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क्या हैं 'सौन्दर्य-लहरी’ और श्री यंत्र का अद्भुत रहस्य ?

'सौन्दर्य-लहरी’;-

16 FACTS;-

1-सौन्दर्य-लहरी’ --शाब्दिक अर्थ सौन्दर्य का सागर,संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है। आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य। निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में।

2-सौन्दर्यलहरी आदि शंकराचार्य तथा पुष्पदन्त द्वारा संस्कृत में रचित महान साहित्यिक कृति है। इसमें माँ पार्वती के सौन्दर्य, कृपा का 103 श्लोकों में वर्णन है।वास्तव में इसके दो खण्ड हैं.....आनन्द लहरी और सौन्दर्य लहरी। इन दोनों को एकत्र करके ही सौन्दर्य लहरी का नाम दिया गया है। इसमें प्रस्तुत स्तुति बहुत ही प्रभावी और रहस्यों से परिपूर्ण है। इससे कई साधनांए एवं ऐसे प्रयोग सिद्ध होते है ।

3-सौन्दर्यलहरी केवल काव्य ही नहीं है, यह तंत्रग्रन्थ है। जिसमें पूजा, यन्त्र तथा भक्ति की तांत्रिक विधि का वर्णन है। इसके दो भाग हैं-

आनन्दलहरी - श्लोक 1 से 41 सौन्दर्यलहरी - श्लोक 42 से 103 4-आदि शंकराचार्य ने जब तंत्राचार्य अभिनव शास्त्री को शास्त्रों में हराया तो उसने उनको मारने की धमकी दी । दूसरे ही दिन शंकरा को भगंदर हो गया।जब सेवा छोड़कर सुरेश्वर ने गुरुदेव से रहस्य पूछा तो बताया “कुछ नहीं. अभिमानी तांत्रिक ने अपनी पराजय का प्रायश्चित कराया है, शंकर से, एकांत वन की गुफा में बैठा वह मारण प्रयोग में लिप्त है ''...और उनके प्राण जाने का समय हो गया तब उस घाव को भरने के लिए आदि शंकराचार्य के मुख से सौंदर्य लहरी के श्लोक फूटे ।अंतिम सौंवा श्लोक निकलते ही शंकरा का घाव भर गया। 5-माता भगवती त्रिपुरसुन्दरी लाड़ले पुत्र आदि शंकराचार्य को स्वयं भगवती ने अपना दूध पिलाकर सब विद्याओं में पारंगत होने का वरदान दिया था ।भगवान शिव की इच्छा और भगवती की आज्ञा से आपने वेदों मैं गुप्त रूप से निहित शताक्षरी महाविद्या का क्रमबद्ध व्यवस्थित विवरण सौन्दर्यलहरी के 100 श्लोकों में प्रस्तुत किया है। ज्योतिष के गूढ़ अर्थ को खोलने वाली इस अनूठी और अकेली प्रस्तुत रचना में साधकों , भक्तों और पीडित व्यथित जनों के लिए इन मोतियों को पिरोया है ।ज्योतिष के गुप्त अर्थों एवं काज सवारने के उपायों का पूरा खुलासा है। 6-मनोरथ पूर्ति एवं सर्वत्र सफलता पाने का कल्पतरु प्रत्येक श्लोक के पाठ करने भर से अनेक मनोरथ पूर्ण हो जाते है।इसमें है...आसान सात्विक विधि, श्रीयंत्र के सब रहस्यों का खुलासा : पिंड और ब्रह्माण्ड : शिव शक्ति संयोग ;ब्रह्माण्ड भगवती का शरीर, सूर्य चंद्र अग्नि तीन नेत्र , मंगल आदि पांच ग्रह इन्द्रियां; राशि नक्षत्र चक्र भगवती के गले का मुक्ताहार , राहु केतु हार की दो कोर ;श्रीयंत्र के भीतरी 43 कोण : 16 तिथि ;27 नक्षत्र चवालीसवाँ कोण : स्वयं चंद्र सूर्य या लगन बाहरी 8 कोण : 8 पहर , 10 कोण, 10 दिशाएं पुनः 10 कोण: दस वर्ग , 14 कोण : निराधार कपोल कल्पना से परे 14 लोक : वेदों उपनिषदों के पुख्ता प्रमाण : दुर्गम कठिन असंभव लक्ष्य पाने के सुगम सोपान ;रोगी ,भोगी, पीड़ित ,दुखियारे जनो ,छात्र, प्रौढ़ ,वृद्ध ,स्त्री सबके लिए बहुत कुछ : यश धन समृद्धि मान सम्मान प्रतिष्ठा पदवी पाने के आसान उपायआदि

