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ऊर्ध्व गमन की वज्रोली मुद्रा


काम की उत्पत्ति उद्भव 1-कुण्डलिनी महाशक्ति को ‘काम कला’ कहा गया है। उसका वर्णन कतिपय स्थलों में ऐसा प्रतीत होता है मानो यह कोई सामान्य काम सेवन की चर्चा की जा रही हो। कुण्डलिनी का स्थान जननेन्द्रिय मूल में रहने से भी उसकी परिणिति काम शक्ति के उभार के लिये प्रयुक्त होती प्रतीत होती है।

2-इस तत्व को समझने के लिये हमें अधिक गहराई में प्रवेश करना पड़ेगा और अधिक सूक्ष्म दृष्टि से देखना पड़ेगा। नर-नारी के बीच चलने वाली ‘काम क्रीड़ा’ और कुण्डलिनी साधना में सन्निहित ‘काम कला’ में भारी अन्तर है। मानवीय अन्तराल में उभयलिंग विद्यामान हैं। हर व्यक्ति अपने आप में आधा नर और आधा नारी है। अर्ध नारी नटेश्वर भगवान् शंकर को चित्रित किया गया है। कृष्ण और राधा का भी ऐसा ही एक समन्वित रूप चित्रों में दृष्टिगोचर होता है। पति-पत्नी दो शरीर एक प्राण होते हैं। यह इस चित्रण का स्थूल वर्णन है। सूक्ष्म संकेत यह है कि हर व्यक्ति के भीतर उभय लिंग सत्ता विद्यमान है। जिसमें जो अंश अधिक होता है उसकी रुझान उसी ओर ढुलकने लगती है। उसकी चेष्टायें उसी तरह की बन जाती हैं। कितने ही पुरुषों में नारी जैसा स्वभाव पाया जाता है और कई नारियों में पुरुषों जैसी प्रवृत्ति, मनोवृत्ति होती है। यह प्रवृत्ति बढ़ चले तो इसी जन्म में शारीरिक दृष्टि से भी लिंग परिवर्तन हो सकता है। अगले जन्म में लिंग बदल सकता है अथवा मध्य सन्तुलन होने से नपुंसक जैसी स्थिति बन सकती है।

नारी लिंग का सूक्ष्म स्थल जननेन्द्रिय मूल है। इसे ‘योनि’ कहते हैं। मस्तिष्क का मध्य बिन्दु ब्रह्मरंध्र-‘लिंग’ है। इसका प्रतीक प्रतिनिधि सुमेरु-मूलाधार चक्र के योनि गह्वर में ही काम बीज के रूप में अवस्थित है।’ अर्थात् एक ही स्थान पर वे दोनों विद्यमान है। पर प्रसुप्त पड़े हैं। उनके जागरण को ही कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। इन दोनों के संयोग की साधना ‘काम-कला’ कही जाती है। इसी को कुण्डलिनी जागरण की भूमिका कह सकते हैं। शारीरिक काम सेवन-इसी आध्यात्मिक संयोग प्रयास की छाया है। आन्तरिक काम शक्ति को दूसरे शब्दों में महाशक्ति—महाकाली कह सकते हैं।

एकाकी नर या नारी भौतिक जीवन में अस्त-व्यस्त रहते हैं। आन्तरिक जीवन में उभयपक्षी विद्युत शक्ति का समन्वय न होने से सर्वत्र नीरस नीरवता दिखाई पड़ती है। इसे दूर करके समग्र समर्थता एवं प्रफुल्लता उत्पन्न करने के लिये कुण्डलिनी साधना की जाती है। इसी संदर्भ में शास्त्रों में साधना विज्ञान का जहां उल्लेख किया है वहां काम क्रीड़ा जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। वस्तुतः यह आध्यात्मिक काम कला की ही चर्चा है। योनि-लिंग, काम बीज, रज, वीर्य, संयोग आदि शब्दों में उसी अन्तःशक्ति के जागरण की विधि व्यवस्था सन्निहित है—

शिव संहिता के अनुसार;-

1-उसके मध्य रन्ध्र सहित महालिंग है। वह स्वयंभु और अधोमुख, श्यामल और सुन्दर है। उसका ध्यान करे।

2-वहां ब्रह्मरंध्र में—वह महालिंग अवस्थित है। वह स्वयंभु और सुख स्वरूप है। इसका मुख नीचे की ओर है। यह निरन्तर क्रियाशील है। काम बीज द्वारा चालित है।

3-अपने शरीर में अवस्थित शिव को त्याग कर जो बाहर-बाहर पूजते फिरते हैं। वे हाथ के भोजन को छोड़कर इधर-उधर से प्राप्त करने के लिये भटकने वाले लोगों में से हैं। आलस्य त्यागकर ‘आत्म-लिंग’—शिव—की पूजा करे। इसी से समस्त सफलताएं मिलती हैं।

रुद्रयामल तंत्र के अनुसार;-

1-महाविन्दु उसका मुख है। सूर्य चन्द्र दोनों स्तन हैं, सुमेरु उसकी अर्ध कला है, पृथ्वी उसकी शोभा है। चर-अचर सब में काम कला के रूप में जगती है। सबमें काम कला होकर व्याप्त है। यह गुह्य से भी गुह्य है।

