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तीर्थयात्रा का क्या अर्थ है?क्या महत्व है तीर्थो का?


तीर्थयात्रा का क्या अर्थ है?-

04 FACTS;-

1-तीर्थ” शब्द का आधुनिक तरीके से अर्थ निकाला जाए तो “ती” शब्द से तीन और “र्थ” शब्द से अर्थ निकलता है। इस तरह से इसका अर्थ बनता है “तीन अर्थो की सिद्धि” यानि जिससे तीन पदार्थो की प्राप्ति हो उसे तीर्थ कहते है।इन चारो में 'अर्थ '(धन) तो तीर्थ यात्रा करने में खर्च होता है।धर्म, काम और मोक्षं इन तीनो की प्राप्ति तीर्थ यात्रा से हो जाती है। लोगो की तीरथ यात्रा करने के पिछे अलग अलग मंशा होती है। जो मनुष्य सात्विक है ,वो केवल मोक्षं के लिए तीर्थ यात्रा करते है। जो व्यक्ति सात्विक और राजसी वृत्ति के है ,वे धर्म के लिए तीर्थ यात्रा करते है।और जो व्यक्ति केवल राजसी वृत्ति के है , वे संसारिक और परलौकिक कामनाओ की सिद्धि के लिए तीर्थ यात्रा करते है।परंतु जो व्यक्ति निष्काम भाव से यात्रा करते है। केवल उन्हें ही मोक्षं प्राप्त होता है। जो व्यक्ति सकाम भाव से तीरथ यात्रा करते है। उन्हे इस लोक में स्त्री- पुत्र आदि और परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति होती है। परंतु उन्हे मोक्षं प्राप्त नही हो सकता।

2-इस संसार में जितने भी तीर्थ है। वो सभी भगवान और भक्तो के साथ से ही बने है अथार्त भक्त बिना भगवान नही, भगवान बिना भक्त नही, और इन दोनो के बिना तीर्थ नही। तीरथ यात्रा का असली मकसद तो आत्मा का उद्धार करना है। इस लोक और परलोक के भोगो की प्राप्ति के लिए और भी बहुत से साधन है। इसलिए हर व्यक्ति को चाहिए कि वह भोगो की प्राप्ति के लिए तीरथ यात्रा न करे। बल्कि आत्मा के कल्याण के लिए तीर्थ यात्रा करे। और जो लोग आत्मा के कल्याण के लिए श्रद्धा व भक्तिपूर्वक नियम का पालन करते हुए तीरथ यात्रा करते है। उसे मोक्षं की प्राप्ति के साथ अन्य लाभ भी होता है।

3-भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने हेतु आदि शंकराचार्य नें भारत के चार दिशाओं में चार धामों की स्थापना की।उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूरब में जगन्नाथपुरी एवं पश्चिम में द्वारका - हिन्दुओं के चार धाम हैं। पूर्व में हिन्दू इन धामों की यात्रा करना अपना पवित्र कर्तव्य मानते थे। कालान्तर में हिन्दुओं के नये तीर्थ आते गये हैं।

मुसलमानों के लिए मक्का और मदीना महत्त्वपूर्ण तीर्थ हैं और इन जगहों पर जीवन में एक बार जाना हर मुसलमान के लिए ज़रूरी है। इसके अतिरिक्त कई तीर्थ महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तियों के जीवन से भी सम्बन्धित हो सकते हैं।

4-उस नदी, सरोवर, मंदिर या भूमि को तीर्थ कहा जाता है ;जहां ऐसी दिव्य शक्तियां है कि उनके संपर्क में जाने से मनुष्य के पाप अज्ञात रूप से नष्ट हो जाते है।3 प्रकार के तीर्थ ऐसे है जो अपने स्थान सदा के लिए स्थित है। और मनुष्य खुद चलकर उनके पास जाता है। जैसे:- नित्य तीर्थ, भगवदीय तीर्थ, और संत तीर्थ।अब हम इन तीर्थो के बारे में विस्तार से जानते है:–

4-1-नित्य तीर्थ

नित्य तीर्थ वो होते है जहां की भूमि में सृष्टि के प्रारम्भ से ही दिव्य और पावनकारी शक्तियां है। अर्थात जिस स्थान पर इस सृष्टि के प्रारंम्भ से ही ईश्वर किसी न किसी रूप में वास करते है। उदाहरण के लिए जैसे:– कैलाश, मानसरोवर, काशी आदि नित्य तीर्थ है। इसी तरह गंगा, यमुना, नर्मदा, कावेरी आदि पवित्र नदियां भी नित्य तीर्थ की श्रेणी में आती है।

