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गीता दर्शन-(भाग-- 4


गीता दर्शन (भाग--4) (प्रवचन--095

सृष्टि और प्रलय का वर्तुल—(प्रवचन—सातवां)

अध्याय—8

अव्यक्तात् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।

रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके।। 18।।

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।

रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे।। 19।।

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।

यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।। 20।।

इसलिए काल के तत्व को जानने वाले यह भी जानते हैं कि संपूर्ण दृश्यमात्र भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेशकाल में अव्यक्त से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त में ही लय होते हैं।

और हे अर्जुन, वह ही यह भूत समुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृति के वश में हुआ रात्रि के प्रवेशकाल में लय होता है और दिन के प्रवेशकाल में फिर उत्पन्न होता है।

परंतु उस अव्यक्त से भी अति परे दूसरा अर्थात विलक्षण जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह पूर्ण ब्रह्म परमात्मा सब भूतों के नष्ट होने पर भी नहीं नष्ट होता है।

अस्तित्व की व्याख्या, कैसे यह अस्तित्व पैदा होता है और कैसे लीन होता है। इसके पहले कि हम कृष्ण के वचन पर विचार करें, कुछ और प्राथमिक बातें जान लेनी जरूरी हैं।

एक तो कि काल के तत्व को जो जान लेते हैं, वे ही आने वाली इस व्याख्या को समझ पाएंगे। काल के तत्व के संबंध में एक बहुत मौलिक बात स्मरण कर लेनी जरूरी है और वह यह है कि समय के भीतर जो भी प्रकट होता है, वह स्वप्नवत है,ड्रीमलाइक है।

इसे हम ऐसा समझें कि जैसे कोई व्यक्ति दर्पण में अपनी तस्वीर देखे, तो दर्पण में जो दिखाई पड़ता है, वह स्वप्नवत है। दर्पण में वस्तुतः होता नहीं, सिर्फ दिखाई पड़ता है। लेकिन दिखाई पूरा पड़ता है। दिखाई पड़ने में कोई कमी नहीं है। या जैसे कोई रात चांद निकला हो आकाश में और झील की शांत सतह में उसका प्रतिफलन बन जाए। कोई झील में झांककर देखे, तो चांद पूरा दिखाई पड़ता है, वैसे वहां है नहीं।

ठीक समय के भीतर भी प्रतिफलन ही उपलब्ध होते हैं। समय दर्पण है या पानी की झील है, उसमें जो हमें दिखाई पड़ता है, वह वास्तविक नहीं है, स्वप्नवत है। यही अर्थ है माया का, इलूजन का। लेकिन जब तक हमें उस सत्य का पता न हो जो दर्पण के बाहर है, तब तक हमें यह भी एहसास न हो सकेगा कि जो हम देख रहे हैं समय के भीतर, वह माया है।

सुना है मैंने, रमजान के उपवास के दिन हैं और मुल्ला नसरुद्दीन एक रास्ते के किनारे से निकलता है। प्यास लगी है, तो उसने कुएं में झांककर देखा, देखा कि चांद कुएं में पड़ा है। सोचा उसने कि चांद यहां फंसा पड़ा है! उपवास के दिन हैं, और अगर चांद बाहर न निकाला गया, तो लोग उपवास कर-करके मर जाएंगे, उपवास का अंत कैसे आएगा?

भागा हुआ पास के गांव में गया, रस्सी लेकर आया। रस्सी को डाला कुएं में चांद को फंसाने के लिए और निकालने के लिए। फंस भी गया चांद। मुल्ला ने बड़ी ताकत लगाई। बड़ी मुश्किल में पड़ा; क्योंकि रस्सी उसकी कुएं में जाकर एक पत्थर से फंस गई थी। बहुत खींचा, फिर सोचा भी कि चांद जैसी चीज है, मुश्किल तो होगी ही। लेकिन हजारों-लाखों लोगों का सवाल है,मुझे मेहनत करके निकाल ही देना चाहिए। बहुत ताकत लगाई, तो रस्सी टूट गई। मुल्ला धड़ाम से कुएं के नीचे गिरा। घबराहट में आंखें बंद हो गईं। सिर लहूलुहान हो गया। जब आंख खुली, तो चांद आकाश में दिखाई पड़ा। उसने कहा कि चलो, कोई हर्ज नहीं। थोड़ी हमें मुश्किल भी हुई, तो कोई बात नहीं, लेकिन चांद मुक्त हो गया!

समय की झील में जो हमें दिखाई पड़ता है, वही संसार है। समय में पकड़ा हुआ जो हमें दिखाई पड़ता है, वही संसार है। लेकिन समय के बाहर हम देख ही नहीं पाते हैं। हम बिलकुल कुएं पर झुके खड़े हैं। और जो हमें कुएं में दिखाई पड़ता है, वही दिखाई पड़ता है। समय के मीडियम में, समय के माध्यम में जो झलकता है, उसे ही हम जानते हैं। और हम किसी चीज को जानते नहीं।

तो समय के तत्व को जो जान लेता है, वह यह भी जान लेता है, यह जगत सिर्फ एक माया है, यह जगत सिर्फ एक प्रतिबिंब है, यह जगत सिर्फ एक स्वप्न है। और जो समय से मुक्त हो जाता है, वह जगत से भी तत्क्षण मुक्त हो जाता है। या जो जगत से मुक्त हो जाता है, वह समय से मुक्त हो जाता है। अगर इसे हम और भी सूक्ष्म में कहें, तो कह सकते हैं, समय ही संसार है। समय के बाहर हो जाना संसार के बाहर हो जाना है।

