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हमारा चक्र संस्थान षट्चक्र, षट्-सम्पत्तियों और आठ सिद्धियाँ का क्या रहस्य है?


1-शरीर मोटी दृष्टि से एक सजीव एवं चिन्तनशील माँस पिण्ड है। मनुष्य की अपनी स्थिति है और अपनी गरिमा। यह उसकी चेतना का मूल्य है। यह चित् शक्ति- दृश्यमान शरीर में स्फूर्ति,बलिष्ठता एवं सुन्दरता के रूप में परिलक्षित होती है। सूक्ष्म शरीर में उसे ज्ञान-गरिमा, बौद्धिक प्रखरता एवं साहसिक मनस्विता के रूप के रूप में देखा जा सकता है। अन्तिम अति सूक्ष्म- कारण शरीर में इसी चेतना में आस्था, आकाँक्षा, स्नेह, सेवा उदारता, वरुणा जैसी दिव्य-विभूतियों का निवास रहता है।

2-इन तीनों शरीरों में जो चेतनात्मक ऊर्जा-चित्त-शक्ति काम करती है,उसे अन्तरिक्ष व्यापी ताप, शब्द विद्युत, ईथर आदि के प्रचण्ड शक्ति कम्पनों से भी अधिक क्षमता सम्पन्न माना जा सकता है। जड़ और चेतन के बीच जितना अनुपातिक अन्तर है, उतना ही विज्ञान परिचित भौतिक सामर्थ्यों और योगियों की जानी मानी आत्मिक क्षमता में। लेसर मृत्यु किरण, अणु ऊर्जा आदि के सम्बन्ध में रोमांचकारी चर्चाएँ सुनने को मिलती रहती हैं। आत्मिक शक्ति की सृजनात्मक शक्ति के बारे में उतनी ही गम्भीरतापूर्वक समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि उसका मूल्याँकन अनिर्वचनीय है।

3-शरीर का एक नगण्य-सा घटक शुक्राणु एक नया मनुष्य रच सकता है। अणु की सौर-मण्डल से तुलना की जाती है। पिण्ड को-व्यक्ति को ब्रह्मांड का प्रतीक प्रतिनिधि कहा जाता है। यह तथ्य भी है और सत्य भी। ऐसी दशा में मानवी सत्ता की तुलना उस चिनगारी से की जा सकती है जिसमें दावानल बनकर समस्त संसार को अपनी चपेट में ले सकने की क्षमता बीज रूप से विद्यमान है। अवसर मिले तो वह बीज विशाल वृक्ष की तरह सुविकसित हो सकता है और चिरकाल तक अपने जैसे असंख्यों बीज उत्पन्न करता रह सकता है।

ब्राह्मी शक्ति के उभय-पक्षीय प्रयोग हैं। उसके परिष्कृत होने पर मनुष्य महात्मा, देवात्मा और परमात्मा के स्तर पर पहुँच सकता है और इन तीनों समुन्नत चेतना वर्गों में जो दिव्य-विभूतियाँ पाई जाती हैं, उससे सुसम्पन्न बन सकता है। इसी शक्ति को यदि भौतिक प्रगति की दिशा में लगा दिया जाए तो व्यक्ति प्रखर प्रतिभावान बन सकता है, उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है और सम्भव दीखने वाले कार्यों को सम्भव बनाता हुआ पग-पग पर विजय श्री वरण कर सकता है। ओजस्वी, मनस्वी और तेजस्वी व्यक्तियों की गुण गरिमा से इतिहास के उज्ज्वल पृष्ठ आलोकित हो रहे हैं। ऐसे महामानवों की यश गाथाएँ उन्हें मिले साधनों एवं अवसरों के कारण नहीं, वरन् उनके अन्तरंग में उभरी हुई चित-शक्ति के ऊपर ही आधारित रही हैं।