4-2-भगवदीय तीर्थ

भगवदीय तीर्थ वो तीर्थ है।जहां भगवान ने किसी न किसी रूप में अवतार लिया हो। या उन्होने वहा कोई लीला की हो। या फिर भगवान ने अपने किसी भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर दर्शन दिए हो या भक्त की प्राथना पर सदा के लिए वहां वास किया हो, यह सभी स्थल भगवदीय तीर्थ है। इस धरती पर भगवान के चरण जहां जहां पडे वह भूमि दिव्य हो गई। अत: ऐसे सभी स्थल भगवदीय तीर्थ की श्रेणी में आते है। उदाहरण के लिए जैसे:- 12 ज्योतिर्लिंग, वृंदावन, अयोध्या, आदि।

4-3-संत तीर्थ

जो जीवन्मुक्त, देहातीत, परमभागवत या भगत्प्रेम तन्मय संत है। उनका शरीर भले ही पांच भौतिक तत्वो से निर्मित और नश्वर हो, किंतु उस देह में भी संत के दिव्यगुण ओत-प्रोत है। उस देह से उन दिव्य गुणो की उर्जा सदा बाहर निकलती रहती है। और जो वस्तुए, मनुष्य, भूमि आदि जो भी उसके संपर्क में आता है। वह उर्जा उसको प्रभावित करती है। इसलिए संत के चरण जहां जहां पडते है, वह भूमि तीर्थ बन जाती है। संत की जन्म भूमि, संत की साधना भूमि, संत की देहत्याग भूमि विशेष रूप से पवित्र है।

क्या महत्व है तीर्थो का?-

10 FACTS;-

1-तीर्थ हमारी ऐसी व्‍यवस्‍थाएं है जिससे हम अंतरिक्ष के जीवन से संबंध स्‍थापित नहीं करते बल्‍कि इस पृथ्‍वी पर ही जो चेतनाएं विकसित होकर विदा हो गयीं, उनसे पुन:-पुन: संबंध स्‍थापित कर सकते है।और इस संभावनाओं को बढ़ाने को बढ़ाने के लिए बाईस तीर्थंकर का सम्‍मेत शिखर पर जाकर समाधि लेना, गहरा प्रयोग था।'सम्मेद शिखर' झारखण्ड राज्य के गिरिडीह ज़िले में स्थित है।यह जैन तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। वह इस चेष्‍टा में था कि उस स्‍थल पर इतनी सघनता हो जाए कि संबंध स्‍थापित करने आसान हो जाएं। उस स्‍थान से दूसरे लोक में इतनी चेतनाएं यात्रा करें , कि उस स्‍थान और दूसरे लोक के बीच सुनिश्चित मार्ग बन जाएं। वह सुनिश्चित मार्ग रहा है।

2-और जैसे जमीन पर सब जगह एक सी वर्षा नहीं होती, घनी वर्षा के स्‍थल है, विरल वर्षा के स्‍थल है। रेगिस्‍तान है जहां कोई वर्षा नहीं होती, और ऐसे स्‍थान है जहां पाँच सौ इंच वर्षा होती है। ऐसी जगह है जहां ठंडा है सब और बर्फ के सिवाए कुछ भी नहीं है, और ऐसे स्‍थान है जहां सब गर्म हे। और बर्फ भी नहीं बन सकती।ठीक वैसे ही पृथ्‍वी पर चेतना की डैंसिटी और नान-डेंसिटी के स्‍थल है।और उनको बनाने की, निर्मित करने की कोशिश की गई है।क्‍योंकि वह अपने आप निर्मित नहीं होंगे,वह मनुष्‍य की चेतना से निर्मित होंगे।

