Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

भज गोविंदम मूढ़मते-(3


सत्संग से निस्संगता—(प्रवचन—तीसरा)

सूत्र :

का ते कांता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः।

कस्य त्वं कः कुत आयातस्तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः।।

सत्संगत्वे निस्संगत्वं निस्संगत्वे निर्मोहत्वम्।

निर्मोहत्वे निश्चल चित्तं निश्चलचित्ते जीवनमुक्तिः।।

वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः।

क्षीणे वित्ते कः परिवारो ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः।।

मा कुरु धनजनयौवनगर्वं हरति निमेषात्कालः सर्वम्।

मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा।।

दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।

कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुग्चत्याशावायुः।।

का ते कांताधनगतचिन्ता वातुल किं तव नास्ति नियन्ता।

क्षणमपि सज्जनसंगतिरेका भवति भवावितरणे नौका।।

सूत्र के पूर्व, मनुष्य-मन की एक अत्यंत अनिवार्य ग्रंथि समझ लेनी जरूरी है। उस ग्रंथि के कारण ही बहुत से लोग समझ कर भी चूक जाते हैं। उस ग्रंथि के कारण ही खाई से तो बचते हैं, खड्ड में गिर जाते हैं; एक अति से तो मन बच जाता है, उस बचने की प्रक्रिया में ही दूसरी अति पर चला जाता है।

कोई अतिशय भोजन करता है, भोजनपटु है; सारा रस भोजन के पास है। आज नहीं कल, किसी के बिना समझाए भी उसे समझ में आ जाएगा कि वह अपने शरीर को कष्ट दे रहा है। पीड़ा होगी; बीमारी होगी; यह देखने में कोई कठिनाई न होगी कि अतिशय भोजन स्वास्थ्यदायी नहीं है। लेकिन तब एक खतरा है कि वह उपवास करना शुरू कर दे; अति भोजन से दूसरी अति पर चला जाए कि भोजन-त्याग ही कर दे।

संसार में राग है। धन में मोह है। दूसरी अति पर जाना बड़ा सुलभ है। संसार छोड़ कर भाग जाए। जहां राग था, वहां विराग आ जाए। और जहां मोह था, वहां मोह के प्रति विरोध, शत्रुता पैदा हो जाए। जिन्हें अपना माना था, उन्हें शत्रु मानने की वृत्ति पैदा हो जाए। तब खाई से तो बचे, खड्ड में गिर गए; कोई बहुत भेद न हुआ।

शंकर के ये सूत्र वैराग्य समझाने के लिए नहीं हैं, सिर्फ राग की व्यर्थता बताने को हैं। राग व्यर्थ हो जाए, बस काफी है; राग गिर जाए, बस काफी है। कहीं राग गिरे और वैराग्य पकड़ जाए, तो चूक हो गई। राग का गिर जाना ही बस वैराग्य है; वैराग्य कोई राग के गिर जाने से अतिरिक्त बात नहीं है।

लेकिन होता उलटा है। इन सूत्रों को पढ़ कर न मालूम कितने लोगों ने–असंख्य लोगों ने–राग को तो न गिराया, वैराग्य को पकड़ लिया! राग तो बना ही रहा–वैराग्य की शक्ल में बना रहा। पहले पैर के बल चलते थे, फिर वे शीर्षासन करके खड़े हो गए; लेकिन कुछ बदला नहीं। कहीं शीर्षासन करने से कुछ बदलता है? सिर ऊपर हो कि नीचे, क्या फर्क पड़ता है? जब राग शीर्षासन करता है तो वैराग्य बन जाता है–साधारण आदमी का वैराग्य; तथाकथित संन्यासियों का वैराग्य। लेकिन जब राग गिर जाता है तो महावीर, बुद्ध और शंकर का वैराग्य पैदा होता है।

मुल्ला नसरुद्दीन को एक मानसिक बीमारी थी कि जब भी उसकी फोन की घंटी बजे, तो वह घबड़ा जाए, डरे–कि पता नहीं, मकान मालिक ने किराए के लिए फोन न किया हो; कि जिस दफ्तर में नौकरी करता है, कहीं उस मालिक ने नौकरी से अलग न कर दिया हो–हजार चिंताएं पकड़ें; फोन उठाना उसे मुश्किल हो जाए। तो मैंने उसे कहा कि तू किसी मनोचिकित्सक को दिखा ले।

दोत्तीन महीने उसने इलाज लिया। एक दिन मैं उसके घर गया, वह फोन कर रहा था। और उसे कंपते भी मैंने नहीं देखा, डरते भी नहीं! फोन करने के बाद मैंने पूछा कि मालूम होता है, चिकित्सा काम कर गई! अब डर नहीं लगता?

