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क्या है मनोमय कोश की या मनोलय योग की साधनायें तथा सिद्धियाँ अथार्त ध्यान ,त्राटक, जप, और तन्मात्रा स


क्या है मनोमय कोश का मनोलय योग ?-

09 FACTS;-

1-पंचकोशों में तीसरा मनोमय कोश है।मन में प्रचण्ड प्रेरक शक्ति है।वश में किया हुआ मन भूलोक का कल्प-वृक्ष है।यह सुख प्राप्ति की अनेक कल्पनाएँ किया करता है।इस प्रेरक शक्ति से अपने कल्पना चित्रों को वह ऐसा सजीव कर देता है कि मनुष्य बालक की तरह उसे प्राप्त करने के लिए दौड़ने लगता है।मन में जैसी कल्पनाएँ, इच्छाएँ, वासनाएँ आकांक्षाएँ, तृष्णाएँ उठती हैं उसी ओर शरीर चल पड़ता है।

2-पातंजलि ऋषि ने योग की परिभाषा करते हुए कहा कि 'चित्त की वृत्तियों का निरोध करना, रोककर एकाग्र करना ही योग है। योग साधना ही इसलिए है कि चित्त वृत्तियाँ एक बिन्दु पर केन्द्रित होने लगें तथा आत्मा के आदेशानुसार उनकी गतिविधि हो। इस कार्य में सफलता मिलते ही आत्मा अपने पिता परमात्मा में सन्निहित समस्त ऋद्धि-सिद्धियों का स्वामी बन जाता है। वश में किया हुआ मन ऐसा शक्तिशाली अस्त्र है कि उसे जिस ओर भी प्रयुक्त किया जायेगा उसी ओर आश्चर्यजनक चमत्कार उपस्थित हो जायेंगे।

3-संसार के किसी कार्य में प्रतिभा, यश विद्या, स्वास्थ्य, भोग, अन्वेषण आदि जो भी वस्तु अभीष्ट होगी, वह वशवर्ती मन के प्रयोग से निश्चित ही प्राप्त होकर रहती है। उसकी प्राप्ति में संसार की कोई शक्ति बाधक नहीं हो सकती।सांसारिक उद्देश्य ही नहीं, वरन् उससे परमार्थिक आकांक्षाएँ भी पूरी होती हैं।

4-मेस्मरेजम, हिम्नोटिज्म, परसन मैग्नेटिज्म ,मेण्टलथैरेपी, आकल्ट साइन्स, मेण्टल हीलिंग, स्प्रिचुअलिज्म और समाधि सुख आदि भी

'मनोबल' का ही एक चमत्कार है। तन्त्र क्रिया, मन्त्र-शक्ति, प्राण विनियम और चमत्कारी शक्तिया आदि सब खिलौने एकाग्र मन की प्रचण्ड संकल्प शक्ति के छोटे-छोटे मनोविनोद मात्र हैं।

5-संकल्प की पूर्ण शक्ति से हमारे पूजनीय पूर्वज परिचित थे, उस शक्ति के थोड़े-थोड़े भौतिक चमत्कारों को लेकर अनेकों व्यक्तियों ने रावण जैसी उधम मचायी थी, परन्तु अधिकांश योगियों ने मन की एकाग्रता से उत्पन्न होने वाली प्रचण्ड शक्ति को परकल्याण में लगाया था।

6-अर्जुन को पता था कि मन को वश करने से कैसी अद्भुत सिद्धियाँ मिल

सकती हैं।इसलिए उसने गीता में भगवान् क्या से पूछा- ''हे अच्युत्! मन को वश में करने की विधि मुझे बताइये, क्योंकि वह वायु को वश में करने के समान कठिन है।''अर्जुन ने ठीक कहा है कि मन को वश में करना वायु को वश में करने के समान कठिन है। वायु को तो यंत्रों द्वारा किसी डिब्बे में बन्द भी किया जा सकता है, पर मन को वश में करने का तो कोई यन्त्र भी नही है।

7-भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को दो उपाय मन को वश में करने के बताये।

(1) अभ्यास और (2) वैराग्य। अभ्यास का अर्थ है- वे योग साधनायें जो मन को रोकती हैं।वैराग्य का वास्तविक तात्पर्य है- राग से निवृत्त होना.. व्यावहारिक जीवन को संयमशील और व्यवस्थित बनाना।बुरी भावनाओं

और आदतों से बचने का अभ्यास करने के लिए ऐसे वातावरण में रहना पड़ता हैं, जहाँ उनसे बचने का अवसर हो।पानी से दूर रहकर तैरना नहीं आ सकता। इसी प्रकार राग- द्वेष जहाँ उत्पन्न होता है उस क्षेत्र में रहकर उन बुराइयों पर विजय प्राप्त करना ही वैराग्य की सफलता है।