7-श्री शंकराचार्य ने सौन्दर्य लहरी में भगवती के सगुण रूप की उपासना की हैं । इस महनीय ग्रंथ में पद पद में मन्त्रत्व निहित हैं । यन्त्र तथा तन्त्र की दृष्टि से मंत्रो की व्याख्या प्राचीन टीकाओं में विशद रूप में की गई हैं । टीकाओं का अध्ययन करने से ज्ञात होता हैं कि भगवान् शंकराचार्य के पदावली में देवी के अनन्त रहस्य उनकी शक्तियाँ तथा महिमा प्रकाशित हैं। श्रीशंकर के समस्त वेदान्त दर्शन का प्रति पादन सौन्दर्यलहरी में देखा जा सकता हैं। शिव और शक्ति के अभेद तथा परस्पर अपेक्षिता तथा शक्ति के कल्याणकारी स्वरूप का दर्शन सौन्दर्यलहरी में जिस प्रकार से प्राप्त होता हैं । वैसे अन्यत्र कहीं नहीं हैं। 8-दुर्गासप्तशती में शक्ति के ओजस्वी स्वरूप का दर्शन होता हैं। शत्रुनाश करने में दक्ष भगवती के स्वरूप को ऋषि ने प्रकाशित किया हैं । भोग तथा उपवर्ग दोनों को देने वाली भगवती दुर्गा भक्त के समस्त तापों का नाश करती हैं। वे ज्ञान तथा विज्ञान दोनों ही देने वाली हैं। शंकराचार्य की सौन्दर्य लहरी में सम्पूर्ण सत्य , सुन्दर तथा शिव का भूमा रूप देखने को