शिव संहिता के अनुसार;-

जननेन्द्रिय मूल—मूलाधार चक्र में योनि स्थान बताया गया है।

चार पंखुरियों वाले मूलाधार चक्र के कन्द भाग में जो प्रकाशवान् योनि है।

उस आधार पद्म की कर्णिका में अर्थात् दण्डी में त्रिकोण योनि है। यह योनि सब तन्त्रों करके गोपित है।

यह गुह्य नामक स्थान देव योनि है। उसी में जो वह्नि उत्पन्न होती है वह परम कल्याणकारिणी है।

गोरक्ष पद्धति के अनुसार;-

पहले मूलाधार एवं दूसरे स्वाधिष्ठान चक्र के बीच में योनि स्थान है, यही काम रूप पीठ है।

गुदा स्थान में जो चतुर्दल कमल विख्यात है उसके मध्य में त्रिकोणाकार योनि है जिसकी वन्दना समस्त सिद्धजन करते हैं, पंचाशत वर्ण से बनी हुई कामाख्या पीठ कहलाती है।

इसी त्रिकोण विषय समाधि में अनन्त विश्व में व्याप्त होने वाली परम ज्योति प्रकट होती है वही कालाग्नि रूप है जब योगी ध्यान, धारण, समाधि—द्वारा उक्त ज्योति देखने लगता है तब उसका जन्म मरण नहीं होता।

इन दोनों का परस्पर अति घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह सम्बन्ध जब मिला रहता है तो आत्म-बल समुन्नत होता चला जाता है और आत्मशक्ति सिद्धियों के रूप में विकसित होती चलती है। जब उनका सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है तो मनुष्य दीन-दुर्बल, असहाय-असफल जीवन जीता है। कुंडलिनी रूपी योनि और सहस्रार रूपी लिंग का संयोग मनुष्य की आन्तरिक अपूर्णता को पूर्ण करता है। साधना का उद्देश्य इसी महान प्रयोजन की पूर्ति करता है। इसी को शिव शक्ति का संयोग एवं आत्मा से परमात्मा का मिलन कहते हैं। इस संयोग का वर्णन साधना क्षेत्र में इस प्रकार किया गया है।

त्रिपुरीपनिषद के अनुसार;-

भग शक्ति है। काम रूप ईश्वर भगवान है। दोनों सौभाग्य देने वाले हैं। दोनों की प्रधानता समान है। दोनों की सत्ता समान है। दोनों समान ओजस्वी हैं। उनकी अजरा शक्ति विश्व का निमित्त कारण है।

शिव और शक्ति के सम्मिश्रण को शक्ति का उद्भव आधार माना गया है। इन्हें बिजली के ‘धन’ और ‘ऋण’ भाग माना जाना चाहिये। बिजली इन दोनों वर्गों के सम्मिश्रण से उत्पन्न होती है। अध्यात्म विद्युत् के उत्पन्न होने का आधार भी इन दोनों शक्ति केन्द्रों का संयोग ही है। शिव पूजा में इसी आध्यात्मिक योनि लिंग का संयोग प्रतीक रूप से लिया गया है।

लिंग पुराण के अनुसार;-

‘'लिंग वेदी’ [योनी] देवी उमा है और लिंग साक्षात् महेश्वर हैं।

वह महादेवी भग संज्ञा वाली और इस जगत् की धात्री हैं तथा लिंग रूप वाले शिव की त्रिगुणा प्रकृति रूप वाली है। हे द्विजोत्तमो! लिंग रूप वाले भगवान् शिद नित्य ही भग से युक्त रहा करते हैं और इन्हीं दोनों से इस जगत् की सृष्टि होती है। लिंग स्वरूप शिव स्वतः प्रकाश रूप वाले, हैं और यह माया के तिमिर से ऊपर विद्यमान रहा करते हैं''

षटचक्र निरूपणम् के अनुसार;-

स्वयंभू लिंग से लिपटी हुई कुण्डलिनी महाशक्ति का ध्यान श्यामा सूक्ष्मा सृष्टि रूपा, विश्व को उत्पन्न और लय करने वाली, विश्वातीत, ज्ञान रूप ऊर्ध्ववाहिनी के रूप में करें।

यह उभय लिंग एक कही स्थान पर प्रतिष्ठापित है। जननेन्द्रिय मूल—मूलाधार चक्र में सूक्ष्म योनि गह्वर है। उसे ऋण विद्युत कह सकते हैं। उसी के बीचों बीच सहस्रार चक्र का प्रतिनिधि एक छोटा सा उभार है जिसे ‘सुमेरु’ कहा जाता है। देवताओं का निवास सुमेरु पर्वत पर माना गया है। समुद्र मंथन में इसी पर्वत का वर्णन आता है। साड़े तीन चक्र लपटा हुआ शेष नाग इसी स्थान पर है। इस उभार केन्द्र को ‘काम बीज’ भी कहा गया है। एक ही स्थान पर दोनों का संयोग होने से साधक का ‘आत्मरति’ प्रयोजन सहज ही पूरा हो जाता है।

कुण्डलिनी साधना इस प्रकार आत्मा के उभय पक्षी लिंगों का समन्वय सम्मिश्रण ही है। इसकी जब जागृति होती है तो रोम-रोम में अन्तःक्षेत्र के प्रत्येक प्रसुप्त केन्द्र में हलचल मचती है और आनन्द उल्लास का प्रवाह बहने लगता है। इस समन्वय केन्द्र—काम बीज का वर्णन इस प्रकार मिलता है—