8-कोई व्यक्ति जंगल में एकान्तवासी रहे तो नहीं कहा जा सकता कि वैराग्य हो गया क्योंकि जंगल में वैराग्य की अपेक्षा ही नहीं होती। जब तक परीक्षा द्वारा यह नहीं जान लिया गया कि हमने राग उत्पन्न करने वाले अवसर होते हुए भी उस पर विजय प्राप्त कर ली तब तक यह नहीं समझना चाहिए कि कोई एकान्तवासी वस्तुत: वैरागी ही है। प्रलोभन को जीतना ही वैराग्य है और यह विजय वहीं हो सकती है, जहाँ वे बुराइयाँ मौजूदा हों। इसलिए गृहस्थ में, सांसारिक जीवन में सुव्यवस्थित रहकर मन पर विजय प्राप्त करने को वैराग्य कहना चाहिए।

9-अभ्यास के लिए योगशास्त्रों में ऐसी कितनी ही साधना का वर्णन है, जिनके द्वारा मन की चंचलता, विषय लोलुपता और एषणा प्रवृत्ति को रोककर उसे ऋतम्भरा बुद्धि के, अंतरात्मा के अधीन किया जा सकता है। इन साधनाओं को मनोलय योग कहते हैं।मनोलय के अंतर्गत चार

साधन प्रधान रूप से आते हैं।इन चारों का मनोमय कोश की साधना में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है ।

9-1- ध्यान

9-2- त्राटक

9-3- जप

9-4- तन्मात्रा साधना

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1- ''ध्यान'';-

04 FACTS;-

1-ध्यान वह मानसिक प्रक्रिया है जिसके अनुसार किसी वस्तु की स्थापना अपने मन:क्षेत्र में की जाती है। मानसिक क्षेत्र में स्थापित की हुई वस्तु हमारे आकर्षण का प्रधान केन्द्र बनती है। उस आकर्षण की ओर मस्तिष्क की अधिकांश शक्तियाँ खिंच जाती हैं। फलस्वरूप एक स्थान पर उनका केन्द्रीयकरण होने लगता है। चुम्बक पत्थर अपने चारों ओर बिखरे हुए लौहकणो को सब दिशाओं से खींचकर अपने पास जमा कर लेता है। इसी प्रकार ध्यान द्वारा मन सब ओर से खींचकर एक केन्द्र बिन्दु पर एकाग्र होता है, बिखरी हुई चित्त-प्रवृतियाँ एक जगह सिमट जाती हैं।

2-कोई आदर्श, लक्ष्य इष्ट निधारित करके उसमें तन्मय होने को ध्यान कहते हैं। जैसा ध्यान किया जाता है मनुष्य वैसा ही बनने लगता है। साँचे में गीली मिट्टी को दबाने से वैसी आकृति बन जाती है, जैसी उस साँचे में होती है। कीट-भृंग का उदाहरण प्रसिद्ध है। भृंग, झींगुर को पकड़ ले जाता है और उसके चारों ओर लगातार गुंजन करता है। झींगुर इस गुंजन को तन्मय होकर सुनता है और भृंग के रूप को उसकी चेष्टाओं को एकाग्र भाव से निहारता है। झींगुर का मन भृंगमय हो जाने से उसका शरीर भी उसी ढाँचे में ढलना आरम्भ हो जाता है। उसके रक्त, माँस, नस, नाड़ी, त्वचा आदि में मन के साथ ही परिवर्तन आरम्भ हो जाता है और थोड़े समय में वह झींगुर मन से और शरीर से भी असली भृंग के समान बन जाता है। इसी प्रकार ध्यान शक्ति द्वारा साधक का सर्वागपूर्ण काया-कल्प होता है।

3-साधारण ध्यान से मनुष्य का शरीर परिवर्तन नहीं होता। इसके लिए विशेष रूप से गहन साधनाएँ करनी पड़ती हैं। परन्तु मानसिक काया-कल्प करने में हर मनुष्य ध्यान-साधना से भरपूर लाभ उठा सकता है। ऋषियों ने इस बात पर जोर दिया है कि हर साधक को इष्टदेव चुन लेना चाहिए। इष्टदेव चुनने का अर्थ है- जीवन का प्रधान लक्ष्य निर्धारित करना। इष्टदेव उपासना का अर्थ है- उस लक्ष्य में अपनी मानसिक चेतना को तन्मय कर देना। इस प्रकार की तन्मयता का परिणाम यह होता है कि मन की बिखरी हुई शक्तियाँ एक बिन्दु पर एकत्रित हो जाती हैं। एक स्थानीय एकाग्रता के कारण उसी दिशा में सभी मानसिक शक्तियाँ लग जाती हैं, फ्लस्वरूप साधक के गुण, स्वभाव, विचार उपाय एवं काम अद्भुत गति से बढ़ते हैं, जो उसे अभीष्ट लक्ष्य तक सरलतापूर्वक स्वल्प काल में ही पहुँचा देते हैं। इसी को इष्ट सिद्धि कहते हैं।

