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शिव—सूत्र:-02 जीवन—जागृति के साधना—सूत्र


सूत्र: जाग्रतस्‍वप्‍नसुषुप्तभेदे तुर्याभोग सवित। ज्ञानं जाग्रत। स्वप्रोविकल्पा:। अविवेको मायासौषुप्तमू। त्रितयभोक्ता वीरेश:।

जाग्रत स्‍वप्‍न और सुषुप्‍ति— इन तीनों अवस्थाओं को पृथक रूप से जानने से तुर्यावस्था का भी ज्ञान हो जाता है ज्ञान का बना रहना ही जाग्रत अवस्था है।

विकल्प ही स्‍वप्‍न हैं।’’

अविवेक अर्थात स्व—बोध का अभाव मायामय सुषुप्‍ति है।

तीनों का भोक्ता वीरेश कहलाता है।

जाग्रत, स्‍वप्‍न और सुषुप्ति— इन तीनों अवस्थाओं को पृथक रूप से जानने से तुर्यावस्था का भी ज्ञान हो जाता है। तुर्या है— चौथी अवस्था। तुर्यावस्था का अर्थ है— परम ज्ञान। तुर्यावस्था का अर्थ है कि किसी प्रकार का अंधकार भीतर न रह जाये, सभी ज्योतिर्मय हो उठे; जरा—सा कोना भी अंतस का अंधकारपूर्ण न हो; कुछ भी न बचे भीतर, जिसके प्रति हम जाग्रत नहीं हो गये; बाहर और भीतर, सब ओर जागृति का प्रकाश फैल जाये।

अभी जहां हम हैं, वहां या तो हम जाग्रत होते हैं या हम स्‍वप्‍न में होते हैं या हम सुषुप्‍ति में होते हैं। चौथे का हमें कुछ भी पता नहीं है। जब हम जाग्रत होते हैं तो बाहर का जगत तो दिखाई पड़ता है, हम खुद अंधेरे में होते हैं; वस्तुएं तो दिखाई पड़ती हैं, लेकिन स्वयं का कोई बोध नहीं होता; संसार तो दिखाई पड़ता है, लेकिन आत्मा की कोई प्रतीति नहीं होती। यह आधी जाग्रत अवस्था है।

जिसको हम जागरण कहते हैं— सुबह नींद से उठकर— वह अधूरा जागरण है। और अधूरा भी कीमती नहीं है; क्योंकि व्यर्थ तो दिखाई पड़ता है और सार्थक दिखाई नहीं पड़ता। कुड़ा—करकट तो दिखाई पड़ता है, हीरे अंधेरे में खो जाते हैं। खुद तो हम दिखाई नहीं पड़ते कि कौन हैं और सारा संसार दिखाई पड़ता है।

दूसरी अवस्था है स्‍वप्‍न की। हम तो दिखाई पड़ते ही नहीं स्‍वप्‍न में, बाहर का संसार भी खो जाता है। सिर्फ, संसार से बने हुए प्रतिबिंब मन में तैरते हैं। उन्हीं प्रतिबिंबों को हम जानते और देखते है— जैसे कोई दर्पण में देखता हो चांद को या झील पर कोई देखता हो आकाश के तारों को। सुबह जागकर हम वस्तुओं को सीधा देखते हैं; स्‍वप्‍न में हम वस्तुओं का प्रतिबिंब देखते हैं, वस्तुएं भी नहीं दिखाई पड़ती।

और तीसरी अवस्था है— जिससे हम परिचित है— बाहर का जगत भी खो जाता है; वस्तुओं का जगत भी अंधेरे में हो जाता है; और प्रतिबिंब भी नहीं दिखाई पड़ते; स्‍वप्‍न भी तिरोहित हो जाता है; तब हम गहन अंधकार में पड़ जाते हैं— उसी को हम सुषुप्ति कहते हैं। सुषुप्ति में न तो बाहर का ज्ञान रहता है, न भीतर का। जाग्रत में बाहर का ज्ञान रहता है। और जाग्रत और सुषुप्ति के बीच की एक मध्य—कड़ी है: स्‍वप्‍न, जहां बाहर का ज्ञान तो नहीं होता, लेकिन बाहर की वस्तुओं से बने हुए प्रतिबिंब हमारे मस्तिष्क में तैरते है और उन्हीं का ज्ञान होता है। चौथी अवस्था है: तुर्या वही सिद्धावस्था है। सारी चेष्टा उसी को पाने के लिए है। सब ध्यान, सब योग

तुर्यावस्था को पाने के उपाय हैं। तुर्यावस्था का अर्थ है: भीतर और बाहर दोनों का ज्ञान; अंधेरा कहीं भी नहीं— न तो बाहर और न भीतर, पूर्ण जागृति; जिसको हमने बुद्धत्व कहा है, महावीर ने जिनत्व कहा है; जिसमें न तो बाहर अंधकार है, न भीतर, सब तरफ प्रकाश हो गया है; जिसमें वस्तुओं को भी हम जानते हैं, स्वयं को भी हम जानते है। ऐसी जो चौथी अवस्था है, वह कैसे पाई जाए— इसके ही ये सूत्र हैं।