चित-शक्ति को विकसित करने का विज्ञान ही योग एवं तप की संयुक्त प्रक्रिया बनकर विकसित हुआ है। स्थूल शरीर के अन्तराल में जो दो सूक्ष्म शरीर है उसकी मूर्छना जगाकर चेतना उत्पन्न कर देना-माया मलीनता से छुड़ाकर दिव्य परिष्कृत बना देना यही है। साधना का उद्देश्य, समझा जाता है कि भक्तजनों अथवा योगी तपस्वियों को कई तरह की जो ऋद्धि-सिद्धियाँ मिलती हैं, वे किसी देव-दानव के अनुदान, अनुग्रह का प्रतिफल हैं। पर वास्तविकता यह है कि जो कुछ अद्भुत असाधारण अतीन्द्रिय कहा जाता है। वह भीतर से ही उभरता है। आत्म-परिष्कार का ही दूसरा नाम ईश्वर साक्षात्कार है। यह तथ्य यदि समझा जा सके तो हम सत्य को समझने वाले कहे जा सकेंगे।

आत्म-साधना के अनेक प्रयोग हैं। अनेकानेक परम्पराओं में अगणित विधि-विधान बताये गये हैं। भारतीय साधना विज्ञान के अन्तर्गत 84 योग प्रधान हैं। उनकी शाखा उपशाखाएँ बढ़ते-बढ़ते हजारों तक पहुँचती हैं। फिर संसार के अन्यान्य क्षेत्रों में प्रचलित साधनाओं की गणना करना और उनका लेखा जोखा रखना तो और भी कठिन है। इन योग साधनाओं में चक्रवेधन की एक प्रक्रिया ऐसी है जिसका महत्व संसार भर के सभी योगाभ्यासियों ने स्वीकार किया है। षट्चक्र वेधन के स्वरूपों और विधि-विधानों में थोड़ा अन्तर- मतभेद रहते हुए भी उनके अस्तित्व और प्रभाव को सर्वत्र स्वीकारा गया है। कुण्डलिनी शक्ति जागरण की चर्चा साधना क्षेत्र में बहुधा होती रहती है। यह चक्र वेधन में मिलने वाली सफलता की अन्तिम परिणति है।

शरीर के नाड़ी संस्थान में-ज्ञान तन्तुओं में दौड़ने वाली विद्युत शक्ति से सभी परिचित हैं। टेलीफोन के तार तभी काम करते हैं जब उनके साथ बिजली का सम्बन्ध हो। इन्द्रियों के माध्यम से मिलने वाली ज्ञान सम्वेदनाएँ-मस्तिष्क में उठने वाली विचार एवं भाव तरंगें इसी विद्युत शक्ति का चमत्कार है। शरीर में विद्युत चुम्बकत्व से भरे आँधी-तूफान के ‘मुह’ बनते, बिगड़ते हैं। जीवन की दशा धारा इसी की प्रेरणा से विनिर्मित होती है। योगियों ने इस दिव्य चेतना प्रवाह के सम्बन्ध में बहुत कुछ जानने का प्रयास इसलिए किया है जिससे उसका सदुपयोग करके अधिक लाभ उठाना सम्भव हो सके।

चित-शक्ति की शोध करते हुए पाया जाता है कि मस्तिष्क के मध्य बिन्दु में अवस्थित सहस्रार चक्र पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव की तरह है और जननेन्द्रिय के मूल में मूलाधार चक्र की स्थिति दक्षिणी ध्रुव जैसी है। ब्रह्मांड चेतना का व्यक्ति सत्ता के साथ सम्पर्क बनने और आदान प्रदान होने के माध्यम यही दो शरीर केन्द्र हैं। इसमें सन्निहित शक्ति हो ही जीवन संचार की धुरी कही जा सकती है। बुद्धि एवं श्रद्धा का केन्द्र ऊपर है और प्रफुल्लता एवं बलिष्ठता की धुरी नीचे है। जननेन्द्रिय मात्र काम-क्रीड़ा का आनन्द लेने एवं सन्तान उत्पन्न करने के काम ही नहीं आती उसके मूल में स्फूर्ति, कला साहसिकता, प्रफुल्लता जैसी अगणित क्षमताएँ भरी पड़ी हैं। इन्हें भौतिक प्रगति का आधार कहा जा सकता है। जिसकी वह शक्ति नष्ट हो जाए उसे क्लीव-नपुंसक कहकर चिढ़ाया जाता है। यहाँ यौनाचार की क्षमता का नहीं पौरुष का वर्णन है। मूलाधार चक्र को भौतिक शक्तियों का केन्द्र कहा गया है।

