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क्या है विज्ञानमय कोश की सोऽहं साधना और ग्रन्थि-भेदन?PART-01


विज्ञानमय कोश के चार अंग प्रधान हैं।

1- सोऽहं साधना 2-ग्रन्थि-भेदन 3- स्वर संयम 4- आत्म -अनुभूति योग

सोऽहं साधना;-

कुण्डलिनी जागरण के लिये प्रयुक्त होने वाली सोहम् साधना-अजपा गायत्री के विज्ञान एवं विधान के समन्वय को हंसयोग कहते हैं। हंसयोग साधना का महत्व और प्रतिफल बताते हुए योगविद्या के आचार्यों ने कहा है— जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि और तिलों में तेल रहता है। उसी प्रकार समस्त वेदों में ‘हंस’ ब्रह्म रहता है। जो उसे जान लेता है सो मृत्यु से छूट जाता है। सोहम् ध्वनि को निरन्तर करते रहने से उसका एक शब्द चक्र बन जाता है जो उलट कर हंस सदृश प्रतिध्वनित होता है। इसी आधार पर उस साधना का एक नाम हंसयोग भी रहा गया है।योग रसायन के अनुसार हंस, हंसो —इस पुनरावर्तित क्रम से जप करते रहने पर शीघ्र ही ‘सोहं-सोहं’ ऐसा जप होने लगता है। अभ्यास के अनन्तर चलते, बैठते और सोते समय भी हंस मन्त्र का चिन्तन, (सांस लेते समय ‘सो’ छोड़ते समय ‘ह’ का चिन्तन अभ्यास) परम सिद्धिदायक है। इसे ही ‘हंस’, ‘हंसो ’ या ‘सोहं’ मन्त्र कहते हैं। जब मन उसे हंस तत्व में लीन हो जाता है तो मन के संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं और शक्ति रूप, ज्योति रूप, शुद्ध-बुद्ध, नित्य निरंजन ब्रह्म का प्रकाश प्रकाशवान होता है। ब्रह्म विद्योपनिषद् के अनुसार प्राणियों की देह में भगवान ‘हंस’ रूप में अवस्थित है। हंस ही परम सत्य है, हंस ही परम् बल है। समस्त देवताओं के बीच ‘हंस’ ही परमेश्वर है। हंस ही परम वाक्य है, हंस ही वेदों का सार है, हंस परम् रुद्र है, हंस ही परात्पर है। समस्त देवों के बीच हंस अनुपम ज्योति बनकर विद्यमान है। सदा तन्मयतापूर्वक हंस मन्त्र का जप निर्मल प्रकाश का ध्यान करते हुए करना चाहिए। जो हृदय में अवस्थित अनाहत ध्वनि सहित प्रकाशवान चिदानन्द ‘हंस’ तत्व को जानता है सो हंस ही कहा जाता है। जो अमृत से अभिसिंचन करते हुए ‘हंस’ तत्व का जप करता है उसे सिद्धियों और विभूतियों की प्राप्ति होती है। इस संसार में ‘हंस’ विद्या के समान और कोई साधन नहीं। इस महाविद्या को देने वाला ज्ञानी सब प्रकार सेवा करने योग्य है''। जिस प्रकार हंस स्वच्छन्द होकर आकाश में उड़ता है उसी प्रकार इस हंसयोग का साधक सर्व बन्धनों से विमुक्त होता है। ‘ह’ और ‘स’ अक्षरों से कई प्रकार के अर्थ निकलते हैं और दोनों के योग से साधक को एक उपयुक्त धारा मिलती है। श्वास के निकलने में ‘हकार’ और प्रविष्ट होने में साकार होता है। हकार शिवरूप और साकार शक्तिरूपा कहलाता है। हकार से सूर्य या दक्षिण स्वर होता है और साकार से चन्द्र या वाम स्वर होता है। इस सूर्य चन्द्र दोनों स्वरों में समता स्थापित हो जाने का नाम हठयोग है। हम द्वारा सब दोषों की कारणभूत जड़ता का नाश हो जाता है और तब साधक क्षेत्रज्ञ (परमात्मा) से एकता प्राप्त कर लेता है। जीवात्मा सहज स्वभाव सोहम् का जप श्वास-प्रश्वास क्रिया के साथ-साथ अनायास ही करता रहता है। यह संख्या औसतन चौबीस घंटे में 21600 के लगभग हो जाती है। हकारेण बहियति सकारेण विशेत्पुनः । हंस हंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ।। षट शतानि त्वहोरात्रे सहस्राण्येकविंशति । एतत्संख्यान्वितं मंत्रं जीवो जपति सर्वदा ।। —गोरक्ष संहिता 41-42 यह जीव हकार की ध्वनि से बाहर आता है और साकार की ध्वनि से भीतर जाता है इस प्रकार वह सदा हंस-हंस जप करता रहता है। इस तरह वह एक दिन रात में जीव इक्कीस हजार छह सो मंत्र सदा जपता रहता है। संस्कृत व्याकरण के आधार पर सोऽहं का संक्षिप्त रूप ॐ हो जाता है। साकारं च हकारं च क्तोपयित्व प्रयोजनेत् । संधि च पूर्व रूपाख्यां ततोऽसौप्रणवो भवेत् ।। सोहम् पद में से साकार और हकार का लोप करके संधि योजना करके वह प्रणव ॐकार रूप हो जाता है। हंस योग के अभ्यास का असाधार महत्व है। उसे कुण्डलिनी जागरण साधना का तो एक अंग ही माना गया है। विभर्ति कुण्डली शक्ति रात्मानं हंसयाश्रिता —तन्त्र सार कुण्डलिनी शक्ति आत्म क्षेत्र में हंसारूढ़ होकर विचरती है। गायत्री का वाहन हंस कहा गया है। यह पक्षी विशेष न होकर हंस योग ही समझा जाना चाहिए। यों हंस पक्षी में भी स्वच्छ धवलता—नीर क्षीर विवेकयुक्त आहार विशेषताओं की ओर इंगित करते हुए निर्मल जीवन सत्-असत् निर्धारण एवं नीति युक्त उपलब्धियों को ही अंगीकार किया जाना जैसी उत्कृष्टताओं का प्रतीक माना गया है किन्तु तात्विक दृष्टि से गायत्री का हंस वाहिनी होना उसकी प्राप्ति के लिए हंस योग की सोहम् की साधना का निर्देश माना जाना ही उचित है। देहो देवालयः प्रोक्तो जीवो नाम सदा शिवः । त्यजेद ज्ञानं निर्माल्यं सोह् भावेन पूजयेत् ।। —प्रपञ्च तन्त्र देह देवालय है। इसमें जीव रूप में शिव विराजमान हैं। इसकी पूजा वस्तुओं से नहीं सोऽहम् साधना से करनी चाहिए। अन्तःकरण में हंस वृत्ति की स्थापना की यह साधना अजपा गायत्री भी कही जाती है। अजपा गायत्री का महत्व बताते हुए शास्त्रकार कहते हैं— अजपा नाम गायत्री ब्रह्मविष्णुमहेश्वरी । अजपां जपते यस्तां पुनर्जन्म न विद्यते ।। —अग्नि पुराण अजपा गायत्री ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र की शक्तियों से परिपूर्ण है। इसका जप करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता है। अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदायिनी । अस्याः संकल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। गोरक्षसंहिता इसका नाम ‘अजपा’ गायत्री है, जो कि योगियों के लिए मोक्ष को देने वाली है। इसके संकल्प मात्र से सब पापों से छुटकारा हो जाता है। अनया सदृशी विद्या अनया सदृशो जपः । अनया सदृशं ज्ञानं न भूतं न भविष्यति ।। —गोरक्षसंहिता गोरक्षसंहिता इसके समान न कोई विद्या है, न इसके समान कोई ज्ञान ही भूत-भविष्य काल में हो सकता है। अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदा सदा ।। —शिव स्वरोदय अजपा गायत्री