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ऊर्ध्व गमन की वज्रोली मुद्रा


काम की उत्पत्ति उद्भव 1-कुण्डलिनी महाशक्ति को ‘काम कला’ कहा गया है। उसका वर्णन कतिपय स्थलों में ऐसा प्रतीत होता है मानो यह कोई सामान्य काम सेवन की चर्चा की जा रही हो। कुण्डलिनी का स्थान जननेन्द्रिय मूल में रहने से भी उसकी परिणिति काम शक्ति के उभार के लिये प्रयुक्त होती प्रतीत होती है।

2-इस तत्व को समझने के लिये हमें अधिक गहराई में प्रवेश करना पड़ेगा और अधिक सूक्ष्म दृष्टि से देखना पड़ेगा। नर-नारी के बीच चलने वाली ‘काम क्रीड़ा’ और कुण्डलिनी साधना में सन्निहित ‘काम कला’ में भारी अन्तर है। मानवीय अन्तराल में उभयलिंग विद्यामान हैं। हर व्यक्ति अपने आप में आधा नर और आधा नारी है। अर्ध नारी नटेश्वर भगवान् शंकर को चित्रित किया गया है। कृष्ण और राधा का भी ऐसा ही एक समन्वित रूप चित्रों में दृष्टिगोचर होता है। पति-पत्नी दो शरीर एक प्राण होते हैं। यह इस चित्रण का स्थूल वर्णन है। सूक्ष्म संकेत यह है कि हर व्यक्ति के भीतर उभय लिंग सत्ता विद्यमान है। जिसमें जो अंश अधिक होता है उसकी रुझान उसी ओर ढुलकने लगती है। उसकी चेष्टायें उसी तरह की बन जाती हैं। कितने ही पुरुषों में नारी जैसा स्वभाव पाया जाता है और कई नारियों में पुरुषों जैसी प्रवृत्ति, मनोवृत्ति होती है। यह प्रवृत्ति बढ़ चले तो इसी जन्म में शारीरिक दृष्टि से भी लिंग परिवर्तन हो सकता है। अगले जन्म में लिंग बदल सकता है अथवा मध्य सन्तुलन होने से नपुंसक जैसी स्थिति बन सकती है।

नारी लिंग का सूक्ष्म स्थल जननेन्द्रिय मूल है। इसे ‘योनि’ कहते हैं। मस्तिष्क का मध्य बिन्दु ब्रह्मरंध्र-‘लिंग’ है। इसका प्रतीक प्रतिनिधि सुमेरु-मूलाधार चक्र के योनि गह्वर में ही काम बीज के रूप में अवस्थित है।’ अर्थात् एक ही स्थान पर वे दोनों विद्यमान है। पर प्रसुप्त पड़े हैं। उनके जागरण को ही कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। इन दोनों के संयोग की साधना ‘काम-कला’ कही जाती है। इसी को कुण्डलिनी जागरण की भूमिका कह सकते हैं। शारीरिक काम सेवन-इसी आध्यात्मिक संयोग प्रयास की छाया है। आन्तरिक काम शक्ति को दूसरे शब्दों में महाशक्ति—महाकाली कह सकते हैं।

एकाकी नर या नारी भौतिक जीवन में अस्त-व्यस्त रहते हैं। आन्तरिक जीवन में उभयपक्षी विद्युत शक्ति का समन्वय न होने से सर्वत्र नीरस नीरवता दिखाई पड़ती है। इसे दूर करके समग्र समर्थता एवं प्रफुल्लता उत्पन्न करने के लिये कुण्डलिनी साधना की जाती है। इसी संदर्भ में शास्त्रों में साधना विज्ञान का जहां उल्लेख किया है वहां काम क्रीड़ा जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। वस्तुतः यह आध्यात्मिक काम कला की ही चर्चा है। योनि-लिंग, काम बीज, रज, वीर्य, संयोग आदि शब्दों में उसी अन्तःशक्ति के जागरण की विधि व्यवस्था सन्निहित है—

शिव संहिता के अनुसार;-

1-उसके मध्य रन्ध्र सहित महालिंग है। वह स्वयंभु और अधोमुख, श्यामल और सुन्दर है। उसका ध्यान करे।

2-वहां ब्रह्मरंध्र में—वह महालिंग अवस्थित है। वह स्वयंभु और सुख स्वरूप है। इसका मुख नीचे की ओर है। यह निरन्तर क्रियाशील है। काम बीज द्वारा चालित है।

3-अपने शरीर में अवस्थित शिव को त्याग कर जो बाहर-बाहर पूजते फिरते हैं। वे हाथ के भोजन को छोड़कर इधर-उधर से प्राप्त करने के लिये भटकने वाले लोगों में से हैं। आलस्य त्यागकर ‘आत्म-लिंग’—शिव—की पूजा करे। इसी से समस्त सफलताएं मिलती हैं।

रुद्रयामल तंत्र के अनुसार;-

1-महाविन्दु उसका मुख है। सूर्य चन्द्र दोनों स्तन हैं, सुमेरु उसकी अर्ध कला है, पृथ्वी उसकी शोभा है। चर-अचर सब में काम कला के रूप में जगती है। सबमें काम कला होकर व्याप्त है। यह गुह्य से भी गुह्य है।

शिव संहिता के अनुसार;-

जननेन्द्रिय मूल—मूलाधार चक्र में योनि स्थान बताया गया है।

चार पंखुरियों वाले मूलाधार चक्र के कन्द भाग में जो प्रकाशवान् योनि है।

उस आधार पद्म की कर्णिका में अर्थात् दण्डी में त्रिकोण योनि है। यह योनि सब तन्त्रों करके गोपित है।

यह गुह्य नामक स्थान देव योनि है। उसी में जो वह्नि उत्पन्न होती है वह परम कल्याणकारिणी है।

गोरक्ष पद्धति के अनुसार;-

पहले मूलाधार एवं दूसरे स्वाधिष्ठान चक्र के बीच में योनि स्थान है, यही काम रूप पीठ है।

गुदा स्थान में