पहला सूत्र है. जाग्रत, स्‍वप्‍न और सुषुप्‍ति— इन तीनों अवस्थाओं को पृथक रूप से जान लेने से तुर्यावस्था का ज्ञान हो जाता है। अभी हम जानते तो हैं, लेकिन पृथक रूप से नहीं जानते। जब हम स्‍वप्‍न में होते हैं, तब हमें पता नहीं चलता कि मैं स्‍वप्‍न देख रहा हूं; तब तो हम स्‍वप्‍न के साथ एक हो जाते है। सुबह जागकर पता चलता है कि रात सपना देखा। लेकिन अब तो वह अवस्था खो चुकी है। जब वह अवस्था होती है, तब हम पृथक रूप से नहीं जान पाते; तादात्‍म्‍य हो जाता है। स्‍वप्‍न में लगता है कि हम स्‍वप्‍न हो गये। सुबह जागकर लगता है कि अब हम स्‍वप्‍न नहीं रहे। लेकिन अब हमारा तादात्‍म्‍य जाग्रत से हो जाता है। हम कहते है: अब मैं जाग गया। लेकिन तुमने कभी सोचा है कि रात तुम फिर सो जाओगे और यह तादात्‍म्‍य भी भूल जायेगा; फिर सपना आयेगा और फिर तुम सपने के साथ एक हो जाओगे। जो भी तुम्हारी आख पर आ जाता है, तुम उसी के साथ एक हो जाते हो, जबकि तुम सभी से पृथक हो।

यह ऐसा ही है कि जैसे वर्षा आये और तुम समझने लगो कि मैं वर्षा हो गया, गरमी आये और तुम समझने लगो कि मै गरमी हो गया और फिर शीत आये और तुम समझो कि मैं शीत हो गया। लेकिन ये तीनों मौसम तुम्हारे आसपास है; तुम तीनों से अलग हो। बचपन था तो तुमने समझा कि मै बच्चा हूं। जवान हुए तो तुमने समझा कि मै जवान हूं। बूढ़े हुए तो तुम समझ लोगे कि मै बूढ़ा हूं। लेकिन तुम तीनों के पार हो। अगर तुम पार न होते तो बच्चा जवान होता कैसे? तुम्हारे भीतर कुछ है जो बचपन को छोड़ सका और जवान हो सका। वह कुछ बचपन और जवानी दोनों से अलग है।

स्‍वप्‍न में तुम खो जाते हो। जागकर फिर तुम्हें लगता है कि सपना झूठ था। तुम्हारे भीतर ही कोई चेतना का तत्व है जो यात्रा करता है। स्‍वप्‍न, सुषुप्‍ति, जाग्रत तुम्हारी यात्रा के पडाव है, तुम नहीं हो। और जैसे ही तुम इस बात को समझ पाओगे कि तुम पृथक हो, अलग हो, वैसे ही चौथे का जन्म शुरू हो जाएगा। वह पृथकता ही चौथा है।

महावीर ने इसके लिए बहुत कीमती शब्द का प्रयोग किया है। इसे महावीर कहते है: भेद विज्ञान। वे कहते है कि सारा विज्ञान अध्यात्म के भेद को साफ—साफ कर लेने में है। वही इस शिवसूत्र का अर्थ है कि तुम्हें, तीनों अवस्थाएं अलग—अलग हैं, इसका पता चल जाए। जैसे ही तीनों अवस्थाओं को तुम अलग—अलग जान लोगे, तुम यह भी जान लोगे कि मैं तीनों से अलग हूं— तुम्हें भेद की कला आ गई। अभी हमारी मनोदशा ऐसी है कि जो भी हमारे सामने होता है, हम उसी के साथ एक हो जाते है।

किसी ने तुम्हें गाली दी, क्रोध उठा; उस क्षण में तुम क्रोध के साथ एक हो जाते हो। तुम भूल ही जाते हो कि क्षणभर पहले क्रोध नहीं था, तब भी तुम थे। क्षणभर बाद क्रोध फिर चला जाएगा, तब भी तुम रहोगे। तो क्रोध बीच में आया हुआ धुआं है। उसने तुम्हें कितना ही घेर लिया हो, लेकिन वह तुम्हारा स्वभाव नहीं है।

चिंता आती है तो चिंता का बादल घिर जाता है; सूरज छिप जाता है। तुम भूल ही जाते हो कि मैं पृथक हूं। सुख आता है तो तुम नाचने लगते हो। दुख आता है तो तुम रोने लगते हो। जो भी घटता है, —तुम उसी के साथ एक हो जाते हो। तुम्हें अपनी पृथकता का कोई बोध नहीं है। इसे धीरे— धीरे अलग करना सीखना होगा। हर स्थिति में अलग करना सीखना होगा। भोजन करते वक्त जानना कि जो भोजन कर रहा है, वह शरीर है। भूख लगे तो जानना कि जिसे भूख लगी है, वह शरीर है। मैं सिर्फ जाननेवाला हूं। चेतना को कोई भूख लग भी नहीं सकती। गरमी लगे और पसीना बहे तो जानना कि वह शरीर पर घट रहा है। इसका यह अर्थ नहीं कि तुम गरमी में बैठे रहना और पसीना बहने देना; हटना, सुविधा बनाना; लेकिन शरीर के लिए ही सुविधा बनाई जा रही है, तुम सिर्फ जाननेवाले हो।

धीरे—धीरे प्रत्येक घटना जो तुम्हें घेरती है, तुम उससे अपने को अलग करते जाना। कठिन है पृथक करना; क्योंकि बहुत बारीक फासला है, सीमा—रेखा साफ नहीं है; क्योंकि अनंत जन्मों में तुमने तादात्‍म्‍य करना ही सीखा है, तोड़ना नहीं सीखा। तुमने हमेशा अपने को जोडना सीखा है— स्थितियों के साथ; तुम तोड्ने की बात ही भूल गये हो। इसका नाम ही बेहोशी है— यह जो तुमने जोड़ना सीख लिया है।