योगियों के लिये मोक्ष देने वाली है। श्वास लेते समय ‘सो’ ध्वनि का और छोड़ते समय ‘हम्’ ध्यान के प्रवाह को सूक्ष्म श्रवण शक्ति के सहारे अन्तः भूमिका में अनुभव करना—यही हैं संक्षेप में ‘सोऽहम्’ साधना। वायु जब छोटे छिद्र में होकर वेगपूर्वक निकलती है तो घर्षण के कारण ध्वनि प्रवाह उत्पन्न होता है। बांसुरी से स्वर लहरी निकलने का यही आधार है। जंगलों में जहां बांस बहुत उगे होते हैं वहां अक्सर बांसुरी जैसी ध्वनियां सुनने को मिलती हैं। कारण कि बांसों में कहीं कहीं कीड़े छेद कर देते हैं और उन छेदों से जब हवा वेग पूर्वक टकराती है तो उसमें उत्पन्न स्वर प्रवाह सुनने को मिलता है। वृक्षों से टकराकर जब द्रुत गति से हवा चलती है तब भी सनसनाहट सुनाई पड़ती है। यह वायु के घर्षण की ही प्रतिक्रिया है। नासिका छिद्र भी बांसुरी के छिद्रों की तरह हैं। उनकी सीमित परिधि में होकर जब वायु भीतर प्रवेश करेगी तो वहां स्वभावतः ध्वनि उत्पन्न होगी। साधारण श्वास-प्रश्वास के समय भी वह उत्पन्न होती है, पर इतनी धीमी रहती है कि कानों के छिद्र उन्हें सरलतापूर्वक नहीं सुन सकते। प्राणयोग की साधना में गहरे श्वासोच्छवास लेने पड़ते हैं। प्राणायाम का मूल स्वरूप ही यह है कि श्वास जितनी अधिक गहरी, जितनी मन्दगति से ली जा सके लेनी चाहिए और फिर कुछ समय भीतर रोक कर धीरे-धीरे उस वायु को पूरी तरह खाली कर देना चाहिए। गहरी और पूरी सांस लेने से स्वभावतः नासिका छिद्रों से टकरा कर उत्पन्न होने वाला ध्वनि प्रवाह और भी अधिक तीव्र हो जाता है। इतने पर भी वह ऐसा नहीं बन पाता कि खुले कानों से उसे सुना जा सके। कर्णेन्द्रियों की सूक्ष्म चेतना में ही उसे अनुभव किया जा सकता है। चित्त को श्वसन क्रिया पर एकाग्र करना चाहिए। और भावना को इस स्तर की बनाना चाहिए कि उससे श्वास लेते समय ‘सो’ शब्द के ध्वनि प्रवाह की मन्द अनुभूति होने लगे। उसी प्रकार जब सांस छोड़ना पड़े तो यह मान्यता परिपक्व करनी चाहिए कि ‘हम्’ ध्वनि प्रवाह विनिसृत हो रहा है। आरम्भ में कुछ समय यह अनुभूति उतनी स्पष्ट नहीं होती, किन्तु क्रम और प्रयास जारी रखने पर कुछ ही समय उपरान्त इस प्रकार का ध्वनि प्रवाह अनुभव में आने लगता है। और उसे सुनने में न केवल चित्त ही एकाग्र होता है वरन् आनन्द का अनुभव होता है। सो का तात्पर्य परमात्मा और हम् का जीवचेतना—समझा जाना चाहिए। निखिल विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त महाप्राण नासिका द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करता है और अंग प्रत्यंग में जीवकोश तथा नाड़ी तन्तु में प्रवेश करके उसको अपने सम्पर्क संसर्ग का लाभ प्रदान करता है। यह अनुभूति ‘सो’ शब्द ध्वनि के साथ अनुभूति भूमिका में उतरनी चाहिए। और ‘हम्’ शब्द के साथ जीव भाव द्वारा इस काय कलेवर पर से अपना कब्जा छोड़कर चले जाने की मान्यता प्रगाढ़ की जानी चाहिए। प्रकारान्तर से परमात्म सत्ता का अपने शरीर और मनःक्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित हो जाने की ही यह धारणा है। जीव भाव अर्थात् स्वार्थवादी संकीर्णता, काम, क्रोध, लोभ मोह भरी मद मत्सरता—अपने को शरीर या मन के रूप में अनुभव करते रहने वाली आत्मा की दिग्भ्रान्त स्थिति का नाम ही जीव भूमिका है। इस भ्रम जंजाल भरे जीव भाव को हटा दिया जाय तो फिर अपना विशुद्ध अस्तित्व ईश्वर के अविनाशी अंश आत्मा के रूप में ही शेष रह जाता है, काय कलेवर के कण-कण पर परमात्मा के शासन की स्थापना और जीव धारण की बेदखली यही है सोऽहम् साधना का तत्वज्ञान। श्वास प्रश्वास क्रिया के माध्यम से सो और हम् ध्वनि के सहारे इसी भाव चेतना को जागृत किया जाता है कि अपना स्वरूप ही बदल रहा है अब शरीर और मन पर से लोभ-मोह का-वासना-तृष्णा का आधिपत्य समाप्त हो रहा है और उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। शासन परिवर्तन जैसी राज्यक्रान्ति जैसी यह भाव भूमिका है जिसमें अनाधिकारी अनाचारी शासन-सत्ता का तख्ता उलट कर उस स्थान पर सत्य, न्याय और प्रेम संविधान वाली धर्मसत्ता का राज्याभिषेक क्रिया जाता है। सोऽहम् साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अन्तःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियन्त्रण नहीं रहा उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा सकता है। श्वास ध्वनि ग्रहण करते समय ‘सो’ और निकालते समय ‘हम्’ की धारणा में लगना चाहिए। प्रयत्न करना चाहिए कि इन शब्दों के आरम्भ में अति मन्द स्तर की होने वाली अनुभूति में क्रमशः प्रखरता आती चली जाय। चिंतन का स्वरूप यह होना चाहिए कि सांस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काय कलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे हैं। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है, वरन् प्रत्येक अवयव पर सघन आधिपत्य बन रहा है। एक-एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगों के चित्र की कल्पना करनी चाहिए और अनुभव करना चाहिए उसमें भगवान की सत्ता चिरस्थायी रूप से समाविष्ट हो गई। हृदय, फुफ्फुस आमाशय, आंतें, गुर्दे, जिगर, तिल्ली आदि में भगवान का प्रवेश हो गया। रक्त के साथ प्रत्येक नस नाड़ी और कोशिकाओं पर भगवान ने अपना शासन स्थापित कर लिया। वाह्य अंगों ने, पांच कर्मेन्द्रियों और पांच ज्ञानेन्द्रियों ने भगवान के अनुशासन में रहना और उनका निर्देश पालन करना स्वीकार कर लिया। जीभ वही बोलेगी जो ईश्वरी प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक हो। देखना, सुनना, बोलना, चलना आदि इन्द्रियजन्य गतिविधियां दिव्य निर्देशों का ही अनुगमन करेंगी। ज्ञानेन्द्रिय का उपयोग वासना के लिए नहीं मात्र ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए अनिवार्य आवश्यकता का धर्म संकट सामने आ खड़ा होने पर ही किया जायेगा। हाथ-पांव मानवोचित कर्तव्य पालन के अतिरिक्त ऐसा कुछ न करेंगे जो ईश्वरीय सत्ता को कलंकित करता हो। मस्तिष्क ऐसा कुछ न सोचेगा जिसे उच्च आदर्शों के प्रतिकूल ठहराया जा सके। बुद्धि कोई अनुचित न्यायविरुद्ध एवं अदूरदर्शी