मिलता हैं।जिस ब्रहा को निगुर्ण निराकार कहकर अदैत सिध्दान्त को स्थापना हुई उसी ब्रहा का परम ललित नारी रूप सौन्दर्य लहरी में प्रकाशित हुआ। जो भक्ति रहित तर्कनायें थीं वे सबके सब भक्ति रस में डूबी स्तुतिया बन गई। 9-जिस शक्ति स्वरूपा त्रिपुर सुन्दरी के बिना वह परमशिव भी शव की भाति निषिक्रय तथा असुन्दर हो जाता है उसकी स्तुति करने का सौभाग्य उसी को प्राप्त होता है जिसका पुण्य उदय होता है। श्रीशंकराचार्य भगवती के शिशुभाव को प्राप्त हो गये है। भगवती के स्तनों से स्वतः स्पन्दमान रसामृत का सागर उमड़ पड़ा है । अपने नवजात शिशु को माता की भांति भगवती गिरीश कन्या ने द्रविड़ प्रदेश में उत्पन्न हुए आचार्य को कृपा करके पिला दिया है । तभी तो वह प्रौढ़ कवि बनकर सौनदर्यलहरी काव्य की सृस्टि करने वाले हो गये है। 10-भगवती के जिन चरणों को वेद अपना शिरो भूषण मानकर मस्तक पर धारण करते हैं तथा जिन चरणों से उतरे जल को भगवान शिव अपने जटाजूट प्रवाहित करते हैं और जिन चरणों में सजे हुए लाक्षारस की शोभा का वैभव भगवान विष्णु के सिर पर अंकित होता है उन चरणों को भक्त कवि अपने सिर पर धारण करने की आकांक्षा रखता है । 11-भगवती ललिता त्रिपुर सुन्दरी , सुधासागर के बीच देव वृक्षो की वाटिका से आवृत मणियों के दीप में नीप के उपवन से धिरे चिन्तामणि के मन्दिर में शिवाकार मंचपर स्थित परमशिवरूप पचांग पर नित्य विराजमान हैं जिनके अंग - अंग सेचिदानन्द की आभाप्रवाहित हो रही हैं। भक्त कवि श्री शंकराचार्य उन्हीं महेश्वरी का भजन कीर्तन करने में प्रवृत्त हैं । सौन्दर्यलहरी शरणागति एवं प्रेमाभक्ति की परकाष्ठा का निदर्शन हैं। जहाँ शक्ति शिव का शरीर हैं जिसमें चन्द्र - सूर्य ही उरोज हैं। शिव और शक्ति में शेष और शेषी का सम्बंध शाश्वत हैं । दोनो समरसता और शक्ति में शेष और शेषी का सम्बंध शाश्वत हैं । दोनो समरसता और परानन्द में पर्यवसित हैं। 12-सौन्दर्य लहरी शंकराचार्य की विलक्षण कृति है जो स्तोत्र काव्य के गुणों से तो समलकृत है ही तन्त्र और दर्शन का भी अनूठा ग्रंथ है । इसमें भगवती जगदम्बा का आघाशक्ति तथा उसमे भी बढ़कर साक्षात चिति शक्ति के रूप में निरूपण हुआ है ।वेदान्त की दृष्टि से वही शक्ति कारण ब्रह्म है तथा प्रकृति की राजस , सात्विक एवं तामस रुपी करयित्री पालयित्री एवं नारयित्री शक्तियों से संवलित ब्रह्मा , विष्णु एवं महेश के रूप में कार्यब्रहा है । सौन्दर्यलहरी मुख्यतः कलात्मक रचना है इसमें भगवती जगदम्बा के अनिन्ध सौन्दर्य का नखशिख चित्रण करते हुए उनके प्रति भक्ति भावना की बड़ी ही पुष्कल अभिव्यक्ति हुई है । 13-सौन्दर्यलहरी मूल रूप से एक प्रबल भक्ति भावना प्रधान काव्य है यघपि इसमें तान्त्रिक विचारों का भी समावेश देखा जाता है । ईश्वर के विषय में वैदिक एवं तान्त्रिक विचारधराओं में कोई अंतर नहीं होता है । तन्त्र में शिव और शक्ति की जो अवधारणा है वह पुरुष और प्रकृति की वैदिक विचारधारा तथा अदैत वेदान्त की ब्रहा एवं माया विषयक विचारधारा से भिन्न नहीं है। विवेकानन्द के शब्दों में परब्रहा का कोई आकार नहीं होता है किन्तु जो परम शक्ति है वह नारी स्वरूपा है। जब शक्ति साकार होती है तब वह मातृशक्ति स्वयं गतिशील है और वह ब्रहा को भी गतिशील बना देती है। वह परमसत्ता की शान्त जलराशि में लहरी का क्षोभ उत्पन्न कर देती है । इसी गत्यात्मक शक्ति के बल से वह निराकार अनन्त परमात्मा नाम रूपतामक सृष्टि में परिवर्तित हो जाता है | 14-शक्ति के बिना शिव की कल्पना नहीं की जा सकती हैं और न ही बिना शिव के शक्ति की कल्पना सम्भव हैं ये दोनों शिव और शक्ति अपने आप में एक हैं । दोनों सत चित औरआनंद हैं।भारतीय दर्शन में किसी भी व्यक्ति के लिए अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति करना होता है। वेद और उपनिषद से निर्मित ये दर्शन “व्यक्ति” यानि Individual, “समस्ति” यानि Society, “सृष्टि” यानि Creation या Universe और “परमेष्टि” यानि ईश्वर, को एक दूसरे से जुड़ा हुआ मानता है। हम उसे टुकड़ों में नहीं देखते। एक अखण्‍ड रूप देखते है। एकात्‍म रूप देखते हैं। यही दर्शन इस धरती को जगत-माता के तौर पर मान्यता देता है। ये दर्शन कहता है कि पृथ्वी हर किसी की है ,मां है। इसी दर्शन से निकला “वसुधैवकुटुंबकम” ही तो भावना उजागर करती है कि ये पूरा विश्व एक परिवार है।

15-ऐसे ही, सौंदर्य लहरी का भी एक मंत्र है- “फल: अपिवान्छा समाधिकम” यानि धरती से हम जितना मांगते हैं, जितनी हमारी इच्छा होती है, वो हमें उससे भी ज्यादा ही देती है। कितना बड़ा सत्य, कितने साधारण शब्दों में। प्रकृति से हम सभी को पर्याप्त पानी, वायु, नदी, अन्न, खनिज, पेड़-पौधे, सब कुछ पर्याप्त भंडार मिला हुआ है। आवश्कता है तो इस वरदान को सहेज कर रखने की। 16-पुरानी मान्‍यता है कि जब एक ही जगह पर, एक ही स्‍वर में, एकजुट होकर मंत्र का जाप किया जाए तो उस जगह ऊर्जा का ऐसा चक्र निर्मित होता है, जो मनमंदिर, शरीर, आत्‍मा सभी को अपनी परिधि में ले लेता है। नाद-ब्रह्म की कल्‍पना हमारे यहां उसी संदर्भ में स्‍वीकृत की गई है। आधुनिक विज्ञान भी नाद-ब्रह्म के सामर्थ्‍य का, मंत्रों के उच्‍चारण की ताकत का इन्‍कार नहीं करता है। दक्षिणामूर्ति स्‍त्रोत और सौन्‍दर्य लहरी के अदभुत पाठ से पूरे वातावरण में ऊर्जा, एक दिव्‍य अनुभूति महसूस होती है। जिसमें रस भी है, रहस्‍य भी है और ईश्‍वर के साथ रम जाने की अदम्‍य इच्‍छा भी है।