गोरक्ष पद्धति के अनुसार;-

''त्रिकोणाकार योनि में सुषुम्ना द्वार के सम्मुख स्वयंभू नायक महालिंग है उसके सिर में मणि के समान देदीप्यमान बिम्ब है यही कुण्डलिनी जीवाधार मोक्षद्धार है इसे जो सम्यक् प्रकार से जानता है उसे योगविद् कहते हैं।

मेढ्र (लिंग स्थान) से नीचे मूलाधार कर्णिका में तपे हुए स्वर्ण के वर्ण के समान वाला एवं बिजली के समान चमक-दमक वाला जो त्रिकोण है वही कालाग्नि का स्थान है।''

पूर्वाक्ता डाकिनी तत्र कर्णिकायां त्रिकोणकम् । यन्मध्ये विवरं सूक्ष्मं रक्ताभं काम बीजकम् । शक्ति तंत्र के अनुसार;-

वहीं ब्रह्म डाकिनी शक्ति है। कर्णिका में त्रिकोण है। इसके मध्य में एक सूक्ष्म विवर है। रक्त आभा वाला काम बीज स्वयंभू अधोमुख महालिंग यहीं है।

गोरक्ष पद्धति के अनुसार;-

मूलाधार और स्वाधियान इन दो चक्रों के बीच जो योनि स्थान है वही ‘काम रूप’ पीठ है।

चौदह पंखुरियों वाले मूलाधार चक्र के मध्य में त्रिकोणाकार योनि है इसे ‘कामाख्या’ पीठ कहते हैं। यह सिद्धों द्वारा अभिवंदित है।

उस योनि के मध्य पश्चिम की ओर अभिमुख ‘महालिंग’ है। उसके मस्तक में मणि की तरह प्रकाशवान बिम्ब है। जो इस तथ्य को जानता है वही योगविद् है।

लिंग स्थान से नीचे, मूलाधार कर्णिका में अवस्थित तपे सोने के समान आभा वाला विद्युत जैसी चमक से युक्त जो त्रिकोण है उसी को ‘कालाग्नि’ कहते हैं।

इसी विश्वव्यापी परम ज्योति में तन्मय होने में महायोग की समाधि प्राप्त होती है और जन्म-मरण से छुटकारा मिलता है। शिव संहिता के अनुसार;-

1-जिस स्थान पर कुण्डलिनी है उसी स्थान पर पुष्प के समान स्वर्ण आभा जैसा चमकता हुआ रक्त वर्ण कामबीज है।

2-कुण्डलिनी, सुषुम्ना और काम बीज यह सूर्य चन्द्रमा की तरह प्रकाशवान हैं। इन तीनों के मिलन को त्रिपुर भैरवी कहते हैं। इस तेजस्वी तत्व की ‘बीज’ संज्ञा है। यह ‘बीज’ ज्ञान और क्रिया शक्ति से संयुक्त होकर शरीर में भ्रमण करता है और ऊर्ध्वगामी होता है। इस परम तेजस्वी अग्नि का योनि स्थान है और उसे ‘स्वयंभू लिंग’ कहते हैं।

3-वह बीज क्रिया शक्ति एवं ज्ञान शक्ति से युक्त होकर शरीर में भ्रमण करता है और कभी ऊर्ध्वगामी होता है और कभी जल में प्रवेश करता है और सूक्ष्म प्रज्वलित अग्नि के समान शिखा युत परम तेज वीर्य की स्थिति योनि स्थान में है स्वयम्भू लिंग संज्ञा है।

4-जिस स्थान में कुण्डलिनी है उसी स्थान में बन्धूक पुष्प के समान रक्त वर्ण काम बीज की स्थिति कही गई है। वह काम बीज तप्त स्वर्ण के समान स्वरूप योग युक्त द्वारा चिन्तनीय है।

जिस स्थान में कुण्डलिनी स्थित है सुषुम्ना उसी स्थान में काम बीज के साथ स्थित है और वह बीज शरच्चन्द्र के समान प्रकाशमान तेज है और वह आप ही कोटि सूर्य के समान प्रकाश और कोटि चन्द्र के समान शीतल है।

5-स्थूल शरीर में नारी का प्रजनन द्रव ‘रज’ कहलाता है। नर का उत्पादक रस ‘वीर्य’ है। सूक्ष्म शरीर में इन दोनों की प्रचुर मात्रा एक ही शरीर में विद्यमान है। उनके स्थान निर्धारित हैं। इन दोनों के पृथक रहने के कारण जीवन में कोई बड़ी उपलब्धि नहीं होती, पर जब इनका संयोग होता है तो जीवन पुष्प का पराग मकरन्द परस्पर मिलकर फलित होने लगता है और सफल जीवन की अगणित सम्भावनाएं प्रस्फुटित होती हैं। एक ही शरीर में विद्यमान इन ‘उभय’ रसों का वर्णन साधना विज्ञानियों ने इस प्रकार किया है—

योग शिखोपविषद के अनुसार;-

योनि स्थान रूपी मूलाधार महाक्षेत्र में, जवा कुसुम के वर्ण का रज हर एक जीवधारी के शरीर में रहता है। उसको ‘देवी तत्व’ कहते हैं। उस रज और वीर्य के योग से राजयोग की प्राप्त होती है अर्थात् इन दोनों के योग का फल राजयोग है।

