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भज गोविंदम मूढ़मते-5


सूत्र :

जटिलो मुण्डी लुग्चितकेशः काषायाम्बरबहुकृतवेषः।

पश्यन्नपि च न पश्यति मूढ़ो ह्युदरनिमित्तं बहुकृतवेषः।।

अंगं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम्।

वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुग्चत्याशापिण्डम्।।

अग्रे वह्निः पृष्ठे भानू रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः।

करतलभिक्षस्तरुतलवासः तदपि न मुग्चत्याशापाशः।।

कुरुते गंगासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम्।

ज्ञानविहीनः सर्वमतेन मुक्तिं नः भजति जन्मशतेन।।

सुरमंदिरतरुमूलनिवासः शय्या भूतलमजिनं वासः।

सर्वपरिग्रहभोगत्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः।।

योगरतो वा भोगरतो वा संगरतो वा संगविहीनः।

यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं नन्दति नन्दति नन्दत्येव।।

एक अति प्राचीन कथा है। घने वन में एक तपस्वी साधनारत था–आंख बंद किए सतत प्रभु-स्मरण में लीन। स्वर्ग को पाने की उसकी आकांक्षा थी; न भूख की चिंता थी, न प्यास की चिंता थी। एक दीन-दरिद्र युवती लकड़ियां बीनने आती थी वन में। वही दया खाकर कुछ फल तोड़ लाती, पत्तों के दोने बना कर सरोवर से जल भर लाती, और तपस्वी के पास छोड़ जाती। उसी सहारे तपस्वी जीता था। फिर धीरे-धीरे उसकी तपश्चर्या और भी सघन हो गई–फल बिना खाए ही पड़े रहने लगे; जल दोनों में पड़ा-पड़ा ही गंदा हो जाता–न उसे याद रही भूख की और न प्यास की। लकड़ियां बीनने वाली युवती बड़ी दुखी और उदास होती, पर कोई उपाय भी न था।

इंद्रासन डोला; इंद्र चिंतित हुआ; तपस्या भंग करनी जरूरी है; सीमा के बाहर जा रहा है यह व्यक्ति–क्या स्वर्ग के सिंहासन पर कब्जा करने का इरादा है?

लेकिन कठिनाई ज्यादा न थी, क्योंकि इंद्र मनुष्य के मन को जानता है। स्वर्ग से जैसे एक श्वास उतरी–सूखी, दीन-दरिद्र, काली-कलूटी वह युवती अचानक अप्रतिम सौंदर्य से भर गई; जैसे एक किरण उतरी स्वर्ग से और उसकी साधारण सी देह स्वर्णमंडित हो गई। पानी भर रही थी सरोवर से तपस्वी के लिए, अपने ही प्रतिबिंब को देखा, भरोसा न कर पाई–साधारण स्त्री न रही, अप्सरा हो गई; खुद के ही बिंब को देख कर मोहित हो गई! तपस्वी की सेवा उसने करनी जारी रखी।

फिर एक दिन तपस्वी ने आंख खोलीं। इस वनस्थली से जाने का समय आ गया–तपश्चर्या को और गहन करना है, पर्वत-शिखरों की यात्रा पर जाना है। उसने युवती से कहा कि मैं अब जाऊंगा, यहां मेरा कार्य पूरा हुआ। अब और भी कठिन मार्ग चुनना है, स्वर्ग को जीत कर ही रहना है।

युवती रोने लगी। उसकी आंख से आंसू गिरने लगे। उसने कहा, मैंने कौन सा दुष्कर्म किया कि मुझे अपनी सेवा से वंचित करते हो? और तो कुछ मैंने कभी मांगा नहीं!

तपस्वी ने सोचा, उस युवती के चेहरे की तरफ देखा। ऐसा सौंदर्य कभी देखा नहीं था। स्वप्न में भी ऐसा सौंदर्य कभी देखा नहीं था। युवती पहचानी भी लगती थी और अपरिचित भी लगती थी। रूप-रेखा तो वही थी, लेकिन कुछ महिमा उतर आई थी। अंग-प्रत्यंग वही थे, लेकिन कोई स्वर्ण-आभा से घिर गए थे। जैसे कोई गीत की कड़ी, भूली-बिसरी, फिर किसी संगीतज्ञ ने बांसुरी में भर कर बजाई हो।

तपस्वी बैठ गया। उसने पुनः आंख बंद कर लीं। वह रुक गया।

उस रात युवती सो न सकी–विजय का उल्लास भी था और साधु को पतित करने का पश्चात्ताप भी। आनंदित थी कि जीत गई और दुखी थी कि किसी को भ्रष्ट किया, किसी के मार्ग में बाधा बन गई, और कोई जो ऊर्ध्वगमन के लिए निकला था, उसकी यात्रा को भ्रष्ट कर दिया। रात भर सो न सकी–रोई भी, हंसी भी। सुबह निर्णय लिया, आकर तपस्वी के चरणों में झुकी और कहा, मुझे जाना पड़ेगा, मेरा परिवार दूसरे गांव जा रहा है।