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श्री यंत्र का अद्भुत रहस्य;-

11 FACTS;-

1-श्रीयंत्र या श्रीचक्र ऐसा पवित्र ज्यामितिय प्रतिरूप है, जिसका उपयोग सहस्राब्दियों तक साधकों और उनके अनुगामियों ने ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने के लिए किया। नवचक्रों से बने इस यंत्र में चार शिव चक्र, पांच शक्ति चक्र होते हैं। इस प्रकार इस यंत्र में 43 त्रिकोण, 28 मर्म स्थान, 24 संधियां बनती हैं। तीन रेखा के मिलन स्थल को मर्म और दो रेखाओं के मिलन स्थल को संधि कहा जाता है। अद्वैत वेदान्त के सिद्दान्तों के मुताबिक यह ज्यामितिय पद्धति सृष्टि (जो आप चाहते हैं) या विनाश (जो आप नहीं चाहते) के विज्ञान में महारत हासिल करने की कुंजी है।

2-श्रीयंत्र के आध्यात्मिक ज्यामितिय प्रतिरूपों को जानने और समझने वाले लोगों की संख्या गिनी-चुनी है। ऐसे लोग या तो किसी योगी से संबद्ध होते हैं या फिर तंत्र के श्री विद्या शिक्षण संस्थान से जुड़े होते हैं। ये लोग आदि शक्ति देवी जगदम्बा के उपासक होते हैं।

3-भगवान शिव ने बताया कि यह त्रिपुर सुंदरी का आराधना स्थल है। श्रीयंत्र में बना चक्र ही देवी का निवास स्थान है और उनका रथ भी यहीं है। इस यंत्र में देवी स्वयं विराजती हैं. तभी से इस श्रीयंत्र की पूजा का विधान चला आ रहा है।

4-यह परम ब्रह्म स्वरूपिणी आदि प्रकृतिमयी देवी भगवती महात्रिपुर सुंदरी का आराधना स्थल है। यह चक्र ही उनका निवास एवं रथ है। यह ऐसा समर्थ यंत्र है कि इसमें समस्त देवों की आराधना-उपासना की जा

सकती है।इस महाचक्र का बहुत विचित्र विन्यास है। यंत्र के मध्य में बिंदु है, बाहर भूपुऱ, भुपुर के चारों तरफ चार द्वार और कुल दस प्रकार के अवयय हैं, जो इस प्रकार हैं- बिंदु, त्रिकोण, अष्टकोण, अंतर्दशार, वहिर्दशार, चतुर्दशार, अष्टदल कमल, षोडषदल कमल, तीन वृत्त, तीन भूपुर।

5-इसमें चार उर्ध्व मुख त्रिकोण हैं, जिसे श्री कंठ या शिव त्रिकोण कहते हैं। पांच अधोमुख त्रिकोण होते हैं, जिन्हें शिव युवती या शक्ति त्रिकोण कहते हैं। आदि शंकराचार्य ने सौंदर्य लहरी में कहा हैं-

चतुर्भि: श्रीकंठे: शिवयुवतिभि: पश्चभिरपि

6-नवचक्रों से बने इस यंत्र में चार शिव चक्र, पांच शक्ति चक्र होते हैं। इस प्रकार इस यंत्र में 43 त्रिकोण, 28 मर्म स्थान, 24 संधियां बनती हैं। तीन रेखा के मिलन स्थल को मर्म और दो रेखाओं के मिलन स्थल को संधि कहा जाता है।

7-श्रीयंत्र बिंदु, त्रिकोण, वसुकोण, दशार-युग्म, चतुर्दशार, अष्ट दल, षोडसार, तीन वृत तथा भूपुर से निर्मित है। इसमें 4 ऊपर मुख वाले शिव त्रिकोण, 5 नीचे मुख वाले शक्ति त्रिकोण होते हैं। इस तरह त्रिकोण, अष्टकोण, 2 दशार, 5 शक्ति तथा बिंदु, अष्ट कमल, षोडश दल कमल तथा चतुरस्त्र हैं। ये आपस में एक-दूसरे से मिले हुए हैं। यह यंत्र मनुष्य को अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष देने वाला है।