एक सुबह, मुल्ला नसरुद्दीन अस्पताल में अपने मित्र के पास बैठा था। मित्र ने आख खोली और उसने कहा, ‘नसरुद्दीन, क्या हुआ? मुझे कुछ याद भी नहीं आता।’ नसरुद्दीन ने कहा, ‘रात, तुम जरा ज्यादा पी गये और फिर तुम खिड़की पर चढ़ गये। और तुमने कहा कि मैं उड़ सकता हूं। और तुम उड़ गये। तीन मंजिल मकान पर थे। घटना जाहिर है। सब हड्डियां—पसलियां टूट गयी हैं।’

मित्र ने उठने की कोशिश की और कहा कि नसरुद्दीन, तुम वहां थे? और तुमने यह होने दिया? तुम किस तरह के मित्र हो?

नसरुद्दीन ने कहा, ‘ अब यह बात मत उठाओ। उस समय तो मुझे भी लग रहा था कि तुम यह कर सकते हो। यही नहीं, अगर मेरे पायजा में का नाडा थोड़ा ढीला न होता तो मैं भी तुम्हारे साथ आ रहा था। तो कहां कने में पायजामा सम्हालूंगा, इसलिए मैं रुक गया और बच गया। तुम ही थोड़े पी गये थे, मै भी पी गया था।’

बेहोशी का अर्थ है: जो भी चित्त में दशा आ जाए, उसी के साथ एक हो जाना। शराबी को एक खयाल आ गया कि उड़ सकता हूं तो अब वह भेद नहीं कर सकता। सोचने के लिए जगह नहीं है। विवेक के लिए सुविधा नहीं है। इसी के साथ एक हो गया!

तुम्हारा जीवन इसी शराबी जैसा है। माना कि तुम खिड़कियों से नहीं उड़ते और माना कि तुम अस्पताल में नहीं पाये जाते और हड्डियां नहीं तोड़ लेते; लेकिन बहुत गौर से देखोगे तो तुम अस्पताल में ही हो और तुम्हारी सब हड्डियां टूट गई हैं। क्योंकि तुम्हारा पूरा जीवन एक रोग है। और उस रोग में सिवाय दुख और पीड़ा के कुछ हाथ आता नहीं है। सब जगह तुम गिरे हो। सब जगह तुमने अपने को तोड़ा है। और सारे तोड्ने के पीछे एक ही मूर्च्छा का सूत्र है कि जो भी घटता है, तुम उससे फासला नहीं कर पाते।

थोड़े दूर हटो! एक—एक कदम लंबी यात्रा है; क्योंकि हजारों—लाखों जन्मों में जिसको बनाया है, उसको मिटाना भी आसान नहीं होगा। पर टूटना हो जाता है; क्योंकि वही सत्य है। तुमने जो भी बना लिया है, वह असत्य है। इसलिए हिंदू इसे माया कहते हैं। माया का अर्थ है कि तुम जिस संसार में रहते हो, वह झूठ है। इसका यह अर्थ नहीं है कि बाहर जो वृक्ष है, वह झूठ है; पर्वत जो है, वह झूठ है और आकाश में चांद—तारे है, वे झूठ है। नहीं, इसका केवल इतना ही अर्थ है कि तुम्हारा जो तादात्‍म्‍य है, वह झूठ है। और, उसी तादात्‍म्य से तुम जीते हो। वही तुम्हारा संसार है।

कैसे तादात्‍म्‍य टूटे? तो पहले तो जागने से शुरू करो; क्योंकि वहीं थोड़ी—सी किरण जागरण की है। स्‍वप्‍न से तो तुम कैसे शुरू करोगे। मुश्किल होगा। और सुषुप्‍ति का तो तुम्हें कोई पता नहीं है। वहां तो सब होश खो जाता है। जाग्रत से शुरू करो। साधना शुरू होती है जाग्रत से। वह पहला कदम है। दूसरा कदम है: रूप। और तीसरा कदम है: सुषुप्‍ति। और जिस दिन तुम तीनों कदम पूरे कर लेते हो, चौथा कदम उठ जाता है, वह चौथा कदम है तुर्यावस्था— वह सिद्धावस्था है।

जाग्रत से शुरू करो; क्योंकि वही रास्ता है। इसलिए उसको जाग्रत कहा है; वह जाग्रत है भी नहीं। क्योंकि कैसी जागृति, जब तुम वस्तुओं में खोये हुए हो और अपने प्रति तुम्हें कोई भी होश नहीं है! उसको क्या जागरण कहना; नाम मात्र को जागरण है। लेकिन उसको जाग्रत कहा है। ठीक जाग्रत तो हमने बुद्धपुरुषों को कहा है। लेकिन यह जागरण है, इस अर्थ में, कि इसमें थोड़ी—सी संभावना जागरण की है।