गुदा और उपस्थ के मध्य में सीवनी के ऊपर त्रिकोणाकृति गृह्य-गह्वर है, जिसको ‘योनि-स्थान’ कहते हैं।

ध्यान बिन्दु उपनिषद् के अनुसार;-

सहस्रार से क्षरित गलित होने पर जब वीर्य योनि स्थान पर ले जाया जाता है तो वहां कुण्डलिनी अग्नि कुण्ड में गिरकर जलता हुआ वह वीर्य योनि मुद्रा के अभ्यास से हठात् ऊपर चढ़ा लिया जाता है और प्रचण्ड तेज के रूप में परिणत होता है यही आध्यात्मिक काम सेवन एवं गर्भ धारण है।

बिन्दु दो प्रकार का होता है—एक तो पाण्डु वर्ग जिसे शुक्र कहते हैं और दूसरा (लोहित) रक्त वर्ण जिसे महारज कहते हैं।

गोरक्ष पद्धति के अनुसार;-

1-तैलमिले सिन्दूर के द्रव (रस) के समान रज सूर्य स्थान नाभि मण्डल में रहता है तथा बिन्दु (वीर्य) चन्द्रमा के स्थान कण्ठ देश षोडशाधर चक्र में स्थिर रहता है। इन दोनों का ऐक्य अत्यन्त दुर्लभ है।

2-विन्दु शिव रज शक्ति है। इनके एक होने से योग सिद्ध एवं परम पद प्राप्त होता है। चन्द्रमा सूर्य का ऐक्य करना ही योग है।

3-शक्ति चालीनी विधि से वायु द्वारा जब रज-बिन्दु के साथ ऐक्य को प्राप्त होता है तब शरीर दिव्य हो जाता है।

ह. योग प्रदीपिका के अनुसार;-

अपने देह स्थित रज व वीर्य वज्रोली के अभ्यास के योग से सब सिद्धियों को देने वाले हो जाते हैं।

शारीरिक काम सेवन की तुलना में आत्मिक काम सेवन असंख्य आनन्ददायक है। शारीरिक काम-क्रीड़ा को विषयानन्द और आत्मरति को ब्रह्मानन्द कहा गया है। विषयानन्द से ब्रह्मानन्द का आनन्द और प्रतिफल कोटि गुना है। शारीरिक संयोग से शरीर धारी सन्तान उत्पन्न होती है। आत्मिक संयोग प्रचण्ड आत्मबल और विशुद्ध विवेक को उत्पन्न करता है। उमा, महेश विवाह के उपरांत दो पुत्र प्राप्त हुए थे। एक स्कन्द (आत्मबल) दूसरा गणेश (प्रज्ञा प्रकाश) कुण्डलिनी साधक इन्हीं दोनों को अपने आत्म लोग में जन्मा बढ़ा और परिपुष्ट हुआ देखता है।

स्थूल काम सेवन की ओर से विमुख होकर यह आत्म रति अधिक सफलतापूर्वक सम्पन्न हो सकती है। इसलिये इस साधना में शारीरिक ब्रह्मचर्य की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है। और वासनात्मक मनोविचारों से बचने का निर्देश दिया गया है। शिवजी द्वारा तृतीय नेत्र तत्व विवेक द्वारा स्थूल काम सेवन को भस्म करना—उसके सूक्ष्म शरीर को अजर-अमर बनाना इसी तथ्य का अलंकारिक वर्णन है कि शारीरिक काम सेवन से विरत होने की और आत्म रति में संलग्न होने की प्रेरणा है। काम दहन के पश्चात् उसकी पत्नी रति की प्रार्थना पर शिवजी ने काम को अशरीरी रूप से जीवित रहने का वरदान दिया था और रति को विधवा नहीं होने दिया था उसे आत्म रति बना दिया था। वासनात्मक अग्नि का आह्य अग्नि-कालाग्नि के रूप में परिणत होने का प्रयोजन भी यही है—

शिव पुराण के अनुसार;-

शिवजी के तृतीय नेत्र की प्रदीप्त अग्नि की ज्वाला से जब कामदेव भस्म हो गया और वह अग्नि समुद्र में प्रवेश कर गई इसके पश्चात क्या हुआ?

लिंग पुराणके अनुसार;-

उस देवी को उस स्थिति में जानकर काम के गर्दन करने वाले शिव ने काल कण्ठी कपर्दिनी का सृजन किया था। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत करने के लाभ कुण्डलिनी शक्ति जागरण विधा अन्धकार को दूर करने का सशक्त माध्यम है। स्यंव को समझने व् दूसरे को पहचानने व् घर परिवार समाज और ब्रहमांड को समझने का मार्ग है । कुण्डलिनी शक्ति जागरण चारों ओर परम शांति प्रेम और आनंद स्थापना का सच्चा मार्ग है । परमानन्द प्राप्ति के बाद क्या करना चाहिए यही बताने का ज्ञान है । अपने शरीर मन बुद्धि व् सब कर्मेन्द्रियों व् ज्ञानेन्द्रियों को विकिसित कर कैसे उनका प्रयोग सम्पूर्णता से सर्जन करने पूर्णता की ओर ले जाने और अपूर्णता के संहार में लगाना है । कुण्डलिनी शक्ति जैसे जैसे आगे बढती है व् अनेक रंग इन्द्रधनुष की तरह से देखने को मिलते हैं । कभी हम बहुत शांत होते हैं कभी संतुष्ट दिखाई देते हैं । कभी हम दूसरों पर हंस रहे होते हैं|