अविवेक भरा निर्णय न करेगी। चित्त में अवांछनीय एवं निकृष्ट स्तरीय आकांक्षाएं न जमने पायेंगी। अहंता का स्तर नर कीटक जैसा नहीं नर नारायण जैसा होगा। यही हैं वे भावनायें जो शरीर और मन पर भगवान का शासन स्थापित होने के तथ्य को यथार्थ सिद्ध कर सकती हैं। यह सब उथली कल्पनाओं की तरह मनोविनोद भर नहीं रह जाना चाहिए वरन् उसकी आस्था इतनी प्रगाढ़ होनी चाहिए कि इस भाव परिवर्तन को क्रिया रूप में परिणत हुए बिना चैन ही न पड़े। सार्थकता उन्हीं विचारों की है जो क्रिया रूप में परिणत होने की प्रखरता से भरे हों, सोहम् साधना के पूर्वार्ध में अपने काय कलेवर पर श्वसन क्रिया के साथ प्रविष्ट हुये महाप्राण की—परब्रह्म की सत्ता स्थापना का इतना गहन चिंतन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के—प्रत्यक्ष तथ्य के—रूप में प्रस्तुत—दृष्टिगोचर होने लगे। इस साधना का उत्तरार्ध पाप निष्कासन का है। शरीर में से अवांछनीय इन्द्रिय लिप्साओं का—आलस्य प्रमाद जैसी दुष्कृतियों का—मन से लोभ, मोह जैसी तृष्णाओं का—अन्तस्थल से जीवभावी अहन्ता का—निवारण-निराकरण हो रहा है। ऐसी भावनायें अत्यन्त प्रगाढ़ होनी चाहिए। दुर्भावनायें और दुष्कृतियां, निष्कृष्टतायें और दुष्टतायें क्षुद्रतायें और हीनतायें सभी निरस्त हो रही हैं—सभी पलायन कर रही हैं यह तथ्य हर घड़ी सामने खड़ा दीखना चाहिए। अनुपयुक्तताओं के निरस्त होने के उपरान्त जो हलकापन—जो सन्तोष—जो उल्लास स्वभावतः होता है और निरन्तर बना रहता है उसी का प्रत्यक्ष अनुभव होना चाहिए। तभी यह कहा जा सकेगा कि सोऽहम् साधना का उत्तरार्ध भी एक तथ्य बन गया। सोऽहम् साधना के पूर्व भाग में श्वास लेते समय ‘सो’ ध्वनि के साथ जीवन सत्ता पर उस ‘परब्रह्म परमात्मा का शासन आधिपत्य स्थापित होने की स्वीकृति है। उत्तरार्ध में ‘हम्’ को—अहंता को—विसर्जित करने का भाव है। सांस निकली साथ-साथ अहम् भाव का भी निष्कासन हुआ। अहंता ही लोभ और मोह की जननी है। शरीराभ्यास में जीव उसी की प्रबलता के कारण डूबता है। माया, अज्ञान, अन्धकार, बन्धन आदि की भ्रांतियां एवं विपत्तियां इस अहंता के कारण ही उत्पन्न होती हैं। इसे विसर्जित कर देने पर ही भगवान का अन्तःक्षेत्र में प्रवेश करना—निवास करना सम्भव होता है। इस छोटे से मानवी अन्तःकरण में दो के निवास की गुंजाइश नहीं है। पूरी तरह एक ही रह सकता है। दोनों रहे तो लड़ते-झगड़ते रहते हैं और अंतर्द्वंद्व की खींचतान चलती रहती है। भगवान् को बहिष्कृत करके पूरी तरह ‘अहंमन्यता’ को प्रबल बना लिया जाय तो मनुष्य दुष्ट दुर्बुद्धि क्रूर-कर्मा असुर बनता है। अपनी कामनाएं—भौतिक महत्वाकांक्षायें ऐषणायें समाप्त करके ईश्वरीय निर्देशों पर चलने का संकल्प ही आत्म समर्पण है। यही शरणागति है। यही ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त होते ही मनुष्य में देवत्व का उदय होता है तब ईश्वरीय अनुभूतियां चिन्तन में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता भर देती हैं। ऐसे ही व्यक्ति महामानव ऋषि, देवता एवं अवतार के नाम से पुकारे जाते हैं। ‘सो’ में भगवान का शासन आत्म-सत्ता पर स्थापित करने और ‘हम्’ में अहंता का विसर्जन करने का भाव है। प्रकारान्तर से इसे महान् परिवर्तन का आन्तरिक कायाकल्प का बीजारोपण कह सकते हैं। सोऽहम् साधना का यही है भावनात्मक एवं व्यावहारिक स्वरूप। ईश्वर जीव को ऊंचा उठाना चाहता है। जीव ईश्वर को नीचे गिराना चाहता है। अस्तु दोनों के बीच रस्साकशी चलती और खींचतान होती रहती है न ईश्वर श्रेष्ठ जीवन क्रम देखे बिना सन्तुष्ट होता है और न अपनी न्याय-निष्ठा, कर्म-निष्ठा, कर्म-व्यवस्था तथाकथित पूजा पाठ के कारण छोड़ने को तैयार होता है। वह अपनी जगह अडिग रहता है और भक्त को तरह-तरह के उलाहने देने, शिकायतें करने, लांछन लगाने की स्थिति बनी ही रहती है। भक्त ईश्वर को अपने इशारे पर नचाना भर चाहता है। उससे उचित अनुदान मनोकामनायें पूरी कराने की पात्रता-कुपात्रता परखने की आदत छोड़ देने का आग्रह करता रहता है। दोनों अपनी जगह पर अडिग रहें—दोनों की दिशायें एक दूसरे की इच्छा के प्रतिकूल बनी रहें तो फिर एकता कैसे हो, सामीप्य सान्निध्य कैसे सधे? ईश्वर प्राप्ति की आशा कैसे पूर्ण हो? इस कठिनाई का समाधान ‘सोऽहम्’ साधना के साथ जुड़े हुए तत्व ज्ञान में सन्निहित है। दोनों एक-दूसरे से गुंथ जायं—परस्पर विलीनीकरण हो जाय। भक्त अपने आपको, अन्तःकरण, आकांक्षा एवं अस्तित्व को पूरी तरह समर्पित करदे और उसी के दिव्य संकेतों पर अपनी दिशा धाराओं का निर्धारण करे। इस स्थिति की प्रतिक्रिया द्वैत की समाप्ति और अद्वैत की प्राप्ति के रूप में होती है। जीव ने ब्रह्म को समर्पण किया है ब्रह्म की सत्ता स्वभावतः जीवधारी में अवतरित हुई दृष्टिगोचर होने लगेगी। समर्पण एक पक्ष से आरम्भ तो होता है, पर उसकी परिणति उभयपक्षीय एकता में होती है। यही प्रेम योग का रहस्य है। यही भक्त के भगवान बनने का तत्वज्ञान है। ईंधन जब अग्नि को समर्पण करता है तो वह भी ईंधन न रहकर आग बन जाता है। बूंद जब समुद्र में विलीन होती है तो उसकी तुच्छता असीम विशालता में परिणत हो जाता है। नमक और पानी—दूध और चीनी जब मिलते हैं तो दोनों की पृथकता समाप्त होकर सघन एकता बनकर उभरती है। यही है वेदान्त अनुमोदित जीवन लक्ष्य की पूर्ति—परम पद की प्राप्ति। इसी स्थिति को ‘अद्वैत’ कहते हैं। शिवोहम्—सच्चिदानन्दोहम्—तत्वमसि अयमात्मा ब्रह्म—की अनुभूति इसे सर्वोत्कृष्ट अन्तःस्थिति पर पहुंचे हुए साधक को होती है इसी को ईश्वर प्राप्ति, आत्म साक्षात्कार एवं ब्रह्म निर्वाण आदि नामों से पूर्णता के रूप में कहा गया है।सोऽहं साधना - विज्ञानमय कोश की साधना;- आत्मा के सूक्ष्म अन्तराल में अपने आप के सम्बन्ध में पूर्ण ज्ञान मौजूद है। वह अपनी स्थिति की घोषणा प्रत्येक क्षण करती रहती है ताकि बुद्धि भ्रमित न हो और अपने स्वरूप को न भूले। थोड़ा सा ध्यान देने पर आत्मा की इस घोषणा को हम स्पष्ट रूप से सुन सकते हैं। उस ध्वनि पर निरन्तर ध्यान दिया जाए तो उस घोषणा के करने वाले अमृत भण्डार आत्मा तक भी पहुँचा जा सकता है।

