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क्या है धनतेरस के दिन का रहस्य? धनतेरस के दिन विविध वस्तुओं के खरीदने का क्या कारण हैं?

पूजा का क्या अर्थ है ?- पू’ का अर्थ है ‘परिपूर्णता’ और ‘जा’ का अर्थ है ‘वह जो परिपूर्णता से जन्मा है’। इसलिए, पूजा का अर्थ है – वह जो परिपूर्णता से जन्मा है और पूजा करने से जो प्राप्त होता है – वही परिपूर्णता और संतुष्टि है। पूजा करने से वातावरण में सूक्ष्म तरंगें बनतीं हैं जिससे सकारात्मकता आती है।दिवाली के पहले वाले दिन को 'धनतेरस' कहते हैं। इस दिन भारत में मन्त्रों के द्वारा भगवान धन्वन्तरि और देवी लक्ष्मी का आवाहन किया जाता है जिससे सकारात्मक तरंगें और समृद्धि प्राप्त होती है। धनतेरस के दिन का क्या रहस्य है?- 07 FACTS;- 1-दिवाली प्रकाश का त्योहार है। भगवान बुद्ध ने कहा है, "आपो दीपो भवः" आप स्वयं ही प्रकाश बन जाईये। सभी वेद और उपनिषद भी यही कहते हैं "आप सभी प्रकाश हैं। आप में से कुछ प्रकाशित हो गए हैं और कुछ अभी प्रकाशित नहीं हुए हैं।लेकिन सभी के अंदर प्रकाश देने की क्षमता है।" 2-दिवाली वह दिन है जब हम अंधकार को दूर करते हैं। और अंधकार को मिटाने के लिए एक रोशनी काफी नहीं है, उसके लिए पूरे समाज को प्रकाशित होना होगा। परिवार में केवल एक सदस्य का खुश होना काफी नहीं है, प्रत्येक सदस्य को खुश होना होगा। यदि एक भी सदस्य खुश नहीं है, तो बाकी लोग भी खुश नहीं रह सकते। इसलिए प्रत्येक घर को प्रकाशित होना होगा। 3-दिवाली को अमावस की रात को मनाते हैं और इस दिन लक्ष्मी देवी की पूजा करते हैं। वह दिव्यता जो हमें समृद्धि प्रदान करती है - देवी लक्ष्मी उसी का रूप हैं। भारत में भगवान् केवल पुरुष नहीं, बल्कि स्त्री रूप में भी पूजे जाते हैं। जिस प्रकार सफ़ेद रोशनी में सात रंग होते हैं, उसी प्रकार एक दिव्यता के अलग-अलग रूप होते हैं। 4-दिवाली के पहले वाले दिन को 'धनतेरस' कहते हैं। पुराने दिनों में इस दिन लोग अपनी सभी धन-समृद्धि को लाकर ईश्वर के सामने रख देते थे। आमतौर पर धन को या तो बैंक में रखते हैं या लॉकर में छुपाकर रखते हैं। लेकिन पुराने दिनों में, धनतेरस के दिन लोग अपने सारे धन को सामने रखकर देखते थे और समृद्ध महसूस करते थे। 5- केवल सोना-चांदी ही धन नहीं है, ज्ञान भी धन है। तो इस प्रकार से उत्सव मनाया जाता था। आपको अपने ज्ञान को भी संजो कर रखना चाहिए और समृद्ध महसूस करना चाहिए। धनतेरस 'आयुर्वेद' का दिन भी है, क्योंकि जड़ीबूटियां भी धन हैं। जड़ीबूटियां और पेड़-पौधे भी धन हैं। ऐसा कहते हैं कि धनतेरस के दिन ही मानवता को अमृत दिया गया था। 6-तो आज के दिन ऐसा महसूस करिये कि आप बहुत सौभाग्यशाली हैं और तृप्त महसूस करिये! जब भी हम खुद को धन्यभागी समझते हैं, तब हमें जीवन में और मिलता है। बाइबिल में कहावत है - "जिनके पास है, उन्हें और दिया जाएगा और जिनके पास नहीं है, उनसे जो भी थोड़ा-बहुत है वह भी ले लिया जाएगा।" पुराने ज़माने से यही विचार रहा है - कि जीवन में समृद्ध महसूस करिये। समृद्धि हमारे भीतर से शुरू होती है और फिर ही बाहर व्यक्त होती है। 7-जैन आगम में धनतेरस को 'धन्य तेरस' या 'ध्यान तेरस' भी कहते हैं। भगवान महावीर इस दिन तीसरे और चौथे ध्यान में जाने के लिये योग निरोध के लिये चले गये थे। तीन दिन के ध्यान के बाद योग निरोध करते हुये दीपावली के दिन निर्वाण को प्राप्त हुये। तभी से यह दिन धन्य तेरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ। धनतेरस में मुख्य द्वार पर दीप जलाने की प्रथा का क्या कारण है?- 03 FACTS;- 1-धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है। इस प्रथा के पीछे एक लोक कथा है, कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। |ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। राजा इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। 2-दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया। विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे। जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा परंतु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा। 