त आदमी थे। उन्हें संस्कृत आती भी नहीं थी; उर्दू-फारसी जानते थे। यह उन्होंने सोचा भी न था कि संस्कृत का और वेद से, और ब्रह्म से, और ज्ञान से कोई संबंध है।

कोई भी भाषा न आती हो तो भी आदमी परमात्मा को जान सकता है। कबीर भी जान लेते हैं बिना पढ़े-लिखे; मोहम्मद भी जान लेते हैं बिना पढ़े-लिखे; बढ़ई के बेटे जीसस के जीवन में भी वे फूल खिल जाते हैं। कुछ पंडित होना शर्त तो नहीं है।

राम चौंके! कहा, नहीं, संस्कृत तो नहीं आती।

वह पंडित हंसने लगा। और लोग भी उठ गए। उन्होंने कहा, जब संस्कृत ही नहीं आती, तो वेदांत कैसे आएगा! पहले संस्कृत सीखो, फिर सिखाने आना।

राम उसके बाद हिमालय चले गए। और एक बड़ी उदास घटना है कि राम ने संन्यासी का वेश छोड़ दिया। जब वे मरे तो गैरिक वस्त्रों में नहीं थे। क्योंकि उन्होंने कहा, जो धर्म शब्दों में अटक गया हो, और जिसका संन्यास केवल पांडित्य हो गया हो,और संस्कृत जानने से जहां वेदांत जाना जाता हो, उस समूह का क्या अपने को अंग मानना! जब वे मरे, तब वे गैरिक वस्त्रों में न थे। उन्होंने संन्यास का भी त्याग कर दिया।

परंपरा ने संन्यास तक को दूषित कर दिया है।

अमेरिका समझ सका, भारत न समझ पाया। अमेरिका नासमझ है इसलिए समझ सका। भारत बहुत समझदार है--जरूरत से ज्यादा समझदार है--बिना जाने बहुत कुछ जान लेने की भ्रांति भारत को पैदा हो गई है; पंडित तो हो गया है मन, प्रज्ञावान नहीं हो पाया है; शब्द तो भर गए हैं, निःशब्द के लिए जगह नहीं बची है। और धर्म का कोई संबंध शब्दों से नहीं है।

इसलिए मैं जो तुमसे कहूं, उससे भी ज्यादा ध्यान उस पर देना जो मैं तुमसे न कहूं। बोलूं--शब्द पर बहुत ध्यान मत देना; दो शब्दों के बीच में जो खाली जगह होती है, उस पर ध्यान देना। जो बोलूं, वह छूट जाए, हर्जा नहीं है; लेकिन जो अनबोला है, वह न छूट पाए।

पंक्तियों के बीच पढ़ना पड़ता है ब्रह्म को। शब्दों के बीच खोजना पड़ता है ब्रह्म को। अंतराल में घटता है। जब मैं चुप रह जाऊं क्षण भर को, तब तुम जागना; तब तुम गौर से मुझे देखना; तब तुम मुझे मौका देना कि मैं तुम्हारे करीब आ जाऊं और तुम्हारे हृदय को सहला सकूं।

धर्म व्याकरण के सूत्रों में नहीं है, वह तो परमात्मा के भजन में है। और भजन, जो तुम करते हो, उसमें नहीं है। जब भजन भी खो जाता है, जब तुम ही बचते हो; कोई शब्द आस-पास नहीं रह जाते, एक शून्य तुम्हें घेर लेता है। तुम कुछ बोलते भी नहीं, क्योंकि परमात्मा से क्या बोलना है! तुम्हारे बिना कहे वह जानता है। तुम्हारे कहने से उसके जानने में कुछ बढ़ती न हो जाएगी। तुम कहोगे भी क्या? तुम जो कहोगे वह रोना ही होगा। और रोना ही अगर कहना है तो रोकर ही कहना उचित है,क्योंकि जो तुम्हारे आंसू कह देंगे, वह तुम्हारी वाणी न कह पाएगी। अगर अपना अहोभाव प्रकट करना हो, तो बोल कर कैसे प्रकट करोगे? शब्द छोटे पड़ जाते हैं। अहोभाव बड़ा विराट है, शब्दों में समाता नहीं, उसे तो नाच कर ही कहना उचित होगा। अगर कुछ कहने को न हो, तो अच्छा है चुप रह जाना, ताकि वह बोले और तुम सुन सको।

