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विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 48 ,49 विधियां क्या है?


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ध्‍वनि-संबंधी अंतिम विधि:

‘’अपने नाम की ध्‍वनि में प्रवेश करो, और उस ध्‍वनि के द्वारा सभी ध्‍वनियों में।‘’

मंत्र की तरह नाम का उपयोग बहुत आसानी से किया जा सकता है। यह बहुत सहयोगी होगा, क्‍योंकि तुम्‍हारा नाम तुम्‍हारे अचेतन में बहुत गहरे उतर चुका है। दूसरी कोई भी चीज अचेतन की उस गहराई को नहीं छूती है। यहां हम इतने लोग बैठे है। यदि हम सभी सो जाएं और कोई बाहर से आकर राम को आवाज दे तो उस व्‍यक्‍ति के सिवाय जिसका नाम राम है, कोई भी उसे नहीं सुनेगा। राम उसे सुन लेगा। सिर्फ राम की नींद में उससे बाधा पहुँचेगी। दूसरे किसी को भी राम की आवाज सुनाई नहीं देगी।

लेकिन एक आदमी क्‍यों सुनता है? कारण यह है कि यह नाम उसके गहरे अचेतन में उतर गया है। अब यह चेतन नहीं है, अचेतन बन गया है। तुम्‍हारा नाम तुम्‍हारे बहुत भीतर तक प्रवेश कर गया है। तुम्‍हारे नाम के साथ एक बहुत सुंदर घटना घटती है। तुम कभी अपने को अपने नाम से नहीं पुकारते हो। सदा दूसरे तुम्‍हारा नाम पुकारते है। तुम अपना नाम कभी नहीं लेते, सदा दूसरे लेते है।

मैंने सूना है कि पहले महायुद्ध में अमेरिका में पहली बार राशन लागू किया गया। थॉमस एडीसन महान वैज्ञानिक था, लेकिन क्‍योंकि गरीब था इसलिए उसे भी अपने राशन कार्ड के लिए कतार में खड़ा होना पडा। और वह इतना बड़ा आदमी था कि कोई उसके सामने उसका नाम नहीं लेता था। और उसे खूद कभी अपना नाम लेने की जरूरत नहीं पड़ती थी। और दूसरे लोग उसे इतना आदर करते थे कि उसे सदा प्रोफेसर कहकर पुकारते थे। तो एडीसन को अपना नाम भूल गया।

वह क्‍यू में खड़ा था। और जब उसका नाम पुकारा गया तो वह ज्‍यों का त्‍यों चुप खड़ा रहा। क्‍यू में खड़े दूसरे व्‍यक्‍ति ने, जो एडीसन का पड़ोसी था, उसने कहा कि आप चुप क्‍यों खड़े है। आपका नाम पुकारा जा रहा है। तब एडीसन को होश आया। और उसने कहा कि मुझे तो कोई भी एडीसन कहकर नहीं पुकारता है, सब मुझे प्रोफेसर कहते है। फिर मैं कैसे सुनता। अपना नाम सुने हुए मुझे बहुत समय हो गया है।

तुम कभी आना नाम नहीं लेते हो। दूसरे तुम्‍हारा नाम लेते है। तुम उसे दूसरों के मुंह से सुनते हो। लेकिन अपना नाम अचेतन में गहरा उतर जाता है—बहुत गहरा। वह तीर की तरह अचेतन में छिद जाता है। इसलिए अगर तुम अपने ही नाम का उपयोग करो तो वह मंत्र बन जाएगा। और दो कारणों से अपना नाम सहयोगी होता है।

एक कि जब तुम अपना नाम लेते हो—मान लो कि तुम्‍हारा नाम राम है और तुम राम-राम कहे जाते हो—तो कभी तुम्‍हें अचानक महसूस होगा कि मैं किसी दूसरे का नाम ले रहा हूं। कि यह मेरा नाम नहीं है। और अगर तुम यह भी समझो कि यह मेरा नाम है तो भी तुम्‍हें ऐसा लगेगा कि मेरे भीतर कोई दूसरा व्‍यक्‍ति है जो इस नाम का उपयोग कर रहा है। यह नाम शरीर का हो सकता है। मन का हो सकता है। लेकिन जो राम-राम कह रहा है वह साक्षी है।

तुमने दूसरों के नाम पुकारें है। इसलिए जब तुम अपना नाम लेते हो तो तुम्‍हें ऐसा लगता है कि यह नाम किसी और का है। मेरा नहीं। और यह घटना बहुत कुछ बताती है। तुम अपने ही नाम के साक्षा हो सकते हो। और इस नाम के साथ तुम्‍हारा समस्‍त जीवन जुड़ा है। नाम से प्रथक होते ही तुम अपने पूरे जीवन में पृथक हो जाते हो। और यह नाम तुम्‍हारे गहरे अचेतन में चला जाता है। क्‍योंकि तुम्‍हारे जन्‍म से ही लोग तुम्‍हें इस नाम से पुकारते है। तुम सदा-सदा इसे सुनते रहे हो। तो इस नाम का उपयोग करो। इस नाम के साथ तुम उन गहराइयों को छू लोगे जहां तक यह नाम प्रवेश कर गया है।

