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गीता दर्शन--(भाग-3)66


गीता दर्शन--(भाग-3) प्रवचन--066

योग का अंतर्विज्ञान (अध्याय—6) प्रवचन—नौवां

प्रश्न: भगवान श्री, योग के अभ्यास और उसकी आवश्यकता पर बात चल रही थी। आपने समझाया था कि धर्म और आत्मा तो हमारा स्वभाव ही है। उसे उपलब्ध नहीं करना है, वह मिला ही हुआ है। लेकिन योग का अभ्यास अशुद्धि को काटने के लिए करना पड़ता है। कृपया योगाभ्यास से अशुद्धि कैसे कटती है, इस पर कुछ कहें।

स्वभाव कहते हैं उसे, जो हमें मिला ही हुआ है। जिसे हम चाहें तो भी खो नहीं सकते। जिसे खोने का कोई उपाय नहीं है। स्वभाव का अर्थ है, जो मेरा होना ही है, जो हमारा अस्तित्व ही है।

जो जानते हैं, वे कहते हैं कि हमारा स्वभाव स्वयं परमात्मा होना है। ऐसा कोई एक नहीं कहता; इस पृथ्वी पर कोने-कोने में, अलग-अलग सदियों में, अलग-अलग स्थानों पर जब भी किसी ने जाना है, उसने यही कहा है। यह निरपवाद घोषणा है। ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं हुआ है मनुष्य के इतिहास में जिसने कहा हो कि मैंने जान लिया भीतर जाकर और मनुष्य के भीतर परमात्मा नहीं है।

जिन्होंने कहा है, परमात्मा नहीं है, वे कभी भीतर नहीं गए। और जो भीतर गए हैं, उन्होंने सदा कहा है कि परमात्मा है। अगर कोई सत्य निरपवाद सत्य हो सकता है, तो वह एक सत्य यही है कि मनुष्य का स्वभाव परमात्मा ही है।

लोग परमात्मा को खोजते हैं। कभी खोज न पाएंगे, क्योंकि खोजा उसे जा सकता है जिसे खोया हो। असल में जो खोजने निकला है, वह स्वयं ही परमात्मा है, इसलिए खोज कैसे पाएगा? हम अगर परमात्मा से अलग होते, तो कहीं न कहीं उसे खोज ही लेते, कहीं न कहीं मुठभेड़ हो ही जाती, कहीं न कहीं आमने-सामने पड़ ही जाते। लेकिन हम स्वयं ही परमात्मा हैं। इसलिए जो परमात्मा को खोजने निकला है, उसे अभी पता ही नहीं कि वह जिसे खोज रहा है, वह उसका स्वयं का ही होना है।

यह तो हमारा स्वभाव है, जिसे हम कभी खो नहीं सकते, लेकिन आश्चर्य कि इसे भी हम खोए हुए मालूम पड़ते हैं,अन्यथा खोजते ही क्यों! खो तो नहीं सकते, फिर कुछ और हो सकता है, जो खोने से मिलता-जुलता है। वह है विस्मरण, वह हैफारगेटफुलनेस।

स्वभाव को खोया नहीं जा सकता, लेकिन स्वभाव को भूला जा सकता है। विस्मरण किया जा सकता है। यद्यपि विस्मरण के समय में भी कुछ बदलाहट नहीं होगी; हम जो थे, वही होंगे। लेकिन फिर भी हम जो हैं, वह हम अपने को समझ नहीं पाएंगे।

परमात्मा सिर्फ विस्मृत है।

योग की क्या जरूरत है जब परमात्मा स्वभाव है? योग की जरूरत है इस विस्मरण को तोड़कर स्मरण को पुनर्स्थापित करने के लिए। यह जो फारगेटफुलनेस है, यह जो भूल जाना है, इस भूल जाने की व्यवस्था को तोड़ देने के लिए योग का प्रयोग है।

ठीक से समझें, तो योग का समस्त प्रयोग निगेटिव है, नकारात्मक है। वह किसी चीज को पाने के लिए नहीं, कोई चीज बीच में अटकाव बन गई है, उसे तोड़ने के लिए है। योग से कोई नई चीज निर्मित नहीं होगी; योग से कोई नई उपलब्धि नहीं होगी; योग से तो जो सदा-सदा से मिला ही हुआ है, वही पुनर्स्मरण होगा।

बुद्ध को जब ज्ञान हुआ, तो किसी ने बुद्ध से पूछा है कि आपने पाया क्या? तो बुद्ध बहुत हंसने लगे और उन्होंने कहा कि मत पूछो। ऐसा मत पूछो। क्योंकि मैंने पाया कुछ भी नहीं। तो उस आदमी ने कहा कि फिर इतनी मेहनत व्यर्थ गई? फिर लोग कहते हैं कि आपको मिल गया। तो मिला क्या है? आप कहते हैं, पाया नहीं! बुद्ध ने कहा, अगर ठीक से कहूं, तो यही कह सकता हूं, मैंने कुछ खोया है, मैंने कुछ पाया नहीं।

तब तो स्वभावतः पूछने वाला और भी चकित हुआ। और उसने कहा, खोने के लिए इतनी मेहनत! तो फल क्या है?अभिप्राय क्या है? और अब आप उपदेश क्यों देते हैं?