भजन--कीर्तन, गीत और नाच है। वे भाव को प्रकट करने के उपाय हैं।

बिना कहे तुम भजन हो जाओ, तुम गीत हो जाओ, इस तरफ शंकर का इशारा है। ये पद बड़े सरल हैं, सूत्र बड़े सीधे हैं--और शंकर जैसे मेधावी पुरुष ने लिखे हैं। शंकर की सारी वाणी में 'भज गोविन्दम्' से मूल्यवान कुछ भी नहीं है। क्योंकि शंकर मूलतः दार्शनिक हैं। उन्होंने जो लिखा है, वह बहुत जटिल है; वह शब्द, शास्त्र, तर्क, ऊहापोह, विचार है। लेकिन शंकर जानते हैं कि तर्क, ऊहापोह और विचार से परमात्मा पाया नहीं जा सकता; उसे पाने का ढंग तो नाचना है, गीत गाना है; उसे पाने का ढंग भाव है, विचार नहीं; उसे पाने का मार्ग हृदय से जाता है, मस्तिष्क से नहीं। इसलिए शंकर ने ब्रह्म-सूत्र के भाष्य लिखे,उपनिषदों पर भाष्य लिखे, गीता पर भाष्य लिखा, लेकिन शंकर का अंतरतम तुम इन छोटे-छोटे पदों में पाओगे। यहां उन्होंने अपने हृदय को खोल दिया है। यहां शंकर एक पंडित और एक विचारक की तरह प्रकट नहीं होते, एक भक्त की तरह प्रकट होते हैं।

'हे मूढ़, गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, क्योंकि अंतकाल के आने पर व्याकरण की रटन तुम्हारी रक्षा न करेगी।'

'हे मूढ़, गोविन्द को भजो।'

मूढ़ता क्या है? शंकर तुम्हें मूढ़ कह कर कोई गाली नहीं दे रहे हैं। अत्यंत प्रेमपूर्ण वचन है उनका यह।

भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम् मूढ़मते।

'हे मूढ़, भगवान को भज, गोविन्द को भज।'

मूढ़ता का क्या अर्थ है? मूढ़ता का अर्थ समझो।

मूढ़ता का अर्थ अज्ञानी नहीं है; मूढ़ता का अर्थ है: अज्ञानी होते हुए अपने को ज्ञानी समझना। मूढ़ता पंडित के पास होती है, अज्ञानी के पास नहीं। अज्ञानी को क्या मूढ़ कहना! अज्ञानी सिर्फ अज्ञानी है--नहीं जानता, बात सीधी-साफ है। और कई बार ऐसा हुआ है कि नहीं जानने वाले ने जान लिया और जानने वाले पिछड़ गए; क्योंकि जो नहीं जानता है, उसका अहंकार भी नहीं होता; जो नहीं जानता है, वह विनम्र होता है; जो नहीं जानता है, नहीं जानने के कारण ही उसका कोई दावा नहीं होता।

लेकिन, पंडित बिना जाने जानता है कि जानता है। शब्द सीख लिए हैं उसने; ग्रंथों का बोझ उसके सिर पर है। वह दोहरा सकता है व्याकरण के नियम। उन्हीं में डूब जाता है।

सूफियों की एक कथा है।

एक सूफी फकीर अपनी रोटी कमाने के लिए एक नदी पर लोगों को नाव से पार करवाता था। एक दिन गांव का पंडित उस पार जाना चाहता था। तो उस सूफी फकीर ने कहा, आपसे क्या पैसे लेने! पैसे भी वह एक-दो पैसे लेता था। आपको ऐसे ही पार करा देंगे। पंडित नाव में बैठा; वे दोनों चले। दोनों ही थे नाव में, पंडित ने पूछा--कुछ पढ़ना-लिखना आता है?