लेकिन यह समय का तत्व बहुत अदभुत है। हम सभी अपनी कामना की गहनता के अनुसार अधिक या कम समय के भीतर हो सकते हैं। जितनी तीव्र वासना होती है, समय के भीतर उतना हमारा गहरा प्रवेश हो जाता है। जितनी क्षीण वासना होती है, उतना ही हम समय की परिधि पर आ जाते हैं।

सुना है मैंने कि एक ईसाई फकीर मरकर स्वर्ग पहुंचा। द्वार पर ही सेंट पीटर उसे मिले। तो उस फकीर ने कहा, मैंने बड़ी-बड़ी बातें स्वर्ग के संबंध में सुनी हैं। मैं सदा फकीर रहा; कौड़ी-कौड़ी मांगकर जीया। मैंने सुना है कि स्वर्ग की एक कौड़ी भी,एक पाई भी पृथ्वी के अरबों-खरबों रुपयों के बराबर होती है। सेंट पीटर ने कहा, तुमने ठीक ही सुना है। तो उस फकीर ने कहा,क्या कृपा करके एक छोटी-सी पाई मुझे उधार न दे सकेंगे!

फकीर ने सोचा कि एक पाई अगर अरबों-खरबों रुपयों के बराबर होती है और एक पाई देने से सेंट पीटर जैसा भला आदमी क्या इनकार करेगा। सेंट पीटर ने कहा, जरूर दूंगा। लेकिन एक क्षण ठहर जाओ।

दिन बीतने के करीब आ गया। फकीर द्वार पर बैठा रहा। सांझ होने लगी। उसने कहा, एक क्षण कितना लंबा होता है यहां? सेंट पीटर ने कहा, पृथ्वी के अरबों-खरबों बरसों के बराबर। क्योंकि जब पाई अरबों-खरबों के बराबर होगी, तो क्षण भी अरबों-खरबों बरसों के बराबर होगा। अनुपात वही होता है।

अनुपात वही होता है। एक आदमी के पास एक कौड़ी है और एक आदमी के पास एक करोड़ रुपए हैं, तो आप यह मत समझना कि करोड़ रुपए वाले की आसक्ति ज्यादा होगी और एक कौड़ी वाले की आसक्ति कम होगी। नहीं, इस भूल में मतपड़ना। आसक्ति का अनुपात वही होगा। एक कौड़ी पर भी उतनी ही होगी, करोड़ रुपए पर भी उतनी ही होगी।

इसे ऐसा समझें। एक आदमी एक घर से एक कौड़ी चुरा लाता है, और एक आदमी एक लाख रुपए चुरा लाता है। क्या लाख रुपए वाले की चोरी ज्यादा होगी? निश्चित ही जो रुपए गिनते हैं, वे कहेंगे, हां। लाख रुपए की चोरी लाख रुपए की चोरी है, और कौड़ी की चोरी कौड़ी की चोरी है।

लेकिन चोरी तो बराबर है। चोरी में कोई भेद पड़ता नहीं। कौड़ी की चोरी उतनी ही चोरी है, जितनी लाख की चोरी चोरी होती है। चोरी में कोई अंतर नहीं पड़ता। क्या चुराया, यह गौण है। चुराया, यही महत्वपूर्ण है। अनुपात वही होता है।

वासना में जो बहुत दौड़ते हैं वे भी, वासना में जो कम दौड़ते हैं वे भी, अनुपात तो बराबर होता है। अनुपात में फर्क नहीं पड़ता। लेकिन फिर भी, जो कम वासना में दौड़ते हैं, वे पानी की सतह के करीब होते हैं। और जो ज्यादा वासना में दौड़ते हैं, वे पानी की गहराइयों में होते हैं। कम वासना में दौड़ने वाला आदमी झटके से छलांग ले सकता है समय के बाहर। ज्यादा वासना में दौड़ने वाले को उतना ही कठिन हो जाता है। समय ही नहीं मिलता कि समय के बाहर निकल सके।

समय के तत्व को जो समझ लेता है, वह यह भी समझ लेता है कि अगर मुझे समय के बाहर होना है, तो मुझे वासना के बाहर हो जाना पड़ेगा। और अगर मुझे वासना के बाहर होना है या समय के बाहर होना है, तो क्या सूत्र होगा इसका? वे जो काल के तत्व को जान लेते हैं, किस सूत्र का प्रयोग करते हैं?

एक छोटा-सा सूत्र आपसे कहता हूं। वे इसी का प्रयोग करते हैं। वे क्षण में जीना शुरू करते हैं। समय में नहीं, क्षण में। नाट इन टाइम, बट इन दि मोमेंट। एक क्षण है अभी मेरे पास; और एक क्षण से ज्यादा किसी आदमी के पास कभी होता नहीं। कितना ही बड़ा आदमी हो, कितना ही छोटा आदमी हो, दीन हो, दरिद्र हो, सम्राट हो, कमजोर हो कि शक्तिशाली हो, अज्ञानी हो कि ज्ञानी हो, एक क्षण से ज्यादा किसी के हाथ में कभी इकट्ठा नहीं होता। जब एक क्षण सरक जाता है, तब दूसरा क्षण हाथ में आता है। एक क्षण से ज्यादा किसी के पास नहीं होता।