तपस्वी ने आशीर्वाद दिया कि जाओ, जहां भी रहो, खुश रहो, मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।

युवती चली गई। वर्ष बीते, तपस्या पूरी हुई। इंद्र उतरा, तपस्वी के चरणों में झुका और कहा, स्वर्ग के द्वार स्वागत के लिए खुले हैं।

तपस्वी ने आंखें खोलीं और कहा, स्वर्ग की अब मुझे कोई जरूरत नहीं!

इंद्र तो भरोसा भी न कर पाया कि कोई मनुष्य और कहेगा कि स्वर्ग की मुझे अब कोई जरूरत नहीं। इंद्र ने सोचा, तब क्या मोक्ष की आकांक्षा इस तपस्वी को पैदा हुई है। पूछा, क्या मोक्ष चाहिए?

तपस्वी ने कहा, नहीं, मोक्ष का भी मैं क्या करूंगा।

तब तो इंद्र चरणों में सिर रखने को ही था कि यह तो आत्यंतिक बात हो गई, तपश्चर्या का अंतिम चरण हो गया, जहां मोक्ष की आकांक्षा भी खो जाती है। पर झुकने के पहले उसने पूछा, मोक्ष के पार तो कुछ भी नहीं है, फिर तुम क्या चाहते हो?

उस तपस्वी ने कहा, कुछ भी नहीं, वह लकड़ियां बीनने वाली युवती कहां है, वही चाहिए।

हंसना मत; आदमी की ऐसी कमजोरी है। सोचना, हंसना मत; क्योंकि पृथ्वी का ऐसा प्रबल आकर्षण है। कहानी को कहानी समझ कर टाल मत देना, मनुष्य के मन की पूरी व्यथा है। और ऐसा मत सोचना कि ऐसा विकल्प उस तपस्वी के सामने ही था कि युवती थी, स्वर्ग था, दोनों के बीच चुनना था। तुम्हारे सामने भी विकल्प वही है; सभी के सामने विकल्प वही है–या तो उन सुखों को चुनो जो क्षणभंगुर हैं, या उसे चुनो जो शाश्वत है; या तो शाश्वत को गंवा दो क्षणभंगुर के लिए, या क्षणभंगुर को समर्पित कर दो शाश्वत के लिए।

और अधिकतम लोग वही चुनेंगे, जो तपस्वी ने चुना। ऐसा मत सोचना कि तुमने कुछ अन्यथा किया है। चाहे इंद्र तुम्हारे सामने खड़ा हुआ हो या न खड़ा हुआ हो; चाहे किसी ने स्पष्ट स्वर्ग और पृथ्वी के विकल्प सामने रखे हों, न रखे हों–विकल्प वहां हैं। और जो एक को चुनता है, वह अनिवार्यतः दूसरे को गंवा देता है। जिसकी आंखें पृथ्वी के नशे से भर जाती हैं, वह स्वर्ग के जागरण से वंचित रह जाता है। और जिसके हाथ पृथ्वी की धूल से भर जाते हैं, स्वर्ग का स्वर्ण बरसे भी तो कहां बरसे, हाथों में जगह नहीं होती! हाथ खाली चाहिए तो ही स्वर्ग उतर सकता है; आत्मा खाली चाहिए तो ही परमात्मा विराजमान हो सकता है।

तुम्हारी आत्मा में अगर कोई आसक्ति पहले से ही विराजमान है, अगर वहां सिंहासन पहले से ही भरा है, तो तुम यह मत कहना कि परमात्मा ने तुम्हारे साथ अन्याय किया है; यह तुम्हारा ही चुनाव है। अगर परमात्मा तुम्हें नहीं मिलता, तो इसमें परमात्मा को दोष मत देना, तुमने उसे अभी चुना ही नहीं; क्योंकि जिन्होंने भी, जब भी उसे चुना है, तत्क्षण वह मिल गया है–एक क्षण की भी वहां देरी नहीं है। लेकिन अगर तुम्हीं न चाहो तो परमात्मा तुम्हारे ऊपर जबरदस्ती नहीं करता; सत्य तुम्हारे ऊपर जबरदस्ती आरूढ़ नहीं होता। तुम्हें जन्मों-जन्मों तक सत्य को इंकार करने की स्वतंत्रता है।