पुराने दिनों में हम सबको परमात्‍मा के नाम दिया करते थे। कोई राम कहलाता था, कोई नारायण कहलाता था। कोई कृष्‍ण कहलाता था। कोई विष्‍णु कहलाता था। कहते है कि मुसलमानों के सभी नाम परमात्‍मा के नाम है। और पूरी धरती पर यही रिवाज था कि परमात्‍मा के नाम के आधार पर हम लोगों के नाम रखते थे। और इसके पीछे कारण थे।

एक कारण तो यही विधि था। अगर तुम अपने नाम को मंत्र की तरह उपयोग करते हो तो इसके दोहरे लाभ हो सकते है। एक तो यह तुम्‍हारा अपना नाम होगा, जिसको तुमने इतनी बार सुना है। जीवन भर सुना है और जो तुम्‍हारे अचेतन में प्रवेश कर गया है। फिर यही परमात्‍मा का नाम भी है। और जब तुम उसको दोहराओगे तो कभी अचानक तुम्‍हें बोध होगा, कि यह नाम मुझसे पृथक है। और फिर धीरे-धीर उस नाम की अलग पवित्रता निर्मित होगी। महिमा निर्मित होगी। किसी दिन तुम्‍हें स्‍मरण होगा कि यह तो परमात्‍मा का नाम है। तब तुम्‍हारा नाम मंत्र बन गया है। तो इसका उपयोग करो। यह बहुत ही अच्‍छा है।

तुम अपने नाम के साथ कई प्रयोग कर सकते हो। अगर तुम सुबह पाँच बजे जागना चाहते हो तो तुम्‍हारे नाम से बढ़कर कोई अलार्म नहीं है। वह ठीक तुम्‍हें पाँच बजे जगा देगा। बस अपने भीतर तीन बार कहो: राम, तुम्‍हें ठीक पाँच बजे जाग जाना है। तीन बार कहकर तुरंत सो जाओ। तुम पाँच बजे जाग जाओगे। क्‍योंकि तुम्‍हारा नाम राम तुम्‍हारे गहन अचेतन में बसा है। अपना ही नाम लेकर अपने को कहो कि पाँच बजे मुझे जगा देना। और कोई तुम्‍हें जगा देगा। अगर तुम इस अध्‍याय को जारी रख सकते हो तो तुम पाओगे की ठीक पाँच बजे तुम्‍हें कोई पूकार रहा है। राम, जागों। यह तुम्‍हारा अचेतन पूकार रहा है।

यह विधि कहती है: ‘’अपने नाम की ध्‍वनि में प्रवेश करो, और उस ध्‍वनि के द्वारा सभी ध्‍वनियों में।‘’

तुम्‍हारा नाम सभी नामों के लिए द्वार बन सकता है। लेकिन ध्‍वनि में प्रवेश करो। पहले तुम जब राम-राम जपते हो तो वह शब्‍द भर है। लेकिन अगर जब सतत जारी रहता है तो उसका अर्थ कुछ और हो जाता है।

तुमने बाल्‍मीकी की कथा सुनी होगी। उन्‍हें यही राम मंत्र दिया गया था। लेकिन बाल्‍मीकी अनपढ़ था। सीधे-साधे बच्‍चे जैसा निर्दोष था। उन्‍होंने राम-राम जपना शुरू किया। लेकिन इतना अधिक जप किया कि वे भूल गये और राम की जगह मरा-मरा कहने लगे। वे राम-राम को इतनी तेजी से जपते थे कि वह मरा-मरा बन गया। और मरा-मरा कहकर ही वे पहूंच गये।

तुम भी अगर अपने भीतर अपने नाम का जाप तेजी से करो तो वह शब्‍द न रहकर ध्‍वनि में बदल जाता है। जब वह एक अर्थहीन ध्‍वनि हो जाती है। और तब राम और मरा में कोई भेद नहीं रहता। अब शब्‍द नहीं रहे, वे बस ध्‍वनि है। और ध्‍वनि असली चीज है।

तो अपने नाम की ध्‍वनि में प्रवेश करो, उसके अर्थ को भूल जाओ। सिर्फ ध्‍वनि में प्रवेश करो। अर्थ मन की चीज है, ध्‍वनि शरीर की चीज है। अर्थ सिर में रहता है। ध्‍वनि सारे शरीर में फैल जाती है। अर्थ को भूल ही जाओ। उसे एक अर्थहीन ध्‍वनि की तरह जपो। और इस ध्‍वनि के जरिए तुम सभी ध्‍वनियों में प्रवेश पा जाओगे। यह ध्‍वनि सब ध्‍वनियों के लिए द्वार बन जाएगी। सब ध्‍वनियों का अर्थ है जो सब है—सारा अस्‍तित्‍व।