पंडित और पूछ भी क्या सकता है! जो वह जानता है, वही सोचता है, दूसरों को भी जना दे। हम वही दूसरों को दे सकते हैं, जो हमारे पास है।

सूफी फकीर का तेज उसे दिखाई न पड़ा। पंडित अपने ज्ञान में अंधा होता है। उसने तो समझा एक साधारण मांझी है। वह एक असाधारण पुरुष था। पंडित जिस परमात्मा की बात सोचता रहा है, सुनता रहा है, वह परमात्मा उस असाधारण पुरुष में मौजूद था; जिसकी पंडित ने अब तक चर्चा की थी, वह उस फकीर में से झांक रहा था। अगर आंख होती तो फकीर में वह सब मिल जाता, जिसके सपने देखे हैं, जिसके शास्त्र पढ़े हैं। प्रत्यक्ष था वहां कोई।

लेकिन पंडित ने पूछा, पढ़ना-लिखना आता है?

पंडित को अगर परमात्मा भी मिल जाए तो वह पूछेगा--सर्टिफिकेट? कहां तक पढ़े-लिखे हो? उसकी अपनी दुनिया है; वह अपने ही शब्दों में, अपने ही शास्त्र में जीता है।

उस फकीर ने कहा कि नहीं, पढ़ना-लिखना तो बिलकुल नहीं आता; मैं बिलकुल गंवार हूं, नासमझ हूं।

उसने जब ये शब्द कहे, तब अगर पंडित के पास जरा भी होश होता तो देख लेता कि कितनी गहरी विनम्रता है। अपने अज्ञान को स्वीकार कर लेना, ज्ञान की तरफ पहला कदम है। और अगर कोई समग्रता से अपने अज्ञान को स्वीकार कर ले, तो वही अंतिम कदम भी हो सकता है। क्योंकि जब तुम पूरे भाव से जानते हो कि कुछ भी नहीं जानता हूं, तब तुम्हारा अहंकार कहां टिकेगा? कहां खड़ा रहेगा? भूमि खो जाएगी पैर के तले से, गिर जाएगा भवन अहंकार का, तुम निरहंकार में उतर जाओगे। वही द्वार है; वहीं से कोई परमात्मा से जुड़ता है।

फकीर ने कहा, मैं कुछ भी नहीं जानता हूं, बिलकुल बेपढ़ा-लिखा हूं।

पंडित ने कहा, तो फिर तुम्हारी चार आना जिंदगी बेकार गई।

नाव थोड़ी आगे बढ़ी। पंडित ने पूछा, और गणित तो आता ही होगा कम से कम? हिसाब-किताब के लिए जरूरी है।

फकीर ने कहा, अपने पास कुछ है ही नहीं, हिसाब-किताब क्या करना! खाली हाथ हैं; जो दिन में मिल जाता है, वह सांझ तक समाप्त हो जाता है, क्योंकि रोटी से ज्यादा कमाना नहीं है कुछ। रात तो हम फिर फकीर हो जाते हैं, सुबह उठ कर फिर कमा लेते हैं। और परमात्मा अब तक देता रहा है तो कल का हिसाब क्या रखना! और किसी ने दे दिया तो ठीक है और किसी ने न दिया तो भी ठीक है; क्योंकि अब तक जी लिए हैं, आगे भी जी लेंगे। न तो देने वाले से कुछ ऐसा मिल जाता है कि सदा काम आ जाए, और न न देने वाला कुछ छीन लेता है कि सदा के लिए कोई नुकसान हो जाए--सब खेल है।

पंडित ने कहा, तुम्हारी आठ आना जिंदगी बेकार गई।

और तभी अचानक तूफान आ गया; और नाव डगमगाने लगी; और नाव अब डूबी, तब डूबी होने लगी। फकीर हंसा,क्योंकि पंडित बहुत घबड़ा गया। मौत सामने देख कर कौन न घबड़ा जाएगा! ऐसे पंडित अमृत की बातें करते था--आत्मा अमर है--लेकिन जब मौत सामने आती है तब पांडित्य की आत्मा काम नहीं आती, न पांडित्य की अमरता काम आती है। घबड़ा गया;हाथ-पैर कंपने लगे।

फकीर ने पूछा, तैरना नहीं आता?

उसने कहा कि बिलकुल नहीं आता।

फकीर ने कहा, तुम्हारी सोलह आना जिंदगी बेकार गई। अब मैं तो कूदता हूं; हम तो चले; ये नाव तो डूबेगी।

'हे मूढ़, गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, क्योंकि अंतकाल के आने पर...'

