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गीता दर्शन--(भाग-3)


गीता दर्शन--(भाग--3) प्रवचन--064

अपरिग्रही चित्त—(अध्याय—6) प्रवचन—सातवां

युग्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।

शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।। 15।।

इस प्रकार आत्मा को निरंतर परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ, स्वाधीन मन वाला योगी मेरे में स्थितरूप परमानंद पराकाष्ठा वाली शांति को प्राप्त होता है।

निरंतर परमात्मा में चेतना को लगाता हुआ योगी!

सुबह जिन सूत्रों पर हमने बात की है, उन्हीं सूत्रों की निष्पत्ति के रूप में यह सूत्र है। समझने जैसी बात इसमें निरंतर है। निरंतर शब्द को समझ लेने जैसा है। निरंतर का अर्थ है, एक भी क्षण व्यवधान न हो।

निरंतर का अर्थ है, एक भी क्षण विस्मरण न हो। जागते ही नहीं, निद्रा में भी भीतर एक अंतर-धारा प्रभु की ओर बहती ही रहे--सतत, कंटिन्यूड, जरा भी व्यवधान न हो--तो निरंतर ध्यान हुआ, तो निरंतर स्मरण हुआ।

जैसे श्वास चलती है। चाहे काम करते हों, तो चलती है; चाहे विश्राम करते हों, तो चलती है। याद रखें, तो चलती है; न याद