बुद्ध ने कहा, इसीलिए कि तुम भी कुछ खो सको। जो मैंने पाया है, अब मैं कह सकता हूं कि वह सदा ही मेरे भीतर था,सिर्फ मुझे पता नहीं था। इसलिए कैसे कहूं कि मैंने पाया! था ही। इतना ही कह सकता हूं कि वह जो मेरे भीतर था, उसको भी जानने में कुछ बाधाएं मेरे भीतर थीं, उन बाधाओं को मैंने खोया। अज्ञान मैंने खोया है। और ज्ञान पाया है, ऐसा मैं नहीं कह सकूंगा, क्योंकि वह था ही। स्वयं को मैंने खोया है। लेकिन परमात्मा को मैंने पाया, ऐसा मैं न कह सकूंगा, क्योंकि वह था ही। लेकिन मेरी वजह से दिखाई नहीं पड़ता था। मेरे मैं की वजह से दिखाई नहीं पड़ता था। मेरी विस्मृति गहरी थी और दिखाई नहीं पड़ता था।

योग है विस्मरण को काटने की विधि।

विस्मरण क्यों है? विस्मरण के होने का भी कारण है। अकारण तो नहीं विस्मरण हो सकता। विस्मरण के होने का कारण है। तीन बातें खयाल में लें, तो स्मरण की प्रक्रिया समझ में आ सकेगी।

विस्मरण का पहला बुनियादी कारण तो यह है कि जो भी हम हैं, उसे बिना एक बार भूले, हमें कभी पता नहीं चलेगा। जो भी हम हैं, उसे एक बार बिना करीब-करीब खोए, हमें पता नहीं चलेगा। असल में पता चलने के लिए विरोधी घटना घटनी चाहिए। पता चलने का नियम है।

अगर आप कभी बीमार नहीं पड़े, तो आप स्वस्थ हैं, ऐसा आपको कभी पता नहीं चलेगा। कभी भी आपको यह पता नहीं चलेगा कि आप स्वस्थ हैं। बीमार पड़ेंगे, तो पता चलेगा कि स्वस्थ थे। बीमार पड़ेंगे, तो पता चलेगा कि अब स्वस्थ हो गए। लेकिन बीमारी के कंट्रास्ट के बिना, बीमारी के विरोध के बिना, आपको अपने स्वास्थ्य का कोई स्मरण नहीं हो सकता है।

अगर इस पृथ्वी पर अंधेरा न हो, तो प्रकाश का किसी को भी पता नहीं चलेगा। प्रकाश होगा, पता नहीं चलेगा। पता चलने के लिए विपरीत का होना जरूरी है। वह जो विपरीत है, वही पता चलवाता है। अगर बुढ़ापा न हो, तो जवानी तो होगी,लेकिन पता नहीं चलेगा। अगर मौत न हो, तो जिंदगी तो होगी, लेकिन पता न चलेगा। जिंदगी का पता चलता है मौत के किनारे से। वह जो मौत की पृष्ठभूमि है, उस पर ही जीवन उभरकर दिखाई पड़ता है। अगर मौत कभी न हो, तो आपको जीवन का कभी भी पता नहीं चलेगा। यह बहुत उलटी बात लगेगी, लेकिन ऐसा ही है।

स्कूल में शिक्षक लिखता है, काले ब्लैकबोर्ड पर सफेद खड़िया से। सफेद ब्लैकबोर्ड पर भी लिख सकता है। लिखावट तो बन जाएगी, लेकिन दिखाई नहीं पड़ेगी। लिखता है काले ब्लैकबोर्ड पर और तब सफेद खड़िया उभरकर दिखाई पड़ने लगती है।

जिंदगी के गहरे से गहरे नियमों में एक है कि उसी बात का पता चलता है जिसका विरोधी मौजूद हो; अन्यथा पता नहीं चलता।

अगर हमारे भीतर परमात्मा है, सदा से है, तो भी उसका पता तभी चलेगा, जब एक बार विस्मरण हो। उसके बिना पता नहीं चल सकता।