जब एक साँस लेते हैं तो वायु प्रवेश के साथ-साथ एक सूक्ष्म ध्वनि होती है जिसका शब्द ‘सो .ऽऽऽ...’ जैसा होता है। जितनी देर साँस भीतर ठहरती है अर्थात् स्वाभाविक कुम्भक होता है, उतनी देर आधे ‘अ ऽऽऽ’ की सी विराम ध्वनि होती है और जब साँस बाहर निकलती है तो ‘हं....’ जैसी ध्वनि निकलती है। इन तीनों ध्वनियों पर ध्यान केन्द्रित करने से अजपा-जाप की ‘सोऽहं’ साधना होने लगती है।

प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व नित्यकर्म से निपटकर पूर्व को मुख करके किसी शान्त स्थान पर बैठिए। मेरुदण्ड सीधा रहे। दोनों हाथों को समेटकर गोदी में रख लीजिए, नेत्र बन्द कर रखिये। जब नासिका द्वारा वायु भीतर प्रवेश करने लगे, तो सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय को सजग करके ध्यानपूर्वक अवलोकन कीजिए कि वायु के साथ-साथ ‘सो’ की सूक्ष्म ध्वनि हो रही है। इसी प्रकार जितनी देर साँस रुके ‘अ’ और वायु निकलते समय ‘हं’ की ध्वनि पर ध्यान केन्द्रित कीजिए। साथ ही हृदय स्थित सूर्य-चक्र के प्रकाश बिन्दु में आत्मा के तेजोमय स्फुल्लिंग की धारणा कीजिए। जब साँस भीतर जा रही हो और ‘सो’ की ध्वनि हो रही हो, तब अनुभव कीजिए कि यह तेज बिन्दु परमात्मा का प्रकाश है। ‘स’ अर्थात् परमात्मा, ‘ऽहम्’ अर्थात् मैं। जब वायु बाहर निकले और ‘हं’ की ध्वनि हो, तब उसी प्रकाश-बिन्दु में भावना कीजिए कि ‘यह मैं हूँ।’

‘अ’ की विराम भावना परिवर्तन के अवकाश का प्रतीक है। आरम्भ में उस हृदय चक्र स्थित बिन्दु को ‘सो’ ध्वनि के समय ब्रह्म माना जाता है और पीछे उसी की ‘हं’ धारणा में जीव भावना हो जाती है। इस भाव परिवर्तन के लिए ‘अ’ का अवकाश काल रखा गया है। इसी प्रकार जब ‘हं’ समाप्त हो जाए, वायु बाहर निकल जाए और नयी वायु प्रवेश करे, उस समय भी जीवभाव हटाकर उस तेज बिन्दु में ब्रह्मभाव बदलने का अवकाश मिल जाता है। यह दोनों ही अवकाश ‘अऽऽऽ’ के समान हैं, पर इनकी ध्वनि सुनाई नहीं देती। शब्द तो ‘सो’ ‘ऽहं’ का ही होता है।

‘सो’ ब्रह्म का ही प्रतिबिम्ब है, ‘ऽ’ प्रकृति का प्रतिनिधि है, ‘हं’ जीव का प्रतीक है। ब्रह्म, प्रकृति और जीव का सम्मिलन इस अजपा-जाप में होता है। सोऽहं साधना में तीनों महाकारण एकत्रित हो जाते हैं, जिनके कारण आत्म-जागरण का स्वर्ण सुयोग एक साथ ही उपलब्ध होने लगता है।

‘सोऽहं’ साधना की उन्नति जैसे-जैसे होती जाती है, वैसे ही वैसे विज्ञानमय कोश का परिष्कार होता जाता है। आत्म-ज्ञान बढ़ता है और धीरे-धीरे आत्म-साक्षात्कार की स्थिति निकट आती चलती है। आगे चलकर साँस पर ध्यान जमाना छूट जाता है और केवल हृदय स्थित सूर्य-चक्र में विशुद्ध ब्रह्मतेज के ही दर्शन होते हैं। उस समय समाधि की सी अवस्था हो जाती है। हंसयोग की परिपक्वता से साधक ब्राह्मी स्थिति का अधिकारी हो जाता है।

स्वामी विवेकानन्द जी ने विज्ञानमय कोश की साधना के लिए ‘आत्मानुभूति’ की विधि बताई है। उनके अमेरिकन शिष्य रामाचरक ने इस विधि को ‘मेण्टल डेवलपमेण्ट’ नामक पुस्तक में विस्तारपूर्वक लिखा है।

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ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि तथा रुद्रग्रंथि का क्या अर्थ है?-

04 FACTS;- 1-विज्ञान -मय कोष में तीन बंधन हैं ,जो भौतिक शरीर न रहने पर भी देव , गंधर्व ,यक्ष , भूत , पिशाच , आदि यौनियों में भी वैसे ही बंधन बंधे रहते हैं | इन्हें रूद्र [ तम ] , विष्णु [ सत ] और ब्रह्म [ रज ] ग्रंथियां कहते हैं | अर्थात तम ,रज सत द्वारा स्थूल , सूक्ष्म , और कारण शरीर बने हुऐ हैं | इन तीन ग्रंथियों से ही जीव बंधा हुआ है | इन तीनों को खोलने की जिम्मेदारी का नाम ही पितृ - ऋण ,ऋषि -ऋण व देव -ऋण कहलाता है |