नसरुद्दीन ने कहा, डर की बात है; चिकित्सा जरूरत से ज्यादा फायदा की।

तो मैंने पूछा कि जरूरत से ज्यादा फायदा का क्या मतलब? फायदा काफी है; जरूरत से ज्यादा से तुम्हारा क्या प्रयोजन है?

उसने कहा, अब तो ऐसी हिम्मत आ गई कि घंटी नहीं भी बजती तो भी मैं फोन करता हूं। पहले घंटी बजने से डरता था; अब अभी-अभी जो फोन कर रहा था, घंटी बजी ही नहीं थी और मैंने मकान मालिक को डांट दिया। वह इतना डर गया है कि बोलता भी नहीं उस तरफ से। चुप! सांस की आवाज का भी पता नहीं चलता है।

एक अति से दूसरी अति पर जाना बहुत सुगम है। और मनुष्य-जीवन की यह बड़ी से बड़ी विडंबना है। कहावत है कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीने लगता है। वह दूसरी अति हो गई। दूध का जला जैसे छाछ भी फूंक-फूंक कर पीने लगता है, वैसा संसार से डरा हुआ व्यक्ति बहुत गहरे में परमात्मा से भी डर जाता है। संसार का जला हुआ परमात्मा को भी फूंक-फूंक कर पीने लगता है।

संसार तो छूटना चाहिए–भय के कारण नहीं; क्योंकि जिसे भी तुम भय के कारण छोड़ोगे, वह छूटेगा नहीं; जिससे तुम भयभीत होओगे, वह तुम्हारा पीछा करेगा; जिससे तुम डरोगे, वह तुम्हें और डराएगा; जिससे तुम भागोगे, वह तुम्हारे पीछे आएगा। क्योंकि भय तो भीतर है, भागोगे कहां? किससे भागोगे? संसार अगर बाहर होता तो भाग जाते। जहां जाओगे, वहीं संसार पाओगे। हिमालय की गुफा में भी तुम तो रहोगे–वही, जैसे तुम यहां हो।

इसलिए असली सवाल स्थान बदलने का नहीं है; न असली सवाल रंग-ढंग बदलने का है; असली सवाल तो भीतर की चित्त-दशा बदलने का है। अभी तुम्हारी जो चित्त की दशा है, वह एक तरफ अतिशय झुकी है। इसे दूसरी तरफ अतिशय मत झुका लेना, क्योंकि अतिशय ही रोग है। मध्य में जो संतुलित हो गया, वह मुक्त हो गया। इसलिए बुद्ध ने तो अपने मार्ग को मज्झिम निकाय कहा–मध्य का मार्ग।

जो बीच में आ गया, वह पहुंच गया; जो न इस तरफ झुकता, न उस तरफ। जब तक झुकोगे एक तरफ, तब तक जीवन में कंपन रहेगा, थिरता न आएगी; तब तक स्वस्थ न हो सकोगे; तब तक डांवाडोल ही रहोगे। ठीक मध्य में ही, जैसे दीये की ज्योति ठहर जाए, हवा का कोई झोंका न हिलाए, ऐसी ही चेतना की ज्योति जब ठीक मध्य में ठहर जाती है–न वासना हिलाती है, न वैराग्य हिलाता है; न पूरब, न पश्चिम; न इस तरफ, न उस तरफ–कुछ कंपता ही नहीं। इसको कृष्ण ने स्थितप्रज्ञ कहा है। उठो, बैठो–तुम्हारे भीतर कोई उठता नहीं, बैठता नहीं; भोजन करो, उपवास करो–तुम्हारे भीतर न कोई भोजन करता है, न उपवास करता है; संसार में रहो कि संन्यास में–न तुम्हारे भीतर संन्यास है और न संसार है। ऐसी परम मध्यावस्था ही वैराग्य है।

वैराग्य राग के विपरीत हो तो गलत है; वैराग्य राग से मुक्ति हो तो सही है। और यह बड़ा बारीक भेद है। वैराग्य राग के विपरीत हो तो समझ लेना कहीं चूक हो गई; क्योंकि जो राग के विपरीत है, वह राग से जुड़ा है।

सभी विपरीत आपस में जुड़े होते हैं। किसी से प्रेम करो तो उसकी याद आती है; किसी को घृणा करो तो भी उसकी याद पीछा नहीं छोड़ती। प्रेम और घृणा विपरीत हैं; लेकिन जुड़े हैं। मित्र तो भूल भी जाए, शत्रु नहीं भूलता। कांटा चुभता ही रहता है। मित्र से भी संबंध है और शत्रु से भी संबंध है।

