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KARTA.KARE NA KARE SAKE ..Siv KARE SO HOYE...TIN LOK NOV KHANDA ME...SIV SHE BADA NA KOY

ढोल गंवार पुरुष और घोड़ा, जितना पीटो उतना थोड़ा।

विवाह ;- दूसरे से सुख नहीं मिलता; सुख स्वयं में छिपा है, वहां खोजना है। और तुम्हारे पास सुख हो तो तुम दूसरों को भी बांट सकते हो। किन्हीं भी व्यक्तियों को विवाह करने के पहले ध्यान को अनिवार्य होना जरूरी है; और कोई शर्त पूरी हो या न हो, जन्म—कुंडली मिले कि न मिले,—कुंडलियां मिलने से क्या होता है! वह कोई अनिवार्य शर्त नहीं। स्त्री सुशिक्षित हो, पुरुष सुशिक्षित हो, कुलीन घर से आते हों— ये सब बातें गौण हैं। मौलिक बात एक है कि दो विवाहित होने वाले व्यक्ति ध्यान की गहराइयों मे गए हैं या नहीं? विवाह के पूर्व वर्ष, दो वर्ष गहन ध्यान की प्रक्रिया से गुजरना जरूरी है। फिर इसके बाद विवाह भी एक अपूर्व अवसर बन जाएगा विकास का। ध्यान से प्रेम की संभावना प्रकट होती है। ध्यान का दीया जलता है तो प्रेम का प्रकाश फैलता है। और दो व्यक्तियों के भीतर ध्यान का दीया जला हो तो विवाह में एक आनंद है। वह आनंद भी ध्यान से आ रहा है, विवाह से नहीं आ रहा है— यह खयाल रखना जरूरी है। और जब तक ऐसा न हो तब तक विवाह एक मजाक है— और बडा कठोर मजाक।

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाये। भगवान का आशीर्वाद आप पर सदा बना रहे और आप को खूब लंबी उम्र के साथ साथ ढेरों खुशियॉ दे।

Ego always speaks ... Surrendered always listen ... Empty always accept ... True Love has no name ... No particular face ...

It is meant to be the one and only ... But once you experience the true love ... Your love belongs to each nd everyone equally ... It is not about me or you or he or she or em ... It is about us ... About us all ... Love you .

You always relate the love to your body ... You always seek the variety of love which pleases your senses ... But it's not love ... Which can't awake your soul is not true love ... True love is the kea to open the secret world of the soul and the self . True love has ability to penetrate in the deepest and to reach the soul ... Soul can not experience much ... But love .

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The Productive cycleWater(blue,black) nurtures -> Wood(green,brown) nurtures -> Fire(red,orange,pink,purple) nurtures -> Earth(yellow) nurtures -> Metal (white,grey)nurtures -> Water.You will use the Productive, or Creative, cycle when you need to strengthen a particular element.The Destructive cycleWater weakens -> Fire weakens –> Metal weakens -> Wood weakens –> Earth weakens –> Water.

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Hindu philosophy. Hindu philosophy refers to a group of darśanas (philosophies, world views, teachings) that emerged in ancient India. These include six systems (ṣaḍdarśana) – Sankhya, Yoga, Nyaya,Vaisheshika, Mimamsa and Vedanta.

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; अहंकार कभी सत्य के प्रति स्वीकृति उत्तपन्न नही कर पाता ... भले ही सत्य प्रत्यक्ष प्रकट क्यों न हो ... पुरुषों में अहंकार स्त्रियों की अपेक्षा कई गुना अधिक होता है सो ही उन्हें स्वयम में सत्य के प्रति स्वीकार्यता उत्तपन्न करना ही सबसे कठिन कार्य है ।

क्योंकि अहंकार केवल भय द्वारा ही पराभूत है तथा भय के मूल में मौन है । सो ही एक अहंकारी व्यक्ति केवल मौन द्वारा ही अहंकार से मुक्त हो सकता है किंतु अहंकारी को मौन सदैव प्रताड़ना तथा भय के मार्ग पर ही प्राप्त होता है ।

पुरुषों की प्राकृतिक प्रतिक्रिया हिंसा है ... सो वह प्रेम तथा साधना में भी हिंसात्मक विधियो को ही चुनेगा ... किन्तु प्रेम हो अथवा साधना ज्यो ज्यो फलीभूत होती जाएगी त्यों त्यों हिंसाभाव तिरोहित होता जाएगा ... करुणा क्षमा सेवा भाव उत्तपन्न होता जाएगा ... किन्तु अभी भी अहंकार न जाएगा ...

अहंकार जाने को सत्य के प्रति स्वीकार्यता तथा समर्पण आवश्यक है । और जब तक अहंकार है तब तक स्वीकार्यता एवम समर्पण सम्भव ही नही ।

सो ही प्रताड़ना तथा भय की सर्जना की ...