इसलिए विस्मरण स्मरण की प्रक्रिया का अनिवार्य अंग है। ईश्वर से बिछुड़ना, ईश्वर से मिलन का प्राथमिक अंग है। ईश्वर से दूर होना, उसके पास आने की यात्रा का पहला कदम है। केवल वे ही जान पाएंगे उसे, जो उससे दूर हुए हैं। जो उससे दूर नहीं हुए हैं, वे उसे कभी भी नहीं जान पाएंगे।

अगर आपको अपनी मां की गोद से कभी सिर हटाने का मौका न मिले, तो आपको मां की गोद का भर पता नहीं चलेगा, और सब पता चलता रहेगा। मां की गोद छूट जाती है, तब ही पता चलता है कि वह गोद थी। उसका अर्थ और अभिप्राय है।

जीवन का यह सत्य स्वयं के स्वभाव को भूलने के लिए भी लागू होता है। भूलना ही पड़ता है, तो ही हमें बोध होता है। बोध के जन्म की यह अनिवार्य प्रक्रिया है।

और भूलने का ढंग क्या होता है? भूलने का एक ही ढंग है। भूलने का एक ही ढंग है, अगर स्वयं को भूलना हो, तो स्वयं को गलत समझना पड़ेगा, तभी भूल सकते हैं; नहीं तो भूल नहीं सकते। स्वयं को कुछ और समझना पड़ेगा, तभी जो हैं,उसे भूल सकते हैं, अन्यथा भूलेंगे कैसे? इसलिए चेतना अपने को शरीर समझ लेती है, पदार्थ समझ लेती है, मन समझ लेती है, विचार समझ लेती है, भाव समझ लेती है, वृत्ति-वासना समझ लेती है--सिर्फ आत्मा नहीं समझती। दूसरे के साथ तादात्म्य हो जाता है। यह भूलने का ढंग है।

योग इस भूलने के ढंग से विपरीत यात्रा है, पुनः घर की ओर वापसी; रिटघनग होम। बहुत दूर निकल गए हैं; फिर वापसपुनर्यात्रा। निश्चित ही, पुनः उसी जगह पहुंचेंगे, जहां से चले थे। लेकिन आप वही नहीं होंगे। क्योंकि जब आप चले थे, तब आपको उस जगह का कोई भी पता नहीं था। अब जब आप पहुंचेंगे, तो आपको पूरा पता होगा। वहीं पहुंचेंगे, जहां से चले थे। वहीं प्रभु के मंदिर में प्रवेश हो जाएगा, जहां से बाहर निकले थे। लेकिन जब दुबारा पहुंचेंगे, इस बीच के क्षण में प्रभु को भूलकर,तो प्रभु के मिलन के आनंद और एक्सटैसी का, समाधि का, प्रभु के मिलन के उत्सव का, प्रभु के मिलन की वह जो अपूर्व घटना घटेगी, वह प्राणों में अमृत बरसा जाएगी।

वहीं पहुंचेंगे, लेकिन वही नहीं होंगे, क्योंकि बीच में विस्मरण घट चुका। और अब जब स्मरण आएगा, तो यह काले तख्ते पर सफेद रेखाओं की तरह उभरकर आएगा। पहली दफे, जो लिखा है, वह पढ़ा जा सकेगा। पहली दफे, जो स्वभाव है, वह प्रकट होगा। पहली दफे, जो छिपा है, वह उघड़ेगा। पहली दफे, जो दबा है, वह अनावृत होगा। यह जीवन का अनिवार्य हिस्सा है।

कोई पूछे, ऐसा क्यों है? तो वह बच्चों का सवाल पूछ रहा है। वैज्ञानिक से पूछें कि पृथ्वी गोल क्यों है? वह कहेगा, है। हम तथ्य बता सकते हैं, क्यों नहीं बता सकते। पूछें कि सूरज में रोशनी क्यों है? वह कहेगा, है। या और अगर थोड़ी खोजबीन की, तो कहेगा, हीलियम गैस की वजह से है, इसकी वजह से है, उसकी वजह से है; कि उदजन का अणु-विस्फोट हो रहा है, इस वजह से है। लेकिन पूछें कि क्यों हो रहा है सूरज पर, जमीन पर क्यों नहीं हो रहा है? तो वैज्ञानिक कहेगा, इसको मत पूछें। ऐसा हो रहा है, वह हम कह सकते हैं। व्हाई मत पूछें, क्यों मत पूछें। हाउ, कैसे; कैसे हो रहा है, वह हम बता सकते हैं।

धर्म भी विज्ञान है। वह भी यह नहीं कहेगा, नहीं कह सकता है, कि क्यों। इतना ही कह सकता है, कैसे!