तो पहले तुम जागरण से शुरू करो। भूख लगे, भोजन देना; लेकिन इस स्मरण को साधे रखना कि भूख शरीर को लगती है, मुझे नहीं। पैर में चोट लगे तो मरहमपट्टी करना, अस्पताल जाना, दवा लेना; लेकिन भीतर एक जागरण को साधे रखना कि चोट शरीर को लगी है, मुझे नहीं। इतने ही स्मरण को रखने से ही तुम पाओगे कि निव्यानबे प्रतिशत पीड़ा तिरोहित हो गई। निव्यानबे प्रतिशत पीड़ा इतना होश रखने से ही तिरोहित हो जाती है कि जो चोट लगी है, वह मुझे नहीं लगी। इतना बोध भी तत्‍क्षण तुम्हारे दुख को विसर्जित कर देता है। एक प्रतिशत बची रहेगी; क्योंकि यह बोध पूरा नहीं है। जिस दिन बोध पूरा हो जाएगा, उस दिन समग्र दुख विसर्जित हो जाता

बुद्ध ने कहा है जाग्रत पुरुष का दुख—निरोध हो जाता है। तुम उसे दुख नहीं दे सकते। तुम उसके हाथ—पैर काट सकते हो; तुम उसकी हत्या कर सकते हो; तुम उसे आग में जला सकते हो; लेकिन दुख नहीं दे सकते हो; क्योंकि प्रतिपल जो भी घट रहा है, वह उससे अलग है।

तो, जागने से शुरू करो। रास्ते पर चलना जरूर; लेकिन ध्यान रखना कि तुम नहीं चल रहे हो, शरीर ही चल रहा है। तुम कभी चले भी नहीं। तुम चलोगे कैसे? आत्मा का कोई पैर है कि चल सके? आत्मा का कोई पेट है कि उसे भूख लगे? आत्मा की कोई भी वासना नहीं है। सभी वासना शरीर की है। आत्‍मा निर्वासना है; इसलिए न चलती है, न चल सकती है। तुम्हारा शरीर ही चल रहा है। इसे जब तक होश रहे, सम्हालने की कोशिश करो। धीरे, धीरे, धीरे, एक बड़ा अनूठा और आहूलादकारी अनुभव होगा कि रास्ते पर चलते हुए अचानक किसी दिन पाओगे कि तुम्हारे भीतर दो हिस्से हो गये— एक चल रहा है और एक नहीं चल रहा है; एक भोजन कर रहा है और एक नहीं भोजन कर रहा है।

उपनिषद कहते हैं एक ही वृक्ष पर बैठे हैं, दो पक्षी। ऊपर का पक्षी शांत है— न हिलता, न डुलता न रोता न हंसता; न आता, न जाता; बस बैठा है शांत। नीचे का पक्षी बड़ा बेचैन है; इस डाल से उस डाल पर उछलता है। इस फल को पकड़ता है, उसको पकड़ता है। बड़े सपने देखता है। बड़ी दौड़— धूप करता है। वे दोनों पक्षी तुम्हारे भीतर हैं। वह जो वृक्ष है, वह तुम हो। एक तुम्हारे भीतर जो पक्षी है, जो कभी हिला—डुला नहीं है, जो बस बैठा देख रहा है— उस पक्षी को हमने साक्षी कहा है।

जीसस ने कहा है कि एक ही बिस्तर पर तुम सोते हो; उसमें एक मरा हुआ है और एक सदा जीवित है। और एक सदा से मरा हुआ है और एक सदा जीवित रहेगा। वह बिस्तर तुम ही हो। जब रात तुम बिस्तर पर सोते हो, तो एक उसमें मुर्दा है और एक उसमें शाश्वत चैतन्य है। पर फर्क करना, फासला करना; कठिन श्रम—उद्यम की जरूरत है।

तो पहले तो तुम दिन से कोशिश करो। सुबह जब उठते हो, जब पहली किरण आती है होश की, तभी से तुम साधने की कोशिश करो। हजारों प्रयास करोगे, तब कहीं एक प्रयास सफल होगा। पर एक भी सफल हो जाए, तो तुम पाओगे कि हजारों साल की मेहनत करनी महंगी नहीं थी। क्योंकि एक क्षण को भी तुम्हें पता चल जाए कि जो चल रहा था, वह तुम नहीं हो; जो रुका है, वह तुम हो; जो वासना से भरा है, वह तुम नहीं; जो सदा निर्वासना है, वह तुम हो; जो मरण—धर्मा है, वह तुम नहीं; जो अमृत का स्रोत है, वह तुम हो। एक क्षण को भी इसका पता चल जाए तो एक क्षण को भी तुम महावीर या बुद्ध हो जाओ, या शिवत्व को उपलब्ध हो जाओ तो तुमने महान संपदा का द्वार खोल लिया। फिर यात्रा सरल है। स्वाद के बाद यात्रा बड़ी सरल है। स्वाद के पहले ही सारी कठिनाई है।