3-जैसे सम्‍मेत शिखर पर बाईस तीर्थ करों का यात्रा करके, समाधि में प्रवेश करना, और उसी एक जगह से शरीर को छोड़ना, उस जगह पर इतनी घनी चेतना को प्रयोग है कि वह जगह विशेष अर्थों में चार्जड हो जाएगी ।एक तीर्थकर ने वहाँ अपनी समाधि लगाई उनके हजारों वर्षों बाद हुए दूसरे तीर्थंकर और दूसरे के बाद तीसरे, यों पूरे बीस तीर्थकरों ने वहाँ निर्वाण प्राप्त किया । एक तीर्थकर की विद्युत धारा क्षीण होती, तब दूसरे तीर्थकर ने पुन: उसे अभिसंचित कर दिया । लाखों वर्षों से वह स्थान स्पन्दित, जागॄत और अभिसंचित होता रहा ।चेतना कीकॊ ज्योति वहाँ सदा अखण्ड बनी रही ।और वहां कोई भी बैठे उस जगह पर और उन विशेष मंत्रों का प्रयोग करे जिन मंत्रों को उन बाईस लोगों ने किया है तो तत्‍काल उसकी चेतना शरीर को छोड़कर यात्रा करनी शुरू कर देगी। वह प्रक्रिया वैसी ही विज्ञान की है जैसी कि और विज्ञान की सारी प्रक्रियाएं है।

4-उदाहरण के लिए मुसलमानों का तीर्थ है-काबा। काबा में मुहम्‍मद के वक्‍त तक तीन सौ पैंसठ मूर्तियां थी। और हर दिन की एक अलग मूर्ति थी। वह तीन सौ पैंसठ मूर्तियां हटा दी गयी।लेकिन जो केंद्रीय पत्‍थर था मूर्तियों का, जो मंदिर को केंद्र था, वह नहीं हटाया गया। तो काबा मुसलमानों से बहुत ज्‍यादा पुरानी जगह है। मुसलमानों की तो उम्र है…..चौदह सौ वर्ष।

लेकिन काबा में लाखों वर्ष पुराना पत्‍थर है जो जमीन का नहीं है। वह पत्‍थर

जमीन का पत्‍थर नहीं है।तो सीधा व्‍याख्‍या तो यह है कि यह उल्‍का पात में गिरा होगा। लेकिन जो और गहरे जानते है। उनका मानना है, वह उल्‍कापात में गिरा पत्‍थर नहीं है।

5-जैसे हम आज जाकर चाँद पर जमीन के चिन्‍ह छोड़ आए है- वे वहीं बनी रहेंगी, सुरक्षित रहेंगी। उन्‍हें बनाया भी इस ढंग से गया है कि लाखों वर्षो तक सुरक्षित रह सकें।वह पत्‍थर पृथ्‍वी पर किन्‍हीं और ग्रहों के यात्रियों द्वारा छोड़ा गया पत्‍थर है। और उस पत्‍थर के माध्‍यम से उस ग्रह के यात्रियों से संबंध स्‍थापित किए जा सकते थे। लेकिन पीछे सिर्फ उसकी पूजा रह गयी। उसका पूरा विज्ञान खो गया; क्‍योंकि उससे संबंध के सब सूत्र खो गए।

काबा का पत्‍थर उन छोटे से उपकरणों में से एक है जो कभी दूसरे अंतरिक्ष के यात्रियों ने छोड़ा और जिनसे कभी संबंध स्थापित हो सकते थे।

6- कुछ तीर्थ तो बिलकुल सनातन हैं- वहां कोई जाएगा तो मुक्त होगा,स्मृति से मुक्त होगा, और स्मृति ही तो बंधन है। वह स्वप्न जो आपने देखा, आपका पीछा कर रहा है और निश्‍चित ही उससे छुटकारा हो सकता है।लेकिन उस छुटकारे के लिए जरूरी हैं कि आपकी ऐसी निष्ठा हो कि मुक्ति हो जाएगी।और आपकी निष्ठा तभी होगी जब आपको ऐसा खयाल हो कि लाखों वर्ष से ऐसा वहां होता रहा है और कोई उपाय नहीं है।

7-पृथ्वी पर कोई ऐसा समय नहीं रहा जब काशी तीर्थ नहीं थी। वह एक अर्थ में बिलकुल सनातन है। यह आदमी का पुराने से पुराना तीर्थ है। उसका मूल्य बढ़ जाता है, क्योंकि उतनी बड़ी धारा, सजेशन है। वहां कितने लोग मुक्त हुए, वहां कितने लोग शांत हुए हैं, वहां कितने लोगों ने पवित्रता को अनुभव किया है, वहां कितने लोगों के पाप झड़ गए-वह एक लंबी धारा है। वह सुझाव गहरा होता चला जाता है, वह सरल चित्त में जाकर निष्ठा बन जाएगी। वह निष्ठा बन जाए तो तीर्थ कारगर हो जाता है। वह निष्ठा न बन पाए तो तीर्थ बेकार हो जाता है। तीर्थ आपके बिना कुछ नहीं कर सकता, आपका कोआपरेशन चाहिए। लेकिन आप भी कोआपरेशन तभी देते हैं कि जब तीर्थ की एक धारा हो, एक इतिहास हो।