आदमी विस्मरण करता है। कैसे विस्मरण करता है? पर के साथ तादात्म्य करके विस्मरण करता है। कैसे स्मरण करेगा? पर के साथ तादात्म्य तोड़ेगा, तो पुनः स्मरण हो जाएगा। बस, इस प्रक्रिया की बात की जा सकती है। क्यों इस प्रक्रिया की मैं आपसे चर्चा कर रहा हूं? क्योंकि योग शुद्ध विज्ञान है। इसलिए बहुत मजे की घटना घटी है।

हिंदुस्तान में तीन बड़े धर्म पैदा हुए--जैन, हिंदू, बौद्ध। उनमें कितने ही झगड़े हों और उनमें कितने ही सैद्धांतिक विवाद हों,लेकिन योग के संबंध में उनमें कोई भी विवाद नहीं उठा। योग के संबंध में कोई विवाद नहीं है। क्या बात है?

योग है साइंस, सिद्धांत नहीं। दार्शनिक सिद्धांत नहीं, मेटाफिजिक्स नहीं, योग तो एक प्रक्रिया है, एक प्रयोग है, एकएक्सपेरिमेंट है। उसे कोई भी करे, अनुभव फलित होगा।

इसलिए योग एक अर्थ में समस्त धर्मों का सार है। भारत में तो तीन धर्म पैदा हुए, वे ठीक ही हैं। भारत के बाहर भी जो धर्म पैदा हुए--चाहे इस्लाम, और चाहे ईसाइयत, और चाहे यहूदी धर्म, चाहे पारसी धर्म--भारत के बाहर भी जो धर्म पैदा हुए,उनका भी योग से कभी भी कोई विरोध खड़ा नहीं होता है।

अगर ठीक से समझें, तो योग समस्त धर्मों की प्रक्रिया है--समस्त धर्मों की--वे कहीं पैदा हुए हों। अगर भविष्य में कभी किसी दुनिया में किसी समय में धर्म का विज्ञान स्थापित होगा, तो उसकी आधारशिला योग बनने वाली है। क्योंकि योग सिर्फ प्रक्रिया है।

योग यह नहीं कहता कि परमात्मा क्या है। योग कहता है, परमात्मा को कैसे पाया जा सकता है। योग यह नहीं कहता कि आत्मा क्या है। योग कहता है, आत्मा को कैसे जाना जा सकता है। हाउ! योग यह नहीं कहता कि किसने प्रकृति बनाई और नहीं बनाई। योग कहता है, अस्तित्व में उतरने की सीढ़ियां ये रहीं, उतरो और जानो। योग कहता है, हम न बताएंगे, तुम्हीं आंखखोलो और देख लो। आंख खोलने का ढंग हम बताए देते हैं।

योग बिलकुल शुद्ध साइंस है, सीधा विज्ञान है। हां, फर्क है। साइंस आब्जेक्टिव है, पदार्थगत है। योग सब्जेक्टिव है,आत्मगत है। विज्ञान खोजता है पदार्थ, योग खोजता है परमात्मा।

यह पुनर्स्मरण, यह पुनर्वापसी की यात्रा योग कैसे करता है, उस संबंध में भी कुछ बातें खयाल में ले लेनी चाहिए। क्योंकि कृष्ण ने कहा, उसके ही सतत अभ्यास से परमात्मा में प्रतिष्ठा उपलब्ध होती है। मैं कहूंगा, पुनर्प्रतिष्ठा उपलब्ध होती है।

है क्या योग? योग करता क्या है? योग की कीमिया, केमेस्ट्री क्या है? योग का सार-सूत्र, राज, मास्टर-की क्या है?उसकी कुंजी क्या है? तो तीन चरण खयाल में लें।

एक, मनुष्य के शरीर में जितनी शक्ति का हम उपयोग करते हैं, इससे अनंत गुनी शक्ति को पैदा करने की सुविधा और व्यवस्था है। उदाहरण के लिए, आपको अभी लिटा दिया जाए जमीन पर, तो आपकी छाती पर से कार नहीं निकाली जा सकती,समाप्त हो जाएंगे। लेकिन राममूर्ति की छाती पर से कार निकाली जा सकती है। यद्यपि राममूर्ति की छाती में और आपकी छाती में कोई बुनियादी भेद नहीं है। और राममूर्ति की छाती की हड्डियों में जरा-सी भी किसी तत्व की ज्यादा स्थिति नहीं है,जितनी आपकी हड्डियों में है। राममूर्ति का शरीर उन्हीं तत्वों से बना है, जिन तत्वों से आपका। राममूर्ति क्या कर रहा है फिर?