तुम ऐसा मत समझना कि शत्रु वह है जिससे हमारे सब संबंध टूट गए। नहीं, अगर सभी संबंध टूट गए तो वह शत्रु कैसे होगा? शत्रु वह है जिससे मित्रता के संबंध न रहे, शत्रुता के संबंध बन गए; संबंध टूटे नहीं। संबंध टूट जाएं–न तो मित्र फिर मित्र है, न शत्रु फिर शत्रु है। संबंध बदल जाएं तो मित्र शत्रु बन जाता है, शत्रु मित्र बन जाते हैं।

मित्र को शत्रु बनाने में कितनी देर लगती है? एक क्षण में हो सकता है। शत्रु को मित्र बनाने में कितनी देर लगती है?

देर क्यों नहीं लगती? क्योंकि दोनों ही संबंध हैं। जरा सा रुख बदला–पूरब जाते थे, पश्चिम जाने लगे; पश्चिम जाते थे, पूरब जाने लगे; दोनों ही गतियां हैं, सिर्फ चेहरे को जरा सा बदलने की जरूरत है।

मैंने सुना है, इंग्लैंड में एक बहुत बड़ा विचारक हुआ, एडमंड बर्क। लंदन के पास एक छोटे गांव में प्रवचन देने के लिए उसे बुलाया था, चर्च में बोलना था। थोड़ा भुलक्कड़ स्वभाव का आदमी था। तो यह अक्सर भूल हो जाती थी, समय पर नहीं पहुंचता, तारीख पर न पहुंचता, दूसरे दिन पहुंच जाता। तो उसने उस बार बड़ा हिसाब रखा, क्योंकि निमंत्रण देने वाले बहुत समझा-समझा कर कह गए थे कि आप ठीक समय पर, ठीक दिन पर पहुंच जाना; आप पर ही सब निर्भर है। चर्च की कोई वर्षगांठ थी।

तो शाम को सात बजे पहुंचना है तो दो बजे घर से निकल पड़ा। मुश्किल से घंटे भर का रास्ता था। अपने घोड़े पर बैठा। तीन बजे पहुंच गया। चर्च में तो कोई था ही नहीं। जलसा तो रात सात बजे होने को था। तो द्वार पर ही खड़ा था। अब क्या करना, तो उसने अपनी सिगरेट निकाली, मुंह से लगाई, माचिस जलाई; लेकिन हवा का रुख विपरीत था। तो उसने घोड़े को घुमा कर खड़ा कर लिया, ताकि सिगरेट जलने में बाधा न पड़े। सिगरेट तो जल गई और घोड़ा चल पड़ा। तीन बजे चर्च पहुंचा था, चार बजे अपने घर के सामने खड़ा था। उसने बड़े गौर से देखा कि चर्च का क्या हुआ? तब उसे याद आया कि सिगरेट जलाने को घोड़े का रुख बदल लिया था। वह सिगरेट पीने में लग गया और घोड़ा अपने घर की तरफ चल पड़ा।

इतना ही फर्क है दिशा के बदलने में। कोई जरा सी घटना–सिगरेट जलाने की घटना, रुख बदलने का कारण हो सकती है। मित्र शत्रु बन जाए, शत्रु मित्र बन जाए। पूरब से पश्चिम मुड़ जाएं, पश्चिम से पूरब मुड़ जाएं। कोई छोटी सी घटना–दिवाला निकल गया, कि पत्नी मर गई, कि बच्चे की मृत्यु हो गई–और आदमी घर छोड़ दे, त्यागी हो जाए। ये घटनाएं भी सिगरेट जलाने से ज्यादा मूल्य की नहीं हैं। पर रुख बदल सकता है। पर यह त्याग झूठा होगा। इस त्याग में घृणा होगी, समझ नहीं; इस त्याग में असफलता होगी, बोध नहीं; इस त्याग में विषाद होगा, मुक्तता नहीं।

एक और त्याग है, जिसमें हम रुख नहीं बदलते; संसार को ही गौर से देखते हैं, संसार की तरफ पीठ नहीं करते। पर उस गौर से देखने में ही संसार तिरोहित हो जाता है। उस बोध में ही, उस ध्यान की दशा में ही हम देख लेते हैं कि संसार का सारा संबंध व्यर्थ है। कोई नया संबंध निर्मित नहीं करते संसार से, कि अब तक हम आकर्षण से जुड़े थे, अब हम विकर्षण से जुड़ेंगे; अब तक हम संसार की तरफ दौड़ते थे, अब संसार के विपरीत दौड़ेंगे। नहीं, अगर ऐसा हुआ तो वैराग्य गलत हो गया। वह नया रोग है अब। और तब इस रोग से भी छुटकारा पाना पड़ेगा। वह स्वास्थ्य नहीं बना।