संभवतः, शंकर उस कहानी को जानते रहे हों जो मैंने तुमसे कही।

'क्योंकि अंतकाल के आने पर व्याकरण की रटन तुम्हारी रक्षा न करेगी।'

जब डूबना आएगा सामने, जब मौत घेरेगी, तब अगर तैरना आता हो तो ही काम आ सकेगा। मौत में तैरना आता हो! और अगर मौत में तैरना नहीं आता तो मौत डुबा लेगी। बहुत बार पहले भी उसने डुबाया--तुम अभी तक भी सजग नहीं हुए हो;तुमने अब तक भी तैरना नहीं सीखा।

अंतकाल के आने पर, मृत्यु के आने पर, कितनी तुम भाषा जानते हो या कितनी भाषाएं जानते हो, कितना व्याकरण जानते हो--कुछ भी तो काम न पड़ेगा।

जो मौत में काम आ जाए, वह प्रज्ञा; और जो मौत में काम न आए, वह पांडित्य। मौत कसौटी है। तो जो भी तुम जानते हो, उसको इस कसौटी पर कसते रहना, कहीं भूल न हो। यह कसौटी सदा सामने रखना। जैसे सर्राफ कसता रहता है पत्थर पर सोने को, ऐसे इस कसौटी को रखे रहना सदा: जो मौत में काम आए, उसी को ज्ञान मानना; जो मौत में काम न आए, धोखा दे जाए, दगा दे जाए, उसे पांडित्य समझना।

और जो मौत में काम न आए, वह जीवन में क्या खाक काम आएगा! जो मौत तक में काम नहीं आता, वह जीवन में कैसे काम आ सकता है? क्योंकि मौत जीवन की पूर्णाहुति है; वह जीवन का चरम शिखर है; वह जीवन का समारोप है। जो मौत में काम आता है, वही जीवन में भी काम आता है। यद्यपि जीवन में धोखा देना आसान है, लेकिन मौत में धोखा देना असंभव है। मौत तो सब उघाड़ कर सामने रख देगी।

शंकर किसे मूढ़ कहते हैं? उसे मूढ़ कहते हैं, जो जानता तो नहीं है, लेकिन व्याकरण को रट लिया है; शब्द का ज्ञाता हो गया है; शास्त्र से जिसकी पहचान हो गई है; जो शास्त्र को दोहरा सकता है, पुनरुक्त कर सकता है; शास्त्र की व्याख्या कर सकता है।

पंडित को मूढ़ कह रहे हैं शंकर। अगर पंडित को मूढ़ न कहते होते, तो 'हे मूढ़, गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो,क्योंकि अंतकाल के आने पर व्याकरण की रटन तुम्हारी रक्षा न करेगी', अचानक व्याकरण को याद करने की जरूरत नहीं थी।मूढ़ थोड़े ही--जिनको हम मूढ़ कहते हैं, अज्ञानी--वे थोड़े ही व्याकरण रट रहे हैं। पंडित रट रहा है। और भारत में यह बोझ काफी गहरा हो गया है। यह इतना गहरा हो गया है कि करीब-करीब हर आदमी को यह खयाल है कि वह परमात्मा को जानता है,क्योंकि परमात्मा शब्द को जानता है।

ध्यान रखना, परमात्मा शब्द परमात्मा नहीं है, न पानी शब्द पानी है। और प्यास लगी हो तो शब्द काम न आएगा,पानी चाहिए। और मौत सामने खड़ी हो तो अमरत्व के सिद्धांत काम न आएंगे, अमृत का स्वाद चाहिए।

मैं एक यात्रा में था। गर्मी के दिन थे और उस वर्ष वर्षा नहीं हुई थी उस इलाके में। स्टेशन पर गाड़ी रुकी थी, एक आदमी दस-दस पैसे में एक गिलास पानी बेच रहा था। दस पैसे में एक गिलास ठंडा पानी, कहता हुआ वह बढ़ता जाता, पैसे इकट्ठे करता जाता। एक आदमी जो मेरे पास ही बैठा था डिब्बे में, उसने कहा, आठ पैसे में न दोगे? वह पानी बेचने वाला रुका ही नहीं, उसने कहा, फिर तुम्हें प्यास ही नहीं लगी।