राममूर्ति, जिस शक्ति का आप कभी उपयोग नहीं करते--आप अपनी छाती का इतना ही उपयोग करते हैं, श्वास को लेने-छोड़ने का। यह एक बहुत अल्प-सा कार्य है। इसके लायक छाती निर्मित हो जाती है। राममूर्ति एक बड़ा काम इसी छाती से लेता है, कारों को छाती पर से निकालने का, हाथी को छाती पर खड़ा करने का।

और जब राममूर्ति से किसी ने पूछा कि खूबी क्या है? राज क्या है? उसने कहा, राज कुछ भी नहीं है। राज वही है जो कि कार के टायर और टयूब में होता है। साधारण सी रबर का टयूब होता है, लेकिन हवा भर जाए एक विशेष अनुपात में, तो बड़े से बड़े ट्रक को वह लिए चला जाता है। राममूर्ति ने कहा कि मैं अपने फेफड़े से वही काम ले रहा हूं, जो आप टायर और टयूब से लेते हैं। हवा को एक विशेष अनुपात में रोक लेता हूं, फिर छाती से हाथी गुजर जाए, वह मेरे ऊपर नहीं पड़ता, भरी हुई हवा के ऊपर पड़ता है। पर एक प्रक्रिया होगी फिर उस अभ्यास की, जिससे छाती हाथी को खड़ा कर लेती है।

हमारे शरीर की बहुत क्षमताएं हैं, जिनका हम हिसाब नहीं लगा सकते। वे सारी की सारी क्षमताएं अनुपयुक्त,अनयूटिलाइज्ड रह जाती हैं। क्योंकि जीवन के काम के लिए उनकी कोई जरूरत ही नहीं है। जीवन के लिए जितनी जरूरत है,उतना शरीर काम करता है।

अगर हम वैज्ञानिकों से पूछें, तो वैज्ञानिकों का खयाल है कि दस प्रतिशत से ज्यादा हम अपने शरीर का उपयोग नहीं करते। नब्बे प्रतिशत शरीर की शक्तियां अनुपयोगी रहकर ही समाप्त हो जाती हैं। जीते हैं, जन्मते हैं, मर जाते हैं। वह नब्बे प्रतिशत शरीर जो कर सकता था, पड़ा रह जाता है।

योग का पहला काम तो यह है कि उन नब्बे प्रतिशत शक्तियों में से जो सोई पड़ी हैं, उन शक्तियों को जगाना, जिनके माध्यम से अंतर्यात्रा हो सके। क्योंकि बिना शक्ति के कोई यात्रा नहीं हो सकती है। एनर्जी, ऊर्जा के बिना कोई यात्रा नहीं हो सकती है। अगर आप सोचते हैं कि हवाई जहाज किसी दिन बिना ऊर्जा के चल सकेंगे, तो आप गलत सोचते हैं। कभी नहीं चल सकेंगे।

हां, यह हो सकता है, हम सूक्ष्मतम ऊर्जा को खोजते चले जाएं। बैलगाड़ी चलती है, तो ऊर्जा से। पैदल आदमी चलता है,तो ऊर्जा से। सांस चलती है, तो ऊर्जा से। सब मूवमेंट, सब गति ऊर्जा की गति है, शक्ति की गति है।

अगर आप सोचते हों कि परमात्मा तक बिना ऊर्जा के सहारे आप पहुंच जाएंगे, तो आप गलती में हैं। परमात्मा की यात्रा भी बड़ी गहन यात्रा है। उस यात्रा में भी आपके पास शक्ति चाहिए। और जिस शक्ति का आप उपयोग करते हैं साधारणतः, वह शक्ति आपके जीवन के दैनिक काम में चुक जाती है, उसमें से कुछ बचता नहीं है। और अगर थोड़ा-बहुत बचता है--अगर थोड़ा-बहुत बचता है--तो भी आपने उसको व्यर्थ फेंक देने के उपाय और व्यवस्था कर रखी है। कुछ बचता नहीं। आदमी करीब-करीबबैंक्रप्ट, दिवालिया जीता है। जो शक्ति उसे मिलती है, दैनंदिन कार्यों में चुक जाती है। और जो शक्ति छिपी पड़ी है, उसे वह कभी जगा नहीं पाता।

तो योग का पहला तो आधार है, छिपी हुई पोटेंशियल ऊर्जा को जगाना। सब तरह के उपाय योग ने खोजे हैं कि वह कैसे जगाई जाए। इसलिए प्राणायाम खोजा। प्राणायाम आपके भीतर सोई हुई शक्तियों को हैमर करने की, चोट करने की एक विधि है। फिर योग ने आसन खोजे। आसन आपके शरीर में छिपे हुए जो ऊर्जा के स्रोत-क्षेत्र हैं, उन पर दबाव डालने की प्रक्रिया है,ताकि उनमें छिपी हुई शक्ति सक्रिय हो जाए।