8- शास्त्र कहते हैं, काशी इस जमीन का ,पृथ्वी का हिस्सा नहीं है, वह अलग ही टुक्का है। वह शिव की नगरी अलग ही है, सनातन है।सब नगर बनेंगे, बिगड़ेंगे, काशी बनी रहेगी। इसलिए व्यक्ति तो खो जाते हैं -बुद्ध काशी आए, जैनों के तीर्थंकर काशी में पैदा हुए, खो गए। काशी ने सब देखा -शंकराचार्य आए, खो गए। कबीर बसे, खो गए। काशी ने तीर्थंकर देखे, अवतार देखे, संत देखे, सब खो गए। उनका तो कहीं कोई निशान नहीं रह जाएगा, लेकिन काशी बनी रहेगी। वह उन सब की पवित्रता को, उन सारे लोगों के पुण्य को, उन सारे लोगों की जीवन धारा को, उनकी सब सुगंध को आत्मसात कर लेती है और बनी रहती है।

9-यह जो स्थिति है, यह निश्‍चित ही पृथ्वी से अलग हो जाती है। यह इसका अपना एक शाश्वत रूप हो गया, इस नगरी का अपना व्यक्तित्व हो गया। इस नगरी पर से बुद्ध गुजरे, इसकी गलियों में बैठकर कबीर ने चर्चा की है। वह सब कहानी हो गयी, वह सब स्वप्न हो गया। पर यह नगरी उन सबको आत्मसात किए है। और अगर कभी कोई निष्ठा से इस नगरी में प्रवेश करे तो वह फिर से बुद्ध को चलता हुआ देख सकता है, वह फिर से संत पार्श्वनाथ को गुजरते हुए देख सकता है। वह फिर से देखेगा संत तुलसीदास को, वह फिर से देखेगा संत कबीर को।

6-अगर कोई निष्ठा से इस काशी के निकट जाए, तो यह काशी साधारण नगरी न रह जाएगी लंदन या बम्बई जैसी। एक असाधारण चिन्मय रूप ले लेगी, और इसकी चिन्मयता बड़ी शाश्वत है, बड़ी पुरातन है। इतिहास खो जाते हैं, सभ्यताएं बनती और बिगड़ती हैं, आती हैं और चली जाती हैं, और यह अपनी एक अंत: धारा को संजोए हुए चलती है। इसके रास्ते पर खड़ा होना, इसके घाट पर स्नान करना, इसमें बैठकर ध्यान करने के प्रयोजन हैं। आप भी हिस्सा हो गए हैं एक अंत: धारा के। यह भरोसा कि मैं ही सब कुछ कर लूंगा, खतरनाक है। प्रभु का सहारा लिया जा सकता है, अनेक रूपों में ..उसके तीर्थ में, उसके मंदिरों में उसका सहारा लिया जा सकता है।सहारे के लिए वह सारा आयोजन है।

10-तीर्थ के साथ,बहुत सी बातें हैं जो समझ में नहीं आ सकेंगी, पर घटित होती हैं। जिनको बुद्धि साफ -साफ नहीं दिखा पाएगी, जिनका गणित नहीं बनाया जा सकेगा,

लेकिन घटित होती हैं। जैसे कि आप कहीं भी जाकर एकांत में बैठकर साधना करें तो बहुत कम संभावना है कि आपको अपने आस -पास किन्हीं आत्माओं की उपस्थिति का अनुभव हो लेकिन तीर्थ में करें तो बहुत जोर से होगा। कहीं भी करें वह अनुभव नहीं होगा, लेकिन तीर्थ में आपको प्रेजेंस मालूम पड़ेगी -थोड़ी बहुत नहीं, बहुत गहन। कभी इतनी गहन हो जाती है कि आप स्वयं मालूम पड़ेंगे कि कम है, और दूसरे की प्रेजेंस ज्यादा है।

.....SHIVOHAM.....