3-यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे उसी वक्त उनमें से एक ने यमदेवता से विनती की हे यमराज क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु से मुक्त हो जाए। दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यमदेवता बोले हे दूत अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है इससे मुक्ति का एक आसान तरीका मैं तुम्हें बताता हूं सो सुनो। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीप माला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं।यही कारण है कि दीपावली के दो दिन पहले से ही यानी धनतेरस से ही दीपामालाएं सजने लगती हैं। क्या भगवान धन्वन्तरि सागर मंथन से उत्पन्न हुए थे?- 05 FACTS;- 1-उत्तरी भारत में कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन धनतेरस का पर्व पूरी श्रद्धा व विश्वास के साथ मनाया जाता है। धन्वन्तरि के अलावा इस दिन, देवी लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की भी पूजा करने की मान्यता है।जिस प्रकार देवी लक्ष्मी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थीं, उसी प्रकार भगवान धन्वन्तरि भी अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए थे।देवी लक्ष्मी हालांकि धन देवी हैं परन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वस्थ और लम्बी आयु भी चाहिए। 2-कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वन्तरि का जन्म हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है।भगवान धन्वन्तरि जो चिकित्सा के देवता भी हैं, उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना की जाती है। 3-धन्वन्तरि जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरि चूंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। 4-कहीं-कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें 13 गुणा वृद्धि होती है।इस अवसर पर धनिया के बीज खरीद कर भी लोग घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं। 5-धनतेरस के दिन चांदी खरीदने की भी प्रथा है।इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में संतोष रूपी धन का वास होता है।संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है वह स्वस्थ है सुखी है और वही सबसे धनवान है।लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी-गणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हैं। धनतेरस मनाने की पावन कथा क्या है?- 10 FACTS;- 1-इस दिन को मनाने के पीछे धन्वन्तरि के जन्म लेने की कथा के अलावा, दूसरी कहानी भी प्रचलित है। कहा जाता है कि एक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे, तब लक्ष्मी जी ने भी उनसे साथ चलने का आग्रह किया। 2-तब विष्णु जी ने कहा कि यदि मैं जो बात कहूं तुम अगर वैसा ही मानो तो फिर चलो। तब लक्ष्मी जी उनकी बात मान गईं और भगवान विष्णु के साथ भूमंडल पर आ गईं। कुछ देर बाद एक जगह पर पहुंचकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा कि जब तक मैं न आऊं तुम यहां ठहरो।मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत आना। विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी के मन में कौतूहल जागा कि आखिर दक्षिण दिशा में ऐसा क्या रहस्य है जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं चले गए। 3-लक्ष्मी जी से रहा न गया और जैसे ही भगवान आगे बढ़े लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं। कुछ ही आगे जाने पर उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया जिसमें खूब फूल लगे थे। सरसों की शोभा देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गईं और फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करने के बाद आगे बढ़ीं।आगे जाने पर एक गन्ने के खेत से लक्ष्मी जी गन्ने तोड़कर रस चूसने लगीं।

