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PREFACE SHIV SUTRA


PREFACE SHIV SUTRA

November 27, 2018

भूमिका:

धर्म की यात्रा के साधन क्या है? इस प्रश्र का समाधान प्रज्ञापुरुषों ने अपने अपने ढंग से किया है। परंतु सभी ने इस बात का स्पष्ट संकेत दिया है कि कोई भी साधन तभी उपयोगी हो सकता है जब साधक गहन से गहनतर चुनौतियों को झेलने के लिए अपने पूरे प्राणपण से तलर हो, कि वह स्वयं एक ऐसी आग में से गुजरने के लिए प्रतिबद्ध हो जो उसकी चेतना को पूरी तरह निखार सके।

परंतु यह यात्रा, इस यात्रा के साधन, और चुनौतियों का सामना करने के योग्य सामर्थ्य यह सब निर्भर करता है एक मुख्य तत्व पर—यात्रा का मार्गदर्शक। दूसरे शब्दों में, मात्र सद्गुरु ही सही साधन उपलब्ध कराते है। सदगुरू स्वयं एक चिरंतन प्रज्वलित अग्रि है जिसकी ऊर्जा व्यक्ति की चेतना को रूपांतरित कर देती है। चुनौती है सद्गुरु, उसके निकट आकर जैसे थे वैसे रह पाना असंभव है।

सद्गुरु क्रांति की ज्वाला है—बाहरी नहीं, भीतरी क्रांति। माता—पिता, शिक्षक, पंडित और पुरोहित और सब तो दे सकते है,बोध नहीं। वे शरीर और मन तो दे सकते हैं, चेतना नहीं। चेतना जगाने के लिए आवश्यकता है एक आमूल क्रांति की, और इस क्रांति को घटाने के लिए आवश्यकता रहती है बोध की, ज्ञान की।

भगवान श्री रजनीश ऐसे ही परम प्रज्ञावान सद्गुरु है। अपनी अमृतवाणी से उन्होंने धर्म और अध्यात्म संबंधी अनेक गढ़ रहस्यों को उद्घाटित किया है तथा संसार के अनेक मुमुक्षुओं को मार्गदर्शन दिया है। उनके वचन हैं— ‘‘जहां क्रांति न हो,समझना ज्ञान नहीं है। ज्ञान अग्रि की भांति है—प्रज्वलित अग्रि की भांति। और जो शान से गुजरेगा, वह अग्रि से जलकर कुंदन हो जाता है।’’

‘‘शिव—सूत्र’‘ ऐसी ही क्रांति के सूत्र हैं। भगवान कहते है, ‘‘शिव कोई पुरोहित नहीं है। शिव तीर्थंकर हैं। शिव अवतार हैं। शिव क्रांतिद्रष्टा है, पैगम्बर है। वे जो भी कहेंगे, वह आग है। अगर तुम जलने को तैयार हो, तो ही उनके पास आना; अगर तुम मिटने को तैयार हो, तो ही उनके निमंत्रण को स्वीकार करना। क्योंकि तुम मिटोगे तो ही नये का जन्म होगा। तुम्हारी राख पर ही नये जीवन की शुरुआत है।’’

लेकिन इन सूत्रों के क्रांतिकारी होने से भी कहीं अधिक उल्लेखनीय बात यह है कि भगवान श्री रजनीश जैसे क्रांतदर्शी बुद्धपुरुष ने इन चिनगारियों में नये प्राण फूंके है। एक नये जीवन की दिशा, एक नये मनुष्य के जन्म के संदर्भ में भगवान के ये अमृत वचन चेतना के रूपांतरण की भूमिका हैं।

तो धर्म की यात्रा के साधन क्या है इस बात से हमने आरंभ किया था। भगवान श्री ने बीज रूप में जो साधन दिया है वह है— ध्यान।’’शिव—सूत्र’‘ के अमूल्य वचनों का रहस्य समझाते हुए इसी संदर्भ में भगवान कहते है—

''ध्यान बीज है। तुम्हारी महत् यात्रा में, जीवन की खोज में, सत्य के मंदिर तक पहुंचने में— ध्यान बीज है। ध्यान क्या है जिसका इतना मूल्य है; जो कि खिल जायेगा तो तुम परमात्मा हो जाओगे; जो सड़ जायेगा तो तुम नारकीय जीवन व्यतीत करोगे? ध्यान क्या है? ध्यान है निर्विचार चैतन्य की अवस्था, जहां होश तो पूरा हो और विचार बिलकुल न हों। तुम तो रहो,लेकिन मन न बचे। मन की मृत्यु ध्यान है।’’

परंतु केवल सदगुरू और साधन के उपलब्ध हो जाने से भी पूरी बात नहीं बनती। संपूर्ण और प्रामाणिक प्रयास भी चाहिए।’’शिव—सूत्र’‘ को समझाते हुए भगवान श्री ने हमें समय में ही सावधान किया है—

‘‘दूभर है मार्ग। उस दूभर से गुजरना होगा। और, इसीलिए उद्यम चाहिए। इतनी महान प्रयत्न करने की आकांक्षा चाहिए,अभीप्सा चाहिए कि तुम अपने को पूरा दांव पर लगा दो। मोक्ष खरीदा जा सकता है, लेकिन तुम अपने को दाव पर लगाओ तो ही; इससे कम में नहीं चलेगा। कुछ और तुमने दिया, वह देना नहीं है, वह कीमत नहीं चुकायी तुमने। अपने को पूरा दे डालोगे तो ही कीमत चुकती है और उपलब्धि होती है।’’