ऐसा समझो कि एक आदमी बीमार है। बीमारी तो चली गई, दवा पकड़ गई। अब वह दवा की बोतलें लिए घूमता रहता है। अब दवा की बोतलें नहीं छोड़ सकता।

बुद्ध कहते थे कि ऐसा समझो कि पांच नासमझों ने नदी पार की थी। फिर उन्होंने नाव को उठा कर सिर पर रख लिया। लोगों ने उनसे पूछा कि यह तुम क्या कर रहे हो? उन्होंने कहा, इस नाव का हम पर बड़ा उपकार है; इसके बिना हम नदी पार न किए होते; हम इस नाव को कैसे छोड़ सकते हैं? हम ऐसे कृतघ्न नहीं हैं। वे नाव को सिर पर बाजार में ढोकर आ गए। लोगों ने कहा कि यह नाव पार करने वाली न हुई, यह तो बोझ हो गई। अब तुम जिंदगी भर इसको ढोते रहोगे! अब तुम कुछ और कर ही न पाओगे।

तुम जिन्हें संन्यासियों की तरह जानते हो–तुम्हारे तथाकथित महात्मागण–अगर गौर से देखो तो उनके सिर पर तुम नाव पाओगे। राग तो छूटा, वैराग्य चढ़ बैठा! क्योंकि राग की विपरीतता को उन्होंने पोषित किया।

शंकर जो कह रहे हैं, यह बात कुछ और है। वे इतना ही कह रहे हैं कि राग को गौर से देखो, ध्यानपूर्वक देखो, विवेकपूर्वक देखो। तुम्हारी बोध की अवस्था में राग के बादल छितर-बितर हो जाएंगे। कोई उनकी जगह वैराग्य आ जाएगा, ऐसा नहीं।

वैराग्य, राग का अभाव है, राग की शत्रुता नहीं। ऐसा नहीं कि तुम्हारे हृदय से राग चला जाएगा और वैराग्य आकर विराजमान हो जाएगा। नहीं, राग तो चला जाएगा, और कोई नहीं आएगा विराजमान होने को; राग तो हट जाएगा, उसका स्थान कोई भी नहीं लेगा। यही परम वैराग्य है।

इसलिए इन सूत्रों को समझने में भूल मत कर लेना; क्योंकि यह भूल बड़ी आसान है।

‘कौन तुम्हारी कांता है? कौन तुम्हारा पुत्र है? यह संसार अत्यंत विचित्र है। तुम किसके हो? कौन हो? कहां से आए हो? मन में इन तत्व की बातों पर विचार तो करो।’

शंकर विचार करने को कह रहे हैं; चिंतन करने को कह रहे हैं; जागने को कह रहे हैं; होशपूर्वक देखने को कह रहे हैं। जल्दी वैराग्य मत ओढ़ लेना, अन्यथा ओढ़ा हुआ वैराग्य किसी काम न आएगा। विचारपूर्वक! तुम्हारे हृदय में प्रकाश हो समझ का, तो राग गिरेगा, कटेगा। अंधेरे को निकालने मत लग जाना, सिर्फ दीया जलाना काफी है।

इसलिए शंकर कहते हैं: ‘कौन तुम्हारी कांता है?’

कौन है तुम्हारी पत्नी? कौन तुम्हारा पुत्र है? राह पर मिले अजनबी हैं। जिसे तुम अपना पुत्र कहते हो–नहीं पैदा हुआ था, कोई परिचय था? तुमने इसी पुत्र को पुकारा था पैदा हो जाने के लिए? जानते भी न थे, पुकारते कैसे? पता-ठिकाना भी तो मालूम न था; शक्ल-सूरत भी तो पहचानी हुई न थी। अनजान मिलन, अपरिचित लोगों का मिलन है।

लेकिन आदमी का मन भ्रांतियां खड़ी करता है। मेरा पुत्र है, मेरी पत्नी है, मेरा भाई है, बहन है–ये जो तुम संबंध जोड़ते हो, ये तुम कैसे जोड़ लेते हो, यह बड़ी विचित्र घटना है। जैसे राह पर चलते हुए दो लोग साथ हो जाते हैं। अपरिचित थे एक क्षण पहले, अब थोड़ी देर को साथ हो लिए। साथ थोड़ी देर का है, फिर अपनी-अपनी राह पर विदा हो जाएंगे। लेकिन उस थोड़ी देर में ही बड़े नाते-रिश्ते बना लेते हैं। कारण होगा कोई गहरा इसके पीछे। नाते-रिश्ते सच तो नहीं हैं; क्योंकि हम सब अपरिचित हैं–और वर्षों साथ रह कर भी परिचित नहीं हो पाते।

तुम अपनी पत्नी से परिचित हो? तीस-चालीस वर्ष साथ रह लिए हो। क्या सच में तुम कह सकते हो, तुमने उसे पूरा जान लिया? क्या तुम यह कह सकते हो कि वह जो भी कल करेगी, तुम उसकी भविष्यवाणी कर सकते हो?