4-उसी क्षण विष्णु जी आए और यह देख लक्ष्मी जी पर नाराज होकर उन्हें शाप दे दिया कि मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानी और किसान की चोरी का अपराध कर बैठी।अब तुम इस अपराध के जुर्म में इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो। ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए। तब लक्ष्मी जी उस गरीब किसान के घर रहने लगीं। एक दिन लक्ष्मीजी ने उस किसान की पत्नी से कहा कि तुम स्नान कर पहले मेरी बनाई गई इस देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तब तुम जो मांगोगी मिलेगा। 5-किसान की पत्नी ने ऐसा ही किया। पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया। लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया। किसान के 12 वर्ष बड़े आनंद से कट गए। फिर 12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं। विष्णुजी लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया। 6-तब विष्णुजी ने एक चतुराई की। विष्णुजी जिस दिन लक्ष्मी को लेने आए थे, उस दिन वारुणी पर्व था। अत: किसान को वारुणी पर्व का महत्त्व समझाते हुए भगवान ने कहा- 'तुम परिवार सहित गंगा में जाकर स्नान करो और इन कौड़ियों को भी जल में छोड़ देना। जब तक तुम नहीं लौटोगे, तब तक मैं लक्ष्मी को नहीं ले जाऊंगा।' 7-लक्ष्मीजी ने किसान को चार कौड़ियां गंगा के देने को दी। किसान ने वैसा ही किया। वह सपरिवार गंगा स्नान करने के लिए चला। जैसे ही उसने गंगा में कौड़ियां डालीं, वैसे ही चार हाथ गंगा में से निकले और वे कौड़ियां ले लीं। तब किसान को आश्चर्य हुआ कि वह तो कोई देवी है। तब किसान ने गंगाजी से पूछा-'माता! ये चार भुजाएं किसकी हैं?' गंगाजी बोलीं- 'हे किसान! वे चारों हाथ मेरे ही थे। तूने जो कौड़ियां भेंट दी हैं, वे किसकी दी हुई हैं?' किसान ने कहा- 'मेरे घर जो स्त्री आई है, उन्होंने ही दी हैं। 8-'इस पर गंगाजी बोलीं- 'तुम्हारे घर जो स्त्री आई है वह साक्षात लक्ष्मी हैं और पुरुष विष्णु भगवान हैं। तुम लक्ष्मी को जाने मत देना, नहीं तो पुन: निर्धन हो जाआगे।' यह सुन किसान घर लौट आया। वहां लक्ष्मी और विष्णु भगवान जाने को तैयार बैठे थे। किसान ने लक्ष्मीजी का आंचल पकड़ा और बोला- 'मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा। तब भगवान ने किसान से कहा- 'इन्हें कौन जाने देता है, परन्तु ये तो चंचला हैं, कहीं ठहरती ही नहीं, इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके। 9-इनको मेरा शाप था, जो कि 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं। तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है।' किसान हठपूर्वक बोला- 'नहीं अब मैं लक्ष्मीजी को नहीं जाने दूंगा। ' तब लक्ष्मीजी ने कहा-'हे किसान! तुम मुझे रोकना चाहते हो तो जो मैं कहूं जैसा करो। कल तेरस है, मैं तुम्हारे लिए धनतेरस मनाऊंगी। तुम कल घर को लीप-पोतकर स्वच्छ करना। रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना और सांयकाल मेरा पूजन करना और एक तांबे के कलश में रुपया भरकर मेरे निमित्त रखना, मैं उस कलश में निवास करूंगी। किंतु पूजा के समय मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूंगी। मैं इस दिन की पूजा करने से वर्ष भर तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी। मुझे रखना है तो इसी तरह प्रतिवर्ष मेरी पूजा करना।' यह कहकर वे दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं । 10-अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कथानुसार पूजन किया। उसका घर धनधान्य से पूर्ण हो गया। इसी वजह से हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा होने लगी।

धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी इस दिन का विशेष महत्त्व है।

NOTE;-

1-इस दिन आप चांदी के बर्तन जरूर खरीदें और दीपावली के दिन वास्तु सम्मत मां लक्ष्मी की पूजा में इसका उपयोग करें।यदि आपने धनतेरस के दिन खरीदी गई वस्तुओं को सही वास्तु जोन्स में रखा तो यह कई गुणा ज्यादा लाभ देती है।

2-पश्चिम जोन लाभ और प्राप्तियों का है इसलिए निवेश से जुड़े सारे कागजात, बैंकिंग के कागज आदि इसी जोन में रखें।धातु से बनी तिजोरी को पश्चिम जोन में रखें।

यह लाभ को बढ़ाने के साथ ही धन को भी नियंत्रित करता है।आप अगर सोना या या म्यूचुअल फंड, शेयर आदि में निवेश कर रहे हैं तो इसके कागजों को भी पश्चिम जोन में ही रखें।

3-वित्तीय सुरक्षा बनाने व धन को आकर्षित करने के लिए धनतेरस पर खरीदे गए चांदी के बर्तन का उपयोग दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन पर जरूर करें।

धनतेरस की पूजा विधि ;-

09 FACTS;- 1-पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार धनतेरस के दिन भगवान धन्‍वंतरि, मां लक्ष्‍मी, भगवान कुबेर और यमराज की पूजा का विधान है।लक्ष्‍मी पूजन करने से घर धन-धान्‍य से पूर्ण हो जाता है। इसी दिन यथाशक्ति खरीददारी और लक्ष्‍मी गणेश की प्रतिमा को घर लाना भी शुभ माना जाता है। कहते हैं कि इस दिन जिस भी चीज की खरीददारी की जाएगी उसमें 13 गुणा वृद्धि होगी। 2-- धनतेरस के दिन आरोग्‍य के देवता और आयुर्वेद के जनक भगवान धन्‍वंतरि की पूजा की जाती है। मान्‍यता है कि इस दिन धन्‍वंतरि की पूजा करने से आरोग्‍य और दीर्घायु प्राप्‍त होती है।इस दिन भगवान धन्‍वंतर‍ि की प्रतिमा को धूप और दीपक दिखाएं।साथ ही फूल अर्पित कर सच्‍चे मन से पूजा करें। 3-इस दिन यम पूजा का विधान भी है।मान्‍यता है कि धनतेरस के दिन संध्‍या काल में घर के द्वार पर दक्षिण दिशा में दीपक जलाने से अकाल मृत्‍यु का योग टल जाता है।इस दिन संध्‍या के समय घर के मुख्‍य दरवाजे के दोनों ओर अनाज के ढेर पर मिट्टी का बड़ा दीपक रखकर उसे जलाएं।दीपक का मुंह दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए। दीपक जलाते समय इस मंत्र का जाप करें:

मृत्‍युना दंडपाशाभ्‍यां कालेन श्‍याम्‍या सह| त्रयोदश्‍यां दीप दानात सूर्यज प्रीयतां मम ||

4- धनतेरस के दिन धन के देवता कुबेर की पूजा की जाती है।कुबेर स्थिर धन के प्रतीक माने जाते हैं, इसलिए धनतेरस पर उनकी पूजा होती है। भगवान शिव से उनको धनपति का वरदान प्राप्त है, इस वजह से पृथ्वी की संपूर्ण धन संपदा के वे स्वामी भी हैं। मान्‍यता है कि उनकी पूजा करने से व्‍यक्ति को जीवन के हर भौतिक सुख की प्राप्‍ति होती है।

ॐ श्रीं, ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्‍लीं श्रीं क्‍लीं वित्तेश्वराय नम:।।

5- धनतेरस के दिन मां लक्ष्‍मी की पूजा का विधान है।इस दिन मां लक्ष्‍मी के साथ

महालक्ष्‍मी यंत्र की पूजा भी की जाती है। पूजा के बाद इस मंत्र का उच्‍चारण करें...

ॐ कां सोस्मितां हिरण्य्प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मेस्थितां पदमवर्णां तामिहोप हवये श्रियम्॥ (4 )

जिस देवी का स्वरूप, वाणी और मन का विषय न होने के कारण अवर्णनीय है तथा जिसके अधरों पर सदैव मुस्कान रहती है, जो चारों ओर सुवर्ण से ओत प्रोत है एवं दया से आद्र ह्रदय वाली देदीप्यमान हैं। स्वयं पूर्णकाम होने के कारण भक्तो के नाना प्रकार के मनोरथों को पूर्ण करने वाली, कमल के ऊपर विराजमान ,कमल के सद्रश गृह मैं निवास करने वाली संसार प्रसिद्ध धन दात्री माँ लक्ष्मी को मैं अपने पास बुलाता हूँ।इस मन्त्र के दिव्य प्रभाव से मां लक्ष्मी की कृपा दृष्टि एवं संपत्ति की प्राप्ति होती है।

अथवा

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः | 6- अब आप घर में जिस स्‍थान पर पैसे और जेवर रखते हैं वहां पूजा करें।