दिन से शुरू करो; और, अगर तुमने दिन से शुरू किया तो तुम धीरे—धीरे सफल हो जाओगे स्‍वप्‍न में भी। गुरजियेफ— इस सदी का एक बहुत बड़ा गुरु, महागुरु—वह अपने साधकों को पहले तो दिन में होश रखना सिखाता था—फिर स्‍वप्‍न में होश रखना सिखता था। उसकी प्रक्रिया थी कि जब तुम सोने लगो, तब एक ही बात स्मरण रखो कि यह स्‍वप्‍न है। अभी स्‍वप्‍न शुरू नहीं हुआ। तुम अभी जागे हो, तभी से तुम यह सूत्र अपने भीतर दोहराने लगो कि मैं जो देख रहा हूं यह स्‍वप्‍न है। कमरे को चारों तरफ देखो और यह भाव मन में गहरा करो कि जो मैं देख रहा हूं वह स्‍वप्‍न है। बिस्तर को छुओ और यह भाव गहरा करो कि जो मैं छू रहा हूं यह स्‍वप्‍न है। अपने हाथ को ही अपने हाथ से सार्श करो और अनुभव करो कि जो मैं छू रहा हूं यह स्‍वप्‍न है। ऐसे भाव को करते—करते तुम सो जाओ। यह भाव की सतत धारा तुम्हारे भीतर बनी रहेगी। कुछ ही दिनों में तुम पाओगे कि बीच स्‍वप्‍न में तुम्हें अचानक याद आ जाता है कि यह स्‍वप्‍न है। और जैसे ही याद आता है कि स्‍वप्‍न है, स्‍वप्‍न उसी क्षण टूट जाता है। क्योंकि स्‍वप्‍न के चलने के लिए मूर्च्छा जरूरी है; बिना मूर्च्छा के रूप नहीं चल सकता। बीच स्‍वप्‍न में तुम्हें याद आ जाएगा कि यह स्‍वप्‍न है और स्‍वप्‍न टूट जाएगा। और तुम इतने आनंद से भर जाओगे कि उस आनंद को तुमने कभी भी जाना नहीं है। नींद टूट जाएगी, स्‍वप्‍न बिखर जाएगा और एक गहरा प्रकाश तुम्हें घेर लेगा।

ज्ञानी पुरुष के स्‍वप्‍न तिरोहित हो जाते हैं; क्योंकि, नींद में भी वह स्मरण रख पाता है कि यह स्‍वप्‍न है।

भारत ने इसके बड़े अनूठे प्रयोग किये हैं। शंकर—वेदांत में, सारे जगत की माया की जो धारणा है, वह इसी का एक प्रयोग है। संन्यासी को चौबीस घंटे स्मरण रखना है कि जो भी हो रहा है, सब स्‍वप्‍न है। जागते भी, रास्ते से गुजरते, बाजार में बैठे हुए भी स्मरण रखना है कि जो भी है, सब स्‍वप्‍न है। यह क्यों? यह एक प्रयोग है, एक प्रक्रिया है, एक विधि है। अगर तुमने आठ घंटे जागते में स्मरण रखा कि जो भी हो रहा है, यह स्‍वप्‍न है, तो यह स्मरण इतना गहरा हो जाएगा कि जब रात स्‍वप्‍न भी चलेगा, तब तुम वहां भी याद रख सकोगे। वहां भी तुम याद रख सकोगे कि यह स्‍वप्‍न है।

अभी तुम याद नहीं रख पाते। अगर ठीक से समझो तो अभी भी तुम उलटे अर्थों में यही कर रहे हो। चौबीस घंटे, जब तुम जागते हो, तब तुम समझते हो कि जो भी देख रहा हूं यह सत्य है। इसी प्रतीति के कारण रात सपने को देखकर भी तुम समझते हो कि जो भी मैं देख रहा हूं वह सत्य है। क्योंकि यह प्रतीति गहरी हो जाती है। सपने से झूठा और क्या होगा! और तुमने कितनी बार रोज सुबह उठकर नहीं पाया कि सपना झूठा है, व्यर्थ है। लेकिन, फिर दुबारा तुम सोते हो और फिर वही भूल होती है। क्यों यह भूल बार—बार होती है? इस भूल के पीछे कोई बहुत गहरा कारण होना चाहिए। वह कारण यह है कि तुम जो भी देखते हो जाग्रत में, उसको तुम समझते हो कि यह सत्य है। जब सब कुछ देखा हुआ तुम सत्य मानते हो तो रात तुम सपने को देखते हो, उसको तुम असत्य कैसे मानोगे! उसको भी तुम सत्य मान लेते हो।

इससे उलटा प्रयोग माया का है। तुम जो भी देखते हो उसे दिनभर स्मरण रखते हो कि यह असत्य है। बार—बार भूलते हो और फिर याद को सम्हालते हो; फिर—फिर स्मरण लाते हो कि यह असत्य है। यह सब जो मैं देख रहा हूं चारों तरफ, एक बड़ा नाटक है और मैं दर्शक से ज्यादा नहीं हूं। मैं भोक्ता नहीं हूं कर्ता नहीं हूं; सिर्फ साक्षी हूं।

इस भाव को अगर तुम सम्हालते हो तो इसकी भीतर एक धारा बन जाती है। तब रात सपना टूट जाता है। और, जिसका सपना टूट गया, उसकी बड़ी उपलब्धि है। जब सपना टूट जाए तो फिर तीसरा चरण उठाया जा सकता है। जब सपना टूट जाए तो फिर सुषुप्‍ति में होश रखने का चरण उठाया जा सकता है। लेकिन तुम्हें अभी बहुत कठिनाई होगी। सीधा उस प्रयोग को करना संभव नहीं है; एक—एक कदम उठाना पड़ेगा।

जब सपना टूट जाता है, तब दृश्य कोई भी नहीं रह जाता। दिन में आख खोलकर तुम चलते हो। तुम कितना ही मानो कि जो देख रहे हो, वह माया है, तो भी दृश्य तो बचेगा। तुम कितना ही, शंकर भी कितना ही कहते हों कि माया है तो भी दीवार से तो निकलेंगे नहीं, निकलेंगे तो दरवाजे से ही; कितना ही कहते हों कि सब माया है, ककंड़—पत्थर तो नहीं खायेंगे, खायेंगे तो भोजन ही; कितना ही कहते हों कि माया है, फिर भी तुम होओगे, तभी बोलेंगे, तुम नहीं होओगे तो नहीं बोलेंगे।