एक क्षण बाद तुम्हारी पत्नी क्या करेगी, चालीस साल साथ रहने के बाद भी कोई भविष्यवाणी नहीं हो सकती। अभी मुस्कुराती थी, प्रसन्न थी; अभी नाराज है! कौन सी ऋतु आ जाएगी, कुछ कहना कठिन है; कौन सी चित्त-दशा पकड़ लेगी, कहना कठिन है।

पत्नी तुम्हें जानती है? ऊपर-ऊपर की पहचान है। भीतर कौन किसके जा सकता है? अपने ही भीतर जाना इतना मुश्किल है, दूसरे के भीतर जाना कैसे आसान होगा? लेकिन कारण कोई गहन होना चाहिए, क्यों हम नाते-रिश्ते बना लेते हैं?

आदमी अकेला है, इसलिए; अकेले में डर लगता है, इसलिए; अकेले में चिंता पकड़ती है, भय पकड़ता है, इसलिए। अकेले होने में बड़ी पीड़ा है। हम अकेले हैं। जमीन भरी-पूरी हो, पर प्रत्येक व्यक्ति अकेला है। भीड़ में भी तुम हो, तब भी अकेले हो। यह अकेलापन काटता है। इस अकेलेपन से ऐसा लगता है कि कैसे बाहर निकलें। संबंध बनाते हो, संबंध रास्ते हैं जिनसे तुम अपने को भूलते हो और अपने अकेलेपन को भूलते हो। थोड़ी देर के लिए ऐसा लगता है, अकेले नहीं हैं।

तुमने कभी ख्याल किया? अंधेरी गली से गुजरते हो, अकेलापन डराता है, तो गीत गुनगुनाने लगते हो। ऐसे लोग तुमसे गीत गुनगुनाने को कहें तो तुम बहुत झेंपते हो, गीत न गाओगे। अकेली गली हो, सन्नाटा हो, रात हो, अंधेरा हो–गीत गुनगुनाने लगते हो! क्या कारण होगा गीत गुनगुनाने का? सीटी बजाने लगते हो! क्या कारण होगा? गीत गुनगुना कर अपनी ही आवाज को सुन कर ऐसा लगता है–अकेले नहीं हैं, कोई साथ है। अपने ही गीत में भूल कर क्षण भर को ऐसी भ्रांति हो जाती है कि कोई डर नहीं है। गीत हिम्मत देता है, जोश देता है।

अकेले में आदमी अपने से ही बात करने लगता है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अगर किसी व्यक्ति को परिपूर्ण एकांत में रखा जाए, तो तीन सप्ताह के बाद वह अपने से ही बातचीत शुरू कर देता है। करते तो तुम भी हो अपने से बातचीत, जोर से नहीं करते हो। अगर तुम खाली बैठे हो तो खाली नहीं होते, अपने से बात करते हो तो भीतर-भीतर। अगर कोई गौर से देखे तो तुम्हारे ओंठों का कंपन भी देख सकता है; क्योंकि जब तुम भीतर भी बात करते हो, तब भी ओंठ कंपते हैं। लेकिन अगर तीन सप्ताह तुम्हें निर्जन में रख दिया जाए, तो निर्जन इतना भयावह है–अकेले, इस विराट संसार में! इस महाशून्य में बिलकुल अकेले! घबड़ाहट होती है; प्राणों का रोआं-रोआं कंपने लगता है। तुम अपने से ही बात करने लगते हो।

तुमने पागलों को खुद से बात करते देखा है। वे तुम्हारे ही थोड़े बढ़े हुए रूप हैं। उनमें और तुममें मात्रा का ही भेद है, गुण का नहीं। तुम धीरे-धीरे करते हो, वे जरा हिम्मतवर हैं, उन्होंने जोर से चर्चा शुरू कर दी है। पागल भी इसीलिए अपने से बात करता है, वह बड़ा घबड़ा गया है। अपने से बात करके थोड़ी देर को भूल जाता है।