कुण्डलिनी जागरण की यात्रा तरह तरह के रंगों से भरी हुई है । इस जीवन में कुछ भी एक सा तो रहता नहीं लेकिन कुण्डलिनी जागरण यात्रा को एकरस कहा गया है । इस दुनियां में जब हम कुण्डलिनी जागरण की ओर पग बढाते हैं तो मन और माया रुपी शत्रु हमारे मार्ग में अनेक प्रकार की बाधाएं उत्पन्न करते हैं । इसलिए अनहोनियों से न घबराकर लगन व् निष्ठा पूर्वक हमें अपने मार्ग कीओर अग्रसर रहना चाहिए । गुरु के प्रति हमारा प्रेम जितना गहरा होगा उतना ही कुण्डलिनी जागरण के प्रति हमारा प्रयास अधिक होता चला जायेगा । कुंडलिनी जागरण अथवा कुंडलिनी साधन के दो मुख्य मार्ग हैं |योग द्वारा कुंडलिनी जागरण और तंत्र द्वारा कुंडलिनी जागरण ...... सहस्रार चक्र का नामकरण इसी आधार पर हुआ है सहस्र फन वाले शेषनाग की परिकल्पना का यही आधार है । 1-एक प्राणायाम और योग वाली जिसमें शक्ति चालिनी मुद्रा उड्या न बंध तथा कुम्भक प्राणायाम और ओज का महत्व प्रतिपादित किया गया है ।

ऐसी साधना प्रक्रिया अविवाहित विधुर अथवा सन्यासियों के लिए महत्वपूर्ण है । यह साधना उन लोगों के लिए उपयूक्त नहीं रही जो गृहस्थाश्रम में रहकर साधना करना चाहते हैं ।गृहस्थ बिना स्त्री के नहीं चलता है और संन्यास स्त्री के रहते कभी नहीं चलता है । परन्तु जहाँ तक साधना का प्रश्न है तो क्या गृहस्थ और क्या सन्यासी क्या स्त्री और क्या पुरुष सभी सामान अधिकार रखते हैं । ऐसे प्रवृत्तिमार्गी गृहस्थों के लिए स्त्री के साथ ही साधनारत होने का मार्ग भी ऋषियों ने खोज निकाला । निवृत्ति मार्ग में जो कार्य शक्ति चालिनी मुद्रा ने किया वह कार्य प्रवृत्ति मार्ग में सम्भोग मुद्रा से संपन्न किया गया शेष बंध और कुम्भक समान रहे । सम्भोग मुद्रा को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए आचार्यों ने विभिन्न की काम मुद्राएँ बाजीकरण विधियाँ तथा तान्त्रिंक औषधियां खोज डालीं ।

इस प्रकार वीर्य को उर्ध्व गति देने के लिए जहाँ सन्यासी लोग भस्त्रिका प्राणायाम का प्रयोग करते थे वहां प्रवृत्ति मार्ग तांत्रिक दीर्घ सम्भोग का उपयोग करने लगे ।इस प्रकार कुण्डलिनी साधना का दूसरा प्रकार काम मुद्राओं वाला बन गया ।सम्भोग के कारण इस साधना में पुरुष व् स्त्री दोनों का बराबर का योगदान रहा ।रमण एक तकनिकी प्रक्रिया है इस कारण सम्भोग साधना तांत्रिक क्रिया कहलाई । साधक को यम व् नियम का तथा आसन प्राणायाम आदि बहिरंग साधना की उतनी ही तैयारी करनी पड़ती है जितनी निवृति मार्ग अपनाने वाले साधक को करनी पड़ती है।

मनुष्य में कार्य करने के लिए ऊर्जा व् आभा तथा ज्योति का मिश्रण ही काम में लाना पड़ता है । मनुष्य में इन तीनों तत्वों का उदगम है उसका खानपान और उसके विचार । जैसा उसका खानपान होगा वैसी उसके शरीर की ऊर्जा होगी । सात्विक जीवन सात्विक ऊर्जा तथा तामसिक भोजन तो तामसिक ऊर्जा ।अतएव कुण्डलिनी शक्ति जागरण के लिए सात्विक ऊर्जा अति आवश्यक है । कुण्डलिनी शक्ति जागरण के लिए उत्तम उम्र 25 वर्ष से 45 वर्ष तक मानी गई है । ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; कुण्डलिनी और अध्यात्मिक काम विज्ञान ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; कुण्डलिनी विज्ञान में मूलाधार को योनि और सहस्रार को लिंग कहा गया है। यह सूक्ष्म तत्त्वों की गहन चर्चा है। इस वर्णन में काम क्रीड़ा एवं शृंगारिकता का काव्य मय वर्णन तो किया गया है, पर क्रिया प्रसंग में वैसा कुछ नहीं है। तन्त्र ग्रन्थों में उलट भाषियों की तरह मद्य, माँस, मीन, मुद्रा और पाँचवाँ ‘मैथुन’ भी साधना प्रयोजनों में सम्मिलित किया गया है। यह दो मूल सत्ताओं के संभोग नहीं जोड़ा गया है। यों यह सूक्ष्म अध्यात्म सिद्धान्त रति कर्म पर भी प्रयुक्त होते, दाम्पत्य स्थिति पर भी लागू होते हैं। दोनों के मध्य समता की, आदान-प्रदान की स्थिति जितनी ही संतुलित होगी उतना ही युग्म को अधिक सुखी, सन्तुष्ट समुन्नत पाया जायेगा।