भारतीय अंतस—अनुसंधान का यह एक बुनियादी सूत्र है कि अस्‍तित्‍व की मूलभूत इकाई ध्‍वनि है। विद्युत नहीं है। आधुनिक विज्ञान कहता है कि अस्‍तित्‍व की मूलभूत इकाई विद्युत है, ध्‍वनि नहीं है। लेकिन वे यह भी मानते है कि ध्‍वनि भी एक तरह की विद्युत है। भारतीय सदा कहते आए है कि विद्युत ध्‍वनि का ही एक रूप है। तुमने सुना होगा कि किसी विशेष राम के द्वारा आग पैदा की जा सकती है। यह संभव है। क्‍योंकि भारतीय धारणा यह है कि समस्‍त विद्युत का आधार ध्‍वनि है। इसलिए अगर ध्‍वनि को एक विशेष ढंग से छेड़ा जाये, किसी खास राग में गया जाए तो विद्युत या आग पैदा हो सकती है।

लंबे पुलों पर फौज की टुकड़ियों को लयवद्ध शैली में चलने की मनाही है, क्‍योंकि कई बार ऐसा हुआ है कि उनकी लयवद्ध कदम पड़ने के कारण पुल टूट गए है। ऐसा उनके भार के कारण नहीं , ध्‍वनि के कारण होता है। अगर सिपाही लयवद्ध शैली में चलेंगे तो उनके लयवद्ध कदमों की विशेष ध्‍वनि के कारण पुल टूट जाएगा। वे सिपाही यदि सामान्‍य ढंग सक निकले तो पुल को कुछ नहीं होगा।

पुराने यहूदी इतिहास में उल्‍लेख है कि जेरीको शहर ऐसी विशाल दीवारों से सुरक्षित था कि उन्‍हें बंदूकों से तोड़ना संभव नही था। लेकिन वे ही दीवारें एक विशेष ध्‍वनि के द्वारा तोड़ डाली गई। उन दीवारों के टूटने का राज ध्‍वनि में छिपा है। दीवारों के सामने अगर उस ध्‍वनि को पैदा किया जाए तो दीवारें टूट जाएंगी। तुमने अली बाबा की कहानी सुनी होगी, उसमे भी एक खास ध्‍वनि बोल कर चट्टान हटाई जाती थी।

वे प्रतीक है। वह सच हो या नहीं , एक बात निश्‍चित है कि अगर तुम किसी ध्‍वनि का इस भांति सतत अभ्‍यास करते रहो कि उसका अर्थ मिट जाये, तुम्‍हारा मन विलीन हो जाए, तो तुम्‍हारे ह्रदय पर पड़ी चट्टान हट जायेगी।

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काम संबंधि पहला सूत्र–

‘’काम-आलिंगन में आरंभ में उसकी आरंभिक अग्‍नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।‘’

कई कारणों से काम कृत्‍य गहन परितृप्‍ति बन सकता है और वह तुम्‍हें तुम्‍हारी अखंडता पर, स्‍वभाविक और प्रामाणिक जीवन पर वापस पहुंचा सकता है। उन कारणों को समझना होगा।

एक कारण यह है कि काम कृत्‍य समग्र कृत्‍य है। इसमें तुम अपने मन से बिलकुल अलग हो जाते हो। छूट जाते हो। यही कारण है कि कामवासना से इतना डर लगता है। तुम्‍हारा तादात्‍म्‍य मन के साथ है और काम अ-मन का कृत्‍य है। उस कृत्‍य में उतरते ही तुम बुद्धि-विहीन हो जाते हो। उसमे बुद्धि काम नहीं करती। उसमे तर्क की जगह नहीं है। कोई मानसिक प्रक्रिया नहीं है। और अगर मानसिक प्रक्रिया चलती है तो काम कृत्‍य सच्‍चा और प्रामाणिक नहीं हो सकता। तब आर्गाज्‍म संभव नहीं है। गहन परितृप्‍ति संभव नहीं है। तब काम-कृत्‍य उथला हो जाता है। मानसिक कृत्‍य हो जाता है। ऐसा ही हो गया है।

सारी दुनिया में कामवासना की इतनी दौड़ है, काम की इतनी खोज है, उसका कारण यह नहीं है कि दुनिया ज्‍यादा कामुक हो गई है। उसका कारण इतना ही हे कि तुम काम-कृत्‍य को उसकी समग्रता में नहीं भोग पाते हो। इसीलिए कामवासना की इतनी दौड़ है। यह दौड़ बताती है कि सच्‍चा काम खो गया है। और उसकी जगह नकली काम हावी हो गया है। सारा आधुनिक चित कामुक हो गया है। क्‍योंकि काम कृत्‍य ही खो गया है। काम कृत्‍य भी मानसिक कृत्‍य बन गया है। काम मन में चलता रहता है और तुम उसके संबंध में सोचते रहते हो।