2-तम को प्रकृति , रज को जीव और सत को आत्मा कहते हैं | संसार में तम को सांसारिक जीवन , रज को व्यक्तिगत जीवन व सत को आध्यात्मिक जीवन कह सकते हैं | देश ,जाति, और समाज के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन करना पितृ -ऋण से ,पूर्व-वर्ती लोगों के उपकारों से उऋण होने का मार्ग है | व्यक्तिगत जीवन को शारीरिक ,बौद्धिक और आर्थिक शक्तियों से संपन्न बनाना , अपने को मनुष्य - सुलभ गुणों से युक्त बनाना ऋषि- ऋण से छूटना है | स्वाध्याय, सत्संग ,भक्ति ,चिंतन ,मनन ,आदि साधनाओं द्वारा काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह ,मद ,मत्सर आदि को हटाकर आत्मा को निर्मल ,देव-तुल्य बनाना ,यह देव -ऋण से उऋण होना है | 3-साधक को विज्ञान -मय कोष में तीनों गांठों का अनुभव होता है | प्रथम मूत्राशय के समीप [ रूद्र ] ,दूसरी आमाशय के उपर भाग में [ विष्णु ] और तीसरी सिर के मध्य केंद्र में [ब्रह्म ] ग्रंथि कहलाती है | इन्हें दूसरे शब्दों में महाकाली , महालक्ष्मी , महा-सरस्वती भी कहते हैं | प्रत्येक की दो दो सहायक ग्रन्थियाँ होती हैं | इन्हें चक्र भी कहते हैं |रूद्र की [ मूलाधार , स्वाधिष्ठान ] , विष्णु की [ मणिपुर , अनाहत ] , ब्रह्म की [ विशुद्धि , आज्ञा ] चक्र कहा जाता है | हठ-योग की विधि से भी इन छ: चक्रों का वेधन [ छिद्रण ] किया जाता है | सिद्धों ने इन ग्रंथियों की अंदर की झांकी के अनुसार शिव , विष्णु और ब्रह्मा के चित्रों का निरूपण किया है | एक ही ग्रंथी ,दायें भाग से देखने पर पुरुष - प्रधान ,व बाएं भाग से देखने पर स्त्री - प्रधान आकार की होती है | 4-ब्रह्म - ग्रंथि मध्य-मस्तिष्क में है | इससे उपर सहस्रार शतदल कमल है | यह ग्रंथि उपर से चतुष्कोण [ चार कोने ] और नीचे से फ़ैली हुई है | इसका नीचे का एक तंतु ब्रह्म -रंध्र से जुडा हुआ है | इसी को सहस्रार -मुख वाले शेषनाग की शय्या पर सोते हुए भगवान की नाभि -कमल से उत्पन्न चार मुख वाला ब्रह्मा चित्रित किया गया है | वाम भाग में यही ग्रंथि चतुर्भुजी सरस्वती है | वीणा की झंकार से ओंकार - ध्वनी का यहाँ निरंतर गुंजार होता है | यही तीन ग्रंथियां ,जीव को बाँधे हुए हैं | जब ये खुल जाती हैं ,तो मुक्ति का अधिकार अपने आप मिल जाता है | इन रत्न -राशियों के मिलते ही शक्ति , सम्पन्नता ,और प्रज्ञा का अटूट भण्डार हाथ में आ जाता है | ये शक्तियां सम - दर्शी हैं | रावण जैसे असुरों ने भी शंकरजी से वरदान पाए थे | परन्तु अनेक देवताओं को भी यह सफलता नहीं मिली | इसमें साधक का पुरुषार्थ ही प्रधान है |

ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि तथा रुद्रग्रंथि का छेदन;-

10 FACTS;-

1-"अ" ब्रह्मा का वाचक है; उच्चारण द्वारा हृदय में उसका त्याग होता है। "उ" विष्णु का वाचक हैं; उसका त्याग कंठ में होता है तथा "म" रुद्र का वाचक है और उसका त्याग तालुमध्य में होता है। इसी प्रणाली से ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि तथा रुद्रग्रंथि का छेदन हो जाता है।

2-तदनंतर बिंदु है, जो स्वयं ईश्वर रूप है अर्थात् बिंदु से क्रमश: ऊपर की ओर वाच्यवाचक का भेद नहीं रहता। भ्रूमध्य में बिंदु का त्याग होता है। नाद सदाशिवरूपी है। ललाट से मूर्धा तक के स्थान में उसका त्याग करना पड़ता है। यहाँ तक का अनुभव स्थूल है।

3-इसके आगे शक्ति का व्यापिनी तथा समना भूमियों में सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। इस भूमि के वाच्य शिव हैं, जो सदाशिव से ऊपर तथा परमशिव से नीचे रहते हैं। मूर्धा के ऊपर स्पर्शनुभूति के अनंतर शक्ति का भी त्याग हो जाता है एवं उसके ऊपर व्यापिनी का भी त्याग हो जाता है। उस समय केवल मनन मात्र रूप का अनुभव होता है। यह समना भूमि का परिचय है। इसके बाद ही मनन का त्याग हो जाता है।

4-इसके उपरांत कुछ समय तक मन के अतीत विशुद्ध आत्मस्वरूप की झलक दीख पड़ती है। इसके अनंतर ही परमानुग्रह प्राप्त योगी का उन्मना शक्ति में प्रवेश होता है।इसी को

परमपद या परमशिव की प्राप्ति समझना चाहिए और इसी को एक प्रकार से उन्मना का त्याग भी माना जा सकता है। इस प्रकार ब्रह्मा से शिवपर्यन्त छह कारणों का उल्लंघन हो जाने पर अखंड परिपूर्ण सत्ता में स्थिति हो जाती

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ग्रन्थि-भेद - रुद्र, विष्णु और ब्रह्म ग्रन्थियों को खोलने के लिए;-