ये सब भुलाने के उपाय हैं, आत्म-विस्मरण के उपाय हैं।

एक जर्मन लेखक का संस्मरण मैं पढ़ रहा था। हिटलर के कारागृह में वह बंद था। उसने लिखा है कि मैं बहुत हैरान हुआ कि मुझे हमेशा छिपकलियों से डर लगता था, लेकिन मेरी उस कोठरी में सिर्फ एक छिपकली थी और मैं था–कारागृह में। छिपकली से, वह कहता है, मुझे सदा डर लगता रहा है; छिपकली मुझे कभी भायी नहीं; छिपकली को देख कर ही मन में कुछ वितृष्णा हो जाती थी। मगर उस कोठरी में छिपकली को पाकर भी मैं प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो है, मैं अकेला नहीं हूं। इस अंधेरी सीलन भरी कोठरी में कोई संगी-साथी है। और धीरे-धीरे, उसने लिखा है कि मैं छिपकली से बातें करने लगा। हंसता भी था कि यह भी क्या पागलपन है! लेकिन आखिर में ऐसी भी घड़ी आई कि मुझे यह भी शक होने लगा कि छिपकली उत्तर देती है। तब मैं अपनी तरफ से भी बोलता और छिपकली की तरफ से भी बोलता।

आदमी अकेला है; बहुत अकेला है। और इस अकेलेपन के साथ दो ही उपाय हैं: या तो तुम संसार बना लो, या तुम संन्यास बना लो।

संसार बनाने का अर्थ है: संबंध बनाओ, ताकि अकेलापन भूल जाए। और संन्यास बनाने का अर्थ है: इस अकेलेपन को स्वीकार कर लो, क्योंकि यह तुम्हारा स्वभाव है। इससे भागो मत, बचो मत; राजी हो जाओ, अंगीकार कर लो; यह तुम्हारा स्वभाव है। इससे भाग कर तुम कहीं भी न पहुंच पाओगे। जन्मों-जन्मों यही तुमने चेष्टा की है और हारे, हार के सिवाय हाथ में कुछ भी न लगा।

संन्यास का अर्थ है: जो अपने अकेलेपन से राजी हो गया। अब न सीटी बजाता है, न गीत गाता है, न संबंध बनाता है–अपने से परिपूर्ण तृप्त है।

और एक बड़े मजे की घटना है: जितना तुम अपने से भागोगे, उतना ही और-और भागना पड़ेगा, उतना ही एकांत भयभीत करेगा; जितने तुम अपने से राजी हो जाओगे, उतना ही धीरे-धीरे तुम पाओगे कि जिसे तुमने अकेलापन समझा था, वह अकेलापन नहीं है, एकांत है।

अकेलापन और एकांत में फर्क है। अकेलेपन का अर्थ है कि दूसरे की याद आती है; एकांत का अर्थ है, अपना होना काफी है। अकेलेपन में पीड़ा है, एकांत में आनंद है।

शंकर जब अकेले हैं, तो एकांत में हैं; तुम जब कहते हो, एकांत में हो, तब भी अकेले हो।

अकेले का मतलब है: दूसरे की गैर-मौजूदगी खलती है। एकांत का अर्थ है: अपने होने में बड़ा रस आता है। एकांत का अर्थ है: तुम अपने साथ प्रेम में पड़ गए।

ध्यान का अर्थ है: अपने ही प्रेम में पड़ जाना।

ध्यान का अर्थ है: अपने साथ ऐसे संबंध बना लेना कि अब दूसरे से संबंध बनाने की कोई जरूरत न रही।

ध्यान का अर्थ है: अपने में परिपूर्ण हो जाना।

तुम्हारा संसार, पूरा संसार तुम्हारे भीतर है; कुछ कमी नहीं है। तुम पूरे हो, परिपूर्ण हो, परमात्मा हो; अब कहीं और जाने की कोई जरूरत नहीं है। ऐसी भाव-दशा का नाम संन्यास है।

संसार हम बनाते हैं–अकेलापन खलता है। अकेलेपन को भरने के लिए हम बहुत उपाय करते हैं–धन से भरते हैं, मित्र से भरते हैं, परिवार से भरते हैं; धर्म, जाति, राष्ट्र से भरते हैं–न मालूम कितने उपाय करते हैं कि किसी तरह भीतर का यह गङ्ढ भर जाए; यह घाव पीड़ा देता मालूम पड़ता है। लेकिन यह घाव है, यहीं भ्रांति है; यह घाव नहीं है।