मेरे पास अनेक लोग आते है और कहते है कि हम काम के संबंध में सोच-विचार करते है, पढ़ते है, चित्र देखते है। अश्‍लील चित्र देखते है। वही उनका कामानंद है, सेक्‍स का शिखर अनुभव है। लेकिन जब काम का असली क्षण आता है तो उन्‍हें अचानक पता चलता है कि उसमे उनकी रूचि नहीं है। यहां तक कि वे उसमे अपने को नापुंसग अनुभव करते है। सोच-विचार के क्षण में ही उन्‍हें काम उर्जा का एहसास होता है। लेकिन जब वे कृत्‍य में उतरना चाहते है तो उन्‍हें पता चलता है कि उसके लिए उनके पास ऊर्जा नहीं है। तब उन्‍हें कामवासना का भी पता नहीं चलता है। उन्‍हें लगता है कि उनका शरीर मुर्दा हो गया है।

उन्‍हें क्‍या हो गया है?यही हो रहा है कि उनका काम-कृत्‍य भी मानसिक हो गया है। वे इसके बारे में सिर्फ सोच विचार कर सकते है। वे कुछ कर नहीं सकते। क्‍योंकि कृत्‍य में तो पूरे का पूरा जाना पड़ता है। और जब भी पूरे होकर कृत्‍य में संलग्‍न होने की बात उठती है। मन बेचैन हो जाता है। क्‍योंकि तब मन मालिक नहीं रह सकता, तब मन नियंत्रण नहीं कर सकता।

तंत्र काम-कृत्‍य को, संभोग को तुम्‍हें अखंड बनाने के लिए उपयोग में लाता है। लेकिन तब तुम्‍हें इसमे बहुत ध्‍यानपूर्वक उतरना होगा। तब तुम्‍हें काम के संबंध में वह सब भूल जाना होगा जो तुमने सुना है, पढ़ा है, जो समाज ने, संगठित धर्मों ने, धर्म गुरूओं ने तुम्‍हें सिखाया है। सब कुछ भूल जाओ। दिया है। और समग्रता से इसमे उतरो। भूल जाओ कि नियंत्रण करना है। नियंत्रण ही बाधा है। उचित है कि तुम उस पर नियंत्रण करने की बजाय अपने को उसके हाथों में छोड़ दो। तुम ही उसके बस में हो जाओ। संभोग में पागल की तरह जाओ। अ-मन की अवस्‍था पागलपन जैसी मालूम पड़ती है। शरीर ही बन जाओ। पशु ही बन जाओ। क्‍योंकि पशु पूर्ण है।

जैसा आधुनिक मनुष्‍य है। उसे पूर्ण बनाने की सबसे सरल संभावना केवल काम में है। सेक्‍स में है, क्‍योंकि काम तुम्‍हारे भीतर गहन जैविक केंद्र है। तुम उससे ही उत्‍पन्‍न हुए हो। तुम्‍हारी प्रत्‍येक कोशिका काम-कोशिका है। तुम्‍हारा समस्‍त शरीर काम-उर्जा की घटना है।

यह पहला सूत्र कहता है: ‘’काम-आलिंगन के आरंभ में उसकी आरंभिक अग्‍नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।‘’

इसी में सारा फर्क है, सारा भेद है। तुम्‍हारे काम-कृत्‍य, संभोग महज राहत का, अपने को तनाव-मुक्‍त करने का उपाय है। इसलिए जब तुम संभोग में उतरते हो तो तुम्‍हें बहुत जल्‍दी रहती है। तुम किसी तरह छुटकारा चाहते हो। छुटकारा यह कि जो ऊर्जा का अतिरेक तुम्‍हें पीडित किए है वि निकल जाए और तुम चैन अनुभव करो। लेकिन यह चैन एक तरह की दुर्बलता है। ऊर्जा की अधिकता तनाव पैदा करती है। उतैजना पैदा करती है। और तुम्‍हें लगता है कि उसे फेंकना जरूरी है। जब वह ऊर्जा बह जाती है तो तुम कमजोरी अनुभव करते हो। और तुम उसी कमजोरी को विश्राम मान लेते हो। क्‍योंकि ऊर्जा की बाढ़ समाप्‍त हो गई उतैजना जाती रही, इसलिए तुम्‍हें विश्राम मालूम पड़ता है।

लेकिन यह विश्राम नकारात्‍मक विश्राम है। अगर सिर्फ ऊर्जा को बाहर फेंककर तुम विश्राम प्राप्‍त करते हो तो यह विश्राम बहुत महंगा है। और तो भी यह सिर्फ शारीरिक विश्राम होगा। वह गहरा नहीं होगा। वह आध्‍यात्‍मिक नहीं होगा।

यह पहला सूत्र कहता है कि जल्‍द बाजी मत करो और अंत के लिए उतावले मत बनो, आरंभ में बने रहो। काम-कृत्‍य के दो भाग है: आरंभ और अंत। तुम आरंभ के साथ रहो। आरंभ का भाग ज्‍यादा विश्राम पूर्ण है। ज्‍यादा उष्‍ण है। लेकिन अंत पर पहुंचने की जल्‍दी मत करो। अंत को बिलकुल भूल जाओ।