मस्तिष्क का सहस्रार केन्द्र ज्ञान, बुद्धि आदि आत्मिक सामर्थ्यों का उद्गम है। प्रत्याहार धारणा, ध्यान, समाधि जैसी साधनाएँ मस्तिष्कीय क्षेत्र में ही की जाती हैं। भौतिक शक्तियों के केन्द्र मूलाधार और आत्मिक शक्तियों के उद्गम सहस्रार के बीच एक कड़ी है, जिसे बोल-चाल की भाषा में मेरुदण्ड और अध्यात्म की परिभाषा में सुषुम्ना संस्थान कहते हैं। रीढ़ की हड्डी का क्या महत्व है? इसे शरीर-शास्त्र के विद्यार्थी भली प्रकार जानते हैं। इसके अन्तराल में प्रवाहित होने वाले विद्युत प्रवाह के साथ उच्चस्तरीय विभूतियाँ जुड़ी हुई हैं इसे तत्वदर्शी आत्मवेत्ता भली प्रकार जानते हैं। इस संस्थान में प्रचण्ड भगवान विद्युत धाराएँ बहती हैं। इसके दो स्वरूप हैं- एक ऋण, दूसरी धन-एक नेगेटिव दूसरी पाजेटिव। ऋण को इडा और धन को पिंगला कहते हैं। दोनों जब भी परस्पर मिलती हैं तो शक्तिधारा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है। इस मिलन प्रक्रिया को सुषुम्ना कहते हैं। इन्हें नाड़ियां भी कहा जाता है, पर यह शब्द प्रयोग ये किसी को ‘नस’ का अर्थ नहीं लेना चाहिए। नाड़ी शब्द का एक अर्थ ‘नस’ भी होता है पर यहाँ उस प्रकार की कोई बात नहीं है। यहाँ दो विद्युत धाराओं का संकेत है। मेरुदण्ड को चीरकर उसमें इडा, पिंगला, सुषुम्ना नाम की कोई उस तरह की नसें नहीं देखी जा सकती जैसा कि योग-शास्त्र में उनका विस्तारपूर्वक और मस्तिष्क रूपी दो अति महान शक्ति केन्द्रों के बीच निरन्तर दौड़ने वाले विद्युत प्रवाह को इडा, पिंगला और सुषुम्ना की संयुक्त, प्रक्रिया कह सकते हैं। अलंकार रूप में इसी को गंगा, जमुना और सरस्वती के मिलन से बनने वाली त्रिवेणी की उपमा दी गई है।

तीव्र प्रवाह की नदियों में प्रायः भँवर पड़ते रहते हैं। जब हवा तेज और गरम होती है तो ग्रीष्म ऋतु में चक्रवात उठते हैं। पानी में भंवर और हवा में चक्रवात की तरह सुषुम्ना संस्थान में प्रवाहित रहने वाली चित् शक्ति को अति प्रचण्ड प्रवाह मात्र विद्युतधारा माना गया है। उसमें भी भँवर पड़ते हैं। उन्हें शक्ति चक्र कहते हैं। योग-शास्त्र में इनकी गणना छह है। षट्चक्र नाम से सभी परिचित हैं। वस्तुतः यह छह नहीं सात हैं। सातवाँ सहस्रार है। उसे सबका अधिपति मानकर गणना से बाहर रखा गया है। यदि अलग ही रखना था तो उत्तरी ध्रुव सहस्रार की तरह दक्षिणी ध्रुव मूलाधार को भी अलग करना चाहिए था और पाँच की ही गणना रखकर उन्हें पाँच देवताओं का -पाँच कोषों का, गायत्री के पाँच मुखों का प्रतीत कहा जा सकता था। जो हो, हमें संख्या निर्धारण के वितंडावाद में उलझने की अपेक्षा वस्तुस्थिति को समझना चाहिए। षट्चक्र प्रसिद्ध है ही- सातवें हमें सहस्रार को भी गिन लेना चाहिए। इस प्रकार यह सात शक्ति चक्र-सात लोकों के, सात ऋषियों के, सप्त धातुओं के, सप्त द्वीपों के प्रतीक समझे जा सकते हैं।