अगर कोई इस एक क्षण में ही जीना शुरू कर दे, आने वाले क्षण की वासना न करे, चिंता न करे, आकांक्षा न करे; बीते हुए क्षण को भूल जाए, छोड़ दे, स्मृति के बाहर कर दे; इस क्षण में ही ठहर जाए--तो ऐसे आदमी को वासना में जाने का उपाय नहीं होगा। क्योंकि वासना इसी क्षण में नहीं हो सकती।

इसी क्षण में तो केवल प्रार्थना ही हो सकती है। इसी क्षण में तो केवल ध्यान ही हो सकता है। इसी क्षण में तृष्णा नहीं हो सकती। तृष्णा के लिए एक क्षण से ज्यादा चाहिए। फैलाव के लिए, विस्तार के लिए भविष्य चाहिए। और भविष्य के फैलाव के लिए अतीत में जड़ें और स्मृति चाहिए। अगर अतीत भी नहीं, भविष्य भी नहीं, यही क्षण है, तो समय गिर गया और वासना भी गिर गई।

इसलिए ज्ञानी क्षण में जीना शुरू कर देता है, अभी और यहीं। और जैसे ही कोई अभी और यहीं जीता है, समय के बाहर हो जाता है। क्षण जो है, समय के बाहर होने का द्वार है।

इसे और तरह से भी समझ लें।

पिछले तीस वर्षों की वैज्ञानिक खोजों ने पदार्थ के अंतिम कण पर मनुष्य को पहुंचा दिया, एटम पर, अणु पर पहुंचा दिया, परम अणु पर पहुंचा दिया। फिर परम अणु का भी विभाजन हो गया और परम अणु का भी विभाजित हिस्सा इलेक्ट्रानहाथ में आ गया। लेकिन एक बड़ी अदभुत घटना घटी, परमाणु के टूटते ही पदार्थ खो जाता है। परमाणु के टूटते ही पदार्थ खो जाता है। और इधर बीस वर्षों में विज्ञान की जो बड़ी से बड़ी उपलब्धि है, वह यह है कि अब पदार्थ जगत में नहीं है।

तीन सौ वर्ष पहले जो विज्ञान सोचकर चला था कि परमात्मा जगत में नहीं है, कोई सोच भी नहीं सकता था...अगर आज पुराने वैज्ञानिकों को कब्रों से उखाड़ा जाए, न्यूटन को उखाड़ा जाए कब्र से या गैलीलियो को, तो वे विश्वास न कर सकेंगे कि यह विज्ञान ने कौन-सी उपलब्धि कर ली! सोचते थे कि ईश्वर खो जाएगा, आत्मा खो जाएगी। इस सदी के प्राथमिक समय में भी सभी वैज्ञानिक इस खयाल से भरे थे कि आत्मा-परमात्मा के बचने की कोई जगह नहीं। पदार्थ ही सत्य है, मैटर इज़ दिओनली रियलिटी।

लेकिन इधर उन्नीस सौ पचास के करीब जो प्रतीति गहन होने लगी, वह यह है कि मैटर इज़ दि मोस्ट अनरियल थिंग,पदार्थ है ही नहीं। जैसे ही परमाणु टूटता है, पदार्थ खो जाता है और परमाणु के टूटते ही पदार्थ के बाहर प्रवेश हो जाता है,अपदार्थ में, नान-मैटीरियल में प्रवेश हो जाता है।

ठीक ऐसे ही समय का जो आखिरी टुकड़ा है, उसका नाम क्षण है, कहें कि वह समय का परमाणु है, क्षण। जो व्यक्ति क्षण में ठहर जाता है, वह समय के बाहर हो जाता है। जैसे परमाणु में जो व्यक्ति प्रवेश करता है, वह पदार्थ के बाहर हो जाता है, वैसे ही जो व्यक्ति क्षण में, समय के परमाणु में प्रवेश करता है, वह समय के बाहर हो जाता है।

विज्ञान ने पदार्थ की खोज करके परमाणु पाया और परमाणु के बाहर द्वार पाया, जहां से अपदार्थ में, अव्यक्त में,अनमैनिफेस्टेड में प्रवेश हो जाता है। ठीक ऐसे ही पूरब के धर्म ने, पूरब के धर्म के खोजियों ने, मिस्टिक्स ने समय की खोज की ज्यादा। क्योंकि उनके इरादे कुछ और थे; उनके इरादे उसको जानने के थे, जो इटरनल है, शाश्वत है, सनातन है। उन्होंने समय की खोज की और समय के आखिरी टुकड़े को खोजा, जिसका नाम उन्होंने क्षण दिया है। उसको कहें टाइम एटम, कहें समय का परमाणु। और जब वे समय के इस परमाणु के भीतर प्रविष्ट हुए, खड़े हुए, उन्होंने पाया, टाइम सिंपली डिसएपियर्स,समय खो जाता है। और फिर जो बचता है, वही शाश्वत, सनातन, नित्य है।

समय के रहस्य को जानने वाले के लिए कृष्ण कहते हैं, जो समय के, काल के इस तत्व को जान लेता है, इस क्षण के द्वार को पहचान लेता है और समय के बाहर होने की कला जिसे आ जाती है, वह संपूर्ण दृश्यमात्र भूतगण ब्रह्मा के दिन केप्रवेशकाल में अव्यक्त से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उसी अव्यक्त में लय होते हैं--इस तत्व का भी ज्ञाता हो जाता है।