प्रताड़ना तथा भय द्वारा बलात स्वीकृति एवम समर्पण का अनुभव कराया जाए सो एक बार अनुभव गहरे में उतार लिया फिर तो व्यक्ति स्वतः ही स्वीकृति तथा समर्पण के मार्ग पर चल पड़ेगा ... चल ही पड़ा तो फिर जितना यात्रा करेगा उतना ही मुक्त होता जाएगा । यात्रा आरम्भ ही हो गयी तो कभी न कभी पूर्ण भी अवश्य ही होगी ।

ओउम तत्सत ... ज्ञा ... न ... अर्थात समस्त की नश्वरता को जान ना ... संसार रूपी वृक्ष को जानना

बो ... ध ... अर्थात समस्त संसार रूपी वृक्ष के मूल में जो बीज है जिसने संसार को स्वयम में धारण कर रखा है.. उसके सहित इसे अनुभूत एवम इस अनुभूति को धारण करना ।

बोध से तातपर्य है स्वानुभूति से जो स्व स्वनुभूत है केवल वही हमारा बोध है ।

ज्ञान से तातपर्य है स्वीकृत बोध ... जिसके भी प्रति हम स्वीकार्यता बना कर उसे ग्रहण कर ले ... वही हमारा ज्ञान है ...

इस से सर्वथा विपरीत स्वयम की अनश्वरता का प्रत्यक्ष बोध ही वास्तविक बोध है

आप नश्वरता का ज्ञान तो कर सकते है किंतु बोध असम्भव है

इसी प्रकार स्वयं की अनश्वरता का बोध तो कर सकते किन्तु ज्ञान असम्भव है

समस्त ज्ञान देह की सम्पत्ति है ... तो आत्मा केवल बोध को ही ग्रहण एवं स्विकार कर पाने में सक्षम है ...

इसी कारण ज्ञान द्वारा शुद्ध बोध को प्राप्त कर मुक्ति की विधि है ... इसी कारण ज्ञानी कितने भी श्रेष्ठ हो किन्तु बुद्ध सर्वश्रेष्ठ है ।

ओउम तत्सत ... जब भी तुम कहते हो असत्य है ... तो क्या असत्य का किसी भी प्रकार का कोई अस्तित्व सम्भव हो जाता है ...

नही ... तुम जब कहते हो कि असत्य है तब भी तुम केवल उसके न होने को ही स्वीकार रहे । जब तुम कहते हो कि अमुक असत्य है तब तुम उसके अस्तित्व के न होने को ही स्वीकार रहे हो ।

जब असत्य का होना सम्भव ही नही तो फिर माया क्या है ... सत्य से पृथक जब कोई अस्तित्व सम्भव ही नही तो माया का अस्तित्व कैसे सम्भव हो सकता है ।

देखो ... तुम कल्पनाएं करते हो तो क्या उन कल्पनाओ का अस्तित्व है ?? तुम स्वप्न देखते हो तो क्या तुम्हारे स्वप्नों का अस्तित्व है ... उसी प्रकार यह संसार तथा इस संसार का प्रत्येक सार असार भी ... किसी कल्पना अथवा स्वप्न के जितना ही अस्तित्ववान है ।

तुम्हारे इस संसार ने तुम्हे जो भी परिभाषाये प्रदान किये है ... वो भी सब कल्पना तथा स्वप्न ही तो है । प्रश्न : बहुधा ऐसा देखने मे आता है कि व्यक्ति मृत व्यक्तियों को गुरु मान कर उनका ही ध्यान जप करते है । क्या ये उचित है यदि है तो क्यो यदि नही तो क्यो ??

उत्तर : यदि गुरु जीवन रहते सत्य को उपलब्ध हुआ तो फिर वह विदेह हो सकता है मृत नही । जो सत्य को उपलब्ध हुआ सो तो परम शाश्वत स्वरूप को प्राप्त हो गया । सो ऐसे परंतप को विदेह होने पर भी गुरु स्विकार कर उनका अनुगामी हुआ जा सकता है । शिष्य की निष्ठा निस्वार्थ हो शिष्य पूर्ण समर्पित भाव से शरणागत हो तो उसे गुरु दर्शन यथा मार्गदर्शन दोनों ही प्राप्त होंगे ।

किन्तु किसी मृत व्यक्ति को गुरु स्वीकार करना उचित नही । एक मृत्यु को प्राप्त हुए व्यक्ति को गुरु स्वीकार करने से आप भी अंततः मृत्यु को ही प्राप्त होंगे ।

किसी मृतक को गुरु स्वीकार करने से अधिक योग्य है कि आप आदिनाथ महारुद्र अथवा नारायण अथवा श्री राधा माधव को गुरु स्विकार करे क्योंकि यह सभी परम शाश्वत स्वरूप है । शिष्य निष्ठावान हो तो उन्हें इनके द्वारा मार्गदर्शन अवश्य प्राप्त होता है ।

ओउम तत्सत ...