कल रात्रि ही एक संन्यासिनी मेरे पास आई। उसने कहा, जब से ध्यान करना शुरू किया है, तो ऐसा लगता है–हृदय मर गया; किसी से संबंध बनाने की कोई आकांक्षा नहीं रही; प्रेम में कोई रस नहीं मालूम होता; मित्रता भी व्यर्थ मालूम होती है।

उदास थी बहुत। क्योंकि पश्चिम से आई है। पश्चिम में अगर प्रेम मरने लगे तो लोग समझते हैं, जीवन गया; अगर भावनाएं छूटने लगें और संबंध टूटने लगें, तो लोग सोचते हैं: अब जीवन में सार क्या रहा? यह व्याख्या है उनकी, इसलिए उदास थी।

हमने पूरब में कुछ और गहरी खोज की है। हमने तो यह खोज की है कि जब कोई व्यक्ति परिपूर्ण अपने में ठहर जाता है, तो सब संबंध अपने आप बिखर जाते हैं। और यह महासौभाग्य की घटना है; इसमें कुछ दुखी होने का कारण नहीं है। जब व्यक्ति अपने में थिर होता है, कामवासना विसर्जित हो जाती है; संबंध बनाने की आतुरता चली जाती है। इतना धन्यभाग मालूम होता है भीतर कि अब किससे क्या संबंध बनाना! अब वह भिखारी की भांति लोगों के सामने हाथ नहीं फैलाता–कि तुम्हारे संबंध के लिए भिक्षा मांगता हूं, कि तुम्हारे बिना मैं न जी सकूंगा। अब वह जी सकता है अकेला। और जो अकेला जी सकता है, वही जी सकता है; बाकी सब जीना धोखा है, माया है। जो अकेला नहीं जी सकता, वह किसी के साथ भी कैसे जीएगा?

तो मैंने उस युवती को, संन्यासिनी को कहा–भयभीत न हो, दुखी भी मत हो, यह तेरी व्याख्या गलत है; पश्चिम की व्याख्या गलत है। आह्लादित हो कि तेरा धन्यभाग है, अहोभाग है कि अब कोई संबंध की आकांक्षा न रही।

संबंध सिवाय पीड़ा के और कुछ लाते भी नहीं, सिवाय दुख के और कुछ लाते भी नहीं। ठीक भी है कि दुख ही लाएंगे; क्योंकि दो दुखी लोग जब मिलते हैं तो एक-दूसरे को सुख कैसे दे पाएंगे! गणित भी तो थोड़ा सा साफ करो। जब दो दुखी व्यक्ति मिलते हैं, तो दुख दो गुना नहीं होता, अनंतगुना हो जाता है, गुणनफल हो जाता है।

तुम सुखी नहीं हो, इसलिए दूसरे को खोज रहे हो; तुम अपने अकेले में आनंदित नहीं हो, इसलिए दूसरे को खोज रहे हो। दूसरा भी तुम्हें इसीलिए टटोल रहा है; वह भी अपने साथ आनंदित नहीं है। ऐसे दो दुखीजन मिल जाते हैं–इस आशा में कि मिलन से सुख होगा। सुख कभी नहीं होता। हो नहीं सकता; क्योंकि दो भिखारी एक-दूसरे के सामने भिक्षापात्र फैलाए खड़े हैं। उनमें दाता कोई भी नहीं है, दोनों भिखारी हैं। दोनों प्रतीक्षा कर रहे हैं कि दूसरा कुछ दे।

तुमने जिनसे भी प्रेम किया है, आशा की है–कुछ दे; दूसरा कुछ दे।

मेरे पास लोग आते हैं; वे कहते हैं कि हम तो बहुत प्रेम करते हैं, लेकिन दूसरा हमें प्रेम नहीं करता।

तुम कैसे प्रेम करोगे? प्रेम तो केवल आनंद के शिखर से ही बहता है; वह गंगा तो आनंद के ही शिखर से बहती है। तुम आनंदित ही नहीं हो। तुम मांगने गए हो, दूसरा भी मांगने आया है; तुम छीनने गए हो, दूसरा भी छीनने आया है; न तुम्हारे पास कुछ है, न उसके पास कुछ है–दोनों प्रतीक्षा कर रहे हो कि दान मिले। प्रतीक्षा लंबी होने लगती है, और हताशा घिरने लगती है।