इसलिए, बाहर के जगत के साथ तुम कितनी ही मान्यता को गहन कर लो कि यह माया है, बाहर का जगत तो बना रहेगा, मिट नहीं जाएगा। कोई पत्थर मारेगा फेंककर तो सिर टूटेगा, खून बहेगा, तुम दुखी मत होओगे, तुम पीड़ा नहीं लोगे, तुम कहोगे कि सब माया है; तुम अपने को दूर रखोगे। लेकिन; फिर भी घटना तो घटेगी ही। लेकिन, रूप में एक अनूठी बात है— वह बिलकुल माया है। इसलिए वहां एक अनूठा प्रयोग हो जाता है। जैसे ही तुम समझते हो कि सपना माया है, सपना खो जाता है, दृश्य विलीन हो जाता है। और, जब दृश्य विलीन हो जाता है, तभी द्रष्टा के प्रति आख जा सकती है। जब तक दृश्य मौजूद रहता है, तब तक तुम बाहर ही देखते हो; क्योंकि दृश्य आकर्षित करता रहता है। जब दृश्य खो जाता है, पर्दा खाली हो जाता है, पर्दा भी नहीं रह जाता, तब तुम अकेले छूटते हो। इसलिए ध्यानी आख बंद करके ध्यान करता है; क्योंकि, इस संसार को माया कहना एक वि(ध है।

यह संसार वास्तविक है। यह तुम्हारे सोचने पर निर्भर नहीं है। अगर यह स्‍वप्‍न भी है तो ब्रह्म का है; यह तुम्हारा स्‍वप्‍न नहीं है। लेकिन तुम्हारे निजी सपने है; वे रात में घटते हैं। इसलिए बड़ी क्रांतिकारी घटना तो तब घटती है, जब तुम निजी स्‍वप्‍न को तोड़ देते हो। आकाश खाली हो जाता है। वहां देखने को कुछ नहीं बचता। नाटक समाप्त हुआ। घर जाने का वक्त आ गया। अब तुम करोगे भी क्या, बैठे—बैठे! इस घड़ी में अचानक आख मुड़ती है; क्योंकि बाहर कुछ भी खोजने को नहीं रह जाता, देखने को नहीं रह जाता, सोचने को नहीं रह जाता। कोई दृश्य नहीं बचता। तो, जो ऊर्जा दृश्य की तरफ जाती थी, वह स्वयं की तरफ मुड़ती है। स्वयं की तरफ मुड़ती हुई ऊर्जा ही ध्यान है। और, जैसे ही यह स्वयं की तरफ मुड़ती है, तब तुम सुषुप्ति में भी होश रख सकते हो। क्योंकि तुम तो होते हो, संसार नहीं होता सुषुप्ति में, स्‍वप्‍न नहीं होता सुषुप्‍ति में। क्योंकि तुम दोनों को देखने में अटके थे, इसलिए सुषुप्‍ति में बेहोशी रहती थी। अब तुम्हारी अटक टूट गई। अब दृश्य से तुम्हारा कोई संबंध न रहा। अब दृश्य के बिना भी तुम हो सकते हो। अब दीया जलता है; उसकी दीये को कोई फिक्र नहीं कि दीये के प्रकाश में कोई गुजरता है या नहीं गुजरता। अब तुम्हारा जीवन भीतर की तरफ मुडेगा। अब तुम सुषुप्ति में जाग जाओगे।

स्‍वप्‍न के टूटने पर जो प्रयोग करने का है, वह यह है कि जैसे ही स्‍वप्‍न टूट जाए, आख मत खोलना; क्योंकि आख खोली तो जगत बाहर मौजूद है। फिर दृश्य मिल जाएगा। जब स्‍वप्‍न टूट जाए तो आख मत खोलना; गौर से देखे चले जाना शून्य को— स्‍वप्‍न खो गया। जहां स्‍वप्‍न था, अब वहां स्‍वप्‍न नहीं है। तुम गौर से उस शून्य को देखे चले जाना। उस शून्य को देखने में ही तुम पाओगे कि तुम्हारी चेतना भीतर की तरफ मुड़ने लगी, अंतर्मुखी हो गई। तब तुम सुषुप्‍ति में भी जागे रहेगे। यही कृष्ण ने गीता में कहा कि जब सब सो जाते हैं, तब भी योगी जागता है। जो सबके लिए निद्रा है, वह योगी के लिए निद्रा नहीं है। वह सुषुप्ति में भी जागा हुआ है। और, जब तुम तीनों को पृथक—पृथक देख लेते हो, तब तुम चौथे हो गये; अपने—आप चौथे हो गये।

तुर्या का अर्थ है. चौथा, दि फोर्थ। उस शब्द का और कोई अर्थ नहीं है। उसे कोई शब्द का अर्थ देने की जरूरत भी नहीं है। बस चौथा कहना काफी है; क्योंकि सभी अर्थ उसको बांध लेंगे, सभी शब्दों से बांध लेंगे; सिर्फ इशारा काफी है, क्योंकि वह अनंत है, और असीम है।