तीन संभावनाएं है। दो प्रेमी प्रेम में तीन आकार, ज्यामितिक आकार निर्मित कर सकते है। शायद तुमने इसके बारे में पढ़ा भी होगा। या कोई पुरानी कीमिया, की तस्‍वीर भी देखो। जिसमें एक स्‍त्री और एक पुरूष तीन ज्‍यामितिक आकारों में नग्‍न खड़े है। एक आकार चतुर्भुज है, दूसरा त्रिभुज है, और तीसरा वर्तुल है। यक अल्केमी और तंत्र की भाषा में काम क्रोध का बहुत पुराना विश्‍लेषण है।

आमतौर से जब तुम संभोग में होते हो तो वहां दो नहीं, चार व्‍यक्‍ति होते है। वही है चतुर्भुज। उसमे चार कोने है, क्‍योंकि तुम दो हिस्‍सों में बंटे हो। तुम्‍हारा एक हिस्‍सा विचार करने वाला है और दूसरा हिस्‍सा भावुक हिस्‍सा है। वैसे ही तुम्‍हारा साथी भी दो हिस्सों में बंटा है। तुम चार व्‍यक्‍ति हो दो नहीं। चार व्‍यक्‍ति प्रेम कर रहे है। यह एक भीड़ है, और इसमें वस्‍तुत: प्रगाढ़ मिलन की संभावना नहीं है। इस मिलन के चार कोने है और मिलन झूठा है। वह मिलन जैसा मालूम होता है। लेकिन मिलन है नहीं। इसमें प्रगाढ़ मिलन की कोई संभावना नहीं है। क्‍योंकि तुम्‍हारा गहन भाग दबा पडा है। केवल दो सिर, दो विचार की प्रक्रियाएं मिल रही है। भाव की प्रक्रियाएं अनुपस्थित है। वे दबी छीपी है।

दूसरी कोटी काम मिलन त्रिभुज जैसा होगा। तुम दो हो, आधार के कोने और किसी क्षण अचानक तुम दोनों एक हो जाते हो—त्रिभुज के तीसरे कोने की तरह। किसी आकस्‍मिक क्षण में तुम्‍हारी दुई मिट जाती है। और तुम एक हो जाते है। यह मिलन चतुर्भुजी मिलन से बेहतर है। क्‍योंकि कम से कम एक क्षण के लिए ही सही , एकता सध जाती है। वह एकता तुम्‍हें स्‍वास्‍थ्‍य देती है। शक्‍ति देती है। तुम फिर युवा और जीवंत अनुभव करते हो।

लेकिन तीसरा मिलन सर्वश्रेष्‍ठ है। और यह तांत्रिक मिलन है। इसमें तुम एक वर्तुल हो जाते हो, इसमें कोने नहीं रहते। और यह मिलन क्षण भर के लिए नहीं है, वस्‍तुत: यह मिलन समयातित है। उसमें समय नहीं रहता। और यह मिलन तभी संभव है जब तुम स्‍खलन नहीं खोजते हो। अगर स्‍खलन खोजते हो तो फिर यह त्रिभुजीय मिलन हो जाएगा। क्‍योंकि स्‍खलन होते ही संपर्क का बिंदु मिलन का बिंदू खो जाता है।

आरंभ के साथ रहो, अंत की फिक्र मत करो। इस आरंभ में कैसे रहा जाए? इस संबंध में बहुत सी बातें ख्‍याल में लेने जैसी है। पहली बात कि काम कृत्‍य को कहीं जाने का, पहुंचने का माध्‍यम मत बनाओ। संभोग को साधन की तरह मत लो, वह आपने आप में साध्‍य है। उसका कहीं लक्ष्‍य नहीं है, वह साधन नहीं है। और दूसरी बात कि भविष्‍य की चिंता मत लो, वर्तमान में रहो। अगर तुम संभोग के आरंभिक भाग में वर्तमान में नहीं रह सकते, तब तुम कभी वर्तमान में नहीं रह सकते। क्‍योंकि काम कृत्‍य की प्रकृति ही ऐसी है। कि तुम वर्तमान में फेंक दिए जाते हो।

तो वर्तमान में रहो। दो शरीरों के मिलन का सुखा लो, दो आत्‍माओं के मिलने का आनंद लो। और एक दूसरे में खो जाओ। एक हो जाओ। भूल जाओ कि तुम्‍हें कहीं जाना है। वर्तमान क्षण में जीओं, जहां से कहीं जाना नहीं है। और एक दूसरे से मिलकर एक हो जाओ। उष्‍णता और प्रेम वह स्‍थिति बनाते है जिसमें दो व्‍यक्‍ति एक दूसरे में पिघलकर खो जाते है। यही कारण है कि यदि प्रेम न हो तो संभोग जल्‍दबाजी का काम हो जाता है। तब तुम दूसरे का उपयोग कर रहे हो। दूसरे में डूब नहीं रहे हो। प्रेम के साथ तुम दूसरे में डूब सकते हो।