मेरुदण्ड के षटचक्रों की भाँति शरीर में अन्यत्र भी कितने शक्ति स्रोत हैं। इन्हें ग्रन्थि उपत्यिका आदि कहते हैं। मस्तिष्क में विष्णु ग्रन्थि, हृदय में ब्रह्म ग्रन्थि और नाभि में रुद्र ग्रन्थि का स्थान है। यहाँ भी थोड़ा मतभेद है। हृदय स्थान विष्णु ग्रन्थि और मस्तिष्क में ब्रह्म ग्रन्थि भी कही गई है। हमें इन नाम भेदों में भी नहीं उलझना चाहिए और समझना चाहिए कि न केवल मेरुदण्ड में वरन् मस्तिष्क, हृदय एवं नाभि में ऐसे ही महत्वपूर्ण शक्ति चक्र हैं और उनका वेधन करने का विधान ग्रन्थि भेद के नाम से वर्णित है। यहाँ एक बात और ध्यान रखने की है- वेध शब्द का सामान्य अर्थ ‘छेद’ कर देना होता है। पर आध्यात्म की परिभाषा में उसे ‘जागरण’ अर्थ में प्रयोग किया गया है।

शरीर के पृष्ठ भाग के- सुषुम्ना संस्थान के षट्चक्रों की तरह काया के अग्र भाग में भी छह चक्र अवस्थिति हैं। उन्हें सूर्य-चक्र, अग्नि चक्र, अमृत-चक्र, प्रभंजन चक्र, तड़ित-चक्र, सोम चक्र कहा गया है।

पर्वतों में भरा जल जब एकत्रित होकर किसी स्थान विशेष से फूटता है तो उसे ‘झरना’ कहते हैं। झरनों के उद्गम स्थान पर जलधारा कितनी प्रचण्ड होती है। ऊपर से नीचे गिरने पर वहाँ कितना कोलाहल होता है। और कितनी उथल-पुथल मचती है उसे सभी जानते हैं। चक्र संस्थानों को भंवर, चक्रवात की ही तरह एक उपमा झरना फटने की भी दी जा सकती है। ज्वालामुखी के छेद अक्सर अग्नि, धुआँ या दूसरी चीजें उगलते रहते हैं। चक्रों से भी उसी प्रकार का प्रकटीकरण होता रहता है। समुद्री लहरों से असीम विद्युत शक्ति उपलब्ध करने की तैयारियाँ हो रही हैं। चक्र संस्थानों में उबलती शक्ति का उपयोग कर सकना जिनके लिए सम्भव होता है वे उसका ऐसा लाभ उठा सकते हैं। जिसे देव क्षमता कहकर सम्बोधित किया जा सके।

हारमोन ग्रन्थियों के सम्बन्ध में खोज करने वाले शरीर शास्त्री आश्चर्य चकित हैं कि इन नन्ही-सी- ग्रन्थियों से निकलने वाले रस मात्रा में कुछ ही बूँद होते हैं, पर शारीरिक और मानसिक स्थिति को कितना अधिक प्रभावित करते हैं। अण्डकोष, गुर्दे, जिगर, तिल्ली, पौरुष ग्रन्थियाँ आदि को बड़ी ग्रन्थियाँ ही कह सकते हैं। उनका क्रिया-कलाप स्थूल होने से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। हारमोन ग्रन्थियों का रहस्योद्घाटन इससे बहुत कठिन है और बहुत माथा-कच्ची करने के बाद भी ठीक तरह पकड़ में नहीं आ रहा है। सूक्ष्म ग्रन्थियाँ जिन्हें चक्र कहते हैं, इन्द्रियों एवं उपकरणों की पहुँच से बाहर हैं। उन्हें जागृत अन्तर्दृष्टि से ही देखा, समझा एवं प्रयोग में लाया जा सकता है। सूक्ष्म विज्ञान के आधार पर ही उनका अनुभव एवं उपयोग सम्भव होता है।