यही मनुष्य की गरिमा है, यही मनुष्य का दुर्भाग्य भी। गरिमा है, क्योंकि स्वतंत्रता है, चुनाव की अप्रतिम स्वतंत्रता है; दुर्भाग्य, क्योंकि हम गलत को चुन लेते हैं।

लेकिन स्वतंत्रता में गलत का चुनाव समाहित ही है। ऐसी तो कोई स्वतंत्रता नहीं हो सकती, जिसमें ठीक ही चुनने की स्वतंत्रता हो और गलत को चुनने की स्वतंत्रता न हो। तब तो स्वतंत्रता न होगी, परतंत्रता होगी। स्वतंत्रता का अर्थ ही है कि भटकने की भी सुविधा है। स्वतंत्रता का अर्थ ही है कि पाप करने की भी सुविधा है। स्वतंत्रता का अर्थ ही है कि परमात्मा को इंकार करने की सुविधा है।

बुद्ध का जन्म हुआ। पांचवें दिन रिवाज के अनुसार श्रेष्ठतम पंडित इकट्ठे हुए। उन्होंने बुद्ध को नाम दिया–सिद्धार्थ। सिद्धार्थ का अर्थ होता है: कामना की पूर्ति; आशा की पूर्ति; अर्थ की उपलब्धि; मंजिल का मिल जाना। बूढ़े शुद्धोधन के घर में बेटा पैदा हुआ था। जीवन भर प्रतीक्षा की थी, आशा की थी, सपने देखे थे; बहुत बार निराश हुआ था; और अब बुढ़ापे में बेटा पैदा हुआ था; निश्चित ही सिद्धार्थ था। पंडितों ने नाम ठीक ही दिया था। आठ बड़े पंडित थे। सम्राट पूछने लगा, इस नवजात शिशु का भविष्य भी कहोगे? सात पंडितों ने अपने हाथ उठाए और दो अंगुलियों का इशारा किया। सम्राट कुछ समझा नहीं। उसने कहा, मैं कुछ समझा नहीं। इशारे में नहीं, स्पष्ट कहो। तो उन सात पंडितों ने कहा कि दो विकल्प हैं–या तो यह चक्रवर्ती सम्राट होगा और या सब छोड़ कर सर्वत्यागी, वीतरागी, संन्यस्त हो जाएगा; या तो यह चक्रवर्ती सम्राट होगा और या सर्व वीतरागी संन्यासी होगा।

सिर्फ एक पंडित चुप रहा। वह सबसे युवा था। कोदन्ना उसका नाम था। लेकिन वह सबसे ज्यादा प्रतिभाशाली भी था। सम्राट ने पूछा, तुम चुप हो, तुमने दो अंगुलियां न उठाईं!

कोदन्ना ने कहा, दो अंगुलियां तो सभी के जन्म के साथ उठाई जा सकती हैं, क्योंकि दोनों विकल्प सभी के सामने होते हैं–या तो संसार की दौड़ का, या संन्यास का। संन्यास या संसार–ये तो दो विकल्प सभी के सामने होते हैं। इन पंडितों ने कुछ विशेष नहीं किया अगर बुद्ध के लिए दो अंगुलियां उठाईं; मैं एक अंगुली उठाता हूं: यह संन्यासी होगा।

लेकिन आदमी का अभागा मन, शुद्धोधन रोने लगा। यह कोदन्ना सर्वज्ञात ज्योतिषी है; युवा है, पर महातेजस्वी है; और उसके वचन कभी खाली नहीं गए। दूसरे पंडितों के साथ तो सुविधा थी थोड़ी कि चक्रवर्ती भी बन सकता है, कोदन्ना ने तो विकल्प ही तोड़ दिया। उसने तो कहा, यह निश्चित बुद्ध बनेगा। उन पंडितों के साथ तो सम्राट रोया न था, प्रसन्न हुआ था–चक्रवर्ती सम्राट होगा बेटा। और दूसरे विकल्प को उसने कोई मूल्य न दिया था, क्योंकि जब चक्रवर्ती सम्राट होने का विकल्प हो तो कौन संन्यासी होना चाहता है! लेकिन कोदन्ना ने तो मार्ग तोड़ दिया, उसने तो एक ही अंगुली उठाई है। लेकिन सम्राट ने अपने मन को समझाया, कोदन्ना अकेला है, विपरीत सात ज्योतिषी हैं। ऐसे ही तो आदमी अपने मन को सांत्वना देता है। सात ही ठीक होंगे, एक ठीक न होगा। लेकिन वह एक ही ठीक सिद्ध हुआ। और अच्छा हुआ कि वह एक ही ठीक सिद्ध हुआ।