जब प्यास लगी हो, तो कोई दस पैसे, आठ पैसे की बात करता है! यह तो प्यास न लगे हुए लोगों की बातें हैं। वह मुझे जंच गई बात; उसने ठीक कहा कि दो पैसे की फिक्र करोगे तुम, जब प्यास लगी हो? तब आदमी सब देने को तैयार हो सकता है। हिसाब-किताब तभी तक चलता है जब तक प्यास न लगी हो।

तुम कहते हो तुम हिंदू हो, मुसलमान हो, ईसाई हो--ये सब प्यास न लगे होने की बातें हैं। जब प्यास लगती है तो कौन हिंदू, कौन मुसलमान, कौन ईसाई? जब प्यास लगती है तो तुम परमात्मा को मांगते हो--मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे से कोई लेना-देना नहीं रह जाता। इनसे कहीं प्यास बुझी है? और जब प्यास लगती है तो तुम हिसाब-किताब नहीं लगाते।

त्याग का यही अर्थ है, संन्यास का यही अर्थ है कि तुम्हें प्यास लगी है और तुम सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार हो।

लोग कहते हैं--हां, परमात्मा को भी जानना है, लेकिन अभी और दूसरे काम करने को भी बाकी हैं; अभी और उलझनें हैं,उनको सुलझा लें। लोग परमात्मा को आखिर में टालते जाते हैं। वह तुम्हारी जरूरतों के क्यू में बिलकुल अंत में खड़ा है। और जरूरतों का क्यू कभी पूरा नहीं होता, वह अंत में ही खड़ा रह जाता है। तुम समाप्त हो जाओगे, तुम उसके पास कभी पहुंच न पाओगे। एक जरूरत पूरी नहीं होती कि दस पैदा हो जाती हैं; एक आकांक्षा भर नहीं पाती कि हजार पैदा हो जाती हैं; वह हमेशा पीछे ही खड़ा रहता है; वह इंच भर नहीं सरक पाता।

तुम्हारे जो जीवन की फेहरिस्त है, उस पर परमात्मा अंतिम है या प्रथम है, इस पर सब कुछ निर्भर करेगा। जिसकीफेहरिस्त में वह अंतिम है, वह मूढ़ है; और जिसकी फेहरिस्त में वह प्रथम है, वह अमूढ़ है; वह जागने लगा; उसने एक बात ठीक से समझ ली है कि इस जीवन में मैं कुछ भी इकट्ठा कर लूं, मौत उसे छीन लेगी। और जो छिन ही जाना है, उसे इकट्ठा करने में समय गंवाना व्यर्थ है।

'हे मूढ़, गोविन्द को भजो।'

भजना--इसे भी समझ लेना जरूरी है। क्योंकि तुम्हें भजन करते लोग मिल जाएंगे, और भजन वे नहीं कर रहे हैं; उनका भजन भी ऊपर-ऊपर है। मनोरंजन होगा शायद; जीवन को दांव पर नहीं लगाया है। मजा ले रहे होंगे शायद। किसी और गीत से भी इतना मजा मिल सकता था। किसी और संगीत में भी इतनी ही खुशी हो सकती थी।

लेकिन भजन का अर्थ है: तुम्हारे पूरे प्राण से कोई आह उठती है! तुम्हारे पूरे प्राण से कोई आवाज उठती है! तुम्हारे पूरे प्राण दांव पर लगे हैं--जैसे जीवन-मरण का सवाल हो!

गोविन्द को भजना हो तो खुद को गंवाना जरूरी है। खुद को बचाना चाहा और गोविन्द को भजना चाहा, तो तुम अपने को ही धोखा दोगे।

भजन की बड़ी आत्यंतिकता है, चरमता है।

रामकृष्ण को कोई राम का नाम भी ले देता--सिर्फ नाम! रास्ते पर चलते वक्त शिष्यों को खयाल रखना पड़ता कि कोईजयरामजी न कर ले। कोई अजनबी आदमी जयरामजी कर ले, वे वहीं खड़े हो जाते--भावाविष्ट हो जाते; हर्षोन्माद हो जाता;नाचने लगते बीच सड़क पर। शिष्यों की बड़ी फजीहत हो जाती; पुलिसवाला आ जाता कि हटाओ यहां से! यह क्या मचाया हुआ है?