मूलाधार में कुण्डलिनी शक्ति शिव लिंग के साथ लिपटी हुई प्रसुप्त सर्पिणी की तरह पड़ी रहती है। समुन्नत स्थिति में इसी मूल स्थिति का विकास हो जाता है। मूलाधार मल मूल स्थानों के निष्कृष्ट स्थान से ऊँचा उठकर मस्तिष्क के सर्वोच्च स्थान पर जा विराजता है। छोटा सा शिव लिंग मस्तिष्क में कैलाश पर्वत बन जाता है। छोटे सा शिव लिंग मस्तिष्क में कैलाश पर्वत बन जाता है। छोटे से कुण्ड को मान सरोवर रूप धारण करने का अवसर मिलता है प्रसुप्त सर्पिणी जागृत होकर शिव कंठ से जा लिपटती है और शेषनाग के परिक्रमा

रूप में दृष्टि गोचर होती है। मुँह बन्द कली खिलती है और खिले हुए शतदल कमल के सहस्रार के रूप में उसका विकास होता है। मूलाधार में तनिक सा स्थान था, पर ब्रह्मरंध्र का विस्तार तो उससे सौगुना अधिक है।

सहस्रार को स्वर्ग लोक का कल्पवृक्ष- प्रलय काल में बचा रहने वाला अक्षय वट-गीता का ऊर्ध्व मूल अधःशाखा वाला अश्वत्थं- भगवान बुद्ध को महान् बनाने वाला बोधि वृक्ष कहा जा सकता है। यह समस्त उपमाएँ ब्रह्मरन्ध्र में निवास करने वाले ब्रह्म बीज की ही है। वह अविकसित स्थिति में मन बुद्धि के छोटे मोटे प्रयोजन पूरे करता है, पर जब जागृत स्थिति में जा पहुँचता है तो सूर्य के समान दिव्य सत्ता सम्पन्न बनता है। उसके प्रभाव से व्यक्ति और उसका संपर्क क्षेत्र दिव्य आलोक से भरा पूरा बन जाता है।

ऊपर उठना पदार्थ और प्राणियों का धर्म है। ऊर्जा का ऊष्मा का स्वभाव ऊपर उठना और आगे बढ़ना है। प्रगति का द्वार बन्द रहे तो कुण्डलिनी शक्ति कामुकता के छिद्रों से रास्ता बनाती और पतनोन्मुख रहती है। किन्तु यदि ऊर्ध्वगमन का मार्ग मिल सके तो उसका प्रभाव परिणाम प्रयत्न कर्ता को परम तेजस्वी बनने और अन्धकार में प्रकाश उत्पन्न कर सकने की क्षमता के रूप में दृष्टिगोचर होता है।

कुण्डलिनी को प्रचण्ड क्षमता स्थूल शरीर में ओजस् सूक्ष्म शरीर में तेजस और कारण शरीर में वर्चस् के रूप में प्रकट एवं परिलक्षित होती है। समग्र तेजस्विता को इन तीन भागों में दृष्टिगोचर होते देखा जा सकता है। इस अंतःक्षमता का एक भौंड़ा सा उभार और कार्य काम-वासना के रूप में देखा जा सकता है। कामुकता अपने सहयोगी के प्रति कितना आकर्षणात्मा, भाव उत्पन्न करती है। संभोग कर्म में सरसता अनुभव होती है। सन्तानोत्पादन जैसी आश्चर्यजनक उपलब्धि सामने आती है। यह एक छोटी सी इन्द्रिय पर इस अन्तः क्षमता का आवेश छा जाने पर उसका प्रभाव कितना अद्भुत होता है यह आँख पसारकर हर दिशा में देखा जा सकता है। मनुष्य का चित्त, श्रम, समय एवं उपार्जन का अधिकांश भाग इसी उभार को तृप्त करने का ताना बाना बुनने में बीतता है। उपभोग की प्रतिक्रिया सन्तानोत्पादन के उत्तरदायित्व निभाने के रूप में कितनी महँगी और भारी पड़ती है यह प्रकट तथ्य किसी से छिपा नहीं है। यदि इसी सामर्थ्य को ऊर्ध्वगामी बनाया जा सके तो उसका प्रभाव देवोपम परिस्थितियाँ सामने लाकर खड़ी कर सकता है।