आरंभ का यह एक दूसरे में डूब जाना अनेक अंतदृष्‍टियां प्रदान करता है। अगर तुम संभोग को समाप्‍त करने की जल्‍दी नहीं करते हो तो काम-कृत्‍य धीरे-धीरे कामुक कम और आध्‍यात्‍मिक ज्‍यादा हो जाता है। जननेंद्रियों भी एक दूसरे में विलीन हो जाती है। तब दो शरीर ऊर्जाओं के बीच एक गहन मौन मिलन घटित होता है। और तब तुम घंटों साथ रह सकते हो। यह सहवास समय के साथ-साथ गहराता जाता है। लेकिन सोच-विचार मत करो, वर्तमान क्षण में प्रगाढ़ रूप से विलीन होकर रहो। वही समाधि बन जाती है। और अगर तुम इसे जान सके इसे अनुभव कर सके, इसे उपलब्‍ध कर सके तो तुम्‍हारा कामुक चित अकामुक हो जाएगा। एक गहन ब्रह्मचर्य उपलब्‍ध हो सकता है। काम से ब्रह्मचर्य उपलब्‍ध हो सकता है।

यह वक्‍तव्‍य विरोधाभासी मालूम होता है। काम से ब्रह्मचर्य उपलब्‍ध हो सकता है। क्‍योंकि हम सदा से सोचते आए है कि अगर किसी को ब्रह्मचारी रहना है। तो उसे विपरीत यौन के सदस्‍य को नहीं देखना चाहिए। उससे नहीं मिलना चाहिए। उससे सर्वथा बचना चाहिए, दूर रहना चाहिए। लेकिन उस हालत में एक गलत किस्‍म का ब्रह्मचर्य घटित होता है। जब चित विपरीत यौन के संबंध में सोचने में संबंध में सोचने में संलग्‍न हो जाता है। जितना ही तुम दूसरे से बचोगे उतना ही ज्‍यादा उसके संबंध में सोचने को विवश हो जाओगे। क्‍योंकि काम मनुष्‍य की बुनियादी आवश्‍यकता है, गहरी आवश्‍यकता है।

तंत्र कहता है कि बचने की, भागने की चेष्‍टा मत करो, बचना संभव नहीं है। अच्‍छा है कि प्रकृति को ही उसके अतिक्रमण का साधन बना लो। लड़ों मत प्रकृति के अतिक्रमण के लिए प्रकृति को स्वीकार करो।

अगर तुम्‍हारी प्रेमिका या तुम्‍हारी प्रेमी के साथ इस मिलन को अंत की फिक्र किए बिना लंबाया जा सके तो तुम आरंभ में ही बने रहे सकते हो। उतैजना ऊर्जा है और शिखर पर जाकर तुम उसे खो सकते हो। ऊर्जा के खोन से गिरावट आती है। कमजोरी पैदा होती है। तुम उसे विश्राम समझ सकते हो। लेकिन वह उर्जा का अभाव है।

तंत्र तुम्‍हें उच्‍चतर विश्राम का आयाम प्रदान करता है। प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे में विलीन होकर एक दूसरे को शक्‍ति प्रदान करते है। तब वे एक वर्तुल बन जाते है। और उनकी ऊर्जा वर्तुल में घूमने लगती है। वह दोनों एक दूसरे को जीवन ऊर्जा दे रहे है। नव जीवन दे रहे है। इसमे ऊर्जा का ह्रास नहीं होता है। वरन उसकी वृद्धि होती है। क्‍योंकि विपरीत यौन के साथ संपर्क के द्वारा तुम्‍हारा प्रत्‍येक कोश ऊर्जा से भर जाता है। उसे चुनौती मिलती हे।

यदि स्‍खलन न हो, यदि ऊर्जा को फेंका न जाए तो संभोग ध्‍यान बन जाता है। और तुम पूर्ण हो जाते हो। इसके द्वारा तुम्‍हारा विभाजित व्‍यक्‍तित्‍व अविभाजित हो जाता है। अखंड हो जाता है। चित की सब रूग्‍णता इस विभाजन से पैदा होती है। और जब तुम जुड़ते हो, अखंड होते हो तो तुम फिर बच्‍चे हो जाते हो। निर्दोष हो जाते हो

और एक बार अगर तुम इस निर्दोषता का उपलब्‍ध हो गए तो फिर तुम अपने समाज में उसकी जरूरत के अनुसार जैसा चाहो वैसा व्‍यवहार कर सकते हो। लेकिन तब तुम्‍हारा यह व्‍यवहार महज अभिनय होगा, तुम उससे ग्रस्‍त नहीं होगे। तब यह एक जरूरत है जिसे तुम पूरा कर रहे हो। तब तुम उसमे नहीं हो। तुम मात्र एक अभिनय कर रहे हो। तुम्‍हें झूठा चेहरा लगाना होगा। क्‍योंकि तुम एक झूठे संसार में रहते हो। अन्‍यथा संसार तुम्‍हें कुचल देगा, मार डालेगा।