किसी के शादी-विवाह में कोई निमंत्रण कर लेता, तो दूल्हा-दुल्हन पीछे हो जाते। किसी ने ऐसे ही नाम ले दिया! एक मित्र के घर बुला लिया था लोगों ने; भक्त था उनका, बुला लिया कि शादी में आशीर्वाद दे देंगे। लड़की की शादी थी, समारोह था। शादी होने के ही करीब थी कि किसी आदमी का नाम गोविन्द था और किसी ने बुलाया गोविन्द को--कि गोविन्द कहां है?भीड़भाड़। तो उसने जोर से चिल्लाया--गोविन्द कहां है? रामकृष्ण नाचने लगे! गोविन्द का भजन शुरू हो गया! वह बरात बरातन रही, विवाह विवाह न रहा, एक दूसरा ही समां बंध गया।

भजन का अर्थ है: चौबीस घंटे तुम्हारे भीतर एक सतत धारा प्रभु-स्मरण की बनी रहे। वह सतत धारा थी भीतर, इसलिए बाहर अगर कोई जरा भी राम का या कृष्ण का या गोविन्द का--परमात्मा का नाम ले देता--भीतर तो धारा मौजूद ही थी, भीतर तो नाच चलता ही था--बाहर की चोट पड़ जाती, भीतर का नाच बाहर बिखर जाता; भीतर चोट पड़ती, वह जो भीतर चल रही थी धारा, वह बाहर आ जाती। जैसे जल तो भरा ही था कुएं में, किसी ने बालटी डाल दी और पानी भर के बाहर आ गया। किसी ने राम का नाम ले दिया--भजन तो चल ही रहा था। भजन कोई ऐसी चीज नहीं है कि तुम कभी कर लो। जब भजन शुरू होता है तो अंत नहीं होता, चलता ही रहता है; एक सतत स्मरण है भीतर।

'हे मूढ़, गोविन्द को भजो, क्योंकि अंतकाल के आने पर व्याकरण की रटन तुम्हारी रक्षा न करेगी।'

कितना तुम शास्त्र जानते हो--मौत यह न पूछेगी। कितना तुमने सत्य जाना? मौत तुम्हारे सामने प्रकट कर देगी--जो तुमने जाना है, वही बच रहेगा; जो दूसरे ने जाना है और दूसरे से तुमने उधार जाना था, वह सब खो जाएगा। शास्त्र अगर उधार है, तो व्यर्थ है; और शास्त्र अगर तुममें आविर्भूत हुआ है, तुम भी उसी स्रोत पर पहुंच गए जहां उपनिषद के ऋषि पहुंचे थे,तुमने भी उसी जलस्रोत से अपनी प्यास बुझा ली जिससे उपनिषद के ऋषियों ने बुझाई थी, तब उपनिषद शास्त्र नहीं है, तब तुम्हारे लिए उपनिषद तुम्हारे ही बोध की अभिव्यक्ति है।

मुझसे लोग पूछते हैं कि मैं क्यों शंकर पर बोलता हूं या बुद्ध पर या क्राइस्ट पर? मैं सीधा भी बोल सकता हूं।

मैं सीधा ही बोल रहा हूं--उनसे मैं कहता हूं--क्योंकि शंकर के इस गीत में शंकर ने वही कहा है जो मैं कहना चाहूंगा। और इतने सुंदर ढंग से कहा है कि अब उसे और सुधारा नहीं जा सकता। आखिरी बात कह दी है। कोई जरूरत नहीं है अब उसे दोहराने की। शंकर पर मैं इसलिए नहीं बोल रहा हूं कि मुझे लगता है शंकर जानते हैं। लगने का सवाल नहीं है। मेरा कोई विश्वास नहीं है शंकर में। उसी जलस्रोत से मैंने भी जल पीया है, जहां से पीकर यह गीत उनमें पैदा हुआ होगा।

'हे मूढ़, धन बटोरने की तृष्णा को छोड़ो; सदबुद्धि को जगाओ और मन को तृष्णा-शून्य करो; तथा उसी से संतुष्ट और प्रसन्न रहो, जो अपने श्रम से मिलता है। हे मूढ़, सदा गोविन्द को भजो।'