व्यक्ति अपने भीतर जब तक आनंदित न हो जाए, तब तक उसे कोई आनंदित कर भी नहीं सकता।

बड़ी प्राचीन कथा है कि परमात्मा ने आदमी को बनाया। आदमी अकेला था; अकेलापन उसे काटने लगा; अकेलेपन से वह घबड़ाया। उसने परमात्मा से प्रार्थना की कि कोई संगी-साथी दो, मैं अकेला हूं। लेकिन परमात्मा के पास जितनी भी चीजें थीं, जो भी साज-सामान था, वह सब उपयोग कर चुका था; कुछ बचा न था। जंगल बनाए, पहाड़ बनाए, पशु-पक्षी बनाए; आदमी आखिरी बात थी। मजबूरी थी, कोई सामान नहीं बचा था, सामग्री नहीं बची थी।

पर आदमी बहुत रोया, चीखा-चिल्लाया, तो उसने कहा कि रुको। उसने स्त्री को बनाने की कोशिश की। सामान नहीं था तो उसने अलग-अलग पशु-पक्षियों से, फूलों से, पौधों से मांगा। चांद से कहा कि तेरी थोड़ी रोशनी दे दे, मोर से कहा कि तेरी थोड़ी अकड़ दे दे, कबूतरों से कहा कि तुम्हारी थोड़ी गुनगुनाहट दे दो, तोतों से कहा कि तुम्हारी थोड़ी वाणी दे दो, नदियों से कहा कि तुम्हारी थोड़ी चंचलता, गति दे दो, कोमल फूलों से कहा कि तुम्हारी थोड़ी कोमलता दे दो। ऐसा उसने मांगा सारे संसार से और स्त्री बनाई।

सात दिन बाद आदमी वापस पहुंचा, उसने कहा, यह भी क्या मुसीबत कर दी! हम तो सोचते थे साथ मिलेगा; यह स्त्री तो एक उपद्रव है। यह चौबीस घंटे चख-चख लगाए रखती है।

वह तोतों से मांगी थी वाणी। कोमल तो है बहुत, जब प्रेम करती है तो बड़ी कोमल है। लेकिन अकड़ भी इसकी बहुत है। वह मोरों से अकड़ मांगी थी। दयालु बहुत है, लेकिन कठोर भी बहुत है। अलग-अलग जगह से सामान इकट्ठा किया था।

बड़ी विरोधाभासी है। मैं तो घबड़ा गया–आदमी ने कहा–इससे तो अकेले बेहतर थे; लाख गुना बेहतर थे। इसे आप वापस ले लो।

परमात्मा ने स्त्री वापस ले ली। लेकिन सात दिन बाद आदमी फिर खड़ा था! उसने कहा कि माना कि वह उपद्रव भी करती है, लेकिन उसकी बड़ी याद आती है; अब उसके बिना मैं रह नहीं सकता। ये सात दिन न तो सो सका, न ठीक से खा-पी सका; कुछ भी करता हूं, याद उसकी ही मन में गूंजती रहती है। मुझे वापस लौटा दो।

फिर सात दिन बाद द्वार पर खड़ा था! कहने लगा, यह तो बड़ी मुसीबत है; न उसके साथ रह सकता हूं, न उसके बिना रह सकता हूं।

कहते हैं, परमात्मा ने पीठ मोड़ ली। उसने कहा कि अब यह बकवास मैं कब तक सुनूंगा? अब तुम जाओ, अपना निपटारा खुद ही करो। हर सात दिन बाद तुम आ जाओगे। न साथ रह सकते हो, न बिना उसके रह सकते हो। तो अब तुम ही निपटारा करो!

तब से आदमी निपटारा कर रहा है; अभी तक सुलझा नहीं। कभी सुलझेगा भी नहीं। क्योंकि जब तुम अकेले हो, तब तुम्हें अपना अकेलापन भयभीत करता है। जब तुम किसी के साथ हो, तो उसकी मौजूदगी काटने लगती है। जब तुम साथ हो, तब तुम अकेले होना चाहते हो; जब तुम अकेले हो, तब तुम साथ होना चाहते हो। जब तुम साथ हो, तब दूसरे की बुराइयां दिखाई पड़ने लगती हैं, दूसरा चुभने लगता है; जब तुम अकेले हो, तब खालीपन दिखाई पड़ता है, शून्य घेर लेता है। शून्य मौत जैसी मालूम होती है। साथ में भी दुर्गति होती है, एकांत में भी मुसीबत हो जाती है।

इसलिए आदमी हजार तरह के संबंध बनाता है। पत्नी को घर लाता है, ताकि अकेला न रहे। फिर पत्नी से बचने को होटल में बैठा रहता है। क्लबघर में बैठा है, क्लबघर का सदस्य बनता है कि वह पत्नी से बचना है। एक भूल करता है, फिर एक भूल से बचने को दूसरी भूल करता है, फिर दूसरी से बचने को तीसरी भूल करता है। एक शृंखला भूलों की हो जाती है। उस