तुम्हारे जन्म के समय भी, जन्म के बाद भी–चाहे पंडित बुलाए गए हों, न बुलाए गए हों–प्रकृति दो अंगुलियां उठाती है। सारी प्रकृति दो विकल्प सामने रखती है–या तो खो जाना मूर्च्छा में, या जाग जाना होश में; या तो बाहर की संपदा को जुटाना, चक्रवर्ती होने की दौड़ में लगना; या भीतर की संपदा को जुटाना, आत्मवान होने में थिर होना। कोदन्ना की एक अंगुली याद रखना! कोई कोदन्ना तुम्हें न मिलेगा अंगुली उठाने को, तुम्हें ही अपनी अंगुली उठानी पड़ेगी।

शंकर के ये सूत्र त्याग और वैराग्य के सूक्ष्मतम इशारे हैं।

‘जिसके माथे पर जटा है, जो सिर मुड़ाए है, जिसने अपने बाल नोच डाले हैं, जो काषाय पहने है, अथवा तरहत्तरह के वेश धारण किए हैं, वह मूढ़ आंख रहते भी अंधा है। केवल पेट भरने के लिए उसने बहुत रूप बना रखे हैं।’

ध्यान रखना, आदमी का मन बड़ा खतरनाक है, वह संन्यास में भी संसार खोज लेता है। वह मंदिर में भी पाखंड खोज लेता है। वह साधना में भी भोग खोज लेता है। आवरण कुछ भी हो, भीतर मन अपनी पुरानी आदतों का जाल बुनता चला जाता है।

तो शंकर कहते हैं, जिसके माथे पर जटा है, उससे धोखा मत खा जाना। जटा होने से ही कुछ भी नहीं होता। जिसने सिर मुड़ा लिया है, धोखा मत खा जाना; और दूसरे धोखा खा जाएं तो खा जाएं, तुम खुद धोखा मत खा जाना–सिर मुड़ा कर या बाल बढ़ा कर या बाल नोच डाले हैं…जैन दिगंबर मुनि केश-लुंच कर लेते हैं, बालों को नोच डालते हैं–धोखा मत खा जाना। जो काषाय पहने है, जिसने गैरिक वस्त्र पहन लिया है, इससे धोखा मत खा जाना। और दूसरा खा भी जाए तो उसकी चिंता मत करना, खुद मत खा जाना। क्योंकि काषाय पहन लेना भी सरल है, बाल नोच लेने भी सरल हैं। थोड़े से अभ्यास की बात है। सिर मुड़ा लेने में क्या कठिनाई है? जटा-जूट बढ़ा लेने में क्या अड़चन है? थोड़े से अभ्यास की बात है। लेकिन भीतर ध्यान रखना कि यह सब किसलिए किया है? कहीं इसके भीतर भी तो संसार ही तो नहीं चल रहा? इसके भीतर भी कहीं व्यवसाय तो नहीं चल रहा? केवल पेट भरने के लिए तो ये सारे रूप नहीं बना रखे हैं?

सौ में निन्यानबे संन्यासी पेट को ही भर रहे हैं। और पेट ही भरना था तो संसार बेहतर था, कम से कम ईमानदारी तो थी; दुकान बेहतर थी, क्योंकि कम से कम साफ-सुथरा तो था। दुकान ही चलानी थी तो दुकान ही उचित थी, कम से कम मंदिर को भ्रष्ट न करते; साधारण वेश ही ठीक था, फिर गैरिक वस्त्रों को विकृत करने की कोई जरूरत न थी। नाई से ही बाल कटवा लिए होते, लोंचने का आग्रह न करते, वही उचित था। क्योंकि अंततः मन व्यापार कर रहा हो, तो बाहर के धोखे से कुछ भी नहीं होता। अंतिम निर्णायक तो भीतर का मन है कि तुम यह किसलिए कर रहे हो।

मुझे खबर मिली कुछ महीनों पहले, दो दिगंबर जैन मुनि–नग्न, जिन्होंने सब छोड़ दिया है, जिनके पास कुछ भी नहीं है–वे सुबह शौच के लिए गांव के बाहर गए थे, वहां उन दोनों में झगड़ा हो गया। दोनों गुरु-शिष्य थे। एक-दूसरे पर हमला कर दिया। झगड़े और हमले के कारण बात खुली। दोनों ने अपनी पिच्छी के डंडे में रुपये छिपा रखे थे। डंडा पोला कर लिया था, उसमें नोट छिपा रखे थे। बंटवारे पर झगड़ा हो गया कि कौन कितना ले।

दोनों पकड़ कर पुलिस स्टेशन लाए गए। गांव के उनके भक्त चिंतित हुए, दुखी हुए, क्योंकि उनकी ही प्रतिष्ठा का सवाल न था, उनके प्रेम करने वाले भक्तों की भी प्रतिष्ठा का सवाल था। पैसा देकर पुलिस को किसी तरह चुप किया कि यह खबर सब तरफ न फैल जाए।