यहां दोत्तीन बातें, जो कि मैंने आपसे अभी-अभी कहीं, वे खयाल में ले लें। कृष्ण कहते हैं, वह व्यक्ति जो समय को जान लेता है, वह इस सत्य को भी जान लेता है कि यह जगत कहां से पैदा होता है और कहां लीन होता है। इस जगत के पैदा होने के लिए कृष्ण ने कहा है, समस्त दृश्यमात्र भूत, सब मैटर, सब पदार्थ, ब्रह्मा के दिन के प्रवेशकाल में, ब्रह्मा के प्रथम मुहूर्त क्षण में, जब ब्रह्मा का दिन शुरू होता है...।

हमने कल समझा कि चौबीस घंटे हमारे जैसे हैं, बारह घंटे का दिन और बारह घंटे की रात भी मान लें, तो ब्रह्मा की जब सुबह होती है, ब्रह्ममुहूर्त! अभी भी हम सुबह के क्षण को ब्रह्ममुहूर्त कहते हैं, सिर्फ इस याददाश्त में कि कभी हमें वास्तविक ब्रह्ममुहूर्त का भी पता चल जाएगा। जिसे हम ब्रह्ममुहूर्त कहते हैं, वह ब्रह्ममुहूर्त नाम मात्र को है।

ब्रह्ममुहूर्त का अर्थ है, ब्रह्मा का वह क्षण, जब जगत शुरू होता है, जीवन प्रारंभ होता है, पदार्थ आविर्भूत होते हैं, व्यक्त होते हैं और लीला शुरू होती है। सुबह वह लीला शुरू होती है, सांझ होते-होते वह लीला अपने शिखर पर पहुंच जाती है। और जब भी कोई चीज शिखर पर पहुंचती है, तो उतरना शुरू हो जाती है। फिर रात ब्रह्मा की, और सब चीजें बिखरती जाती हैं, उतरती चली जाती हैं। और अंतिम क्षण में रात्रि के, जो जगत प्रकट हुआ था, वह पुनः अप्रकट में लीन हो जाता है। और फिर सुबह,और फिर सांझ, और फिर सुबह, ऐसा वर्तुलाकार ब्रह्मा का समय चलता रहता है।

ये पदार्थ अव्यक्त से उत्पन्न होते हैं। अव्यक्त का अर्थ है, दि अनमैनिफेस्टेड, जो प्रकट नहीं है। उससे प्रकट होता है सब। जो छिपा है, उससे प्रकट होता है सब। जो गुप्त है, उससे प्रकट होता है सब।

अभी विज्ञान की खोज भी इसके करीब पहुंची है। शायद इस वचन के समर्थन में शंकर जो नहीं कह सकते, रामानुज जो नहीं कह सकते, निंबार्क जो नहीं कह सकते, गीता के जो भी बड़े-बड़े चिंतक हुए वे नहीं कह सकते, वह शायद इस हमारी सदी का भौतिकविद, फिजिसिस्ट कह सकता है। आइंस्टीन कह सकता है कि यह वक्तव्य न केवल धर्म का वक्तव्य है, यह वक्तव्य विज्ञान का भी वक्तव्य है। क्योंकि परमाणु के विभाजन के बाद विज्ञान ने पाया कि वह जो प्रकट परमाणु था, अचानक अप्रकट में लीन हो जाता है।

इसके पहले तक कभी विज्ञान को खयाल नहीं था और यह इल्लाजिकल भी है। यह वक्तव्य बहुत अतार्किक है, तर्कहीन है। बुद्धिमत्ता इसका समर्थन न करेगी, बुद्धि इसके सहयोग में खड़ी न होगी। क्यों? क्योंकि व्यक्त अगर प्रकट होता है अव्यक्त से, तो इसका तो अर्थ हुआ कि शून्य से पूर्ण का जन्म होता है। इसका तो अर्थ हुआ कि जो नहीं है, उससे, जो है, वह निकल आता है। इसका तो अर्थ हुआ, जो कहीं नहीं पाया जाता, उससे भी, सारा जो सब जगह पाया जाता है, उसका फैलाव है। यह तो बहुत तर्क में बात आती नहीं। विचार इसको पकड़ नहीं पाता। यह तो ऐसा ही हुआ कहना कि आउट आफ नथिंग, ना-कुछ से,सब कुछ का जन्म है।

लेकिन परमाणु के विघटन ने इस गीता के वक्तव्य को वैज्ञानिक प्रामाणिकता भी दे दी। क्योंकि परमाणु के विघटन के बाद कोई उपाय न रहा। और जब किसी ने बहुत बड़े भौतिकविद प्लांक से पूछा कि यह तुम कैसी तर्कहीन बातें कर रहे हो! कि परमाणु के नीचे उतरते ही परमाणु का जो पदार्थ है, वह अपदार्थ हो जाता है, मैटर इम्मैटर हो जाता है, यह तुम कैसी तर्कहीन और अवैज्ञानिक बातें कर रहे हो! तो प्लांक का उत्तर बहुत अदभुत है।