4-ध्यान साधना के लिए ही आदर्शो को दिव्य रूपधारी देवताओं के रूप में मानकर उनमें मानसिक तन्मयता स्थापित करने का यौगिक विधान है।प्रीति सजातियों में होती है। इसलिए लक्ष्य रूप इष्ट को दिव्य देहधारी देव मानकर उसमें तन्मय होने का गूढ़ एवं रहस्यमय मनोवैज्ञानिक आधार स्थापित करना पड़ा है।यहाँ किसी को भ्रम में पड़ने की

आवश्यकता नहीं। अनेक देवताओं का कोई स्वतन्त्र आधार नहीं है। ईश्वर एक है। उसकी अनेक शक्तियाँ ही अनेक देवों के नाम से पुकारी जाती हैं। अपनी इच्छा, रुचि और आवश्यकतानुसार उन शक्तियों को प्राप्त करने के लिए अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अपना इष्ट लक्ष्य चुनता है और उनमें तन्मय होते ही मनोवैज्ञानिक उपासना पद्धति द्वारा उन शक्तियों को अपने अन्दर प्रचुर परिमाण में धारण कर लेता है।

5-ध्यान-योग साधना में मन की एकाग्रता के साथ-साथ लक्ष्य को, इष्ट को भी प्राप्त करके योगस्थिति उत्पन्न करने का दुहरा लाभ प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। इसलिए इष्टदेव का मन:क्षेत्र में उसी प्रकार ध्यान करने का विधान किया गया है।

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ध्यान के अंग;-

05 FACTS;-

ध्यान के पाँच अंग हैं...

1-स्थिति 2-संस्थिति 3-विगति 4-प्रगति 5-सस्मिति

1-स्थिति;-

स्थिति का तात्पर्य हैं- साधक की उपासना करते समय की स्थिति। मन्दिर में, नदी, तट पर एकान्त में, श्मशान में स्नान करके, बिना स्नान किए पद्मासन से, सिद्धासन से किस ओर मुँह करके, किस मुद्रा में, किस समय, किस प्रकार ध्यान किया जाय ... इस सम्बन्ध की व्यवस्था को स्थिति कहते है।

2-संस्थिति;-

संस्थिति का अर्थ है...इष्टदेव की छवि का निर्धारण। उपास्य देव का मुख आकृति, आकार मुद्रा, वस्त्र, आभूषण, वाहन, स्थान, भाव को निश्चित करना संस्थिति कहलाती है।

3-विगति;-

विगति कहते हैं...गुणावली को। इष्टदेव में क्या विशेषताएँ, शक्तियाँ, सामर्थ्य, परम्पराएँ एवं गुणावलियाँ हैं ... उनको जानना विगति कहा जाता है।

4-प्रगति;-

प्रगति कहते हैं- उपासना काल में साधक के मन में रहने वाली भावना को। दास्य, सखा, गुरु, बन्धु मित्र, माता-पिता, पति, पुत्र, सेवक, शत्रु आदि जिस रिश्ते को उपास्य देव को मानना हो उस रिश्ते की स्थिरता तथा उस रिश्ते को प्रणाढ़ बनाने के लिए इष्टदेव को प्रमुख ध्यानावस्था में, अपनी आन्तरिक भावनाओं को विविध शब्दों तथा चेष्टाओं द्वारा उपस्थित करना प्रगति कहलाती है।

5-सस्मिति;-

'सस्मिति' वह व्यवस्था है जिसमें साधक और साध्य उपासक और उपास्य, एक हो जाते हैं। दोनों में कोई भेद नहीं रहता है। भृंग कीट की सी तन्मयता द्वैत के स्थान पर अद्वैत की झाँकी, उपास्य और उपासक का अभेद, मैं स्वयं इष्टदेव हो गया हूँ या इष्टदेव में पूर्णतया लीन हो गया हूँ ऐसी अनुभूति का होना। अग्नि में पड़कर जैसे लकड़ी भी अग्निमय लाल वर्ण हो जाती है, वैसी ही अपनी स्थिति जिन क्षणों में अनुभव होती है उसे 'संस्मिति' कहते हैं।

NOTE;-

एक ही इष्टदेव के अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक प्रकार से ध्यान किए जाते हैं। साधक की आयु, स्थिति, मनोभूमि, वर्ण, संस्कार आदि के विचार से भी ध्यान की विधियों में स्थिति, संस्थिति, विगति, प्रगति एवं संस्मिति की जो कई महत्वपूर्ण पद्धति हैं, उनका सविस्तार वर्णन नहीं हो सकता।

ध्यान द्वारा मन को एकाग्र करने की विधि(FOR BEGINNERS);-

10 FACTS;-

ध्यान द्वारा मन को एकाग्र करने की, वश में करने की विधि के लिए कुछ ध्यान नीचे दिये जा रहे हैं...

