Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

भज गोविंदम मूढ़मते-6


तर्क का सम्यक प्रयोग—(प्रवचन—छठवां)

प्रश्न-सार

1- आपने बहुत बार कहा है कि तर्क और विवाद से कभी भी संवाद संभव नहीं होता; लेकिन शंकर ने विवाद और शास्त्रार्थ में सैकड़ों मनीषियों को पराजित किया। कृपया समझाएं कि शंकर का यह कैसा शास्त्रार्थ था?

2—जो कि मंजिल के करीब पहुंच चुका है, क्यों कर उसका पतन की खाई में गिरना संभव हो पाता है?

3—तथाकथित संन्यासी धर्म के नाम पर दुकानदारी करते हैं। और आपने अपने संन्यासियों को अपनी-अपनी दुकानें चालू रखने को कहा है। यह विरोधाभास है। कृपया इसे स्पष्ट करें।

4—ऐसा लगता है कि भज गोविन्दम् वानप्रस्थ अवस्था के लिए कहा गया है। लेकिन आप उसे सबके लिए कह रहे हैं!

5—ब्रह्म में रमण करने वाला क्या सचमुच भोग में रत हो सकता है?

पहला प्रश्न:

आपने बहुत बार कहा है कि तर्क और विवाद से कभी भी संवाद संभव नहीं होता। लेकिन शंकर ने अपनी विश्व-विजय की घोषणा की तथा विवाद और शास्त्रार्थ में सैकड़ों मनीषियों को पराजित किया। हारने पर उन्हें शंकर का शिष्यत्व स्वीकार करना पड़ता था। कृपया समझाएं कि शंकर का यह कैसा शास्त्रार्थ था?

तर्क और विवाद, तर्क और खंडन से न तो कभी कोई संवाद हुआ है, न हो सकता है।

संवाद का अर्थ है: दो हृदयों की बातचीत; विवाद से अर्थ है: दो बुद्धियों का टकराव।

संवाद का अर्थ है: दो व्यक्तियों का मिलन; विवाद से अर्थ है: दो व्यक्तियों का संघर्ष।

संवाद में कोई हारता नहीं, दोनों जीत जाते हैं; विवाद में कोई जीतता नहीं, दोनों हार जाते हैं।

लेकिन मजबूरी थी और शंकर को विवाद करना पड़ा; क्योंकि विवाद के पूर्व संवाद का कोई उपाय ही न था। शंकर ने सत्य को समझाने के लिए विवाद नहीं किया। लेकिन लोग अपनी बुद्धियों में, अपने अहंकारों में, अपने पांडित्य में इस भांति भरे थे कि जब तक उनका पांडित्य तोड़ा न जाए, उनकी बुद्धि पराजित न हो, वे धूल-धूसरित होकर गिरें न, तब तक वे हृदय की बात सुनने को राजी भी न थे। तो शंकर ने विवाद से उन्हें सत्य नहीं समझाया, विवाद से केवल उनके अहंकार को झुकाया। और जो झुकने को राजी हो जाए, उससे फिर संवाद हो सकता है।

शंकर का शास्त्रार्थ तो केवल निषेधात्मक था; वह तो एक लगे कांटे को दूसरे कांटे से निकालना था। तर्क से भरे हुए मन हैं, वे केवल तर्क की भाषा ही समझते हैं। पांडित्य से भरा हुआ मन केवल पांडित्य की भाषा समझता है; प्रेम की भाषा उसे सुनाई भी नहीं पड़ती। सुनाई भी पड़े तो उसमें कोई अर्थ नहीं मालूम होता। और मौन की भाषा का तो कोई सवाल ही नहीं है।

शंकर जब पैदा हुए, तब इस देश का पांडित्य अपने शिखर पर था। उसी पांडित्य ने इस देश को बर्बाद भी किया। यह देश खोपड़ी में अटक गया; और हृदय तक जाने के इसके द्वार बंद हो गए। गर्दनें काटनी जरूरी थीं, अन्यथा हृदय तक आने का कोई उपाय न था। और बीमारी इतनी भयंकर हो गई थी कि औषधि काम नहीं कर सकती थी; शल्य-चिकित्सा जरूरी थी, आपरेशन जरूरी था; काटे बिना कोई उपाय न था। मलहम-पट्टी से इलाज होने वाला न था। बीमारी काफी दूर आगे निकल जा चुकी थी।

तो शंकर को विवाद करना पड़ा; वह मजबूरी थी। शंकर विवादी नहीं हैं। शंकर और विवादी हों, यह संभव ही नहीं है। शंकर का रस तर्क में नहीं है, अन्यथा वे भज गोविन्दम् जैसा गीत न गाएं। उनके प्राण तो भजन गाने को बने थे। शंकर को ठीक अवसर मिलता तो वे नाचते; समय परिपक्व होता, लोग हृदय की भाषा समझते, तो शंकर ने तर्क किया ही न होता। लेकिन देश बीमार था; पांडित्य अपनी आखिरी अवस्था में था; लोगों के सिर भारी थे; उनका बोझ उतारना जरूरी था। और पंडित केवल तर्क ही समझ सकता था। तर्क से पराजित हो, तर्क से हारे, तो शायद राजी हो हृदय की भाषा सुनने को। झुकाया शंकर ने लोगों को।

और ध्यान रखना, जिसने सत्य को जाना हो, वह तर्क का भी उपयोग कर सकता है–हितकर दिशा में। जिसने सत्य को न जाना हो, उसके हाथ में तो तर्क का उपयोग खतरनाक है। जिसने सत्य को न जाना हो, उसके लिए तर्क ही सब कुछ हो जाता है–साध्य। जिसने सत्य को जाना हो, वह तर्क को भी सत्य की सेवा में संलग्न कर देता है। जिसने सत्य को जाना हो, वह तर्क को अनुचर बना लेता है। सत्य तर्क पर भी सवारी कर सकता है। साधारणतया तर्क छोटे बच्चों के हाथ में पड़ गई तलवार है। उससे वे दूसरों को भी नुकसान पहुंचा देते हैं और अंततः अपने को भी नुकसान पहुंचाएंगे। लेकिन ज्ञानी के हाथ में तर्क, समझदार के हाथ में तलवार है; उससे किसी को नुकसान न पहुंचेगा। हां, दुर्घटना के क्षणों में किसी की रक्षा हो सकती है।