प्लांक ने कहा, जब तक मुझे पता नहीं था, प्रयोग में जाना नहीं था, तब तक मैं भी यही कहता। अब मैं तुमसे इतना ही कहूंगा, हमारे वश के बाहर है। परमाणु का जो व्यवहार है, वह यही है कि उसके टूटते ही वह नीचे अव्यक्त में खो जाता है। अब अगर वह अतर्क है, तो हम अपने तर्क को बदल डालें, और कोई उपाय नहीं। नाउ लेट अस चेंज अवर होल लाजिक! लेकिन हम अस्तित्व को नहीं बदल सकते। अगर हमारे तर्क में बात नहीं बैठती है, तो भी अस्तित्व राजी नहीं होगा कि हमारे तर्क के अनुसार चले। हम अपने तर्क को ही बदल लें। और तो कोई उपाय नहीं है।

इसलिए पचास वर्षों में पिछले एक नए तर्क का जन्म हुआ है, पश्चिम में नए गणित का जन्म हुआ है, नई ज्यामिति का जन्म हुआ है, जिनको कि सुनकर पुराने ज्यामिति के विद्यार्थी को, पुराने गणित के विद्यार्थी को, पुराने तर्क के विद्यार्थी को कुछ भी समझ में नहीं आता कि यह क्या है!

आपमें से बहुत-से लोगों ने शिक्षा के समय में ज्यामेट्री पढ़ी होगी यूक्लिड की, लेकिन इधर निरंतर नान-यूक्लिडिअनज्यामेट्री महत्वपूर्ण होती जा रही है। यूक्लिड की सारी परिभाषाएं गलत हो गईं, क्योंकि अस्तित्व में उनसे कहीं मेल नहीं है।

यूक्लिड कहता है, दो समानांतर रेखाएं कहीं नहीं मिलतीं। जो गैर, यूक्लिड के विपरीत खड़ी हुई ज्यामेट्री है, वह कहती है,दो समानांतर रेखाएं भी मिलती हैं। यूक्लिड कहता है, दो समानांतर रेखाएं कैसे मिल सकती हैं? वे बिलकुल समानांतर हैं,इसलिए कहीं भी बढ़ जाएं, समानांतर ही रहेंगी। मिलेंगी कैसे?

नान-यूक्लिडिअन ज्यामेट्री कहती है, हम परिभाषाएं नहीं मानते। हम कहते हैं, दो समानांतर रेखाएं खींचो और बढ़ाते चले जाओ, अगर वे न मिलें, तो हम मान लेंगे।

अब बड़ी मुश्किल है, रेखाएं मिल जाती हैं। तो वे कहते हैं, हम यूक्लिड को मानें कि इन रेखाओं को मानें, जो मिल जाती हैं! इन रेखाओं को यूक्लिड का कोई भी पता नहीं है। या, नान-यूक्लिडिअन ज्यामेट्री कहती है, कि अगर तुम जिद्द ही करते हो,तो उसका मतलब यह हुआ कि दो समानांतर रेखाएं खींची ही नहीं जा सकतीं। एक ही बात है। जो भी खींची जा सकती हैं, वे मिल जाती हैं। और जो खींची नहीं जा सकतीं, उनके मिलने न मिलने का पता कैसे चलेगा!

यूक्लिड कहता है कि हम सीधी रेखा उसे कहते हैं, जो दो बिंदुओं के बीच सबसे कम जगह में प्रवेश करती है। और यूक्लिड कहता है कि सीधी रेखा सीधी है। सीधी रेखा को किसी वर्तुल का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता है। इट कैन नाट बीसेग्मेंट आफ ए सर्किल। नान-यूक्लिड की ज्यामेट्री कहती है, तुम कोई सीधी रेखा खींचो; और हर सीधी रेखा को किसी बड़े वर्तुल का हिस्सा बनाया जा सकता है। क्योंकि नान-यूक्लिडिअन ज्यामेट्री कहती है, जिस जमीन पर बैठकर तुम रेखा खींचते हो, वह गोल है। उस पर खींची गई कोई भी रेखा, अगर पूरी तरह दोनों तरफ बढ़ा दी जाए, तो जमीन को घेरकर वर्तुल बन जाएगी।

यूक्लिड का बिलकुल सफाया हो गया, उसको अब कोई जगह नहीं बची।

पुराना गणित कहता है, दो और दो मिलकर चार होते हैं। नया गणित कहता है कि दो और दो मिलकर चार कभी नहीं होते, कभी इंचभर इस तरफ होते हैं, कभी इंचभर उस तरफ होते हैं। क्योंकि दो और दो कभी बराबर नहीं होते। दो और दो बराबर कभी नहीं होते। आप कहेंगे, दो और दो तो बराबर होते हैं! नया गणित कहता है कि सिर्फ परिभाषा में। सिर्फ परिभाषा में।

कोई दो चीजें बराबर नहीं होतीं। कोई दो पत्थर बराबर नहीं होते। कोई दो पत्ते बराबर नहीं होते। अस्तित्व में दो चीजेंएक्जेक्टली अलाइक एंड ईक्वल होती ही नहीं। कोई उपाय नहीं है दो चीजों को बराबर, ठीक बराबर करने का। थोड़ा-सा अंतर शेष रह ही जाता है। और वह अंतर जोड़ में फर्क करेगा। लेकिन दो और दो चार होते हैं। दो और दो चीजें अगर जोड़ी जाएं, तो कभी चार नहीं होतीं; कुछ कम या कुछ ज्यादा।

प्लांक ने कहा है कि हम अपने गणित को बदल लें, अपने तर्क को बदल लें; लेकिन अस्तित्व हमारे तर्क को मानकर चलने के लिए राजी नहीं है।