सारे संसार में धर्म के नाम पर सदियों से अत्याचार, शोषण और बेईमानी होते रहे है। परंतु जब भी इस प्रकार अंधकार घना होता है, कोई एक बुद्धपुरुष अपने दिव्य तेज और अपनी प्रखर वाणी द्वारा एक नयी चेतना को जम्प देता है, जीवन को एक नया संदर्भ देता है, सूखे, प्यासे, हारे प्राणों में एक नया मधुर संगीत भर देता है। वर्तमान जगत को घेरे हुए अंधकार को चीर कर भगवान श्री रजनीश ने नयी ज्योतिर्मय दिशा प्रदान की है। ध्यान, प्रेम और संन्यास का त्रिवेणी संगम उनके सान्निध्य में अनुभव करने और उसमें गहरी डुबकियां लेने में ही जीवन की कृतार्थता है।

भगवान द्वारा प्रकटाए हुए स्कूलिंग हम सब की चेतना को प्रज्वलित करें और हमारे यात्रापथ को प्रकाशमान करें इसी प्रार्थना के साथ प्रस्तुत है ‘‘शिव—सूत्र’‘।

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आचार्य वसुगुप्त जी ने ८ वीं शताब्दी के उतरार्ध्द में कश्मीरी शैव सम्प्रदाय का गठन किया। किन्तु नवम शताब्दी में यह पूर्णतया विकसित हुआ है। भगवान शिव ने वैदिक द्वैत परक व्याख्यों देखकर शिवाद्वैत सिद्धांत प्रचारार्थ अपने गण वीरभद्र को आदेश दिया। वीरभद्र ने दुर्वास को शैवागम प्रतिपादित शिवाद्वैत बोध किये उन्हों ने अपने पुत्र त्रियंबक को उपदेश किया। त्रियंबक प्रचारित दर्शन ही ” त्रियंबक दर्शन ” है। जो अद्वैत दृष्टि से ओतप्रोत है। क्षेमराज ने ‘शिवसूत्र’ में कहा है कि भगवान श्रीकंठ ने वसुगुप्त को स्वप्न में आदेश दिया महादेवगिरि के एक शिलाखंड पर शिवसूत्र उतंकित हैं, प्रचार करो। जिस शिला पर ये शिवसूत्र उद्दंकित मिले थे कश्मीर में लोग शिवपल (शिवशिला) कहते हैं। इस की संख्या 77 है। ये ही इस दर्शन के मूल आधार हैं इस को रहस्य सम्प्रदाय तथा त्रिक दर्शन भी कहते है। रुद्रागम , शिवागम और भैरवागम इन तीनो आगमो को शिव , शक्ति और अणु को पशु , पाश और पति को भेद , अभेद और भेदाभेद का वर्णन करने के कारण इस से त्रिक दर्शन कहा जाता है। और इसे भारतीय दर्शन शास्त्रज्ञों ने सर्वश्रेष्ठ कह कर घोषित किया है जैसे की

वेदाच्छैवं ततो वाम ततो दक्षं ततः कुलम् ।

ततो मतं ततश्चापि त्रिकं सर्वोत्तमं मतम्। ।

इस सर्वोत्तम मत आचार्य वसुगुप्त द्वारा जनकल्याणार्थ प्रतिष्ठापित किया। कश्मीरी शैवदर्शन का मुख्य स्रोत शैवागम है। शैवाचार्य शिव सामान शैवागम को मानते है और इन आगमो का उद्गम शिव मुखोद्भव है।

शिवसूत्र उन ७७ सूत्रों के समूह को कहते हैं जो काश्मीरी शैव दर्शन के आधार हैं। इनके रचयिता वसुगुप्त माने जाते हैं जिनका समय ९वीं शताब्दी है।

आचार्य वशुगुपत जी के कल्लट और सोमानन्द दो प्रसिध्द शिष्य थे। सोमानन्द ने ”प्रत्यभिज्ञा मत” का प्रतिपादन किया। प्रतिभिज्ञा शब्द का तात्पर्य है कि साधक अपनी पूर्वज्ञात वस्तु को पुन: जान ले। इस अवस्था में साधक को अनिवर्चनीय आनन्दानुभूति होती है।कश्मीर शैवदर्शन के अनुसार ३६ तत्व हैं। वसुगुप्त कृत शिवसूत्र इसका मूल ग्रन्थ है।

क्रम, कुल, स्पन्द और प्रत्यभिज्ञ इसके चार अंग माने जाते हैं। यह एक अद्वैत दर्शन है।

अभिनवगुप्त का तन्त्रालोक इसका महान ग्रन्थ है।

आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि 'कल्पना' ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है। हम जैसी कल्पना और विचार करते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। सपना भी कल्पना है। शिव ने इस आधार पर ध्यान की 112 विधियों का विकास किया।

अधिकतर लोग खुद के बारे में या दूसरों के बारे में बुरी कल्पनाएं या खयाल करते रहते हैं। दुनिया में आज जो दहशत और अपराध का माहौल है उसमें सामूहिक रूप से की गई कल्पना का ज्यादा योगदान है।आदमी को बदलाहट की प्रामाणिक विधि के बिना नहीं बदल सकते। मात्र उपदेश से कुछ नहीं बदलता।

भगवान शिव ने अमरनाथ गुफा में माता पार्वती को मोक्ष की शिक्षा दी थी। पार्वती और शिव के बीच जो संवाद होता है उसे 'विज्ञान भैरव तंत्र' में संग्रहीत किया गया है। इसमें ध्यान की 112 विधियां संग्रहीत

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