आपने ट्रेन को चलते देखा है। शक्ति तो बहुत साधारण-सी उपयोग में आती है, पानी और आग की, और दोनों से बनी हुई भाप की। लेकिन भाप के धक्के से इंजन का सिलेंडर धक्का खाकर चलना शुरू हो जाता है। फिर ट्रेन चल पड़ती है। इतनी बड़ी शक्ति, इतने बड़े वजन की ट्रेन सिर्फ पानी की भाप, स्टीम चलाती है।

आपके शरीर में भी बहुत-सी शक्तियां हैं, जिन शक्तियों को दबाकर सक्रिय किया जाए, तो आपके भीतर न मालूम कितने सिलेंडर चलने शुरू हो जाते हैं, जो कि अभी बिलकुल वैसे ही पड़े हैं। इन शक्तियों के बिंदुओं को, जहां शक्ति छिपी है,योग चक्र कहता है। प्रत्येक चक्र पर छिपी हुई शक्तियां हैं। और प्रत्येक चक्र को दबाने के, गतिमान करने के, डायनेमिक करने के आसन हैं, प्राणायाम की विधियां हैं।

हम भी साधारणतः उपयोग करते हैं, हमारे खयाल में नहीं होता है। आपने कभी खयाल किया है कि रात आप सिर के नीचे तकिया रखकर क्यों सो जाते हैं? कभी खयाल नहीं किया होगा। कहते हैं कि नींद नहीं आती है, इसलिए सो जाते हैं। तकिया रखकर आप न सोएं, तो नींद क्यों नहीं आती?

जब आप तकिया नहीं रखते, तो शरीर के खून की गति सिर की तरफ ज्यादा होती है। क्योंकि सिर भी शरीर की सतह में, बल्कि शरीर से थोड़ा नीचे ढल जाता है। तो सारे शरीर का खून सिर की तरफ बहता है। और जब खून सिर की तरफ बहता है, तो सिर के जो तंतु हैं, मस्तिष्क के, वे खून की गति से सजग बने रहते हैं। फिर नींद नहीं आ सकती। खून बहता रहता है,तो मस्तिष्क के तंतु सजग रहते हैं। तो फिर नींद नहीं आ सकती। तो आप तकिया रख लेते हैं।

और जैसे-जैसे आदमी सभ्य होता जाता है; तकिए बढ़ते चले जाते हैं--एक, दो, तीन! क्यों? क्योंकि उतना सिर ऊंचा चाहिए, ताकि खून जरा भी भीतर न जाए। नहीं तो मस्तिष्क की दिनभर इतनी चलने की आदत है कि जरा-सा खून का धक्का और सिलेंडर चालू हो जाएगा; आपका मस्तिष्क काम करना शुरू कर देगा।

योगी शीर्षासन लगाकर खड़ा होता है। आप समझें कि दोनों का नियम एक ही है, तकिया रखने का और शीर्षासन का आधारभूत नियम एक ही है। उलटा काम कर रहा है वह। वह सारे शरीर के खून को सिर में भेज रहा है। योगी जब शीर्षासन लगाकर खड़ा हो रहा है, तो वह कर क्या रहा है? वह इतना ही कर रहा है कि वह सारे शरीर के खून की गति को सिर की तरफ भेज रहा है।

अभी जितना आपका मस्तिष्क काम कर रहा है, वैज्ञानिक कहते हैं कि सिर्फ एक चौथाई मस्तिष्क काम करता है, तीन चौथाई बंद पड़ा हुआ है, स्टैगनेंट, वह कभी कोई काम नहीं करता। खून की तीव्र चोट से वह जो नहीं काम करने वाला मस्तिष्क का हिस्सा है, सक्रिय किया जा सकता है। क्योंकि यह हिस्सा भी खून की चोट से ही सक्रिय होता है। खून का धक्का आपके मस्तिष्क के बंद सिलेंडर को गतिमान कर देता है।

मस्तिष्क के वे हिस्से सक्रिय हो जाएं, जो मौन चुपचाप पड़े हैं, तो आपकी समझ और आपके विवेक में आमूल अंतर पड? जाते हैं--आमूल अंतर पड़ जाते हैं। आप नए ढंग से सोचना और नए ढंग से देखना शुरू कर देते हैं। नए ढंग से, एक नई दृष्टि, और एक नया द्वार, न्यू परसेप्शन, डोर्स आफ न्यू परसेप्शन, प्रत्यक्षीकरण के नए द्वार आपके भीतर खुलने शुरू हो जाते हैं।

मैंने उदाहरण के लिए कहा। इस तरह के शरीर में बहुत-से चक्र हैं। इन प्रत्येक चक्र में छिपी हुई अपनी विशेष ऊर्जा है,जिसका विशेष उपयोग किया जा सकता है। योगासन उन सब चक्रों में सोई हुई शक्ति को जगाने का प्रयोग है।