7- धनतेरस के दिन आप सोना खरीदते हैं यह अच्छी बात है लेकिन याद रहे इस दिन आप झाड़ू खरीदें। क्योंकि झाडू़ ही आपके घर द्वार को स्वच्छ रखती है। इस दिन भगवान विष्णु, राम और लक्ष्मी के चरणों का आगमन आपके घर होता है। इसलिए धनतेरस के दिन झाड़ू का खरीदना बहुत शुभ माना जाता है। बताया जाता है कि इस दिन झाड़ू खरीदने से घर में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा घर में प्रवेश करती है। खरीदी गई झाड़ू का इस्तेमाल छोटी दिवाली के दिन करनी चाहिए।

8-परिवार में सभी का स्वास्थ्य सही रहे और समृद्धि बनी रहे इसके लिए धनतेरस के दिन 11 गोमती चक्र खरीदें। इन गोमती चक्र को आप पीले रंग के कपड़े में बांधकर तिजोरी, अलमारी या फिर ऐसी जगह रखें, जहां आप पैसा रखते हों।

9-धनतेरस के दिन धनिए के बीज खरीदना बहुत शुभ माना गया है। शास्त्रों में भी इसके बारे में बताया गया है। धनिए के बीज को दिवाली पूजन में माता लक्ष्मी को अर्पित करें और फिर उनको बगीचे में बो दें। कुछ बीज को बचाकर तिजोरी या फिर अलमारी में रख दें।

धनतेरस पूजा in NUTSHELL ;-

1-कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी का प्रारंभ 12 नवंबर को रात 09 बजकर 30 मिनट पर हो रहा है, जो अगले दिन 13 नवंबर को शाम 05 बजकर 59 मिनट तक है। ऐसे में इस साल धनतेरस 13 नवंबर दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा।धनतेरस के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त केवल 30 मिनट के लिए है। ऐसे में आपको अपनी पूजा इतने समय में पूर्ण कर लेनी चाहिए।धनतेरस पूजा मुहूर्त शाम को 05 बजकर 28 मिनट से 05 बजकर 59 मिनट तक है। मंत्र उच्चारण के बाद घर की तिजोरी या लॉकर की पूजा करें।इस दिन ही आपको यमराज के लिए दीपक भी दान करना होता है।

2-धनतेरस के दिन आप भगवान धन्वंतरि, कुबेर और महालक्ष्मी की तस्वीर या मूर्ति शुभ मुहूर्त में पूजा स्थान पर स्थापित करें।पीले रंगे हुए अक्षत् से त्रिकोण और उसके अंदर स्वास्तिक बनाकर उसके ऊपर स्‍वर्ण, चांदी, तांबे या मिट्टी का कलश रखें ।कलश में सुपारी,सात या ग्यारह चांदी के सिक्‍के और अक्षत डालें।स्थापना के बाद क्रमश: देवी लक्ष्मी, कुबेर और धन्वंतरि को अक्षत्, धूप, रोली, चंदन, सुपारी, पान का पत्ता, नारियल आदि अर्पित करें। फिर दक्षिण दिशा की ओर हाथ जोड़कर सच्‍चे मन से इनके मंत्रों का उच्चारण करें।

कुबेर पूजा मंत्र-

ओम श्रीं, ओम ह्रीं श्रीं, ओम ह्रीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय: नम:।

धन्वंतरि पूजा मंत्र-

ओम धन्वंतरये नमः॥

महालक्ष्मी पूजा मंत्र-

ॐ कां सोस्मितां हिरण्य्प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मेस्थितां पदमवर्णां तामिहोप हवये श्रियम्॥ (4 )

धनतेरस की तिथि:- शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

धनतेरस पूजन मुर्हुत - शाम 05:25 बजे से शाम 05:59 बजे तक

प्रदोष काल - शाम 05:25 से रात 08:06 बजे तक

वृषभ काल - शाम 05:33 से शाम 07:29 बजे तक

NOTE;-

इस दिन सोना खरीदने का शुभ मुहूर्त- सुबह 06:42 बजे से शाम के 05:59 बजे तक है। इस मुहूर्त में यदि आप सोना खरीदते हैं तो उसे बेहद शुभ माना जाएगा।धनतेरस के दिन सोने या चांदी के सिक्के खरीदें, उस पर लक्ष्मी माता और गणेश जी का चित्र बना होना चाहिए। इस सिक्के का दिवाली के दिन विधिपूर्वक पूजा करें और अपने तिजोरी में रख दें।यह आपके धन-सं​पत्ति के लिए शुभ फलदायी होगा।

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