नग्न खड़ा आदमी भी अंततः वही कर रहा है, जो दुकान पर बैठा कर रहा है। फिर दुकान पर ही बैठना उचित है। फिर कम से कम नग्नता को तो अपवित्र न करो। कोई नहीं कह रहा है कि छोड़ो संसार को। छोड़ना हो तो ही छोड़ो। ऊपर-ऊपर छोड़ो, भीतर-भीतर सम्हालो, इस धोखे से कुछ भी लाभ न होगा।

‘जिसके माथे पर जटा है, जो सिर मुड़ाए है, जिसने बाल नोच डाले हैं, जिसने काषाय पहना है, अथवा तरहत्तरह के वेश धारण किए हैं, वह मूढ़ आंख रहते भी अंधा है।’

क्यों शंकर कहते हैं, वह मूढ़ आंख रहते भी अंधा है?

क्योंकि वह किसको धोखा दे रहा है! यह सवाल दूसरों को धोखा देने का नहीं है, दूसरों का कोई प्रयोजन ही नहीं है; वह अपने को ही धोखा दे रहा है। क्योंकि अंतिम निर्णय में, तुम जो भीतर थे, उसी से निश्चित होता है; तुम जो बाहर थे, उससे कुछ निश्चित नहीं होता। जीवन, तुम जो भीतर हो, उससे निर्धारित होता है; तुम जो बाहर हो, उससे निर्धारित नहीं होता। वह जो तुम्हारे भीतर चल रहा है सतत, वहां तुम रुपये गिन रहे हो; ऊपर तुम राम-राम जप रहे हो। वह राम-राम व्यर्थ है। वह जो तुमने रुपये गिने हैं, वही सार्थक है। उससे ही निर्णय होगा। क्योंकि निर्णय कोई और करने वाला नहीं है, कोई दूसरा निर्णय करने वाला नहीं है। तुम जो भीतर कर रहे हो, उसी से प्रतिपल निर्णय हुआ जा रहा है। कोई निर्णायक भी होता तो समझा-बुझा लेते, हाथ जोड़ लेते, पैर जोड़ लेते, क्षमा मांग लेते। कोई निर्णायक भी नहीं है। कहीं कोई परमात्मा बैठा नहीं है, जिसको तुम समझा-बुझा लोगे। तुमने जो किया, तुम्हारा कृत्य ही तुम्हारी नियति है। तुम्हारे कृत्य में ही फल छिपा है। तुम्हारे सोचने में ही तुम्हारे होने का सारा आधार है। तुमने जैसा सोचा!

महावीर के जीवन में बड़ी प्यारी कथा है: कि महावीर खड़े हैं एक वन-प्रांत में, ध्यानस्थ। उनका बचपन का एक साथी, जो सम्राट है, उनके दर्शन को आ रहा है। उसने राह में एक दूसरे सम्राट को भी जो महावीर का संन्यासी हो गया है, उसको एक शिलाखंड के पास तपश्चर्यारत खड़ा देखा। तीनों बचपन के साथी हैं। उसके मन में बड़ा ही पश्चात्ताप होने लगा कि मैं बड़ा पीछे रह गया हूं। यह सम्राट प्रशेनचंद्र खड़ा है–कितना शांत, कितना मौन, कितने अपूर्व आनंद में मग्न! और एक मैं हूं कि अभी भी रुपये-पैसे गिन रहा हूं। और महावीर परम अवस्था को उपलब्ध हो गए हैं! मैं अभागा हूं। उसके मन में बड़े त्याग का भाव उठा।

जब वह महावीर के पास गया तो उसने पूछा कि मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। मैंने सम्राट प्रशेनचंद्र को राह में तपश्चर्या करते देखा, वे आपके शिष्य हो गए हैं; उन्हें देख कर मेरे मन में त्याग के बड़े भाव उठे। एक प्रश्न पूछना है: जब मैं प्रशेनचंद्र के सामने खड़ा था, अगर उनकी उसी समय मृत्यु हो जाए, तो उनका कहां जन्म होगा?

महावीर ने कहा, अगर उसी वक्त मृत्यु हो तो वे सातवें नरक में पैदा होंगे।

सम्राट तो हैरान हो गया! इतने शांत, इतने मौन, इतने ध्यानस्थ वे खड़े थे–और मौत हो तो सातवें नरक में जन्म होगा!