हमने अनेक सच्‍चे चेहरों को मारा है। हमने जीसस को सूली पर चढ़ा दिया, क्‍योंकि वे सच्‍चे मनुष्‍य की तरह व्‍यवहार करने लगे थे। झूठा समाज इसे बर्दाश्‍त नहीं कर सकता है। हमने सुकरात को जहर दे दिया। क्‍योंकि वह भी सच्‍चे मनुष्‍य की तरह पेश आने लगे थे। समाज जैसा चाहे वैसा करो, अपने लिए और दूसरों के लिए व्‍यर्थ की झंझट मत पैदा करो। लेकिन जब तुमने अपने सच्‍चे स्‍वरूप को जान लिया, उसकी अखंडता को पहचान लिया तो यह झूठा समाज तुम्‍हें फिर रूग्‍ण नहीं कर सकता, विक्षिप्‍त नहीं कर सकता।

‘’काम-आलिंगन के आरंभ में उसकी आरंभिक अग्‍नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।‘’

अगर स्‍खलन होता है तो ऊर्जा नष्‍ट होती है। और तब अग्‍नि नहीं बचती। तुम कुछ प्राप्‍त किए बिना ऊर्जा खो देते हो।;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

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काम संबंधि दूसरा सूत्र–

‘’ऐसे काम-आलिंगन में जब तुम्‍हारी इंद्रियाँ पत्‍तों की भांति कांपने लगें उस कंपन में प्रवेश करो।‘’

जब प्रेमिका या प्रेमी के साथ ऐसे आलिंगन में, ऐसे प्रगाढ़ मिलन में तुम्‍हारी इंद्रियाँ पत्‍तों की तरह कांपने लगें, उस कंपन में प्रवेश कर जाओ।

तुम भयभीत हो गए हो, संभोग में भी तुम अपने शरीर को अधिक हलचल नहीं करने देते हो। क्‍योंकि अगर शरीर को भरपूर गति करने दिया जाए तो पूरा शरीर इसमें संलग्‍न हो जाता है तुम उसे तभी नियंत्रण में रख सकते हो जब वह काम-केंद्र तक ही सीमित रहता है। तब उस पर मन नियंत्रण कर सकता है। लेकिन जब वह पूरे शरीर में फैल जाता है तब तुम उसे नियंत्रण में नहीं रख सकते हो। तुम कांपने लगोगे। चीखने चिल्‍लाने लगोगे। और जब शरीर मालिक हो जाता है तो फिर तुम्‍हारा नियंत्रण नहीं रहता।

हम शारीरिक गति का दमन करते है। विशेषकर हम स्‍त्रियों को दुनियाभर में शारीरिक हलन-चलन करने से रोकते है। वे संभोग में लाश की तरह पड़ी रहती है। तुम उनके साथ जरूर कुछ कर रहे हो, लेकिन वे तुम्‍हारे साथ कुछ भी नहीं करती, वे निष्‍क्रिय सहभागी बनी रहती है। ऐसा क्‍यों होता है। क्‍यों सारी दुनिया में पुरूष स्‍त्रियों को इस तरह दबाते है।

कारण भय है। क्‍योंकि एक बार अगर स्‍त्री का शरीर पूरी तरह कामाविष्‍ट हो जाए तो पुरूष के लिए उसे संतुष्‍ट करना बहुत कठिन है। क्‍योंकि स्‍त्री एक शृंखला में, एक के बाद एक अनेक बार आर्गाज्‍म के शिखर को उपलब्‍ध हो सकती है। पुरूष वैसा नहीं कर सकता। पुरूष एक बार ही आर्गाज्‍म के शिखर अनुभव को छू सकता है। स्‍त्री अनेक बार छू सकती है। स्‍त्रियों के ऐसे अनुभव के अनेक विवरण मिले है। कोई भी स्‍त्री एक शृंखला में तीन-तीन बार शिखर-अनुभव को प्राप्‍त हो सकती है। लेकिन पुरूष एक बार ही हो सकता है। सच तो यह है कि पुरूष के शिखर अनुभव से स्‍त्री और-और शिखर अनुभव को उत्‍तेजित होती है। तैयार होती है। तब बात कठिन हो जाती है। फिर क्‍या किया जाए?

स्‍त्री को तुरंत दूसरे पुरूष की जरूरत पड़ जाती है। और सामूहिक कामाचार निषिद्ध है। सारी दुनियां में हमने एक विवाह वाले समाज बना रखे है। हमें लगता है कि स्‍त्री का दमन करना बेहतर है। फलत: अस्‍सी से नब्‍बे प्रतिशत स्‍त्रियां शिखर अनुभव से वंचित रह जाती है। वे बच्‍चों को जन्‍म दे सकती है। यह और बात है। वे पुरूष को तृप्‍त कर सकती है। यह भी और बात है। लेकिन वे स्‍वयं कभी तृप्‍त नहीं हो पाती। अगर सारी दुनिया की स्‍त्रियां इतनी कड़वाहट से भरी है, दुःखी है, चिड़चिड़ी है, हताश अनुभव करती है। तो यह स्‍वाभाविक है। उनकी बुनियादी जरूरत पूरी नहीं होती।