8-श्री यंत्र में 9 त्रिकोण या त्रिभुज होते हैं जो निराकार शिव की 9 मूल प्रकृतियों के द्योतक हैं। मुख्यतः दो प्रकार के श्रीयंत्र बनाए जाते हैं – सृष्टि क्रम और संहार क्रम। सृष्टि क्रम के अनुसार बने श्रीयंत्र में 5 ऊध्वर्मुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शिव त्रिकोण कहते हैं। ये 5 ज्ञानेंद्रियों के प्रतीक हैं। 4 अधोमुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शक्ति त्रिकोण कहा जाता है। ये प्राण, मज्जा, शुक्र व जीवन के द्योतक हैं। संहार क्रम के अनुसार बने श्रीयंत्र में 4 ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण शिव त्रिकोण होते हैं और 4 अधोमुखी त्रिकोण शक्ति त्रिकोण होते हैं।

9-श्री यंत्र में 4 त्रिभुजों का निर्माण इस प्रकार से किया जाता है कि उनसे मिलकर 43 छोटे त्रिभुज बन जाते हैं जो 33 देवताओं और 12 असुरो का प्रतिनिधित्व करते हैं। मध्य के सबसे छोटे त्रिभुज के बीच एक बिंदु होता है जो समाधि का सूचक है अर्थात यह शिव व शक्ति का संयुक्त रूप है। इसके चारों ओर जो 43 त्रिकोण बनते हैं वे योग मार्ग के अनुसार यम 10, नियम 10, आसन 8, प्रत्याहार 5, धारणा 5, प्राणायाम 3, ध्यान 2 के स्वरूप हैं।

10-महाविद्या त्रिपुरसुंदरी महालक्ष्मी का सिद्ध यंत्र है। यह यंत्र सही अर्थों मे यंत्रराज है। इस यंत्र को स्थापित करने का तात्पर्य श्री को अपने संपूर्ण ऐश्वर्य के साथ आमंत्रितकरना होता है। कहा गया है कि :-

जो साधक श्री यंत्र के माध्यम से त्रिपुरसुंदरी महालक्ष्मी की साधना के लिए प्रयासरत होता है, उसके एक हाथ मे सभी प्रकार के भोग होते है, तथा दूसरे हाथ मे पूर्ण मोक्ष होता है। आशय यह कि श्री यंत्र का साधकसमस्त प्रकार के भोगो का उपभोग करता हुआ अंत मे मोक्ष को प्राप्त होता है। इस प्रकार यह एकमात्र ऐसी साधना है जो एक साथ भोग तथा मोक्ष दोनो ही प्रदान करती है, इसलिए प्रत्येक साधक इस साधना को प्राप्त करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता है।

11-श्री यंत्र के स्थापन मात्र से भगवती लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।पूरे विधि विधान से इसका पूजन यदि प्रत्येक दीपावली की रात्रि को संपन्न कर लिया जाय तो उस घर मे साल भर किसी प्रकार की कमी नही होती है।श्री यंत्र पर ध्यान लगाने से मानसिक क्षमता मे वृद्धि होती है।उच्च यौगिक दशा में यह सहस्रार चक्र के भेदन मे सहायक माना गया है।

प्रत्येक त्रिकोण एवं कमल दल का महत्व;-

03 FACTS;-

1-इन त्रिभुजों के बाहर की तरफ 8 कमल दल का समूह होता है जिसके चारों ओर 16 दल वाला कमल समूह होता है। इन सबके बाहर भूपुर है। मनुष्य शरीर की भांति ही श्री यंत्र की संरचना में भी 9 चक्र होते हैं जिनका क्रम अंदर से बाहर की ओर इस प्रकार है- केंद्रस्थ बिंदु फिर त्रिकोण जो सर्वसिद्धिप्रद कहलाता है।

2-फिर 8 त्रिकोण सर्वरक्षाकारी हैं। उसके बाहर के 10 त्रिकोण सर्व रोगनाशक हैं। फिर 10 त्रिकोण सर्वार्थ सिद्धि के प्रतीक हैं। उसके बाहर 14 त्रिकोण सौभाग्यदायक हैं। फिर 8 कमलदल का समूह दुःख, क्षोभ आदि के निवारण का प्रतीक है। उसके बाहर 16 कमलदल का समूह इच्छापूर्ति कारक है।

3-अंत में सबसे बाहर वाला भाग त्रैलोक्य मोहन के नाम से जाना जाता है। इन 9 चक्रों की अधिष्ठात्री 9 देवियों के नाम इस प्रकार हैं – 1. त्रिपुरा 2. त्रिपुरेशी 3. त्रिपुरसुंदरी 4. त्रिपुरवासिनी, 5. त्रिपुरात्रि, 6. त्रिपुरामालिनी, 7. त्रिपुरसिद्धा, 8. त्रिपुरांबा और 9. महात्रिपुरसुंदरी।

...SHIVOHAM...