महावीर ने कहा, चिंतित मत होओ। लेकिन अब अगर मृत्यु हो–अभी कोई घड़ी भर ही बीती है दोनों के बीच, घटनाओं में–तो वे सातवें स्वर्ग में प्रवेश पाएंगे।

सम्राट ने कहा, यह तो बड़ी पहेली हो गई, आप सुलझा कर कहें।

महावीर ने कहा, तुम्हारे पहले तुम्हारे सैनिक प्रशेनचंद्र के पास से गुजरे थे। उन्होंने कहा, देखो ये मूरख खड़ा है। ये यहां आंख बंद किए खड़े हैं और जिन मंत्रियों के हाथ में ये राज्य सौंप आया है–इसके बेटे तो अभी छोटे हैं, नाबालिग हैं–वे मंत्री सब लूट-खसोट कर रहे हैं और ये मूरख की तरह यहां खड़े हैं! सैनिक, साधारण सैनिक बात करते हुए निकल गए। प्रशेनचंद्र ने यह सुना कि मंत्री लूट-खसोट कर रहे हैं! जिन पर मैंने भरोसा किया, वे धोखा दे रहे हैं! क्षण भर को भूल गया कि मैं त्यागी हूं। भूल ही गया, बेहोशी छा गई, मन में खयाल उठा कि मैं अभी जिंदा हूं, तुमने समझा क्या है, नासमझो! अभी मैं जिंदा हूं, सिर धड़ से अलग कर दूंगा मंत्रियों का! और उसका हाथ तलवार पर चला गया। कोई तलवार नहीं है अब, लेकिन पुरानी आदत। म्यान से तलवार खींच ली–सपने में। और जैसी उसकी आदत थी सदा की, जब भी वह क्रोध में आ जाता–जैसे तुम्हारी या बहुतों की आदत होती है, कोई अपना सिर खुजलाता है, कोई अपनी चैंथी खुजलाता है–उसकी आदत थी कि जब भी वह क्रोध में आ जाता, तो अपने मुकुट को सम्हालता था। उसने मुकुट को सम्हालने की कोशिश की–वहां सिर घुटा था, वहां कुछ भी न था, मुकुट वगैरह कुछ भी न था! उसे होश आ गया कि यह मैं क्या कर रहा हूं? न कोई तलवार है और न अब मैं सम्राट प्रशेनचंद्र हूं! मैं तो सब छोड़ चुका! मेरे मन में यह कैसे हत्या का विचार उठा?

महावीर ने कहा, जब तुम प्रशेनचंद्र के सामने खड़े थे, तब भीतर उसने तलवार खींची हुई थी, उसी समय मरता तो सातवें नरक में जाता। अब उसे होश फिर आ गया है, वह हंस रहा है, उसने अपनी मूढ़ता पहचान ली है, इस समय मर जाए तो सातवें स्वर्ग में उत्पन्न होगा।

प्रत्येक कृत्य निर्णायक है। और कृत्य का निर्णय तुम्हारे अंतस में है, तुम्हारे बाहर नहीं। तुम बाहर से मौन खड़े हो सकते हो और भीतर तूफान उठा हो सकता है। तुम बाहर शांत दिखाई पड़ सकते हो और भीतर अशांति का दावानल हो। तुम बाहर चुप और भीतर ज्वालामुखी तैयार हो रहा हो विस्फोट पाने को। तुम्हारा बाहर मूल्यवान नहीं है, तुम्हारा भीतर ही तुम्हारा अस्तित्व है। और तुम्हारा प्रत्येक कृत्य निर्णय करता है, तुम्हारी आत्मा के स्वरूप की। तुम्हारा प्रत्येक कृत्य तुम्हें निर्मित करता है। कोई निर्णायक नहीं है, तुम्हीं हो।

इसलिए शंकर कहते हैं: वह मूढ़ आंख रहते भी अंधा है। जो सोचता है, मैं दूसरों को धोखा दे रहा हूं। धोखा, सब धोखा, अपने को ही दिया गया धोखा है। सब प्रवंचना अपने को ही दी गई प्रवंचना है। गंवाओगे तुम अपना ही, किसी और का तुम कुछ गंवा नहीं सकते हो। शायद दूसरे की जेब से थोड़े पैसे खींच लो। लेकिन उन्हीं पैसों में तुम्हारी जेब से पूरी आत्मा बिखर जाएगी। तुम खोओगे बहुत, पाओगे कुछ भी नहीं। दूसरे को धोखा भी दोगे तो क्या धोखा दोगे? चार पैसे उससे छीन लोगे। वे पैसे तो पड़े ही रह जाने वाले हैं। न जिससे तुमने छीने हैं, वह ले जाने वाला था; न तुम ले जाओगे। वे पैसे किसकी जेब में रहे, बहुत फर्क नहीं पड़ता। लेकिन तुमने छीना, तुमने आकांक्षा की, तुम विकृत हुए, तुमने अपने मन को धूमिल किया, तुमने भीतर पाप को जगह दी, तुमने पाप का बीज बोया। फिर तुम आशा मत करना कि उस पाप के बीज से कोई स्वादिष्ट फल लगने वाले हैं, या कोई सुगंधित फूल लगेंगे।