कांपना अद्भुत है। क्‍योंकि जब संभोग करते हुए तुम कांपते हो तो तुम्‍हारी ऊर्जा पूरे शरीर में प्रवाहित होने लगती है। सारे शरीर में तरंगायित होने लगती है। तब तुम्‍हारे शरीर का अणु-अणु संभोग में संलग्‍न हो जाता है। प्रत्‍येक अणु जीवंत हो उठता है। क्‍योंकि तुम्‍हारा प्रत्‍येक अणु काम अणु है।

तुम्‍हारे जन्‍म में दो कास-अणु आपस में मिले और तुम्‍हारा जीवन निर्मित हुआ, तुम्‍हारा शरीर बना। वे दो काम अणु तुम्‍हारे शरीर में सर्वत्र छाए है। यद्यपि उनकी संख्‍या अनंत गुनी हो गई है। लेकिन तुम्‍हारी बुनियादी इकाई काम-अणु ही है। जब तुम्‍हारा समूचा शरीर कांपता है तो प्रेमी प्रेमिका के मिलन के साथ-साथ तुम्‍हारे शरीर के भीतर प्रत्‍येक पुरूष-अणु स्‍त्री अणु से मिलता है। वह कंपन यही बताता है। यह पशुवत मालूम पड़ेगा। लेकिन मनुष्‍य पशु है और पशु होने में कुछ गलती नहीं है।

यह दूसरा सूत्र कहता है: ‘’ऐसे काम-आलिंगन में जब तुम्‍हारी इंद्रियाँ पत्‍तों की भांति कांपने लगे।‘’

मानो तूफान चल रहा है और वृक्ष कांप रहा है। उनकी जड़ें तक हिलने लगती है। पत्‍ता-पत्‍ता कांपने लगता है। यही हालत संभोग में होती है। कामवासना भारी तूफान है। तुम्‍हारे आर-पार एक भारी ऊर्जा प्रवाहित हो रही है। कंपो। तरंगायित होओ। अपने शरीर के अणु-अणु को नाचने दो। और इस नृत्‍य में दोनों के शरीरों को भाग लेना चाहिए। प्रेमिका को भी नृत्‍य में सम्‍मिलित करो। अणु-अणु को नाचने दो। तभी तुम दोनों का सच्‍चा मिलन होगा। और वह मिलन मानसिक नहीं होगा। वह जैविक ऊर्जा का मिलन होगा।

‘’उस कंपन में प्रवेश करो।‘’

और कांपते हुए उससे अलग-थलग मत रहो, मन का स्‍वभाव दर्शक बने रहने का है। इसलिए अलग मत रहो। कंपन ही बन जाओ। सब कुछ भूल जाओ और कंपन ही कंपन हो रहो। ऐसा नहीं कि तुम्‍हारा शरीर ही कांपता है। तुम पूरे के पूरे कांपते हो, तुम्‍हारा पूरा अस्‍तित्‍व कांपता है। तुम खुद कंपन ही बन जाते हो। तब दो शरीर और दो मन नहीं रह जाएंगे। आरंभ में दो कंपित ऊर्जाऐं है, और अंत में मात्र एक वर्तुल है। दो नहीं रहे।

इस वर्तुल में क्‍या घटित होगा। पहली बात तो उस समय तुम अस्‍तित्‍वगत सत्‍ता के अंश हो जाओगे। तुम एक सामाजिक चित नहीं रहोगे। अस्‍तित्‍वगत ऊर्जा बन जाओगे। तुम पूरी सृष्‍टि के अंग हो जाओगे। उस कंपन में तुम पूरे ब्रह्मांड के भाग बन जाओगे। वह क्षण महान सृजन का क्षण है। ठोस शरीरों की तरह तुम विलीन हो गए हो, तुम तरल होकर एक दूसरे में प्रवाहित हो गए हो। मन खो गया, विभाजन मिट गया, तुम एकता को प्राप्‍त हो गए।

यही अद्वैत है। और अगर तुम इस अद्वैत को अनुभव नहीं करते हो अद्वैत का सारा दर्शन शास्त्र व्यर्थ है। वह बस शब्‍द ही शब्‍द है। जब तुम इस अद्वैत अस्‍तित्‍वगत क्षण को जानोंगे तो ही तुम्‍हें उपनिषद समझ में आएँगे। और तभी तूम संतों को समझ पाओगे। कि जब वे जागतिक एकता की अखंडता की बात करते है तो उनका क्‍या मतलब है। तब तुम जगत से भिन्‍न नहीं होगे। उससे अजनबी नहीं होगे। तब पूरा अस्‍तित्‍व तुम्‍हारा घर बन जाता है। और इस भाव के साथ कि पूरा अस्‍तित्‍व मेरा घर है। सारी चिंताएं समाप्‍त हो जाती है। फिर कोई द्वंद्व न रहा, संघर्ष न रहा, संताप न रहा।

उसका ही लाओत्से ताओ कहते है, शंकर अद्वैत कहते है। तब तुम उसके लिए कोई अपना शब्‍द भी दे सकते हो। लेकिन प्रगाढ़