जैसे ही तुम तीन के बाहर हुए, तुम परमात्मा हो। इन तीनों में तुम प्रविष्ट हो गये हो, इसलिए संकीर्ण हो गये हो। यह ऐसे ही है कि जैसे तुम खुले आकाश से एक टनल में, एक बोगदे में प्रवेश कर जाओ और बोगदा छोटा होता जाए। इंद्रियों तक आते—आते तुम बिलकुल संकीर्ण हो गये हो। पीछे लौटना है। जैसे—जैसे तुम पीछे लौटते हो, तुम्हारा आकाश बड़ा होता जाता है। जिस क्षण तुम तीनों के पार अपने को देख लेते हो, उस दिन तुम महा आकाश हो। उस दिन तुम परमात्मा हो— ऐसे ही जैसे कि कोई आदमी दूरबीन से देखता है आकाश को। दूरबीन का छोटा—सा छेद होता है और वह अपनी सारी आंखों को उसी पर लगा देता है। फिर दूरबीन से आंखें हटाता है, तब उसे पता चलता है कि मैं दूरबीन नहीं हूं। तुम भी आख नहीं हो; लेकिन आख पर तुम कई जन्मों से टिके हो। तुम कान नहीं हो; लेकिन कान से तुम कई जन्मों से सुन रहे हो। तुम हाथ नहीं हो; लेकिन हाथ से तुम कई जन्मों से छू रहे हो। बस, तुम दूरबीन से बंध गये हो। तुम्हारी हालत वैसी हो गयी है, जैसे किसी वैज्ञानिक को दूरबीन बंध गयी हो। अब वह दूरबीन को आख से बांधे हुए घूम रहा है। तुम उसको कितना ही कहो कि दूरबीन उतारकर रखो, यह तुम नहीं हो। पर वह दूरबीन से ही देख सकता है और भूल ही गया है। यह विस्मृति है। इस विस्मृति को तोड्ने की प्रक्रिया है— जाग्रत से शुरू करो, सुषुप्‍ति पर पूर्ण होने दो।

जाग्रत, स्‍वप्‍न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं को पृथक रूप से जानने से तुर्यावस्था का भी ज्ञान हो जाता है। इससे शुरू करो—— और धीरे— धीरे बढ़ते जाओ। जिस दिन तुम्हें गहरी नींद में होश रह जाए, उस दिन जान लेना कि तुममें, बुद्ध में, महावीर में, शिव में, अब कोई अंतर न रहा। लेकिन तुम उलटा ही काम कर रहे हो। तुम जागरण में भी ठीक से जागे हुए नहीं हो तो तुम सुषुप्ति में कैसे जागोगे! तुम यहां भी सोये हुए हो। तुम्हारा जागरण नाम मात्र को है। तुम्हें श्रम पैदा होता है कि तुम जागे हो, क्योंकि तुम कामचलाऊ काम निपटा लेते हो। साईकल चला लेते हो तो तुम सोचते हो कि तुम जागे हुए हो; कार चला लेते हो तो तुम सोचते हो कि जागे हुए हो। लेकिन तुमने कभी खयाल किया कि यह सब आटोमेटिक हो गया है, यंत्रवत हो गया है। साईकल चलानेवाला सोचता भी नहीं कि अब बायें छूना है, अब दायें मुड़ना है। वह अपने मन में लगा रहता है। साईकल बायें मुड़ती है, दायें मुड़ती है; वह अपने घर पहुंच जाता है। सोचना। यहां होशपूर्वक चलने की कोई जरूरत नहीं है; सब यंत्रवत हो गया है, आदत हो गयी है। वह घर पहुंच ही जाता है। कार चलानेवाला चलाता जाता है; कोई जरूरत नहीं है उसको कि वह जागे।

हम सबकी जिंदगी एक रूटीन, एक बंधी हुई लीक पर घूमने लगती है। जैसे कोलू के बैल चलते हैं, ऐसे हम चलने लगते हैं। उसी—उसी लीक पर रोज चलते हैं। किसी की लीक थोड़ी बड़ी, किसी की थोड़ी छोटी, किसी की थोड़ी सुंदर, किसी की थोड़ी कुरूप; लेकिन लीक होने में कोई फर्क नहीं है। तुम्हारी जिंदगी एक कोलू के बैल की भांति है। सुबह उठते हो, एक धारा चलती है; रात सो जाते हो, एक वर्तुल पूरा हुआ। फिर सुबह उठते हो—फिर वही, फिर वही। यह सब इतनी बार तुमने दोहराया है कि अब होश रखने की कोई जरूरत ही नहीं; यह बेहोशी में हो जाता है। समय पर भूख लग जाती है। समय पर नींद आ जाती है। समय पर उठकर तुम बाजार चल पड़ते हो। तुम पूरी जिंदगी को ऐसे सोये—सोये एक वर्तुल में गुजार रहे हो।

कब जागोगे? कब एक झटका दोगे अपने को? कब इस लीक से उठोगे? कब कहोगे कि मैं कोलू का बैल होने को राजी नहीं हूं? जिस दिन तुम्हें झटका देने का खयाल आ जायेगा, उसी दिन से परमात्मा की यात्रा शुरू हो जाती है। मंदिर जाने से तुम धार्मिक नहीं होते; क्योंकि वह भी तुम्हारी कोलू की लीक का हिस्सा है। तुम वहां भी चले जाते हो; क्योंकि तुम सदा जाते रहे हो; क्योंकि तुम्हारे मां—बाप जाते रहे हैं; उनके मां—बाप जाते रहे हैं इसी मंदिर में। इसी शास्त्र को तुम पढ़ते रहे हो, तो तुम पढ़ते चले जाते हो। लेकिन यह कोलू की लीक है। क्या तुम कभी होशपूर्वक मंदिर गए? होशपूर्वक अगर तुम जा सको तो मंदिर जाने की जरूरत न रह जायेगी। जहां होश हो जायेगा, तुम वहीं पाओगे, मंदिर है।

