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भज गोविंदम मूढ़मते-(3


सत्संग से निस्संगता—(प्रवचन—तीसरा)

सूत्र :

का ते कांता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः।

कस्य त्वं कः कुत आयातस्तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः।।

सत्संगत्वे निस्संगत्वं निस्संगत्वे निर्मोहत्वम्।

निर्मोहत्वे निश्चल चित्तं निश्चलचित्ते जीवनमुक्तिः।।

वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः।

क्षीणे वित्ते कः परिवारो ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः।।

मा कुरु धनजनयौवनगर्वं हरति निमेषात्कालः सर्वम्।

मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा।।

दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।

कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुग्चत्याशावायुः।।

का ते कांताधनगतचिन्ता वातुल किं तव नास्ति नियन्ता।

क्षणमपि सज्जनसंगतिरेका भवति भवावितरणे नौका।।

सूत्र के पूर्व, मनुष्य-मन की एक अत्यंत अनिवार्य ग्रंथि समझ लेनी जरूरी है। उस ग्रंथि के कारण ही बहुत से लोग समझ कर भी चूक जाते हैं। उस ग्रंथि के कारण ही खाई से तो बचते हैं, खड्ड में गिर जाते हैं; एक अति से तो मन बच जाता है, उस बचने की प्रक्रिया में ही दूसरी अति पर चला जाता है।

कोई अतिशय भोजन करता है, भोजनपटु है; सारा रस भोजन के पास है। आज नहीं कल, किसी के बिना समझाए भी उसे समझ में आ जाएगा कि वह अपने शरीर को कष्ट दे रहा है। पीड़ा होगी; बीमारी होगी; यह देखने में कोई कठिनाई न होगी कि अतिशय भोजन स्वास्थ्यदायी नहीं है। लेकिन तब एक खतरा है कि वह उपवास करना शुरू कर दे; अति भोजन से दूसरी अति पर चला जाए कि भोजन-त्याग ही कर दे।

संसार में राग है। धन में मोह है। दूसरी अति पर जाना बड़ा सुलभ है। संसार छोड़ कर भाग जाए। जहां राग था, वहां विराग आ जाए। और जहां मोह था, वहां मोह के प्रति विरोध, शत्रुता पैदा हो जाए। जिन्हें अपना माना था, उन्हें शत्रु मानने की वृत्ति पैदा हो जाए। तब खाई से तो बचे, खड्ड में गिर गए; कोई बहुत भेद न हुआ।

शंकर के ये सूत्र वैराग्य समझाने के लिए नहीं हैं, सिर्फ राग की व्यर्थता बताने को हैं। राग व्यर्थ हो जाए, बस काफी है; राग गिर जाए, बस काफी है। कहीं राग गिरे और वैराग्य पकड़ जाए, तो चूक हो गई। राग का गिर जाना ही बस वैराग्य है; वैराग्य कोई राग के गिर जाने से अतिरिक्त बात नहीं है।

लेकिन होता उलटा है। इन सूत्रों को पढ़ कर न मालूम कितने लोगों ने–असंख्य लोगों ने–राग को तो न गिराया, वैराग्य को पकड़ लिया! राग तो बना ही रहा–वैराग्य की शक्ल में बना रहा। पहले पैर के बल चलते थे, फिर वे शीर्षासन करके खड़े हो गए; लेकिन कुछ बदला नहीं। कहीं शीर्षासन करने से कुछ बदलता है? सिर ऊपर हो कि नीचे, क्या फर्क पड़ता है? जब राग शीर्षासन करता है तो वैराग्य बन जाता है–साधारण आदमी का वैराग्य; तथाकथित संन्यासियों का वैराग्य। लेकिन जब राग गिर जाता है तो महावीर, बुद्ध और शंकर का वैराग्य पैदा होता है।

मुल्ला नसरुद्दीन को एक मानसिक बीमारी थी कि जब भी उसकी फोन की घंटी बजे, तो वह घबड़ा जाए, डरे–कि पता नहीं, मकान मालिक ने किराए के लिए फोन न किया हो; कि जिस दफ्तर में नौकरी करता है, कहीं उस मालिक ने नौकरी से अलग न कर दिया हो–हजार चिंताएं पकड़ें; फोन उठाना उसे मुश्किल हो जाए। तो मैंने उसे कहा कि तू किसी मनोचिकित्सक को दिखा ले।

दोत्तीन महीने उसने इलाज लिया। एक दिन मैं उसके घर गया, वह फोन कर रहा था। और उसे कंपते भी मैंने नहीं देखा, डरते भी नहीं! फोन करने के बाद मैंने पूछा कि मालूम होता है, चिकित्सा काम कर गई! अब डर नहीं लगता?

नसरुद्दीन ने कहा, डर की बात है; चिकित्सा जरूरत से ज्यादा फायदा की।

तो मैंने पूछा कि जरूरत से ज्यादा फायदा का क्या मतलब? फायदा काफी है; जरूरत से ज्यादा से तुम्हारा क्या प्रयोजन है?

उसने कहा, अब तो ऐसी हिम्मत आ गई कि घंटी