1- चिकने पत्थर की या धातु की सुन्दर-सी इष्टदेव की प्रतिमा लीजिए। उसे एक सुसज्जित आसन पर स्थापित कीजिए। प्रतिदिन उसका जल, धूप, दीप, गन्ध, नैवेद्य, अक्षत, पुष्प आदि मांगलिक द्रव्यों पूजन कीजिए। इस प्रकार नित्य-प्रति पूजन आरम्भिक साधकों के लिए श्रद्धा बढ़ाने वाला मन की प्रवृत्तियों को इस ओर झुकाने वाला होता है। साधक में अरुचि को हटाकर रुचि उत्पन्न करने का प्रथम सोपान, यह पार्थिव पूजन ही है। मन्दिरों में मूर्ति पूजा का आधार यह प्राथमिक शिक्षा के रूप में साधना का आरम्भ करना ही है।

2-पूर्व को ओर मुँह करके, आसन पर बैठिए। सामने इष्टदेव का चित्र रख लीजिए। विशेष मनोयोगपूर्वक उसकी मुखाकृति या अंग-प्रत्यंगों को देखिये। फिर नेत्र बन्द कर लीजिए। ध्यान द्वारा उस चित्र की बारीकियाँ भी ध्यानावस्था में भली-भाँति परिलक्षित होने लगेंगी। इस प्रतिमा को मानसिक साष्टाग प्रणाम कीजिए और अनुभव कीजिए कि उत्तर में आपको आर्शीर्वाद प्राप्त हो रहा है।

3- एकान्त स्थान में सुस्थिर होकर बैठिए।ध्यान कीजिए कि निखिल नील आकाश में और कोई वस्तु नहीं है, केवल एक स्वर्णिम वर्ण का सूर्य दिशा में चमक रहा है। उस सूर्य को ध्यानावस्था में मनोयोगपूर्वक देखिए। उसके बीच में इष्टदेव की धुँधली-सी छवि दृष्टिगोचर होगी, अभ्यास से धीरे-धीरे यह छवि स्पष्ट दीखने लगेगी।

4- भावना कीजिए कि इस सूर्य की स्वर्णिम किरणें मेरे नग्न शरीर पर पड़ रही हैं और वे रोमकूपों में होकर प्रवेश हुई आभा से देह के समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म अंगों को अपने प्रकाश से पूरित कर रही हैं।दिव्य तेजयुक्त,

अत्यन्त सुन्दर, इतनी जितनी कि आप अधिक-से-अधिक कल्पना कर सकते हों।

5-आकाश में दिव्य वस्त्रों, आभूषणों से सुसज्जित इष्टदेव का ध्यान कीजिए। किसी सुन्दर चित्र के आधार पर ऐसा ध्यान करने की होती है। इष्टदेव के एक-एक अंग को विशेष मोनोयोगपूर्वक देखिए। उसकी मुखाकृति, चितवन, मुसकान, भाव-भंगिमा पर विशेष ध्यान दीजिए।इष्टदेव अपनी अस्पष्ट वाणी, चेष्टा तथा संकेतों द्वारा आपके मन:क्षेत्र में नवीन भावों का संचार करेंगे।

6- शरीर को बिल्कुल ढीला कर दीजिए। आराम कुर्सी, मसनद या दीवार का सहारा लेकर, शरीर की नस-नाडि़यों को निर्जीव की भाँति शिथिल कर दीजिए। भावना कीजिए कि सुन्दर आकाश में अत्यधिक ऊँचाई पर अवस्थित ध्रुव तारे से निकल कर एक नीलवर्ण की शुभ्र किरण सुधा धारा अपनी ओर चली आ रही है और अपने मस्तिष्क या हृदय में ऋतुम्भरा बुद्धि के रूप में ..तरणतारिणी प्रज्ञा के रूप में प्रवेश कर रही है।उस परम दिव्य परम प्रेरक शक्ति को पाकर अपने हृदय और मस्तिष्क में सद्विचार उसी प्रकार उमड़ रहें है जैसे समुद्र में ज्वार-भाटा उमड़ते हैं।वह ध्रुव तारा जो इस धरा में प्रेरक है ...सत्लोकवासी इष्टदेव ही है और भावना कीजिए कि आप उनकी गोद में खेल और क्रीड़ा कर रहे हैं।

7- मेरुदण्ड को सीधा करके पद्मासन से बैठिए। नेत्र बन्द कर लीजिए। भू-मध्य भाग (भृकुटी) में शुभ्र वर्ण दीपक की लौ के समान दिव्य ज्योति का ध्यान कीजिए। यह ज्योति विद्युत की भांति क्रियाशील होकर अपनी शक्ति से मस्तिष्क क्षेत्र में बिखरी हुई अनेक शक्तियों का पोषक एवं जागरण कर रही है ऐसा विश्वास कीजिए।

8- भावना कीजिए कि आपका शरीर एक सुन्दर रथ है। उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार रूपी घोड़े जुते हैं। इस रथ में दिव्य तेजोमय इष्टदेव विराजमान हैं और घोड़ों की लगाम उसने अपने हाथ में थाम रखी है।जो घोड़ा बिचकता है वह चाबुक से उसका अनुशासन करते है और लगाम झटककर उसको सीधे मार्ग पर ठीक रीति से चलने में सफल पथ-प्रदर्शन करते है। घोड़े भी इष्टदेव से आतंकित होकर उसके अंकुश को स्वीकार करते हैं।