मेरी दृष्टि से जननेन्द्रियों को काम वासना एवं रति प्रवृत्ति के लिए उत्तरदायी माना जाता है। पर वैज्ञानिक गहन अन्वेषण से यह तथ्य सामने आता है कि नर-नारी के प्रजनन केन्द्रों का सूत्र संचालन मेरुदण्ड के सुषुम्ना केन्द्र से होता है। यह केन्द्र नाभि की सीध में है। हैनरी आस्ले कृत ‘नोट्स आन फिजयालोजी’ ग्रन्थ में इस संदर्भ में विस्तृत प्रकाश डाला गया है। उसमें उल्लेख है कि - नर नारियों के प्रजनन अंगों के संकोच एवं उत्तेजना का नियन्त्रण मेरुदंड के ‘लम्बर रीजन’ (निचले क्षेत्र) में स्थित केन्द्रों से होता है। इस दृष्टि से कामोत्तेजना के प्रकटीकरण का उपकरण मात्र जननेन्द्रिय रह जाती है।

उसका उद्गम तथा उद्भव केन्द्र सुषुम्ना संस्थान में होने से वह कुण्डलिनी की ही एक लहर सिद्ध होती है। यह प्रवाह जननेन्द्रिय की ओर उच्च केन्द्रों को मोड़ देने की प्रक्रिया ही इस महाशक्ति की साधना के रूप में प्रयुक्त होती है।

नैपोलियन हिल ने अपनी पुस्तक ‘थिंक एन्ड ग्रो रिंच’ में काम शक्ति के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला है। वे सैक्स एनर्जी को मस्तिष्क और शरीर दोनों को समान रूप से प्रभावित करने वाली एक विशेष शक्ति मानते हैं यह मनुष्य को प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के लिए प्रेरणा देती है।

सामान्यतया उसका उभार इन्द्रिय मनोरंजन मात्र बनकर समाप्त होता रहता है। जमीन पर फैले हुए पानी की भाप भी ऐसे ही उड़ती और बिखरती भटकती रहती है, पर यदि उसका विवेकपूर्ण उपयोग किया जा सके तो भाप द्वारा भोजन पकाने से लेकर रेल का इंजन चलाने जैसे असंख्यों उपयोगी काम लिये जा सकते हैं। काम शक्ति के उच्चस्तरीय सृजनात्मक प्रयोजन अनेकों हैं कलात्मक गतिविधियों में- काव्य जैसी कल्पना सम्वेदनाओं में - दया, करुणा एवं उदार आत्मीयता की साकार बनाने वाली सेवा साधना में-

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ऊर्ध्व गमन की वज्रोली मुद्रा;-

हठयोग की क्रियाओं में एक वज्रोली क्रिया भी है उनमें मूत्र मार्ग से जल ऊपर खींच कर फिर बाहर निकाला जाता है। इस प्रकार उस मार्ग की शुद्धि हो जाती है। इसी प्रकार किसी टब में बैठकर मल मार्ग द्वारा भी पानी खींचा जाता है। थोड़ी देन पेट में रख कर उसे घुमाया जाता है और फिर मल त्याग कर दिया जाता है। इस प्रकार आधुनिक एनीमा की पुरातन ढंग से पूर्ति हो जाती है।

नाड़ी शोधन में आरंभिक प्रयोग है। नेति, धोति, वस्ति, वज्रोली इन हठयोग की प्रक्रियाओं में उन स्थानों की सफाई की जाती हैं, जहाँ मल जमा रहता है, रुका रहता है। इस शारीरिक स्वच्छता के उपरान्त षट् चक्र वेधन आदि की अन्य अभिवर्धन क्रियाएँ की जाती है। शोधन के उपरान्त ही अभिवर्धन क्रियाओं को आरम्भ करने का नियम है।

हठयोग की सारी क्रियायें शारीरिक है। उनका प्रभाव भी शरीर पर ही पड़ता है। शरीरगत समर्थता बढ़ती है और वे कार्य बन पड़ने हैं जो कोई अति बलिष्ठ शरीर कर कसता है। इस स्तर के लोगों को ही प्राचीन काल में दैत्य कहा जाता है। दैत्य और दानव का अन्तर समझा जाना चाहिए। मानव के विपरीत दुर्गुणों वाले को दानव कहते हैं, उनकी प्रवृत्तियां अधोगामी होती हैं और क्रियायें भी अनीतियुक्त ही बन पड़ती हैं। पर दैत्य में ऐसे दुर्गुण होना आवश्यक नहीं। अंग्रेजी के जाइन्ट शब्द में दैत्य स्तर का अनुमान लगाया गया है।

हठयोग की हर क्रिया प्रतिरोधक है। जिस प्रकार नदी प्रवाह को रोक कर बाँध बनाया जाता है और फिर उससे बिजली बनाने, नहर निकालने जैसी व्यवस्थायें बनाई जाती हैं। हठयोग में भी ऐसा ही होता है। उसमें प्रकृति प्रेरणा से चल रहे क्रिया कलापों को उलटा जाता है। जैसे मल मूत्र त्यागने के छिद्र स्वाभाविक स्थिति में अपने प्रवाह नीचे की ओर ही बहाते हैं पर वज्रोली क्रिया द्वारा उन्हें इसके लिए प्रशिक्षित किया जाता है कि वह नीचे ऊपर की ओर जल खींचने का काम करें।

ऐसे उलटे कृत्यों को ही हठवाद कहते हैं-हठयोग भी इन्हें सरकस के उस खेल की तरह समझना चाहिए जिसमें शेर को बकरा अपनी पीठ पर लाद कर चलने का कौतुक दिखाया जाता है। दर्शक इस अनहोनी बात को होता हुआ देखते हैं। तो आश्चर्य से चकित रह जाते हैं।