हठयोग साधना के अन्तर्गत आने वाले मेरुदण्ड के सुषुम्ना संस्थान में अवस्थित छह चक्रों के नाम हैं- (1) मूलाधार चक्र (2) स्वाधिष्ठान चक्र (3) मणिपुर चक्र (4) अनाहत चक्र (5) विशुद्ध चक्र (6) आज्ञाचक्र।

इनमें शरीर शास्त्रियों ने चार को नाड़ी गुच्छकों के रूप में मान्यता दे दी है। मूलाधार चक्र को- पौल्विक प्लैक्सस। मणिपुर चक्र को- सोलर प्लैक्सस। अनाहत चक्र को- कार्डियल प्लैक्सस और विशुद्ध चक्र को- फैरिजियल प्लैक्सस नाम से निश्चित कर दिया गया है। शेष दो के बारे में प्राचीन व्याख्या एवं नवीन वास्तविकता में थोड़ा अन्तर एवं मतभेद है। आशा की जानी चाहिए कि वह गुत्थी भी निकट भविष्य में सुलझ ही जायेगी।

षट्-सम्पत्तियों;-

चक्र संस्थान के जागरण के फलस्वरूप मिलने वाली षट्-सम्पत्तियों का वर्णन मिलता है। इन्हें आध्यात्मिक उपलब्धियाँ भी कह सकते हैं।

षट्-सम्पत्ति यह है (1) शम (2) दम (3) उपरति (4) तितीक्षा (5) श्रद्धा (6) समाधान।

शम- अर्थात् शान्ति उद्वेगों का शमन। दम- इन्द्रियों को दमन करने की क्षमता। उपरति- दुष्टता से घृणा। तितीक्षा- कष्टों को धैर्यपूर्वक सहना। श्रद्धा- सन्मार्ग में प्रगाढ़ निष्ठा, विश्वास और साधना का समन्वय। समाधान- संशयों और लालसाओं से छुटकारा।

यह गुण, कर्म, स्वभाव की विशेषताएँ हैं। उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व से मनुष्य ऊँचा उठता है। और ब्रह्म परायण व्यक्तियों को मिलने वाले आन्तरिक सन्तोष, उल्लास और बाह्य सम्मान, सहयोग का अधिकारी बनता है।

इसके अतिरिक्त आत्मिक प्रगति के भौतिक लाभ भी कितने ही हैं जिन्हें सिद्धियों के नाम से पुकारा गया है। आत्मिक सफलताओं के सम्पत्ति एवं विभूति दो नाम हैं। भौतिक प्रगति को समृद्धि एवं सिद्धि के नाम से सम्बोधित किया जाता है। दोनों के सम्मिलित परिणाम को अतीन्द्रिय क्षमता विकास के रूप में देखा जा सकता है।

आठ सिद्धियाँ;-

श्री आद्य शंकराचार्य ने आठ सिद्धियाँ यह गिनाई हैं (1) जन्म सिद्धि (2) शब्द ज्ञान सिद्धि (3) शास्त्रज्ञान सिद्धि (4) आधिदैविक ताप सहन शक्ति (5) आध्यात्मिक ताप सहन शक्ति (6) आधिभौतिक ताप सहन शक्ति (7) विज्ञान सिद्धि (8) विद्या शक्ति।

जन्म सिद्धि का अर्थ है पूर्व जन्मों की स्थिति का आभास। पूर्व जन्मों के सम्बन्धों के प्रति सहज आकर्षण और उनके साथ अपने पूर्व सम्बन्धों की जानकारी।

शब्द सिद्धि का अर्थ है- शब्दों के साथ जुड़ी हुई भावना का आभास। शब्दों की शक्ति बड़ी सीमित है और उससे कुछ का कुछ- उलटा-सीधा-अप्रासंगिक अर्थ भी निकल सकता है। कहने वाले की भावना का सही अनुमान वही लगा सकता है जिनका अन्तः करण पवित्र हो।

शास्त्र सिद्धि का तात्पर्य है- शास्त्रकार की मूल भावना को समझना और यह जानना कि यह प्रतिपादन किस देश, काल, पत्र को ध्यान में रखकर किया गया है। कोई सिद्धान्त या प्रतिपादन सार्वभौम या सर्वकालीन नहीं होता। यह शास्त्र वचन किस प्रकार प्रयुक्त करना चाहिए। यह सूक्ष्म ज्ञान होना ही शब्द की सिद्धि है।