विज्ञानमय कोश की चतुर्थ भूमिका में पहुँचने पर जीव को प्रतीत होता है कि तीन सूक्ष्म बन्धन ही मुझे बाँधे हुए हैं। पञ्च-तत्त्वों से शरीर बना है, उस शरीर में पाँच कोश हैं। गायत्री के ये पाँच कोश ही पाँच मुख हैं। इन पाँच बन्धनों को खोलने के लिए कोशों की अलग-अलग साधनाएँ बताई गई हैं। विज्ञानमय कोश के अन्तर्गत तीन बन्धन हैं, जो पञ्च भौतिक शरीर न रहने पर भी-देव, गन्धर्व, यक्ष, भूत, पिशाच आदि योनियों में भी वैसे ही बन्धन बाँधे रहते हैं जैसा कि शरीरधारी का होता है। ये तीन बन्धन-ग्रन्थियाँ रुद्रग्रन्थि, विष्णु-ग्रन्थि, ब्रह्मग्रन्थि के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन्हें तीन गुण भी कह सकते हैं। रुद्रग्रन्थि अर्थात् तम, विष्णुग्रन्थि अर्थात् सत्, ब्रह्मग्रन्थि अर्थात् रज। इन तीनों गुणों से अतीत हो जाने पर, ऊँचा उठ जाने पर ही आत्मा शान्ति और आनन्द का अधिकारी होता है। इन तीन ग्रन्थियों को खोलने के महत्त्वपूर्ण कार्य को ध्यान में रखने के लिए कन्धे पर तीन तार का यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि तम, रज, सत् के तीन गुणों द्वारा स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर बने हुए हैं। यज्ञोपवीत के अन्तिम भाग में तीन ग्रन्थियाँ लगाई जाती हैं। इसका तात्पर्य यह है कि रुद्रग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि तथा ब्रह्मग्रन्थि से जीव बँधा पड़ा है। इन तीनों को खोलने की जिम्मेदारी का नाम ही पितृऋण, ऋषिऋण, देवऋण है। तम को प्रकृति, रज को जीव, सत् को आत्मा कहते हैं। व्यावहारिक जगत् में तम को सांसारिक जीवन, रज को व्यक्तिगत जीवन, सत् को आध्यात्मिक जीवन कह सकते हैं। जैसे हमारे पूर्ववर्ती लोगों ने, पूर्वजों ने अनेक प्रकार के उपकारों, सहयोगों द्वारा निर्बल दशा से ऊँचा उठाकर हमें बल, विद्या, बुद्धि सम्पन्न किया है, वैसे ही हमारा भी कर्त्तव्य है कि संसार में अपनी अपेक्षा किसी भी दृष्टि से जो लोग पिछड़े हुए हैं, उन्हें सहयोग देकर ऊँचा उठाएँ, सामाजिक जीवन को मधुर बनाएँ ।देश, जाति और समाज के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन करें; यही पितृऋण से, पूर्ववर्ती लोगों के उपकारों से उऋण होने का मार्ग है। व्यक्तिगत जीवन को शारीरिक, बौद्धिक और आर्थिक शक्तियों से सुसम्पन्न बनाना अपने को मनुष्य जाति का सदस्य बनाना ऋषि- ऋण से छूटना है। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन, निदिध्यासन आदि आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि अपवित्रताओं को हटाकर आत्मा को परम निर्मल, देवतुल्य बनाना यह देव-ऋण से उऋण होना है। दार्शनिक दृष्टि से विचार करने पर तम का अर्थ होता है-शक्ति, रज का अर्थ होता है-साधन, सत् का अर्थ होता है-ज्ञान। इन तीनों की न्यूनता एवं विकृत अवस्था बन्धन कारक अनेक उलझनों, कठिनाइयों और बुराइयों को उत्पन्न करने वाली होती है; किन्तु जब तीनों की स्थिति सन्तोषजनक होती है, तब त्रिगुणातीत अवस्था प्राप्त होती है। हमको भली प्रकार यह समझ लेना चाहिए कि परमात्मा की सृष्टि में कोई भी शक्ति या पदार्थ दूषित अथवा भ्रष्ट नहीं है। यदि उसका सदुपयोग किया जाए तो वह कल्याणकारी सिद्ध होगा। आत्मिक क्षेत्र में सूक्ष्म अन्वेषण करने वाले ऋषियों ने यह पाया है कि तीन गुण, तीन शरीरों, तीन क्षेत्रों का व्यवस्थित या अव्यवस्थित होना अदृश्य केन्द्रों पर निर्भर रहता है। सभी दशाओं को उत्तम बनाने से ये केन्द्र उन्नत अवस्था में पहुँच सकते हैं। दूसरा उपाय यह भी है कि अदृश्य केन्द्रों को आत्मिक साधना-विधि से उन्नत अवस्था में ले जाएँ तो स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर को ऐसी स्थिति पर पहुँचाया जा सकता है जहाँ उनके लिए कोई बन्धन या उलझन शेष न रहे। साधक जब विज्ञानमय कोश की स्थिति में होता है तो उसे ऐसा अनुभव होता है मानो उसके भीतर तीन कठोर, गठीली, चमकदार, हलचल करती हुई हलकी गाँठें हैं। इनमें से एक गाँठ मूत्राशय के समीप, दूसरी आमाशय के ऊर्ध्व भाग में और तीसरी मस्तिष्क के मध्य केन्द्र में विदित होती है। इन गाँठों में से मूत्राशय वाली ग्रन्थि को रुद्र-ग्रन्थि, आमाशय वाली को विष्णु-ग्रन्थि और शिर वाली को ब्रह्मग्रन्थि कहते हैं। इन्हीं तीनों को दूसरे शब्दों में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती भी कहते हैं। इन तीन महाग्रन्थियों की दो सहायक ग्रन्थियाँ भी होती हैं, जो मेरुदण्ड स्थित सुषुम्ना नाड़ी के मध्य में रहने वाली ब्रह्मनाड़ी के भीतर रहती हैं। इन्हें चक्र भी कहते हैं। रुद्रग्रन्थि की शाखा ग्रन्थियाँ मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान कहलाती हैं। विष्णु -ग्रन्थि की दो शाखाएँ मणिपूरक चक्र और अनाहत चक्र हैं। मस्तिष्क में निवास करने वाली ब्रह्मग्रन्थि के सहायक ग्रन्थि-चक्रों को विशुद्धिचक्र और आज्ञाचक्र कहा जाता है। हठयोग की विधि से षट्चक्रों का वेधन किया जाता है। इन षट्चक्र वेधन की विधि के सम्बन्ध में इस पुस्तक में पहले से ही हम काफी प्रकाश डाल चुके हैं। उसकी पुनरावृत्ति करने की आवश्यकता नहीं। जिन्हें हठयोग की अपेक्षा गायत्री की पञ्चमुखी साधना के अन्तर्गत विज्ञानमय कोश में ग्रन्थिभेद करना है, उन्हीं के लिए आवश्यक जानकारी देने का यहाँ प्रयत्न किया जाएगा। रुद्रग्रन्थि का आकार बेर के समान ऊपर को नुकीला, नीचे को भारी, पैंदे में गड्ढा लिए होता है; इसका वर्ण कालापन मिला हुआ लाल होता है। इस ग्रन्थि के दो भाग हैं। दक्षिण भाग को रुद्र और वाम भाग को काली कहते हैं। दक्षिण भाग के अन्तरंग गह्वर में प्रवेश करके जब उसकी झाँकी की जाती है, तो ऊर्ध्व भाग में श्वेत रंग की छोटी-सी नाड़ी हलका-सा श्वेत रस प्रवाहित करती