यह प्रशिक्षण अति कठिन है। बकरे के मन में से भय निकालना और अति को बकरा देखते ही टूट पड़ने की प्रवृत्ति को काबू में लाया जाता है। यह सामान्य नहीं असामान्य बात है। इसमें असाधारण कौशल एवं साहस की आवश्यकता पड़ती है, पर साथ ही जोखिम भी रहता है। हठयोग की क्रियाओं में भूल हो जाने से उस मार्ग में संकट भी खड़े हो सकते हैं और कई बार तो अनर्थ तक की आशंका रहती है। इसलिए हठयोग का शिक्षण अनुभवी गुरु के पास रह कर ही किया जाता है। भयंकर घाव वाले रोगियों का अस्पताल में भर्ती करके ही इलाज होता है। ताकि समय-समय पर आने वाले उतार चढ़ावों से निपटा जा सके।

किन्तु मध्यवर्ती सामान्य रोगों की स्थिति में भर्ती किये जाने की आवश्यकता नहीं रहती। दवा दे देने पथ्य बता देने तथा आवश्यक सावधानियाँ बरतने की हिदायत देकर उसे घर पर ही रहकर इलाज कराते रहने का परामर्श दे दिया जाता है। क्योंकि उससे किसी बड़ी आशंका की कोई संभावना पड़ती नहीं दीखती।

जोखिम वाले खेल निष्णातों को ही खिलाये जाते हैं। आरंभिक शिक्षार्थियों से हलकी फुलकी क्रियायें ही कराई जाती हैं। आर्ट कोमर्स आदि विषयों को लेकर पड़ने वालों को पत्राचार विद्यालय में नाम लिखाने से भी काम चल जाता है। किन्तु साइंस पढ़ने वाले को अध्यापकों से क्रियात्मक शिक्षण प्राप्त करना पड़ता है। इसलिए उनका स्कूल प्रवेश अनिवार्य माना जाता है।

राजयोग और हठयोग में यही अन्तर है। हठयोग ऐसा है जैसा हिंसक पशुओं से भिड़ने उन्हें वशवर्ती बनाने का कौशल और राजयोग ऐसे हैं जैसा गौ पालन। गौ पालन में थोड़ी उपेक्षा रहने पर इतनी ही हानि है कि दूध कम मिले। वैसे कोई जोखिम उसमें नहीं है। राजयोग के साधकों को देर लग सकती है। कम लाभ में संतोष करना पड़ सकता है, उर उसमें जोखिम उठाने जैसी कोई आशंका या कठिनाई नहीं है।

ब्रह्मचर्य के लिए वज्रोली क्रिया का हठयोग में विधान है। आरम्भ में शुद्धि के लिए मूत्र मार्ग में जल चढ़ा कर स्वच्छ किया जाता है। पीछे जब नीचे से ऊपर खींचने की क्रिया का अभ्यास हो जाता है तो वीर्य की अधोगामी प्रवृत्ति को प्रतिबंधित करके ऊपर चढ़ाने एवं मस्तिष्क तक पहुँचने का प्रयत्न किया जाता है। इससे वीर्यपात की हानियाँ रुकती हैं और उस बहुमूल्य तत्व को मस्तिष्क में ले जाकर प्राण शक्ति बढ़ाने से लेकर मानसिक पराक्रमों को अधिक सरल एवं सफल बनाया जाता है। यह सफल हो सके तो शरीर में से निकलने वाले प्राण तक को रोक कर ब्रह्मरंध्र में छिपाया जा सकता है और निर्धारित आयु से कहीं अधिक जिया जा सकता है।

हठयोग की इस वज्रोली क्रिया को राजयोग में अति सरल बना दिया गया है। उससे लाभ लगभग उसी प्रकार के होते हैं, जैसे वज्रोली क्रिया में। पर गति अवश्य मंथर रहती है और सफलता भी समय साध्य गतिशीलता के अनुरूप आगे बढ़ती है।

वज्रोली क्रिया में आसन इस प्रकार लगाया जाता है कि एड़ी या एड़ी से ऊपर की हड्डी गुदा और जननेन्द्रिय मूल को हलका-सा दबाती रहे। यह दबाव इतना अधिक नहीं होना चाहिए कि उस क्षेत्र में अवस्थित पौरुष ग्रन्थियों या जननेंद्रिय की ओर जाने वाली नसों पर अधिक दबाव डालें और उनकी स्वाभाविक क्रिया में अवरोध उत्पन्न करें। इस योजना के लिए उस केन्द्र का हलका-सा स्पर्श ही पर्याप्त है, जिससे यह अनुभव होता रहे कि यहाँ कुछ हलकी रोक थाम जैसी चेष्टा की गयी है।

अब गुदा मूल को ऊपर खींचना चाहिए। इसके लिए साँस भी खींचनी पड़ती है। गुदा को ऊपर खींचने के साथ साथ जननेन्द्रिय की मूत्र वाहिनी नसें भी ऊपर खींचती हैं इस खिचाव को इसी स्तर का समझना चाहिए जैसे कि कभी-कभी मल मूत्र त्यागने की इच्छा होती है पर वैसा अवसर नहीं होता। अतएव उन वेगों को रोकना पड़ता है। रोकने का तरीका एक ही है कि उस क्षेत्र को ऊपर खींचा जाय। माँस