आधिदैविक ताप सहन शक्ति का अर्थ है- दैवी प्रकोप अथवा प्रारब्ध जन्म लोग के कारण आकस्मिक अनायास विपत्तियाँ उत्पन्न हो जाने, प्रियजनों के कारण विछोह आदि के अवसर उपस्थित हो जाने पर उन शोक सम्वेदनाओं को धैर्यपूर्वक सहन।

आध्यात्मिक ताप सहन शक्ति का तात्पर्य है- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मदमत्सर, ईर्ष्या आदि उद्वेगों को नियन्त्रण में रखना। इन्द्रियों के अमर्यादित योग को छूट न देना, मन को उच्छृंखल न होने देना। इस अवरोध से भीतर जो असन्तोष उत्पन्न होता है उसको हँसते हुए टाल देना।

आधिभौतिक ताप सहन शक्ति का अर्थ है- सर्दी गर्मी, भूख, प्यास, नींद, रोग, चोट आदि के शरीर कष्टों को समय पड़ने पर शक्तिपूर्वक सह लेना और चित को अशान्त उद्विग्न न होने देना।

विज्ञान शक्ति का अर्थ है-शुद्ध अन्तःकरण, निर्मल चरित्र, सन्तुलित मन, सौम्य स्वभाव और हँसमुख प्रकृति, निरालस्यता, स्फूर्तिवान और नियम-पालन की तत्परता, कर्त्तव्य पालन में प्रगाढ़ निष्ठा, उदार व्यवहार में सन्तोष।

विद्या शक्ति अर्थात्- आत्मा के स्वरूप, उद्देश्य तथा कर्तव्य पर भावना और विश्वास भरी निष्ठा, ईश्वर पर विश्वास, आत्मा को सर्वव्यापी समझकर सबको अपना ही समझना और आत्मीयता भरा व्यवहार करना, प्रेम भावनाओं के उभार, उद्वेग और आवेशों से निवृत्ति।

तिवादी या अति उच्चस्तरीय अपवाद रूप में कहीं कहीं, कभी कभी सुनी, देखी जाने वाली सिद्धियों में (1) अणिमा (2) महिमा (3) गरिमा (4) लघिमा (5) प्राप्ति (6) प्राकाम्य (7) ईशत्व (8) वशित्व का वर्णन मिलता है।

अणिमा अर्थात्- शरीर को अणु के समान सूक्ष्म बना लेना। महिमा अर्थात्- बहुत बड़ा कर लेना। गरिमा- बहुत भारीपन। लघिमा- बहुत हलकापन। प्राप्ति- दूरस्थ वस्तु की समीपता। प्राकाम्य- मनोरथों की पूर्ति। ईशत्व- स्वामित्व, अभीष्ट वस्तु व्यक्ति या परिस्थिति पर अधिकार। वशित्व- वशवर्ती बना लेना।

अष्ट सिद्धियों का दूसरा वर्णन एक और भी मिलता है (1) परकाया प्रवेश (2) जलादि में असंग (3) उत्क्रान्ति (4) ज्वलन (5) दिव्य श्रवण (6) आकाश गमन (7) प्रकाश आवरण क्षय (8) भूत जय।

इस प्रकार के चमत्कार इन दिनों देखे नहीं जाते। जो दिखते हैं उनमें छल की मात्रा ही प्रमुख होती है। ऐसी दशा में हमें अनुभव में न आने वाली सिद्धियों पर ध्यान देने की अपेक्षा इतना ही सोचना है कि चक्र वेधन जैसी योग-साधनाओं का आश्रय लेकर हम सहज ही अपनी आत्मिक और भौतिक सामर्थ्यों को जगा सकते हैं और उस दिशा में मिलने वाली सफलता का इतना लाभ ले सकते हैं, जितना सामान्य पुरुषार्थ से सम्भव नहीं हो सकता।