‘वह मूढ़ आंख रहते भी अंधा है। केवल पेट भरने के लिए उसने बहुत रूप बना रखे हैं। अतः हे मूढ़, सदा गोविन्द को भजो।’

‘अंग गल गए हैं, बाल सफेद हो गए हैं, मुंह में एक दांत नहीं; ऐसा वह वृद्ध छड़ी पकड़ कर चलता है। फिर भी वह आशा के पिंड से बंधा हुआ है।’

मरने के आखिरी क्षण तक भी आशा नहीं छूटती। तुम मर जाते हो, आशा नहीं मरती। मरते-मरते भी आशा सजग रहती है–जीती है, जवान रहती है। मरने वाला आदमी भी सोचता है: कल सब ठीक हो जाएगा। मरते-मरते भी कल का सपना देखता रहता है। सपने देखते-देखते ही लोग मरते हैं।

आशा समझ लेने की बात है। आशा है क्या?

जो नहीं है, वह मिलेगा–इसकी भ्रांति। जो नहीं है, वह कभी होगा–इसका सपना आशा है।

और आशा से जागना क्या है?

जो है, उसका बोध। जो है, उसके प्रति जाग जाने में आशा टूट जाती है। और जो नहीं है, उसकी मांग में आशा बनी रहती है। गरीब भी आशा में जीता है, अमीर भी आशा में जीता है।

सिकंदर भारत आता था, तो एक फकीर डायोजनीज से मिलने गया; क्योंकि उस फकीर की बड़ी चर्चा सुनी थी। और अनेक बार ऐसा हुआ है कि सम्राट भीर् ईष्या से भर जाते हैं फकीरों से। वह डायोजनीज फकीर भी ऐसा था, महावीर जैसा नग्न ही रहता था। अनूठा फकीर था, हाथ में भिक्षा का एक पात्र भी नहीं रखता था। जब शुरू-शुरू में फकीर हुआ था तो एक पात्र रखता था। लेकिन फिर उसने एक दिन एक कुत्ते को पानी पीते देखा नदी में। उसने कहा, अरे मैं भी पागल हूं, यह पात्र नाहक ढोता हूं। कुत्ता बिना पात्र के पानी पी रहा है! कुत्ता हमसे ज्यादा समझदार है। और जब यह काम चला लेता है बिना पात्र के, तो हम आदमी होकर न चला पाएंगे? उसने पात्र वहीं फेंक दिया।

उसकी बड़ी खबर सिकंदर के पास पहुंचती थी कि वह परम आनंदित है। सिकंदर उससे मिलने गया। सिकंदर जब उसे मिलने गया तो डायोजनीज ने पूछा, कहां जा रहे हो?

सिकंदर ने कहा, एशिया मायनर जीतना है।

डायोजनीज ने पूछा, फिर क्या करोगे? और डायोजनीज लेटा था नदी की रेत में। सर्दी की ऐसी ही सुबह रही होगी, धूप ले रहा था। वह लेटा ही रहा, वह उठ कर बैठा भी नहीं। फिर क्या करोगे?

सिकंदर ने कहा, फिर भारत जीतना है।

डायोजनीज ने कहा, फिर?

सिकंदर ने कहा कि फिर और जो थोड़ी-बहुत दुनिया बचेगी, वह जीत लेनी है।

डायोजनीज ने कहा, और फिर?

सिकंदर ने कहा, फिर क्या, फिर आराम करेंगे।

डायोजनीज हंसने लगा, उसने कहा, आराम तो हम अभी कर रहे हैं। तुम तब करोगे? अगर आराम ही करना है, अगर आखिर में आराम ही करना है, तो इतनी दौड़-धूप किसलिए? आराम, देखो हम अभी कर रहे हैं। वह लेटा ही था। और इस नदी के तट पर बहुत जगह है, कोई ऐसा भी नहीं कि जगह की कमी है, तुम भी आराम कर सकते हो, कहीं जाने की कोई जरूरत नहीं है।

सिकंदर निश्चित ही गहन रूप से प्रभावित हुआ था। झेंप गया क्षण भर को। बात तो सच थी। अंत में आराम ही करना है और अंत के आराम के लिए इतना इंतजाम कर रहा है। और डायोजनीज निश्चित आराम कर रहा है। यह कह भी नहीं सकते कि वह गलत बोल रहा है–वह आराम कर ही रहा है। और सिकंदर से ज्यादा प्रफुल्लित है, सिकंदर से ज्यादा उसका खिला कमल है। सिकंदर के पास सब कुछ है और भीतर कुछ भी नहीं। डायोजनीज के पास बाहर कुछ भी नहीं है और भीतर सब कुछ।