9- हृदय स्थान के निकट, सूर्य चक्र में सूर्य जैसे छोटे प्रकाश की ध्यान कीजिए यह आत्मा का प्रकाश है। इसमें इष्टदेव की शक्ति मिलती है और प्रकाश बढ़ता है। इस बढ़े हुए प्रकाश में आत्मा से वस्तु स्वरूप की झाँकी होती है। आत्मा साक्षात्कार का केन्द्र यह सूर्य चक्र है।

10- ध्यान कीजिए कि चारों ओर अन्धकार है। उसमें होली की तरह पृथ्वी से लेकर आकाश तक प्रचण्ड तेज जाज्वल्यमान हो रहा है। उसमें प्रवेश करने से अपने शरीर का प्रत्येक अंग, मन: क्षेत्र से उस परम तेज के समान अग्निमय हो गया है अपने समस्त पाप-ताप, विकार-संस्कार जल गये हैं और शुद्ध सच्चिदानन्द शेष रह गया है।

NOTE;-

ऊपर कुछ सुगम एवं सर्वोपरि ध्यान हैं जो सरल हैं और प्रतिबन्ध रहित हैं। इनके लिए किन्हीं विशेष नियमों के पालन की आवश्यकता नहीं होती। साधना के समय उनका करना उत्तम है... वैसे अवकाश में ,अन्य समयों में भी.. जब चित्त शान्त हो तो, इन ध्यानों में से, अपनी रुचि के अनुकूल ध्यान किया जा सकता है। इन ध्यानों में मन को संयत, एकाग्र करने की बड़ी शक्ति है। साथ ही उपासना का आध्यात्मिक लाभ भी मिलने से यह ध्यान दुहरा हित साधन करते हैं।

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2-त्राटक;-

10 FACTS;-

त्राटक भी ध्यान का एक अंग है या त्राटक का ही एक अंग ध्यान है। आन्तर-त्राटक और बाह्य-त्राटक दोनों का उद्देश्य मन को एकाग्र करना है। नेत्र बन्द करके किसी एक वस्तु पर भावना को जमाने और उसे आन्तरिक नेत्रों से देखते रहने की क्रिया आन्तर-त्राटक कहलाती है।ऊपर जो दस ध्यान लिखे गये हैं, वे सभी आन्तर-त्राटक हैं। मैस्मरेजम के ढंग से जो लोग अन्तर-त्राटक करते हैं वे केवल प्रकाश बिन्दु पर ध्यान करते हैं। इससे एकांगी लाभ होता है। प्रकाश बिन्दु पर ध्यान करने से मन तो एकाग्र होता है, पर उपासना का आत्म-लाभ नही मिल पाता। इसलिए भारतीय योगी सदा ही आन्तर-त्राटक का इष्ट ध्यान के रूप में प्रयोग करते रहे हैं।

त्राटक क्या है?‘त्रि’ और ‘टकटकी बंधने’ से मिलकर बना शब्द त्राटक वास्तव में त्र्याटक है, जिसके विश्लेषण में कहा गया है कि जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु पर अपनी नजर और मन को बांध लेता है, तो वह क्रिया त्राटक कहलाती है। उस वस्तु को कुछ समय तक देखने पर द्वाटक और उसे लगातार लंबे समय तक देखते रहना ही त्राटक है। इसके लिए दृष्टि की शक्ति को जाग्रत करते हुए मजबूत बनानी होती है। यह क्रिया हठ योग के अंतरगत आती है। यह कहें कि त्राटक से किसी वस्तु को अपलक देखते रहने की अद्भुत शक्ति हासिल होती है। ऐसी स्थिति में एकाग्रता आती है और मन का भटकाव नहीं होने पाता है।त्राटक साधना से अगर शरीर की सुप्त शक्तियां जागृत हो जाती हैं और निर्मल-निरोगी काया में सम्मोहन, आकर्षण और वशीकरण जैसे भाव भी समाहित हो जाते हैं। इस अनुसार त्राटक का वास्तविक रूप अपनी चेतना को भटकने से रोकने के संघर्ष में जीत हासिल कर लेती है। आईए, जानते हैं कुछ ऐसी विधियों के बारे में जिनसे इस शक्ति को हासिल कर विचार-प्रक्रिया को मजबूत बनाया जा सकता है।