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योग के सिद्धियों को फलित करके सर्ष्टि संचालन के सिधान्तों को जाना व प्रयोग किया जा सकता है किन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि किस योग से क्या घटित होता है इसी विषय पर संक्षिप्त लेख प्रस्तुत किया जा रहा है सभी योग के सिद्धि को प्राप्त करने की प्रक्रिया अलग-अलग है अतः प्रक्रिया पर पुनः विचार किया जायेगा योग के सिद्धियों की संख्या बहुत अधिक है, नीचे हम कुछ महत्वपूर्ण सिद्धियों का संक्षिप्त में वर्णन कर रहे हैं —

(1) यह जगत संस्कारों (काल-समय) का परिणाम है और उन संस्कारों के क्रम में अदल-बदल होने से ही तरह-तरह के परिवर्तन होते रहते हैं। योगी इस तत्व को जान कर प्रत्येक वस्तु और घटना के ‘भूत’ तथा भविष्यत् का ज्ञान प्राप्त कर लेता है।

(2) शब्द, अर्थ और ज्ञान का एक दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध है इनके ‘संयम’ (धारणा, ध्यान और समाधि, इन तीनों साधन क्रियाओं के एकीकरण को ‘संयम’ कहते हैं) से ‘सब प्राणियों की वाणी’ का ज्ञान हो जाता है।

(3) अति सूक्ष्म संस्कारों (काल-समय) को प्रत्यक्ष देख सकने के कारण योगी को किसी भी व्यक्ति के पूर्व जन्म या अगले जन्म का ज्ञान होता है।

(4)अपने ज्ञान में संयम करने पर दूसरों के चित्त का ज्ञान होता है। इसके द्वारा योगी प्रत्येक प्राणी के मन की बात जान सकता है।

(5) कायागत रूप में संयम करने से दूसरों के नेत्रों के प्रकाश का योगी के शरीर के साथ संयोग नहीं होता। इससे योगी का शरीर ‘अन्तर्धान’ हो जाता है। इसी प्रकार उसके शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध को भी पास में बैठा हुआ पुरुष नहीं जान सकता।

(6) ’सोपक्रम’ का अभ्यास करने से योगी को मृत्यु का पूर्व ज्ञान हो जाता है।

(7) सातवीं सिद्धि (ध्यान) से योगी के आत्म-बल का इतना विकास हो जाता है कि उसके मन पर इन्द्रियों का वश नहीं चलता।

(8) बल में संयम करने से योगी को हाथी, शेर, ग्राह, गरुड़ की शक्ति प्राप्त होती है।

(9) ज्योतिष्मती प्रकृति के प्रकाश को सूक्ष्म वस्तुओं पर न्यास्त करके संयम करने से सूक्ष्म, गुप्त और दूरस्थ पदार्थों का ज्ञान होता है। इससे वह जल या पृथ्वी के भीतर समस्त पदार्थों को देख सकने में समर्थ होता है।

(10) सूर्य नारायण में संयम करने से योगी को क्रमशः स्थूल और सूक्ष्म लोकों का ज्ञान होता है। सात स्वर्ग और सप्त पाताल सूक्ष्म लोक कहे जाते हैं। योगी का अन्यान्य ब्रह्मांडों का भी ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

(11) चंद्रमा में संयम करने से समस्त राशियों और नक्षत्रों का ज्ञान प्राप्त होता है।

(12) ध्रुव में संयम करने से समस्त ताराओं की गति का पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है।

(13) नाभि चक्र में संयम करने से योगी को शरीर के भीतरी अंगों का पूर्ण ज्ञान हो जाता है। वात, पित्त, कफ ये तीन दोष किस रीति से हैं; चर्म, रुधिर, माँस, नख, हाथ, चर्बी और वीर्य ये सात धातुएँ किस प्रकार से हैं; नाड़ी आदि कैसी-कैसी हैं, इन सब का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। (14) कण्ठकूप में संयम करने से भूख और प्यास निवृत्त हो जाती है। मुख के भीतर उदर में वायु और आहार जाने के लिये जो कण्ठछिद्र है उसी का ‘कण्ठ कूप’ कहते हैं। यही पर पाँचवाँ चक्र स्थित है और क्षुधा, पिपासा आदि क्रियाओं का इससे घनिष्ठ सम्बन्ध है।