है; एक तन्तु तिरछा पीत वर्ण की ज्योति-सा चमकता है। मध्य भाग में एक काले वर्ण की नाड़ी साँप की तरह मूलाधार से लिपटी हुई है। प्राणवायु का जब उस भाग से सम्पर्क होता है, तो डिम-डिम जैसी ध्वनि उसमें से निकलती है। रुद्रग्रन्थि की आन्तरिक स्थिति की झाँकी करके ऋषियों ने रुद्र का सुन्दर चित्र अंकित किया है। मस्तक पर गंगा की धारा, जटा में चन्द्रमा, गले में सर्प, डमरू की डिम-डिम ध्वनि, ऊर्ध्व भाग में त्रिशूल के रूप में अंकित करके भगवान् शंकर का ध्यान करने लायक एक सुन्दर चित्र बना दिया। उस चित्र में आलंकारिक रूप से रुद्रग्रन्थि की वास्तविकताएँ ही भरी गई हैं। उस ग्रन्थि का वाम भाग जिस स्थिति में है, उसी के अनुरूप काली का सुन्दर चित्र सूक्ष्मदर्शी आध्यात्मिक चित्रकारों ने अंकित कर दिया है। विष्णुग्रन्थि किस वर्ण की, किस गुण की, किस आकार की, किस आन्तरिक स्थिति की, किस ध्वनि की, किस आकृति की है, यह सब हमें विष्णु के चित्र से सहज ही प्रतीत हो जाता है। नील वर्ण, गोल आकार, शंख-ध्वनि, कौस्तुभ मणि, वनमाला यह चित्र उस मध्यग्रन्थि का सहज प्रतिबिम्ब है। जैसे मनुष्य को मुख की ओर से देखा जाए तो उसकी झाँकी दूसरे प्रकार की होती है और पीठ की ओर से देखा जाए, तब यह आकृति दूसरे ही प्रकार की होती है। एक ही मनुष्य के दो पहलू दो प्रकार के होते हैं। उसी प्रकार एक ही ग्रन्थि दक्षिण भाग से देखने में पुरुषत्व प्रधान आकार की और बाईं ओर से देखने पर स्त्रीत्व प्रधान आकार की होती है। एक ही ग्रन्थि को रुद्र या शक्तिग्रन्थि कहा जा सकता है। विष्णु-लक्ष्मी, ब्रह्मा और सरस्वती का संयोग भी इसी प्रकार है। ब्रह्मग्रन्थि मध्य मस्तिष्क में है। इससे ऊपर सहस्रार शतदल कमल है। यह ग्रन्थि ऊपर से चतुष्कोण और नीचे से फैली हुई है। इसका नीचे का एक तन्तु ब्रह्मरन्ध्र से जुड़ा हुआ है। इसी को सहस्रमुख वाले शेषनाग की शय्या पर लेटे हुए भगवान् की नाभि कमल से उत्पन्न चार मुख वाला ब्रह्मा चित्रित किया गया है। वाम भाग में यही ग्रन्थि चतुर्भुजी सरस्वती है। वीणा की झंकार-से ओंकार ध्वनि का यहाँ निरन्तर गुञ्जार होता है। यह तीनों ग्रन्थियाँ जब तक सुप्त अवस्था में रहती हैं, बँधी हुई रहती हैं, तब तक जीव साधारण दीन-हीन दशा में पड़ा रहता है। अशक्ति, अभाव और अज्ञान उसे नाना प्रकार से दु:ख देते रहते हैं। पर जब इनका खुलना आरम्भ होता है तो उनका वैभव बिखर पड़ता है। मुँह बन्द कली में न रूप है, न सौन्दर्य और न आकर्षण। पर जब वह कली खिल पड़ती है और पुष्प के रूप में प्रकट होती है, तो एक सुन्दर दृश्य उपस्थित हो जाता है। जब तक खजाने का ताला लगा हुआ है, थैली का मुँह बन्द है, तब तक दरिद्रता दूर नहीं हो सकती; पर जैसे ही रत्नराशि का भण्डार खुल जाता है, वैसे ही अतुलित वैभव का स्वामित्व प्राप्त हो जाता है। रात को कमल का फूल बन्द होता है तो भौंरा भी उसमें बन्द हो जाता है, पर प्रात:काल वह फूल फिर खिलता है तो भौंरा बन्धन-मुक्त हो जाता है। ये तीन कलियाँ, तीन-तीन ग्रन्थियाँ, जीव को बाँधे हुए हैं। जब ये खुल जाती हैं तो मुक्ति का अधिकार स्वयमेव ही प्राप्त हो जाता है। इन रत्न-राशियों का ताला खुलते ही शक्ति, सम्पन्नता और प्रज्ञा का अटूट भण्डार हस्तगत हो जाता है। चिड़िया अपनी छाती की गरमी से अण्डों को पकाती है, चूल्हे की गर्मी से भोजन पकता है, सूर्य की गर्मी से वृक्षों, वनस्पतियों और फलों का परिपाक होता है। माता नौ महीने तक बालक को पेट में पकाकर उसको इस स्थिति में लाती है कि वह जीवन धारण कर सके। विज्ञानमय कोश की ये तीनों -ग्रन्थियाँ भी तप की गर्मी से पकती हैं। तप द्वारा ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सरस्वती, लक्ष्मी, काली सभी का परिपाक हो जाता है। ये शक्तियाँ समदर्शी हैं; न उन्हें किसी से प्रेम है, न द्वेष। रावण जैसे असुरों ने भी शंकर जी से वरदान पाए थे और अनेक सुर भी कोई सफलता नहीं प्राप्त कर पाए। इसमें साधक का पुरुषार्थ ही प्रधान है। श्रम और प्रयत्न ही परिपक्व होकर सफलता बन जाते हैं। रुद्र, विष्णु और ब्रह्म ग्रन्थियों को खोलने के लिए ग्रन्थि के मूल भाग में निवास करने वाली बीज शक्तियों का सञ्चार करना पड़ता है। रुद्रग्रन्थि के अधोभाग में बेर के डण्ठल की तरह एक सूक्ष्म प्राण अभिप्रेत होता है, उसे ‘क्लीं’ बीज कहते हैं। विष्णुग्रन्थि के मूल में ‘श्रीं’ का निवास है और ब्रह्मग्रन्थि के नीचे ‘ह्रीं’ तत्त्व का अवस्थान है। मूलबन्ध बाँधते हुए एक ओर से अपान और दूसरी ओर से कूर्मप्राण को चिमटे की तरह बनाकर रुद्रग्रन्थि को पकड़कर रेचक प्राणायाम द्वारा दबाते हैं। इस दबाव की गर्मी से क्लीं बीज जाग्रत् हो जाता है। वह नोकदार डण्ठल आकृति का बीज अपनी ध्वनि और रक्त वर्ण प्रकाश-ज्योति के साथ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है। इस जाग्रत् क्लीं बीज की अग्रिम नोंक से कुंचुकि क्रिया की जाती है, जैसे किसी वस्तु में छेद करने के लिए नोंकदार कील कोंची जाती है; इस प्रकार की वेधन-साधना को ‘कुंचुकी क्रिया’ कहते हैं। रुद्रग्रन्थि के मूल केन्द्र में क्लीं बीज की अग्र शिखा से जब निरन्तर कुंचुकी होती है, तो प्रस्तुत कलिका में भीतर ही भीतर एक विशेष प्रकार के लहलहाते हुए तड़ित प्रवाह उठाने पड़ते हैं; इनकी आकृति एवं गति सर्प जैसी होती है। इन तड़ित प्रवाहों को ही शम्भु के गले में फुफकारने वाले सर्प बताया है। जिस प्रकार ज्वालामुखी पर्वत के उच्च शिखर पर धूम्र मिश्रित अग्नि निकलती है, उसी प्रकार रुद्रग्रन्थि के ऊपरी भाग में पहले क्लीं बीज की अग्निजिह्वा प्रकट होती है। इसी को काली की बाहर निकली हुई जीभ माना गया है। इसको शम्भु का तीसरा नेत्र भी कहते हैं। मूलबन्ध, अपान और कूर्म प्राण के आघात से जाग्रत् हुई क्लीं