इधर बीस वर्षों ने खुद विज्ञान की आधारशिलाओं को बहुत ही हिला दिया है। एक नया शब्द विज्ञान में प्रवेश किया जो कभी भी नहीं था। हमेशा समझा जाता था, साइंस इज़ दि मोस्ट सर्टेन थिंग। किसी ने नहीं सोचा था कि अनसर्टेंटी, अनिश्चय विज्ञान का केंद्रीय शब्द बन जाएगा। इधर बन गया है। अनसर्टेंटी, अनिश्चय ही विज्ञान का केंद्रीय शब्द बन गया है। क्योंकि कुछ भी निश्चित नहीं मालूम पड़ता, सब डांवाडोल हो गया है। इस डांवाडोल होने में जो सबसे बड़ी घटना घटी है, यह वचन उसी घटना के लिए है।

कृष्ण कहते हैं, अव्यक्त से व्यक्त का जन्म होता है ब्रह्ममुहूर्त में, ब्रह्मा के पहले क्षण में। और फिर पुनः यह व्यक्त जब थक जाता, जीर्ण-शीर्ण हो जाता, जरा-जीर्ण हो जाता, वृद्ध हो जाता, तो पुनः लीन हो जाता है अव्यक्त में।

इसे हम अपने से समझें तो शायद आसान हो जाए।

सुबह आप उठते हैं ताजे, लेकिन कभी आपने खयाल किया, यह ताजगी कहां से आती है? निश्चित ही, रातभर आपने ताजगी के लिए कुछ भी नहीं किया; न कोई व्यायाम किया, न कोई भोजन लिया। रातभर अगर आपने कुछ भी किया, तो इतना ही किया कि अपने को सब करने से रोका। रातभर आप सोए रहे। सोने में आप पुनः अव्यक्त में गिर जाते हैं। व्यक्त से हट जाते हैं, अव्यक्त में गिर जाते हैं। उसी अव्यक्त से ताजगी लेकर सुबह पुनः उठ आते हैं। सांझ होते-होते फिर थक जाते हैं;दिन ढल जाता है, रात शुरू हो जाती है। फिर...।

इसलिए पुराने शास्त्र कहते हैं, निद्रा छोटी मृत्यु है, निद्रा आंशिक मृत्यु है; मृत्यु पूर्ण निद्रा है। रोज आदमी को मरना पड़ता है, इसीलिए सुबह वह पुनः जीवित हो पाता है। रात अंधेरे में डूब जाते हैं, सुबह फिर पुनरुज्जीवित होते हैं, ताजे,प्रफुल्लित; फिर काम में लग जाते हैं।

ठीक ब्रह्मा की यह पूरी सृष्टि भी दिनभर में थक जाती है, सांझ होने के करीब हो जाती है। फिर मृत्यु, फिर पुनर्जन्म। ठीक चौबीस घंटे के दिन की भांति ब्रह्मा का भी बड़ा वर्तुलाकार दिन घूमता रहता है।

इसलिए एक बात और बहुत मजे की है और वह यह कि सिर्फ पूरब के मुल्कों में और विशेषतया भारत में समय की एक धारणा विकसित की, जो सरकुलर है, वर्तुलाकार है। हम समय को हमेशा वर्तुल में सोचते रहे। पश्चिम में समय की धारणालीनियर है, एक रेखा में, सीधी। पश्चिम को वर्तुल का खयाल ही अभी-अभी आना शुरू हुआ। नहीं तो पश्चिम सोचता है, एक रेखा में इतिहास चलता है। हम सोचते हैं कि रेखा में नहीं, गोल वर्तुल में चलता है।

इसलिए हम जानते हैं कि सब चीजें फिर लौटकर आ जाती हैं। अगर एक ही रेखा में चलता हो, तो चीजें लौटकर नहीं आ सकतीं। इसलिए पश्चिम ने इतिहास लिखा, पूरब ने कभी इतिहास नहीं लिखा। क्योंकि जब सभी चीजें बार-बार लौट आती हों, तो इतिहास की लिखने की व्यर्थ की झंझट में क्यों पड़ना? फिर-फिर यही होगा। फिर राम होंगे, फिर कृष्ण होंगे, फिर बुद्ध होंगे; चीजें वर्तुलाकार लौटती रहेंगी; तो क्या प्रयोजन है बार-बार लिखने से कि बुद्ध कब हुए, कैसे हुए, किस तिथि में हुए, किस समय में हुए!

ईसाइयत ने समय का नान-सर्कुलर दृष्टिकोण पकड़ा है, गैर-वर्तुल, रेखाबद्ध। इसलिए ईसा का जन्मदिन इतिहास की शुरुआत बन गया। वह ईवेंट बन गया, घटना बन गई। इसलिए उचित ही है कि सारी दुनिया में हम ईसा के जन्मदिन के हिसाब से समय को मापते हैं। हमारे पास ऐसा समय-माप नहीं है। और हमने जो समय-माप गढ़े भी हैं, वे भी ईसा की नकल में गढ़े हैं। और हमने बहुत दफे बहुत-से समय-माप शुरू किए, लेकिन हमारी चेतना से मेल नहीं पड़ा और वे छूट गए।