(15) कूर्म नाड़ी में संयम करने से मन अपनी चंचलता त्याग कर व्यक्ति स्थिर हो जाता है। (16) कपाल की ज्योति में संयम करने से योगी को सिद्धजनों के दर्शन होते हैं। सिद्ध महात्मागण जीव श्रेणी से मुक्त होकर सृष्टि के कल्याणार्थ चौदह भुवन में विराजते हैं।

(17) योग-साधन करते समय ध्यानावस्था में दिखलाई पड़ने वाले ‘प्रातिभ’ नामक तारे में संयम करने से ज्ञान-राज्य की समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

(18) हृदय में संयम करने से चित्त का पूर्ण ज्ञान होता है। वैसे महामाया की माया से कोई चित्त का पूर्ण स्वरूप नहीं जान पाता, पर जब योगी हृदयकमल पर संयम करता है तो अपने चित्त का पूर्ण ज्ञाता प्राप्त कर लेता है।

(19) बुद्धि की चिद्भाव अवस्था में संयम करने से पुरुष के स्वरूप का ज्ञान होता है। इससे योगी को (1) प्रातिभ, (2) श्रावण, (3) वेदन, (4) आदर्श, (5) आस्वाद और (6) वार्ता — ये षट्सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

(20) बन्धन का जो कारण है उसके शिथिल हो जाने से और संयम द्वारा चित्त की प्रवेश निर्गमन मार्ग नाड़ी का ज्ञान हो जाने से योगी किसी भी शरीर में प्रवेश कर सकता है। यही परकाया प्रवेश की सिद्ध है।

(21) उदान वायु को जीतने से जल, कीचड़ और कण्टक आदि पदार्थों का योगी को स्पर्श नहीं होता और मृत्यु भी वशीभूत हो जाती है अर्थात् वह इच्छा मृत्यु को प्राप्त होता है जैसा कि भीष्म पितामह का उदाहरण प्रसिद्ध है।

(22) समान वायु को वश में करने से योगी का शरीर तेज-पुञ्ज और ज्योतिर्मय हो जाता है। जिससे अंधकार में भी गमन कर सकता है ।

(23) कर्ण इन्द्रिय और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने से योगी को दिव्य श्रवण की शक्ति प्राप्त होती है। अर्थात् वह गुप्त से गुप्त, सूक्ष्म से सूक्ष्म और दूरवर्ती से दूरवर्ती शब्दों को भली प्रकार सुन सकता है।

(24) शरीर और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने से आकाश में गमन हो सकता है।

(25)शरीर के बाहर मन की जो स्वाभाविक वृत्ति ‘महा विदेह धारणा’ है उसमें संयम करने से अहंकार का नाश हो जाता है और योगी अपने अन्तःकरण को यथेच्छा (किसी भी लोक में) ले जाने की सिद्धि प्राप्त करता है।

(26) पंच तत्वों की स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थतत्व — ये पाँच अवस्थाएँ हैं। इन पर संयम करने से जगत् का निर्माण करने वाले पंचभूतों पर जयलाभ होता है और प्रकृति वशीभूत हो जाती है। इससे अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, वशित्व, ईशित्व — ये अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इस प्रकार योगी, समाधि अवस्था में पहुँचने के बाद जिस किसी विषय पर अपना ध्यान लगाता है उसी का पूर्ण ज्ञान किसी से बिना सीखे अथवा बिना कहीं गये हुये प्राप्त हो जाता है। अन्त में परमात्मा की ओर अग्रसर होते हुये उसे वैसी ही शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं जो ईश्वर में पाई जाती है। वह त्रिकालदर्शी हो जाता है और सब लोकों में उसकी गति हो जाती है और उसके संकल्प मात्र से महान परिवर्तन हो जाते हैं। पर यह सब कुछ संभव होने पर भी महात्माओं का मत यही है कि साधक को अपना लक्ष्य सदा मोक्ष रखना चाहिये। ये समस्त सिद्धियाँ “अपरा” कही जाती हैं। परा सिद्धि मोक्ष ही है जिसका लक्ष्य अपने स्वरूप अनुभव करके मुक्ति प्राप्त करना होता है।