योग के द्वारा शरीर एक डायनेमिक फोर्स, एक बहुत जीवंत ऊर्जा की जीती-जागती, साकार प्रतिमा बन जाता है। इस शक्ति के पंखों पर चढ़कर अंतर्यात्रा हो सकती है। अन्यथा अंतर्यात्रा अत्यंत कठिन है। वह प्रभु का जो स्मरण है, तभी हो सकता है।

तो पहला तो योग का विशेष अभ्यास है, वह है, शक्ति के सोए हुए स्रोतों को सजीव करना, जाग्रत करना, पुनर्जीवित करना।

बहुत स्रोत हैं। कभी-कभी अचानक घटनाएं घटती हैं, तब लोगों को पता चलता है। अभी स्विटजरलैंड में एक आदमी एक ट्रेन से गिर पड़ा था। चोट लगी बहुत जोर से उसके कानों को। जब वह अस्पताल में भर्ती किया गया, तो पाया गया कि दस मील के भीतर जो भी रेडियो स्टेशन हैं, उसके कान ने, उन रेडियो स्टेशंस को पकड़ना शुरू कर दिया। बड़ी हैरानी हुई। कभी सोचा न था कि कान के पास यह क्षमता हो सकती है कि रेडियो स्टेशन को सीधा पकड़ ले, बीच में रेडियो की जरूरत न रहे!

लेकिन योग सदा से कहता है कि कान के पास ऐसी क्षमता छिपी पड़ी है, सिर्फ उसे सजग करने की बात है। यह भूल-चूक से हो गया, एक्सिडेंटल, कि आदमी ट्रेन से गिरा और उस केंद्र पर चोट लग गई और शक्ति सक्रिय हो गई। योग इसे व्यवस्थित रूप से सक्रिय करना जानता है।

उसके कुछ दिन पहले स्वीडन में एक आदमी को आंख का कुछ आपरेशन किया, और अचानक उसे दिन में आकाश के तारे दिखाई पड़ने शुरू हो गए। दिन में! आकाश में तारे तो दिन में भी होते हैं, सिर्फ सूरज की रोशनी की वजह से आपको दिखाई नहीं पड़ते। अगर आप एक गहरे कुएं में चले जाएं, गहरे अंधेरे कुएं में, तो दिन में भी आपको गहरे कुएं में से आकाश में थोड़े-से तारे दिखाई पड़ सकते हैं। लेकिन उस आदमी को तो सूरज की रोशनी में खड़े होकर तारे दिखाई पड़ने लगे। क्या हो गया?

योग बहुत दिन से कहता है कि आंख की क्षमता बहुत है। जितनी आप जानते हैं, उससे बहुत ज्यादा। लेकिन उसके सोए हुए शक्ति केंद्र हैं, उनको सजग करना जरूरी है। शरीर में ऐसे बहुत ऊर्जा-स्रोत हैं, और योग ने सबको सक्रिय करने की प्रक्रियाएं खोजी हैं। उनका ही अभ्यास, उनका ही सतत अभ्यास व्यक्ति को परमात्मा की दिशा में सक्रिय कर पाता है, एक।

दूसरी बात, जैसा हमारा मन है, साधारणतः हम सोचते हैं, साधारणतः हमारा खयाल है कि यह जो हमारा मन है, जैसा यह मन है, इसी मन को लेकर हम परमात्मा की तरफ चले जाएंगे, तो हम गलत सोचते हैं। इस मन को लेकर जाना असंभव है। इसी मन के कारण तो हम पदार्थ की तरफ आए हैं। यह मन हमारा पदार्थ से संबंध जोड़ने का इंतजाम है; यह परमात्मा से तोड़ने का कारण है; यह जोड़ने का कारण नहीं बन सकता है।

यह जो मन है हमारे पास, यह मन पदार्थ से जोड़ने की व्यवस्था है। इसी मन को आप परमात्मा की तरफ नहीं ले जा सकते। आपको एक नए मन को पैदा करने की जरूरत है।

और योग कहता है, वैसा नया मन पैदा किया जा सकता है। और उस नए मन को पैदा करने की भी पूरी कीमिया योग ने खोजी है कि वह नया मन कैसे पैदा हो। जैसे मैंने कहा कि शरीर की शक्ति जगाने के लिए आसन, प्राणायाम, मुद्राएं और इस तरह की सारी व्यवस्था है। हठयोग ने उस पर अपूर्व चेष्टा की है, और ऐसे राज खोज लिए हैं, जिनमें से बहुत-से राजों से अभी विज्ञान भी अपरिचित है।