हमने पुराण तो लिखा है, इतिहास नहीं लिखा। पुराण का अर्थ है, वह जो सदा लौटता है, उसमें तिथियों के हिसाब की जरूरत नहीं, कथा का सार ही काफी है। इसलिए ईसाइयत कहती है कि जीसस इज़ दि फर्स्ट हिस्टारिक पर्सन। वे ठीक कहते हैं कि जीसस पहले ऐतिहासिक पुरुष हैं। वे कहते हैं, तुम्हारे सब पुरुष--कृष्ण हों, कि ऋषभ हों, कि राम हों, कि परशुराम हों--ये सब नान-हिस्टारिक हैं, ये सब गैर-ऐतिहासिक हैं।

इससे भारतीय मन को बड़ी पीड़ा होती है; लेकिन उसी मन को, जिसे भारत के रहस्यों का कोई पता नहीं है। इससे खुश होना चाहिए, यह पौराणिक है और पुराण इतिहास से ज्यादा गहन बात है।

इतिहास लेखा-जोखा है ऊपरी घटनाओं का; पुराण लेखा-जोखा है अंतरतम का। उसमें तिथियों का कोई मूल्य नहीं। उसमें,अखबार में जो घटनाएं छपती हैं, उनका कोई मूल्य नहीं। उसमें तो जो घटनाएं जीवन के अंतस्तल में, अस्तित्व के प्राणों में घटित होती हैं, केवल उनका लेखा-जोखा है।

इसलिए एक बहुत मजेदार घटना घट सकती है, वह सिर्फ भारत में घट सकती है। वह यह है कि वाल्मीकि ने राम केजन्मने के पहले रामायण लिखी। यह दुनिया में कहीं भी नहीं घट सकती। यह कैसे घट सकती है! क्योंकि इतिहास लिखने वाला तो इतिहास तभी लिखेगा, जब इतिहास घट जाए। कोई अखबार खबर छाप सकता है, जो अभी घटी न हो? अखबार तो खबर छाप सकता है, जो घट गई हो। इसलिए इतिहास केवल सड़ा हुआ कचरा है, जो हो चुका, जो बीत चुका। वह सिर्फ राख है मुर्दों की। इतिहास मरे का लेखा-जोखा है।

सिर्फ एक अनूठी घटना इस मुल्क में घटी है और वह यह कि वाल्मीकि ने राम के जन्म के पहले राम की कथा लिखी है। बड़ी अनूठी है और बड़ी बेबूझ है, एब्सर्ड है, तर्कसंगत नहीं है। कोई भी कहेगा, क्या पागलपन है! पहले कथा कैसे लिखी जा सकती है?

लिखी जा सकती है, अगर पुराण का खयाल हो। वाल्मीकि को अगर यह पता है कि राम जैसा व्यक्ति हर वर्तुलाकार अस्तित्व में पैदा होता है, राम जैसा व्यक्ति ब्रह्मा के हर दिन में एक बार पैदा होता ही है, तो यह कथा लिखी जा सकती है। यह राम जैसा व्यक्ति हजारों दफे पहले भी पैदा हो चुका है।

समझें ऐसा कि हमें पता है कि हर वर्ष, वर्ष के किसी काल में वर्षा आती है। एक बार जब वर्ष का वर्तुल घूमता है, तो वर्षा आती है। तो वर्षा आने के पहले जान लेने में कौन-सी कठिनाई है! जिसे पता हो कि आषाढ़ आएगा और आषाढ़ के पहले दिन आकाश में बादल घिरेंगे, भूखी-प्यासी पृथ्वी मांग करेगी और आकाश से उसकी प्यास को तृप्त करने के लिए पानी गिरेगा। इसमें कौन-सी कठिनाई है, जिसे पता हो पिछले वर्षों का, वर्षा के होने का!

लेकिन एक नया बच्चा पैदा हुआ है, जिसने अभी पहली वर्षा भी नहीं देखी। उसका पिता अगर उससे कहे कि बहुत शीघ्र वर्षा आएगी, आषाढ़ का पहला दिन करीब आता है। आकाश में काले बादल घिरेंगे, सब मौसम गीला, धुंधला हो जाएगा। फिर बूंदें गिरेंगी, जो पृथ्वी के लिए अमृत जैसी तृप्तिदायी होंगी। वृक्ष हरे हो उठेंगे, फूलों से लद जाएंगे। सारा जीवन हरा हो जाएगा।

तो वह बच्चा प्रतीक्षा करे। फिर आषाढ़ का पहला दिन आए और बादल घिरने लगें, तो वह पिता को कहे कि तुम कैसे अदभुत हो! ठीक वैसा ही हुआ जा रहा है।

इस पिता को सिर्फ इतना ही पता है कि वर्ष के वर्तुल में, चक्र में वर्षा एक बार आती है। ठीक प्रत्येक ब्रह्मा के काल में कितने लोग पैदा होते हैं!