त्राटक साधनाकोई भी व्यक्ति अपनी प्रबल इच्छा शक्ति के जरिए त्राटक साधन की अद्भुत सिद्धियां हासिल कर सकता है। मन की एकाग्रता प्राप्त करने के लिए बताई गई अनेकों योग पद्धतियों में त्राटक साधना को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। इसके लिए व्यक्ति में असीम श्रद्धा, धैर्य और मन की शुद्धता का होना जरूरी है। यह कई तरह से किया जा सकता है। जिसमें ज्योति त्राटक, बिंदु त्राटक और दपर्ण त्राटक मुख्य हैं।बिंदु त्राटकः यह त्राटक साधना का एक असान तरीका है, जिसके द्वारा इस क्रिया की शुरुआत की जाती है। इसके लिए किसी वस्तु, जैसे पेंसिल, फूल या कोई छोटी वस्तु को एकटक देखकर साधना की जाती है। यह एक ऐसी साधना है, जिसे सिद्ध करने वाले व्यक्ति में ऐसी शक्ति आ जाती है कि वह अपने विचारों से दूसरों के मन में पहुंच जाता है और वह व्यक्ति वशीभूत हो जाता है। इसतरह से वशीकरण होने पर दूसरों के मनोभावों या विचारों को पढ़ा-समझा जा सकता है। इसकी मुख्य बात यह है कि इसके लिए किसी भी तरह के तंत्र-मंत्र संबंधी अनुष्ठान आदि नहीं किए जाते हैं। यह एक तरह से आभासी ज्ञान, वशीकरण की अद्भुत शक्ति, प्रभाव, तेज और आत्मविश्वास को बढ़ा देता है।इसके लिए एक वर्गफूट के आकार का एक सफेद कागज लें, जो ड्राईंग पेपर हो सकता है। उसके बीच में काली स्याही से भरा हुआ तीन इंच व्यास का एक वृत बना लें। उस पेपर को अपने बैठने वाले आसन के सामने करीब तीन फीट की दूरी लिए हुए कमरे की दीवार पर इस तरह से टांग दें कि उसका वृत्त आपकी आंखों के ठीक सामने रहे। कमरे में हल्की रोशनी का होनी चाहिए। इस प्रयोग को रा़ित्र के समय शांत वातावरण में करने से अच्छा रहता है। उस वृत्त पर तब तक दृष्टि जमाए रहें जबतक कि उसपर कोई चमकीली न दिखने लगे। अर्थात ज्यों-ज्यों एकाग्रता बढ़ेगी, त्यों-त्यों वृत्त का कालापन खत्म होता चला जाएगा और एक स्थिति ऐसी भी आएगी जब वह एकदम से गायब ही हो जाएगा। इस अभ्यास को प्रतिदिन पंद्रह मिनट तक करते हुए लगातार 51 दिनों तक करने के बाद त्राटक साधना की सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इस दौरान मन में बाहरी विचारों को नहीं आने देना चाहिए।ज्योति त्राटक का तरीकाः इसकी सिद्धि रात्रि या घुप्प अंधेरे में प्रतिदिन करीब एक निश्चित समय पर बीस मिनट तक कर प्राप्त की जा सकती है। इस साधना के दौरान किसी भी प्रकार की बाधा या अशांति नहीं पैदा होनी चहिए। ढीलेढाले परिधानों में असान लगाकर करीब तीन फुट की दूरी पर एक दीपक या मोमबत्ती को जलाकर उपासना की जानी चाहिए। ध्यान रहे दीपक या मोमबत्ती की लौ में हवा या दूसरी वजहों से कंपन नहीं होने पाए या वह ध्यान के बीच में ही बुझे नहीं। उसे लौ की ज्योति या कहें मधुर प्रकाश पुंज को स्थिर आंखों से एकाग्रता के साथ देखना चाहिए। आंखों की पलकें नहीं झपकनी चाहिए। ऐसा तबतक करना चाहिए, जबतक कि आंखों में किसी भी तरह की पीड़ा या असहनशीलता की स्थिति नहीं आए।इस सिलसिले को प्रतिदिन जारी रखने पर ज्योति का तेज बढ़ता हुए ऐहसास होगा। कुछ दिनों के बाद तो साधना के दौरान ज्योति के प्रकाश के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखेगा। साथ ही प्रकाश पुंज में संकल्पित कार्य या व्यक्ति का स्वरूप दिखेगा, तो उस आकृति के अनुरूप घटित घटनाओं से आंखों की गजब के तेज की अनुभूति होगी और मनोवांछित कार्यों में सफलता मिलेगी। इस तरह से मिलने वाली सिद्धि सकारात्मक कार्यों के लिए हो तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। एक मान्यता के अनुसार सिद्ध योगियों में दृष्टिमात्र से ही अग्नि उत्पन्न करने की क्षमता त्राटक सिद्धि से ही हासिल होती है।दर्पण त्राटकः इस तरीके में दर्पण का उपयोग किया जाता है, जिसमें अभ्यास के दौरान चेहरा नहीं दिखता है। इस साधन के दौरान व्यक्ति की स्थिति गहन ध्यान अर्थात शून्य मे विचरण की होती है और उसके द्वारा विचारी जाने वाली बातें साकार होने लगती हैं। इस साधना को संपन्न करने वाला व्यक्ति के चेहरे पर जहां तेज और आत्मविश्वास झलकता है, वहीं लंबे समय तक विचारशून्य बना रहता है। वह किसी को भी आसानी से सम्मोहित या वशीभूत कर लेता है। इसके अभ्यास के लिए निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक है।दर्पण का आकार आठ इंच लंबा और छह इंच चैड़ा होना चाहिए। यानि कि उसमें नजदीक से केवल चेहरा दिखने लायक हो। उसके सामने इस तरह से बैठना चाहिए ताकि दर्पण में सिर्फ आपकी दोनों आंखों की पुतली ही दिखाई दे।दर्पण को एकटक से निहारते समय अपनी सांसों को नियंत्रित रखना चाहिए। उसमे उतार-चढ़ाव आने से एकाग्रता भंग हो सकती है। यदि आपकी सांस एकदम रूकी हुई तो इससे आपकी वैचारिकता में स्थिरता आने की संभावना प्रबल हो जाती है।