होश मंदिर है। लेकिन ईसाई चला जा रहा है चर्च की तरफ; सिक्ख चला जा रहा है गुरुद्वारा की तरफ; हिंदू चला जा रहा है मंदिर की तरफ—बंधे हुए अपनी—अपनी लीक पर हैं। तुम्हारी यह सोयी—सोयी अवस्था तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी नहीं तोड़ सकता।

तो पहली बात जान लेनी जरूरी है कि तुम्हारा जाग्रत भी सोया हुआ है और योगी की सुषुप्ति भी जागी हुई है। तुम बिलकुल उलटे योगी हो। और जिस दिन तुम इससे विपरीत हो जाओगे, उसी दिन जीवन का सार—सूत्र तुम्हारे हाथ आ जायेगा। तीनों को अलग—अलग जान लो तो जाननेवाला तीनों से अलग हो जाता है। तुम मात्र ज्ञान हो इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं। तुम सिर्फ होश मात्र हो। लेकिन तीनों से अपने को तोड़ो।

पढ़ता था मैं, एक सूफी फकीर के संबंध में—जुन्नैद के बाबत। कोई उसे गाली दे जाता तो वह कहता है कि कल आकर उत्तर दूंगा। कल जाकर कहता कि अब उत्तर की कोई जरूरत नहीं। तो वह आदमी पूछता कि कल मैंने गाली दी; कल तुमने क्यों उत्तर नहीं दिया? तुम अनूठे आदमी हो। गाली किसी को दो तो वह उसी वक्त उत्तर देता है, क्षणभर नहीं रुकता है। जुन्नैद ने कहा कि मेरे गुरु ने कहा है कि अगर जल्दी की तो मूर्च्छा हो जाती है। तो थोड़ा वक्त देना। कोई गाली दे, उसी वक्त अगर उत्तर दिया तो उत्तर मूर्च्छा में दिया जायेगा; क्योंकि गाली तुम्हें घेरे होगी, उसका ताप तुम्हें पकड़े होगा, उसका धुआं अभी आंखों में होगा। थोड़ा बादल को गुजर जाने दो। चौबीस घंटे का वक्त दो, फिर उत्तर देना।

और जुन्नैद कहता है कि मेरा गुरु बहुत चालबाज आदमी था; क्योंकि तब से मैं उत्तर ही नहीं दे पाया। चौबीस घंटा कोई रुक जाये क्रोध करने को, तो तुम सोचते हो, क्रोध कर पायेगा? चौबीस मिनट भी रुक जाये तो क्रोध असंभव है। चौबीस सैकंड भी रुक जाये तो क्रोध असंभव है। सच तो यह है कि एक सैकंड भी अगर रुक जाये, और देख ले, तो क्रोध असंभव है।

लेकिन, तुम रुकते ही नहीं। उधर किसी ने गाली दी, जैसे किसी ने बिजली का बटन दबाया, इधर तुम्हारा पंखा चला। इसमें रत्तीभर का फासला नहीं है। इसमें जरा—सी भी संध नहीं है। और, तुम सोचते हो कि तुम बड़े होशपूर्ण हो। तुम मालिक भी नहीं हो अपने। बेहोश आदमी मालिक हो भी नहीं सकता। कोई भी बटन दबाता है और तुम्हें चलाता है। कोई आया और तुम्हारी खुशामद की, तुम खिलखिला गये, गदगद हो गये। किसी ने तुम्हारा अपमान किया और तुम आंसुओ से भर गये। तुम मालिक हो अपने? या हर कोई तुम्हें चलाता है? और जो तुम्हें चला रहे हैं, वे भी अपने मालिक नहीं है अपने। तुम गुलामों के गुलाम हो। और बड़ा मजा है कि सब एक—दूसरे को चलाने में कुशल हैं, और उनमें से एक भी होश में नहीं है। इससे बड़ा और कोई अपमान नहीं हो सकता आआ का, कि हर कोई तुम्हें चलाता है।

मुल्ला नसरुद्दीन एक दफ्तर में काम करता था। सभी नाराज थे उसके काम से; क्योंकि काम भी कुछ था ही नहीं। या तो वह सोया रहता था या झपकी खाता रहता था। आखिर दफ्तर के लोग परेशान इतने हो गये कि धीरे— धीरे लोगों ने उसे कहना भी शुरू कर दिया। मालिक ने भी कहा, डांटा—डपटा लेकिन उसमें कुछ फर्क नहीं हुआ। इतना अपमान और इस सब उपद्रव के कारण उसने इस्तीफा दिया। बदलना तो मुश्किल था, इस्तीफा देना आसान था। बहुत—से लोग, जो संसार से भागते हैं संन्यास की तरफ, वे इस्तीफा दे रहे हैं। बदलना तो मुश्किल है, इस्तीफा देना सदा आसान है। उसने इस्तीफा दिया। सारा दफ्तर प्रसन्न हुआ इस्तीफे से। लोग इतने प्रसन्न हो गए कि मालिक ने कहा कि जब वह अपनी तरफ से ही जा रहा है, तो विदाई—समारोह करना उचित है। और हम इतने परेशान थे इससे और यह छोड़ रहा है। और छुड़ाने का कोई उपाय नहीं था। वह बोझ हो गया था। इसलिए, ठीक से, सच में ही खुश थे वे। विदाई—समारोह काफी अच्छी तरह से आयोजित किया—मिठाई, खाना—पीना;