जैन अनुभवियों को पता है कि ब्रह्मा के एक दिन में चौबीस तीर्थंकर पैदा होते हैं। एक-एक घंटे पर, इसलिए चौबीस। चौबीस घंटे में एक-एक घंटे पर एक-एक टीचर, एक-एक सदगुरु पैदा होता है। इसलिए चौबीस तीर्थंकर पैदा होते हैं।

ये हर वर्तुल में पैदा होते हैं। इनके नाम अलग होंगे, इनके इतिहास की रेखाएं थोड़ी-बहुत अलग होंगी। क्योंकि हर बार,हर आषाढ़ के पहले दिन पर आकाश में घिरे बादलों की रूप-रेखा एक-सी नहीं होती। कोई और होगा राम, कोई और होगा कृष्ण। लेकिन ऊपर का लेखा-जोखा अलग होगा, इतिहास अलग होगा, भीतर का जो सारभूत तत्व है, वह एक ही होगा। कभी वह दशरथ का पुत्र होगा, और कभी दशरथ का पुत्र नहीं होगा। लेकिन राम जब भी पैदा होगा, तो वह भीतर का जो रामपन है, दि एसेंशियल, वह जो सारभूत है, वह वही होगा।

वाल्मीकि उसी सारभूत राम की कथा लिखते थे। और बड़ी मधुर है यह बात कि राम फिर उस कथा के अनुसार जीवन का आचरण करते हैं। क्योंकि वाल्मीकि को सत्य तो होना ही चाहिए। वाल्मीकि के असत्य होने का कोई उपाय ही नहीं है। जो पुराण को जानते हैं, वे कभी असत्य नहीं होते; और जो इतिहास को जानते हैं, वे कितना ही जान लें, वे सदा ही असत्य होते हैं।

इतिहास कभी निर्णय नहीं कर पाता--यह बहुत मजे की बात है--हम पीछे का भी निर्णय नहीं कर पाते कि क्या हुआ। हमला पाकिस्तान ने किया हिंदुस्तान पर, कि हिंदुस्तान ने किया पाकिस्तान पर, वह कभी निर्णीत नहीं होता। वह कभी निर्णीत नहीं होता, कि चीन हमलावर था कि हम हमलावर थे। चीन के इतिहासविद लिखते रहेंगे कि हमने हमला किया और हमारे इतिहासज्ञ लिखते रहेंगे कि चीन ने हमला किया। और सदियों तक ये दोनों इतिहास चलते रहेंगे। और कभी तय होने वाला नहीं कि हमला किसने किया। इतिहास, जो घट चुका, वह भी तय नहीं होता।

और अभी पश्चिम का बहुत बड़ा विचारशील इतिहासविद टायनबी कहता है कि मैं इतना ही कह सकता हूं इतिहास के संबंध में कि ज्यादा से ज्यादा हम इतना ही मान सकते हैं कि जिस पर भी हम सब सहमत हो जाते हैं, एक बात पर, वह सबसे कम असत्य होगी, बस। और सत्य होगी, इस पर नहीं हो सकते तय। कम से कम असत्य यह बात होगी, इस पर हम तय हो सकते हैं ज्यादा से ज्यादा। इस पर भी विवाद जारी रहेगा। इस पर भी निर्णय नहीं हो सकता।

एक तो यह स्थिति है और एक स्थिति वह है कि पहले लिखी जाती है कथा और राम का आचरण उसके अनुसार हो जाता है। और राम के आचरण में अगर थोड़ा-बहुत भेद भी रहा होगा, तो उस भेद को हटा दिया गया। उस भेद का कोई मूल्य नहीं है। राम उतने निर्णायक नहीं हैं, जितने निर्णायक वाल्मीकि हैं। क्योंकि राम की जो ऊपरी घटनाएं हैं, नान-एसेंशियल हैं, कि वह किसके घर में पैदा हुए, कि उन्होंने कितनी रोटी एक दिन खाईं, कि किससे क्या बात की, यह बेमानी है। उनका रामपनकैसे प्रकट हुआ, वही महत्वपूर्ण है।

पुराण का अर्थ यह है। अव्यक्त से व्यक्त का जो जन्म है, अगर वह वर्तुलाकार है, तो हम भविष्य के ज्ञाता हो सकते हैं। और अतीत के संबंध में भी हमारी निष्पत्ति सत्य हो सकती है। कम से कम असत्य नहीं, पूर्णतः सत्य हो सकती है।

लेकिन समय की इस वर्तुलाकार दृष्टि का अगर खयाल हो, तो दो बातें स्मरण रख लेनी चाहिए। वह यह कि जो भी शुरू होता है, वह समाप्त होता है। पश्चिम को खयाल ही नहीं है प्रलय का। पश्चिम में खयाल है क्रिएशन का। ईश्वर ने जगत को बनाया। लेकिन पश्चिम यह सोच ही नहीं सकता कि वही ईश्वर इस जगत को मिटाएगा भी। क्योंकि यह मिटाना, बनाने वाले के साथ संगत नहीं मालूम पड़ता, इनकंसिस्टेंट मालूम पड़ता है। पश्चिम सोच सकता है कि पिता है ईश्वर जगत का, लेकिन यह नहीं सोच सकता कि वही विध्वंसक और हत्यारा भी होगा।

हम सोच सके। सच तो यह है कि हमसे ज्यादा हिम्मतवर सोचने वाले लोग जमीन पर फिर नहीं हुए। यह बड़ी हिम्मत की बात है यह सोचना कि जिसने बनाया है इस जगत को, वही इसे विनाश में ले जाएगा। क्योंकि हमें एक सत्य दिखाई पड़ गया कि जो भी चीज बनती है, वह मिटती है। और जो बनाने वाला है, वही मिटाने वाला भी है। और मिटने और बनने में हमने विरोध नहीं देखा, एक ही प्रक्रिया के दो हिस्से देखे। सुबह और सांझ में हमने विरोध नहीं देखा। सुबह जिसे उगते देखा, सांझ उसे डूबते देखा। वही सूरज सांझ को डूबता है