दर्पण में दिखने वाली सिर्फ पुतली पर ही ध्यान देना चाहिए, न कि दर्पण की फ्रेम या आस-पास की दीवारों पर।यह त्राटक लंबे समय तक प्रभावकारी रह सकता है। इस दौरान समय का अंदाजा लगाना मुश्किल है।दर्पण त्राटक से आत्मविश्वास, विचार शून्यता, सम्मोहन और प्राण ऊर्जा के अभ्यास किए जा सकते हैं। विशेषः त्राटक साधन के लिए खुद को अगर नियामों से बंधना होगा, तो इस उगते सूर्य, मोमबत्ती या दीपक की लौ, कोई यंत्र, दीवार या सफेद कागज पर बना बिंदु आदि को देखकर किया जा सकता है। इसक लिए आंखों की स्वस्थता का होना अति आवश्यक है। इससे आंखों और मस्तिष्क के भीतर गर्मी बढ़ जाती है और अधिक देर तक करने से आंखों से आंसू तक निकल आते हैं। इस स्थिति में अभ्यास थोड़े समय के लिए रोक देना चाहिए।

बाह्य त्राटक का उद्देश्य बाह्य-साधकों के आधार पर मन को वश में करना एवं चित्त प्रवृत्तियों का एकीकरण करना है। मन की शक्ति प्रधानतया नेत्रों द्वारा बाहर आती है। दृष्टि को किसी विशेष वस्तु पर जमाकर उसमें 'मन को तन्मयतापूर्वक प्रवेश कराने से नेत्रों द्वारा विकीर्ण होने वाला मन:तेज एवं विद्युत प्रवाह एक स्थान पर केन्द्रीभूत होने लगता है। इससे एक तो एकाग्रता बढ़ती है। दूसरे नेत्रों का प्रवाह-चुम्बकत्व बढ़ जाता है। ऐसी बढ़ी हुई आकर्षण शक्ति वाली दृष्टि को 'बेधक-दृष्टि' कहते हैं।

'बेधक दृष्टि' से देखकर किसी व्यक्ति को प्रभावित किया जा सकता है। मैस्मरेजम करने वाले अपने नेत्रों में त्राटक द्वारा ही इतना विद्युत प्रवाह उत्पन्न कर लेते हैं कि उसे जिस किसी शरीर में प्रवेश कर दिया जाय, वह तुरन्त बेहोश एवं वशवर्ती हो जाता है। उस बेहोश या अर्द्धानद्रित व्यक्ति के मस्तिष्क पर बेधक दृष्टि वाले व्यक्ति का कब्जा हो जाता है और उसमें जो चाहे वह काम ले सकता है। मैस्मरेजम करने वाले किसी व्यक्ति को अपनी त्राटक शक्ति से पूणनिद्रित या अद्धानिद्रित करके उसे नाना प्रकार के नाच नचाते हैं।

मैस्मरेजम द्वारा सत्संकल्प, दान, रोग निवारण, मानसिक त्रुटियों का परिमार्जन आदि लाभ हो सकते हैं और उससे ऊँची अवस्था में जाकर अज्ञात वस्तुओं का पता लगाना, अप्रकट बातों को मालूम करना आदि कार्य भी हो सकते हैं। दुष्ट प्रकृति के बेधक दृष्टि वाले अपने दृष्ट तेज से कहीं स्त्री-पुरुषों के मस्तिष्क पर अपना अधिकार करके उन्हें भ्रमग्रस्त कर देते हैं और उनका सतीत्व तथा धन लूटते हैं। कई बेधक दृष्टि से खेल- तमाशे करके पैसा कमाते हैं यह इस महत्वपूर्ण शक्ति का दुरुपयोग है।

बेधक दृष्टि द्वारा किसी के अन्तःकरण में भीतर तक प्रवेश करके उसकी सारी मन स्थिति को, मनोगत भावनाओं को जाना जा सकता है। बेधक दृष्टि फेंक कर दूसरों को प्रभावित किया जा सकता है। नेत्रों में ऐसा चुम्बकत्व त्राटक द्वारा पैदा हो सकता है। मन की एकाग्रता, चूँकि त्राटक के अभ्यास में अनिवार्य रूप से करनी पड़ती है, इसलिए उसका साधन साथ-साथ होते चलने से मन पर बहुत कुछ काबू हो सकता है।