सिकंदर ने डायोजनीज से कहा कि तुम मुझेर् ईष्या से भरते हो। अगर दुबारा मुझे कोई जन्म मिला तो परमात्मा से कहूंगा, मुझे सिकंदर मत बना, डायोजनीज बना दे।

डायोजनीज ने कहा, यह फिर तुम अपने को धोखा दे रहे हो। परमात्मा को क्यों बीच में लाते हो? अगर तुम्हें डायोजनीज बनना है, तो अभी बनने में कौन सी अड़चन है? मुझे अगर सिकंदर बनना हो तो अड़चन हो सकती है; क्योंकि सारी दुनिया जीत पाऊं, न जीत पाऊं; इतना फौज-फाटा इकट्ठा कर पाऊं, न कर पाऊं। लेकिन तुम्हें डायोजनीज बनने में क्या अड़चन है? कपड़े फेंक दो, विश्राम करो।

सिकंदर ने कहा, बात जंचती है, लेकिन आशा नहीं मानती। मैं आऊंगा, मैं जरूर लौट कर आऊंगा। लेकिन अभी तो मुझे जाना होगा, अभी तो यात्रा अधूरी है। तुम्हारी बात शत-प्रतिशत सही है।

यही मजा है। बात ठीक भी लगती है, फिर भी आशा खींचे चली जाती है!

कुछ दिन पहले, जापान में हुए एक बड़े कवि ईशा की कुछ पंक्तियां मैं सुना रहा था। उसकी पत्नी मर गई, बहुत दुख हुआ; फिर उसकी बेटी मर गई, बहुत दुख हुआ; और जब वह तैंतीस साल का था, तभी उसके पांचों बच्चे मर गए; वह अकेला रह गया। वह बड़ी पीड़ा में था और कवि हृदय था, कंप गया। यह दुख इतना क्यों है–पूछने लगा। सो न सके रात, दिन होश न रहे–बस एक ही बात पूछे कि इतना दुख क्यों है संसार में? और मैंने ऐसा क्या बुरा किया है? किसी ने कहा कि तुम मंदिर जाओ, मंदिर में एक फकीर है, शायद वह तुम्हारी समस्या हल कर दे। वह मंदिर गया। मंदिर के फकीर ने कहा, दुख क्यों है? यह बात ही व्यर्थ है। जीवन तो ओस की बूंद की भांति है–अब गया, तब गया। तुम भी जाओगे। पांच बच्चे गए, पत्नी गई, अब तुम समय खराब मत करो। जीवन तो घास के पत्ते पर ठहरी ओस की भांति है–अभी गया, तभी गया। लौट आया ईसा घर। बात तो जंची। जीवन ऐसा ही है। उसने एक हाइकू लिखा, एक छोटी सी कविता लिखी। कविता है:

लाइफ इज़ ए डयू ड्रॉप

यस आई एम कनविंस्ड परफेक्टली–लाइफ इज़ ए डयू ड्रॉप

एंड यट, एंड यट…

निश्चित ही जीवन एक ओस का कण है

और मैं पूर्णतया सहमत हूं कि जीवन एक ओस का कण है

फिर भी, फिर भी…

‘फिर भी’ आशा है। समझ में भी आ जाए, तो भी आशा समझने नहीं देती; बुद्धि भी पकड़ ले, तो भी प्राण से संबंध नहीं जुड़ता; विचार में झलक भी जाए, तो भी भावना में नहीं झलकता और आशा अपना जाल बुने जाती है।

‘अंग गल गए हैं, बाल सफेद हो गए हैं, मुंह में एक दांत नहीं; ऐसा वह वृद्ध छड़ी पकड़ कर चलता है। फिर भी वह आशा के पिंड से बंधा हुआ है।’

आशा धागा है, जिसके सहारे हम जीते हैं। बड़ा महीन धागा है, कभी भी टूट सकता है, लेकिन टूटता नहीं। मजबूत से मजबूत जंजीर बन गया है। एक तरफ से टूटता है तो हम दूसरी तरफ से सम्हाल लेते हैं। अगर संसार से भी टूट जाता है तो हम मोक्ष की आशा करने लगते हैं, स्वर्ग की आशा करने लगते हैं। आशा जारी रहती है। आशा संसार से भी बड़ी है। संसार छूट जाए, टूट जाए, संसार का दुख दिखाई पड़ जाए, तो आदमी स्वर्ग की आशा करने लगता है। आशा चलती रहती है। तुम थक जाते हो, गिर जाते हो, आशा घसीटती चली ज