बीज की कुंचुकी -क्रिया से धीरे-धीरे रुद्रग्रन्थि शिथिल होकर वैसे ही खुलने लगती है, जैसे कली धीरे-धीरे खिलकर फूल बन जाती है। इस कमल पुष्प के खिलने को पद्मासन कहा गया है। त्रिदेव के कमलासन पर विराजमान होने के चित्रों का तात्पर्य यही है कि वे विकसित रूप से परिलक्षित हो रहे हैं। साधक के प्रयत्न के अनुरूप खुली हुई रुद्रग्रन्थि का तीसरा भाग जब प्रकटित होता है, तब साक्षात् रुद्र का, काली का अथवा रक्त वर्ण सर्प के समान लहलहाती हुई, क्लीं-घोष करती हुई अग्नि शिखा का साक्षात्कार होता है। यह रुद्र जागरण साधक में अनेक प्रकार की गुप्त-प्रकट शक्तियाँ भर देता है। संसार की सब शक्तियों का मूल केन्द्र रुद्र ही है। उसे रुद्रलोक या कैलाश भी कहते हैं। प्रलय काल में संसार संचालिनी शक्ति व्यय होते-होते पूर्ण शिथिल होकर जब सुषुप्त अवस्था में चली जाती है, तब रुद्र का ताण्डव नृत्य होता है। उस महामन्थन से इतनी शक्ति फिर उत्पन्न हो जाती है जिससे आगामी प्रलय तक काम चलता रहे। घड़ी में चाबी भरने के समान रुद्र का प्रलय ताण्डव होता है। रुद्रशक्ति की शिथिलता से जीवों की तथा पदार्थों की मृत्यु हो जाती है, इसलिए रुद्र को मृत्यु का देवता माना गया है। विष्णुग्रन्थि को जाग्रत् करने के लिए जालन्धर बन्ध बाँधकर ‘समान’ और ‘उदान’ प्राणों द्वारा दबाया जाता है, तो उसके मूल भाग का ‘श्रीं’ बीज जाग्रत् होता है। यह गोल गेंद की तरह है और इसकी अपनी धुरी पर द्रुत गति से घूमने की क्रिया होती है। इस घूर्णन क्रिया के साथ-साथ एक ऐसी सनसनाती हुई सूक्ष्म ध्वनि होती है, जिसको दिव्य श्रोत्रों से ‘श्रीं’ जैसे सुना जाता है। श्रीं बीज को विष्णुग्रन्थि की बाह्य परिधि में भ्रामरी क्रिया के अनुसार घुमाया जाता है। जैसे पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, उसी प्रकार परिभ्रमण करने को भ्रामरी कहते हैं। विवाह में वर-वधू की भाँवर या फेरे पड़ना, देव-मन्दिरों तथा यज्ञ की परिक्रमा या प्रदक्षिणा होना भ्रामरी क्रिया का रूप है। विष्णु की उँगली पर घूमता हुआ चक्र सुदर्शन चित्रित करके योगियों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से अनुभव किए गए इसी रहस्य को प्रकट किया है। ‘श्रीं’ बीज विष्णुग्रन्थि की भ्रामरी गति से परिक्रमा करने लगता है, तब उस महातत्त्व का जागरण होता है। पूरक प्राणायाम की प्रेरणा देकर समान और उदान द्वारा जाग्रत् किए गए श्रीं बीज से जब विष्णुग्रन्थि के बाह्य आवरण की मध्य परिधि में भ्रामरी क्रिया की जाती है, तो उसके गुञ्जन से उसका भीतरी भाग चैतन्य होने लगता है। इस चेतना की विद्युत् तरंगें इस प्रकार उठती हैं जैसे पक्षी के पंख दोनों बाजुओं में हिलते हैं। उसी गति के आधार पर विष्णु का वाहन गरुड़ निर्धारित किया गया है। इस साधना से विष्णुग्रन्थि खुलती है और साधक की मानसिक स्थिति के अनुरूप विष्णु, लक्ष्मी या पीत वर्ण की अग्निशिखा की लपटों के समान ज्योतिपुञ्ज का साक्षात्कार होता है। विष्णु का पीताम्बर इस पीत ज्योतिपुञ्ज का प्रतीक है। इस ग्रन्थि का खुलना ही बैकुण्ठ, स्वर्ग एवं विष्णुलोक को प्राप्त करना है। बैकुण्ठ या स्वर्ग को अनन्त ऐश्वर्य का केन्द्र माना जाता है। वहाँ सर्वोत्कृष्ट सुख-साधन जो सम्भव हो सकते हैं, वे प्रस्तुत हैं। विष्णुग्रन्थि वैभव का केन्द्र है, जो उसे खोल लेता है, उसे विश्व के ऐश्वर्य पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाता है। ब्रह्म ग्रन्थि मस्तिष्क के मध्य भाग में सहस्रदल कमल की छाया में अवस्थित है। उसे अमृत कलश कहते हैं। बताया गया है कि सुरलोक में अमृत कलश की रक्षा सहस्र फनों वाले शेषनाग करते हैं। इसका अभिप्राय इसी ब्रह्म ग्रन्थि से है। उड्डियान बन्ध लगाकर व्यान और धनञ्जय प्राणों द्वारा ब्रह्मग्रन्थि को पकाया जाता है। पकाने से उसके मूलाधार में वास करने वाली ह्रीं शक्ति जाग्रत् होती है। इसकी गति को प्लावनी कहते हैं। जैसे जल में लहरें उत्पन्न होती हैं और निरन्तर आगे को ही लहराती हुई चलती हैं, उसी प्रकार ह्रीं बीज की प्लावनी गति से ब्रह्मग्रन्थि को दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर प्रेरित करते हैं। चतुष्कोण ग्रन्थि के ऊर्ध्व भाग में यही ह्रीं तत्त्व रुक-रुककर गाँठें सी बनाता हुआ आगे की ओर चलता है और अन्त में परिक्रमा करके अपने मूल संस्थान को लौट आता है। गाँठ बाँधते चलने की नीची-ऊँची गति के आधार पर माला के दाने बनाए गए हैं। १०८ दचके लगाकर तब एक परिधि पूरी होती है, इसलिए माला के १०८ दाने होते हैं। इस ह्रीं तत्त्व की तरंगें मन्थर गति से इस प्रकार चलती हैं जैसे हंस चलता है। ब्रह्मा या सरस्वती का वाहन हंस इसीलिए माना गया है। वीणा के तारों की झंकार से मिलती-जुलती ‘ह्रीं’ ध्वनि सरस्वती की वीणा का परिचय देती है। कुम्भक प्राणायाम की प्रेरणा से ह्रीं बीज की प्लावनी क्रिया आरम्भ होती है। यह क्रिया निरन्तर होते रहने पर ब्रह्मग्रन्थि खुल जाती है। तब उसका ब्रह्म के रूप में, सरस्वती के रूप में अथवा श्वेत वर्ण प्रकम्पित शुभ्र ज्योति शिखा के समान साक्षात्कार होता है। यह स्थिति आत्मज्ञान, ब्रह्मप्राप्ति, ब्राह्मी स्थिति की है। ब्रह्मलोक एवं गोलोक भी इसको कहते हैं। इस स्थिति को उपलब्ध करने वाला साधक ज्ञान-बल से परिपूर्ण हो जाता है। इसकी आत्मिक शक्तियाँ जाग्रत् होकर परमेश्वर के समीप पहुँचा देती हैं, अपने पिता का उत्तराधिकार उसे मिलता है और जीवन्मुक्त होकर ब्राह्मीस्थिति का आनन्द ब्रह्मानन्द उपलब्ध करता है। षट्चक्र का हठयोग-सम्मत विधान अथवा महायोग का यह ग्रन्थिभेद, दोनों ही समान स्थिति के हैं। साधक अपनी स्थिति के अनुसार उन्हें अपनाते हैं, दोनों से ही विज्ञानमय कोश का परिष्कार होता है।

....SHIVOHAM....