१- एक हाथ लम्बा एक हाथ चौड़ा, चौकोर कागज का पुट्टा लेकर उसके बीच में रुपये के बराबर एक काला गोल निशान बना लें। स्याही एक-सी हो, कहीं कम ज्यादा न हो। इसके बीच में सरसों के बराबर निशान छोड़ दो और उसत्रें पीला रंग भर दो और तुम उससे चार फीट दूरी पर इस प्रकार बैठो कि वह काला गोला तुम्हारी आँखों के सामने, सीध में रहे।

साधना का कमरा ऐसा होना चाहिए कि जिसमें न अधिक प्रकाश रहे न अंधेरा। न अधिक सर्दी हो, न गर्मी। पालथी मारकर, मेरुदण्ड सीधा रखते हुए बैठो और काले गोले के बीच में जो पीला निशान हो उस पर दृष्टि जमाओ। चित्त की सारी भावनायें एक़त्रित करके, उस बिन्दु को इस प्रकार देखो, मानो तुम अपनी सारी शक्ति नेत्रों द्वारा उसमें प्रवेश कर देना चाहते हो। ऐसा सोचते रहो कि मेरी तीक्ष्ण दृष्टि से इस बिन्दु में छेद हुआ जा रहा है, कुछ देर इस प्रकार देखने से आँखों में दर्द होने लगेगा और पानी बहने लगेगा, तब अभ्यास बन्द कर दो।

अभ्यास के लिए प्रातःकाल का समय ठीक है। पहले दिन देखो कि कितनी देर में आँखें थक जाती हैं और पानी आ जाता है। पहले दिन जितनी देर अभ्यास किया है प्रतिदिन उससे एक या आधी मिनट बढा़ते जाओ।

दृष्टि को स्थिर करने पर देखेंगे कि उस काले गोले में तरह-तरह की आकृतियों पैदा होती हैं। कभी वह सफेद रंग का हो जायेगा तो कभी सुनहरा। कभी छोटा मालूम पड़ेगा, कभी चिन्गारियाँ-सी उड़ती दीखेगी, कभी बादल से छाये हुए प्रतीत होंगे। इस प्रकार यह गोला अपनी आकृति बदलता रहेगा, किन्तु जैसे-जैसे दृष्टि स्थिर होना शुरू हो जायेगी उसमें दीखने वाली विभिन्न आकृतियाँ बन्द हो जायेंगी और बहुत देर तक देखते रहने पर भी गोला ज्यों का ज्यों बना रहेगा।

२- एक फुट लम्बे-चौड़े दर्पण के बीच चाँदी की चवन्नी के बराबर काले रंग के कागज का एक गोल टुकड़ा काटकर, चिपका दिया जाता है। उस कागज के मध्य में सरसों के बराबर पीला बिन्दु बनाते हैं। इस बिन्दु पर दृष्टि स्थिर करते हैं। इस अभ्यास को एक-एक मिनट बढ़ाते जाते हैं। जब इस तरह की दृष्टि स्थिर हो जाती है, तब और भी आगे का अभ्यास शुरू हो जाता है। दर्पण पर चुपके हुए कागज को छुड़ा देते हैं और उसमें अपना मुँह देखते हुए अपनी बाई आँरव की पुतली पर दृष्टि जमा कर लेते हैं और उस पुतली में ध्यानपूर्वक अपना प्रतिबिम्ब देखते हैं।

३- गो घृत का दीपक जलाकर नेत्रों की सीध में चार फुट की दूरी पर रखिए। दीपक की लौ आध इन्च से कम उठी हुई न हो इसलिए मोटी बत्ती डालना और पिघला हुआ घृत भरना आवश्यक है। बिना पलक झपकाये इस अग्नि-शिखा पर दृष्टिपात कीजिए और भावना कीजिए कि आपके नेत्रों की ज्योति दीपक की लौ से टकराकर उसी में घुली जा रही है।

४- प्रातःकाल के सुनहरे सूर्य पर या रात्रि को चन्द्रमा पर भी त्राटक किया जाता है। सूर्य या चन्द्रमा जब मध्य आकाश में होंगे तब त्राटक नहीं हो सकता। कारण कि उस समय तो सिर ऊपर को करना पड़ेगा या लेटकर ऊपर को आँखें करनी पड़ेगी, यह दोनों ही स्थितियाँ हानिकारक हैं। इसलिए उदय होता सूर्य या चन्द्रमा ही त्राटक के लिए उपयुक्त माना जाता है।

५- त्राटक के अभ्यास के लिए स्वस्थ नेत्रों का होना आवश्यक है। जिनके नेत्र कमजोर हों या कोई रोग हो, उन्हें बाह्य-त्राटक की अपेक्षा आन्तर-त्राटक उपयुक्त है, जो कि ध्यान प्रकरण में लिखा जा चुका है। आन्तर-त्राटक को पाश्चात्य योगी इस प्रकार करते हैं कि दीपक की अग्नि-शिखा, सूर्य-चन्द्रमा आदि कोई चमकता प्रकाश पन्द्रह सैकण्ड खुले नेत्रों से देखा, फिर आँखें बन्द कर ली और ध्यान किया कि वह प्रकाश मेरे सामने मौजूद है। एकटक दृष्टि से मैं उसे घ