'धन बटोरने की तृष्णा को छोड़ो।'

धन से केवल अर्थ उस धन का नहीं है जिसे तुम धन कहते हो; धन से उस सब का अर्थ है जिसको तुम बटोरते हो। जिसको भी बटोरने की तुम्हारे भीतर तृष्णा है, वह सभी धन है--फिर वह ज्ञान ही क्यों न हो। जब तुम ज्ञान भी बटोरते हो, तुम धन ही बटोर रहे हो। एक आदमी रुपये गिनता जाता है, कितने उसकी तिजोरी में हो गए। एक आदमी ज्ञान गिनता जाता है कि कितना ज्ञान उसने बटोर लिया, कितनी सूचनाएं उसके पास हो गईं, कितने शास्त्र उसने पढ़ लिए। पर दोनों बटोर रहे हैं। तीसरा आदमी हो सकता है त्याग बटोर रहा हो--कि कितने उपवास उसने किए। चौथा आदमी हो सकता है यश बटोर रहा हो--कि कितने लोग उसे मानते हैं, कितने लोग उसे पूजते हैं, कितने लोग उसके पीछे चलते हैं। जहां भी तुम बटोरते हो, जो भी बटोरा जाता है, वह सब धन है। और धन बड़े धोखे का है; क्योंकि भीतर तो तुम निर्धन ही बने रहते हो, और बाहर तुम बटोरते चले जाते हो। जो बाहर इकट्ठा किया है, वह भीतर न ले जाया जा सकेगा। और जिसे तुम अपने भीतर न ले जा सके, मौत उसे छीन लेगी; क्योंकि तुम ही मौत से पार जा सकोगे, और कुछ भी नहीं। केवल तुम्हारा होना ही गुजरेगा, लपटें उसे जला न सकेंगी,शस्त्र उसे बेध न सकेंगे--नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः। सिर्फ तुम गुजर पाओगे मौत के द्वार से--शुद्ध तुम, और कुछ भी नहीं।

अगर तुमने बाहर का ही धन बटोरा, तो तुम निर्धन गुजरोगे मौत के द्वार से। और जब मौत तुम्हें निर्धन बता देगी, तो जीवन में भी धन का सिर्फ धोखा ही हुआ। वह धन क्या जिसे हम साथ न ले जा सकें? संपत्ति वही है जो साथ जा सके,अन्यथा शेष सब विपत्ति है। जिसे तुम बटोरते हो, वह संपत्ति लगती है, संपत्ति है नहीं; है तो विपत्ति। और तुम भी जानते हो। बटोर लेने के बाद पता चलता है कि और विपत्ति बढ़ गई। संपत्ति से तो संतोष आता, संपत्ति से तो शांति आती, संपत्ति से तो निर्भयता आती, संपत्ति से तो तुम्हारे जीवन में एक स्वर गूंजता--कि पा लिया, पहुंच गए, घर आ गया; एक विश्राम की सुगंध तुम्हारे जीवन में उठती। लेकिन वह तो उठती दिखाई नहीं पड़ती। संपत्ति बढ़ती है, वैसे तुम्हारे जीवन में और भी दुर्गंध उठती है, और भी तुम्हारे जीवन में भय उठता है। संपत्ति क्या इकट्ठी होती है, हजार चिंताएं इकट्ठी होती हैं। संपत्ति से शांति तो नहीं मिलती, अशांति के द्वार खुल जाते हैं।

'हे मूढ़, धन बटोरने की तृष्णा को छोड़ो।'

बटोरने की ही तृष्णा को छोड़ो। बटोरने का इतना पागलपन क्यों है?

मैं एक घर में रहता था। उस घर के जो मालिक थे, वे बटोरने के शुद्ध अवतार थे। कोई भी चीज, जो व्यर्थ भी हो गई,उसे भी सम्हाल कर रख लेते! उनका घर एक कबाड़खाना था। उसमें वे कैसे जीते थे, यही बड़ा मुश्किल; कैसे रहते थे, यही बड़ा मुश्किल। एक दिन मैं सामने बगीचे में खड़ा था। वे मुझसे बात कर रहे थे और उनका छोटा लड़का एक