जैसे विज्ञान को अभी तक खयाल नहीं था कि शरीर में खून या खून की गति वालेंटरी हो सकती है, स्वेच्छा से हो सकती है। विज्ञान समझता है कि खून की गति नान-वालेंटरी है, स्वेच्छा के बाहर है, आप कुछ कर नहीं सकते। लेकिन हठयोग बहुत हजारों साल से कह रहा है कि शरीर की कोई भी गति स्वेच्छा से चालित हो सकती है। खून भी हमारी इच्छा से चले और बंद हो सकता है। शरीर का बुढ़ापा, युवावस्था भी हमारी इच्छा के अनुकूल निर्धारित हो सकती है। शरीर की उम्र भी हम विशेष प्रक्रियाओं से लंबी और कम कर सकते हैं।

एक आदमी इजिप्त में, एक सूफी योगी, अठारह सौ अस्सी में समाधिस्थ हुआ, जीवित। और चालीस साल बाद उखाड़ाजाए, इसकी घोषणा करके समाधि में, कब्र में चला गया, अठारह सौ अस्सी में। चालीस साल बाद उन्नीस सौ बीस में कब्रखुदेगी। जो बूढ़े उसको दफनाने आए थे उस चालीस साल के विश्राम के लिए, उनमें से करीब-करीब सभी मर गए। उन्नीस सौ बीस में एक भी नहीं था। जो जवान थे, उनमें से भी अनेक बूढ़े होकर मर चुके थे। जो बच्चे थे, वे ही कुछ बचे थे। जो उस भीड़ में छोटे बच्चे खड़े थे, वे ही बचे थे।

उन्नीस सौ बीस तक करीब-करीब बात भूली जा चुकी थी। वह तो सरकारी दफ्तरों के कागजातों में बात थी और किसी के हाथ पड़ गई। किसी को भरोसा नहीं था कि वह आदमी अब जिंदा मिलेगा उन्नीस सौ बीस में। लेकिन कुतूहलवश--किसी को भरोसा नहीं था कि वह जिंदा मिलने वाला है। चालीस साल! कुतूहलवश कब्र खोदी गई। वह आदमी जिंदा था। और बड़ा आश्चर्य जो घटित हुआ वह यह कि इस चालीस साल में उसकी उम्र में कोई भी फेर-बदल नहीं हुआ था। उसके जो चित्र छोड़े गए थे अठारह सौ अस्सी में फाइलों के साथ, उससे उसके चेहरे में चालीस साल का कोई भी फर्क नहीं था।

उन्नीस सौ बीस में कब्र के बाहर आकर वह आदमी नौ महीने और जिंदा रहा। और नौ महीने में उतना फर्क पड़ गया,जितना चालीस साल में नहीं पड़ा था। और उस आदमी से पूछा गया कि तुमने किया क्या? उसने कहा कि मैं कुछ ज्यादा नहीं जानता हूं। सिर्फ प्राणायाम का एक छोटा-सा प्रयोग जानता हूं। श्वास पर काबू करने का एक छोटा-सा प्रयोग जानता हूं, और कुछ भी नहीं जानता।

तो एक हिस्सा तो शरीर है ऊर्जा का, जिसके योग ने सूत्र खोजे। दूसरा हिस्सा नया मन, ए न्यू माइंड पैदा करने की प्रक्रियाएं हैं, जो योग ने खोजीं। पहले प्रयोग के लिए योगासन हैं, प्राणायाम हैं, मुद्राएं हैं। दूसरे प्रयोग के लिए ध्वनि, शब्द और मंत्रों का प्रयोग है। तो मंत्रयोग की पूरी लंबी व्यवस्था है।

हमें खयाल में भी नहीं है कि हमारा चित्त जो है, वह ध्वनियों से चलता है। ध्वनियों से!

ओंकारनाथ ठाकुर इटली में मुसोलिनी के मेहमान थे--भारत के एक बड़े संगीतज्ञ। मुसोलिनी ने ऐसे ही मजाक में--भोजन पर निमंत्रित किया था ठाकुर को--मजाक में, भोजन करते वक्त मुसोलिनी ने कहा कि मैं सुनता हूं कि कृष्ण बांसुरी बजाते थे,तो जंगली जानवर आ जाते; गउएं नाचने लगतीं; मोर पंख फैला देते। यह कुछ मुझे समझ में नहीं आता कि संगीत से यह कैसे हो सकता है! ओंकारनाथ ठाकुर ने कहा कि कृष्ण जैसी मेरी सामर्थ्य नहीं। संगीत के संबंध में उतनी मेरी समझ नहीं। सच तो यह है कि संगीत के संबंध में कृष्ण जैसी समझ पृथ्वी पर फिर दूसरे आदम